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महंगे कैफे में 6 साल की बच्ची से कप गिरा तो अमीर मालकिन ने उसके अकेले पिता को सबके सामने थप्पड़ मारकर कहा, “बच्ची को बाहर लाने से पहले तमीज़ सिखाओ”, पिता बस चुपचाप बेटी को सीने से लगाकर खड़ा रहा, लेकिन उसके चेहरे का पुराना निशान देखकर बॉडीगार्ड काँप उठा और 3,000 करोड़ का राज खुलने लगा।

PART 1

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दिल्ली के खान मार्केट के सबसे महंगे कैफे में, अवंतिका राठौर ने 6 साल की बच्ची के सामने उसके अकेले पिता को थप्पड़ मार दिया, सिर्फ इसलिए क्योंकि गर्म चॉकलेट की एक प्याली उसके 1,20,000 रुपये के इटैलियन जूतों पर गिर गई थी।

थप्पड़ की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि कैफे की हँसी, कपों की खनक और धीमी अंग्रेज़ी बातचीत एक पल में जम गई। कॉफी मशीन की सीटी भी जैसे बीच में ही अटक गई। एक वेटर ट्रे में रखे 3 कप लेकर वहीं ठिठक गया। शीशे के पास बैठी 2 लड़कियाँ अपना फोन नीचे करना भूल गईं। और कोने वाली मेज़ पर बैठे बुजुर्ग दंपती के हाथ से अखबार आधा मुड़कर रह गया।

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अर्जुन मल्होत्रा नहीं हिला।

उसने बस अपनी बेटी सिया को और कसकर सीने से लगा लिया। सिया का छोटा शरीर काँप रहा था। उसकी गुलाबी फ्रॉक पर चॉकलेट के धब्बे थे, आँखों में डर था और दोनों हाथ उसके पिता की पुरानी नीली शर्ट के कॉलर में धँसे हुए थे। फर्श पर टूटी हुई प्याली से भूरी धार संगमरमर पर फैल रही थी।

सामने खड़ी अवंतिका राठौर दिल्ली की रक्षा उद्योग की सबसे ताकतवर महिला मानी जाती थी। उसकी कंपनी राठौर एडवांस सिस्टम्स सेना के लिए निगरानी ड्रोन, सीमा सुरक्षा सॉफ्टवेयर और संचार उपकरण बनाती थी। सुबह 11 बजे उसे रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों से 3,000 करोड़ रुपये के अनुबंध पर अंतिम बातचीत करनी थी। उसके पीछे 2 सहायक फाइलें सँभाले खड़ी थीं और एक लंबा-चौड़ा बॉडीगार्ड काले सूट में दरवाज़े के पास खड़ा था।

लेकिन अर्जुन का ध्यान जूतों पर नहीं था।

वह सिर्फ सिया को देख रहा था।

क्योंकि कुछ सेकंड पहले सिया फर्श पर गिरी थी।

सुबह तो किसी छोटे त्योहार जैसी शुरू हुई थी। 10 दिनों बाद पहली बार सिया ने उठते ही अपनी माँ का नाम लेकर रोना शुरू नहीं किया था। उसने खिड़की से आसमान देखा और पूछा था, “पापा, आज बादल दुखी नहीं हैं ना?” अर्जुन ने मुस्कराकर कहा था कि आज बादल छुट्टी पर हैं। फिर सिया ने डांस क्लास जाने से पहले उसी कैफे की गर्म चॉकलेट माँगी थी, जहाँ वेट्रेस कभी-कभी ऊपर दिल बना देती थी।

रिया की मौत के बाद अर्जुन ऐसी छोटी-छोटी बातों से ही जिंदगी को बाँधकर रखता था। रिया 34 साल की उम्र में कैंसर से चली गई थी। 18 महीने अस्पताल, कीमोथेरेपी, झूठी मुस्कानें और सिया को छुपाकर बहाए गए आँसू। आखिरी रात उसने अर्जुन की कलाई पकड़कर कहा था, “उसे हँसाते रहना, अर्जुन। जब तुम्हारा मन बिल्कुल न हो तब भी।”

