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“मां, ये बच्चा नहीं, शर्म है” — बेटी ने 66 साल की मां को क्लिनिक में सबके सामने झुकाया; लेकिन डायपर वाली थैली और पुराने भूरे लिफाफे ने बच्चों की असली चाल खोलने की शुरुआत कर दी।

भाग 1
66 साल की सावित्री देवी हाथ में नवजात बच्चों के डायपर का पैकेट पकड़े जब गायनेकोलॉजिस्ट के क्लिनिक में घुसीं और बोलीं कि उनका बच्चा कभी भी पैदा हो सकता है, तो रिसेप्शन पर बैठी लड़की के हाथ से पेन गिर गया।

लखनऊ के हजरतगंज की उस चमचमाती निजी क्लिनिक में सब कुछ महंगा और शांत था। सफेद दीवारें, कांच के दरवाजे, हल्की खुशबू, सोफे पर बैठी जवान गर्भवती औरतें, उनके साथ चिंतित पति, फाइलों में दबे अल्ट्रासाउंड। उसी जगह पर 66 साल की एक बूढ़ी औरत, सूजे हुए पेट के साथ, हाथ में डायपर और आंखों में अजीब-सी उम्मीद लेकर खड़ी थी।

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उसके पीछे उसके 3 बच्चे खड़े थे।

सबसे बड़ी बेटी निधि ने मुंह फेरकर हंसी दबाई।

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—मम्मी, धीरे बोलो, लोग सुन रहे हैं।

बड़े बेटे संजय ने मोबाइल जेब में रखते हुए तंज कसा।

—डॉक्टर से कहिएगा डिलीवरी के साथ नामकरण भी कर दें।

सबसे छोटा रोहित तो बिना शर्म कैमरा ऑन करके वीडियो बना रहा था।

—भाई, ये तो वायरल हो जाएगा। 66 की उम्र में मम्मी बनने वाली दादी।

सावित्री देवी ने नीचे देखा। उनकी उंगलियां डायपर के पैकेट पर कस गईं। वहां बैठी औरतें अब सचमुच उन्हें देख रही थीं। कुछ हैरान होकर, कुछ दया से, कुछ ऐसे जैसे किसी पागल को सभ्य जगह पर देख लिया हो।

लेकिन सावित्री पागल नहीं थीं।

कम से कम वे खुद को यही समझाती रहीं।

सब कुछ 8 महीने पहले शुरू हुआ था। पहले पेट के नीचे हल्की सूजन हुई। फिर साड़ी की पेटी कसने लगी। फिर रात को करवट बदलते समय अंदर कोई भारी चीज हिलती महसूस होती। सुबह उल्टियां, दिन भर थकान, भूख कम, और कभी-कभी पेट में ऐसा झटका जैसे भीतर किसी ने पैर मारा हो।

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एक रात वे रसोई में चाय का बर्तन धो रही थीं। अचानक पेट के अंदर जोर से कुछ सरका।

स्टील का गिलास हाथ से छूटकर जमीन पर गिरा।

सावित्री दीवार पकड़कर खड़ी रह गईं।

—हे राम… क्या सच में?

उनके पति महेश 6 साल पहले हार्ट अटैक से चले गए थे। उम्र, विधवापन, शरीर की हालत—सब कहता था कि यह असंभव है। लेकिन पास की सरकारी डिस्पेंसरी में जब उन्होंने जांच करवाई तो एक जूनियर डॉक्टर ने कुछ रिपोर्ट देखकर धीमे स्वर में कहा था कि कुछ हार्मोनल वैल्यू गर्भ जैसी लग रही हैं, हालांकि उम्र के हिसाब से मामला बहुत असामान्य है और तुरंत अच्छे स्त्री रोग विशेषज्ञ को दिखाना चाहिए।

