
PART 1
शादी की रात, जब नीचे संगमरमर के हॉल में मेहमान शहनाई और शैम्पेन के बीच हंस रहे थे, अनन्या मल्होत्रा ने ऊपर की बंद बाथरूम में 10 साल के एक लड़के को फर्श पर सिकुड़ा हुआ पाया, जिसकी पीठ पर पुराने और नए निशान एक साथ जल रहे थे।
वह अभी भी अपनी लाल बनारसी साड़ी में थी। माथे का सिंदूर ताजा था, गले का हार भारी था, और कैमरों ने कुछ घंटे पहले ही उसे दिल्ली के छतरपुर वाले मल्होत्रा फार्महाउस के रोशन दरवाजे पर मुस्कुराते हुए कैद किया था। बाहर से यह शादी शहर की सबसे शानदार शादी लग रही थी। मल्होत्रा परिवार रियल एस्टेट, स्कूलों, मंदिरों के दान और राजनीतिक संबंधों के लिए मशहूर था। हर अखबार में उनकी तस्वीरें छपती थीं, हर समारोह में उनका नाम सम्मान से लिया जाता था।
लेकिन अनन्या जानती थी कि यह शादी प्रेम कहानी नहीं थी। वह संकट प्रबंधन सलाहकार थी। राघव मल्होत्रा पर हाल ही में एक जमीन घोटाले की छाया पड़ी थी। एक समझदार, शिक्षित, शांत पत्नी उसके नाम को फिर से सम्मान दे सकती थी। राघव विधुर था। उसकी पहली पत्नी नंदिता 3 साल पहले एक निजी अस्पताल में अचानक मर गई थी। उसका बेटा आरव था, जिसके बारे में घर में लोग ऐसे बात करते थे जैसे वह दीवार पर टंगी कोई पुरानी तस्वीर हो।
अनन्या दुल्हन के कमरे की तलाश में गलत गलियारे में चली गई थी। हवेली जैसी उस कोठी में हर दरवाजा भारी था, हर दीवार पर पूर्वजों की तस्वीरें थीं, हर कोना धन से चमकता था, पर कहीं भी गर्माहट नहीं थी। तभी उसने हल्की-सी दबाई हुई सिसकी सुनी। चीख नहीं। जैसे किसी बच्चे ने खुद को चुप रहने का आदेश दे रखा हो।
उसने बाथरूम का दरवाजा धक्का दिया।
आरव ठंडे फर्श पर बैठा था। उसने अपनी कमीज छाती से चिपका रखी थी। बाल पसीने से भीगे थे। होंठ सफेद थे। आंखें ऐसी थीं जैसे मदद मांगना भी कोई अपराध हो।
—मैं गिर गया था, अनन्या आंटी।
अनन्या घुटनों के बल बैठ गई।
—आरव, सच बताओ। किसने किया?
