
भाग 1
जिस दिन नंदिनी ने पालमपुर के छोटे से सराय के बाहर अपनी आखिरी 82 रुपये की पोटली खोली, उसी दिन पूरे कस्बे ने उसे लालची औरत मान लिया था।
बरसात के बाद की ठंडी दोपहर थी। धौलाधार की पहाड़ियों पर धुंध नीचे उतर रही थी, और बस अड्डे के पास बने पुराने सराय की सीढ़ियों पर नंदिनी एक भूरे कपड़े की थैली पकड़े बैठी थी। उसके बाल सफर की धूल से उलझे हुए थे, सूती सलवार-कुर्ता भीगकर बदन से चिपक गया था, और आंखों में वह खालीपन था जो किसी स्टेशन पर छूटे सामान का नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी के उजड़ जाने का होता है।
वह कानपुर से यहां अपने मामा को ढूंढते हुए आई थी। मामा ने 6 महीने पहले चिट्ठी लिखी थी—“यहां आ जा, पहाड़ में सेब का छोटा बाग है, तेरे लिए भी जगह बन जाएगी।” नंदिनी ने मां की पुरानी चूड़ियां बेच दीं, घर का किराया चुकाया, और एक लंबा सफर करके पालमपुर पहुंची। पर यहां आकर पता चला कि मामा 13 दिन पहले निमोनिया से मर चुके थे। उनके नाम पर कोई पक्की जमीन नहीं थी, बस तहसील में अटका हुआ एक दावा और किराने वाले का कर्ज था।
अब नंदिनी के पास लौटने की जगह नहीं थी। सराय वाला 1 रात के 40 रुपये मांग रहा था। उसके पास 82 रुपये थे। यानी 2 रातें और फिर सड़क।
तभी 9 साल का एक लड़का उसके सामने आकर रुक गया। उसने नंदिनी को ऐसे देखा जैसे बच्चे सच को कपड़े से ढकना नहीं जानते।
“आप रो क्यों रही हो?”
नंदिनी ने जल्दी से चेहरा पोंछा। “मैं नहीं रो रही।”
लड़का बोला, “झूठ बोलना बुरा होता है। मेरी छोटी बहन भी ऐसे ही बोलती है।”
उसके पीछे 6 साल की एक लड़की खड़ी थी, बड़ी शांत आंखों वाली। उसके हाथ में गेंदे के फूलों की छोटी माला थी। तभी एक भारी, दबा हुआ पुरुष स्वर आया।
“आरव।”
लड़का पीछे मुड़ा। “पापा, ये बहुत अकेली लग रही हैं।”
“दूसरों के दुख में बिना पूछे मत घुसा करो,” आदमी ने कहा, लेकिन उसकी आवाज में डांट से ज्यादा थकान थी।
वह आदमी लंबा था, गेहुआं रंग, कनपटियों पर हल्की सफेदी, कंधे पर ऊनी चादर, हाथ में राशन का थैला। उसके चेहरे पर पहाड़ों जैसा सख्तपन था, पर आंखों में कोई पुराना टूटा हुआ कमरा भी छिपा था।
“राजवीर ठाकुर,” उसने संक्षेप में कहा। “ये आरव है। ये मीरा।”
नंदिनी ने अपना नाम बताया और बस इतना कहा, “मैं यहां अपने मामा के पास आई थी। अब वे नहीं रहे।”
राजवीर की आंखों में अचानक एक पुरानी चोट चमककर बुझ गई। उसने कुछ नहीं पूछा, बस सिर झुका दिया। “खाना खाया?”
नंदिनी ने कहा, “हां।”
आरव तुरंत बोला, “फिर से झूठ।”
मीरा ने पहली बार धीरे से कहा, “पापा, मां कहती थीं भूखे को देखकर भगवान परीक्षा लेते हैं।”
राजवीर का चेहरा कस गया। मां का नाम आते ही हवा बदल गई।
उस रात नंदिनी सराय के कमरे में बैठी थी, जब दरवाजे पर दस्तक हुई। बाहर आरव खड़ा था। हाथ में ढका हुआ स्टील का डिब्बा।
“पापा ने राजमा-चावल भेजा है,” उसने कहा। “कह रहे थे, आपको भूख लगी होगी।”
गलियारे के कोने पर राजवीर खड़ा था, पर उसने नंदिनी की तरफ देखा भी नहीं। जैसे मदद करना चाहता हो, मगर एहसान जताने से डरता हो।
अगली सुबह नंदिनी को पता चला कि उसके 3 दिन का सराय किराया पहले ही जमा हो चुका है। उसने गुस्से और शर्म के बीच राजवीर को बाजार में ढूंढ लिया।
“आपने ऐसा क्यों किया?”
