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महंगे आईसीयू में 5 डॉक्टरों ने 8 साल के बेटे को मृत मान लिया, तभी पुराने जूतों वाला एक मजदूर चिल्लाया: “इंजेक्शन रोकिए”, और मां को पता चला कि असली गलती इलाज में नहीं, अहंकार में छिपी थी

भाग 1

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मॉनिटर की सीधी रेखा देखते ही रैना मेहरा अपने 8 साल के बेटे इशान के बिस्तर के पास घुटनों के बल गिर गई, और दिल्ली के सबसे महंगे निजी अस्पताल के 5 डॉक्टर पीछे हटकर चुप हो गए।

कमरे में मशीनों की हल्की आवाज थी, एंटीसेप्टिक की गंध थी, और उस औरत की टूटी हुई सांसें थीं, जिसे पूरा गुरुग्राम लोहे की औरत कहता था। रैना मेहरा, मेहरा इंफ्राटेक की मालिक, करोड़ों की डील्स पर बिना पलक झपकाए हस्ताक्षर करने वाली महिला, अपने बेटे की ठंडी होती उंगलियां पकड़कर बार-बार कह रही थी, “इशान, मम्मा यहां है… बेटा आंख खोलो…”

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लेकिन इशान नहीं हिला।

कुछ ही देर पहले वही बच्चा नीचे बने बैंक्वेट हॉल में अपनी मां के साथ बैठा था। अस्पताल के बच्चों के हार्ट सेंटर के लिए चैरिटी शाम रखी गई थी। सफेद फूल, चमकती झूमर लाइटें, बड़े उद्योगपति, फिल्मी चेहरे, डॉक्टर, ट्रस्ट के सदस्य—सब कुछ वैसा ही था जैसा दिल्ली की अमीर दुनिया को पसंद था। रैना मुख्य दानदाता थी। उसने उसी शाम 25 करोड़ देने की घोषणा की थी।

उसी हॉल के पिछले दरवाजे के पास आरिफ कुरैशी तारों का एक उलझा हुआ बॉक्स ठीक कर रहा था। 41 साल का आरिफ एक साधारण इलेक्ट्रिकल ठेकेदार था। उसके पुराने जूते, फीकी शर्ट और चुप चेहरा उस जगह से मेल नहीं खाते थे। उसकी 7 साल की बेटी सना पास की कुर्सी पर बैठी रंग भर रही थी, क्योंकि पड़ोस वाली आंटी अचानक गांव चली गई थीं और सना को घर पर छोड़ना संभव नहीं था।

लोगों ने आरिफ को देखा भी नहीं। वे उसे बस स्टाफ समझकर रास्ते से हटाते रहे। किसी को नहीं पता था कि वही आदमी 3 साल पहले सेना की मेडिकल यूनिट में था, सीमा पर घायल जवानों की धड़कनें हाथ से संभाल चुका था, और अपनी पत्नी नाज़िया की मौत के बाद उसने अस्पतालों से मुंह मोड़ लिया था।

भाषण चल रहा था जब भीड़ में हलचल हुई। किसी मेहमान की कोहनी इशान के सीने से टकराई। टक्कर मामूली थी। बच्चा बस 1 पल के लिए सिमटा, फिर बोला, “मैं ठीक हूं, मम्मा।” रैना ने उसका कॉलर ठीक किया और फिर मंच की तरफ देखने लगी।

4 मिनट बाद इशान का चेहरा सफेद पड़ गया। उसने मां का हाथ पकड़ा, होंठ नीले हुए और शरीर कुर्सी से ढलक गया।

डॉक्टरों ने तुरंत कहा, “एलर्जी शॉक है।” इंजेक्शन, ऑक्सीजन, दवाएं, आईसीयू—सब कुछ बिजली की रफ्तार से हुआ। रैना को बाहर रोक दिया गया। आरिफ दूर से देखता रहा, क्योंकि उसे लगा अंदर डॉक्टर हैं, उसे बीच में नहीं बोलना चाहिए।

