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श्मशान के खुले गड्ढे के सामने पति ने धमकाया, “बेटा लेकर भागी तो यहीं दफना दूँगा,” लेकिन महीनों बाद उसी होटल की मेज पर उसका बनाया स्वाद चखते ही वह फँसा, और पत्नी ने कैमरों के सामने उसका पूरा अपराध-जाल खुलवा दिया।

PART 1

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—अगर दोबारा इस घर से जाने की बात की, तो सूरज निकलने से पहले इसी गड्ढे में दबा दूँगा।

यह धमकी किसी सुनसान सड़क पर खड़े अपराधी ने नहीं दी थी। जयपुर पुलिस की अपराध शाखा में तैनात वरिष्ठ अधिकारी विक्रम राठौड़ ने अपनी पत्नी अदिति से यह कहा था। अदिति की छाती से उसका 5 महीने का बेटा आरव चिपका हुआ था और सामने श्मशान की सीमा के पास मिट्टी का ताजा खोदा हुआ गड्ढा पड़ा था।

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कुछ घंटे पहले तक अदिति घर की रसोई में मकर संक्रांति की दावत के लिए दाल-बाटी, चूरमा और केसरिया फिरनी बना रही थी। बैठक में चल रहे समाचार में एक महिला की कहानी दिखाई गई, जो वर्षों की घरेलू हिंसा के बाद अपने बच्चों को लेकर आश्रय गृह पहुँची थी। अदिति के हाथ में पकड़ा चाकू थम गया। स्क्रीन पर बोलती उस महिला की आँखों में वही डर था, जिसे अदिति हर सुबह आईने में छिपाती थी।

अदिति ने जयपुर के होटल प्रबंधन संस्थान से पढ़ाई की थी। उसका सपना था कि वह राजस्थानी व्यंजनों को नए अंदाज में परोसने वाला अपना भोजनालय खोले। विक्रम से उसकी मुलाकात 21 वर्ष की उम्र में एक शादी समारोह में हुई थी। वर्दी, आत्मविश्वास और मीठी भाषा में वह सुरक्षा जैसा दिखाई देता था। अदिति की विधवा माँ ने भी कहा था, “वर्दी वाला घर में होगा तो बेटी सुरक्षित रहेगी।”

शादी के बाद सबसे पहले अदिति के सपने बंद हुए। विक्रम ने नौकरी करने से रोक दिया, बैंक खाता अपने नियंत्रण में ले लिया और उसका पहचान पत्र तथा पासपोर्ट अलमारी में बंद कर दिए। फिर देर रात आने वाले संदिग्ध लोग, आय से कहीं अधिक महंगी गाड़ियाँ और नकदी से भरे थैले दिखने लगे।

अदिति के प्रश्नों का एक ही उत्तर होता—“जितना कहा जाए, उतना जानो।”

पहली बार विक्रम ने उसे गर्भावस्था के दौरान थप्पड़ मारा था। फिर धक्के, गालियाँ, कमरे में छिपे कैमरे और हर फोन कॉल की जाँच सामान्य बात बन गई। जब अदिति शिकायत करने थाने पहुँची, वहाँ बैठे पुलिसकर्मियों ने उसे अलग कमरे में बैठाकर विक्रम को बुला लिया।

विक्रम मुस्कराते हुए आया और उसके कान में बोला, “अगली बार शिकायत की तो तुम्हें मानसिक रोगी साबित कर दूँगा। बच्चा हमेशा के लिए मुझसे मिलेगा, तुमसे नहीं।”

अदिति आरव के लिए चुप रही। लेकिन उस रात श्मशान के पास खड़े होकर उसे समझ आ गया कि चुप्पी अब बेटे को बचा नहीं रही थी।

विक्रम ने गड्ढे की ओर इशारा किया।

—यह तुम्हारे लिए है। आरव को मुझसे दूर किया, तो किसी को तुम्हारी हड्डियाँ भी नहीं मिलेंगी।

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अदिति ने सिर झुका लिया, जैसे डर से टूट गई हो। मगर उसी क्षण उसके भीतर वर्षों से दबी हुई एक आवाज उठी—अब या तो वह भागेगी, या उसका बेटा अगला कैदी बनेगा।

