
PART 1
जब नैना ने शादी के कमरे में अपने लाल बनारसी लहंगे की जगह चमकीली पीली कमीज़, हरे सस्पेंडर, पोल्का डॉट वाली ढीली पैंट और प्लास्टिक के विशाल जोकर जूते देखे, तो कमरे में मौजूद हर औरत की सांस जैसे वहीं अटक गई।
जयपुर के बाहरी इलाके में बनी राजवाड़ा हेरिटेज हवेली उस सुबह किसी सपने जैसी सजी थी। आंगन में गेंदे और मोगरे की मालाएं झूल रही थीं, ढोल वालों की हल्की थाप दूर से आ रही थी, और मेहंदी की खुशबू अब भी नैना के हाथों से उठ रही थी। कुछ ही देर में उसे मंडप तक जाना था, जहां अर्जुन मल्होत्रा उसका इंतज़ार कर रहा था।
लेकिन सफेद कवर खोलते ही सपना फट गया।
नैना शर्मा ने 8 महीने तक उस लहंगे के लिए पैसे जोड़े थे। वह दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में काउंसलर थी। उसकी तनख्वाह बड़ी नहीं थी, पर उसकी मेहनत सच्ची थी। वह लहंगा उसके लिए सिर्फ कपड़ा नहीं था। वह उसकी इज़्ज़त, उसकी कमाई, उसकी पसंद और उसके प्रेम की पहली सार्वजनिक गवाही था।
और अब उसके सामने एक जोकर का भद्दा कपड़ा पड़ा था।
उसकी सहेली रीमा के हाथ कांप रहे थे। मौसी ने माथा पकड़ लिया। कजिन बहनें एक-दूसरे को देखने लगीं। किसी ने धीरे से कहा, “हे भगवान… ये किसने किया?”
नैना ने जवाब नहीं दिया। उसे जवाब पता था।
सविता मल्होत्रा।
अर्जुन की मां।
सविता ऐसी औरत नहीं थी जो चिल्लाकर जहर उगलती। वह मुस्कुराकर काटती थी। मोती की माला, रेशमी साड़ी, नपे-तुले शब्द और भीतर तक उतर जाने वाला अपमान। पहली मुलाकात में ही उसने नैना को सिर से पैर तक देखा था और कहा था, “सरकारी अस्पताल में काम करती हो? बहुत सेवा भाव है तुम्हारा।”
उस दिन नैना समझ गई थी कि सविता के लिए सेवा भाव का मतलब था गरीबी।
मल्होत्रा परिवार के पास दक्षिण दिल्ली में बंगला, गुरुग्राम में ऑफिस, जयपुर में पैतृक हवेली और समाज में ऊंचा नाम था। नैना के पिता सरकारी स्कूल के रिटायर्ड अध्यापक थे और मां आंगनवाड़ी सुपरवाइज़र। घर छोटा था, लेकिन वहां किसी की आवाज़ को छोटा नहीं किया जाता था।
जब अर्जुन ने नैना से शादी करने की बात घर में रखी, सविता ने मुस्कुराकर मिठाई बांटी, लेकिन उसकी आंखों में साफ लिखा था कि यह रिश्ता उसे अपमान लगता है।
शादी की हर तैयारी में उसने दखल देना चाहा। मेहमानों की सूची, खाना, गहने, फोटोग्राफर, यहां तक कि नैना की चूड़ियों का रंग भी। उसने अपने खानदान का भारी पुराना लहंगा पहनाने की ज़िद की, जिसे नैना ने विनम्रता से मना कर दिया।
“मैं अपनी कमाई से खरीदा हुआ लहंगा पहनूंगी,” नैना ने कहा था।
