Posted in

22 साल की वेट्रेस ने 72 साल की अजनबी मां को बचाने के लिए 4 गोलियां खा लीं, लेकिन अस्पताल में होश आते ही उसे पता चला, “अब बचना है तो डॉन की पत्नी बनना होगा”

भाग 1

Advertisements

मुंबई की बरसाती रात में जब 22 साल की वेट्रेस ने अपने सीने और पेट पर 4 गोलियां खाईं, तब वह किसी फिल्म की हीरोइन नहीं थी, बस 1 गरीब लड़की थी जिसने 72 साल की बूढ़ी औरत को मरने से बचा लिया था।

माटुंगा की पुरानी गली में “श्री अन्नपूर्णा भोजनालय” नाम का छोटा-सा रेस्टोरेंट था, जहां रात को आम लोग कम और खामोश चेहरे ज्यादा आते थे। बाहर से वह जगह साधारण लगती थी—स्टील की मेजें, दीवार पर भगवान गणेश की तस्वीर, काउंटर पर रखी इलायची वाली चाय, और रसोई से उठती मसालों की खुशबू। लेकिन शहर के कुछ लोग जानते थे कि हर मंगलवार रात वहां किसका आना तय होता था।

Advertisements

काव्या मिश्रा वहीं काम करती थी। पिता के इलाज में घर बिक चुका था, मां पहले ही गुजर गई थी, और छोटा भाई रोहन इंजीनियरिंग कॉलेज की फीस के लिए उसकी तरफ देखता था। दिन में वह नर्सिंग की पढ़ाई करती, रात में थाली परोसती। उसकी मुस्कान थकी हुई होती, पर नकली नहीं।

उस रात ठीक 9:00 बजे रेस्टोरेंट की हवा बदल गई। दरवाजे पर 2 भारी-भरकम आदमी खड़े हुए और अंदर आईं सावित्री राणे। सफेद रेशमी साड़ी, मोतियों की माला, माथे पर छोटी-सी बिंदी और आंखों में ऐसा सन्नाटा, जिससे बड़े-बड़े लोग निगाहें झुका लेते थे। वह मुंबई अंडरवर्ल्ड के सबसे ताकतवर घराने की मां थीं। उनके बेटे विक्रम राणे का नाम पुलिस फाइलों में डर की तरह लिखा जाता था, मगर काव्या उन्हें बस “अम्मा जी” कहती थी।

—आज भी वही नींबू वाली दाल और नरम फुल्के? काव्या ने मुस्कुराकर पूछा।

सावित्री ने पहली बार की तरह उसे देखा, फिर हल्का-सा हंसीं।

—तू याद रखती है, बेटी।

—कुछ लोग टिप से याद रहते हैं, आप दुआ से।

सावित्री की आंखें नरम पड़ गईं। बाहर बारिश तेज हो रही थी। तभी काव्या ने शीशे के पार 1 काली स्कॉर्पियो को धीरे से रुकते देखा। उसका दिल अजीब तरह से धड़का। दरवाजा खुला। अंदर 1 आदमी आया, जिसने रेनकोट का हुड चेहरे तक खींच रखा था। वह नियमित ग्राहक नहीं था। उसके जूते कीचड़ से भरे थे, लेकिन चाल बहुत साफ थी—जैसे वह रास्ता पहले से नाप चुका हो।

काव्या रसोई की तरफ मुड़ी ही थी कि उसने देखा, आदमी ने जेब से पिस्तौल निकाली। निशाना सीधे कोने वाली मेज पर बैठी सावित्री राणे पर था।

—नीचे झुकिए! काव्या चीखी।

Advertisements

वह सोच भी नहीं पाई। ट्रे हाथ से छूटी, स्टील के गिलास फर्श पर गिरे, और काव्या पूरे शरीर से सावित्री पर झपट पड़ी। सावित्री कुर्सी से टकराकर नीचे गिरीं। उसी पल 4 दबे हुए धमाके हुए।

काव्या का शरीर झटका खाकर मेज पर गिरा, फिर फर्श पर लुढ़क गया। सफेद एप्रन लाल हो गया। रेस्टोरेंट में चीखें गूंज उठीं। हमलावर बाहर भाग गया। गार्ड देर से जागे, पर तब तक स्कॉर्पियो बारिश में गायब हो चुकी थी।

सावित्री कांपते हाथों से काव्या का सिर अपनी गोद में लेने लगीं।

—बेटी, आंखें खोल। तूने मुझे क्यों बचाया?

