
PART 1
“अगर तेरे बेटे को बड़ों की इज्जत नहीं आती, तो आज उसे सिखा दूँगा,” मामा ने पूरे आँगन के सामने 9 साल के बच्चे से कहा, और फिर भी घर के बुज़ुर्गों को लगा कि गलती माँ की थी।
उस रविवार निशा श्रीवास्तव सुबह से बेचैन थी। लखनऊ के इंदिरा नगर वाले छोटे फ्लैट में चाय ठंडी हो चुकी थी, पर उसका ध्यान बार-बार फोन की स्क्रीन पर जा रहा था। माँ का संदेश तीसरी बार खुला पड़ा था—
“आज 2 बजे घर आ जाना। आरव को साथ लाना। विक्रम भी आएगा। अब सब ठीक है। पुरानी बातें भूलो।”
विक्रम उसका बड़ा भाई था। 37 साल का, गुस्से में बेकाबू, शराब के बाद और भी खतरनाक। मोहल्ले में उसके झगड़े मशहूर थे। कभी बाइक वाले से भिड़ गया, कभी दुकान वाले को धमका दिया, कभी अपनी पत्नी को इस हद तक डराया कि वह मायके चली गई। लेकिन माता-पिता के लिए वह हमेशा “मुश्किल दौर से गुजर रहा बेटा” था।
निशा ने रात में ही माँ से कहा था, “मम्मी, आरव उससे डरता है।”
सरला देवी बोलीं, “बेटा, वह उसका मामा है। रिश्ते तोड़कर कोई घर नहीं बसता।”
“रिश्ते डर से नहीं बसते।”
“अब विक्रम बदल गया है। मंदिर भी जा रहा है, काउंसलर से भी मिल रहा है।”
निशा ने कड़वी हँसी रोकी। कुछ महीनों की काउंसलिंग किसी आदमी के भीतर वर्षों से जमा हिंसा को कैसे धो सकती थी?
फिर भी वह गई। क्योंकि उसे हर बार “नाटक करने वाली”, “अहंकारी बेटी”, “बच्चे को परिवार से काटने वाली माँ” कहा जाता था। क्योंकि कहीं भीतर वह अब भी चाहती थी कि एक दिन उसका मायका सचमुच मायका लगे।
आरव पीछे की सीट पर अपना नया क्रिकेट बैट पकड़े बैठा था।
“मम्मी, विक्रम मामा होंगे?”
“हाँ, लेकिन हम जल्दी लौट आएँगे।”
“वो मुझे ऐसे देखते हैं जैसे मैंने कुछ गलत किया हो।”
निशा ने शीशे में उसकी आँखें देखीं। बच्चों को सच कहने के लिए शब्द नहीं सजाने पड़ते।
पुराने पुश्तैनी घर के बाहर गाड़ियाँ लगी थीं। आँगन में तंदूरी रोटी, छोले, पुलाव और कोयले की महक थी। रिश्तेदार प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे थे। बच्चे गली में क्रिकेट खेल रहे थे। सब कुछ सामान्य दिख रहा था, जैसे इस घर की दीवारों ने कभी चीखें सुनी ही न हों।
सरला देवी ने आरव को सीने से लगा लिया।
“मेरे राजा बेटा! कितना दुबला हो गया।”
पिता, हरिनारायण श्रीवास्तव, तंदूर के पास खड़े थे। उनके बगल में विक्रम था—भारी शरीर, लाल आँखें, जबड़े में जकड़ा हुआ गुस्सा।
पहला घंटा किसी तरह निकल गया। निशा ने रसोई में मदद की। आरव चचेरे बच्चों के साथ खेलने लगा। तभी गेंद आँगन में रखी स्टील की बाल्टी से टकराई और छाछ का गिलास गिर गया।
विक्रम पलटा।
“अंधा है क्या?”