राजवीर बोला, “क्योंकि मेरे बेटे ने पूछा था कि कोई सीढ़ियों पर बैठा रहे तो क्या हमें गुजर जाना चाहिए।”
नंदिनी ने कहा, “मैं पैसे लौटा दूंगी।”
राजवीर पहली बार सीधे उसकी आंखों में देखता हुआ बोला, “तो लौटा देना। मगर अभी जिंदा रहना ज्यादा जरूरी है।”
उसी समय बाजार के बीच एक औरत ने ऊंची आवाज में कहा, “विधुर आदमी और अकेली जवान औरत… कहानी तो जल्दी बनेगी।”
नंदिनी पत्थर हो गई। राजवीर ने पलटकर देखा, लेकिन कुछ बोला नहीं। बस मीरा का हाथ कसकर पकड़ लिया।
और उसी शाम, जब नंदिनी काम की तलाश में धोबीघाट पहुंची, उसे खबर मिली कि राजवीर के घर से अचानक मीरा गायब हो गई है… और आखिरी बार उसे नंदिनी के कमरे की तरफ जाते देखा गया था।
भाग 2
मीरा के गायब होने की खबर आग की तरह फैली। सराय के बाहर लोग जमा हो गए। किसी ने कहा नंदिनी बच्ची को फुसलाकर ले गई होगी, किसी ने कहा वह राजवीर के घर में जगह बनाने आई है। सराय वाला भी शक भरी नजरों से दरवाजा देखने लगा।
नंदिनी ने कांपती आवाज में कहा, “मीरा मेरे पास नहीं आई।”
लेकिन कस्बे की सरपंच कमला देवी चिल्लाईं, “कल ही आई, आज बच्ची गायब। इतना संयोग नहीं होता।”
राजवीर पहुंचा तो उसका चेहरा पीला था। आरव रोते हुए बोला, “पापा, मीरा मां के पेड़ के पास गई होगी। वह डरती है तो वहीं छिपती है।”
“कौन सा पेड़?” नंदिनी ने पूछा।
आरव ने कहा, “हमारे बाग का पुराना सेब का पेड़। मां ने लगाया था।”
नंदिनी बिना किसी को देखे भाग पड़ी। पहाड़ी रास्ता कीचड़ से भरा था। पीछे राजवीर और आरव दौड़े। शाम घिर रही थी। हवा में ठंड बढ़ गई थी। आधे रास्ते पर नंदिनी को मीरा की गेंदे की माला पड़ी मिली।
कुछ दूर आगे, पुराने कुएं के पास मीरा सिसकती हुई बैठी थी। उसका पैर पत्थरों के बीच फंस गया था। वह ठंड से कांप रही थी और बार-बार कह रही थी, “मां नाराज होंगी… नई आंटी आ गईं तो मां चली जाएंगी…”
नंदिनी ने घुटनों के बल बैठकर उसका पैर छुड़ाया। “कोई मां अपने बच्चों को छोड़कर नहीं जाती, मीरा। वह तो बस जगह बनाकर जाती है, ताकि कोई तुम्हें फिर से प्यार कर सके।”
मीरा ने पहली बार नंदिनी को कसकर पकड़ लिया।
जब वे लौटे, भीड़ शांत हो गई। पर कमला देवी की आंखों में हार नहीं थी। उन्होंने सबके सामने कहा, “बहुत अच्छा नाटक है। पहले बचाओ, फिर घर में घुसो।”
उसी पल रविंद्र सूद, कस्बे का अमीर अनाज व्यापारी, आगे आया। उसने नंदिनी से कहा, “मेरे घर चलो। नौकरी भी दूंगा, इज्जत भी। विधुर राजवीर के घर का रास्ता तुम्हारे लिए बदनामी है।”
राजवीर ने चुपचाप सब सुना। फिर धीमे स्वर में बोला, “नंदिनी को किसी की दया नहीं चाहिए।”
कमला देवी हंसीं। “तो क्या चाहिए? तुम्हारा नाम?”