सावित्री उस दिन डॉक्टर के पास नहीं गईं।

डर से नहीं।

उम्मीद से।

महेश के जाने के बाद उनके अपने बच्चों ने उन्हें घर की दीवार समझ लिया था। जरूरत हो तो टिक जाओ, वरना भूल जाओ। निधि महीने में 1 बार आती, दवा पूछने से पहले अलमारी की चाबी पूछती। संजय हर बातचीत में पुराने मकान की कीमत जोड़ता। रोहित बेरोजगारी के नाम पर पैसे ले जाता और मां की बीमारी को ड्रामा कहकर टाल देता।

ऐसे में उस असंभव संभावना ने सावित्री को जीने का कारण दे दिया।

उन्होंने अमीनाबाद से पीला ऊन खरीदा।

छोटे-छोटे मोजे बुने।

पुरानी लकड़ी की पालना एक कबाड़ी से खरीद लाई।

अलमारी में डायपर रखे।

और रात को पेट पर हाथ फेरकर बात करने लगीं।

—अगर तू सच में आ रहा है न, तो देर से सही, पर मुझे अकेला मत छोड़ना।

मोहल्ले में बातें फैल गईं।

—सावित्री चाची कहती हैं पेट में बच्चा है।

—अरे, इस उम्र में?

—लगता है महेश बाबू के बाद दिमाग चल गया।

बच्चों को जब पालना दिखी, तो चिंता नहीं हुई कि मां 8 महीने से दर्द सह रही है। उन्हें शर्म आई।

—मम्मी, आप हमारे खानदान की नाक कटवा रही हैं —निधि ने डांटा।

—लोग हंस रहे हैं —संजय बोला।

—आज ही बड़े डॉक्टर के पास चलना पड़ेगा —रोहित ने फैसला सुनाया।

वे मां को प्यार से नहीं लाए थे। वे उसे चुप कराने लाए थे, क्योंकि मोहल्ले की एक औरत ने फेसबुक पर लिख दिया था कि “पुरानी चौक वाली सावित्री आंटी 66 में मां बनने वाली हैं।”

डॉक्टर का नाम था डॉ. अंशुमान त्रिपाठी। उम्र करीब 55, सफेद होते बाल, गंभीर चेहरा और आंखों में ऐसी थकान जैसे उन्होंने लोगों के शरीर से ज्यादा उनके रिश्तों की बीमारी देखी हो। उन्होंने सावित्री की बात सुनी। बीच में नहीं टोका। हंसे नहीं।

—कब से सूजन है?

—करीब 8 महीने से।

—दर्द?

—नीचे रहता है। कभी-कभी बहुत भारी लगता है।

—वजन घटा है?

—हां बेटा… मतलब डॉक्टर साहब… खाना अच्छा नहीं लगता।

निधि ने बीच में कहा।

—डॉक्टर, इन्हें बच्चा-वच्चा कुछ नहीं है। इन्हें काउंसलिंग चाहिए। घर में पालना रख लिया है इन्होंने।

सावित्री ने धीमे से कहा।

—मैं बस तैयार रहना चाहती थी।

रोहित फिर मोबाइल उठाने लगा, पर डॉक्टर ने पहली बार उसे सख्त नज़र से देखा।

—फोन नीचे रखिए।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

डॉक्टर ने सावित्री को जांच वाली मेज पर लिटाया। ठंडा जेल पेट पर लगा तो उनकी आंखें बंद हो गईं। मशीन की स्क्रीन पर धुंधली काली-सफेद आकृतियां उभरने लगीं। सावित्री ने सांस रोक ली। वे एक चेहरा ढूंढ रही थीं। एक धड़कन। एक हाथ। कुछ भी, जिससे वे कह सकें कि उनका अकेलापन झूठ नहीं था।

लेकिन कमरे में कोई धड़कन नहीं गूंजी।

सिर्फ मशीन की सूखी आवाज थी।

—डॉक्टर साहब… बच्चा कहां है? —सावित्री ने कांपते स्वर में पूछा।

डॉ. अंशुमान ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने प्रोब धीरे-धीरे घुमाया। फिर दोबारा। फिर और दबाकर देखा। उनकी भौंहें सिकुड़ गईं।

संजय पास आ गया।

—सीधा बताइए डॉक्टर, प्रेग्नेंट हैं या नहीं?