तब से अर्जुन पिता भी था, माँ भी। बालों की टेढ़ी चोटियाँ बनाना, स्कूल की मीटिंग में अकेले जाना, रात में कहानी सुनाते-सुनाते रोने से बचना, सब उसने सीखा था। 42 साल का अर्जुन बाहर से साधारण आदमी लगता था। पुरानी जींस, घिसे जूते, हल्की दाढ़ी, आँखों के नीचे गड्ढे। कोई नहीं जानता था कि वह 14 साल तक भारतीय सेना की विशेष टुकड़ी में रहा था, ऐसी जगहों पर जहाँ मिशन के नाम भी सार्वजनिक नहीं होते।

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अवंतिका फोन पर बात करते हुए अंदर आई थी।

“मुझे मंत्रालय की शर्तों से मतलब नहीं है,” वह तेज़ आवाज़ में कह रही थी। “अगर डिलीवरी नवंबर से पहले चाहिए तो फाइल आज साइन होगी। 3,000 करोड़ का सौदा किसी अफसर की नैतिकता पर नहीं रुकेगा।”

सिया अपनी खाली प्याली और नैपकिन लेकर कूड़ेदान की तरफ जा रही थी।

“सिया, रुको,” अर्जुन ने कहा।

बच्ची रुक ही रही थी कि अवंतिका बिना देखे मुड़ी। टक्कर हुई। प्याली उड़ी। चॉकलेट जूतों पर गिरी। सिया धप्प से बैठ गई।

“ये क्या बदतमीज़ी है!” अवंतिका चीखी।

सिया ने काँपते हुए कहा, “सॉरी आंटी… मुझसे गलती हो गई…”

अवंतिका ने बच्ची को नहीं, अपने जूतों को देखा।

“तुम्हें पता है ये कितने महंगे हैं? तुम्हारे माँ-बाप ने तुम्हें सिखाया नहीं कि अच्छे लोगों की जगहों पर कैसे चलते हैं?”

वह सिया का हाथ पकड़ने को झुकी, मगर अर्जुन बीच में आ चुका था।

“मेरी बेटी को मत छूइए।”

आवाज़ धीमी थी, पर इतनी ठंडी कि आसपास बैठे लोग सीधा बैठ गए।

अवंतिका ने उसे सिर से पैर तक देखा। पुराने कपड़े, थका चेहरा, साधारण आदमी। उसने तुरंत फैसला कर लिया कि यह कोई दबाने लायक इंसान है।

“आपकी बेटी ने मेरे जूते खराब किए हैं,” उसने दाँत भींचकर कहा।

“जूते साफ हो जाते हैं,” अर्जुन बोला। “बच्चे शब्द याद रखते हैं।”

यह सुनते ही कैफे में अजीब-सी खामोशी फैल गई। एक लड़के ने फोन उठाकर रिकॉर्डिंग शुरू कर दी। अवंतिका ने कैमरे देखे और उसका अहंकार घायल हो गया।

“सुनिए, मिस्टर जो भी हैं आप,” वह और पास आई। “मैं अवंतिका राठौर हूँ। मेरी एक मीटिंग से आपके पूरे मोहल्ले की 50 साल की कमाई निकल सकती है। मुझे किसी ऐसे आदमी से तहज़ीब सीखने की ज़रूरत नहीं, जो अपनी बदतमीज़ बच्ची को महंगे कैफे में घुमाने लाया है।”

सिया अर्जुन की गर्दन में मुँह छुपाकर सिसकने लगी।

अर्जुन की आँखों में पहली बार कठोरता आई।

“मेरी बेटी के बारे में एक शब्द और मत बोलिए।”

“वरना?”