लेकिन 1 घंटे बाद जब उसने कांच के पार मॉनिटर देखा, उसका दिल बैठ गया। बच्चे के चेहरे पर एलर्जी की सूजन नहीं थी। त्वचा पर चकत्ते नहीं थे। सांस की नली बंद होने जैसा कुछ नहीं था। असली खतरा धड़कन की लय में छिपा था।

आरिफ धीरे से दरवाजे की ओर बढ़ा।

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नर्स ने उसे रोकना चाहा। सुरक्षा गार्ड भी मुड़ा। लेकिन वह अंदर चला गया और सीधे सबसे वरिष्ठ डॉक्टर से बोला, “आप लोग गलत बीमारी का इलाज कर रहे हैं।”

कमरे में सब जम गए।

रैना ने आंखों में आग लेकर पूछा, “तुम हो कौन?”

आरिफ ने जवाब नहीं दिया। उसने सिर्फ मॉनिटर की तरफ इशारा किया और कहा, “अगला इंजेक्शन दिया तो इसका दिल और बिगड़ सकता है।”

उसी पल नर्स के हाथ में भरा हुआ इंजेक्शन हवा में रुक गया।

भाग 2

डॉ. सरीन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। “इसे बाहर निकालिए,” उन्होंने सुरक्षा गार्ड से कहा। “यह आईसीयू है, कोई सड़क का तमाशा नहीं।”

आरिफ ने हिलना भी जरूरी नहीं समझा। उसकी नजर सिर्फ इशान की धड़कन पर थी। “सीने पर हल्की चोट लगी थी। इसके बाद रंग बदला। एलर्जी में सूजन होती, चकत्ते होते। यहां समस्या दिल की बिजली में है। आप लोग उसे तेज कर रहे हैं।”

रैना ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। पुराने जूते, थकी आंखें, मगर आवाज में न लालच था, न डर। सना बाहर कांच के पास खड़ी रो रही थी, क्योंकि उसने अपने पिता को गार्डों के बीच देखा था। आरिफ ने बस 1 बार बेटी की तरफ देखा, जैसे कह रहा हो—डरो मत।

डॉ. सरीन ने अनिच्छा से मॉनिटर देखा। 7 सेकंड तक कमरे में सिर्फ मशीन की आवाज रही। फिर उनका चेहरा बदल गया।

“इंजेक्शन रोक दो,” उन्होंने धीमे से कहा। “तुरंत हार्ट इको कराओ।”

रैना का गुस्सा डर में बदल गया। “अगर मेरा बेटा…”

“मैडम,” डॉ. सरीन ने बीच में कहा, “हमें काम करने दीजिए।”

नई जांच में दिल की दीवार में जन्मजात कमजोरी दिखी, जो कभी पकड़ी ही नहीं गई थी। सीने की मामूली चोट ने उसी कमजोरी को जगा दिया था। दवा बदली गई। धड़कन धीरे-धीरे संभलने लगी। इशान की उंगलियां हिलीं तो रैना ने मुंह पर हाथ रख लिया।

सुबह होते-होते खबर फैल गई—“बिना डिग्री वाला आदमी करोड़पति महिला के बेटे के इलाज में घुसा।” अस्पताल ने जांच बैठा दी। 2 डॉक्टरों ने बयान दिया कि आरिफ ने इलाज में बाधा डाली।

रैना चुप रही।

रात 12 बजे इशान की हालत फिर बिगड़ गई।

और उसी समय रैना को लॉबी में वही आदमी दिखा—आरिफ कुरैशी, जो जाने के बाद भी अस्पताल के बाहर से गया नहीं था।

