
PART 1
14 घंटे की ड्यूटी के बाद जब राजीव ने दिल्ली के लक्ष्मी नगर वाले अपने छोटे से फ्लैट का दरवाज़ा खोला, तो उसकी 8 महीने की गर्भवती पत्नी नंदिनी रसोई के ठंडे फर्श पर घुटनों के बल बैठी टूटी हुई प्लेट के टुकड़े उठा रही थी, और ड्रॉइंग रूम से उसकी मां की आवाज़ आ रही थी, “जल्दी साफ कर, कहीं किसी के पैर में लग गया तो फिर रोना मत शुरू कर देना।”
राजीव दरवाज़े पर ही जम गया।
उसकी शर्ट पसीने और धूल से चिपकी थी, हाथों पर गोदाम के डिब्बों के निशान थे, और कंधे इतने भारी थे जैसे किसी ने उनमें पत्थर बांध दिए हों। वह गाज़ियाबाद के एक लॉजिस्टिक वेयरहाउस में सुबह से रात तक माल उतारता था। आज लौटते समय उसने गली के नुक्कड़ से गर्म जलेबी और समोसे लिए थे, क्योंकि नंदिनी को पिछले कुछ दिनों से मीठा खाने का मन कर रहा था। वह सोच रहा था कि घर पहुंचकर उसे चौंकाएगा, उसके पेट पर हाथ रखेगा, बच्चे की हल्की-सी लात महसूस करेगा और सारी थकान भूल जाएगा।
लेकिन घर के अंदर कदम रखते ही उसे लगा, यह उसका घर नहीं रहा।
ड्रॉइंग रूम में ठंडी कचौड़ियों की गंध, गिरे हुए कोल्ड ड्रिंक की चिपचिपाहट और तेल में तली चीज़ों की बासी बू फैली थी। सेंटर टेबल पर गंदे डिब्बे, चटनी के खाली पाउच और चाय के कप पड़े थे। सोफे पर उसकी मां सावित्री देवी ऐसे बैठी थीं जैसे यह घर उनका दरबार हो। उनकी गोद में शॉल था, हाथ में नमकीन का पैकेट, और टीवी पर कोई ऊंची आवाज़ वाला धारावाहिक चल रहा था।
साथ में राजीव की 3 बहनें भी थीं।
पूनम नए फोन से रील बना रही थी, जिसके पैसे अभी भी राजीव किस्तों में भर रहा था। रितु हंसते हुए वीडियो देख रही थी। नेहा फ्रिज खोलकर बड़बड़ा रही थी कि मिठाई खत्म कैसे हो गई।
किसी को शर्म नहीं थी।
किसी ने झाड़ू तक नहीं उठाई थी।
और यह सब राजीव की कमाई से चल रहा था—किराया, राशन, बिजली, मां की दवाइयां, बहनों के मोबाइल रिचार्ज, ऑनलाइन ऑर्डर, कपड़े, छोटे-बड़े खर्चे, और वे ज़रूरतें जो कभी सच में ज़रूरी नहीं होती थीं।
राजीव ने धीरे से बैग नीचे रखा।
“नंदिनी कहां है?”