उसे नहीं पता था कि कुछ सप्ताह बाद जिस होटल को वह अपनी शरण समझेगी, उसी की एक मेज पर उसका अतीत बैठा उसका बनाया भोजन चख रहा होगा।

PART 2

अगली सुबह अदिति ने बिना कुछ कहे विक्रम के लिए अदरक वाली चाय और पोहा बनाया। बाहर से वह पहले जैसी डरी हुई पत्नी थी, भीतर से वह हर रास्ता गिन रही थी।

कई सप्ताह तक उसने सब्जियों के डिब्बों में पैसे छिपाए, आरव के टीकाकरण के बहाने दस्तावेजों की प्रतियाँ बनाईं और विक्रम की मेज के नीचे मिले भ्रष्ट लेन-देन के कुछ कागज अपने कपड़ों में सिल दिए।

एक रात विक्रम नशे और थकान में गहरी नींद सो गया। अदिति ने आरव को शॉल में लपेटा, एक थैला उठाया और बिना पीछे देखे घर से निकल गई।

उसने अपना फोन बस अड्डे के कूड़ेदान में फेंका, 3 वाहन बदले और नकद टिकट लेकर गोवा पहुँच गई।

समुद्र किनारे एक पुराने होटल में उसी दिन मुख्य रसोइया नौकरी छोड़कर चला गया था। अदिति ने काँपती आवाज में कहा, “एक अवसर दीजिए, मैं पूरी दावत संभाल सकती हूँ।”

तभी पीछे से किसी ने उसका नाम पुकारा।

—अदिति शर्मा?

वह पलटी। सामने उसका पुराना सहपाठी कबीर मेहता खड़ा था, जो अब उस होटल का मालिक था।

कबीर ने उसके चेहरे का नीला निशान, बाँहों में बच्चा और आँखों का आतंक देखा। उसने केवल इतना कहा, “यहाँ तुम्हें कोई हाथ नहीं लगाएगा।”

मगर कुछ महीनों बाद होटल के भोजन कक्ष में एक परिचित आवाज गूँजी—

—इस मिठाई को बनाने वाली रसोइया से मिलना है।

विक्रम उसे ढूँढ़ चुका था।

PART 3

अदिति के हाथ से चाँदी की कटोरी लगभग छूट गई। रसोई के दरवाजे के पार वही भारी आवाज थी, जो वर्षों से उसकी नींद में घुसकर उसे जगाती रही थी।

भोजन कक्ष में विक्रम अपनी नई प्रेमिका के साथ बैठा था। उसके सामने बादाम और बाजरे की खीर रखी थी, जिसमें अदिति ने गुड़, सूखे गुलाब और हल्का सा धुआँदार स्वाद मिलाया था। यह वही व्यंजन था जिसे उसने विवाह की पहली वर्षगाँठ पर बनाया था। विक्रम ने एक चम्मच चखा और तुरंत पहचान लिया।

दुनिया में हजारों रसोइए वह खीर बना सकते थे, मगर भुने हुए बाजरे में सूखे गुलाब का स्वाद केवल अदिति मिलाती थी।

कबीर ने अदिति को साँस लेने में कठिनाई होते देख लिया। वह उसे रसोई के भंडार कक्ष में ले गया और दरवाजा बंद कर दिया।

—वह यहाँ क्यों आया है? अदिति ने फुसफुसाकर पूछा।

—वह तुम्हारे लिए नहीं आया था। यहाँ एक निर्माण व्यवसायी ठहरा है, जिससे वह अवैध भुगतान माँग रहा है। लेकिन अब उसने तुम्हारा स्वाद पहचान लिया है।

अदिति दीवार से टिक गई। महीनों की सुरक्षित नींद एक पल में टूट गई।

गोवा पहुँचने के बाद कबीर ने उसे होटल के पीछे बने कर्मचारी आवास में कमरा दिया था। अदिति ने सहायता लेने से पहले साफ कहा था कि वह दया पर नहीं जिएगी। उसने बर्तन धोने से शुरुआत की, फिर नाश्ते की जिम्मेदारी संभाली। उसके प्याज की कचौरी, मसालेदार मछली, नारियल वाली कढ़ी और बाजरे की खीर इतनी लोकप्रिय हुई कि 6 महीने में उसे मुख्य रसोइया बना दिया गया।