भाग 3

रैना ने लॉबी में कदम रखते ही अपनी सारी ऊंची हैसियत दरवाजे पर छोड़ दी। वह अब उद्योगपति नहीं थी, किसी बोर्ड मीटिंग की अध्यक्ष नहीं थी, मीडिया की आदत वाली महिला नहीं थी। वह सिर्फ एक मां थी जिसका बच्चा ऊपर किसी कमरे में जिंदगी से लड़ रहा था।

“वह फिर से जा रहा है,” उसने आरिफ से कहा। उसकी आवाज कांप नहीं रही थी, लेकिन वह टूट चुकी थी। “डॉक्टर कह रहे हैं कि स्थिर नहीं हो पा रहा। सर्जरी का फैसला नहीं कर पा रहे।”

आरिफ खड़ा हुआ। उसने कोई विजय भाव नहीं दिखाया, जैसे उसे पहले से साबित होने की खुशी हो। उसके चेहरे पर सिर्फ थकान और डर था।

“कल जो इको हुआ था,” उसने पूछा, “सीने के ऊपर से सामान्य कोण में हुआ था?”

रैना ने भौंचक होकर देखा। “मुझे नहीं पता। तुम कहना क्या चाहते हो?”

“दिल की एक जगह ऐसे कोण से छिप सकती है। अगर दूसरी रुकावट है, तो सामान्य जांच में नहीं दिखेगी। बच्चे को थोड़ा झुकाकर, पेट की तरफ से तिरछा दृश्य लेना होगा। सेना में जब पूरी मशीन नहीं होती थी, हम कई बार इसी तरह छिपी चोट पकड़ते थे।”

रैना की आंखें सिकुड़ गईं। “तुमने यह कल क्यों नहीं कहा?”

आरिफ ने पहली बार नजरें झुका लीं। उसके भीतर 3 साल पुराना दरवाजा खुला।

“क्योंकि यह कहने का मतलब था कि मैं फिर वही आदमी बन जाऊं, जिसे मैंने दफना दिया था।”

रैना चुप रही।

लॉबी की पीली रोशनी में आरिफ ने अपनी पत्नी नाज़िया की कहानी बताई। वह नर्स नहीं थी, डॉक्टर नहीं थी, बस एक स्कूल टीचर थी जो लगातार थकान और सीने में अजीब भारीपन की शिकायत करती थी। आरिफ ने पैटर्न पहचान लिया था। उसने डॉक्टर से कहा था कि एक खास कोण से हार्ट स्कैन दोबारा करिए। डॉक्टर मुस्कुराया था, “आपकी फौजी ट्रेनिंग युद्ध क्षेत्र के लिए ठीक होगी, लेकिन यहां क्लिनिकल निर्णय हम लेते हैं।”

आरिफ चुप हो गया था।

उसने सोचा था कि शायद वह सीमा पार कर रहा है। शायद पत्नी के डर ने उसे ज्यादा शक करने वाला बना दिया है। शायद डॉक्टर सही हैं। 7 दिन बाद नाज़िया बाथरूम में गिर गई। अस्पताल पहुंचने से पहले उसकी सांस बंद हो चुकी थी। बाद की जांच में वही छिपी हुई दिल की समस्या निकली, जिसे अलग कोण से देखा जा सकता था।

मेडिकल बोर्ड ने कहा—आरिफ की कोई कानूनी गलती नहीं थी।

लेकिन आरिफ जानता था कि गलती कानून की किताब में नहीं, उसके गले में अटकी चुप्पी में थी।

“मैंने उसे बचाने के लिए काफी जोर नहीं दिया,” उसने कहा। “उस दिन से मैं अस्पतालों से दूर रहा। तार जोड़ता हूं, पंखे ठीक करता हूं, बिल भरता हूं, सना को स्कूल छोड़ता हूं। लेकिन कल तुम्हारे बेटे को देखकर लगा, अगर इस बार भी चुप रहा तो मैं जीते जी दूसरी बार मर जाऊंगा।”