काव्या की सांस टूट रही थी।

—आप… ठीक हैं न?

उसी वक्त दरवाजा धड़ाम से खुला। विक्रम राणे अंदर आया। काला सूट भीग चुका था, आंखें खून जैसी थीं। उसने पहले मां को देखा, फिर फर्श पर पड़ी काव्या को।

—मां, कहां लगी?

सावित्री रो पड़ीं।

—मुझे नहीं, उसे लगी है। इस बच्ची ने मेरी मौत अपने ऊपर ले ली।

विक्रम घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपना कोट उतारकर काव्या के जख्मों पर दबाया।

—सुनो, काव्या। अभी मत मरना। मेरी मां की सांसें तुम्हारे कारण चल रही हैं। अब तुम्हारी सांस मेरी जिम्मेदारी है।

काव्या की आंखें बंद होने लगीं। आखिरी आवाज जो उसने सुनी, वह विक्रम की थी।

—जिसने इस पर गोली चलाई है, उसने मेरी दुनिया को छू लिया है।

भाग 2

4 दिन बाद काव्या ने आंखें मुंबई के 1 निजी अस्पताल के कमरे में खोलीं। उसके शरीर में टांके थे, कंधा पट्टियों में बंद था, पेट में जलन थी, और कमरे के बाहर हथियारबंद आदमी खड़े थे। उसे लगा वह बच गई है, मगर विक्रम राणे की आंखें बता रही थीं कि असली खतरा अब शुरू हुआ था।

विक्रम उसके पास कुर्सी खींचकर बैठा।

—मेरी मां जिंदा हैं। तुम्हारी वजह से।

काव्या की आंखों में आंसू आ गए।

—मेरा भाई?

—सुरक्षित है। उसकी फीस भर दी गई है।

काव्या ने डरकर पूछा।

—मुझे यहां क्यों पहरा दे रहे हैं?

विक्रम ने सच छिपाया नहीं।

—क्योंकि जिसने मां को मारना चाहा, वह अब तुम्हें मारेगा। तुम गवाह भी हो, और उनके लिए अपमान भी।

काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया।

—तो मैं बचकर भी मरने वाली हूं?

तभी सावित्री कमरे में आईं। उनके हाथ में तुलसी की माला थी।

—नहीं, अगर तू हमारे घर की हो जाए।

काव्या समझी नहीं। विक्रम ने जबड़े भींचे।

—मेरी मां चाहती हैं कि मैं तुमसे शादी करूं।

काव्या की धड़कन मशीन पर तेज दिखाई देने लगी।

—आप पागल हैं? मैं आपको जानती तक नहीं।

—मुझे भी यह सही नहीं लगता, विक्रम बोला, लेकिन हमारे नियमों में डॉन की पत्नी को छूना युद्ध माना जाता है। बाहर रहोगी तो शिकार बनोगी। मेरे नाम में आओगी तो कोई हाथ नहीं लगाएगा।

काव्या ने आंखें बंद कर लीं। उसे पिता की उधारी, भाई का भविष्य और उस रेनकोट वाले आदमी की ठंडी आंखें याद आईं।

—ये शादी… सिर्फ सुरक्षा के लिए होगी?