आरव जम गया।
“सॉरी, मामा… गलती से हुआ।”
निशा तुरंत आगे आई। “बच्चा खेल रहा था, विक्रम।”
“इसीलिए तो बिगड़ गया है। कोई डर ही नहीं।”
कुछ देर बाद आरव ने अपना बैट उठाया और धीमे से बोला, “मामा, मेरी गेंद दीजिए ना।”
गेंद विक्रम के पैर के पास थी। उसने उठाई, मुस्कराया, और उसे गली के बाहर नाली की तरफ फेंक दिया।
आरव का चेहरा उतर गया।
“वो मेरी नई गेंद थी।”
“तो जाकर उठा। रो क्यों रहा है?”
निशा का धैर्य टूट गया। “तुम्हें 9 साल के बच्चे से जलन हो रही है?”
विक्रम की आँखें सख्त हो गईं।
“मुझे मत सिखा, निशा। तूने बिना बाप के बच्चे को बहुत सिर चढ़ा दिया है।”
सारा आँगन चुप हो गया। निशा के तलाक का ज़ख्म सब जानते थे। पति दूसरी औरत के लिए चला गया था, पर विक्रम के लिए वह भी निशा की ही गलती थी।
आरव रोते हुए अंदर की तरफ भागा। निशा उसके पीछे दौड़ी।
तभी एक चीख गूँजी।
वह खेल की आवाज़ नहीं थी। वह ऐसी चीख थी जिसे सुनते ही माँ का शरीर अपनी साँस भूल जाता है।
निशा भागी।
आरव पिछली दीवार के पास जमीन पर पड़ा था। उसका पैर अजीब तरह से मुड़ा हुआ था। विक्रम सामने खड़ा था, हाथ में तंदूर की लोहे की सींक।
निशा की आवाज़ काँप गई।
“तूने क्या किया?”
विक्रम ने सींक फेंक दी।
“ये मुझ पर लकड़ी लेकर झपटा था। मैंने बस रोका।”
जमीन पर एक पतली सूखी टहनी पड़ी थी।
आरव दर्द से चीख रहा था, “मम्मी, पैर… बहुत दर्द हो रहा है!”
निशा घुटनों के बल गिर गई।
“मैं हूँ बेटा, हिलना मत।”
उसने एंबुलेंस को फोन किया। रिश्तेदार घेरकर खड़े थे। सरला देवी रो रही थीं, पर आरव के लिए नहीं—विक्रम को देखकर।
हरिनारायण ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा, जैसे घायल वही हो।
और तभी निशा ने समझ लिया, इस घर में सच भी खून के रिश्तों के आगे अकेला पड़ने वाला था।
PART 2
एंबुलेंस में आरव ने निशा की उँगलियाँ इतनी जोर से पकड़ीं कि नाखूनों के निशान पड़ गए।
“मम्मी… मामा ने मुझे क्यों मारा?”
निशा के पास जवाब नहीं था। उसने बस उसके माथे को चूमा।
“क्योंकि उन्होंने बहुत गलत किया। और मैं वादा करती हूँ, वह फिर कभी तुम्हारे पास नहीं आएँगे।”
अस्पताल में रिपोर्ट आई—टिबिया की गंभीर फ्रैक्चर, तुरंत ऑपरेशन, पैर में मेटल प्लेट। निशा ने 4 घंटे गलियारे में बैठकर बिताए, जहाँ दवा, पसीने और डर की मिली-जुली गंध थी।
डॉक्टर बाहर आए तो बोले, “सर्जरी ठीक हुई है। लेकिन यह चोट गिरने जैसी नहीं लगती। हमें बच्चे पर हिंसा की सूचना देनी होगी।”
निशा ने बिना पलक झपकाए कहा, “करिए। पुलिस को मैं भी बुला चुकी हूँ।”
रात में फोन पर 28 मिस्ड कॉल थीं। माँ, पिता, मौसी, मामा, अनजान नंबर।
सरला देवी का संदेश था, “विक्रम पछता रहा है। घर की बात पुलिस तक मत ले जा। परिवार बिखर जाएगा।”
हरिनारायण ने लिखा, “तेरा भाई है। बच्चे तो गिरते रहते हैं।”
निशा ने दोनों संदेश मिटा दिए।
सुबह आरव ने धीमे से पूछा, “नाना-नानी मुझसे नाराज़ हैं क्या?”
