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रात 1:12 बजे बेटी भीगी हुई दरवाजे पर गिरी और बोली, “मुझे पति के घर मत भेजना”, माँ ने सिर्फ दरवाजा बंद किया, अस्पताल की रिपोर्ट, ढीली अंगूठी और छिपे कागज देखकर समझ गई कि 3 साल की शादी के पीछे 90 करोड़ का खेल छिपा था…

PART 1

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रात 1:12 बजे अनन्या अपनी माँ के दरवाजे पर गिर पड़ी, भीगी हुई, घायल, और काँपती आवाज़ में बस इतना कहती रही—मुझे विक्रम के घर वापस मत भेजना।

लखनऊ की उस पुरानी कॉलोनी में इतनी रात को कोई दरवाजा नहीं खटखटाता था। बाहर सावन की बारिश छज्जों से धार बनकर गिर रही थी। मीरा श्रीवास्तव ने पहले सोचा कि शायद पड़ोसी के घर कोई पाइप फट गया होगा। लेकिन जैसे ही उसने कुंडी खोली, उसकी 29 साल की बेटी अनन्या दहलीज पर पड़ी थी। उसका दुपट्टा कीचड़ से सना था, कुर्ती की बाँह फटी हुई थी, होंठ के किनारे खून सूख चुका था, और उसकी शादी की अंगूठी उंगली से ढीली होकर लगभग गिरने को थी।

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मीरा का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में दबा दिया।

—किसने किया ये?

अनन्या ने पेट पर हाथ कस लिया और आँखें बंद कर लीं।

—वे कहेंगे मैं पागल हूँ, माँ।

—कौन वे?

कुछ पल तक सिर्फ बारिश की आवाज़ थी।

—विक्रम… उसकी माँ… उसका छोटा भाई… सब।

विक्रम चौहान से अनन्या की शादी को 3 साल हुए थे। जयपुर के बड़े बिल्डर परिवार का बेटा, महंगी गाड़ी, मुलायम आवाज़, और वह मुस्कान जो बाहर वालों को संस्कार लगती थी। उसकी माँ सुधा चौहान हर बात में परिवार की इज्जत का नाम लेती थी, मगर अनन्या को हमेशा याद दिलाती रहती थी कि वह सिर्फ एक मिठाई की दुकान चलाने वाली विधवा की बेटी है।

शादी के बाद अनन्या धीरे-धीरे बदलने लगी थी। पहले रोज फोन करती थी, फिर हफ्ते में 2 बार, फिर बस त्योहारों पर। उसकी आवाज़ में एक अजीब डर उतर आया था। वह कहती—विक्रम मेरी भलाई चाहता है। मम्मीजी बड़े घर की बातें समझती हैं। तुम बेकार शक करती हो, माँ।

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उस रात मीरा समझ गई कि उसकी बेटी किसी आलीशान कोठी में नहीं, सोने के पिंजरे में रह रही थी।

वह अनन्या को भीतर खींच लाई, दरवाजा बंद किया और तुरंत अस्पताल फोन किया। सिविल अस्पताल में डॉक्टरों ने उसके जख्म देखे, गर्दन के निशान दर्ज किए, हाथों की सूजन लिखी। अनन्या छत को ऐसे देख रही थी जैसे हर दीवार में कोई सुनने वाला छिपा हो।

तभी विक्रम आया। उसके कपड़ों पर बारिश की एक बूंद नहीं थी। पीछे सुधा चौहान खड़ी थी, मोतियों की माला पहने, चेहरा ऐसा जैसे वह दुख नहीं, नाटक निभाने आई हो।

—मेरी पत्नी को दौरा पड़ा है, विक्रम ने डॉक्टर से कहा। वह गर्भवती है, दिमागी तौर पर बहुत कमजोर हो गई है। सीढ़ियों से फिसल गई।

गर्भवती।

मीरा ने अनन्या की तरफ देखा।

अनन्या का चेहरा टूट गया।

—मैं तुम्हें बताना चाहती थी, माँ…

कुछ देर बाद डॉक्टर रिपोर्ट लेकर आई। उसकी आवाज़ धीमी थी।

—हमें अफसोस है। भ्रूण की धड़कन नहीं मिल रही। गर्भ रुक चुका है।

अनन्या की चीख कमरे में नहीं फूटी, वह उसके भीतर टूट गई। मीरा ने विक्रम को देखा।

उसके चेहरे पर दर्द नहीं था।

बस एक बहुत छोटा-सा आराम था।

तभी सुधा मीरा के पास झुकी और फुसफुसाई—

—अपनी बेटी को संभालिए। और उसे सिखाइए कि इज्जतदार घरों को बदनाम नहीं किया जाता।

उन्हें क्या पता था कि मीरा सिर्फ मिठाई बनाने वाली औरत नहीं थी। दुकान खोलने से पहले वह 18 साल आर्थिक अपराध शाखा में जांच अधिकारी रह चुकी थी।