पूनम ने नज़र उठाए बिना कहा, “रसोई में होगी।”
रितु हंसी, “बर्तन मांज रही है। इतना परेशान मत हो भैया, प्रेग्नेंट है, कांच की गुड़िया नहीं।”
सावित्री देवी ने नाक सिकोड़कर कहा, “आजकल की बहुएं ज़रा सा पेट निकलते ही रानी बन जाती हैं। हमारे ज़माने में 9 महीने में भी खेत, चूल्हा, घर सब संभालते थे।”
राजीव ने कुछ नहीं कहा। वह रसोई की ओर बढ़ा। अंदर पानी चलने की आवाज़ थी, बर्तनों की खनक थी, और उसके बीच एक दबा हुआ सिसकना।
नंदिनी नंगे पांव खड़ी थी। उसका बड़ा पेट सिंक से लग रहा था। एक हाथ गंदे पानी में था, दूसरा कमर पर, जैसे शरीर अब अपना भार खुद नहीं उठा पा रहा हो। चेहरा पीला, आंखें सूजी हुईं, बाल गालों से चिपके हुए। वह जले हुए तवे को रगड़ते हुए चुपचाप रो रही थी।
“नंदिनी,” राजीव की आवाज़ फट गई।
वह बुरी तरह चौंकी। प्लेट हाथ से फिसलते-फिसलते बची। उसने जल्दी से आस्तीन से आंखें पोंछीं और मुस्कुराने की कोशिश की।
“तुम आ गए… मैं अभी खाना गरम कर देती हूं। बस ये खत्म कर लूं।”
राजीव ने उसके हाथ से स्पंज लिया और नल बंद कर दिया।
“अब तुम कुछ नहीं करोगी।”
नंदिनी की आंखों में डर उतर आया। उसने ड्रॉइंग रूम की ओर देखा।
“राजीव, प्लीज़ कुछ मत कहना। वो फिर झूठ बोलेंगी। मैं कर लूंगी।”
“तुम कांप रही हो।”
“मैं ठीक हूं।”
“नहीं। तुम ठीक नहीं हो।”
वह 2 सेकंड उसे देखती रही, फिर उसके सीने से लगकर टूट गई। जैसे किसी ने महीनों से बंद बांध पर पहली दरार डाल दी हो।
“तुम्हारी मां कहती हैं मैं तुम्हें खा रही हूं,” वह फुसफुसाई। “तुम्हारी बहनें कहती हैं तुम मेरी वजह से मर-मरकर काम करते हो। मैंने बहुत कोशिश की, राजीव। सच में बहुत कोशिश की।”
राजीव की सांस अटक गई।
“कब से?”
नंदिनी ने आंखें झुका लीं।
“करीब 2 महीने से।”
2 महीने।
जिस घर के लिए वह अपनी हड्डियां तोड़ रहा था, उसी घर में उसकी पत्नी और उसके बच्चे की मां को धीरे-धीरे तोड़ा जा रहा था।
तभी ड्रॉइंग रूम से सावित्री देवी की आवाज़ फिर गूंजी, “नंदिनी, कांच के छोटे टुकड़े भी उठा लेना। तेरी लापरवाही से हमें अस्पताल नहीं जाना।”
राजीव की आंखों में आग थी, मगर उसकी आवाज़ अजीब तरह से शांत हो गई।
उसने कुर्सी खींची, नंदिनी को बैठाया, उसके हाथ में पानी का गिलास दिया और उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
“अब सब बताओ। एक भी बात मत छिपाना।”
नंदिनी ने कांपते होंठ खोले, और उसी पल राजीव को लगा कि यह रात सिर्फ झगड़े की नहीं, किसी बड़े सच के फटने की रात है।
PART 2
सावित्री देवी और 3 बहनें “बस 10 दिन” के लिए आई थीं। करोल बाग वाले उनके किराए के मकान में सीलन बढ़ गई थी, मकान मालिक मरम्मत टाल रहा था। राजीव ने मां को बुला लिया, क्योंकि वह बेटा था और बेटा मां को मना कैसे करता।
10 दिन 4 महीने बन गए।
शुरू में नंदिनी ने सबका मन से स्वागत किया। उसने अपनी अलमारी खाली की, बहनों के लिए बिस्तर लगाए, मां के लिए हल्की खिचड़ी बनाई, उनके कपड़े धोए, पूजा के लिए फूल लाकर रखे। वह चाहती थी कि बच्चा ऐसी दुनिया में आए जहां दादी, बुआ और मां के बीच प्यार हो।
फिर ताने शुरू हुए।
“घर पर रहती है, फिर भी थकती है?”