वह टब से और सट गया।
—मत पूछिए। दादी कहती हैं, जो बच्चे झूठ बोलते हैं, उन्हें बोर्डिंग स्कूल भेज दिया जाता है।
अनन्या ने धीरे से उसकी कमीज हटाई। उसका गला सूख गया। कुछ निशान ताजे थे, कुछ पीले पड़ चुके थे, कुछ इतने पुराने कि शरीर ने उन्हें अपनी भाषा में याद कर लिया था। यह गिरना नहीं था। यह आदत थी।
सिंक के पास एक पुराना नीला स्वेटर पड़ा था। आरव ने कांपते हुए कहा—
—मम्मा का था। मैंने छू लिया था।
नीचे ढोलक बज रही थी। ऊपर एक बच्चा अपनी मरी हुई मां की निशानी छूने की सजा भुगत रहा था।
अनन्या की आंखों में अचानक अपना बचपन लौट आया। 9 साल की उम्र में जब उसके सौतेले भाई ने उसे कांच के दरवाजे से धक्का दिया था, उसकी मां ने खून पोंछकर कहा था, “घर की इज्जत बचानी पड़ती है।” उसी रात अनन्या ने तय किया था कि उसके सामने कोई बच्चा किसी बड़े की सुविधा के लिए चुप नहीं रहेगा।
उसने आरव की पीठ साफ की, दवा लगाई, उसे कंबल में लपेटा।
—तुमने कुछ गलत नहीं किया।
आरव ने जवाब नहीं दिया। जैसे यह वाक्य उसने जिंदगी में पहली बार सुना था।
जब वह गेस्ट रूम में सो गया, अनन्या नीचे उतरी। रसोई के पास 2 नौकरानियां फुसफुसा रही थीं।
—सावित्री देवी कहती हैं, वारिस को मजबूत बनाना पड़ता है। साहब भी ऐसे ही पले हैं।
अनन्या को कपड़ों के ढेर के पीछे चमड़े की पतली बेल्ट मिली। उसने उसे उठाया और सीधे उस निजी बैठक में चली गई जहां सावित्री देवी मल्होत्रा अकेली बैठी थीं। सफेद रेशमी साड़ी, मोतियों की माला, हाथ में माला, चेहरे पर पत्थर जैसा संतुलन।
—नई दुल्हन को अपने पति के कमरे में होना चाहिए, मेरे सामने नहीं।
अनन्या ने बेल्ट मेज पर फेंक दी।
—दादी को पोते की रक्षा करनी चाहिए, उसे दर्द सहना नहीं सिखाना चाहिए।
सावित्री देवी की पलक तक नहीं हिली।
—तुम्हें इस घर में आए 4 घंटे हुए हैं। शादी को हक मत समझना।
—अगर आपने आरव को फिर छुआ, तो आपका नाम, पैसा, ट्रस्ट, वकील—कुछ भी आपको बचा नहीं पाएगा।
सावित्री देवी मुस्कुराईं।
—पहली पत्नी भी यही सोचती थी कि वह इस घर को बदल देगी।
अनन्या का हाथ बेल्ट पर कस गया।
—आज से आरव के हर निशान की तस्वीर होगी, तारीख होगी, रिपोर्ट होगी। और अगली बार हाथ उठेगा, तो पुलिस दरवाजे पर होगी।
आधी रात को राघव आया। उसकी मां ने उसे रोते हुए फोन किया था।
—तुमने मेरी मां को धमकाया? आरव कमजोर है। मां उसे मजबूत बना रही हैं।
अनन्या ने उसे घूरा।
—तुम्हारे बेटे को मजबूत नहीं, पिता चाहिए।
राघव चुप रहा।
—बताओ, वह तौलिया काटकर क्यों रोता है ताकि आवाज बाहर न जाए?
राघव ने नजर फेर ली।
अनन्या उसके करीब आई।
—तुमने मुझसे अपना नाम बचाने के लिए शादी की थी। शायद मैं इस घर में तुम्हारे बेटे को इसी नाम से बचाने आई हूं।
गलियारे में आधे खुले दरवाजे के पीछे आरव सब सुन चुका था।
और सुबह होने से पहले, वह गायब हो गया।
PART 2
सुबह गेस्ट रूम खाली था।
तकिए पर कॉपी का फटा पन्ना पड़ा था—“मैं चला गया। मेरी वजह से आप लोग नहीं लड़ेंगे।”