डॉक्टर चुप रहे।

स्क्रीन पर एक विशाल-सी छाया थी। गोल, भारी, असामान्य। वह किसी बच्चे जैसी नहीं थी। फिर डॉक्टर का हाथ अचानक स्थिर हो गया।

उन्होंने स्क्रीन को घूरा।

फिर सावित्री को देखा।

फिर उनके 3 बच्चों को।

उनके चेहरे से खून उतर गया।

—आप तीनों बाहर जाइए —उन्होंने बेहद ठंडे स्वर में कहा।

निधि चौंकी।

—क्यों? हम इनके बच्चे हैं।

—इसीलिए कह रहा हूं। अभी बाहर जाइए।

संजय झुंझलाया।

—डॉक्टर, इतना ड्रामा क्यों कर रहे हैं?

डॉक्टर ने मेज के पास लगा लाल बटन दबा दिया। नर्स भागती हुई आई।

—सर?

डॉक्टर ने धीमे, मगर साफ शब्दों में कहा।

—इमरजेंसी रेफरल तैयार कीजिए। एम्बुलेंस बुलाइए। तुरंत।

सावित्री की आंखों में डर उतर आया।

—डॉक्टर साहब… मेरा बच्चा?

डॉक्टर ने स्क्रीन थोड़ा घुमाई। नर्स ने देखते ही मुंह पर हाथ रख लिया।

उस धुंधली विशाल गांठ के भीतर कुछ सफेद, टेढ़ा और कठोर दिखाई दे रहा था। जैसे छोटे-छोटे दांत। जैसे हड्डी। जैसे कोई डरावनी चीज, जो महीनों से सावित्री के भीतर बढ़ रही थी।