“राजीव पैसा पेड़ पर नहीं उगाता।”
“अच्छी बहू शिकायत नहीं करती।”
“हमारी मांएं दर्द में भी चूल्हा नहीं छोड़ती थीं।”
नंदिनी चुप रही, क्योंकि वह राजीव की थकान देखती थी। लेकिन 3 हफ्ते पहले उसे तेज़ दर्द उठा था। पेट कड़ा हो गया, सांस रुकने लगी। उसने सावित्री देवी से अस्पताल ले चलने को कहा।
सावित्री देवी ने जवाब दिया, “ड्रामा बंद कर। राजीव को फोन किया तो उसकी ओवरटाइम की कमाई कट जाएगी।”
अगली सुबह नंदिनी अकेली ऑटो से अस्पताल गई।
डॉक्टर ने आराम लिखकर दिया था—लंबे समय तक खड़े न रहें, तनाव से बचें, दर्द हो तो तुरंत आएं।
नंदिनी ने कांपते हाथों से वह पर्ची राजीव को दी।
फिर उसने डिब्बे के पीछे छिपा एक लिफाफा निकाला।
उसमें बिल थे।
खाना, कपड़े, मेकअप, महंगा फोन, ऑनलाइन शॉपिंग—सब राजीव के कार्ड से। कुछ पैसे उस खाते से निकले थे जिसमें उसने बच्चे का पालना, गद्दा और पहले कपड़े खरीदने के लिए बचत की थी।
नंदिनी रोते हुए बोली, “तुम्हारी मां ने कहा तुम जानते हो। कहा कि खून का रिश्ता पत्नी से बड़ा होता है।”
राजीव ने लिफाफा मुट्ठी में दबाया, ड्रॉइंग रूम में गया और टीवी बंद कर दिया।
सन्नाटा गिरा।
सावित्री देवी ने भौंहें चढ़ाईं।
“क्या बदतमीज़ी है?”
राजीव ने बिल मेज़ पर फेंक दिए।
“बदतमीज़ी ये है। और उससे भी बड़ा पाप ये है कि आपने अस्पताल की पर्ची छिपाई।”
सावित्री देवी का चेहरा पहली बार उतर गया।
PART 3
ड्रॉइंग रूम में पड़े तेल लगे डिब्बों और चाय के दागों के बीच वे बिल ऐसे बिखरे थे जैसे किसी झूठ की लाश खुली सड़क पर रख दी गई हो। पूनम का चेहरा सफेद पड़ गया। रितु ने अपना मोबाइल उल्टा कर दिया। नेहा ने मां की ओर देखा, जैसे वह चाहती हो कि इस बार भी सावित्री देवी कोई ऐसा वाक्य बोल दें जिससे सब सच झूठ बन जाए।
लेकिन राजीव की आंखें आज पहली बार इतनी ठंडी थीं कि कोई बहाना वहां टिक नहीं सकता था।
“ये पैसे बच्चे के पालने के थे,” उसने धीमे मगर कड़े स्वर में कहा। “ये पैसे नंदिनी की दवाइयों के थे। ये पैसे उस घर के थे जिसे मैं अपने हाथों से बना रहा था।”
सावित्री देवी ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, जैसे बात को छोटा साबित करना चाहती हों।
“बेटा, घर-परिवार में खर्च चलता रहता है। मां और बहनों पर कुछ खर्च कर दिया तो कौन-सा पहाड़ टूट गया?”
“पहाड़ नंदिनी पर टूट रहा था,” राजीव बोला। “और आप सब सोफे पर बैठकर देख रही थीं।”
“तेरी पत्नी ने तुझे भड़का दिया है।”
“मेरी पत्नी ने 2 महीने चुप रहकर मेरी मां की इज़्ज़त बचाई। आपने उसकी चुप्पी को नौकरानी समझ लिया।”
सावित्री देवी की आंखें फैल गईं।
“अपनी मां से ऐसे बात करेगा?”