विक्रम अनन्या के पास झुका।

—चलो घर। तुम्हारी माँ तुम्हारे लिए ठीक नहीं है।

मीरा बीच में खड़ी हो गई।

—वह तुम्हारे साथ नहीं जाएगी।

विक्रम मुस्कुराया।

—आपके पास कोई अधिकार नहीं है।

मीरा की आवाज़ ठंडी हो गई।

—आज रात तुमने मेरी बेटी को छुआ है। अब मैं तुम्हारे हर छिपे कागज को छुऊँगी।

विक्रम का चेहरा बदल गया।

वह अनन्या के कान के पास झुका।

—कागजों पर दस्तखत कर दो, वरना सबको बता दूँगा कि तुम बच्चे के बाद बिल्कुल पागल हो गई थीं।

अनन्या फिर काँपने लगी।

मीरा को अभी नहीं पता था कि वे कागज कौन से थे।

मगर उसे समझ आ गया था कि यह सिर्फ मारपीट नहीं थी।

यह किसी बहुत बड़े धोखे की शुरुआत थी।

PART 2

सुबह 5 बजे, जब अनन्या दवाओं के असर में मीरा के कमरे में सो रही थी, मीरा ने पुराना लैपटॉप खोला और लोहे का वह बक्सा निकाला जिसे उसने वर्षों से नहीं छुआ था।

वह रोई नहीं। उसने सबूत जमाए।

अस्पताल की रिपोर्ट। चोटों की तस्वीरें। विक्रम की धमकी भरी आवाज़ें। फटे कपड़े। अनन्या के मोबाइल की लोकेशन। हर वह चीज़ जो उस लड़की की जगह बोले, जिसे पागल साबित करने की तैयारी हो चुकी थी।

दोपहर में अनन्या ने धीमे से कहा—

—माँ, वे सिर्फ मुझे डराना नहीं चाहते थे।

मीरा उसके पास बैठ गई।

—बताओ।

—मम्मीजी मुझे रोज काढ़ा देती थीं। कहती थीं उल्टी कम होगी। उसके बाद सिर भारी हो जाता था, बातें भूल जाती थी। फिर विक्रम कहता था कि मैं खतरनाक हो रही हूँ। बच्चे की खबर के बाद वे मुझे कानूनी रूप से अक्षम घोषित कराने की बात करने लगे।

—क्यों?

अनन्या ने दीवार की तरफ देखा।

—नाना की हवेली।

जयपुर के बाहर वह पुरानी हवेली अनन्या के पिता की आखिरी निशानी थी। ट्रस्ट डीड में लिखा था कि पहले बच्चे के जन्म के बाद उसका पूरा नियंत्रण अनन्या को मिलेगा। लेकिन अगर वह मानसिक रूप से अक्षम घोषित हो जाती, तो अस्थायी प्रबंधन पति को मिल सकता था।

विक्रम को।

मीरा ने पुराने दस्तावेज खोले। 6 महीने से नोटरी को झूठे दस्तखत भेजे गए थे। मेडिकल प्रमाणपत्र का मसौदा तैयार था। हवेली बेचने का प्रस्ताव भी।

तभी अनन्या के फोन पर संदेश आया।

रात 8 बजे तक वापस आओ। आधार कार्ड लाना। आज ही दस्तखत होंगे, नहीं तो तुम्हारी माँ पर अपहरण का केस करवाऊँगा।

मीरा ने जवाब लिखा—

आ रही हूँ। कागज तैयार रखना।

विक्रम ने तुरंत लिखा—

आखिर समझदारी आ गई।

मीरा ने अपनी पुरानी सहकर्मी, अब आर्थिक अपराध शाखा की एसीपी कविता राठौड़ को फोन किया।

—कविता, मामला निजी है।

—सबूत मजबूत हैं?