राघव ने गार्ड, ड्राइवर और पुलिस को फोन किया, पर अनन्या को रात की एक बात याद आई—“मम्मा मुझे लोधी गार्डन में बतखें दिखाने ले जाती थीं।”
वह उसे वहीं मिली। आरव पेड़ के नीचे बैठा था, नीला स्वेटर सीने से चिपकाए। राघव पास आया तो बच्चा अनन्या के पीछे छिप गया। राघव का चेहरा पहली बार टूट गया।
घर लौटकर अनन्या ने परिवार के डॉक्टर को नहीं, बाहर के बाल रोग विशेषज्ञ को बुलाया। रिपोर्ट साफ थी। पुराने घाव, उंगली की गलत जुड़ी हड्डी, पसली की पुरानी दरार। कोई रिकॉर्ड नहीं।
—मुझे पता नहीं था, राघव ने कहा।
—तुम जानना नहीं चाहते थे।
स्कूल की एक शिक्षिका ने भी कबूल किया कि आरव हर शुक्रवार कांपता था, बांहें छिपाता था, तेज आवाज से डरता था। स्कूल चुप था, क्योंकि मल्होत्रा ट्रस्ट 12 बच्चों की फीस देता था।
शाम को सावित्री देवी वकील लेकर आईं।
—अगर मेरे पोते को नहीं लौटाया, तो तुम्हारी मां को दिया गया 2 करोड़ 80 लाख का हिसाब खोल दूंगी।
अनन्या ने मेडिकल रिपोर्ट मेज पर रख दी।
—खोलिए। मैं भी खोलूंगी।
सावित्री देवी झुकीं।
—मरे हुए लोगों को जगाना चाहती हो? तो राघव से पूछो, नंदिता अस्पताल से जिंदा बाहर क्यों नहीं आई।
राघव दरवाजे पर खड़ा था।
उसके हाथ से चाबियां गिर गईं।
PART 3
कमरे में ऐसा सन्नाटा फैल गया जैसे किसी ने पूरी हवेली की सांस रोक दी हो।
राघव अपनी मां को देख रहा था। वही मां, जिसके इशारे पर उसने पढ़ाई चुनी, कारोबार चुना, शादी की तारीख चुनी, पत्नी की चुप्पी चुनी। सावित्री देवी के चेहरे पर पछतावा नहीं था। वह जानती थीं कि उन्होंने जहर फेंका है, अब देखना चाहती थीं कि कौन पहले गिरता है।
—मां, इसका मतलब क्या है? राघव की आवाज सूखी थी।
सावित्री देवी ने माला की एक मनका आगे बढ़ाई।
—हर सच जानना जरूरी नहीं होता। कुछ बातें परिवार बचाने के लिए दफन रखी जाती हैं।
अनन्या आरव के सामने खड़ी हो गई। बच्चा सीढ़ी के पास था, स्वेटर को ऐसे पकड़े जैसे वही उसकी मां का आखिरी शरीर हो।
—आप यहां से जाइए।
सावित्री देवी हंसीं।
—यह घर मेरा है।
—डर आपका हो सकता है। यह बच्चा नहीं।
पहली बार राघव ने अपनी मां का साथ नहीं दिया। उसने सिर्फ इतना कहा—
—मां, अभी जाइए।
बस 2 शब्द थे, पर सावित्री देवी के चेहरे पर जैसे किसी ने थप्पड़ मार दिया। वह बिना आशीर्वाद, बिना पलटे चली गईं।
उस रात फार्महाउस के पीछे बने छोटे गेस्ट बंगले में 3 लोग बैठे रहे। बाहर शादी की बची हुई झालरें हवा में हिल रही थीं। अंदर पुराने डिब्बे खुले थे। नंदिता की चीजें मुख्य घर से हटाकर स्टोर रूम में फेंक दी गई थीं—जैसे वह कभी पत्नी नहीं, कोई गलती थी।
एक डिब्बे में अस्पताल की फाइलें थीं। दूसरे में बैंक स्टेटमेंट। तीसरे में नंदिता की डायरी। राघव ने बताया कि नंदिता की मौत “एक मामूली प्रक्रिया” के बाद हुई थी। घरवालों ने कहा था कि संक्रमण अचानक फैल गया। वह उस दिन जयपुर में एक प्रोजेक्ट लॉन्च पर था। उसकी मां ने फोन पर कहा था, “अभी मत आओ। नंदिता को शांति चाहिए। तुम्हें देखकर वह और घबरा जाएगी।”
अनन्या ने धीरे से पूछा—
—और तुमने मान लिया?
