
भाग 1:
12 घंटे की ड्यूटी के बाद जब संध्या घर लौटी, तो उसने देखा कि उसके 5 साल के बेटे आरव के सामने ठंडी खिचड़ी का सूखा कटोरा पड़ा था, जबकि उसी कमरे में उसकी सास, पति और ननद उसके पैसों से खरीदे गए झींगे और मछली खाकर डकार ले रहे थे।
दरवाजे पर खड़ी संध्या के हाथ से बैग लगभग फिसल गया। उसके पैरों में सूजन थी, पीठ ऐसे जल रही थी जैसे किसी ने पूरे दिन उस पर पत्थर रखे हों, और अस्पताल की नर्स वाली सफेद यूनिफॉर्म पर दवा, पसीने और थकान की मिली-जुली गंध चिपकी हुई थी। रात के 10 बजकर 15 मिनट हो चुके थे।
बैठक में स्टील की बड़ी थाली में झींगों के छिलके, नींबू के टुकड़े, तेल में डूबे मसालों के दाग और आधी खाली कोल्ड ड्रिंक की बोतलें पड़ी थीं। पंखा चल रहा था, पर कमरे में तली मछली की खुशबू ऐसे फैली थी जैसे किसी ने जानबूझकर उसे दिखाने के लिए बचाकर रखा हो।
वे झींगे संध्या ने खरीदे थे।
6 बड़े झींगे और 2 किलो सुरमई मछली, दिल्ली के सीआर पार्क मार्केट से। 8,200 रुपये नकद देकर। वह पैसा उसने 12 घंटे ICU में मरीजों की उल्टियां साफ करके, डॉक्टरों की डांट सुनकर, बुजुर्ग मरीजों के रिश्तेदारों के गुस्से सहकर कमाया था।
उसने वह सब किसी शौक में नहीं खरीदा था।
वह एक परीक्षा थी।
दोपहर 1:32 पर, जब संध्या अस्पताल के स्टाफ रूम के पीछे खड़ी होकर चुपके से बैंक का फोन उठा रही थी, एक महिला अधिकारी ने उससे 48,00,000 रुपये के होम लोन टॉप-अप की पुष्टि मांगी थी।
संध्या पहले तो समझी कि कोई गलती है।
फिर बैंक अधिकारी ने दस्तावेजों का जिक्र किया।
उसकी साइन।
उसके पति विक्रांत की साइन।
और उसकी सास शकुंतला देवी की गवाही।
संध्या की उंगलियां ठंडी पड़ गई थीं।
विक्रांत और शकुंतला देवी ने उसकी नकली साइन करके उस फ्लैट पर कर्ज लेने की कोशिश की थी, जिसकी EMI संध्या 7 साल से अकेले भर रही थी। वही छोटा-सा 2BHK फ्लैट, गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में, जिसे खरीदते वक्त विक्रांत ने कहा था कि यह उनका सपना होगा। बाद में सपना सिर्फ संध्या की जिम्मेदारी बन गया था।
अगर बैंक ने फोन न किया होता, तो 48,00,000 रुपये का कर्ज उसके सिर पर डाल दिया जाता।
संध्या ने उसी वक्त बैंक से सभी प्रक्रियाएं रोकने को कहा। खाते फ्रीज करवाए। दस्तावेजों की कॉपी ईमेल पर मंगवाई। फिर उसने अपने आंसू पोंछे, वापस ICU में गई और एक मरीज को इंजेक्शन लगाया, जैसे उसकी दुनिया अभी टूटी ही न हो।
शाम को घर लौटने से पहले उसने मछली और झींगे खरीदे।
सुबह घर से निकलते समय उसने वह पैकेट शकुंतला देवी को देते हुए कहा था—
—मांजी, रात को इसे बना दीजिएगा। आरव को भी अच्छे से खिला दीजिएगा। आज मैंने बहुत मेहनत से लिया है।