आरव अब 11 महीने का था। वह होटल की रसोई में काम करने वाली महिलाओं को पहचानता था और कबीर को देखते ही दोनों हाथ फैलाकर हँसता था। अदिति पहली बार अपने बेटे को बिना डर के बड़ा होते देख रही थी।

लेकिन कबीर केवल पुराना मित्र नहीं था।

एक रात समुद्र तट पर चलते हुए उसने अदिति को बताया था कि उसके पिता की हत्या 7 वर्ष पहले सड़क दुर्घटना बताकर बंद कर दी गई थी। वास्तव में वे पुलिस संरक्षण में चल रहे अवैध खनन और भूमि कब्जे के प्रमाण जुटा रहे थे। उनकी निजी डायरी में कई अधिकारियों के नाम थे। उनमें सबसे अधिक बार विक्रम राठौड़ का नाम लिखा था।

कबीर ने वर्षों तक चुपचाप दस्तावेज जमा किए थे। उसने ईमानदार अधिकारियों, केंद्रीय जाँच एजेंसी और मानवाधिकार वकीलों से संपर्क किया था, मगर विक्रम के विरुद्ध प्रत्यक्ष स्वीकारोक्ति या अंदरूनी गवाही के बिना मामला आगे नहीं बढ़ रहा था।

अदिति के पास मिले कागज उस जाँच की खोई हुई कड़ी थे।

उस रात विक्रम ने होटल के अभिलेख जाँचने के लिए अपने पद का दबाव डाला। अदिति ने नौकरी के समय अपना उपनाम बदलकर “अदिति सेन” लिखवाया था, लेकिन आरव के जन्म प्रमाणपत्र की एक प्रति कर्मचारी दस्तावेजों में थी। थोड़ी धमकी और रिश्वत के बाद विक्रम तक सच्चाई पहुँच गई।

रात 1 बजे अदिति के नए फोन पर अनजान नंबर से संदेश आया—

“मेरा बेटा लेकर भागने की कीमत पता है? कल सुबह अकेली आना। नहीं आई तो आरव को उठवा लूँगा।”

अदिति की उँगलियाँ सुन्न पड़ गईं। वह आरव के पालने के पास बैठ गई और उसे अपनी बाँहों में उठा लिया। बच्चा नींद में उसकी साड़ी पकड़कर फिर सो गया।

कबीर ने तुरंत वकील को बुलाया। उसने अदिति और आरव को उसी रात दूसरे शहर भेजने का सुझाव दिया।

—नहीं, अदिति ने कहा।

उसकी आवाज काँप रही थी, मगर निर्णय स्पष्ट था।

—मैं हर बार भागती रही तो वह हर शहर में मेरा पीछा करेगा। आज आरव छोटा है। कल वह स्कूल जाएगा। क्या मैं हर कुछ महीनों में उसका नाम, घर और जीवन बदलती रहूँगी?

कबीर ने उसे ध्यान से देखा।

—विक्रम खतरनाक है।

—इसीलिए उसे रोका जाना जरूरी है।

अगली सुबह एक योजना बनी। होटल के निजी सम्मेलन कक्ष में अदिति विक्रम से मिलेगी। कमरे में छिपे कैमरे और ध्वनि उपकरण लगाए गए। बगल के कक्ष में केंद्रीय जाँच दल, गोवा पुलिस के 2 विश्वसनीय अधिकारी और अदिति की वकील साक्षी नायर मौजूद थे।

योजना सुनने में सरल थी, मगर सबसे कठिन काम अदिति को करना था। उसे उसी आदमी के सामने बैठना था, जिसने उसे गर्भावस्था में मारा, उसके कमरे में कैमरे लगाए और एक खुला गड्ढा दिखाकर मौत की धमकी दी थी।

अदिति ने हल्की नीली सूती साड़ी पहनी। उसने कोई गहना नहीं लगाया। बाल बाँधते समय उसकी उँगलियाँ कई बार उलझीं। आईने में उसे अपना पुराना चेहरा दिखाई दिया—वही चेहरा जो विक्रम का मूड देखकर साँस लेने का तरीका बदल लेता था।