निधि के हाथ से डायपर का पैकेट गिर गया।

पीले ऊन के छोटे मोजे बैग से निकलकर फर्श पर लुढ़क गए।

और सावित्री को पहली बार समझ आया कि उनके पेट में कोई चमत्कार नहीं पल रहा था।

कुछ ऐसा पल रहा था, जो उन्हें मार सकता था।

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भाग 2

डॉ. अंशुमान ने बच्चों को बाहर रोककर स्पष्ट कर दिया कि सावित्री का भ्रम सबसे बड़ी समस्या नहीं था, असली खतरा उनके शरीर के भीतर था। उनके अंडाशय से जुड़ी एक बहुत बड़ी गांठ थी, जो कभी भी फट सकती थी, मुड़ सकती थी या कैंसर में बदल चुकी हो सकती थी। सावित्री स्ट्रेचर पर लेटी थीं और दरवाजे के बाहर अपने बच्चों की आवाजें सुन रही थीं। निधि बार-बार कह रही थी कि गलत डॉक्टर के पास आ गए, संजय खर्च का हिसाब पूछ रहा था, और रोहित पहली बार चुप था। किसी ने यह नहीं पूछा कि मां बचेगी या नहीं। अस्पताल पहुंचते ही एक सामाजिक कार्यकर्ता, मीरा नायर, उनसे मिलने आई। उसने सावित्री से पूछा कि क्या हाल में उन्होंने कोई कागज साइन किए थे। सावित्री का गला सूख गया। 15 दिन पहले निधि हलवा और दही लेकर आई थी। उसने कहा था कि सरकार की बुजुर्ग योजना के कागज हैं, ताकि बच्चे के आने से पहले सब सुरक्षित रहे। सावित्री ने बिना पढ़े 4 पन्नों पर अंगूठा और हस्ताक्षर कर दिए थे। अब मीरा के सवालों ने उनके भीतर दूसरी गांठ खोल दी। उनका पुराना मकान लखनऊ मेट्रो के विस्तार वाली सड़क के पास था, जिसकी कीमत अचानक बहुत बढ़ गई थी। बच्चे उनकी बीमारी से नहीं, उनकी संपत्ति से घबराए हुए थे। ऑपरेशन थिएटर में ले जाने से पहले निधि ने माथा छूना चाहा, मगर सावित्री ने चेहरा फेर लिया। उन्हें बेहोशी की दवा दी गई और सफेद रोशनियां आंखों में तैरती रहीं। कई घंटे बाद जब वे जागीं, पेट पर पट्टी थी और अंदर एक अजीब खालीपन। डॉ. अंशुमान ने बताया कि वह विशाल टेराटोमा था, जिसमें बाल, चर्बी, कैल्सिफिकेशन और दांत जैसी संरचनाएं थीं; नमूने जांच के लिए भेजे गए थे। सावित्री रोईं, क्योंकि उन्होंने महीनों तक बीमारी को बच्चा समझकर पुकारा था। तभी मीरा अंदर आई और बोली कि एक बूढ़ी पड़ोसन उनसे मिलना चाहती है, जो महेश बाबू की रखी हुई कोई चीज लाई है। वह थीं शकुंतला चाची, जो गली के मोड़ पर कचौड़ी बेचती थीं। उनके हाथ में पुराना भूरा लिफाफा था। उसमें मकान की असली रजिस्ट्री की कॉपी, महेश का वसीयतनामा और एक चिट्ठी थी। चिट्ठी में लिखा था कि बच्चे अपने हो सकते हैं, पर लालच अपना नहीं होता। अगले दिन जब निधि, संजय और रोहित कमरे में आए, तो उन्हें लगा मां अब भी कमजोर और अकेली है। उन्हें नहीं पता था कि तकिए के नीचे वही लिफाफा था, जो उनकी सारी चाल खोलने वाला था।

भाग 3

सावित्री ने तकिए के नीचे से भूरा लिफाफा निकाला और मेज पर रख दिया।

कमरे में तीनों बच्चों की सांस जैसे अटक गई।

निधि का चेहरा एक पल में बदल गया। अभी तक वह चिंता करने वाली बेटी बनी खड़ी थी। अब उसकी आंखों में घबराहट और गुस्सा दोनों तैर रहे थे।

—ये आपको किसने दिया?

सावित्री ने थके हुए होंठों से कहा।

—तुझे इससे मतलब नहीं होना चाहिए था, अगर तू सच में बेटी बनकर आई होती।

संजय ने लिफाफे की तरफ देखा।

—मां, आप अभी ऑपरेशन से निकली हैं। आपको आराम करना चाहिए। ये कागज बाद में देख लेंगे।

—नहीं संजय, कागज तुम लोग बाद में नहीं देखते। तुम लोग कागज पहले देखते हो, मां बाद में।

रोहित कुर्सी पर बैठ गया। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था।

—मम्मी, मुझे सच में नहीं पता था कि निधि दीदी ने क्या करवाया है।

सावित्री ने उसे देखा। उस नज़र में नाराज़गी से ज्यादा टूटन थी।

—तुझे कभी कुछ पता नहीं होता, रोहित। जब पैसे चाहिए होते हैं, तब सब पता होता है। जब जिम्मेदारी आती है, तब तू सबसे छोटा बन जाता है।

निधि ने खुद को संभाल लिया। वह वही पुरानी आवाज लाकर बोली, जिसमें वह बचपन से अपनी गलती को दूसरों की चिंता बना देती थी।

—मम्मी, आप समझ क्यों नहीं रहीं? हम आपकी सुरक्षा कर रहे थे। आप 66 की उम्र में कह रही थीं कि आप मां बनने वाली हैं। घर में पालना रख दिया था। डायपर खरीद रही थीं। मोहल्ले में लोग हंस रहे थे। अगर हमने कागज नहीं बनाए होते, तो कोई भी आपको ठग लेता।