शकुंतला देवी ने तब मुस्कुराकर पैकेट लिया था, जैसे संध्या घर की बहू नहीं, मुफ्त की नौकरानी हो जो सामान भी लाए और हिसाब भी न पूछे।
अब वही संध्या दरवाजे पर खड़ी थी।
विक्रांत सोफे पर अधलेटा था, पेट पर हाथ रखे टीवी देख रहा था। उसकी शर्ट के बटन खुले थे। उसके चेहरे पर शराब और आलस का मिला-जुला घमंड था। उसकी छोटी बहन प्रीति, जो 6 महीने की गर्भवती थी, कुशन से टिककर बैठी थी और अपनी उंगलियों से मसाला चाट रही थी।
प्रीति ने संध्या को देखा और हंस दी।
—भाभी, आज तो मजा आ गया। आपके हाथ का नहीं था, लेकिन आपके पैसों का स्वाद अच्छा था।
शकुंतला देवी ने पूजा वाले कमरे से आवाज लगाई, बिना शर्म, बिना झिझक—
—इतनी देर से आने वाली औरत को घर में रानी जैसा स्वागत चाहिए क्या?
संध्या ने पहले बेटे को ढूंढा।
—आरव ने खाना खाया?
शकुंतला देवी बाहर आईं। माथे पर बड़ी लाल बिंदी, गले में सोने की चेन, हाथ में मछली की गंध लगी हुई थी।
—हां, खिचड़ी दे दी। बच्चों को ऐसी तैली चीजें नहीं खिलाते। पेट खराब हो जाता है।
संध्या की आंखें थाली पर गईं। फिर कमरे में बैठे बड़ों पर।
—और मेरा खाना?
विक्रांत ने चैनल बदलते हुए कहा—
—किचन में कुछ होगा। हर बात पर तमाशा मत किया कर।
संध्या रसोई में गई।
सिंक में मछली की कांटियां पड़ी थीं। बर्तन तेल से भरे थे। गैस के पास एक छोटी स्टील की कटोरी में सूखी, जम चुकी खिचड़ी पड़ी थी। उस पर हल्दी की पपड़ी बन गई थी। साथ में बच्चे की छोटी चम्मच उलटी पड़ी थी।
तभी पीछे से छोटे कदमों की आवाज आई।
आरव नीली नाइटसूट में खड़ा था। उसकी आंखें नींद से सूजी हुई थीं, लेकिन चेहरे पर वह डर था जो 5 साल के बच्चे के चेहरे पर नहीं होना चाहिए।
उसने धीरे से अपनी जेब में हाथ डाला।
संध्या मुड़ी।
आरव ने अपनी छोटी हथेली खोली।
उसकी हथेली में झींगे का एक छोटा-सा टुकड़ा था, दबा हुआ, रूई और जेब की धूल से चिपका हुआ।
—मम्मा, रोना मत।
संध्या की सांस अटक गई।
आरव ने वह टुकड़ा आगे किया।
—ये नीचे गिर गया था। मैंने थोड़ा साफ किया। आपके लिए रखा।
संध्या वहीं जड़ हो गई।
आरव ने सिर झुका लिया।
—दादी बोलीं कि मम्मी घर की असली फैमिली नहीं हैं। जो मम्मियां बाहर काम करती हैं, उन्हें बचा हुआ खाना खाना चाहिए।
बैठक से शकुंतला देवी की हंसी आई।
वह हंसी संध्या के कानों में नहीं, सीधा उसकी छाती में लगी।
संध्या ने कटोरी उठाई। उसकी उंगलियां कांप रही थीं, पर आवाज नहीं निकली। फिर उसने वह कटोरी फर्श पर छोड़ दी।
स्टील की कटोरी टाइल पर जोर से गिरी। खिचड़ी फैल गई।
विक्रांत उठकर आया।
—क्या ड्रामा है ये? एक झींगे के टुकड़े पर घर सिर पर उठा लिया?