मीरा ने बेटी को देखा।

—उससे भी मजबूत, जिसने यह खेल रचा है।

PART 3

रात 7:40 बजे मीरा और अनन्या जयपुर की चौहान हवेली के लोहे के गेट के सामने खड़ी थीं। बारिश थम चुकी थी, मगर हवा में गीली मिट्टी और चमेली की मिली-जुली गंध थी। बाहर से वह घर वैसा ही दिखता था जैसा समाज बड़े घरों को देखना पसंद करता है—ऊँचे खंभे, संगमरमर की सीढ़ियाँ, पीतल के दीये, और अंदर जाती हुई लंबी रोशन राह। लेकिन अनन्या के लिए वह घर मंदिर नहीं, अदालत से पहले की जेल था।

वह एक पल के लिए रुक गई। उसके हाथ ठंडे थे। मीरा ने उसकी उंगलियाँ दबाईं।

—तू अकेली नहीं है।

अनन्या ने पहली बार सीधा गेट देखा।

—आज मैं भागकर नहीं आई हूँ, माँ। आज मैं लौट रही हूँ ताकि ये लोग भाग न सकें।

ड्राइंग रूम में सब तैयार बैठे थे। विक्रम ने हल्की क्रीम रंग की शेरवानी जैसी बंदगला जैकेट पहन रखी थी, जैसे किसी पारिवारिक रस्म में बैठा हो। सुधा चौहान सोफे के बीचोंबीच बैठी थी, माथे पर बड़ी बिंदी, हाथ में रुद्राक्ष की माला, चेहरे पर वह शांति जो अक्सर ताकतवर लोग अपराध छिपाते समय पहनते हैं। विक्रम का छोटा भाई रोहन बार-बार फोन देख रहा था। एक पारिवारिक डॉक्टर भी वहाँ था, और साथ में वकील, जिसके सामने कागजों का ढेर रखा था।

—आ गई तुम, विक्रम ने कहा। अच्छा है। अब तमाशा खत्म करते हैं। यहाँ बैठो और दस्तखत करो।

सुधा ने मीठी आवाज़ में कहा—

—बेटा, गर्भ में बच्चा हो तो औरतों की बुद्धि बदल जाती है। हमने तुम्हारे लिए सब सोचा है। कुछ दिन आराम करोगी, इलाज होगा, फिर सब ठीक हो जाएगा।

अनन्या का चेहरा सफेद पड़ गया। उसके पेट पर हाथ चला गया, जहाँ अब सिर्फ खालीपन था।

मीरा आगे बढ़ी।

—वह गर्भवती नहीं है। और यह बात आप सबको पहले से पता है।

कमरे की हवा एकदम भारी हो गई।

विक्रम की आँखों में झुंझलाहट आई, मगर वह तुरंत मुस्कुरा दिया।

—आंटी, आपको भावनाएँ समझ आती होंगी, कानून नहीं।

मीरा ने मेज पर अपना फोल्डर रख दिया।

—कानून से ही तो 18 साल रोज रोटी कमाई थी, बेटा। मिठाई की दुकान बाद में खोली।

वकील ने पहली बार सिर उठाया।

मीरा ने एक-एक पन्ना निकालना शुरू किया।

—यह अनन्या के नाम से नोटरी को भेजे गए दस्तखत हैं। यह उसके असली दस्तखत से मेल नहीं खाते। यह हवेली बेचने का प्रारंभिक समझौता है, खरीदार कंपनी का निदेशक तुम्हारे मामा का बेटा है। यह डॉक्टर साहब का मसौदा प्रमाणपत्र है, जिसमें अनन्या को अस्थिर बताया गया है, वह भी उस तारीख से पहले जब उन्होंने उसे देखा तक नहीं था। यह सुधा जी के भेजे मैसेज हैं, जिनमें काढ़े की मात्रा और समय लिखा है। और यह अस्पताल की शुरुआती टॉक्सिकोलॉजी रिपोर्ट है।

डॉक्टर की उंगलियाँ काँप गईं।

रोहन के चेहरे का रंग उड़ गया।

सुधा ने माला कसकर पकड़ ली।

—ये सब झूठ है। एक माँ अपनी बिगड़ी हुई बेटी को बचाने के लिए कुछ भी बना सकती है।

मीरा ने शांत स्वर में कहा—

—बिल्कुल। और एक लालची परिवार अपनी बहू को पागल साबित करने के लिए उससे भी ज्यादा कर सकता है।