राजवीर ने पहली बार सबके सामने कहा, “अगर नंदिनी चाहे, तो मेरे घर में उसका नाम दया से नहीं, परिवार से लिखा जाएगा।”
भाग 3
उस रात पालमपुर में ठंड सिर्फ मौसम की नहीं थी। लोगों की निगाहों में भी बर्फ जम गई थी। नंदिनी सराय के छोटे कमरे में बैठी रही। बाहर से फुसफुसाहट आती रही—“राजवीर पागल हो गया है”, “बच्चों की मां को मरे 2 साल हुए हैं”, “नई औरत आएगी तो घर तोड़ेगी”, “गरीब लड़की को मौका मिल गया।”
नंदिनी ने खिड़की से बाहर पहाड़ों को देखा। उसे अपने मामा की चिट्ठी याद आई, मां की चूड़ियां याद आईं, और सराय की सीढ़ियां याद आईं जहां आरव ने बिना डर पूछा था—“आप रो क्यों रही हो?”
कई बार इंसान को दुख से ज्यादा डर यह खा जाता है कि कहीं वह किसी और की जिंदगी में बोझ बनकर न घुस जाए। नंदिनी भी यही सोच रही थी। राजवीर ने सबके सामने जो कहा था, वह सहारा भी था और आग भी। सहारा इसलिए कि किसी ने पहली बार उसे भीड़ के सामने सम्मान से खड़ा किया था। आग इसलिए कि अब हर आंख उसे परखेगी।
अगली सुबह वह धोबीघाट गई। मालकिन शांता ताई ने उसे कपड़े निचोड़ते देखकर कहा, “बेटी, हाथ मजबूत हैं तेरे। लेकिन दुनिया हाथ नहीं देखती, कहानी बनाती है।”
नंदिनी ने बिना सिर उठाए कहा, “मुझे काम चाहिए, कहानी नहीं।”
शांता ताई ने कुछ देर बाद पूछा, “रविंद्र सूद का आदमी आया था। कह रहा था उसके घर काम कर ले। खाना, कमरा, महीने के 700 रुपये।”
नंदिनी का हाथ रुक गया। 700 रुपये उसके लिए बहुत थे। सराय की चिंता खत्म। लोगों की बातें भी शायद कम। राजवीर के घर जाने का मतलब था बच्चों से जुड़ना, राजवीर की मृत पत्नी की जगह न लेते हुए भी उस खाली जगह के पास खड़ा होना, और हर दिन यह साबित करना कि वह घर छीनने नहीं आई।
उसी दोपहर आरव धोबीघाट के बाहर आया। उसके हाथ में एक छोटी लकड़ी की घोड़ी थी, शायद खुद तराशी हुई।
“मीरा ने भेजी है,” उसने कहा। “कहती है उस रात आपने उसे मां से नहीं छीना।”
नंदिनी की आंखें भर आईं। “मीरा कैसी है?”
“कम बोल रही है,” आरव बोला। “पापा भी कम बोल रहे हैं। वैसे पापा हमेशा कम बोलते हैं, लेकिन कल से और कम।”
“तुम्हारे घर में सब ठीक हो जाएगा।”
आरव ने गंभीरता से कहा, “ठीक तभी होगा जब आप आएंगी। पापा अकेले सब पकड़ते-पकड़ते थक गए हैं। मीरा मां के पेड़ से बातें करती है। मैं घोड़ों से। घर में इंसानों की आवाज कम है।”
नंदिनी ने उसे देखा। एक बच्चा अपनी उम्र से बड़ा हो चुका था, सिर्फ इसलिए क्योंकि किसी घर में मां की आवाज अचानक बंद हो गई थी।
शाम को नंदिनी राजवीर के सेब के बाग तक गई। पुराना रास्ता, गीली मिट्टी, पत्थर की मेड़, और बीच में वह सेब का पेड़ जिसके नीचे मीरा मिली थी। पेड़ पर अब फल नहीं थे, सिर्फ सूखी डालियां थीं, मगर उसके तने पर लाल धागा बंधा था।
राजवीर वहीं था। हाथ में कुल्हाड़ी, पर लकड़ी नहीं काट रहा था। बस खड़ा था।
“यह पेड़ सुहानी ने लगाया था,” उसने कहा। “मेरी पत्नी। शादी के 3 महीने बाद। बोली थी, जब बच्चे बड़े होंगे तो उन्हें बताना कि घर ईंटों से नहीं, लगाए हुए पेड़ों से बनता है।”
नंदिनी ने पेड़ को छुआ। “मीरा को डर है कि मैं आ गई तो उनकी मां चली जाएंगी।”
राजवीर की आवाज भारी हो गई। “मुझे भी यही डर था। 2 साल से। मुझे लगता था अगर मैंने किसी और को घर में जगह दी तो सुहानी के साथ धोखा होगा। फिर कल जब मीरा गायब हुई, पहली बार समझ आया कि घर बंद रखने से याद नहीं बचती, बच्चे अकेले हो जाते हैं।”
नंदिनी ने चुपचाप उसकी बात सुनी।
राजवीर ने कहा, “मैंने तुम्हें सराय की सीढ़ियों पर देखा था तो खुद को समझाया था कि यह मेरा मामला नहीं। फिर आरव रुका। उसने मुझे शर्मिंदा कर दिया। मैं आगे निकल गया था, लेकिन मोड़ पर पहुंचकर लौट आया। क्योंकि मुझे याद आया, सुहानी से भी मैं पहली बार कुछ कहे बिना निकल गया था। फिर वापस गया था। अगर उस दिन वापस न जाता, तो मेरा परिवार कभी बनता ही नहीं।”
नंदिनी की आंखों में नमी आ गई। “और अब?”