सावित्री की आंखों में पानी भर आया, मगर आवाज साफ रही।

—मुझे बाहर वाले नहीं ठग रहे थे, निधि। मुझे मेरे अपने ठग रहे थे।

कमरे के बाहर खड़ी मीरा नायर अंदर आई। उसके साथ अस्पताल का कानूनी सलाहकार था। उसने फाइल खोली।

—निधि श्रीवास्तव, हमें नोटरी के माध्यम से तैयार एक दस्तावेज मिला है, जिसमें आप अपनी मां की मानसिक स्थिति पर सवाल उठाकर उनकी संपत्ति पर पूर्ण अधिकार मांग रही हैं। इसमें लिखा है कि सावित्री देवी लगातार भ्रम में रहती हैं और अपने निर्णय खुद नहीं ले सकतीं।

सावित्री का दिल धक से रह गया। वे जानती थीं कि कुछ गलत है, लेकिन इतना गंदा?

—तूने मुझे पागल लिखवा दिया?

निधि चिल्लाई।

—क्योंकि आप वैसे ही व्यवहार कर रही थीं!

—मैं बीमार थी।

—आप जिद्दी थीं!

—मैं अकेली थी।

—आप हमें शर्मिंदा कर रही थीं!

यह आखिरी वाक्य कमरे की दीवारों से टकराकर सावित्री के सीने में धंस गया।

शर्मिंदा।

वही बेटी, जिसके लिए सावित्री ने अपनी शादी की सोने की चूड़ियां बेचकर कॉलेज की फीस भरी थी। वही बेटा संजय, जिसकी दुकान डूबने पर उन्होंने अपनी पेंशन से 2 लाख दिए थे। वही रोहित, जिसके लिए महेश की घड़ी बेचकर उन्होंने नौकरी के इंटरव्यू के कपड़े खरीदे थे। और आज वे उन्हें मां नहीं, बोझ समझ रहे थे।

सावित्री ने धीरे से कहा।

—तुम लोगों को मेरे पेट से नहीं, मेरी सांस से शर्म थी। क्योंकि जब तक मैं सांस ले रही थी, मकान मेरा था।

संजय की गर्दन झुक गई।

—मां, बात इतनी सीधी नहीं है। उस घर की कीमत बहुत बढ़ गई है। बिल्डर ने अच्छा ऑफर दिया था। हमने सोचा—

—तुमने सोचा कि बूढ़ी औरत को हटाना आसान है।

रोहित रो पड़ा।

—मम्मी, मैं सच में डर गया था। दीदी ने कहा था कि आप किसी बाबा के चक्कर में घर दान कर देंगी।

—और इसलिए तूने अपनी मां को पागल मान लिया?

रोहित ने दोनों हाथों से चेहरा ढक लिया।

—मैं कायर निकला।

—हां —सावित्री ने धीमे से कहा— पर कायर होना और लालची होना अलग बात है। अब देखना है तू कौन है।

मीरा ने साफ कर दिया कि अस्पताल की तरफ से बुजुर्ग आर्थिक शोषण की रिपोर्ट दर्ज होगी। जब तक सावित्री स्वस्थ होकर स्वतंत्र कानूनी सलाह न लें, कोई दस्तावेज मान्य नहीं माना जाएगा। निधि ने विरोध किया, धमकाया, रोई, फिर बोली कि मां को बच्चे भड़का रहे हैं। लेकिन इस बार कमरे में कोई उसकी भाषा से नहीं डरा।

सावित्री ने पहली बार अपने बच्चों को बाहर जाने के लिए कहा।

—मुझे आराम करना है। और हां, मेरी चाबी किसी के पास हो तो आज ही वापस कर देना।

निधि ने तिरछी नज़र से देखा।

—आप हमें घर से निकाल रही हैं?