विक्रम उठ खड़ा हुआ।

—बहुत हो गया। अनन्या, तुम अभी मेरे साथ अंदर चलो। तुम्हें आराम चाहिए।

अनन्या एक इंच भी नहीं हिली।

—मुझे आराम नहीं, सच चाहिए।

विक्रम की आवाज़ फिसलकर असली रूप में आ गई।

—सच यह है कि तुम्हारी वजह से 90 करोड़ का प्रोजेक्ट अटका हुआ है। वह हवेली किसी बूढ़े भावुक आदमी की निशानी नहीं, हमारी जमीन है। बच्चा होता तो नियंत्रण तुम्हारे हाथ में चला जाता। तुम वैसी भी कोई कारोबार समझने वाली नहीं थीं।

सुधा फुसफुसाई—

—विक्रम, चुप रहो।

लेकिन शब्द कमरे में फैल चुके थे।

अनन्या ने विक्रम को देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर पहली बार उनमें डर नहीं था।

—तो मेरा बच्चा तुम्हारे लिए सिर्फ रास्ते की रुकावट था?

विक्रम ने जबड़ा भींचा।

—भावुक मत बनो। अभी भी दस्तखत कर दो तो बात घर में रहेगी।

दरवाजे के बाहर से आवाज़ आई—

—अब बात घर में नहीं रहेगी।

एसीपी कविता राठौड़ अंदर आईं। उनके साथ 2 अधिकारी और एक महिला कांस्टेबल थी। सबके कैमरे चालू थे। वकील तुरंत खड़ा हुआ, जैसे उसे पहले से अंदाजा था कि नाव डूब चुकी है और वह किनारे पर कूदना चाहता है।

सुधा चीखी—

—हमारे घर में पुलिस? किस अधिकार से?

कविता ने शांत भाव से कहा—

—आपके वकील ने प्रवेश की अनुमति दी है। और आपके बेटे ने अभी जो कहा, वह भी रिकॉर्ड हो चुका है।

विक्रम ने वकील को घूरा।

—तुमने हमें धोखा दिया?

वकील की आवाज़ धीमी थी।

—मैं धोखे में शामिल होने नहीं आया था। मुझे शारीरिक हिंसा, नकली दस्तखत और दवाओं की बात नहीं बताई गई थी।

रोहन का धैर्य टूट गया।

—भैया ने पासवर्ड मुझसे लिए थे! मैंने सिर्फ मेल खोले थे। मेडिकल सर्टिफिकेट की बात माँ और डॉक्टर अंकल ने की थी। मुझे जेल नहीं जाना!

सुधा ने उसे थप्पड़ मारने को हाथ उठाया, पर महिला कांस्टेबल बीच में आ गई।

अनन्या ने रोहन की ओर देखा। वह वही लड़का था जो राखी पर उससे महंगे गिफ्ट लेता था, परिवार की तस्वीरों में हँसता था, और रातों को उसके कमरे की दराजें खंगालता था।

—तुम सबने मिलकर मुझे पागल बनाया, उसने कहा। मेरा फोन चेक किया। मेरी माँ से बात कम करवाई। मेरे खाने-पीने पर नजर रखी। मुझे बताया कि मैं कमजोर हूँ, गलत हूँ, बोझ हूँ। और जब मैंने बच्चे की बात कही, तुम सबने मेरी कोख तक को सौदे की शर्त बना दिया।

कमरे में कोई जवाब नहीं था।

कविता ने कागज उठाए।

—विक्रम चौहान, आपको घरेलू हिंसा, धमकी, जालसाजी, संपत्ति हड़पने की साजिश और संदिग्ध पदार्थ देने के आरोप में हिरासत में लिया जा रहा है। गर्भहानि से जुड़े आरोपों पर मेडिकल बोर्ड और अभियोजन आगे निर्णय लेंगे।

विक्रम हँसा, पर वह हँसी टूट चुकी थी।

—तुम लोग जानते नहीं हो चौहान परिवार कौन है।

कविता ने उसकी ओर देखा।

—आज से अदालत जानेगी।

जब हथकड़ी लगी, विक्रम ने आखिरी बार अनन्या को देखा।

—तुमने अपना घर उजाड़ दिया।

अनन्या ने धीमे से कहा—

—नहीं। मैंने जेल का दरवाजा खोल दिया।

सुधा चौहान की बारी आई तो उसका चेहरा पहली बार सचमुच बूढ़ा लगा। उसने समाज, इज्जत, परिवार, परंपरा, बहू का कर्तव्य, सब एक साथ बोलना शुरू किया। मगर इस बार किसी ने सिर नहीं झुकाया। महिला कांस्टेबल ने उसका फोन सील किया। डॉक्टर को भी पूछताछ के लिए साथ चलना पड़ा। रोहन वहीं बैठकर रोता रहा, जैसे अपराध उसकी समझ से बड़ा और उसकी हिम्मत से छोटा था।