निशा का दिल टूट गया।
“नहीं बेटा। तूने कुछ गलत नहीं किया।”
आरव ने आँखें फेर लीं। “पर उन्होंने मामा पर विश्वास किया।”
9 साल का बच्चा सच पहचान चुका था।
उसी शाम निशा ने वकील अदिति सक्सेना से मुलाकात की। अदिति ने सारे संदेश पढ़े, मेडिकल रिपोर्ट देखी और पूछा, “विक्रम कहाँ रहता है?”
“माँ-पापा के घर में। पत्नी उसे छोड़कर चली गई।”
अदिति की आँखें गंभीर हो गईं।
“तो मामला सिर्फ मामा का नहीं है। यह उन लोगों का भी है जो खतरे को घर में रखकर बच्चे को बुला रहे थे।”
और यही बात अदालत में तूफान बन गई।
PART 3
परिवार न्यायालय की इमारत में उस दिन अजीब-सी ठंडक थी। बाहर जून की गर्मी थी, भीतर पुराने पंखों, फाइलों और बेचैन चेहरों की हवा।
निशा अकेली नहीं थी। उसके साथ वकील अदिति थी, आरव की मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट थी, अस्पताल के कागज़ थे, पुलिस शिकायत थी, और हर वह संदेश था जिसमें उसके अपने माता-पिता ने बच्चे के दर्द से ज्यादा विक्रम की बदनामी की चिंता की थी।
सरला देवी और हरिनारायण ऐसे आए जैसे किसी पूजा में जा रहे हों। माँ ने हल्की रेशमी साड़ी पहनी थी, माथे पर बड़ी बिंदी, हाथ में रुद्राक्ष की माला। पिता ने सफेद कुर्ता और नेहरू जैकेट पहन रखा था। वे दोनों अदालत को यह दिखाना चाहते थे कि वे संस्कारी, दुखी और प्रेम करने वाले नाना-नानी हैं।
उनके वकील ने शुरुआत की।
“माननीय न्यायाधीश, यह एक माँ की अतिशय भावनात्मक प्रतिक्रिया है। मेरे मुवक्किल अपने नाती से बहुत प्रेम करते हैं। एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना को आधार बनाकर बच्चे को उसके नाना-नानी से दूर रखना भारतीय पारिवारिक मूल्यों के विरुद्ध है।”
फिर उन्होंने तस्वीरें रखीं—आरव का पहला जन्मदिन, नानी की गोद में सोता हुआ बच्चा, नाना के साथ पतंग उड़ाता हुआ, दीवाली पर नए कुर्ते में मुस्कुराता हुआ।
निशा की आँखें भर आईं। वे तस्वीरें झूठ नहीं थीं। कभी उसके माता-पिता सचमुच आरव से प्रेम करते थे। लेकिन प्रेम तब तक अधूरा था, जब तक वह बच्चे की रक्षा करने की हिम्मत न रखे।
हरिनारायण गवाही के लिए खड़े हुए।
“आप अपने नाती से प्रेम करते हैं?” उनके वकील ने पूछा।
“जान से ज्यादा,” उन्होंने भरी आवाज़ में कहा।
अदिति उठीं। उनकी आवाज़ शांत थी, पर हर शब्द चाकू की धार जैसा साफ।
“श्री हरिनारायण, जब आरव जमीन पर पड़ा दर्द से चीख रहा था, तब आपने किसे पकड़ा था?”
वह चुप रहे।
“बच्चे को या विक्रम को?”
“मेरा बेटा घबरा गया था।”
“कौन-सा बेटा? विक्रम या आरव?”