—नहीं। मैं अपने जीवन में दरवाजा लगा रही हूं।

तीनों बाहर चले गए। रोहित सबसे आखिर में रुका।

—मम्मी, मैं कल आ सकता हूं?

—अगर सच बोलने आओगे तो आना। बहाना लेकर आओगे तो मत आना।

वह सिर झुकाकर चला गया।

अगले 7 दिन सावित्री के लिए शरीर और आत्मा दोनों की लड़ाई थे। पैथोलॉजी रिपोर्ट में शुरुआती स्तर की खतरनाक कोशिकाएं मिलीं, मगर गांठ पूरी तरह निकाल दी गई थी। डॉक्टर ने कहा कि नियमित जांच, दवाएं और सावधानी जरूरी रहेगी, पर जान बच गई है।

डॉ. अंशुमान ने कहा।

—आप समय पर आ गईं, सावित्री जी। थोड़ा और इंतजार होता तो मामला बहुत बिगड़ सकता था।

सावित्री ने सोचा, वे समय पर नहीं आई थीं। उन्हें तो घसीटकर लाया गया था। वे तो महीनों तक अपने पेट से लोरी जैसी बातें करती रहीं। पर शायद शरीर भी कभी-कभी अजीब रास्ते से बचाता है। जिस चीज को वे बच्चा समझ रही थीं, वही उनकी चीख थी।

शकुंतला चाची रोज अस्पताल आतीं। कभी घर का दलिया, कभी नारियल पानी, कभी बस अपनी डांट लेकर।

—अरी पगली, दर्द था तो बोली क्यों नहीं?

सावित्री हल्की मुस्कान से कहतीं।

—किससे बोलती?

शकुंतला की आंखें भर आतीं।

—अब मुझसे बोलना। चाहे आधी रात हो।

20 दिन बाद सावित्री घर लौटीं। पुरानी गली के मोड़ पर कुछ लोग खड़े थे। वही लोग जो कभी फुसफुसाते थे, अब हाथ जोड़कर पूछ रहे थे कि तबीयत कैसी है। किसी ने दरवाजा धोया था। किसी ने आंगन बुहारा था। तुलसी सूखने से बच गई थी, क्योंकि शकुंतला चाची रोज पानी दे जाती थीं।

कमरे में वह पालना अब भी खिड़की के पास रखा था।

सावित्री उसके सामने काफी देर तक खड़ी रहीं।

उस पालने में कोई बच्चा कभी नहीं सोया था। वहां उनकी उम्मीद सोई थी। उनका भ्रम। उनका अकेलापन। उनका अपमान। और कहीं न कहीं, उनका बचना भी।

उन्होंने धीरे-धीरे पालने की चादर हटाई, लकड़ी पोंछी और अगले दिन उसमें मिट्टी भरवाई। शकुंतला चाची हंसती रहीं।

—बच्चे की जगह पौधे पालोगी?

सावित्री ने तुलसी, मोगरा, धनिया और एक छोटी-सी चमेली लगाते हुए कहा।

—कुछ तो जन्म लेना चाहिए यहां।

पीले मोजे उन्होंने नहीं फेंके। उन्हें महेश की चिट्ठी के साथ एक पीतल के डिब्बे में रख दिया। अब वे शर्म की चीज नहीं थे। वे सबूत थे कि एक औरत की ममता कभी-कभी गलत जगह चली जाती है, पर उसका अपमान करने का हक किसी को नहीं मिलता।

रोहित सबसे पहले वापस आया। उसके हाथ में फल थे, पर सावित्री ने फल नहीं देखे। उन्होंने उसकी आंखें देखीं। इस बार उसमें कैमरे वाली हंसी नहीं थी।

—मम्मी, मैं आपकी वीडियो बनाने आया था उस दिन। मुझे लगा मजाक है। मैं… मैं बहुत छोटा निकला।