संध्या ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखें लाल थीं, मगर उनमें आंसू नहीं थे।
विक्रांत को नहीं पता था कि बैंक ने उसकी चाल पकड़ ली है।
शकुंतला देवी को नहीं पता था कि उनकी साइन वाली फाइल अब संध्या के ईमेल में है।
प्रीति को नहीं पता था कि संध्या ने घर आने से पहले आरव का छोटा बैग ऑटो वाले के पास रखवा दिया था।
और इस घर में बैठे किसी को नहीं पता था कि जिस औरत को वे बचा हुआ खाना समझ रहे थे, वही आज रात उनकी झूठी इज्जत की पूरी थाली पलटने वाली थी।
—आरव, जूते पहन लो।
विक्रांत ने उसकी कलाई पकड़ ली।
—कहीं नहीं जाएगी तू।
संध्या ने बहुत धीरे कहा—
—हाथ छोड़ो।
—वरना?
संध्या ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
—वरना कल सुबह पुलिस तुम्हें उठाएगी, और बैंक की फाइल तुम्हारी मां के नाम से खुलेगी।
कमरे में पहली बार सन्नाटा छा गया।
शकुंतला देवी का चेहरा पीला पड़ गया।
प्रीति ने अपने पेट पर हाथ रख लिया।
विक्रांत की पकड़ ढीली हुई, मगर आवाज और कठोर हो गई।
—तू मुझे धमका रही है?
संध्या ने आरव को अपनी तरफ खींच लिया।
—नहीं। मैं पहली बार सच बोल रही हूं।
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भाग 2:
संध्या ने आरव का हाथ पकड़ा और दरवाजे की तरफ बढ़ी, लेकिन शकुंतला देवी ने रास्ता रोक लिया। उनके चेहरे पर अब सास वाला घमंड नहीं, पकड़े जाने का डर था। विक्रांत ने तुरंत बात पलटने की कोशिश की और बोला कि यह सब परिवार के फायदे के लिए था, लेकिन संध्या ने उसका झूठ वहीं काट दिया। बैंक के ईमेल, नकली साइन, 48,00,000 रुपये का कर्ज, सब उसके फोन में था। प्रीति ने नजरें फेर लीं, क्योंकि उसने कई रातों तक अपनी मां को डाइनिंग टेबल पर संध्या की साइन की प्रैक्टिस करते देखा था। आरव संध्या से चिपक गया। उसके छोटे हाथ अभी भी कांप रहे थे। विक्रांत ने बच्चे की बांह पकड़कर उसे खींचना चाहा, तो आरव चीख पड़ा। उसी चीख ने संध्या के अंदर बची आखिरी झिझक भी मार दी। उसने विक्रांत को धक्का दिया, बैग उठाया और बारिश में बाहर निकल गई। नीचे पहले से एक ऑटो खड़ा था, जिसे संध्या ने घर में घुसने से पहले बुक कर लिया था। उसे लगा था कि शायद उसे भागना पड़े, और अब वही शक सच निकला। वह आरव को लेकर वसुंधरा में अपनी सहकर्मी नेहा के छोटे किराए के कमरे में पहुंची। नेहा ने बिना सवाल किए बच्चे को दूध दिया और संध्या को सूखा दुपट्टा। मगर रात खत्म नहीं हुई थी। सुबह 4 बजे संध्या के फोन में लोकेशन शेयरिंग का नोटिफिकेशन दिखा, जो उसने कभी ऑन नहीं किया था। विक्रांत ने उसके फोन में ट्रैकिंग ऐप डाल रखा था। खिड़की से झांकते ही उसने नीचे विक्रांत की काली SUV देखी। संध्या ने बिना आवाज किए फोन बंद किया, आरव को उठाया और पीछे की सीढ़ियों से निकल गई। वे दोनों बारिश में भीगते हुए एक 24 घंटे खुले मेडिकल स्टोर तक पहुंचे। वहीं से नेहा ने अपनी वकील दोस्त मीरा सक्सेना को फोन किया। 