“वरना आपको यह मिनट याद रहेगा।”

अवंतिका हँसी।

“धमकी दे रहे हैं? मैं पुलिस बुला सकती हूँ। मैं कह सकती हूँ कि आप हिंसक हैं। मैं बाल कल्याण वालों को बुलाकर आपकी बच्ची आपसे दूर करवा सकती हूँ। आप जैसे लोगों के पास हमेशा कुछ छुपाने को होता है।”

अर्जुन ने गहरी साँस ली।

“आपका तमाशा खत्म हो चुका है।”

लेकिन अवंतिका ने इतने साल सत्ता में बिताए थे कि उसे माफी माँगना हार लगता था। उसने हाथ उठाया और अर्जुन के चेहरे पर थप्पड़ मार दिया।

थप्पड़ उसकी गाल की हड्डी के ठीक नीचे पड़ी लंबी, फीकी चोट के निशान पर पड़ा।

सिया चीख पड़ी।

अर्जुन ने हाथ नहीं उठाया। वह पीछे नहीं हटा। उसने बस अवंतिका को देखा, इतनी स्थिर आँखों से कि कुछ लोगों को अचानक डर लगने लगा।

उसी समय बॉडीगार्ड आगे बढ़ा।

“सर, बच्ची को नीचे रखिए और मैडम से दूर हटिए,” उसने कठोर आवाज़ में कहा।

अर्जुन नहीं हिला।

बॉडीगार्ड 2 कदम और बढ़ा। फिर उसकी नज़र अर्जुन की चोट के निशान पर पड़ी। फिर आँखों पर। फिर शर्ट की मुड़ी आस्तीन के नीचे धुंधले टैटू पर—एक काला चीता, 7 अंक और 3 अक्षर जिन्हें केवल कुछ लोग पहचानते थे।

बॉडीगार्ड का चेहरा सफेद पड़ गया।

उसके होंठ काँपे।

“साहब…” वह फुसफुसाया। “मेजर साहब… मुझे माफ कर दीजिए। मुझे नहीं पता था कि ये आप हैं।”

PART 2

अवंतिका ने पलटकर उसे घूरा।

“विक्रम, ये क्या बकवास है? तुम मेरे लिए काम करते हो।”

विक्रम ने पहली बार उसकी ओर बिना झुके देखा।

“मैं करता था, मैडम।”

कैफे में सन्नाटा और गहरा गया।

अवंतिका चिल्लाई, “मेजर? ये आदमी? ये कोई गरीब अकेला पिता है।”

विक्रम की आँखों में शर्म और गर्व साथ-साथ चमक रहे थे।

“मैडम, आपने उस आदमी को मारा है जिसने कश्मीर में 7 जवानों को जिंदा निकाला था, जब पूरी यूनिट मान चुकी थी कि वे वापस नहीं आएँगे। आपने उसकी बेटी को डराया है। आपको अंदाज़ा भी नहीं कि आप किसके सामने खड़ी हैं।”

“मुझे उसके तमगों से फर्क नहीं पड़ता,” अवंतिका ने फोन निकालते हुए कहा। “मैं अभी लेफ्टिनेंट जनरल भसीन को कॉल करती हूँ।”

उसने स्पीकर ऑन किया।

“जनरल, मैं एक कैफे में हूँ। एक हिंसक आदमी ने मुझे धमकाया है। मेरा गार्ड उसे मेजर कहकर बचा रहा है।”

दूसरी तरफ भारी आवाज़ आई, “नाम?”

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा, “अर्जुन मल्होत्रा।”

फोन के उस पार अचानक चुप्पी जम गई।

फिर आवाज़ बदली।

“अर्जुन… सिया ठीक है?”