—जब तक तुम चाहो।

2 घंटे बाद उसी अस्पताल के कमरे में पंडित बुलाया गया। काव्या अस्पताल के बिस्तर पर थी, विक्रम उसके पास खड़ा था, और सावित्री रोते हुए मंत्र सुन रही थीं। विक्रम ने अपनी दादी की पुरानी अंगूठी काव्या की उंगली में पहनाई।

—अब तुम अकेली नहीं हो, उसने धीमे से कहा।

लेकिन उसी रात 2:15 बजे बाहर खड़ा 1 गार्ड सीढ़ियों में गया और फोन पर फुसफुसाया।

—शादी हो गई। लड़की अब उसकी पत्नी है। मगर अभी कमजोर है। आज रात राणे को विधुर बना सकते हैं।

भाग 3

अस्पताल की चौथी मंजिल पर रात जितनी शांत दिख रही थी, उतनी थी नहीं। गलियारे की सफेद लाइटें लगातार जल रही थीं, पर उनमें भी डर की नीली झिलमिलाहट थी। कमरे के भीतर काव्या आधी नींद में थी। दवाइयों ने शरीर को सुन्न किया था, मगर मन अब भी उस रेस्टोरेंट के फर्श पर अटका था जहां उसकी हथेली खून में भीग गई थी।

विक्रम खिड़की के पास खड़ा था। उसने 3 रातों से ठीक से आंख नहीं झपकाई थी। बाहर खड़े पहरेदारों के कदमों की आवाज वह पहचानने लगा था—कौन धीमे चलता है, कौन जूते घसीटता है, कौन खांसता है। उसी पहचान ने उसे बचाया, क्योंकि अचानक सब आवाजें बंद हो गईं।

सन्नाटा हमेशा खाली नहीं होता। कभी-कभी वह हमले से पहले की सांस होता है।

विक्रम ने धीरे से जैकेट के भीतर हाथ डाला। उसकी उंगलियां पिस्तौल पर टिक गईं।

—काव्या, हिलो मत, उसने फुसफुसाया।

काव्या ने मुश्किल से आंख खोली।

—क्या हुआ?

—चुप रहो।

दरवाजे का हैंडल धीरे-धीरे घूमने लगा। विक्रम ने इंतजार नहीं किया। उसने दरवाजे की लकड़ी के बीचों-बीच 3 गोलियां दागीं। बाहर से दर्द भरी चीख आई। अगले ही पल गलियारा गोलियों की आवाज से फट पड़ा। दरवाजे के टुकड़े, दीवार की धूल और कांच के कण कमरे में उड़ने लगे।

काव्या चीखी, पर विक्रम बिजली की तरह उसके पास पहुंचा। उसने अस्पताल के भारी बिस्तर को पलट दिया। काव्या दर्द से कराह उठी, उसके टांके खिंच गए। विक्रम ने उसे बिस्तर और लोहे के फ्रेम के पीछे खींच लिया।

—मुझ पर भरोसा करो, उसने उसके कान में कहा। आज किसी को तुम्हारे पास नहीं आने दूंगा।

दरवाजा टूटकर खुला। काले कपड़ों में 2 हमलावर अंदर घुसे। विक्रम ने बिना झिझक निशाना लिया। 1 गिरा, फिर दूसरा। तीसरा खिड़की की तरफ से घुसने की कोशिश कर रहा था, लेकिन विक्रम पहले से वहां था। उसने उसे कंधे में गोली मारी और जमीन पर पटक दिया।

काव्या ने पहली बार विक्रम को वैसे देखा जैसे शहर उसे देखता था—बेरहम, तेज, खतरनाक। लेकिन उसी बेरहमी के बीच वह अपने शरीर को ढाल बनाकर उसके सामने खड़ा था। उसके महंगे सूट पर खून के छींटे थे, पर उसकी आंखों में सिर्फ 1 बात थी—काव्या जिंदा रहे।

अलार्म बजने लगे। अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई। कुछ ही मिनटों में राणे परिवार के वफादार आदमी मंजिल पर भर गए। घायल हमलावर को घसीटकर विक्रम के सामने लाया गया।

विक्रम ने उसके कॉलर को पकड़ा।

—किसने रास्ता खुलवाया?

हमलावर हांफता रहा। विक्रम की पकड़ और कस गई।

—बोल।

—रमेश… तुम्हारा अपना गार्ड… उसने कैमरे बंद किए।

विक्रम की आंखें बर्फ हो गईं। बाहर से रमेश को पकड़कर लाया गया। वही आदमी जो 5 साल से राणे परिवार की दहलीज पर खड़ा था, अब घुटनों पर था।

—माफ कर दो साहब, रमेश रोता हुआ बोला। मुझे लगा बस 1 काम है। पैसे बहुत थे।

सावित्री भी वहां पहुंच चुकी थीं। उन्होंने रमेश को घृणा से देखा।

—जिस घर की रोटी खाई, उसी घर की बहू को मारने आया?