“अब मेरा बेटा शायद मुझे दूसरी बार परिवार बनाना सिखा रहा है।”
काफी देर हवा बोलती रही। दूर घर से मीरा की खांसी की हल्की आवाज आई।
नंदिनी ने धीरे से कहा, “मैं तुम्हारे घर आ सकती हूं। लेकिन नौकरानी बनकर नहीं। दया की पात्र बनकर भी नहीं। और तुम्हारी पत्नी की जगह लेने के लिए तो बिल्कुल नहीं।”
राजवीर ने तुरंत कहा, “कोई सुहानी की जगह नहीं ले सकता।”
“फिर मुझे क्या जगह दोगे?”
राजवीर ने पहली बार बिना डर के उसकी आंखों में देखा। “जो जगह तुम खुद बनाओगी। बच्चों के पास। रसोई के उजाले में। बाग की मिट्टी में। मेरे बराबर।”
नंदिनी ने सांस रोकी। “और अगर लोग बोलेंगे?”
“तो बोलने दो। वे हमारे घर में रात को मीरा की सिसकी नहीं सुनते। आरव को मां का पुराना दुपट्टा पकड़े सोते नहीं देखते। मुझे खाली आंगन में चूल्हे की राख ठंडी करते नहीं देखते।”
नंदिनी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह घर की तरफ चली। दरवाजे पर मीरा खड़ी थी। उसकी आंखें रोने से सूजी हुई थीं। वह धीरे-धीरे आगे आई और बोली, “आप मां की कहानी सुनेंगी?”
नंदिनी घुटनों पर बैठ गई। “हर रात।”
मीरा ने पूछा, “और मेरी चोटी बनाएंगी?”
“जब तक तुम्हें खुद बनाना न आ जाए।”
आरव ने पीछे से कहा, “और घोड़ों के नाम याद करेंगी?”
नंदिनी मुस्कुराई। “सारे 12।”
आरव चौंका। “मैंने तो आपको 8 ही बताए थे।”
“बाकी 4 तुम कल बताना।”
उस दिन से नंदिनी राजवीर के घर आने-जाने लगी। पहले रसोई संभाली, फिर मीरा की चोटी, फिर आरव की पढ़ाई, फिर बाग की क्यारियां। उसने घर में सुहानी की तस्वीर हटाई नहीं। उल्टा साफ करके मुख्य कमरे में रखी। हर शाम दीया जलाती और बच्चों से कहती, “जिसने यह घर पहले प्यार से भरा, उसे भूलना नहीं है।”
यही बात कस्बे को और चुभी। कमला देवी ने पंचायत में बात उठाई कि विधुर आदमी के घर अकेली औरत का आना समाज के लिए ठीक नहीं। रविंद्र सूद ने भी मौका देखा। उसने कहा, “या तो राजवीर उससे शादी करे, या उसे घर से निकाले। बच्चों के नाम पर नाटक न चले।”
राजवीर पंचायत में शांत बैठा रहा। नंदिनी पीछे खड़ी थी। लोगों की नजरें उसे काट रही थीं। किसी ने कहा, “गरीबी में इज्जत जल्दी बिकती है।” किसी ने कहा, “बच्चों का बहाना है, जमीन असली बात है।”
तभी मीरा भीड़ चीरकर आगे आई। उसके हाथ में एक पुराना डिब्बा था। राजवीर घबरा गया। “मीरा, ये कहां से मिला?”