अवंतिका की उँगलियाँ फोन पर जड़ हो गईं।

अर्जुन ने बेटी की पीठ सहलाई।

“ठीक थी, सर। जब तक आपकी आपूर्तिकर्ता ने उसे धक्का देकर डराया, मुझे धमकाया और फिर मारा नहीं।”

जनरल की आवाज़ लोहे जैसी हो गई।

“अवंतिका, अनुबंध तत्काल निलंबित है।”

PART 3

अवंतिका को लगा जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से संगमरमर खींच लिया हो। उसके चेहरे पर पहली बार वह डर आया जो वह हमेशा दूसरों की आँखों में देखना चाहती थी।

“सर, आप ऐसा नहीं कर सकते,” उसने जल्दी से कहा। “मंत्रालय को हमारी तकनीक चाहिए। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।”

“राष्ट्रीय सुरक्षा केवल मशीनों से नहीं चलती,” जनरल भसीन की आवाज़ कैफे की हर मेज़ तक पहुँची। “यह चरित्र से चलती है। जो महिला एक बच्ची को डराकर उसके पिता पर झूठा आरोप लगाने की धमकी दे सकती है, उसके निर्णयों की जाँच जरूरी है। आपकी कंपनी के सभी संवेदनशील अनुबंध रोक दिए जाएँगे, जब तक पूरा ऑडिट नहीं होता।”

“सर, बोर्ड—”

“आपका बोर्ड जवाब देगा। और आप मेरा नाम लेकर किसी नागरिक को डराने की कोशिश फिर कभी नहीं करेंगी।”

आवाज़ थोड़ी नरम हुई।

“अर्जुन, मुझे अफसोस है। बच्ची को घर ले जाओ। बाकी हम देखेंगे।”

“धन्यवाद, सर,” अर्जुन ने कहा।

कॉल कट गया।

अवंतिका फोन पकड़े खड़ी रह गई। 4 मिनट पहले वह पूरे कैफे पर राज कर रही थी। अब उसकी आवाज़, उसका पैसा, उसका रुतबा, सब फर्श पर गिरी टूटी प्याली जैसा लग रहा था।

तभी दरवाज़े पर 2 पुलिसकर्मी आए। बाहर नीली बत्ती का प्रकाश शीशे पर चमक रहा था। उम्रदराज इंस्पेक्टर ने फर्श, रोती बच्ची, अर्जुन के गाल पर लाल निशान और अवंतिका के काँपते हाथ देखे।

“यहाँ झगड़े की सूचना मिली थी,” उसने कहा।

अवंतिका तुरंत आगे बढ़ी।

“अच्छा हुआ आप आ गए। इस आदमी को गिरफ्तार कीजिए। इसने मुझे धमकाया है। इसकी बेटी ने मुझ पर हमला किया। मेरा गार्ड भी अपना काम नहीं कर रहा।”

अर्जुन कुछ कहता, उससे पहले कोने वाली मेज़ से वह लड़का उठ गया जो वीडियो बना रहा था।

“सर, ये झूठ बोल रही हैं। पूरा वीडियो मेरे पास है।”

अवंतिका गरजी, “तुम चुप रहो।”

लड़के ने फोन आगे कर दिया।

“इन्होंने बच्ची को धक्का दिया, फिर चिल्लाईं, फिर पिता को धमकाया, फिर थप्पड़ मारा।”

एक महिला ने कहा, “मेरे पास भी रिकॉर्डिंग है।”

वेट्रेस की आँखें भर आईं।

“सर, बच्ची ने गलती भी नहीं की थी। वह तो माफी माँग रही थी।”

इंस्पेक्टर ने अवंतिका की ओर देखा। उसकी आवाज़ में थकान थी, जैसे उसने जिंदगी में बहुत अमीर झूठे देखे हों।

“मैडम, कृपया मुड़िए।”

“क्या मतलब?”

“आपको सार्वजनिक स्थान पर हिंसा, झूठी शिकायत की कोशिश और शांति भंग करने के आरोप में हिरासत में लिया जा रहा है।”

“आप जानते हैं मैं कौन हूँ?”