2 दिन बाद जब संध्या फैमिली कोर्ट पहुंची, तो सामने शकुंतला देवी बैठी थीं, हाथ में माला और चेहरे पर नकली आंसू। उनके पास विक्रांत था। और उनके पीछे प्रीति बैठी थी, बिल्कुल सफेद चेहरा लिए, जैसे उसके पेट में पल रहा बच्चा नहीं, कोई भारी सच धड़क रहा हो।
भाग 3:
फैमिली कोर्ट की वह सुबह संध्या कभी भूल नहीं सकी।
बाहर बरामदे में भीड़ थी। कोई तलाक के कागज लिए बैठा था, कोई बच्चे की कस्टडी के लिए रो रहा था, कोई चुपचाप दीवार को देख रहा था। लेकिन संध्या के लिए उस दिन पूरी दुनिया सिर्फ 3 लोगों में सिमट गई थी।
आरव।
विक्रांत।
और शकुंतला देवी।
आरव ने उसका दुपट्टा कसकर पकड़ रखा था। उसकी आंखों के नीचे हल्के काले घेरे थे। 5 साल का बच्चा 2 रातों में जैसे बड़ा हो गया था। वह हर बार दरवाजा खुलने पर चौंक जाता, जैसे दादी अभी आएंगी और उसे खींचकर ले जाएंगी।
विक्रांत अदालत में ऐसे आया जैसे वह पीड़ित पति हो। सफेद शर्ट, साफ दाढ़ी, आंखों में बनावटी नमी। उसके हाथ में कुछ कागज थे, और चेहरे पर वह आत्मविश्वास जो मर्द अक्सर तब पहनते हैं जब उन्हें लगता है कि समाज अपने आप उनकी तरफ खड़ा हो जाएगा।
शकुंतला देवी ने हल्की सूती साड़ी पहनी थी। माथे पर बड़ी बिंदी थी। हाथ में तुलसी की माला। वह हर 2 मिनट में आंख पोंछतीं, जैसे दुनिया की सबसे दुखी दादी वही हों।
प्रीति कोने में बैठी थी। उसने संध्या की तरफ एक बार देखा, फिर तुरंत नजरें झुका लीं।
वकील मीरा सक्सेना ने संध्या के कंधे पर हाथ रखा।
—डरना मत। आज झूठ को बोलने दो। सच बाद में आएगा, लेकिन आएगा पूरा।
संध्या ने सिर हिलाया।
सुनवाई शुरू हुई।
विक्रांत ने पहले बयान दिया।
—माननीय कोर्ट, मेरी पत्नी मानसिक रूप से अस्थिर हो चुकी है। वह बहुत देर तक अस्पताल में काम करती है, घर पर ध्यान नहीं देती, बच्चे के सामने चीजें फेंकती है। उस रात उसने बिना वजह खाना फेंका, मेरी मां को धक्का दिया और मेरे बेटे को रात में घर से बाहर ले गई।
शकुंतला देवी रो पड़ीं।
—मैंने तो बहू को बेटी माना था। मगर वह घर को सराय समझती है। मेरा पोता भूखा रहता था। मैं ही उसे संभालती थी।
संध्या की मुट्ठियां भींच गईं।
आरव ने धीरे से पूछा—
—मम्मा, दादी झूठ बोल रही हैं ना?
संध्या ने उसके बाल सहलाए।
—बस मेरा हाथ पकड़े रहो।
मीरा खड़ी हुईं।
उनकी आवाज शांत थी, लेकिन हर शब्द धारदार।
—शकुंतला देवी, आपने कहा कि बच्चा आपकी देखरेख में अच्छा रहता था?
