
भाग 1
शादी की पहली रात ही दुल्हन की चीख ने पूरे शाही फार्महाउस को जगा दिया, और जब सास दरवाजा तोड़कर कमरे में घुसी, तो उसने अपनी बहू को फर्श पर कांपते हुए पाया, जबकि उसका बेटा सफेद पड़ चुके चेहरे के साथ दीवार के पास खड़ा बुदबुदा रहा था।
—उसे नयना का हिसाब चुकाना ही था।
सावित्री देवी के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।
कुछ घंटे पहले तक जयपुर के बाहरी इलाके में बनी उनकी हवेली “राजविलास” रोशनी, गुलाब, चमेली, शहनाई और महंगे इत्र की खुशबू से भरी थी। बड़े-बड़े कारोबारी, रिश्तेदार, मंत्री, समाजसेवी, सबने कहा था कि यह साल की सबसे खूबसूरत शादी है। दूल्हा अर्जुन राठौड़, रियल एस्टेट कारोबारी महेंद्र राठौड़ का इकलौता बेटा। दुल्हन अदिति, आगरा के एक साधारण मोहल्ले से आई, पढ़ी-लिखी, शांत, आत्मसम्मान वाली लड़की।
सबने कहा था कि अदिति की किस्मत खुल गई।
लेकिन उस कमरे में, लाल जोड़े में बैठी वह लड़की किस्मत नहीं, किसी जाल में फंसी हुई लग रही थी।
उसका घूंघट आधा फटा था, चूड़ियां टूटकर फर्श पर बिखरी थीं, माथे का सिंदूर पसीने और आंसुओं में धुंधला गया था। वह दोनों हाथ सीने पर दबाए बैठी थी, जैसे अभी भी किसी अदृश्य चोट से खुद को बचा रही हो।
—मांजी, मुझे यहां से ले जाइए। मैं आपके बेटे के साथ 1 मिनट भी नहीं रह सकती।
सावित्री देवी आगे बढ़ीं, लेकिन अदिति अचानक पीछे सरक गई।
—कृपया मुझे मत छूइए… पहले उसे दूर कीजिए।
अर्जुन ने सिर उठाया। उसकी आंखों में पछतावा नहीं था, सिर्फ टूटा हुआ गुस्सा था।
—ड्रामा मत करो, अदिति। तुम जैसी लड़कियां रोना अच्छी तरह जानती हैं।
महेंद्र राठौड़ भी कमरे में आ चुके थे। उनकी आवाज पहली बार अपने बेटे पर गरजी।
—अर्जुन, साफ-साफ बताओ, यहां हुआ क्या है?
अर्जुन हंसा, मगर वह हंसी इंसान की नहीं लग रही थी।
—कुछ नहीं, पापा। बस सच बताया है इसे। बताया है कि यह शादी प्यार से नहीं हुई। सजा देने के लिए हुई है।
अदिति का शरीर फिर कांप उठा।
—मैंने आपका क्या बिगाड़ा था? मैंने क्या किया था?
अर्जुन अचानक चिल्लाया।
—नयना को बर्बाद किया था तुमने। उसका करियर, उसका घर, उसकी इज्जत, सब खत्म कर दिया था तुमने।
कमरे में एक भारी सन्नाटा गिरा।
सावित्री देवी को नयना याद थी। 3 साल पहले अर्जुन की जिंदगी में एक लड़की थी, नयना सक्सेना। बहुत सीधी, शांत, संस्कारी। दोनों की बात शादी तक पहुंच चुकी थी। फिर अचानक नयना गायब हो गई। अर्जुन महीनों तक टूटता रहा। उसने खाना छोड़ दिया, ऑफिस जाना छोड़ दिया, लोगों से मिलना बंद कर दिया। सावित्री ने सोचा था कि उनके बेटे का दिल अब कभी नहीं भरेगा।
फिर अदिति आई।
अदिति उनकी किसी रिश्तेदार की कंपनी में काम करती थी। एक पारिवारिक पूजा में पहली बार आई थी। वह ज्यादा बोलती नहीं थी, पर घर के बड़े-बुजुर्गों की बात ध्यान से सुनती थी। रसोई में नौकरों से भी सम्मान से बात करती थी। सावित्री को वह पहली मुलाकात में ही अपनी लगने लगी थी। अर्जुन भी कुछ महीनों बाद बदलने लगा था। वह हंसने लगा, मां के साथ बैठने लगा, अदिति से लंबी बातें करने लगा।