काव्या ने “बहू” शब्द सुना तो उसका दिल अजीब तरह से कांपा। यह शादी मजबूरी थी, फिर भी सावित्री की आवाज में बनावट नहीं थी।

विक्रम ने रमेश को वहीं नहीं मारा। उसने बस अपने लोगों से कहा—

—इसे जिंदा रखो। मुझे जानना है असली सांप कौन है।

उस रात काव्या को अस्पताल से निकालकर मुंबई के बाहर अलीबाग के समुद्र किनारे बने राणे हवेली में ले जाया गया। वह जगह घर से ज्यादा किला लगती थी। ऊंचे लोहे के गेट, हर कोने पर कैमरे, लंबे नारियल के पेड़, भीतर संगमरमर की फर्श और इतने कमरे कि काव्या को अपना छोटा किराये का घर याद आकर शर्म नहीं, दर्द हुआ।

उसके लिए हवेली का सबसे बड़ा कमरा खोला गया। निजी डॉक्टर, नर्स, फिजियोथेरेपिस्ट, सब तैनात थे। रोहन को भी सुरक्षित जगह रखा गया। उसकी कॉलेज फीस, हॉस्टल, किताबें—सबका इंतजाम विक्रम ने बिना शोर किए कर दिया।

लेकिन काव्या का शरीर ठीक हो रहा था, मन नहीं। हर रात उसे लगता कोई दरवाजे के पीछे खड़ा है। नींद टूटते ही वह पेट पर हाथ रखती, कंधे की पट्टी छूती, फिर अंगूठी देखती। वह हीरे की अंगूठी उसके लिए कभी ढाल लगती, कभी हथकड़ी।

विक्रम दिन में शायद ही दिखता। सुबह खबर आती कि उसने बंदरगाह का 1 गोदाम सील करवा दिया। दोपहर में पता चलता कि पुलिस ने 1 पुराने गिरोह को उठा लिया। रात को हवेली के बाहर गाड़ियों की आवाजें आतीं और सावित्री चुपचाप पूजा घर में दिया जलाती रहतीं।

काव्या ने 1 शाम सावित्री से पूछा—

—अम्मा जी, क्या मैं सच में इस सबके लायक हूं? मैंने तो बस आपको बचाने की कोशिश की थी।

सावित्री ने उसके बालों पर हाथ फेरा।

—जिस लड़की ने बिना पूछे किसी की जान बचाई, वह हमारे घर की सबसे कीमती चीज है। लायक तू नहीं, हम हैं या नहीं, यह सवाल है।

काव्या ने पहली बार उनके सामने रोया। उसने बताया कि पिता ने आखिरी दिनों में कहा था—“बेटी, गरीब का दिल ही उसका खानदान होता है।” उसने कभी नहीं सोचा था कि 1 दिन वही दिल उसे अंडरवर्ल्ड की रानी बना देगा।

3 हफ्ते बाद सच सामने आया। रमेश ने टूटकर बताया कि हमला दुश्मन गिरोह ने अकेले नहीं कराया था। असली साजिश घर के अंदर से आई थी। विक्रम के चाचा, महेंद्र राणे, जो परिवार के सलाहकार और सावित्री के देवर थे, वर्षों से गद्दी चाहते थे। पहले सावित्री को हटाना था, फिर विक्रम को युद्ध में फंसाकर खत्म करना था। काव्या बीच में आ गई। इसलिए वह भी मरनी जरूरी हो गई।

जब यह बात सावित्री को पता चली, वह घंटों चुप रहीं। उनका चेहरा पत्थर हो गया। महेंद्र वही आदमी था जिसने उनके पति की चिता पर कंधा दिया था, जिसने विक्रम को बचपन में गोद में खिलाया था। परिवार का खून ही परिवार को काटने निकला था।

विक्रम उस रात देर से लौटा। बारिश फिर हो रही थी। काव्या खिड़की के पास खड़ी थी। घाव अभी पूरी तरह भरे नहीं थे, पर वह अब पहले जैसी कांपती लड़की नहीं लग रही थी। उसकी आंखों में डर था, मगर उससे बड़ा सवाल था।

विक्रम ने कमरे में आते ही कहा—

—महेंद्र अब कभी वापस नहीं आएगा। उसके सारे आदमी टूट चुके हैं। दुश्मन गिरोह भी खत्म है। तुम्हारे नाम पर जो खतरा था, वह आज खत्म हो गया।

काव्या ने धीमे से पूछा—

—तो अब मैं जा सकती हूं?