अदालत में सन्नाटा फैल गया।
हरिनारायण ने नज़रें झुका लीं।
अदिति ने संदेश पढ़ा, “आपने लिखा—‘बच्चे तो गिरते रहते हैं।’ क्या यह आपका संदेश है?”
“गुस्से में लिख दिया था।”
“जब आरव की टांग में मेटल प्लेट डाली जा रही थी, तब आपको चिंता किसकी थी? बच्चे की या पुलिस केस से विक्रम की?”
हरिनारायण का चेहरा पीला पड़ गया।
फिर सरला देवी को बुलाया गया। वह बैठते ही रोने लगीं।
“मैं बस अपने नाती को गले लगाना चाहती हूँ। वह मेरे बिना कैसे रहेगा?”
अदिति ने उन्हें रोने दिया। फिर धीरे से पूछा, “आपने निशा को संदेश भेजा था—‘अगर उसने बेटे को सही संस्कार दिए होते, तो विक्रम इतना भड़कता नहीं।’ क्या यह आपने लिखा?”
सरला देवी के हाथ काँपे।
“मैं परेशान थी।”
“आपने यह भी लिखा—‘विक्रम ने गलती की, पर आरव को बड़ों के सामने जवाब नहीं देना चाहिए था।’ क्या आप अब भी मानती हैं कि 9 साल का बच्चा अपनी टूटी टांग के लिए जिम्मेदार था?”
सरला देवी का रोना थम गया।
“नहीं… अब नहीं।”
“तो विक्रम आज भी आपके घर में क्यों रह रहा है?”
उन्होंने बहुत धीमे कहा, “वह मेरा बेटा है।”
अदिति ने सीधा देखा।
“आरव भी आपका नाती है।”
उस एक वाक्य ने कमरे की हवा बदल दी।
फिर एक गवाह बुलाया गया, जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी—शकुंतला आंटी, बगल वाले घर की पड़ोसन। वह उस दिन खाने में बुलायी गई थीं, क्योंकि सरला देवी हर त्योहार पर उन्हें घर बुलाती थीं।
सफेद बालों वाली वह महिला धीरे-धीरे गवाही वाली कुर्सी पर बैठीं।
अदिति ने पूछा, “आपने क्या देखा था?”
शकुंतला आंटी ने न्यायाधीश की तरफ देखा।
“मैंने बच्चे को रोते हुए अंदर जाते देखा। विक्रम पीछे गया। उसने बच्चे को गाली दी। बच्चा दीवार के पास रुक गया। उसके हाथ में बस एक छोटी टहनी थी। विक्रम ने तंदूर की लोहे की सींक उठाई और पूरी ताकत से उसके पैर पर मारी।”
सरला देवी ने मुँह पर हाथ रख लिया।
दूसरे वकील ने पूछा, “आपकी उम्र 70 है। क्या आपको देखने में दिक्कत है?”
शकुंतला आंटी तमतमा गईं।
“चश्मा पढ़ने के लिए लगाती हूँ, झूठ पहचानने के लिए नहीं। मैं 4 कदम दूर थी।”
फिर निशा की बारी आई।
वह खड़ी हुई तो उसके हाथ ठंडे थे। पर आवाज़ नहीं टूटी।
उसने बताया कैसे उसे बार-बार “घर बचाने” के नाम पर चुप कराया गया। कैसे आरव पहले भी विक्रम से डरता था। कैसे गेंद फेंकने के बाद विक्रम ने उसके तलाक पर ताना मारा। कैसे उसका बच्चा दर्द से जमीन पर पड़ा था और उसके माता-पिता हमलावर बेटे को संभाल रहे थे।
“मैं अपने माता-पिता से नफरत नहीं करती,” निशा ने कहा। “पर मैं अपने बेटे को उन लोगों के पास नहीं भेज सकती जो उसके डर को बदतमीज़ी और उसकी चोट को गलती कहते हैं।”
न्यायाधीश मीरा खन्ना ने लंबे समय तक फाइल देखी। मेडिकल रिपोर्ट, मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, सामाजिक कार्यकर्ता की टिप्पणी, व्हाट्सऐप संदेश, पुलिस केस, पड़ोसन की गवाही—सब कुछ सामने था।
सामाजिक कार्यकर्ता की रिपोर्ट सबसे भारी थी।
उसमें लिखा था कि आरव रात में चौंककर उठता है, तेज पुरुष आवाज़ सुनते ही काँपता है, और “मामा फिर आ जाएगा” कहकर अलमारी के पीछे छिप जाता है। उसने यह भी कहा था कि नाना-नानी के नाम पर वह उलझन में पड़ जाता है—प्यार भी याद आता है और डर भी।
न्यायाधीश ने पूछा, “क्या बच्चा अदालत में आना चाहता है?”