राघव ने आंखें बंद कर लीं।
—मैंने हमेशा माना कि मां सही जानती हैं।
—नहीं। तुम्हें आसान लगा कि कोई और तुम्हारी जगह जानता रहे।
राघव ने विरोध नहीं किया।
फाइलों में अजीब बातें थीं। भर्ती का समय 2 जगह अलग था। एक डॉक्टर का नाम काटकर बदला गया था। एक दवा लिखी गई, फिर काली स्याही से मिटाई गई। भुगतान मल्होत्रा समूह की किसी सहायक कंपनी से हुआ था। और नंदिता की डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा था—
“अगर मुझे कुछ हो जाए, आरव को सावित्री मां के पास अकेला मत छोड़ना। वह उसे पालना नहीं चाहतीं। वह उसे अपने नाम की चीज बनाना चाहती हैं।”
राघव पन्ना पकड़े-पकड़े उठ गया। वह दरवाजे तक गया, फिर लौट आया। उसके कंधे कांप रहे थे, पर आवाज नहीं निकल रही थी। अनन्या ने उसे रोका नहीं। कुछ पछतावे इतने गहरे होते हैं कि उनमें आदमी को पूरा डूबना पड़ता है।
अगले दिन वे नंदिता की पुरानी नर्स मीना से मिलने गाजियाबाद गए। मीना एक छोटे से फ्लैट में रहती थी। दरवाजा खोलते ही जब उसने मल्होत्रा नाम सुना, उसका चेहरा उतर गया।
—मुझे कुछ नहीं पता। मैं किसी मुसीबत में नहीं पड़ना चाहती।
अनन्या ने आरव की पीठ की रिपोर्ट और उसका बनाया हुआ चित्र सामने रखा। चित्र में नंदिता छाते के नीचे आरव का हाथ पकड़े खड़ी थी।
मीना की आंखें भर आईं।
—मुझे डर था कि वे बच्चे को भी नहीं छोड़ेंगे।
धीरे-धीरे सच खुला। नंदिता राघव से अलग होना चाहती थी। उसने मल्होत्रा समूह की कुछ जमीनों के दस्तावेज देख लिए थे। फर्जी मंजूरियां, दबाव में साइन, नकली दान, नेताओं को पैसे। वह आरव को लेकर मायके जाना चाहती थी और एक पत्रकार से मिलने वाली थी।
—सावित्री देवी उसे कहती थीं, “एक छोटे शहर की लड़की को हमने नाम दिया, और अब वही हमारे घर पर उंगली उठाएगी।”
मीना ने बताया कि अस्पताल वाली रात नंदिता लगातार बेचैनी और दर्द की शिकायत कर रही थी। ड्यूटी डॉक्टर उसे बड़े अस्पताल में रेफर करना चाहता था, पर सावित्री देवी ने कहा था, “परिवार का मामला बाहर नहीं जाएगा।” कुछ कागज गायब कर दिए गए। स्टाफ को चुप रहने के लिए पैसे मिले।
—मैं यह नहीं कह सकती कि उन्हें मारा गया, मीना ने कांपते हुए कहा। लेकिन मैं यह जरूर कह सकती हूं कि उन्हें बचाया नहीं गया।
उसके पास पुराने नर्सिंग नोट्स की फोटो थीं। यही काफी था। हत्या सिद्ध हो या न हो, झूठ का दरवाजा खुल चुका था।
अनन्या ने बाल संरक्षण और घरेलू हिंसा मामलों की एक सख्त वकील, फराह कुरैशी, को बुलाया। फराह ने बिना भाव बदले सारे कागज पढ़े।
—आपकी सास सिर्फ क्रूर नहीं हैं। उन्हें आदत है कि लोग उनकी क्रूरता को संस्कार कहकर स्वीकार करें। ऐसे लोगों को भावनाओं से नहीं, सबूतों से रोका जाता है।