सावित्री ने सोचा, भगवान ने उसके बेटे को दूसरा जीवन दिया है।
उन्हें क्या पता था, उनका बेटा जीवन नहीं, बदला तैयार कर रहा था।
—अर्जुन, तुमने शादी क्यों की इससे? सच बोलो।
अर्जुन की आवाज धीमी लेकिन जहरीली हो गई।
—ताकि इसे वही दर्द दूं जो नयना ने झेला। ताकि इसे लगे कि इसका घर बस रहा है, और उसी रात इसे पता चले कि यह घर नहीं, अदालत है।
अदिति ने रोते हुए सिर हिलाया।
—मैं नयना की दोस्त थी। दुश्मन नहीं। मैंने उसे कभी नुकसान नहीं पहुंचाया।
—झूठ! फोटो तुम्हारे फोन से भेजे गए थे। मैसेज तुम्हारे नंबर से गए थे। पूरी कंपनी में वही तस्वीरें फैली थीं। नयना को नौकरी से निकाला गया। उसके पिता ने उसे घर से बाहर कर दिया। और मैं… मैं उसे धोखेबाज समझकर छोड़ आया।
सावित्री देवी ने अपने बेटे को ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हों।
—तो तुमने 3 साल तक यह जहर पाला? और फिर एक निर्दोष लड़की को दुल्हन बनाकर यहां लाए?
—निर्दोष नहीं है यह।
अदिति ने हिम्मत जुटाई। वह दीवार पकड़कर उठी।
—अगर मैं दोषी थी तो पुलिस में जाते। मुझसे पूछते। नयना से बात करते। लेकिन आपने क्या किया? मुझे मंदिर ले गए, फेरे लिए, सबके सामने मेरे माथे में सिंदूर भरा… और कमरे में दरवाजा बंद करके कहा कि आज मेरी पहली रात नहीं, सजा की रात है।
सावित्री देवी का चेहरा सख्त हो गया।
—तुमने इसे हाथ लगाया?
अर्जुन कुछ पल चुप रहा।
—नहीं।
अदिति की आवाज टूट गई।
—हाथ नहीं लगाया, लेकिन डर से मार दिया। दीवार पर मुट्ठी मारी। शीशा तोड़ा। मेरा फोन छीन लिया। कहा कि अगर मैं चिल्लाई तो मेरी मां को सड़क पर ला देगा। कहा कि शादी के बाद मेरा हर रास्ता उसके हाथ में है।
महेंद्र राठौड़ ने अर्जुन का कॉलर पकड़ लिया।
—शर्म आनी चाहिए तुझे।
अर्जुन ने पिता का हाथ झटक दिया।
—जब नयना रोई थी, तब किसी को शर्म नहीं आई थी।
—क्योंकि शायद किसी ने सच जाना ही नहीं था।
यह वाक्य सावित्री देवी के मुंह से निकला, पर कमरे की हवा चीर गया।
अर्जुन स्तब्ध रह गया।
—आप भी उसकी तरफ हैं?
—मैं उस लड़की की तरफ हूं जो अभी मेरे घर के फर्श पर दुल्हन के जोड़े में पड़ी कांप रही थी। मां होने का मतलब यह नहीं कि बेटे के पाप पर आंख बंद कर लूं।
अदिति दरवाजे की ओर बढ़ी। उसका लाल लहंगा फर्श पर घिसट रहा था। हर कदम ऐसा लग रहा था जैसे वह शादी के कमरे से नहीं, किसी आग से बाहर निकल रही हो।
सावित्री ने नौकरानी राधा को आवाज दी।
—अतिथि कमरे में साफ चादर लगाओ। और घर के बाहर कोई गाड़ी न निकले। कोई फोन न करे। सुबह तक इस घर का सच यहीं रहेगा।
अर्जुन आगे बढ़ा।
—मुझे उससे बात करनी है।
सावित्री उसके सामने दीवार बनकर खड़ी हो गईं।
—तुम्हें अब सिर्फ कानून से बात करनी चाहिए।
—मां!
—अभी मुझे मां मत कहो। जिस आदमी ने अपनी पत्नी को पहली रात बदले की वस्तु बना दिया, वह मेरा बेटा कैसे हो सकता है?