इंस्पेक्टर ने हथकड़ी निकाली।

“जी। इस समय आप वही व्यक्ति हैं जिसे मैं गिरफ्तार कर रहा हूँ।”

हथकड़ी की आवाज़ कैफे में गूँजी। वह आवाज़ थप्पड़ से भी भारी थी।

अवंतिका चीखने लगी। उसने वकीलों, मंत्रियों, मीडिया और बर्बाद कर देने की धमकियाँ दीं। मगर इस बार कोई नहीं डरा। जिन आँखों को वह हमेशा नीचे झुकते देखने की आदी थी, वे आज सीधे उसे देख रही थीं।

अर्जुन ने सिया का चेहरा अपनी छाती की ओर कर दिया ताकि वह यह दृश्य न देखे।

लेकिन दरवाज़े से बाहर जाते हुए अवंतिका ने गर्दन मोड़ी।

“तुम पछताओगे, अर्जुन मल्होत्रा,” उसने धीमे मगर जहरीले स्वर में कहा।

अर्जुन ने उत्तर नहीं दिया। उसने बस सिया के बालों को चूमा।

दोपहर तक वीडियो 10 लाख लोगों ने देख लिया था। शाम तक पूरा देश बात कर रहा था। खबरों में शीर्षक दौड़ रहे थे—दिल्ली के कैफे में रक्षा कंपनी की मालकिन ने अकेले पिता को मारा, सेना का पूर्व अधिकारी निकला साधारण आदमी, 3,000 करोड़ का अनुबंध रुका।

लेकिन कोई शीर्षक यह नहीं बता रहा था कि अर्जुन जीत नहीं महसूस कर रहा था।

उसे बदला नहीं चाहिए था। उसे कैमरे नहीं चाहिए थे। उसे पत्रकारों की भीड़ नहीं चाहिए थी जो उसके अपार्टमेंट के बाहर खड़ी होकर सिया की तस्वीर माँगती। वह नहीं चाहता था कि उसकी बच्ची किसी बहस का प्रतीक बन जाए। वह बस चाहता था कि रात को सिया बिना डर के सो पाए।

उस रात सिया डाइनिंग टेबल पर तितलियाँ बना रही थी। अर्जुन रसोई में चावल धो रहा था। घर छोटा था, लेकिन रिया की तस्वीर, सिया की ड्रॉइंग और पुराने पर्दों में एक गर्माहट थी जिसे कोई महंगा कैफे खरीद नहीं सकता था।

“पापा?”

“हाँ, गुड़िया।”

“वो आंटी बुरी थीं?”

अर्जुन ने नल बंद किया। यह सवाल गोलियों से कठिन था।

वह उसके सामने बैठ गया।

“उन्होंने बुरा काम किया।”

सिया ने पेंसिल रोक दी।

“लेकिन वो खुद बुरी हैं?”

अर्जुन ने बेटी के छोटे हाथ देखे। वही हाथ जो सुबह डर से काँप रहे थे।

“कभी-कभी लोग इतने साल आदेश देते रहते हैं कि उन्हें माफी माँगना याद ही नहीं रहता।”

सिया ने नीली तितली में बैंगनी रंग भरा।

“आपने उन्हें वापस क्यों नहीं मारा?”

अर्जुन ने अपनी हथेलियाँ देखीं। ये हथेलियाँ कभी घायल सैनिकों को उठाती थीं, बंद दरवाज़े तोड़ती थीं, बंदूक पकड़ती थीं। अब इन्हीं हाथों से वह सिया के बाल सँवारता था, टिफिन बनाता था, रात को डर लगने पर उसका हाथ पकड़ता था।

“क्योंकि ताकत का मतलब हर वह चीज़ करना नहीं है जो हम कर सकते हैं। ताकत कभी-कभी यह चुनना है कि हम क्या नहीं करेंगे।”

सिया ने गंभीर होकर पूछा, “जैसे डिनर से पहले सारी मिठाई न खाना?”