फिर उसने आरव की तस्वीर अपने ब्लाउज के भीतर रखी और सम्मेलन कक्ष में चली गई।

विक्रम 20 मिनट देर से आया। उसके चेहरे पर वही आत्मविश्वास था, जो कानून को निजी संपत्ति समझने वाले लोगों के चेहरे पर होता है।

उसने कुर्सी खींची और बिना अनुमति अदिति के सामने बैठ गया।

—आखिर समझ आ गया कि तुम अकेली कुछ नहीं हो।

अदिति ने नजरें झुका लीं। यह डर का अभिनय नहीं था; वह अपने भीतर उठती घृणा को छिपा रही थी।

—मैं थक गई हूँ, विक्रम। आरव को पिता चाहिए। मैं वापस चलने के लिए तैयार हूँ, लेकिन पहले मुझे सच जानना होगा। अगर तुम्हारे खिलाफ कोई कार्रवाई हुई तो हमारा क्या होगा?

विक्रम मुस्कराया।

—मेरे खिलाफ कार्रवाई? आधे अधिकारी मेरे पैसे पर घर चला रहे हैं।

अदिति ने धीरे से पूछा, “तुम्हारी मेज से जो फाइलें मिली थीं, उनमें खदानों, जमीनों और लापता गवाहों के नाम थे। क्या वे सब तुम्हारे लोग हैं?”

विक्रम का चेहरा सख्त हुआ।

—तुमने मेरी फाइलें छुई थीं?

अदिति ने तुरंत पीछे हटने का अभिनय किया।

—मैं डर गई थी। मुझे लगा तुम किसी बड़े संकट में हो। अगर मैं तुम्हारी पत्नी हूँ तो मुझे पता होना चाहिए कि किसके सामने क्या कहना है।

उसने वही भाषा चुनी, जिसे विक्रम सुनना चाहता था—पत्नी, वफादारी, परिवार और चुप्पी।

विक्रम कुर्सी पर पीछे झुक गया।

—संकट में मैं नहीं हूँ। संकट उन लोगों का होता है जो मेरा विरोध करते हैं।

उसने एक-एक करके कई नाम बताए। उसने गर्व से कहा कि उसने सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल अवैध पत्थर ढोने वाले ट्रकों को रास्ता दिलाने में किया। उसने 3 गवाहों के बयान गायब करवाए। कबीर के पिता की दुर्घटना का उल्लेख करते हुए वह हँसा।

—वह बूढ़ा बहुत ईमानदार बनता था। ब्रेक किसने कटवाए, यह साबित कौन करेगा?

बगल के कक्ष में बैठे कबीर की मुट्ठियाँ कस गईं। उसकी आँखें भर आईं, मगर साक्षी ने उसका हाथ पकड़कर उसे शांत रहने का संकेत दिया।

अदिति ने अपने नाखून हथेली में गड़ा लिए।

—और वह गड्ढा? उसने पूछा। “क्या सच में तुम मुझे मार देते?”

विक्रम उसकी ओर झुका।

—जरूरत पड़ती तो हाँ। लेकिन मारने से पहले तुम्हें पागल घोषित करता। रिकॉर्ड में लिखा जाता कि तुम बच्चे को लेकर भागी और कहीं आत्महत्या कर ली। तुम्हारी शिकायत पहले ही मानसिक अस्थिरता के नाम पर दर्ज करवा चुका था।

अदिति की आँखों में आँसू आ गए। यह अभिनय नहीं था। उसे पहली बार पता चला कि उसकी हत्या की कहानी भी पहले से लिखी जा चुकी थी।

उसी समय विक्रम का फोन बजा। स्क्रीन पर उसकी प्रेमिका का संदेश था। साथ में होटल के कर्मचारी ने भेजी एक तस्वीर थी, जिसमें कबीर आरव को गोद में लिए हँस रहा था और अदिति पास खड़ी थी।

विक्रम की आँखों का रंग बदल गया।

—तो यह सब उस आदमी के लिए था?

अदिति ने पीछे हटते हुए कहा, “नहीं।”

विक्रम ने मेज पर मुक्का मारा।

—मेरे बेटे को किसी दूसरे आदमी के पास ले गई? तुमने सोचा मैं तुम्हें जीवित छोड़ दूँगा?