—हां, बिल्कुल।
—उस रात आपने आरव को क्या खिलाया था?
शकुंतला देवी तनकर बोलीं—
—खिचड़ी। बच्चे के लिए वही ठीक था।
—और घर के बाकी लोगों ने क्या खाया?
शकुंतला देवी चुप हुईं।
मीरा ने फोटो कोर्ट के सामने रखी। वही बैठक। झींगों के छिलके। मछली की कांटियां। गंदी प्लेटें।
—ये खाना किसने खरीदा था?
विक्रांत ने तुरंत कहा—
—घर का था।
मीरा ने बिल निकाला।
—8,200 रुपये। भुगतान संध्या के कार्ड से। समय शाम 7:12। स्थान सीआर पार्क मार्केट।
जज ने बिल देखा।
मीरा ने अगला सवाल किया।
—संध्या किस पेशे में हैं?
—नर्स है, तो?
—कितने घंटे की ड्यूटी करती हैं?
विक्रांत चिढ़ गया।
—ये सब जरूरी नहीं है।
जज ने उसकी तरफ देखा।
—जवाब दीजिए।
—12 घंटे।
—घर की EMI कौन भरता है?
—हम दोनों।
मीरा ने बैंक स्टेटमेंट आगे रखा।
—गलत। पिछले 7 साल में 82 EMI संध्या के खाते से गई हैं। विक्रांत ने 1 भी EMI नहीं भरी।
कमरे में हलचल हुई।
शकुंतला देवी ने माला तेज चलानी शुरू कर दी।
मीरा ने दूसरा पेपर उठाया।
—बिजली, पानी, गैस, स्कूल फीस, राशन, मेडिकल बिल, प्रीति की गर्भावस्था की जांच… सबका भुगतान किसने किया?
विक्रांत चुप।
मीरा ने खुद जवाब दिया।
—संध्या ने।
प्रीति की आंखों से आंसू गिरने लगे।
मीरा ने अब असली फाइल खोली।
—अब बात करते हैं 48,00,000 रुपये के होम लोन टॉप-अप की।
विक्रांत की गर्दन अकड़ गई।
—वह कभी हुआ ही नहीं।
—क्योंकि बैंक ने पैसे रिलीज करने से पहले संध्या को फोन कर दिया।
मीरा ने दस्तावेज जज के सामने रखे।
नकली साइन।
विक्रांत की साइन।
शकुंतला देवी की गवाही।
संपत्ति का विवरण।
कर्ज का आवेदन।
जज के चेहरे की गंभीरता बढ़ गई।
—यह दस्तावेज किसने तैयार करवाए?
विक्रांत ने होंठ खोले, पर आवाज नहीं निकली।
शकुंतला देवी बोलीं—
—हमें कानून नहीं पता। बैंक वालों ने कहा होगा।
मीरा उनकी तरफ मुड़ीं।
—आपको संध्या की साइन लिखनी आती है?
—क्या मतलब?
—मतलब यह कि आपने उसकी साइन की नकल की या नहीं?
—झूठ है।
मीरा ने प्रीति की तरफ देखा।
—प्रीति जी, आप गर्भवती हैं। कोर्ट झूठे बयान को हल्के में नहीं लेता। सोचकर जवाब दीजिएगा।
प्रीति कांपने लगी।
शकुंतला देवी फुसफुसाईं—
—कुछ मत बोलना।
जज ने तुरंत कहा—
—यहां किसी को डराने की कोशिश मत कीजिए।
मीरा ने पूछा—
—क्या आपने अपनी मां को संध्या की साइन की प्रैक्टिस करते देखा था?