अर्जुन के चेहरे पर पहली बार डर आया।
उस रात राजविलास हवेली में कोई नहीं सोया। बाहर अभी भी मंडप में फूल लटक रहे थे। मेहमानों के लिए बनी मिठाइयों की ट्रे आधी भरी थीं। शादी का बोर्ड हवा में झूल रहा था, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था, “अर्जुन और अदिति।”
लेकिन भीतर सब जान चुके थे कि यह शादी नहीं, एक झूठी रस्म थी।
सुबह होने से पहले, सावित्री देवी ने अर्जुन के पुराने कमरे की अलमारी खुलवाई। वहां से एक काली डायरी, कुछ पुराने प्रिंटआउट और नयना की तस्वीरें मिलीं। अर्जुन ने सब 3 साल से छिपाकर रखा था।
महेंद्र ने डायरी खोली। उसमें नयना की लिखावट थी। आखिरी पन्ने पर लिखा था कि अदिति ने उसे धोखा दिया, उसके फोन से तस्वीरें भेजीं, और उसकी जिंदगी खत्म कर दी।
अर्जुन ने कांपती आवाज में कहा।
—अब बताइए, मैंने गलत किया?
तभी दरवाजे पर अदिति खड़ी दिखाई दी। उसने रातभर एक शब्द नहीं बोला था। अब उसके हाथ में एक मुड़ी हुई पुरानी तस्वीर थी।
—अगर आपको सच चाहिए, तो यह देखिए।
तस्वीर में 3 लड़कियां थीं। नयना, अदिति और उनके बीच खड़ी एक तीसरी लड़की। चेहरे पर महंगा चश्मा, होंठों पर तेज मुस्कान, आंखों में खतरनाक आत्मविश्वास।
अदिति ने कहा।
—इसका नाम रिया मल्होत्रा है। नयना को मैंने नहीं, इसी ने बर्बाद किया था।
अर्जुन का चेहरा राख जैसा हो गया।
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भाग 2
अदिति की बात सुनते ही कमरे की हवा बदल गई, लेकिन अर्जुन के अहंकार ने तुरंत खुद को बचाने की कोशिश की। वह तस्वीर छीनकर देखने लगा, जैसे कागज पर झूठ पकड़ लेगा। रिया मल्होत्रा वही लड़की थी जो 3 साल पहले उनके कारोबारी सर्कल में घूमती थी, हर पार्टी में अर्जुन के आसपास दिखती थी, पर अर्जुन ने कभी उसे गंभीरता से नहीं लिया था। अदिति ने बताया कि नयना उसकी सबसे करीबी दोस्त थी और रिया अर्जुन पर पागलपन की हद तक मोहित थी। एक दिन ऑफिस की कैंटीन में अदिति अपना फोन अनलॉक छोड़कर वॉशरूम गई थी। उसी 5 मिनट में रिया ने नयना की निजी तस्वीरें और झूठे मैसेज अदिति के नंबर से भेज दिए। जब तूफान उठा, रिया ने अदिति को धमकाया कि अगर उसने मुंह खोला तो उसकी मां कमला देवी की फैक्ट्री की नौकरी खत्म करवा देगी, क्योंकि रिया का मामा उसी फैक्ट्री का मालिक था। कमला देवी पहले से बीमार थीं, घर का खर्च उसी नौकरी से चलता था। 22 साल की अदिति डर गई, चुप रही, और वही चुप्पी उसके माथे पर गुनाह बनकर चिपक गई। सावित्री देवी ने अर्जुन को देखा। पहली बार उनके बेटे के चेहरे पर विश्वास नहीं, पछतावे का डर दिखा। तभी मुख्य दरवाजे पर तेज दस्तक हुई। राधा दौड़ती हुई आई और बोली कि बाहर कोई औरत है, कहती है कि उसे अदिति से मिलना है। दरवाजा खुला तो सामने नयना खड़ी थी। पहले वाली टूटी हुई लड़की नहीं, बल्कि थकी हुई मगर सीधी खड़ी औरत। उसके हाथ में फोन था, आंखों में 3 साल का दर्द। उसने अदिति की ओर देखा, फिर अर्जुन की ओर नहीं देखा। उसने बस इतना कहा कि वह दूल्हे से नहीं, दुल्हन से मिलने आई है, क्योंकि पिछली रात रिया नशे में अपने ही दोस्तों के सामने सब उगल गई थी। उसने रिकॉर्डिंग चालू की। उसी पल सावित्री के फोन पर अनजान नंबर से एक ऑडियो आया। संदेश में लिखा था कि अगर सच सुनने की हिम्मत है तो इसे सबके सामने चलाइए। सावित्री ने प्ले दबाया, और रिया की हंसी पूरे कमरे में जहर की तरह फैल गई।