राजीव ने नंदिनी की ओर देखा। वह रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थी, एक हाथ पेट पर, दूसरा दीवार पर। उसके पांव सूजे हुए थे। चेहरे पर थकान थी, पर आज उसकी आंखें झुकी नहीं थीं।
राजीव ने वापस मां की ओर देखा।
“मैं अपनी मां से नहीं, उस औरत से बात कर रहा हूं जिसने मेरी गर्भवती पत्नी को दर्द में अस्पताल नहीं जाने दिया।”
रितु घबरा गई। “भैया, मम्मी को लगा होगा कि इतना सीरियस नहीं है।”
राजीव मुड़ा।
“तुम्हें भी लगा था?”
रितु चुप।
“पूनम?”
पूनम ने होंठ काट लिए।
“नेहा?”
सबसे छोटी नेहा की आंखों में पानी भर आया। “मैंने देखा था… पर मुझे डर लगा। मम्मी गुस्सा हो जातीं।”
राजीव की हंसी निकली, मगर उसमें खुशी नहीं थी।
“तुम सबको झगड़े से डर लगा, लेकिन एक गर्भवती औरत को फर्श पर झुकाने से डर नहीं लगा। उसके पेट में पल रहे बच्चे को तनाव देने से डर नहीं लगा। उसका खाना ठंडा कर देने, उसकी नींद तोड़ देने, उसकी दवा के पैसे खर्च कर देने से डर नहीं लगा।”
सावित्री देवी उठ खड़ी हुईं।
“ये घर मेरा भी है। मेरा बेटा कमाता है।”
“नहीं,” राजीव ने पहली बार साफ कहा। “ये घर मेरा और नंदिनी का है। और अब ये मेरी बेटी का घर होगा।”
“बेटी?” पूनम के मुंह से निकला।
नंदिनी सिहर गई। राजीव उसकी ओर पलटा।
“क्या?”
नंदिनी की आंखें भर आईं। “अल्ट्रासाउंड में डॉक्टर ने बताया था… बच्ची है। तुम्हारी मां ने कहा था तुम्हें मत बताना। बोलीं कि तुम निराश हो जाओगे।”
कुछ पल के लिए समय रुक गया।
सावित्री देवी ने जल्दी से कहा, “अरे, मैंने तो बस इसलिए—”
“बस,” राजीव ने हाथ उठा दिया।
उसकी आंखें अब भीगी थीं। दर्द, गुस्सा और शर्म सब एक साथ उसके चेहरे पर थे। वह धीरे-धीरे नंदिनी के पास गया, उसके पेट पर कांपता हाथ रखा और बोला, “मेरी बेटी है?”
नंदिनी रो पड़ी।
“हां।”
राजीव की आंखों से आंसू गिर गए। “मैं कैसे निराश हो सकता हूं? वो मेरी बच्ची है। मेरी धड़कन।”
यह सुनकर कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया जिसमें सावित्री देवी का झूठ भी खुद को छिपा नहीं पाया।
राजीव ने मोबाइल निकाला। पहले उसने अपने सभी ऑनलाइन ऐप्स से कार्ड हटाए। फिर पासवर्ड बदले। फिर मकान मालिक को संदेश भेजा कि अब इस फ्लैट में सिर्फ 2 स्थायी सदस्य रहेंगे—वह और नंदिनी। बाकी लोग कल तक घर खाली करेंगे।
पूनम चीखी, “भैया, तुम हमें निकाल दोगे?”
“मैं तुम्हें निकाल नहीं रहा। मैं अपनी पत्नी को बचा रहा हूं।”
रितु रोने लगी। “हम कहां जाएंगे?”