निशा ने सिर हिलाया। “नहीं। उसकी डॉक्टर ने मना किया है।”
अदिति ने कहा, “हम बच्चे को फिर से उस घटना में नहीं धकेलना चाहते।”
अदालत ने सुनवाई पूरी की और आदेश सुरक्षित रखा। 30 दिन बाद फैसला सुनाया जाना था।
वे 30 दिन निशा के जीवन के सबसे लंबे दिन थे।
आरव की फिजियोथेरेपी जारी थी। पहले वह बैसाखी से चलता, फिर दीवार पकड़कर। कई बार गिरता, दाँत भींचता, फिर उठता। उसकी टांग ठीक हो रही थी, लेकिन मन की हड्डी अब भी टूटी हुई थी।
एक रात उसने पूछा, “अगर कोर्ट बोले कि मुझे नाना-नानी के पास जाना पड़ेगा तो?”
निशा उसके बिस्तर के पास बैठ गई।
“तो मम्मी फिर लड़ेगी।”
“आप थकती नहीं?”
उसने बच्चे के बाल सहलाए।
“माँ थक सकती है, हार नहीं सकती।”
फैसले वाले दिन निशा अदालत पहुँची तो सरला देवी पहले से बैठी थीं। इस बार उनके चेहरे पर सजावट कम और थकान ज्यादा थी। हरिनारायण कठोर चेहरा बनाए बैठे थे, जैसे अब भी उन्हें विश्वास था कि परिवार की इज्जत कानून से बड़ी है।
न्यायाधीश ने आदेश पढ़ना शुरू किया।
“अदालत मानती है कि भारतीय समाज में नाना-नानी का स्थान महत्वपूर्ण है। परंतु कोई भी पारिवारिक संबंध बच्चे की शारीरिक और मानसिक सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकता।”
निशा की साँस अटक गई।
“रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि बच्चे आरव को उसके मामा विक्रम द्वारा जानबूझकर गंभीर चोट पहुँचाई गई। यह भी स्पष्ट है कि प्रतिवादी नाना-नानी ने घटना को कमतर दिखाने, बच्चे को दोष देने और पुलिस कार्रवाई रोकने का प्रयास किया। प्रतिवादी आज भी उसी व्यक्ति को अपने घर में आश्रय दे रहे हैं।”
सरला देवी रोने लगीं।
न्यायाधीश ने आगे कहा, “अतः अदालत आरव की माँ निशा श्रीवास्तव की याचिका स्वीकार करती है। सरला देवी और हरिनारायण श्रीवास्तव को आरव से प्रत्यक्ष, फोन, संदेश, स्कूल, पड़ोस या किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से संपर्क करने से रोका जाता है।”
निशा को लगा जैसे उसके सीने से कोई भारी पत्थर हट गया।
अदिति ने धीरे से उसका हाथ दबाया।
“वह सुरक्षित है,” उन्होंने कहा।
न्यायाधीश ने जोड़ा, “आदेश की समीक्षा 2 वर्ष बाद ही संभव होगी, वह भी तब जब प्रतिवादी विक्रम से पूर्ण दूरी, परामर्श उपचार और अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने के प्रमाण प्रस्तुत करेंगे।”
हरिनारायण अचानक उठे।
“वह हमारा नाती है!”