प्रीति ने चेहरा ढक लिया।
कुछ पल तक सिर्फ उसकी सिसकियां सुनाई दीं।
फिर उसने धीरे से कहा—
—हां।
संध्या ने सांस रोक ली।
विक्रांत ने फुसफुसाकर कहा—
—प्रीति, पागल मत बन।
प्रीति ने पहली बार सिर उठाया।
—पागल मैं नहीं हूं। पागल वो घर है जहां एक बच्चा अपनी मां के लिए जमीन से गिरा खाना जेब में छिपाता है।
शकुंतला देवी चीख पड़ीं।
—चुप रह!
लेकिन अब देर हो चुकी थी।
प्रीति रोते हुए बोलती चली गई।
—मम्मी ने साइन की नकल की। विक्रांत भैया जानते थे। उन्होंने कहा था कि संध्या को कुछ पता नहीं चलेगा क्योंकि वह हमेशा अस्पताल में रहती है। मम्मी कहती थीं कि ऐसी औरतें बस कमाने के लिए अच्छी होती हैं। घर की इज्जत तो बेटे से होती है।
संध्या की आंखों में पहली बार आंसू आए, मगर वह टूटी नहीं।
प्रीति ने पेट पर हाथ रखा।
—मैंने इसलिए चुप्पी रखी क्योंकि मम्मी ने कहा था कि अगर मैं बोलूंगी तो मुझे घर से निकाल देंगी। मेरा पति दुबई में है, यहां मेरा कोई नहीं। उन्होंने कहा था कि संध्या पर केस कर देंगे, बच्चे को रोक लेंगे, फिर वह डरकर साइन कर देगी।
मीरा ने अगली चीज निकाली।
एक छोटा वीडियो।
संध्या ने आंखें बंद कर लीं।
वीडियो अदालत में चला।
आरव की छोटी आवाज सुनाई दी।
—मम्मा, रोना मत। ये नीचे गिर गया था। मैंने आपके लिए रखा।
फिर उसकी टूटी हुई आवाज—
—दादी बोलीं कि आप असली फैमिली नहीं हो।
कोर्टरूम में एक अजीब चुप्पी फैल गई।
जज ने वीडियो बंद करवाया।
उन्होंने चश्मा उतारा, कुछ सेकंड आंखें बंद रखीं, फिर बोले—
—बच्चे को बाहर ले जाइए।
मीरा ने संध्या को संकेत दिया। नेहा, जो पीछे बैठी थी, आरव को बाहर ले गई। जाते-जाते आरव मुड़ा।
—मम्मा, आप आओगी ना?
संध्या ने खुद को संभालते हुए कहा—
—हां, बेटा। इस बार कोई हमें अलग नहीं करेगा।
दरवाजा बंद हुआ।
जज की आवाज बदल चुकी थी।
—प्रथम दृष्टया यह मामला केवल वैवाहिक विवाद नहीं है। इसमें आर्थिक धोखाधड़ी, मानसिक उत्पीड़न, बच्चे की सुरक्षा और दस्तावेजी फर्जीवाड़े का गंभीर प्रश्न है।
विक्रांत ने तुरंत कहा—
—सर, मैं समझौता करने को तैयार हूं।
मीरा ने तीखे स्वर में कहा—
—जिसे आप समझौता कह रहे हैं, वह 48,00,000 रुपये की चोरी की कोशिश है।
शकुंतला देवी ने फिर रोना शुरू किया।
—मैं बूढ़ी औरत हूं। मुझसे गलती हो गई होगी।
संध्या ने पहली बार उनकी तरफ सीधे देखा।
—गलती तब होती है जब नमक ज्यादा पड़ जाए। आपने मेरे बच्चे को सिखाया कि उसकी मां बची हुई चीज है।
शकुंतला देवी चुप हो गईं।
उस दिन कोर्ट ने आरव की अस्थायी पूर्ण कस्टडी संध्या को दी। विक्रांत और शकुंतला देवी को बिना अनुमति मिलने से रोका गया। बैंक दस्तावेजों की जांच पुलिस को भेजी गई। ट्रैकिंग ऐप, झूठी शिकायत और बच्चे को खींचने की घटना को अलग से दर्ज किया गया।
विक्रांत की अकड़ उसी दिन आधी टूट गई।