अर्जुन कई दिनों बाद सचमुच मुस्कराया।

“बिल्कुल वैसा ही।”

लेकिन उस रात वह सो नहीं सका।

अगले दिन राठौर एडवांस सिस्टम्स के शेयर 38 प्रतिशत गिर गए। रक्षा मंत्रालय ने ऑडिट की घोषणा कर दी। पुराने कर्मचारियों ने सोशल मीडिया पर लिखना शुरू किया—मीटिंग में अपमान, रात 2 बजे तक काम, गर्भवती कर्मचारी को नौकरी से निकालने की धमकी, जूनियर इंजीनियरों पर चीखना, और अनुबंध पाने के लिए दबाव डालना। वह थप्पड़ अवंतिका का पहला पाप नहीं था। वह सिर्फ पहला पाप था जिसे सबने देख लिया।

3 दिन बाद अर्जुन के घर एक सफेद लिफाफा आया। कोई लोगो नहीं, कोई वकील का नाम नहीं। केवल हाथ से लिखा था—अर्जुन मल्होत्रा।

अंदर अवंतिका का पत्र था।

अर्जुन ने पहले उसे फाड़ने का सोचा। फिर उसने पढ़ा, क्योंकि वह जानना चाहता था कि यह नई चाल है या पहली बार सच में पछतावा।

पत्र में प्रेस बयान जैसी भाषा नहीं थी। कई शब्द काटे गए थे। स्याही 2 जगह फैली हुई थी। अवंतिका ने लिखा था कि उसने वीडियो बिना आवाज़ के 2 रातों तक देखा, क्योंकि अपनी ही आवाज़ सुनने की हिम्मत नहीं हुई। उसने अपने पिता का जिक्र किया, जो जयपुर के उद्योगपति थे और हमेशा कहते थे कि रक्षा कारोबार में औरत को जगह नहीं मिलेगी। उसने लिखा कि पहले उसने कठोर होना सीखा, फिर डर पैदा करना सीखा, फिर उसे डर पसंद आने लगा क्योंकि डर से काम जल्दी होता था।

एक पंक्ति पर अर्जुन की नज़र रुक गई।

“आपकी बेटी ने उस प्याली के लिए माफी माँगी जिसे मैंने उसके भीतर तोड़ा था।”

अर्जुन ने पत्र मेज़ पर रख दिया।

उसे दया नहीं आई।

लेकिन एक भारी बात महसूस हुई—कभी-कभी नुकसान पहुँचाने वाला इंसान भी पहली बार अपने नुकसान को देख सकता है।

एक हफ्ते बाद अदालत में पहली सुनवाई थी। कमरा पत्रकारों से भरा था। पीछे कुछ पूर्व सैनिक चुपचाप बैठे थे। कोई नारा नहीं, कोई तमाशा नहीं। बस उपस्थिति। विक्रम भी दूसरी पंक्ति में था, सिर झुकाए। वह लड़का भी आया था जिसने वीडियो बनाया था। उसकी आँखों के नीचे नींद की कमी साफ दिख रही थी, जैसे वह समझ नहीं पा रहा था कि उसके फोन ने कितनी जिंदगियाँ बदल दीं।

अवंतिका अंदर आई तो वह पहले जैसी नहीं दिख रही थी। न महंगा सफेद सूट, न सहायक, न काला चश्मा। साधारण काली साड़ी, बिना चमक के। वह छोटी लग रही थी, शायद इसलिए नहीं कि उसकी कंपनी खतरे में थी, बल्कि इसलिए कि कमरे में कोई उससे डर नहीं रहा था।

जज ने घटना पढ़ी। उसके वकील ने तुरंत खड़े होकर कहा कि बात को संदर्भ में देखना होगा, मानसिक दबाव था, कंपनी का तनाव था, मीडिया ने—

अवंतिका ने उसके हाथ पर हाथ रख दिया।

“नहीं।”

वकील रुक गया।

अवंतिका खड़ी हुई।

“माननीय न्यायाधीश, मैं घटना से इनकार नहीं करती। मैंने अर्जुन मल्होत्रा को थप्पड़ मारा। मैंने उनकी बेटी को डराया। मैंने पुलिस के सामने झूठ बोलने की कोशिश की। कोई कारोबार, कोई तनाव, कोई निजी इतिहास इसे सही नहीं बना सकता।”

कैमरे चमके।

जज ने पूछा, “आपको पता है इस बयान के कानूनी परिणाम होंगे?”