सविता ने उस दिन सिर्फ इतना कहा था, “जैसी तुम्हारी समझ।”
3 दिन पहले वही सविता प्यार से बोली थी, “बेटा, तुम्हारा लहंगा बुटीक से मैं ले आऊंगी। रास्ते में ही है। शादी से पहले तुम्हें भागदौड़ नहीं करनी चाहिए।”
अर्जुन अपनी मां की नरमी देखकर इतना खुश हुआ था कि नैना ने शक को मन में दबा दिया।
अब वही शक उसके पैरों के पास जोकर के जूतों की तरह पड़ा था।
रीमा ने तुरंत फोन उठाया। “मैं अर्जुन को बुलाती हूं। अभी दूसरा लहंगा लाते हैं। तू ऐसे बाहर नहीं जाएगी।”
“कोई फोन नहीं करेगा,” नैना की आवाज़ धीमी थी, लेकिन लोहे जैसी।
“नैना, ये शादी है। तमाशा नहीं।”
नैना ने पोल्का डॉट वाली पैंट उठाई और उसे सामने फैलाकर देखा।
“तमाशा उन्होंने बनाया है,” उसने कहा, “अब मंच मैं संभालूंगी।”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
“तू सच में ये पहनेगी?” रीमा ने फुसफुसाकर पूछा।
“हां,” नैना ने कहा। “लेकिन मैं रोती हुई जोकर नहीं बनूंगी। मैं दुल्हन बनकर चलूंगी।”
उसने मेकअप आर्टिस्ट से कहा, “मेरे चेहरे को सबसे सुंदर दुल्हन जैसा बनाओ। माथे पर टीका, आंखों में काजल, बालों में मोगरा। गले से ऊपर कोई कमी नहीं होनी चाहिए।”
एक घंटे बाद कमरे में एक अजीब युद्ध की तैयारी पूरी हो चुकी थी। नैना के बालों में सफेद फूल थे, माथे पर बिंदी चमक रही थी, आंखों में काजल था, होंठों पर हल्की मुस्कान। लेकिन शरीर पर पीली कमीज़, हरे सस्पेंडर और पोल्का डॉट वाली पैंट थी।
उसने रंगीन विग और लाल नाक नहीं पहनी।
“इतना अधिकार उन्हें नहीं दूंगी,” उसने कहा।
लेकिन उसने विशाल जोकर जूते पहन लिए।
जब उसके पिता कमरे में आए, उनकी आंखें भर आईं। “बेटी… ये किसने किया?”
नैना ने उनका हाथ पकड़ा। “जिसे लगा मैं शर्म से छिप जाऊंगी।”
पिता ने अपनी रीढ़ सीधी की। “तो चल। आज पूरा आंगन देखेगा कि मेरी बेटी को कोई झुका नहीं सकता।”
लकड़ी के दरवाज़े खुले। शहनाई शुरू हुई। सबकी गर्दनें एक साथ मुड़ीं।
और पहली पंक्ति में बैठी सविता मल्होत्रा के चेहरे से रंग उड़ गया।
PART 2
जोकर जूतों की आवाज़ संगमरमर पर अजीब तरह से गूंज रही थी।
चीं।
चीं।
चीं।
हर कदम पर मेहमानों के चेहरे बदल रहे थे। कुछ हंसना चाहते थे, कुछ शर्म से नजरें झुका रहे थे, कुछ मोबाइल निकाल चुके थे। मगर नैना ने सिर नहीं झुकाया। उसके हाथों में सफेद मोगरे का गुलदस्ता था और आंखें सीधी मंडप पर।
अर्जुन ने पहले उसे देखा, फिर उसके कपड़े, फिर अपनी मां को।
सिर्फ 1 पल में उसके चेहरे पर भ्रम से चिंता, चिंता से क्रोध और क्रोध से दर्द उतर आया।
नैना मंडप पर पहुंची तो उसने बस पूछा, “मां ने किया?”