मीरा बोली, “मां के संदूक से।”
डिब्बे में सुहानी की पुरानी चिट्ठियां थीं। मीरा ने एक कागज राजवीर को दिया। उस पर सुहानी की लिखावट थी। बीमारी के दिनों की लिखावट—कमजोर, टेढ़ी, लेकिन साफ।
राजवीर ने कांपते हाथों से पढ़ा। आवाज टूट रही थी।
“राजवीर, अगर मैं कभी न रहूं, तो बच्चों को मेरे नाम पर अकेला मत रखना। आरव बहुत जल्दी बड़ा बनने लगेगा और मीरा चुप्पी में छिप जाएगी। किसी दिन कोई ऐसी औरत मिले जो हमारे बच्चों को मेरी जगह मिटाकर नहीं, मेरे बारे में बताकर प्यार करे, तो उसे दरवाजे पर मत रोकना। घर को शोक का मंदिर मत बनाना। घर को फिर घर बनने देना।”
पूरी पंचायत चुप हो गई। कमला देवी का चेहरा उतर गया। रविंद्र सूद की आंखों में झुंझलाहट तैर गई। राजवीर पढ़ते-पढ़ते रुक गया। शायद 2 साल से जो गांठ उसके सीने में थी, वह एक ही चिट्ठी से खुलने लगी थी।
नंदिनी रो पड़ी, लेकिन उसने चेहरा नहीं छिपाया। उसने सुहानी की चिट्ठी को प्रणाम किया।
मीरा ने सबके सामने कहा, “नंदिनी आंटी मां को नहीं हटातीं। वह मां की बात करती हैं। जब मैं रोती हूं तो कहती हैं कि मां को दुख होगा अगर मैं खाना नहीं खाऊंगी।”
आरव ने जोड़ दिया, “और पापा अब रात को अकेले आंगन में नहीं बैठे रहते।”
पंचायत में खड़े बूढ़े मास्टरजी ने पहली बार आवाज उठाई। “जिस घर को बच्चे स्वीकार कर लें, उसे समाज ठुकराने वाला कौन होता है?”
रविंद्र सूद ने ताना मारा, “तो शादी कर लो। देखेंगे कितने दिन निभेगा।”
राजवीर उठा। उसने सबके सामने नंदिनी से नहीं, पहले अपने बच्चों से पूछा, “तुम दोनों सच में यही चाहते हो?”
आरव ने तुरंत कहा, “हां।”
मीरा ने नंदिनी का दुपट्टा पकड़ते हुए कहा, “लेकिन मां की कहानी बंद नहीं होगी।”
नंदिनी ने कहा, “कभी नहीं।”
राजवीर ने नंदिनी की तरफ मुड़कर कहा, “मैं तुम्हें सहारे के नाम पर नहीं बुला रहा। न बच्चों की देखभाल के सौदे में। अगर तुम हां कहो, तो इस घर में तुम्हारा सम्मान मेरे बराबर होगा। अगर ना कहो, तब भी तुम्हारे लिए मेरे मन में यही सम्मान रहेगा।”
नंदिनी ने लंबी सांस ली। उसे अपने 82 रुपये याद आए, सराय की सीढ़ियां याद आईं, वह पहली थाली याद आई जिसमें राजमा-चावल भेजे गए थे। उसे यह भी याद आया कि रविंद्र सूद ने उसे सुरक्षित रास्ता दिया था—कमरा, नौकरी, पैसा। लेकिन सुरक्षित और सही हमेशा एक नहीं होते। सही रास्ता कई बार ज्यादा बदनाम, ज्यादा कठिन और ज्यादा सच्चा होता है।
उसने कहा, “मैं हां कहती हूं। क्योंकि मुझे घर चाहिए, पर किसी भी कीमत पर नहीं। मुझे बच्चे प्यारे हैं, पर दया से नहीं। और मैं तुम्हारे साथ चलना चाहती हूं, क्योंकि तुमने मेरी गरीबी नहीं, मेरी इज्जत देखी।”
कुछ औरतों की आंखें झुक गईं। शांता ताई पीछे से मुस्कुराईं। कमला देवी बिना कुछ कहे चली गईं। रविंद्र सूद ने भीड़ से निकलते हुए बस इतना कहा, “देख लेना, पछताओगे।”
लेकिन राजवीर ने उस दिन पहली बार डरकर पीछे नहीं देखा।