कमरे में मौन भर गया। विक्रम ने उसकी तरफ देखा। वह जवाब देने में उतनी ही देर लगा रहा था जितनी देर 1 आदमी अपनी सबसे कमजोर जगह छिपाने में लगाता है।

—हां, उसने आखिर कहा। अगर तुम जाना चाहो तो। तुम्हारे लिए बांद्रा में सुरक्षित फ्लैट खरीदा है। तुम्हारे भाई की पढ़ाई जारी रहेगी। तुम्हारे ऊपर कोई कर्ज नहीं। यह शादी… अगर तुम चाहो तो कागज पर खत्म हो सकती है।

काव्या ने अंगूठी को देखा। कितनी अजीब बात थी—यह वही अंगूठी थी जिसे पहनते समय उसे लगा था कि उसकी आजादी छिन गई। अब वही अंगूठी उसे उस रात की याद दिला रही थी जब विक्रम ने गोलियों के बीच उसे अपनी बांहों में ढक लिया था।

—आप चाहते क्या हैं? उसने पूछा।

विक्रम ने पहली बार डॉन की तरह नहीं, इंसान की तरह सांस ली।

—मैंने जिंदगी में बहुत कुछ लिया है। जमीन, बंदरगाह, सौदे, बदला। पर तुम्हें लेना नहीं चाहता। तुम्हें रोकना चाहता हूं, लेकिन तुम्हारी मर्जी के बिना नहीं।

काव्या के भीतर कुछ टूटकर जुड़ गया। उसने उसकी आंखों में थकान देखी, खून देखे हाथ देखे, हिंसा से भरी दुनिया देखी। लेकिन उसने वह आदमी भी देखा जो हर रात उसके कमरे के बाहर 10 मिनट रुकता था और बिना अंदर आए वापस चला जाता था, ताकि उसकी नींद न टूटे। वह आदमी जो उसके भाई को फोन पर समझाता था कि पढ़ाई मत छोड़ना। वह आदमी जो सावित्री को दवा समय पर देता था मगर किसी को पता न चलने देता था।

—मैंने 4 गोलियां इसलिए नहीं खाईं थीं कि 1 दिन डरकर भाग जाऊं, काव्या ने कहा।

विक्रम स्थिर रह गया।

—काव्या…

—मैं आपकी दुनिया से डरती हूं। आपसे भी डरती थी। लेकिन जिस रात सब मुझे मारने आए थे, आपने मुझे बचाने के लिए खुद को दीवार बना दिया। आपने मेरे भाई को एहसान की तरह नहीं, जिम्मेदारी की तरह संभाला। अगर यह शादी सिर्फ ढाल थी, तो भी इस ढाल के पीछे मुझे पहली बार परिवार मिला है।

विक्रम की आंखें भीग गईं, पर उसने उन्हें झुकाकर छिपा लिया।

काव्या उसके पास आई। उसके कदम धीमे थे, घाव अभी दुख रहे थे। उसने अपना हाथ उसके सीने पर रखा।

—मैं वापस नहीं जाना चाहती। लेकिन 1 शर्त है।

—जो कहो।

—मेरी जिंदगी का फैसला अब कोई बंदूक, कोई दुश्मन, कोई घर का बुजुर्ग नहीं करेगा। मैं आपकी पत्नी बनकर रहूं तो बराबर की तरह। डर से नहीं।

विक्रम ने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया।

—आज से तुम्हारे बिना इस घर का कोई फैसला पूरा नहीं होगा।

अगली सुबह जब सावित्री पूजा घर में आईं, उन्होंने देखा कि काव्या पहली बार अपनी इच्छा से वहां खड़ी है। उसने साड़ी पहनी थी, कंधे पर पट्टी अब भी थी, चेहरे पर कमजोरी भी थी, मगर माथे पर सिंदूर की रेखा साफ थी। सावित्री की आंखें भर आईं।

—रुक रही है तू?