—छोटा उम्र से नहीं, सोच से होता है।

—मैं बदलना चाहता हूं।

सावित्री ने दरवाजा पूरा नहीं खोला। बस इतना खोला कि बात हो सके।

—बदलना है तो कल सुबह 8 बजे आना। दवाई लेने जाना है, बिजली का बिल भरना है, और फिर बैठकर वह वीडियो डिलीट करना है जो तूने बनाया था। मेरे सामने।

रोहित ने तुरंत सिर हिलाया।

अगली सुबह वह सचमुच आया। पहली बार बिना इयरफोन, बिना जल्दबाजी। उसने वीडियो डिलीट किया, फिर “रिसेंटली डिलीटेड” से भी हटाया। फिर मां को अस्पताल ले गया। रास्ते भर चुप रहा। सावित्री ने भी उसे तुरंत माफ नहीं किया। लेकिन उसने उसे एक मौका दिया, क्योंकि गलती मानने वाले इंसान में अभी कुछ बाकी होता है।

संजय 3 हफ्ते बाद आया। वह दवाइयां, नहाने की कुर्सी और ग्लूकोमीटर लेकर आया था। उसके चेहरे पर अपराधबोध था, पर सावित्री अब दया से जल्दी नहीं पिघलती थीं।

—मां, मैं पैसों में उलझ गया था।

—नहीं संजय, तू लालच में उलझा था। पैसे जरूरत होते हैं, लालच फैसला बन जाता है।

—मैंने सोचा था घर बेच देंगे तो सबको फायदा होगा।

—मुझे पूछे बिना सबको? मैं जिंदा थी या सिर्फ रजिस्ट्री?

संजय रो पड़ा।

—मां, मुझसे गलती हुई।

—गलती तब होती है जब पैर फिसले। जब कोई बूढ़ी मां को मानसिक रूप से अयोग्य साबित करके उसका घर लेना चाहे, उसे गलती नहीं कहते। उसे चरित्र कहते हैं।

संजय के पास कोई जवाब नहीं था।

निधि नहीं आई।

वह सीधे कानूनी नोटिस लेकर आई।

2 महीने बाद परिवार अदालत जैसे माहौल वाली एक सुनवाई में सावित्री को जाना पड़ा। निधि ने साड़ी पहन रखी थी, माथे पर छोटी बिंदी, आंखों में बनावटी आंसू। उसने कहा कि वह सिर्फ मां की भलाई चाहती थी। उसने कहा कि सावित्री मानसिक रूप से अस्थिर थीं। उसने कहा कि कोई भी समझदार व्यक्ति 66 की उम्र में गर्भ का दावा नहीं करेगा।

सावित्री ने अपना बैग खोला। पीले मोजे निकाले और मेज पर रख दिए।

कमरे में बैठे लोग कुछ पल उन्हें देखते रहे।

फिर सावित्री बोलीं।

—ये मैंने उस बच्चे के लिए बनाए थे, जो कभी था ही नहीं। हां, मैं गलत समझी। हां, मैंने बीमारी को उम्मीद मान लिया। लेकिन मेरी गलती ने किसी को मेरे घर का मालिक नहीं बना दिया। मेरे पेट में बच्चा नहीं था, पर दर्द था। बीमारी थी। मौत की आहट थी। मेरे बच्चों ने मुझे डॉक्टर तक इसलिए नहीं लाया कि मैं बच जाऊं। वे मुझे इसलिए लाए कि मेरा मजाक बंद हो जाए और कागज जल्दी पूरे हो जाएं।

निधि ने कुछ कहना चाहा, पर सलाहकार ने उसे रोका।

सावित्री ने आगे कहा।

—बूढ़ी औरत जब दर्द बताती है, तो लोग कहते हैं नाटक। जब डर बताती है, तो कहते हैं पागल। जब संपत्ति बचाती है, तो कहते हैं जिद्दी। मैं आज यह कहने आई हूं कि मैं बूढ़ी हूं, पर बेअक्ल नहीं। मैं अकेली हूं, पर लावारिस नहीं। और मैं मां हूं, लेकिन किसी की जेब नहीं।