“जहां बड़े लोग जाते हैं जब उन्हें अपने खर्च खुद उठाने पड़ते हैं।”
सावित्री देवी ने कांपती उंगली उठाई। “मैंने तुझे जन्म दिया है।”
राजीव ने आंखें बंद कीं। इस वाक्य ने उसे भीतर तक काट दिया। उसे याद आया बचपन में मां कैसे सर्द रातों में उसके लिए कंबल खींच देती थीं। कैसे दूसरों के घरों में काम करके उसकी फीस भरती थीं। कैसे त्योहार पर खुद नई साड़ी न लेकर उसके लिए जूते खरीदती थीं।
वह सब सच था।
लेकिन आज का सच भी सच था।
किसी पुराने त्याग की छाया में नया अन्याय पवित्र नहीं हो जाता। मां का सम्मान जरूरी था, मगर पत्नी की जान और अजन्मे बच्चे की सुरक्षा उससे छोटी नहीं हो सकती थी।
“आपने मेरे लिए बहुत किया,” राजीव ने भारी आवाज़ में कहा। “उसके लिए मैं जिंदगी भर आभारी रहूंगा। लेकिन आभार का मतलब यह नहीं कि मैं आपकी हर गलत बात सहूं। आपने मदद को अधिकार समझ लिया। आपने नंदिनी की सहनशीलता को कमजोरी समझ लिया।”
सावित्री देवी का चेहरा कठोर हो गया।
“तेरी पत्नी ने तुझे मां से अलग कर दिया।”
तभी नंदिनी बोली।
उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी, मगर हर शब्द साफ था।
“मैंने आपका बेटा कभी नहीं छीना, मांजी। मैं सिर्फ अपना सम्मान वापस चाहती थी।”
सावित्री देवी के पास कोई जवाब नहीं था। शायद इसलिए नहीं कि उन्हें अपनी गलती समझ आ गई थी, बल्कि इसलिए कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि जिस बहू को वे 2 महीने से दबा रही थीं, उसके अंदर अभी भी आवाज़ बची होगी।
उस रात राजीव ने किसी को कुछ और नहीं कहने दिया। उसने नंदिनी को कमरे में ले जाकर बिस्तर पर लिटाया, उसके पैरों के नीचे तकिए रखे, गरम दूध दिया और डॉक्टर की पर्ची फिर से पढ़ी। हर शब्द उसके सीने में कील की तरह उतर रहा था—आराम, तनाव से बचाव, दर्द होने पर तुरंत अस्पताल।
वह बाहर आया और रसोई साफ करने लगा।
उसने टूटी प्लेट का हर टुकड़ा उठाया। सिंक में जमे चिकनाई वाले बर्तन धोए। मेज़ पोंछी। सोफे के नीचे से पाउच निकाले। कूड़े के 3 बड़े बैग नीचे फेंककर आया। फिर सारे बिल एक फाइल में रख दिए।
रात के 2 बजे वह नंदिनी के पास बैठा था। कमरे में हल्की पीली रोशनी थी। नंदिनी आधी नींद में थी। अचानक उसके पेट में हल्की हरकत हुई।
राजीव ने घबराकर हाथ रखा।
“बच्ची हिली?”