न्यायाधीश ने उनकी तरफ देखा।
“और आप उसे सुरक्षित रखने में असफल रहे।”
हथौड़े की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज गई।
बाहर सरला देवी निशा के पास आईं।
“बेटी, एक बार आरव से बात करा दे।”
अदिति बीच में आ गईं।
“आदेश अभी से लागू है।”
सरला देवी वहीं रुक गईं। उनकी आँखों में पछतावा था या फिर अपने खोए अधिकार का दुख, निशा समझ नहीं पाई। हरिनारायण बिना पीछे देखे चले गए।
निशा ने फोन निकाला। आरव उसकी सहेली पायल के घर था।
“मम्मी?” उसकी आवाज़ डरी हुई थी।
निशा पहली बार खुलकर रोई।
“बेटा, कोर्ट ने कहा है कि कोई तुम्हें मजबूर नहीं करेगा। तुम सुरक्षित हो।”
कुछ पल चुप्पी रही।
फिर आरव ने पूछा, “तो आज आइसक्रीम खा सकते हैं?”
निशा हँस पड़ी, आँसुओं के बीच।
“2 खाएँगे।”
कुछ महीनों बाद विक्रम को नाबालिग पर हिंसा और गंभीर चोट पहुँचाने के मामले में सजा मिली। सरला देवी हर तारीख पर गईं। हरिनारायण भी। निशा नहीं गई। आरव भी नहीं। उन्हें किसी को गिरते देखने की जरूरत नहीं थी, उन्हें बस खुद खड़ा होना था।
समय धीरे-धीरे चला। आरव की टांग में हल्का निशान रह गया। वह फिर स्कूल जाने लगा। पहले मैदान से दूर बैठता था, फिर बच्चों को खेलते देखता, फिर एक दिन उसने खुद बैट उठाया।
गेंद आई। उसने हल्का-सा शॉट मारा। गेंद आगे गई। बच्चे चिल्लाए।
निशा स्कूल की बाउंड्री के बाहर खड़ी थी। उसकी आँखें भर आईं।
आरव ने मुड़कर कहा, “मम्मी, देखा?”
निशा ने ताली बजाई।
“बहुत अच्छा!”
उस शाम घर लौटकर उन्हें डाक में एक पत्र मिला। सरला देवी का था।
पत्र में लिखा था कि वह काउंसलिंग ले रही हैं। उन्होंने पहली बार स्वीकार किया कि उन्होंने बेटी और नाती को नहीं, अपने बेटे की छवि को बचाया। उन्होंने लिखा कि वह आरव से मिलने की माँग नहीं कर रहीं, क्योंकि अब समझती हैं कि माफी अधिकार नहीं होती, जिम्मेदारी होती है।
निशा ने पत्र पूरा पढ़ा, फिर अलमारी में रख दिया। शायद किसी दिन आरव इतना बड़ा होगा कि उसे पढ़ सके। शायद वह कभी जवाब देना चाहे। शायद नहीं।
लेकिन उस रात, जब आरव अपने कमरे में सो रहा था, निशा दरवाजे पर खड़ी होकर उसे देखती रही। उसका बच्चा अब भी थोड़ा डरता था, पर डर अब उसके जीवन का मालिक नहीं था।
बाहर गली में बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। किसी ने जोर से कहा, “छक्का!”
आरव नींद में हल्का-सा मुस्कुराया।
निशा ने धीरे से दरवाजा बंद किया।
उसने उस दिन अपना मायका खो दिया था, पर अपने बेटे का बचपन बचा लिया था। और कभी-कभी माँ होने का सबसे कठिन सच यही होता है—जिस परिवार में जन्म मिला, उसे पीछे छोड़ना पड़ता है, ताकि जिस बच्चे को जन्म दिया है, वह डर के बिना जी सके।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.