नैना ने सिर हिला दिया।
अर्जुन ने उसका हाथ थामा। “तुम बहुत सुंदर लग रही हो।”
नैना वहीं टूट सकती थी, लेकिन उसने खुद को संभाला।
पंडित जी ने मंत्र शुरू करने चाहे, पर नैना ने हाथ उठाया।
“शादी से पहले मैं अपनी होने वाली सासू मां सविता मल्होत्रा को धन्यवाद देना चाहती हूं,” उसकी आवाज़ साफ थी।
पूरा आंगन शांत हो गया।
“उन्होंने मेरा लहंगा लाने का वादा किया था। बदले में ये पोशाक रखवा दी। शायद वे मुझे इस मंडप का मज़ाक बनाना चाहती थीं।”
सविता खड़ी हो गई। “झूठ! ये लड़की ड्रामा कर रही है!”
नैना मुस्कुराई। “ड्रामा मेरा है, पोशाक आपकी।”
तभी सविता गुस्से में चीख पड़ी, “मैं अपने बेटे को ऐसी लड़की से बचा रही थी, जो हमारे घराने लायक नहीं!”
सब जम गए।
उसी समय एक होटल कर्मचारी दौड़ता आया। उसके हाथ में पारदर्शी बैग था।
“मैडम, रिसेप्शन पर अभी कोई ये छोड़ गया।”
बैग में नैना का लहंगा था।
मुड़ा हुआ, मेकअप से दागदार, और एक पर्ची चिपकी थी।
“अपनी औकात याद रखना।”
लिखावट सविता की नहीं थी।
नैना ने मेहमानों में देखा।
अर्जुन की बहन इशिता अपनी उंगलियां मेज़पोश के नीचे छिपा रही थी।
PART 3
इशिता मल्होत्रा हमेशा मीठी आवाज़ में बात करती थी। वह वही ननद थी जिसने नैना को शादी से पहले कहा था, “भाभी, आप जैसी हो वैसी ही अच्छी हो। इस घर को आपकी सादगी चाहिए।”
इसीलिए जब नैना ने उसे हाथ छिपाते देखा, तो चोट सविता से भी गहरी लगी। सविता की नफरत सामने थी, लेकिन इशिता की मुस्कान के पीछे छुरा छिपा था।
अर्जुन ने धीरे से कहा, “इशिता, हाथ बाहर निकालो।”
इशिता ने हंसने की कोशिश की। “भैया, आप भी ना…”
“हाथ बाहर निकालो।”
मंडप के पास खड़े पंडित जी तक चुप हो गए। हवा में अगरबत्ती की खुशबू थी, पर उस पल पूरे आंगन में सिर्फ शक की गंध थी।
इशिता ने धीरे-धीरे हाथ बाहर निकाले। उसकी उंगलियों पर नीली स्याही लगी थी। वही नीली स्याही जिससे पर्ची पर लिखा था।
नैना की मां उठ खड़ी हुईं। “तुमने लिखा?”
इशिता की आंखें भर आईं, लेकिन उनमें पछतावा कम और पकड़े जाने का डर ज्यादा था।
“मम्मी ने कहा था बस थोड़ा सबक सिखाना है,” वह बुदबुदाई। “लहंगा वापस आ जाता। शादी रुकती थोड़ी ना…”
“सबक?” नैना के पिता की आवाज़ कांप गई। “किस बात का सबक? कि गरीब घर की बेटी को प्यार करने की हिम्मत क्यों हुई?”
सविता ने झट से कहा, “गरीब नहीं कह रही थी मैं! पर रिश्ते बराबर में होते हैं। समाज में इज़्ज़त देखनी पड़ती है। लोग पूछेंगे कि मल्होत्रा परिवार की बहू कौन है, क्या जवाब देंगे?”