नंदिनी ने थके चेहरे से मुस्कुराया। “हां। शायद तुम्हारी आवाज़ सुन रही है।”
राजीव झुक गया और रो पड़ा।
वह पैसा कमाने वाला आदमी था, पर उस रात उसने जाना कि घर सिर्फ पैसों से नहीं बचता। घर आंखें खोलकर बचता है। घर उस आवाज़ से बचता है जो गलत को गलत कहने की हिम्मत करे। घर उस हाथ से बचता है जो थकी हुई पत्नी से झाड़ू छीनकर खुद उठाए।
अगली सुबह वह नंदिनी को अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने जांच के बाद राहत की सांस दिलाई—बच्ची ठीक थी, लेकिन नंदिनी का शरीर बहुत थका हुआ था। डॉक्टर ने राजीव को साफ कहा, “इन्हें आराम चाहिए। प्यार चाहिए। घर में शांति चाहिए। गर्भवती महिला घर की मजदूर नहीं होती।”
राजीव ने सिर झुका लिया।
“अब ऐसा नहीं होगा।”
घर लौटते समय उसने नंदिनी के लिए नारियल पानी लिया। रास्ते भर वह उसकी उंगलियां पकड़े रहा। नंदिनी खिड़की से बाहर देखती रही—दिल्ली की भीड़, हॉर्न, धूल, मंदिर की घंटी, सब वैसा ही था, पर उसके भीतर कोई पुराना डर धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था।
दोपहर तक बहनों ने सामान बांधना शुरू कर दिया। पूनम अपनी सहेली के घर नोएडा चली गई। रितु ने मामा को फोन किया। नेहा सबसे आख़िर में नंदिनी के कमरे में आई। उसकी आंखें लाल थीं।
“भाभी, माफ कर दो। मैंने देखा था, पर कुछ नहीं कहा।”
नंदिनी ने उसे देर तक देखा।
“माफी मुझसे ज्यादा खुद से मांगना। जिस दिन तुम किसी औरत को चुपचाप टूटते देखो, उस दिन अपनी चुप्पी को संस्कार मत समझना।”
नेहा फूटकर रो पड़ी और बाहर चली गई।
सावित्री देवी आखिरी थीं। दरवाज़े पर 2 बैग रखे थे। चेहरा कठोर, आंखों में चोट कम और अधिकार छिन जाने का गुस्सा ज्यादा था।
“एक दिन तुझे पछताना पड़ेगा,” उन्होंने कहा।
राजीव ने गहरी सांस ली।
“मुझे पहले ही बहुत बातों का पछतावा है, मां। लेकिन नंदिनी को बचाने का नहीं।”
सावित्री देवी ने नंदिनी की ओर देखा भी नहीं। न पोती के बारे में पूछा, न डॉक्टर की रिपोर्ट। वे बस चली गईं, जैसे घर से नहीं, अपने सिंहासन से उतारी गई हों।
इसके बाद रिश्तेदारों के फोन आने लगे। बुआ ने कहा, “मां को घर से निकाल दिया? शर्म कर।” चाचा ने कहा, “औरत के कहने में आ गया।” मौसी ने ताना मारा, “आजकल की लड़कियां सास को नहीं सहतीं।” पड़ोस की एक आंटी ने संदेश भेजा कि गर्भवती औरतों को इतना नाटक नहीं करना चाहिए।
राजीव ने एक ही जवाब भेजा—डॉक्टर की पर्ची, खर्चों के बिल, और एक पंक्ति:
“मेरी गृहस्थी मेरी पत्नी की पीड़ा पर नहीं बनेगी।”
फिर उसने फोन साइलेंट कर दिया।
धीरे-धीरे घर बदलने लगा।
उसने वेयरहाउस में अपने सुपरवाइज़र से बात की। पूरी कहानी नहीं बताई, मगर इतना कहा कि पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है। उम्मीद के उलट, सुपरवाइज़र ने उसकी शाम की शिफ्ट कुछ हफ्तों के लिए कम कर दी। राजीव ने अपनी पुरानी बाइक का एक्स्ट्रा साइलेंसर और एक पुराना गेमिंग फोन बेच दिया। उन पैसों से उसने बच्ची का सफेद पालना खरीदा। महंगा नहीं था, पर मजबूत था। नंदिनी ने उसके ऊपर छोटी-छोटी चांद-सितारों वाली लटकन लगाई।
जब पालना कमरे में रखा गया, नंदिनी बहुत देर तक उसे देखती रही।
“मैं सोचती थी शायद ये कभी नहीं आएगा,” उसने धीमे से कहा।
राजीव ने उसके कंधे पर हाथ रखा। “अब जो भी जरूरी होगा, पहले तुम्हारे और बच्ची के लिए होगा।”
नंदिनी ने उसकी ओर देखा। “मैंने तुम्हें तुम्हारी मां से दूर नहीं करना चाहा था।”
“तुमने कुछ नहीं तोड़ा,” राजीव बोला। “जो टूटा, वो उस दिन टूटा जब उन्होंने मदद को हक समझ लिया और तुम्हारे आंसुओं को सुविधा।”
दिन बीतने लगे। घर अब भी छोटा था, खर्चे अब भी बड़े थे, राजीव अब भी थकता था। लेकिन अब घर में डर की जगह हवा चलती थी। रसोई में अब बासी तेल की गंध नहीं, मूंग दाल की खिचड़ी, अजवाइन की खुशबू और कभी-कभी गर्म जलेबी की मिठास होती। टीवी की चीख नहीं, धीमी भजन की धुन या नंदिनी की हल्की हंसी सुनाई देती।
एक शाम राजीव जल्दी लौटा। नंदिनी सोफे पर सो रही थी, पैरों के नीचे 2 तकिए, पेट पर हल्की चादर। खिड़की से आती धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी। वह अभी भी कमजोर लग रही थी, मगर टूटी हुई नहीं।
वह पास बैठा। नंदिनी ने आंखें खोलीं।
“तुम आ गए?”