भाग 3
ऑडियो में पहले तेज संगीत था, जैसे किसी महंगे लाउंज में पार्टी चल रही हो। फिर रिया की लड़खड़ाती मगर घमंडी आवाज आई।
—अदिति? अरे वह तो हमेशा से डरपोक थी। मैंने बस उसका फोन इस्तेमाल किया था। बाकी सबने खुद कर लिया।
अदिति ने आंखें बंद कर लीं।
नयना की उंगलियां फोन पर कस गईं।
रिया की आवाज फिर आई।
—नयना बहुत पवित्र बनती थी। अर्जुन उसे देवी समझता था। मुझे हंसी आती थी। मैंने तस्वीरें भेजीं, मैसेज बनाए, और सबको लगा अदिति ने धोखा दिया। कमाल तो यह था कि नयना ने अपनी दोस्त से बात तक नहीं की। अर्जुन ने भी नहीं। अमीर लोग भी कितने मूर्ख होते हैं, बस चोट लगनी चाहिए, सच पूछना भूल जाते हैं।
अर्जुन के चेहरे से जैसे खून उतर गया।
ऑडियो चलता रहा।
—और अदिति? उसकी मां की नौकरी मेरी मुट्ठी में थी। मैंने कहा, बोलोगी तो तेरी मां सड़क पर आ जाएगी। वह चुप हो गई। मुझे पता था, एक दिन अर्जुन अपने गुस्से में खुद जल जाएगा। बस मैंने आग लगाई थी, बाकी सबने उसमें घी डाला।
फिर कुछ लोगों की हंसी सुनाई दी।
ऑडियो खत्म हो गया।
कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया, जैसे कोई मर गया हो। सचमुच कुछ मरा था—अर्जुन का भ्रम, सावित्री का गर्व, नयना का पुराना क्रोध और अदिति का बचा हुआ भरोसा।
अर्जुन लड़खड़ाकर अदिति की ओर बढ़ा।
—अदिति, मैं…
सावित्री ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
—नहीं। अभी नहीं। अपनी गलती का बोझ उठाने के लिए किसी और की माफी पर मत टूटो।
—मां, मैंने जो किया…
—तुमने अपराध किया है, अर्जुन। किसी झूठ पर विश्वास करना कमजोरी थी, पर शादी करके बदला लेना क्रूरता थी।
नयना की आंखों से आंसू बह निकले। वह अदिति के सामने आई।
—मैंने भी तुम्हें नहीं सुना। तुम 4 बार मेरे घर आई थीं। मैंने दरवाजा बंद कर लिया था। मुझे लगा तुम्हारा चेहरा देखते ही मेरी बेइज्जती याद आ जाएगी। मैं गलत थी।
अदिति ने धीमे से कहा।
—मैंने भी चुप रहकर खुद को सजा दी। शायद अगर मैं बोलती, तो सब पहले खुल जाता।
—तुम्हें धमकाया गया था। गलती तुम्हारी नहीं थी।
अदिति मुस्कराई नहीं। वह इतनी थक चुकी थी कि माफी भी उसे आराम नहीं दे पा रही थी।
दोपहर तक खबर घर के अंदर फैल चुकी थी। रिश्तेदार जो अभी तक अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठकर लौटने की तैयारी कर रहे थे, अब ड्रॉइंग रूम में जमा थे। कुछ फुसफुसा रहे थे, कुछ अदिति को देखकर दया दिखा रहे थे, कुछ इस बात से ज्यादा परेशान थे कि “इज्जत” का क्या होगा।
महेंद्र राठौड़ ने पहली बार सबके सामने कठोर आवाज में कहा।
—आज इस घर की इज्जत बचाने का एक ही रास्ता है, सच बोलना।
उसी समय अदिति की मां कमला देवी हवेली पहुंचीं। उन्हें रात में कुछ नहीं बताया गया था, बस सुबह राधा ने रोते हुए फोन कर दिया था। कमला देवी साधारण सूती साड़ी में थीं, पैरों में पुरानी चप्पलें, चेहरे पर घबराहट, मगर आंखों में आग।
उन्होंने बेटी को देखा। लाल जोड़े में टूटी हुई चूड़ियों के निशान उसकी कलाई पर थे। कमला देवी का चेहरा कस गया।
—मेरी बेटी को किसने रुलाया?