बाकी आधी तब टूटी जब बैंक ने उसके खाते सील किए और नौकरी वाली कंपनी को कानूनी नोटिस पहुंचा। जिस दोस्त के साथ वह कथित बिजनेस शुरू करने वाला था, वही सबसे पहले गायब हो गया।
शकुंतला देवी ने रिश्तेदारों में कहानी फैलाने की कोशिश की कि बहू बिगड़ गई है। मगर जब पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया, तो वही रिश्तेदार फोन उठाना बंद कर गए।
प्रीति ने बाद में संध्या से माफी मांगी।
वह नेहा के कमरे में आई थी, बहुत धीरे, बहुत शर्मिंदा।
—भाभी, मैंने देर कर दी।
संध्या ने कुछ देर उसे देखा।
प्रीति की आंखों में डर नहीं, पछतावा था।
—तुमने सच बोल दिया। कभी-कभी वही देर से भी बहुत होता है।
प्रीति रो पड़ी।
—मेरा बच्चा ऐसे घर में नहीं पलेगा।
संध्या ने उसे पानी दिया।
उस दिन पहली बार दोनों औरतें सास के बनाए डर से बाहर बैठीं। कोई बड़ी दोस्ती नहीं हुई, मगर एक सच्चाई थी—दोनों किसी न किसी तरह उसी घर की कैदी थीं।
6 महीने बाद विक्रांत ने अपनी भूमिका स्वीकार की। उसने कहा कि कागज मां ने तैयार करवाए, पर वह सब जानता था। उसे लगा था कि संध्या कभी बैंक की भाषा समझ नहीं पाएगी। उसे लगा था कि अस्पताल में काम करने वाली औरत सिर्फ बिल भरना जानती है, सवाल पूछना नहीं।
शकुंतला देवी ने आखिरी दिन तक खुद को निर्दोष कहा।
मगर सच को उनकी मंजूरी की जरूरत नहीं थी।
फ्लैट संध्या के नाम सुरक्षित रहा। कोर्ट ने उसे और आरव को रहने का अधिकार दिया। विक्रांत को घर खाली करना पड़ा। शकुंतला देवी पहले बेटी के पास गईं, फिर रिश्तेदारों के यहां, फिर एक छोटे किराए के कमरे में। उनके सोने के कंगन बिके। महंगे खाने बंद हुए। पूजा की थाली बची, पर सामने बैठकर सुनने वाला कोई नहीं बचा।
2 साल बाद संध्या ने अस्पताल की नौकरी छोड़ दी।
उसने गाजियाबाद में एक छोटा होम केयर क्लिनिक खोला—“आरव केयर”।
वह बुजुर्ग मरीजों की नर्सिंग, बच्चों की देखभाल और घर पर मेडिकल सहायता का काम करती थी। नेहा उसकी पार्टनर बनी। दीवारों पर हल्का नीला रंग था। रिसेप्शन पर तुलसी का छोटा पौधा रखा था। वहां हर आने वाला कहता था कि जगह में अजीब-सी शांति है।
संध्या मुस्कुरा देती।
शांति भी कभी-कभी केस जीतकर आती है।
उद्घाटन वाले दिन प्रीति अपने नवजात बच्चे के साथ आई। उसने आरव को एक छोटा-सा खिलौना डॉक्टर सेट दिया।
—अब तू मम्मी का असिस्टेंट बनेगा?
आरव हंसा।
अब वह जेब में खाना नहीं छिपाता था।
अब वह रात में उठकर फ्रिज नहीं देखता था कि मम्मा के लिए कुछ बचा है या नहीं।
अब वह हर अच्छी चीज देखकर पहले डरता नहीं था कि कोई छीन लेगा।
उसी शाम नेहा ने सबके लिए खाना मंगवाया।
गरम राजमा, जीरा राइस, तंदूरी रोटी, पनीर टिक्का, और एक बड़ी ट्रे में तंदूरी झींगे।
संध्या ने ट्रे देखते ही पल भर आंखें बंद कर लीं।
नेहा ने धीरे से पूछा—
—हटवा दूं?