अर्जुन ने पहली बार अपनी मां को उस नजर से देखा जैसे कोई बेटा नहीं, एक आदमी सच को देखता है।
“आप जवाब देंगी कि वह वही लड़की है जिसने आपकी क्रूरता पहनकर भी मंडप तक चलने की हिम्मत की,” उसने कहा।
सविता सन्न रह गई।
अर्जुन के पिता, राजीव मल्होत्रा, जो अब तक पत्थर जैसे बैठे थे, उठे। उनका चेहरा पीला था, आंखें थकी हुई थीं। “सविता, तुमने हद पार कर दी।”
“तुम मुझे सबके सामने दोष दोगे?” सविता चीखी। “तुम जानते हो, मैंने इस परिवार की इज़्ज़त के लिए कितना किया है!”
राजीव की आवाज़ भारी हो गई। “इज़्ज़त दूसरों को तोड़कर नहीं बनती। आज तुमने मेरे बेटे की शादी नहीं, अपना चेहरा सबके सामने खोल दिया है।”
मेहमानों में फुसफुसाहट फैल गई। कुछ बुजुर्ग औरतें सविता की तरफ देखकर सिर हिला रही थीं। कुछ युवा लड़कियां नैना को देख रही थीं, जैसे पहली बार किसी ने उनके मन की अनकही लड़ाई को आवाज़ दे दी हो।
नैना ने पारदर्शी बैग से अपना लहंगा देखा। वह वही लहंगा था जिसे उसने सपनों से चुना था। गहरे लाल रंग पर सुनहरी कारीगरी, पल्लू पर छोटी-छोटी बेलें, और पीछे हाथ से बुना हुआ मोर। लेकिन अब उस पर फाउंडेशन और लिपस्टिक के दाग थे, जैसे किसी ने कपड़े को नहीं, उसके आत्मसम्मान को रौंदा हो।
रीमा ने गुस्से में कहा, “नैना, शादी रोक दे। इन्हें सबक मिलना चाहिए।”
नैना ने अर्जुन की तरफ देखा। उसकी आंखों में शर्म नहीं थी। डर नहीं था। सिर्फ पछतावा और प्रेम था।
“तुम क्या चाहती हो?” अर्जुन ने पूछा।
“मैं चाहती हूं कि कोई आज मेरा फैसला मेरे लिए न करे,” नैना ने कहा।
फिर वह सविता की ओर मुड़ी।
“आप चाहती थीं मैं रोकर कमरे में छिप जाऊं। आप चाहती थीं लोग कहें कि यह लड़की इस परिवार लायक नहीं थी। आप चाहती थीं अर्जुन मुझे कमज़ोर देखे। लेकिन आज आप यहीं बैठेंगी और देखेंगी कि मैं शादी करूंगी। इसी पोशाक में।”
सविता की आंखें फैल गईं। “तुम मेरे बेटे की शादी को सर्कस बना दोगी?”
नैना की आवाज़ शांत थी। “सर्कस आपने बनाया। फर्क इतना है कि मैं जोकर नहीं, दुल्हन बनकर खड़ी हूं।”
कुछ मेहमानों के मुंह से अनायास “वाह” निकला। नैना की मां रो रही थीं, लेकिन इस बार दुख से नहीं। उस रोने में गर्व था।
अर्जुन ने नैना के पिता के सामने हाथ जोड़े। “अंकल, मैं माफी मांगता हूं। मैं जानता था मां को नैना से दिक्कत है, लेकिन मैंने हर बात को स्वभाव, चिंता या परंपरा कहकर छोटा कर दिया। आज समझ आया कि चुप रहना भी गलत पक्ष में खड़ा होना होता है।”
नैना के पिता ने कुछ पल उसे देखा। फिर बोले, “बेटा, माफी शब्द से नहीं, आगे की जिंदगी से साबित होती है।”
“करूंगा,” अर्जुन ने कहा। “आज से नैना अकेली नहीं लड़ेगी।”
पंडित जी ने धीमे से पूछा, “फेरे शुरू करें?”