अर्जुन आगे आया। इस बार उसके पास कोई सफाई नहीं थी।
—मैंने।
कमला देवी ने उसे सिर से पैर तक देखा।
—जिस लड़की ने तुम्हारे घर को अपना घर समझा, तुमने उसे बदले की रात दे दी?
अर्जुन की आंखें भर आईं।
—मैंने पाप किया है।
—पाप शब्द छोटा है। तुमने उसके भरोसे की हत्या की है।
सावित्री देवी ने कमला के सामने हाथ जोड़ दिए।
—बहन, मैं आपकी बेटी को बचा नहीं पाई। यह मेरी सबसे बड़ी शर्म है।
कमला देवी ने उनके हाथ नीचे कर दिए।
—आपने दरवाजा खोला, यही बहुत है। कई घरों में मांएं बेटे की आवाज सुनती हैं, बहू की चीख नहीं।
यह बात कमरे में बैठे हर रिश्तेदार के सीने में तीर की तरह लगी।
अर्जुन घुटनों पर बैठ गया।
—मांजी, मैं कुछ मांगने नहीं आया। बस इतना कहने आया हूं कि रिया के खिलाफ शिकायत दर्ज कराऊंगा। नयना भी गवाही देगी। जो सच है, वह सबके सामने आएगा।
कमला देवी ने पूछा।
—और मेरी बेटी?
अर्जुन ने अदिति की ओर देखा। उसकी आवाज टूट गई।
—मैं उसे आजाद करता हूं। वह चाहे तो इसी वक्त यह शादी खत्म समझे। मैं तलाक में कोई रुकावट नहीं डालूंगा। कोई पैसा, कोई शर्त, कोई दबाव नहीं।
अदिति ने पहली बार सीधे उसकी आंखों में देखा।
—शादी कागज से नहीं टूटती, अर्जुन। वह उस पल टूट गई थी जब तुमने कमरे का दरवाजा बंद करके मुझे दुश्मन कहा।
अर्जुन ने सिर झुका लिया।
—मुझे पता है।
—नहीं, तुम्हें अभी नहीं पता। तुम्हें तब पता चलेगा जब हर त्योहार पर यह याद आएगा कि जिस औरत ने तुम्हें सचमुच चाहा, उसे तुमने उस गलती की सजा दी जो उसने की ही नहीं थी।
अर्जुन रो पड़ा। मगर इस बार अदिति ने उसे सांत्वना नहीं दी।
शाम तक पुलिस को बुलाया गया। महेंद्र ने अपने पुराने प्रभाव का इस्तेमाल छिपाने के लिए नहीं, शिकायत दर्ज कराने के लिए किया। नयना ने ऑडियो दिया। अदिति ने अपना बयान दिया। सावित्री ने अर्जुन के पुराने कागज, डायरी और मैसेज सौंपे। अर्जुन ने लिखित रूप में स्वीकार किया कि उसने बदले की भावना से शादी की थी और पहली रात अदिति को डराया था।
पुलिस इंस्पेक्टर ने रिया मल्होत्रा को नोटिस भेजा। पहले उसने हंसकर कहा कि पार्टी की नशे वाली बातों को कोई गंभीर नहीं लेगा। फिर उसने अपने वकील लगाए। फिर पैसे की पेशकश की। फिर धमकी दी कि राठौड़ परिवार की भी बदनामी होगी।
लेकिन इस बार कोई चुप नहीं हुआ।
2 दिन बाद सावित्री देवी ने वही किया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। उन्होंने हवेली के बड़े आंगन में उन सभी रिश्तेदारों को बुलाया जो शादी में आए थे। फूल सूख चुके थे, मंडप आधा हट चुका था, पर कुर्सियां फिर लगाई गईं। सब सोच रहे थे कि शायद परिवार सफाई देगा।