युद्ध शुरू हो गया।
पहले सावित्री देवी ने मिठास भेजी। आरव के लिए चांदी के डिब्बे में काजू कतली आई। कार्ड पर लिखा था—“दादी तुम्हें प्यार करती है, चाहे तुम झूठ बोलो।” फराह ने डिब्बा सबूत में रखवा दिया।
फिर धमकियां आईं। सोशल मीडिया पर खबर फैली कि अनन्या ने पैसे के लिए शादी की और अब वारिस पर कब्जा चाहती है। उसकी पुरानी कंपनी के ग्राहकों को फोन गए। स्कूल ने कहा कि शायद बच्चा “नई मां के प्रभाव” में है।
अगले दिन अनन्या वकील और मेडिकल रिपोर्ट लेकर स्कूल पहुंची।
—जब आप दानदाताओं की रक्षा कर रहे थे, एक बच्चा अपनी पीठ बचाने के लिए हाथों से खुद को ढक रहा था। अब आप बच्चे की रक्षा करेंगे।
प्रिंसिपल का चेहरा पीला पड़ गया।
बाल कल्याण समिति को रिपोर्ट गई। आरव की बात एक सुरक्षित कमरे में रिकॉर्ड हुई। वह शुरू में चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा—
—दादी कहती थीं, मम्मा मेरी वजह से मरीं। मैं उन्हें थका देता था।
कांच के पार राघव ने मुंह पर हाथ रख लिया। वह बाहर जाना चाहता था। अनन्या ने उसकी बांह पकड़ ली।
—सुनो। अब कम से कम पूरा सुनो।
आरव ने आगे कहा—
—पापा फोन देखते रहते थे। इसलिए मुझे लगता था, उन्हें पता है और उन्हें फर्क नहीं पड़ता।
राघव के लिए वह वाक्य किसी अदालत के फैसले से भी भारी था।
उस रात उसने नींद नहीं ली। सुबह वह मुख्य हवेली में गया। सावित्री देवी बड़े ड्रॉइंग रूम में बैठी थीं। उनके आसपास वकील, मुनीम और परिवार के पुराने सलाहकार थे।
—आ गए? अब होश आ गया होगा, उन्होंने कहा।
राघव ने उनके सामने नंदिता की डायरी, मेडिकल नोट्स, आरव की रिपोर्ट और स्कूल के बयान रख दिए।
—मैं सब न्यायालय को दूंगा।
सावित्री देवी ने उसे थप्पड़ मार दिया।
कमरे में बैठे सब लोग जड़ हो गए।
—मेरे बिना तुम कुछ नहीं हो, उन्होंने दांत भींचकर कहा।
राघव की गाल लाल थी, पर वह सीधा खड़ा रहा।
—शायद आपके बिना मैं पिता बन सकता था।
यह सुनकर सावित्री देवी का चेहरा पहली बार खाली हुआ। उनके सामने कोई सिर झुकाने वाला नहीं बचा था।
कुछ ही दिनों में मामला बाहर आ गया। राघव ने प्रेस के सामने खड़े होकर कहा—
—मेरे घर में 3 साल तक मेरे बेटे पर अत्याचार हुआ। मैं इसे रोक सकता था, पर मैंने देखना नहीं चुना। मैं अपने बेटे से माफी मांगने का अधिकार भी नहीं मांगता। मैं सिर्फ न्याय की प्रक्रिया में सहयोग करूंगा। मेरी पत्नी नंदिता की मृत्यु से जुड़े दस्तावेज भी जांच को सौंप रहा हूं।
एक पत्रकार ने पूछा—
—क्या आप अपनी मां पर आरोप लगा रहे हैं?