वह कुर्सी से उठा और अदिति की बाँह पकड़ ली। उसकी पकड़ इतनी तेज थी कि अदिति की चूड़ियाँ टूटकर फर्श पर बिखर गईं।

—आरव तुम्हारी संपत्ति नहीं है, अदिति ने पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखकर कहा।

विक्रम ने उसे धक्का दिया। वह दीवार से टकराकर नीचे गिर पड़ी। विक्रम उसका मुँह दबाने के लिए झुका, लेकिन इस बार कमरा बंद नहीं रहा।

दरवाजा टूटकर खुला। अधिकारी भीतर घुसे और विक्रम को अदिति से अलग किया। उसने अपना पद चिल्लाकर बताया, अधिकारियों को निलंबित कराने की धमकी दी और कबीर को मार डालने की बात कही।

तभी साक्षी ने सामने लगा कैमरा दिखाया।

—आपके पद, धमकी और स्वीकारोक्ति तीनों दर्ज हो चुके हैं।

पहली बार विक्रम के चेहरे से घमंड गायब हुआ।

उसे हथकड़ी लगाई गई तो वह अदिति की ओर देखकर चीखा—

—तुम मेरे बिना कुछ नहीं हो!

अदिति धीरे-धीरे उठी। उसकी कोहनी छिल गई थी, साँस तेज थी, मगर वह पीछे नहीं हटी।

—तुम्हारे साथ रहते हुए मैं कुछ नहीं बची थी। तुम्हारे बिना मैं फिर से अपने नाम तक पहुँची हूँ।

विक्रम की गिरफ्तारी के बाद मामला केवल घरेलू हिंसा तक सीमित नहीं रहा। अदिति के दिए कागजों, होटल में दर्ज स्वीकारोक्ति और कबीर के पिता की डायरी से एक बड़ा जाल सामने आया। पुलिस अधिकारियों, खनन ठेकेदारों, दलालों और 2 स्थानीय नेताओं के विरुद्ध जाँच शुरू हुई।

विक्रम पर पत्नी को धमकाने, शारीरिक हिंसा, पद के दुरुपयोग, साक्ष्य मिटाने, भ्रष्टाचार, आपराधिक षड्यंत्र और गवाहों को नुकसान पहुँचाने के आरोप लगे। उसके कई सहयोगियों ने पहले उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन जब जाँच दल ने बैंक खातों, संपत्ति और फोन अभिलेखों की जाँच की तो वर्षों से दबे मामले खुलने लगे।

अदिति को अदालत में बयान देना पड़ा।

विक्रम सामने बैठा था। वर्दी नहीं थी, केवल जेल की निर्धारित पोशाक थी। फिर भी अदिति के घुटने काँप रहे थे। शरीर कई बार उस भय को याद रखता है, जिसे मन पीछे छोड़ना चाहता है।

न्यायाधीश ने पूछा, “क्या आप अपना बयान देने की स्थिति में हैं?”

अदिति ने आरव की ओर देखा, जो बाहर कबीर की गोद में था।

—हाँ।

उसने पहला थप्पड़, थाने में हुआ विश्वासघात, छिपे कैमरे, बंद दस्तावेज, गड्ढे की धमकी और हत्या को आत्महत्या दिखाने की योजना सब बताया। अदालत में बैठे कई लोगों की आँखें झुक गईं। कुछ वही पुलिसकर्मी थे, जिन्होंने कभी उसकी शिकायत को “घर का मामला” कहकर लौटाया था।

एक महिला सिपाही बयान के बाद अदिति के पास आई।

—मैडम, उस दिन आपको वापस भेजना गलत था। हममें से किसी ने आवाज उठाई होती तो शायद आपको इतना नहीं सहना पड़ता।

अदिति ने उसे क्षमा का आश्वासन नहीं दिया। उसने केवल कहा—

—अगली महिला को वापस मत भेजना।

अदालत ने विक्रम को हिरासत में रखने का आदेश दिया। आरव की अभिरक्षा अदिति को मिली और विक्रम को बच्चे से किसी भी प्रकार संपर्क करने से रोक दिया गया। बाद में अलग-अलग अपराधों के मुकदमे चलते रहे। कबीर के पिता की हत्या की जाँच भी दोबारा खोली गई।