“हाँ।”

फिर वह अर्जुन की ओर मुड़ी।

उसकी आँखों में पानी था, पर वह रोकर खुद को पीड़ित नहीं दिखाना चाहती थी।

“मिस्टर मल्होत्रा, मुझे अफसोस है। इसलिए नहीं कि मेरा अनुबंध रुका। इसलिए नहीं कि मुझे हथकड़ी लगी। इसलिए क्योंकि आपकी बेटी ने 1 पल के लिए यह मान लिया कि उसे मेरे रास्ते में आने के लिए माफी माँगनी चाहिए।”

अर्जुन चुप रहा।

सिया अदालत में नहीं थी। वह अपनी बच्ची को कैमरों के सामने कभी नहीं लाता।

“मैं वह 1 पल वापस नहीं कर सकती,” अवंतिका बोली। “मैं सिर्फ उसे स्वीकार कर सकती हूँ और जो सजा मिले, उसे ले सकती हूँ।”

अदालत ने उसे जुर्माना, 200 घंटे सामुदायिक सेवा, गुस्सा नियंत्रित करने की थेरेपी और शोकग्रस्त परिवारों की सहायता करने वाली संस्था में अनिवार्य काम की सजा दी। कंपनी के खिलाफ अलग जाँच चलती रही। बोर्ड ने उसी शाम उसे पद से हटा दिया, हालांकि उसने उससे पहले ही इस्तीफा लिख दिया था।

अदालत से बाहर पत्रकारों ने अर्जुन को घेर लिया।

“क्या आप उन्हें माफ करेंगे?”

“क्या आप मुआवजा माँगेंगे?”

“देश आपको हीरो कह रहा है, आप क्या कहेंगे?”

अर्जुन बिना जवाब दिए आगे बढ़ा।

पीछे से अवंतिका की आवाज़ आई।

“मेजर साहब।”

वह रुक गया।

“मैं आपके माफ करने लायक नहीं हूँ,” उसने कहा।

अर्जुन मुड़ा।

“माफी कोई कमाई हुई चीज़ नहीं होती। इसलिए वह महँगी होती है।”

अवंतिका ने होंठ भींचे।

“सिया कैसी है?”

अर्जुन ने पार्किंग की ओर देखा, जहाँ सिया विक्रम की पत्नी के साथ कार में बैठी बिस्किट खा रही थी।

“उसके पास सवाल हैं।”

“बच्चों के पास बड़ों की वजह से ऐसे सवाल नहीं होने चाहिए।”

“नहीं,” अर्जुन ने कहा। “नहीं होने चाहिए।”

कुछ महीने बीत गए।

लोगों ने इंटरनेट पर उस कहानी को बदले की कहानी बना दिया। थप्पड़। टैटू। बॉडीगार्ड का बदलना। जनरल का फोन। हथकड़ी। कंपनी का गिरना। उन्हें यह सब रोमांचक लगता था।

लेकिन अर्जुन के लिए वह जीत की कहानी नहीं थी।

उसके केंद्र में 6 साल की बच्ची थी, जिसने सोचा था कि थोड़ी चॉकलेट गिरने से दुनिया टूट गई।