सुनवाई में निधि के दस्तावेज रद्द कर दिए गए। सावित्री की संपत्ति पर किसी भी तरह के हस्तांतरण के लिए स्वतंत्र मेडिकल मूल्यांकन, अलग कानूनी सलाह और उनकी प्रत्यक्ष उपस्थिति अनिवार्य कर दी गई। अस्पताल की रिपोर्ट के आधार पर आर्थिक शोषण की जांच शुरू हुई। निधि पर जेल नहीं हुई, पर उसका झूठ रिकॉर्ड में दर्ज हो गया। कभी-कभी दुनिया की सबसे बड़ी सजा यही होती है कि आदमी अपने असली चेहरे के साथ कागज पर पकड़ा जाए।

कुछ महीने बाद सावित्री ने अपनी वसीयत बदली। मकान तीनों बच्चों में बांटने के बजाय उन्होंने तय किया कि उनके बाद वह जगह बुजुर्ग औरतों के दिन-देखभाल केंद्र के रूप में इस्तेमाल होगी। वहां मुफ्त जांच शिविर लगेंगे, कानूनी सलाह मिलेगी, और मोहल्ले की अकेली औरतें दिन में आकर बैठ सकेंगी।

उसका नाम उन्होंने रखा—पीले मोजों वाला आंगन।

शकुंतला चाची ने माथा पीट लिया।

—नाम सुनकर लोग समझेंगे बच्चों की दुकान है।

सावित्री ने मुस्कुराकर कहा।

—हम बूढ़ी औरतों को भी फिर से जीना सीखना पड़ता है, जैसे नए बच्चे सीखते हैं।

धीरे-धीरे घर बदलने लगा। खिड़की के पास पालने में लगे पौधे फैलने लगे। चमेली में फूल आए। तुलसी घनी हुई। सावित्री की चाल अभी भी धीमी थी, मगर उनकी आवाज अब कांपती नहीं थी।

रोहित हर मंगलवार उन्हें अस्पताल ले जाता। संजय महीने का खर्चा भेजता, पर सावित्री हर बार हिसाब लिखवातीं। निधि कभी-कभी फोन करती, पर सावित्री हर कॉल नहीं उठातीं। पहले वे बच्चों की आवाज पर दौड़ती थीं। अब वे सोचती थीं कि कौन-सा दरवाजा खोलना है।

एक शाम सावित्री खिड़की के पास बैठी थीं। बाहर गली में बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। पालने में चमेली की खुशबू थी। उनके हाथ में महेश की चिट्ठी थी, गोद में वही पीला मोजा।

उन्होंने पेट की तरफ हाथ ले जाकर अपनी लंबी सर्जरी की रेखा को छुआ।

वह निशान दर्द का था।

पर वही निशान उनकी वापसी का भी था।

जिस पेट को लोग तमाशा समझ रहे थे, उसी ने उन्हें सच दिखाया। जिस बीमारी को उन्होंने बच्चा समझकर पुकारा, उसी ने उनके बच्चों का चेहरा खोल दिया। और जिस घर को सब बेच देना चाहते थे, वही अब उन औरतों का सहारा बनने वाला था, जिन्हें घर में रहकर भी कोई नहीं सुनता।

रात गहराने लगी। दरवाजे पर दस्तक हुई।

सावित्री ने तुरंत दरवाजा नहीं खोला।

वे उठीं, धीरे-धीरे खिड़की तक गईं, बाहर देखा, फिर अपने मन से पूछा कि यह दस्तक प्यार की है या जरूरत की।

पहले वे बिना सोचे खोल देती थीं।

अब वे तय करती थीं।

क्योंकि वह मकान अब भी उनका था।

उनकी चाबी अब भी उनकी थी।

और सबसे बड़ी बात, सावित्री देवी अब खुद भी अपनी थीं।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.