“हां।”
उसने पेट पर हाथ रखा। बच्ची ने हल्की-सी लात मारी।
नंदिनी मुस्कुराई। “उसे पता चल जाता है कि पापा आ गए।”
राजीव ने उसका माथा चूमा।
“तो उसे यह भी पता चलेगा कि उसकी मां अब कभी अकेली नहीं लड़ेगी।”
5 हफ्ते बाद, बारिश भरी सुबह में उनकी बेटी पैदा हुई। अस्पताल की खिड़की पर पानी की बूंदें फिसल रही थीं। नंदिनी ने बच्ची को सीने से लगाया हुआ था। बच्ची छोटी थी, गर्म थी, मुट्ठियां बंद थीं, और उसका चेहरा इतना नाजुक था कि राजीव को लगा दुनिया की सारी ताकतें भी उसके सामने छोटी हैं।
उसने नंदिनी को देखा।
वही औरत जो कुछ हफ्ते पहले टूटे कांच के बीच खड़ी थी, आज जीवन को अपनी छाती से लगाए थी।
राजीव ने अपनी बेटी की ओर झुककर कहा, “तुम्हारा घर इंतज़ार कर रहा है।”
जब वे घर लौटे, सफेद पालना खिड़की के पास रखा था। चांद-सितारों वाली लटकन धीरे-धीरे घूम रही थी। मेज़ पर राजीव ने गर्म जलेबी रखी। इस बार सोफे से कोई आदेश नहीं आया। किसी ने नंदिनी को कमज़ोर नहीं कहा। किसी ने उसके आंसुओं को नाटक नहीं कहा।
सिर्फ बच्ची की धीमी सांसें थीं, नंदिनी की थकी मगर शांत मुस्कान थी, और राजीव का हाथ उसकी पीठ पर था।
उस दिन राजीव ने समझा कि घर दीवारों, किराए और राशन से नहीं बनता। घर उस जगह का नाम है जहां एक औरत रोते हुए भी सुरक्षित महसूस करे। जहां मां बनने वाली देह को बोझ नहीं, मंदिर समझा जाए। जहां रिश्तों के नाम पर अत्याचार को संस्कार न कहा जाए।
कभी-कभी धोखा बाहर से नहीं आता। वह अपने ही नाम, अपने ही खून, अपनी ही मेज़ की कुर्सी लेकर घर में बैठता है। वह पुराने त्यागों की दुहाई देकर आज की क्रूरता को ढकना चाहता है।
लेकिन उस रात, जब राजीव ने नंदिनी को टूटे कांच के बीच पाया था, उसने सिर्फ अपनी पत्नी को नहीं बचाया था।
उसने उस घर को बचाया था जहां उसकी बेटी पहली बार प्यार का मतलब सीखेगी।
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