शादी बहुत बड़ी नहीं हुई। मंदिर के आंगन में गेंदे के फूल, पीतल की घंटियां, चूल्हे से उठती हल्दी और घी की खुशबू, और पहाड़ से उतरती सफेद धुंध। नंदिनी ने लाल बनारसी नहीं, बल्कि हल्की मैरून सूती साड़ी पहनी, क्योंकि उसने कहा, “मुझे भारी कपड़ों से ज्यादा मजबूत कदम चाहिए।” मीरा ने उसकी चोटी में सुहानी का बचा हुआ रिबन बांधा। आरव ने पंडितजी से 3 बार पूछा कि फेरे सही गिने जा रहे हैं या नहीं।
जब फेरे खत्म हुए, राजवीर ने सुहानी की तस्वीर के सामने दीया रखा। नंदिनी ने भी हाथ जोड़े। कोई अजीबपन नहीं था। उस क्षण घर में 2 औरतों की लड़ाई नहीं, 2 प्यारों की निरंतरता थी—एक जिसने घर लगाया था, दूसरी जो उसे सूखने नहीं दे रही थी।
दिन आसान नहीं हुए। सचमुच का घर बनाना कहानी के आखिरी पन्ने पर नहीं, अगले सुबह से शुरू होता है। नंदिनी ने बाग की सूखी क्यारियां साफ कीं। सेब के पेड़ के पास उसने पालक, मेथी और धनिया लगाया। राजवीर ने पुराने गोशाले की छत ठीक की। आरव ने स्कूल के बाद दूध नापना सीखा। मीरा ने चोटी बनाना सीखा, मगर हर दूसरे दिन फिर भी नंदिनी से बनवाती, सिर्फ पास बैठने के लिए।
कभी-कभी कस्बे की बातें फिर घर तक आतीं। कोई कहता नंदिनी भाग्य वाली है। कोई कहता राजवीर ने जल्दी कर दी। कोई कहता बच्चे मजबूरी में मान गए। पर धीरे-धीरे बातें थक गईं, क्योंकि घर का सच बाहर की अफवाहों से लंबा निकला।
बरसात के बाद अगले साल सेब के पेड़ पर फूल आए। मीरा ने तने को छूकर कहा, “मां खुश होंगी?”
नंदिनी ने कहा, “बहुत। क्योंकि पेड़ फिर से जाग गया।”
आरव ने पूछा, “और हम?”
राजवीर ने पीछे से कहा, “हम भी।”
उस शाम चारों बरामदे में बैठे थे। चूल्हे पर दाल पक रही थी। दूर मंदिर की घंटी बज रही थी। पहाड़ों पर धुंध उतर रही थी, वैसी ही जैसी उस दिन थी जब नंदिनी सराय की सीढ़ियों पर बैठी थी। फर्क सिर्फ इतना था कि उस दिन उसके पास 82 रुपये और कोई अपना नहीं था। आज उसके हाथ में मीरा की अधूरी चोटी थी, सामने आरव अपनी लकड़ी की घोड़ी ठीक कर रहा था, और राजवीर बिना कुछ कहे उसके पास बैठा था।
कुछ कहानियां बड़े वादों से नहीं बदलतीं। वे तब बदलती हैं जब एक बच्चा सड़क पर रुककर पूछता है—“आप रो क्यों रही हो?” जब एक पिता मोड़ से लौट आता है। जब एक औरत दया नहीं, सम्मान मांगती है। और जब एक मृत मां की चिट्ठी जिंदा लोगों को यह सिखा देती है कि प्यार की जगह कोई नहीं लेता, प्यार बस घर में एक और दीपक जला देता है।
उस रात मीरा सोने से पहले बोली, “आंटी नहीं… मैं आपको क्या बुलाऊं?”
नंदिनी चुप हो गई। राजवीर ने भी सांस रोक ली। आरव ने शरारत से कहा, “बहुत सोचकर बुलाना।”
मीरा ने नंदिनी की हथेली पकड़ ली। “मैं आपको छोटी मां बुला सकती हूं? बड़ी मां पेड़ वाली रहेंगी।”
नंदिनी ने उसे सीने से लगा लिया। जवाब शब्दों में नहीं निकला, सिर्फ आंसुओं में निकला।
बरामदे के बाहर सेब का पेड़ हवा में हिल रहा था। उसके लाल धागे पर चांदनी पड़ रही थी। और पहली बार उस घर में किसी को लगा कि दुख खत्म नहीं हुआ, मगर अब वह अकेला भी नहीं रहा।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.