उस रात अनन्या हवेली से कुछ लेकर नहीं निकली। न कपड़े, न गहने, न वे महंगे साड़ियाँ जिन्हें सुधा ने हमेशा एहसान की तरह गिनाया था। उसने सिर्फ अपनी मेडिकल फाइल उठाई, पिता की हवेली से जुड़े असली कागज उठाए, और माँ का हाथ पकड़कर बाहर चली गई।

बाहर चाँद बादलों के पीछे था, मगर हवा हल्की थी।

कार में बैठते ही अनन्या टूट गई। उसने अपना चेहरा मीरा की गोद में छिपा लिया। अब वह चीख रही थी, सचमुच चीख रही थी। बच्चे के लिए। अपने 3 सालों के लिए। अपने उस भरोसे के लिए जो धीरे-धीरे जहर में बदल दिया गया था। मीरा ने उसे रोने दिया। उसने एक बार भी नहीं कहा कि मजबूत बनो। कुछ दुखों पर मजबूत होने की सलाह नमक जैसी लगती है।

अगले कुछ हफ्तों में चौहान परिवार की चमक उतरने लगी। आर्थिक अपराध शाखा ने उनके दफ्तरों पर छापे मारे। हवेली बेचने वाली कंपनी के खाते सील हुए। डॉक्टर का लाइसेंस निलंबित हुआ। नोटरी ने बयान दिया कि उसे कई बार दबाव वाले फोन आए थे। विक्रम की माँ के फोन से काढ़े की दवा, खुराक और अनन्या की “अस्थिरता” पर चर्चा वाले संदेश मिले। अस्पताल की पूरी रिपोर्ट ने यह साबित किया कि अनन्या के शरीर पर चोटें गिरने से नहीं, पकड़े जाने और धक्का दिए जाने से आई थीं।

मगर अदालत की तारीखें किसी माँ की कोख खाली होने का दर्द नहीं भरतीं।

मीरा ने यह बात धीरे-धीरे समझी। वह सुबह दुकान खोलती, जलेबी तलती, ग्राहकों को मुस्कुराकर लड्डू पैक करती, और पीछे कमरे में अनन्या कभी चुपचाप बैठी रहती। कभी वह खाली दीवार देखती। कभी अचानक मोबाइल बंद कर देती। कभी बच्चों की हँसी सुनकर बाथरूम में चली जाती और देर तक बाहर नहीं आती।

मीरा ने उससे कभी नहीं कहा—सब ठीक हो जाएगा।

वह बस कहती—

—मैं यहीं हूँ।

एक दिन अनन्या ने अपनी ढीली शादी की अंगूठी उतारकर मिठाई के पुराने डिब्बे में रख दी। फिर उसने वह डिब्बा बंद करके मीरा को नहीं दिया। उसने खुद अलमारी के ऊपर रख दिया, जैसे कोई सबूत नहीं, एक युग बंद कर रही हो।

6 महीने बाद अदालत ने अनन्या की सुरक्षा के आदेश दिए। विक्रम को जमानत मिली, पर उसके पासपोर्ट पर रोक लगी। सुधा को भी नियमित पूछताछ के लिए बुलाया जाने लगा। हवेली और ट्रस्ट संपत्ति पर किसी भी लेन-देन को रोक दिया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात, अदालत ने साफ कहा कि अनन्या अपने निर्णय खुद लेने में पूरी तरह सक्षम है।

यह एक कानूनी वाक्य था।

लेकिन अनन्या के लिए वह जैसे किसी ने उसके माथे से पागलपन की मुहर धो दी थी।

8 महीने बाद, वह मीरा के साथ जयपुर के बाहर अपने पिता की हवेली गई। वही हवेली, जिसे विक्रम 90 करोड़ की जमीन कहता था। बरामदे में धूल थी, दीवारों पर पुरानी दरारें थीं, आँगन में नीम का पेड़ थोड़ा झुक गया था। मगर हवा में कुछ ऐसा था जो अनन्या को बचपन की दोपहरों में ले गया—जहाँ पिता उसे पतंग उड़ाना सिखाते थे, और माँ स्टील के डिब्बे में पूरियाँ लाती थी।