सावित्री देवी ने माइक्रोफोन हाथ में लिया।
—हमारे घर में कल रात जो हुआ, वह छिपाने लायक नहीं, स्वीकार करने लायक है। मेरे बेटे अर्जुन ने अदिति से शादी प्यार के लिए नहीं, बदले के लिए की। अदिति निर्दोष थी। नयना को बर्बाद करने वाली रिया मल्होत्रा थी। लेकिन मेरे बेटे का अपराध सिर्फ गलतफहमी नहीं था। उसने सच पूछे बिना एक लड़की की जिंदगी से खेला। इस परिवार में आज से कोई भी मर्द अपनी चोट के नाम पर किसी औरत की इज्जत नहीं कुचल सकेगा।
कई औरतों की आंखें भर आईं। कुछ पुरुष असहज होकर नीचे देखने लगे। वही बुआ, जो कल तक कह रही थीं कि दुल्हन ने कुछ किया होगा तभी दूल्हा ऐसा हुआ, उठकर अदिति के पास आईं।
—बेटी, गलती हो गई।
अदिति ने बस इतना कहा।
—गलती तब होती है जब सच मालूम न हो। जब बिना जाने फैसला सुनाया जाए, वह अन्याय होता है।
बुआ चुप हो गईं।
अगले हफ्तों में रिया का झूठ खुलता गया। उसकी पुरानी चैट्स मिलीं। कैंटीन की धुंधली सीसीटीवी फुटेज मिली जिसमें वह अदिति के फोन के पास बैठी दिख रही थी। फैक्ट्री के मालिक को भी नोटिस गया, जिसने माना कि रिया ने कमला देवी की नौकरी पर दबाव डालने को कहा था। नयना के पुराने ऑफिस में भी जांच खुली। जिन लोगों ने बिना जांच उसे निकाला था, वे अब कानूनी जवाब दे रहे थे।
पर न्याय की शुरुआत से दिल तुरंत नहीं भरते।
अदिति कमला देवी के साथ आगरा लौट गई। उसने लाल जोड़ा बंद संदूक में रख दिया, नफरत से नहीं, याद के रूप में नहीं, बल्कि सबक के रूप में। उसने अपने हाथों से टूटी चूड़ियां मिट्टी में दबा दीं। कमला देवी ने पूछा।
—फेंक क्यों नहीं देती?
अदिति ने कहा।
—क्योंकि कुछ चीजें फेंकने से नहीं, दफनाने से खत्म होती हैं।
सावित्री देवी हर हफ्ते फोन करतीं। शुरुआत में अदिति फोन नहीं उठाती थी। फिर एक दिन उसने उठाया। दोनों तरफ लंबे समय तक खामोशी रही।
—हैलो, बेटी।
अदिति की आंखें भर आईं।
—मांजी, मैं अभी बेटी कहलाने लायक मजबूत नहीं हूं।
—बेटी होने के लिए मजबूत होना जरूरी नहीं। टूटकर भी कोई अपनी हो सकती है।
उस दिन अदिति रोई। बहुत रोई। लेकिन पहली बार उस रोने में डर नहीं था।
3 महीने बाद तलाक की प्रक्रिया शुरू हुई। अर्जुन ने कोई विरोध नहीं किया। वह हर तारीख पर चुपचाप आता, दस्तखत करता और दूर बैठ जाता। उसने अदिति को देखने की कोशिश भी कम कर दी, क्योंकि अब वह समझ चुका था कि पछतावा भी कभी-कभी दबाव बन जाता है।
आखिरी सुनवाई के दिन जज ने पूछा।
—क्या दोनों पक्ष आपसी सहमति से अलग होना चाहते हैं?