नैना ने अपने विशाल जूतों को देखा, फिर अर्जुन का हाथ पकड़ा।
“शुरू कीजिए।”
फेरे शुरू हुए।
हर फेरे पर जोकर जूतों की आवाज़ मंडप के लकड़ी के फर्श पर गूंजती रही। चीं। चीं। चीं। पहले लोग असहज थे, फिर कोई रोया, फिर किसी ने मुस्कुराकर आंख पोंछी। वह आवाज़ अब मज़ाक की नहीं थी। वह घोषणा थी कि अपमान भी प्रतिरोध बन सकता है।
जब 7वां फेरा पूरा हुआ, अर्जुन ने नैना के माथे की मांग में सिंदूर भरा। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। मंगलसूत्र पहनाते समय उसकी आंखें भर आईं।
“मैंने तुम्हें बचाने का वादा किया था,” उसने फुसफुसाया, “और आज तुमने खुद को हम सबसे बचा लिया।”
नैना ने कहा, “अब हम दोनों सीखेंगे कि परिवार का मतलब खून से नहीं, सम्मान से होता है।”
शादी पूरी हुई तो कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा। फिर सबसे पहले नैना के पिता खड़े हुए और ताली बजाई। फिर उसकी मां। फिर रीमा। फिर राजीव मल्होत्रा। फिर धीरे-धीरे पूरा आंगन तालियों से भर गया।
सविता बैठी रही। उसके चेहरे पर आंसू थे, लेकिन वह हार के आंसू थे। इशिता सिर झुकाए कांप रही थी।
रिसेप्शन शुरू हुआ तो नैना बदलने नहीं गई। उसने अपना असली लहंगा एक कुर्सी पर टांग दिया, बिल्कुल सामने, पर्ची उसके ऊपर रखी रही। किसी को अफवाह बनाने की ज़रूरत नहीं थी। सच सबकी आंखों के सामने था।
जब डीजे ने पहला गाना बजाया, अर्जुन ने हाथ बढ़ाया। “डांस करोगी?”
नैना ने अपने जूतों की तरफ देखा। “ये बहुत आवाज़ करेंगे।”
अर्जुन मुस्कुराया। “आज पूरी दुनिया सुने।”
वे नाचे।
हर कदम पर चीं की आवाज़ आती और लोग हंस पड़ते। मगर वह हंसी अब अपमान की नहीं थी। वह राहत की हंसी थी, उस तनाव के टूटने की हंसी, जो किसी औरत की गरिमा पर हुए हमले से पैदा हुआ था।
फिर नैना ने अपने पिता के साथ डांस किया। बूढ़े शिक्षक की आंखों में इतने आंसू थे कि वह कदम भूल गए।
“बेटी, काश मैं तुझे इस दिन से बचा पाता,” उन्होंने कहा।
“आपने बचाया,” नैना ने उनका हाथ कसकर पकड़ा। “आपने मेरा सिर झुकने नहीं दिया।”
रात के बीच अर्जुन ने माइक उठाया। पूरा हॉल शांत हो गया।
“आज मेरी पत्नी को उन लोगों ने चोट पहुंचाई, जिन्हें उसे गले लगाना चाहिए था,” उसने कहा। “मैं सबके सामने एक बात साफ कर रहा हूं। जो नैना का सम्मान नहीं करेगा, वह हमारी जिंदगी में जगह नहीं पाएगा। रिश्ता चाहे खून का हो, समाज का हो या नाम का।”