जब भी सिया “कैफे वाले दिन” के बारे में पूछती, अर्जुन उसे यह नहीं बताता कि कितने करोड़ का सौदा रुका। वह उसे बताता कि वेट्रेस ने उसे बाद में मुफ्त ब्राउनी दी थी। वह बताता कि एक लड़के ने सच बोलने की हिम्मत की थी। वह बताता कि कुछ अजनबी लोग उस दिन उसके पक्ष में खड़े हुए थे।

एक रविवार को विक्रम घर आया। साथ में अर्जुन का पुराना साथी कबीर भी था, जो सेना में डॉक्टर रहा था और जिसे अर्जुन ने कभी घायल हालत में सीमा से निकाला था। सिया ने तीनों को फर्श पर बैठाकर तितली बनाने की प्रतियोगिता करवाई। 2 पूर्व सैनिक गंभीरता से बहस कर रहे थे कि तितली के 5 पंख हो सकते हैं या नहीं। सिया इतनी जोर से हँसी कि कालीन पर गिर पड़ी।

अर्जुन ने रिया की तस्वीर की ओर देखा।

“उसे हँसाते रहना।”

वह हँस रही थी।

हर दिन नहीं। बिना दर्द के नहीं। मगर हँस रही थी।

6 महीने बाद एक छोटा पार्सल आया। भेजने वाले का नाम नहीं था। अंदर हाथ से रंगी हुई चीनी मिट्टी की प्याली थी। उस पर नीली तितलियाँ बनी थीं। हैंडल थोड़ा टेढ़ा था। प्याली महंगी नहीं लग रही थी, बल्कि अधूरी-सी, मानवीय-सी लग रही थी।

कार्ड पर लिखा था—

“प्यालियाँ बदली जा सकती हैं। बचपन नहीं।”

अर्जुन ने प्याली सिया के सामने रखी।

सिया ने उँगली से तितलियों को छुआ।

“ये वही आंटी हैं?”

“शायद।”

“उन्होंने सीख लिया?”

अर्जुन ने खिड़की से आती शाम की रोशनी देखी।

“शायद उन्होंने शुरू किया है।”

सिया ने बहुत गंभीरता से सिर हिलाया।

“शुरू करना, गलत करते रहने से अच्छा होता है।”

उस शाम वे कैफे नहीं गए। सिया ने घोषणा की थी कि कैफे सामान्य लोगों के लिए बहुत नाटकीय जगह है। अर्जुन ने घर पर गर्म चॉकलेट बनाई। दोनों इंडिया गेट के लॉन की तरफ चले गए। घास नम थी। बच्चे पतंग जैसी दौड़ रहे थे। एक परिवार चाट बाँट रहा था। दूर कहीं कोई बाँसुरी बजा रहा था। दिल्ली अपने शोर, धूल और कोमलता के साथ चलती रही।

सिया ने अपना सिर अर्जुन के बाजू से टिका दिया।

“पापा?”

“हाँ, गुड़िया।”

“अगर कोई फिर मेरे साथ बुरा करेगा, तो आप फिर शांत रहोगे?”

अर्जुन ने उसके होंठों के पास लगी चॉकलेट पोंछी।

“मैं हमेशा तुम्हारी रक्षा करूँगा।”

“पर मारोगे नहीं?”

उसने अपनी खुली हथेलियाँ देखीं।

“अगर मैं तुम्हारी रक्षा बिना क्रूर बने कर सकता हूँ, तो मैं हमेशा वही चुनूँगा।”

सिया ने राहत की साँस ली। शायद वह पूरी बात नहीं समझी थी, मगर उसे पिता की आवाज़ में सच महसूस हुआ।

उस सुबह अवंतिका राठौर ने सोचा था कि उसने एक अदृश्य आदमी को थप्पड़ मारा है। एक साधारण, थका हुआ, अकेला पिता, जिसे सबके सामने अपमानित किया जा सकता है।

असल में उसने एक आईना थप्पड़ मारा था।

और उस कैफे की खामोशी में, हर इंसान ने 1 पल के लिए अपना असली चेहरा देख लिया।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.