अदिति ने जीत का उत्सव नहीं मनाया। उसके लिए न्याय कोई आतिशबाजी नहीं था। न्याय वह पहली रात थी, जब उसने दरवाजा बंद किया और यह जाँचने नहीं उठी कि बाहर विक्रम के कदमों की आवाज तो नहीं आ रही।

कुछ महीनों बाद उसने गोवा के एक महिला आश्रय गृह में भोजन भेजना शुरू किया। वहाँ कई महिलाएँ ऐसी थीं जो अपने घर से केवल एक थैले, बच्चों और शरीर पर पड़े निशानों के साथ निकली थीं। किसी का पति व्यवसायी था, किसी का शिक्षक, किसी का पुजारी परिवार से संबंध था, किसी का सरकारी पद था। हिंसा ने अलग-अलग चेहरे पहने थे, लेकिन डर की भाषा सबकी एक थी।

अदिति सप्ताह में 2 दिन वहाँ खाना बनाना सिखाने लगी। वह महिलाओं से कहती—

—कमाई केवल पैसा नहीं देती। कमाई निर्णय लेने की आवाज लौटाती है।

कबीर ने होटल की एक खाली इमारत उसे उपलब्ध कराई। अदिति ने उसे प्रशिक्षण रसोई में बदल दिया, जहाँ आश्रय गृह से निकली महिलाएँ खाना बनाना, हिसाब रखना, ग्राहक संभालना और छोटे व्यवसाय चलाना सीखती थीं।

उस जगह का नाम उसने “नई आँच” रखा।

दरवाजे के भीतर एक पंक्ति लिखी थी—

“जिस प्रेम में साँस लेने की अनुमति माँगनी पड़े, वह प्रेम नहीं, कैद है।”

कबीर ने कभी अदिति से उसके अतीत को भूलने के लिए नहीं कहा। उसने विवाह का प्रस्ताव भी जल्दबाजी में नहीं रखा। वह बस आरव की बीमारी में अस्पताल गया, रात देर तक प्रशिक्षण रसोई की टूटी पाइप ठीक करवाता रहा और अदिति के डर लौटने पर बिना प्रश्न किए पास बैठा रहा।

समय के साथ अदिति ने समझा कि सुरक्षा ऊँची आवाज में किए वादों से नहीं बनती। सुरक्षा छोटे, लगातार किए गए सम्मान से बनती है।

आरव के दूसरे जन्मदिन पर प्रशिक्षण केंद्र के आँगन में एक छोटी दावत रखी गई। आरव ने केक काटने से पहले दोनों हाथों में आटा लगा लिया और दौड़ता हुआ कबीर के पास पहुँचा।

—पापा!

पूरा आँगन कुछ क्षण के लिए शांत हो गया।

कबीर ने अदिति की ओर देखा, जैसे अनुमति माँग रहा हो। अदिति की आँखें भर आईं। उसने आरव को नहीं रोका। उसने केवल सिर हिला दिया।

कबीर घुटनों के बल बैठा और बच्चे को गले लगा लिया।

अदिति ने उन्हें देखा तो उसे श्मशान का वह गड्ढा याद आया। कभी विक्रम ने उसी गड्ढे को उसका भविष्य बताया था। मगर वह भविष्य नहीं था। वह केवल उस आदमी की अंतिम कोशिश थी, जो डर को भाग्य समझता था।

अदिति ने अपना भाग्य स्वयं चुना था—एक रसोई की गर्म आँच, अपने बेटे की हँसी, मेहनत से लौटता आत्मसम्मान और ऐसा घर जहाँ किसी को प्रेम साबित करने के लिए भय सहना नहीं पड़ता था।

उसने देर से सही, मगर यह सीख लिया था कि कभी-कभी खतरा वर्दी पहनकर सुरक्षा का दावा करता है, और कभी-कभी बचाने वाला व्यक्ति कोई वादा नहीं करता—वह बस दरवाजा खुला रखता है, ताकि डरी हुई स्त्री अपनी इच्छा से भीतर आ सके और अपनी इच्छा से बाहर जा सके।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.