सविता ने पहली बार नजर उठाकर अपने बेटे को देखा। उसे शायद समझ आया कि उसने जिस लड़की को बाहर धकेलना चाहा था, उसी धक्के में उसने अपना बेटा दूर कर दिया।
इशिता रोते हुए उठी और नैना के पास आई। “भाभी… मुझसे गलती हो गई।”
नैना ने उसे देखा। “गलती तब होती है जब पैर फिसलता है। तुमने मेरी शादी के दिन मेरे आत्मसम्मान पर पैर रखा।”
इशिता चुप हो गई।
“माफी मांगना आसान है,” नैना बोली। “भरोसा वापस लाना मुश्किल। अभी मैं सिर्फ इतना कह सकती हूं कि आज तुम मुझे गले लगाने के लायक नहीं हो।”
इशिता का चेहरा सफेद पड़ गया। शायद पहली बार उसे एहसास हुआ कि आंसू हर दरवाज़ा नहीं खोलते।
शादी के बाद नैना और अर्जुन दिल्ली लौट आए। 3 दिन तक घर में चुप्पी थी। फूल मुरझा चुके थे, मेहंदी हल्की पड़ने लगी थी, लेकिन उस दिन की आवाज़ अब भी उनके कानों में थी।
तीसरे दिन अर्जुन ने अपनी मां को फोन किया। स्पीकर ऑन था।
“मां, मैं बात साफ करना चाहता हूं,” उसने कहा।
सविता की आवाज़ थकी हुई थी। “बेटा, मैंने गुस्से में—”
“नहीं,” अर्जुन ने रोक दिया। “आपने योजना बनाई। नैना का लहंगा छिपाया। इशिता से वह पर्ची लिखवाई। उसे सबके सामने शर्मिंदा करना चाहा। अगर नैना कभी आपको माफ न करे, तो मैं उसका साथ दूंगा।”
उधर लंबी चुप्पी रही।
फिर सविता बोली, “तुम अपनी मां से ऐसे बात करोगे?”
“मां होने का मतलब किसी की पत्नी को तोड़ने का अधिकार नहीं होता,” अर्जुन ने कहा। “और जब हमारे बच्चे होंगे, वे सिर्फ उन्हीं लोगों के पास जाएंगे जो प्यार में सम्मान रखना जानते हों।”
फोन के उस पार पहली बार सविता की सांस टूटती सुनाई दी। वह रो रही थी। लेकिन उस रोने में गुस्सा कम और खो देने का डर ज्यादा था।
एक महीने बाद सविता ने नैना से मिलने की इच्छा जताई। नैना ने बहुत सोचा। फिर उसने मिलने का फैसला किया, क्योंकि वह भागना नहीं चाहती थी, लेकिन झुकना भी नहीं।
वे दिल्ली के एक शांत कैफे में मिले। सविता बिना भारी गहनों के आई थी। साड़ी साधारण थी, चेहरा थका हुआ। वह पहले जैसी रानी नहीं लग रही थी। वह एक ऐसी औरत लग रही थी, जिसे पहली बार अपने किए का भार महसूस हो रहा था।
“नैना,” उसने कहा, “मुझे माफ कर दो।”
नैना ने सीधा जवाब दिया, “माफी मांगने से पहले सच बोलिए।”
सविता की आंखें भर आईं। “मैंने तुम्हें स्वीकार नहीं किया क्योंकि मुझे डर था कि अर्जुन मेरे नियंत्रण से बाहर चला जाएगा। मैंने इसे परिवार की इज़्ज़त का नाम दिया, लेकिन सच में यह मेरा अहंकार था।”
नैना ने धीरे से पूछा, “क्या आपको लगा था कि मुझे तोड़कर आपका बेटा आपसे और प्यार करेगा?”