अर्जुन ने धीमे से कहा।
—जी।
अदिति ने भी कहा।
—जी।
कागज पर हस्ताक्षर हुए। 7 फेरों की कहानी कानूनी रूप से खत्म हो गई, लेकिन उसके निशान किसी मुहर से नहीं मिटे।
बाहर निकलते समय अर्जुन ने बस एक वाक्य कहा।
—अदिति, तुम्हारे लिए मैं हर सच बोल चुका हूं। अपने लिए शायद उम्र भर बोलता रहूंगा।
अदिति रुकी। उसने उसे देखा, इस बार न डर से, न प्यार से, सिर्फ शांत दूरी से।
—सच बोलना अच्छी शुरुआत है। लेकिन याद रखना, तुम्हें माफी पाने के लिए नहीं, इंसान बनने के लिए बदलना है।
वह चली गई।
नयना ने शहर छोड़ दिया। उसने एक नए संस्थान में नौकरी शुरू की और धीरे-धीरे लोगों पर भरोसा करना सीखा। उसने अदिति से दोस्ती वापस मांगने की जल्दी नहीं की। वह कभी-कभी सिर्फ एक छोटा संदेश भेज देती।
“आज तुम्हारी याद आई। उम्मीद है तुम ठीक हो।”
अदिति कई बार जवाब नहीं देती। फिर एक दिन उसने लिखा।
“मैं ठीक होना सीख रही हूं।”
रिया मल्होत्रा की दुनिया टूट गई। उसके पिता ने दूरी बना ली, दोस्त गायब हो गए, सोशल मीडिया पर उसकी चमकती तस्वीरों के नीचे लोग सच पूछने लगे। मामला अदालत में गया। सजा कितनी बड़ी हुई, यह लोगों की चर्चा का हिस्सा रहा, पर अदिति के लिए असली सजा यह थी कि रिया अब किसी और की चुप्पी खरीद नहीं सकती थी।
सावित्री देवी ने राजविलास हवेली की शादी वाली तस्वीर उतरवा दी। उसकी जगह उन्होंने आंगन में एक छोटा सा पत्थर लगवाया, जिस पर लिखा था कि घर की मर्यादा सच से बड़ी नहीं होती। रिश्तेदारों ने इसे नाटक कहा। सावित्री ने परवाह नहीं की।
1 साल बाद, सावित्री देवी बिना बताए आगरा पहुंचीं। उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा था। अदिति ने दरवाजा खोला। वह अब एक नई कंपनी में प्रशासनिक अधिकारी थी। सफेद कुर्ती, खुले बाल, चेहरे पर हल्की थकान, मगर आंखों में वह टूटा हुआ डर नहीं था।
—मैं अंदर आ सकती हूं? सावित्री ने पूछा।
अदिति कुछ पल चुप रही, फिर दरवाजा खोल दिया।
कमला देवी ने चाय बनाई। तीनों औरतें छोटे से आंगन में बैठीं। वहां न कोई शहनाई थी, न महंगे फूल, न सोने की प्लेटें, न कैमरे। बस तुलसी का गमला, दोपहर की धूप और एक सच्चा सन्नाटा।
सावित्री ने डिब्बा खोलते हुए कहा।
—आज तुम्हारी नई नौकरी की खबर सुनी। मिठाई तो बनती थी।
अदिति हल्का सा मुस्कराई।
—आपको किसने बताया?
—मांओं को खबर मिल ही जाती है।
अदिति की आंखें भर आईं, पर इस बार उसने आंसू गिरने नहीं दिए।
कुछ देर बाद उसने अंदर से गरम पराठे लाकर रखे। सावित्री ने खाते हुए कहा।
—यह हवेली के किसी पकवान से अच्छा है।
अदिति ने पहली बार खुलकर मुस्कराया।
उसी शाम, जब सावित्री लौट रही थीं, अदिति ने उन्हें एक छोटा डिब्बा दिया।
—यह आपके लिए।
सावित्री ने खोला। उसमें शादी की टूटी चूड़ियों का एक छोटा कांच का टुकड़ा था, साफ करके कपड़े में लपेटा हुआ।
—यह क्यों?
अदिति ने कहा।
—ताकि आपको याद रहे, किसी लड़की की आवाज टूटे तो उसे अपशकुन मत समझिए। कभी-कभी वही आवाज पूरे घर को बचा लेती है।
सावित्री ने डिब्बा सीने से लगा लिया।
राजविलास की वह शादी आज भी शहर में याद की जाती है। लोग कहते हैं, दुल्हन चीखी तो एक घर की नाक कट गई। पर सच यह था कि उसी चीख ने 3 साल पुराने झूठ का गला काट दिया था।
अदिति कभी उस हवेली में पत्नी बनकर नहीं लौटी।
लेकिन एक सर्द सुबह, वह सावित्री देवी से मिलने गई। हाथ में घर का बना गुड़ वाला हलवा था। आंगन में दोनों ने साथ बैठकर चाय पी। दूर कहीं मंदिर की घंटी बज रही थी। कोई संगीत नहीं था, कोई मेहमान नहीं, कोई लाल जोड़ा नहीं।
फिर भी उस दिन सावित्री को लगा, यह रिश्ता उस शादी से कहीं ज्यादा सच्चा था, जो सात फेरों के साथ शुरू होकर पहली रात ही मर गई थी।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.