राघव ने कैमरे की ओर देखा।
—मैं उस चुप्पी पर आरोप लगा रहा हूं, जिसने उन्हें रानी बनाया। और मेरी चुप्पी सबसे पहले।
मल्होत्रा साम्राज्य हिल गया। पुराने कर्मचारी बोलने लगे। एक डॉक्टर ने दबाव मान लिया। परिवार के डॉक्टर ने स्वीकार किया कि उसने आरव के घाव बिना रिकॉर्ड के देखे थे। स्कूल की जांच शुरू हुई। ट्रस्ट से दान लेने वाले संस्थानों ने दूरी बना ली।
सावित्री देवी पर नाबालिग पर हिंसा, गवाहों को प्रभावित करने, दस्तावेजों से छेड़छाड़ और रिपोर्टिंग रोकने के मामले दर्ज हुए। उम्र और स्वास्थ्य के कारण उन्हें तुरंत जेल नहीं भेजा गया, पर अदालत ने उन्हें आरव से मिलने, फोन करने या संदेश भेजने से रोक दिया। राघव से भी उनका संपर्क सीमित कर दिया गया।
पर आरव के लिए यह जीत नहीं थी। कम से कम तुरंत नहीं।
बच्चा अदालत के आदेश से नहीं ठीक होता।
दरवाजा जोर से बंद होता तो वह कांप जाता। गिलास टूटता तो वह खुद को छिपाने लगता। पानी पीने से पहले पूछता, “ले सकता हूं?” राघव कमरे में तेज कदमों से आता तो आरव का शरीर पत्थर हो जाता।
अनन्या ने कभी उसे मजबूर नहीं किया।
—वह तुम्हें माफ करने के लिए बाध्य नहीं है, उसने राघव से कहा। शायद एक दिन तुम्हें जगह दे। शायद नहीं। अभी तुम्हारा काम है भरोसेमंद बने रहना, चाहे कोई तुम्हारी तारीफ करे या न करे।
राघव ने धीरे-धीरे सीखना शुरू किया। वह आरव को मनोवैज्ञानिक के पास ले गया। उसने रसोई में ज्यादा पकी हुई मैगी बनाई। स्कूल मीटिंग में पहली बार बिना सुरक्षा गार्ड, बिना अहंकार, एक साधारण कुर्सी पर बैठा। कभी आरव उससे बात नहीं करता। राघव स्वीकार करता। कभी वह एक कॉमिक आगे बढ़ा देता। राघव उसे ऐसे पढ़ता जैसे उसे कोई अमूल्य विरासत मिली हो।
एक सुबह आरव से दूध का कटोरा गिर गया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। वह पीछे हट गया, कुर्सी गिर गई।
राघव खड़ा हुआ।
आरव ने आंखें बंद कर लीं।
राघव ने चुपचाप कपड़ा उठाया, दूध पोंछा, कुर्सी सीधी की।
—बस दूध था।
आरव ने धीरे से आंख खोली।
—आप चिल्लाएंगे नहीं?
—नहीं। मैं खुद से नाराज हूं, तुमसे नहीं।
आरव बहुत देर खड़ा रहा। फिर वापस बैठ गया। उसने मुस्कुराया नहीं, पर अपना नाश्ता पूरा किया।
वह उनका पहला छोटा चमत्कार था।
अनन्या को भी अपने पुराने घावों से मिलना पड़ा। उसकी मां एक शाम उसके पास आईं। हाथ में पर्स दबा था, आंखों में शर्म थी।
—समाचार में आरव को देखा तो तुम्हारा बचपन याद आ गया, उन्होंने कहा।
अनन्या चुप रही।
—मैंने तुम्हें अकेला छोड़ दिया था। मैं कहती थी कि घर बचा रही हूं, पर सच में अपनी डरपोक चुप्पी बचा रही थी।
ये शब्द 25 साल देर से आए थे। फिर भी अनन्या के भीतर कुछ ढीला पड़ा। उसने सब माफ नहीं किया। उसने नाटक नहीं किया। उसने सिर्फ दरवाजा इतना खोला कि उसकी मां अंदर आकर चाय पी सकें।
महीने बीत गए।
राघव ने मल्होत्रा समूह की कुर्सी छोड़ दी। उसने कुछ संपत्तियां बेचीं, पुराने कर्मचारियों की भरपाई की और घरेलू हिंसा झेल रहे बच्चों के लिए फंड बनाया। अनन्या ने अपना काम जारी रखा, पर अब वह किसी अमीर परिवार की छवि बचाने वाली महिला नहीं थी। फराह के साथ उसने एक संस्था शुरू की, जो शिक्षकों, डॉक्टरों और पड़ोसियों को सिखाती थी कि बच्चे की चुप्पी को भी बयान समझना चाहिए।
आरव का वजन बढ़ने लगा। उसे जासूसी कहानियां, गुप्त डायरी और आवारा कुत्तों से प्यार हो गया। अपने 11वें जन्मदिन पर उसने बड़ी पार्टी नहीं मांगी। उसने सिर्फ चॉकलेट केक, 5 दोस्त और बारिश में बगीचे में दौड़ने की इजाजत मांगी।
उस दिन वह कीचड़ में फिसलकर हंस पड़ा।
बरामदे पर खड़े राघव ने अनन्या की ओर देखा।
—जाऊं?