सविता ने सिर झुका लिया। “हां। और मैं गलत थी।”
“आपने मुझे नहीं तोड़ा,” नैना ने कहा। “आपने अर्जुन को दिखा दिया कि प्यार और नियंत्रण में फर्क होता है।”
सविता रो पड़ी। “मैं अपनी गलती सुधारना चाहती हूं।”
“गलती नहीं, नुकसान,” नैना ने स्पष्ट कहा। “और नुकसान की भरपाई शब्दों से नहीं होती। मैं आपकी माफी सुन रही हूं, लेकिन भरोसा वापस पाने में साल लगेंगे। मैं आपको अभी अपनी जिंदगी में जगह नहीं दे रही। सिर्फ एक मौका दे रही हूं कि आप सम्मान से दूर खड़ी रहना सीखें।”
सविता ने पहली बार बिना बहस किए सिर हिलाया।
“और इशिता?” नैना ने पूछा।
“वह शर्मिंदा है।”
“शर्मिंदा होना काफी नहीं। उसे भी सच्ची माफी मांगनी होगी। बिना फूल, बिना नाटक, बिना परिवार को बीच में लाए।”
कुछ हफ्तों बाद इशिता आई। उसने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा, “मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। मुझे जलन थी कि भैया तुम्हें मुझसे ज्यादा सुनते थे। मम्मी ने कहा तो मैं तैयार हो गई, क्योंकि मुझे लगा तुम्हें नीचे दिखाने से मैं फिर महत्वपूर्ण हो जाऊंगी। मैं माफी की हकदार नहीं, लेकिन माफी मांगना चाहती हूं।”
नैना ने उसे भीतर नहीं बुलाया। बस कहा, “आज पहली बार तुमने सच बोला। बाकी समय बताएगा।”
समय बीतता गया। परिवार के त्योहार बदले। दीवाली पर नैना ने मल्होत्रा घर जाने से मना किया, तो अर्जुन ने बिना सवाल उसके साथ अपने छोटे फ्लैट में दीये जलाए। होली पर राजीव मिठाई लेकर आए, लेकिन सविता को नहीं लाए, क्योंकि सीमाएं समझना भी रिश्ते निभाने का हिस्सा था।
धीरे-धीरे सविता बदलने की कोशिश करने लगी। वह फोन पर सलाह देने से पहले पूछती, “क्या मैं कुछ कह सकती हूं?” वह मेहमानों के सामने नैना की नौकरी को “सरकारी अस्पताल की छोटी नौकरी” नहीं, “लोगों को संभालने का बड़ा काम” कहने लगी। मगर नैना ने अपनी सावधानी नहीं छोड़ी। उसने सीखा था कि क्षमा और भूल जाना एक बात नहीं होते।
1 साल बाद अर्जुन ने शादी की एक फोटो फ्रेम कराकर नैना को दी।
फोटो में वह मंडप की ओर चल रही थी। माथे पर बिंदी, आंखों में काजल, बालों में मोगरा, गले में दुल्हन का हार, और शरीर पर वही पीली कमीज़, पोल्का डॉट पैंट और हरे सस्पेंडर। पैरों में वे बेहूदा विशाल जूते थे, लेकिन उसके चेहरे पर ऐसी आग थी कि कोई उसे मज़ाक नहीं कह सकता था।
अर्जुन ने कहा, “यह फोटो उस दिन की है जब तुमने अपमान को ताज बना दिया।”
नैना ने फोटो को ड्राइंग रूम में टांग दिया।
जब भी कोई मेहमान पूछता, “ये कैसी शादी की फोटो है?”, नैना पूरी कहानी सुनाती। वह खुद को बेचारी बनाकर नहीं सुनाती थी। वह बदला लेने वाली औरत की तरह भी नहीं सुनाती थी। वह इसे उस सबक की तरह सुनाती थी जो हर लड़की, हर बहू, हर पत्नी और हर मां को कभी न कभी सीखना पड़ता है।
कि परिवार की शांति के नाम पर अपनी इज़्ज़त दफन करना त्याग नहीं होता।
कि चुप रहना हमेशा संस्कार नहीं होता।
कि किसी और की क्रूरता की शर्म अपने माथे पर लगाना जरूरी नहीं।
कभी-कभी गरिमा लाल लहंगे में नहीं आती।
कभी-कभी वह पीली कमीज़, हरे सस्पेंडर, पोल्का डॉट पैंट और चीं-चीं करते जोकर जूतों में मंडप तक चलती है।
और जब सिर ऊंचा हो, तो कोई भी औरत मज़ाक नहीं बनती।
मज़ाक वह बनता है, जिसे लगता है कि किसी को नीचा दिखाकर वह खुद ऊंचा हो जाएगा।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.