संध्या ने सिर हिलाया।
—नहीं। कुछ चीजें डर की नहीं, जीत की याद बननी चाहिए।
वह प्लेट लेकर बैठी ही थी कि क्लिनिक के कांच के दरवाजे के बाहर एक परछाईं रुकी।
विक्रांत था।
बारिश हो रही थी। उसकी शर्ट भीग चुकी थी। बाल बिखरे थे। चेहरे पर वह पुराना घमंड नहीं था। सिर्फ थकान थी। शायद पछतावा भी, या शायद सिर्फ हार।
संध्या बाहर आई।
—क्या चाहिए?
विक्रांत ने निगाह झुका ली।
—मां बीमार है। किराए के कमरे में अकेली रहती है। वह आरव को देखना चाहती है।
संध्या ने लंबे समय तक कुछ नहीं कहा।
उसके सामने वही रात खुल गई।
ठंडी खिचड़ी।
सूखी कटोरी।
आरव की धूल भरी हथेली।
झींगे का छोटा टुकड़ा।
और वह वाक्य—मम्मियां जो बाहर काम करती हैं, उन्हें बचा हुआ खाना खाना चाहिए।
विक्रांत ने कमजोर आवाज में कहा—
—उसके पास अब कोई नहीं है।
संध्या ने धीरे से जवाब दिया—
—जब उसके पास सब कुछ था, तब उसने मेरे बच्चे को सिखाया कि उसकी मां कोई नहीं है।
—वह पछता रही है।
—पछतावा आरव की नींद वापस नहीं ला सकता।
विक्रांत ने पहली बार उसकी आंखों में सीधे देखा।
—क्या मैं उसे कभी मिल सकता हूं?
संध्या ने कांच के पार देखा।
अंदर आरव हंस रहा था। उसके हाथ में 2 प्लेटें थीं। वह नेहा से कह रहा था कि मम्मा को सबसे बड़ा टुकड़ा देना है।
संध्या की आंखें भर आईं।
उसने विक्रांत से कहा—
—जब वह बड़ा होगा, सच जानकर खुद फैसला करेगा। तब तक नहीं।
विक्रांत ने सिर झुका लिया।
—और मां?
संध्या की आवाज बिल्कुल शांत थी।
—उन्हें कहना, जिस दिन उनके सामने भरी थाली हो, उस दिन किसी बच्चे की प्लेट खाली मत छोड़ना।
वह वापस मुड़ गई।
दरवाजा बंद हुआ।
अंदर आरव उसके पास दौड़कर आया।
—मम्मा, मैंने आपके लिए रखा है। सबसे अच्छा वाला।
संध्या ने प्लेट देखी।
उसमें झींगे का सबसे बड़ा टुकड़ा था।
वह मुस्कुराई, मगर इस बार उसका दिल नहीं टूटा।
उसने आरव को गोद में खींच लिया।
—नहीं बेटा। आज हम दोनों सबसे अच्छा खाएंगे।
आरव ने पूछा—
—पहले आप।
संध्या ने सिर हिलाया।
—पहले हम।
दोनों ने साथ बैठकर खाना खाया।
क्लिनिक की रोशनी सफेद और साफ थी। बाहर बारिश अब भी गिर रही थी, मगर अंदर कोई डर नहीं था। कोई बचा हुआ खाना नहीं था। कोई झूठा परिवार नहीं था जो प्यार के नाम पर अपमान परोसता हो।
उस रात संध्या ने पहली बार अपनी प्लेट पूरी भरी।
और पहली बार आरव ने अपनी जेब खाली रखी।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.