काव्या ने उनके पैर छुए।

—बहू बनकर नहीं, आपकी बेटी बनकर।

सावित्री ने उसे गले लगा लिया। वह आलिंगन किसी अंडरवर्ल्ड घराने की रस्म नहीं था। वह 1 बूढ़ी मां का टूटना था, जिसने मौत से बचकर बेटी पा ली थी।

समय बीता। काव्या ने अपनी नर्सिंग पूरी की। राणे हवेली के भीतर उसने 1 छोटा चिकित्सा केंद्र शुरू करवाया, जहां रसोइयों, ड्राइवरों, गार्डों और उनके परिवारों का इलाज मुफ्त होने लगा। शहर उसे तरह-तरह के नामों से जानता था—राणे घराने की बहू, डॉन की पत्नी, गोली खाने वाली लड़की। पर हवेली के लोग उसे सिर्फ “काव्या दीदी” कहते थे।

रोहन ने डिग्री पूरी की और अपनी पहली नौकरी का पत्र लेकर आया तो काव्या बहुत देर तक रोती रही। विक्रम ने उस दिन कोई बड़ा जश्न नहीं किया, बस चुपचाप भोजनालय के मालिक को बुलवाया जहां सब शुरू हुआ था। उसी जगह की दाल, फुल्के और नींबू वाली प्लेट हवेली में परोसी गई।

1 साल बाद, उसी मंगलवार रात, विक्रम काव्या को माटुंगा के उसी पुराने रेस्टोरेंट में ले गया। गोली के निशान अब दीवार से मिट चुके थे, फर्श बदल दिया गया था, लेकिन काव्या को सब याद था। वह कोने वाली मेज के पास खड़ी रही जहां सावित्री बैठी थीं, जहां उसने बिना सोचे अपनी जान दांव पर लगा दी थी।

—अगर उस रात तुम 1 पल देर करतीं, विक्रम बोला, मेरी मां चली जातीं।

काव्या ने उसकी तरफ देखा।

—अगर उस रात मैं नहीं कूदती, शायद मैं आज भी सिर्फ कर्ज चुकाती रहती। कभी पता ही नहीं चलता कि मेरा दिल इतना बड़ा फैसला कर सकता है।

विक्रम ने उसकी उंगली में चमकती वही अंगूठी देखी।

—क्या तुम्हें कभी पछतावा होता है?

काव्या ने बाहर बारिश को देखा। मुंबई की सड़कें भीग रही थीं। लोग भाग रहे थे, गाड़ियां हॉर्न दे रही थीं, जिंदगी हमेशा की तरह शोर कर रही थी। लेकिन उसके भीतर अजीब-सी शांति थी।

—पछतावा उस चीज का होता है जो छीन ली जाए, उसने कहा। मैंने अपनी पुरानी जिंदगी खोई नहीं, उससे बड़ी जिंदगी चुन ली।

विक्रम ने उसका हाथ थाम लिया। उस स्पर्श में अब सुरक्षा से ज्यादा अपनापन था। काव्या ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

उस रात शहर ने फिर बारिश देखी, लेकिन इस बार वह चेतावनी नहीं लगी। वह जैसे उस खून को धो रही थी जो कभी 1 चेकदार फर्श पर फैला था। 22 साल की गरीब वेट्रेस, जिसने 72 साल की मां को बचाने के लिए 4 गोलियां खाईं, अब किसी डर की कैदी नहीं थी।

वह काव्या मिश्रा नहीं रही थी, जिसे दुनिया आसानी से कुचल सकती थी।

वह काव्या राणे थी।

और मुंबई के सबसे खतरनाक घराने में, पहली बार लोग किसी डॉन से नहीं, उसकी पत्नी की दया और हिम्मत से डरने लगे थे।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.