—जाओ।
—अगर वह नहीं चाहता?
—तो रुक जाना। पर उसे चुनने का मौका दो।
राघव धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरा। आरव ने उसे देखा, फिर कीचड़ लगी पत्तियों की मुट्ठी उठाकर उसके कुर्ते पर फेंक दी। 2 सेकंड तक समय रुका रहा। फिर राघव हंस पड़ा। आरव भी हंस दिया।
बारिश में दोनों भागे। वे पिता-पुत्र थे, पर अभी सीख रहे थे कि डर के बाद प्यार कैसे वापस आता है।
शादी के 1 साल बाद आरव अनन्या के कमरे में एक लिफाफा लेकर आया। अंदर एक चित्र था। छोटे बंगले की खिड़की रोशन थी। बाहर 3 लोग खड़े थे। ऊपर उसने लिखा था—“परिवार वह जगह है, जहां डर नहीं लगता।”
वह शर्म से गाल लाल किए खड़ा रहा।
—मैं आपको कभी-कभी मां कह सकता हूं? हमेशा नहीं। जब मन करे तब।
अनन्या का गला भर आया।
—तुम मुझे वही कह सकते हो, जिसमें तुम्हारे दिल को सुरक्षा लगे।
आरव उससे लिपट गया।
दरवाजे पर राघव चुपचाप रो रहा था। इस बार उसने नजर नहीं झुकाई।
छतरपुर की बड़ी हवेली अब भी खड़ी थी। वही संगमरमर, वही झूमर, वही काले गेट। पर वह उनका घर नहीं रही। उन्होंने पीछे वाला छोटा बंगला चुना, जिसे सावित्री देवी ने सजा समझकर दिया था। उन्होंने दीवारें रंगीं, बरामदे में तुलसी लगाई, पुराने स्टोर रूम को किताबों की जगह बना दिया।
लोग अब भी कहते थे कि अनन्या ने एक बड़ा परिवार तोड़ दिया।
सच इससे कहीं कठोर था।
वह परिवार बहुत पहले डर, अहंकार और बंद दरवाजों से टूट चुका था। अनन्या ने सिर्फ वह दरवाजा खोला था, जिसके पीछे एक बच्चा बिना आवाज रो रहा था।
शादी की रात उसे लगा था कि उसने आरव को बचाया।
बाद में उसने समझा, आरव ने उसे भी बचाया था। उसकी पीठ के निशानों के लिए लड़ते हुए अनन्या ने अपने भीतर की उस छोटी लड़की का हाथ थाम लिया था, जिसे कभी कहा गया था कि बड़ों की शांति के लिए चुप रहो।
कई साल बाद जब कोई आरव से पूछता कि उनका परिवार कैसे बना, वह कंधे उचकाकर कहता—
—क्योंकि एक दिन किसी ने यह दिखावा करना बंद कर दिया कि उसे रोने की आवाज सुनाई नहीं दे रही।
और उसी वाक्य में अनन्या को हर बार अपने परिवार की असली शुरुआत सुनाई देती थी।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.