अनन्या लंबे समय तक दरवाजे पर खड़ी रही।

—पापा ने इसे मेरे लिए छोड़ा था, माँ।

—हाँ।

—और वे लोग इसे बेचकर मुझे भी खत्म कर देते।

मीरा ने कहा—

—उन्होंने सोचा था तू अकेली है।

अनन्या ने धीरे से जवाब दिया—

—अब कोई और अकेली नहीं रहेगी।

अगले 4 महीनों में हवेली बदली, मगर उसकी आत्मा नहीं बदली। संगमरमर की जगह चकाचौंध नहीं आई। पुराने कमरों को साफ किया गया, मजबूत दरवाजे लगे, खिड़कियों पर जाली लगी, एक छोटा कानूनी सहायता कक्ष बना, एक परामर्श कक्ष, बच्चों के लिए रंगीन कमरा, और रसोई जहाँ सुबह की चाय में डर की जगह इलायची की खुशबू हो।

दरवाजे के ऊपर लकड़ी का एक बोर्ड लगाया गया—

नन्ही आशा गृह — संकट में महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित ठिकाना

“आशा” वह नाम था जो अनन्या ने अपने होने वाले बच्चे के लिए मन ही मन सोचा था। उसने कभी किसी को नहीं बताया था। उस दिन बोर्ड देखते हुए उसकी आँखें भर आईं।

मीरा ने पूछा—

—नाम बदलना चाहती है?

अनन्या ने सिर हिलाया।

—नहीं। उसे दुनिया नहीं मिली। कम से कम उसका नाम किसी और को रास्ता देगा।

उद्घाटन के दिन कोई बड़ा नेता नहीं बुलाया गया। कोई कैमरा, कोई माला, कोई भाषण नहीं। सिर्फ 11 औरतें थीं, 3 बच्चे थे, मीरा की दुकान से आए गरम समोसे थे, और आँगन में रखे पीतल के दीये।

पहली महिला जो उस घर में आई, उसकी उम्र शायद 24 रही होगी। बाँह पर चोट थी, गोद में 2 साल का बच्चा सो रहा था, और हाथ में सिर्फ एक प्लास्टिक बैग था। उसने दरवाजे पर कदम रखते ही पूछा—

—मुझे वापस तो नहीं भेजेंगे?

अनन्या के भीतर कुछ कांपा। वही सवाल। वही डर। वही दहलीज।

वह आगे बढ़ी, उस महिला के सामने झुकी और बोली—

—नहीं। यहाँ पहले सांस लो। बाकी बाद में देखेंगे।

महिला रो पड़ी।

अनन्या ने उसे गले लगा लिया। इस बार उसकी पकड़ कमजोर नहीं थी।

मीरा आँगन के कोने में खड़ी थी। उसे 1:12 की वह रात याद आई, जब उसकी बेटी बारिश में टूटी हुई दरवाजे पर पड़ी थी। तब मीरा ने सोचा था कि उसने अपनी बच्ची खो दी है। लेकिन अब वही लड़की किसी और की बच्ची को बचाने के लिए दरवाजा खोल रही थी।

रात को जब सब सो गए, अनन्या ने मुख्य दरवाजे की बत्ती जलाई। घड़ी में 1:12 बज रहे थे।

मीरा ने चुपचाप उसे देखा।

—डर लग रहा है?

अनन्या ने बाहर अँधेरे रास्ते को देखा, फिर भीतर रोशन बरामदे को।

—थोड़ा। लेकिन अब डर मुझे चला नहीं रहा।

मीरा उसके पास आई।

—तेरे पापा होते तो गर्व करते।

अनन्या ने बोर्ड की तरफ देखा।

—वो कहते, घर वही होता है जहाँ किसी को वापस नरक में न भेजा जाए।

कुछ दूर सड़क पर फिर बारिश शुरू हो गई थी। बूंदें धीरे-धीरे गिर रही थीं, जैसे आकाश भी शोर नहीं करना चाहता।

उस रात नन्ही आशा गृह की बत्ती बुझी नहीं।

क्योंकि कभी-कभी एक बेटी अपनी माँ के दरवाजे पर सिर्फ बचने नहीं लौटती।

वह लौटती है यह याद करने कि डर से पहले उसका एक नाम था, एक आवाज़ थी, और जीने का पूरा अधिकार था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.