रैना ने उसे लंबे समय तक देखा। यह कोई आदमी नहीं था जो नाम चाहता था। यह कोई झूठा हीरो नहीं था। यह एक घायल इंसान था, जो अपनी ही चुप्पी की राख से हाथ निकालकर किसी और बच्चे की धड़कन पकड़ने आया था।

वह मुड़ी और तेज कदमों से कार्डियक यूनिट की तरफ चली गई।

ड्यूटी पर डॉ. मीरा अय्यर थीं। वह काबिल डॉक्टर थीं, लेकिन 14 घंटे से जाग रही थीं। उनके आसपास जूनियर डॉक्टर, नर्सें, मशीनें, अलार्म और बेचैन आदेशों का शोर था।

रैना सीधे उनके सामने खड़ी हो गई। “बाहर एक आदमी है। सेना में मेडिकल असिस्टेंट था। उसने कल मेरे बेटे की जान बचाई थी। वह कह रहा है कि आपकी इमेजिंग में दूसरी रुकावट छूट गई है।”

डॉ. अय्यर ने माथा सिकोड़ा। “मैडम, यह वक्त बाहरी सलाह सुनने का नहीं है।”

“मेरा बेटा मर रहा है,” रैना ने बेहद शांत आवाज में कहा। “अगर वह गलत है, तो आप 4 मिनट गंवाएंगी। अगर वह सही है, तो आपको रास्ता मिल जाएगा। फैसला आपका है।”

कमरे में मौजूद सबने उस वाक्य का वजन महसूस किया।

डॉ. अय्यर ने 1 लंबी सांस ली और दरवाजे की ओर इशारा किया। “उसे अंदर बुलाइए।”

आरिफ आया तो किसी ने उसका स्वागत नहीं किया। न किसी ने उसे धन्यवाद कहा। न किसी ने कुर्सी दी। वह खुद भी किसी आदर की उम्मीद लेकर नहीं आया था। उसने इको तकनीशियन को शांत आवाज में बताया कि बच्चे को थोड़ा बाईं तरफ झुकाना होगा, प्रोब को निचले हिस्से से तिरछा घुमाना होगा, और दिल की उस जोड़ वाली जगह को पकड़ना होगा जहां सामान्य जांच सिर्फ साफ दीवार दिखा रही थी।

तकनीशियन पहले झिझकी। फिर डॉ. अय्यर ने सिर हिलाया। “करो।”

स्क्रीन पर धुंधली लकीरें आईं। कुछ सेकंड कुछ नहीं दिखा। आरिफ ने धीरे से कहा, “थोड़ा और तिरछा… नहीं, इतना नहीं… अब रोकिए…”

और फिर स्क्रीन पर एक संकरी सी जगह चमकी।

डॉ. अय्यर आगे झुकीं। उनकी आंखों में थकान गायब हो गई। “यहीं है,” उन्होंने लगभग फुसफुसाकर कहा। “दूसरी रुकावट…”

कमरा अचानक तेजी से चलने लगा। कार्डियक सर्जन को फोन गया। कैथेटर आधारित प्रक्रिया की तैयारी शुरू हुई। इशान की हालत खराब थी, मगर अब डॉक्टरों के पास अंधेरे में हाथ मारने की जगह लक्ष्य था। हर मिनट की कीमत थी।

रैना ने कांच के बाहर से अपने बेटे को देखा। छोटा सा शरीर, तारों से घिरा, चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क। उसे याद आया कि सुबह इसी बच्चे ने टीवी रिमोट मांगा था। उसे याद आया कि हॉल में वह ब्लेजर का कॉलर खींच रहा था और उसने झुंझलाकर उसका हाथ हटा दिया था। उसे लगा, मां होना कई बार बड़ी-बड़ी कुर्बानियों में नहीं, उन्हीं छोटे स्पर्शों में छिपा होता है जिन्हें खोने तक उनकी कीमत समझ नहीं आती।

सर्जन 38 मिनट में पहुंचा। उसने इमेज देखी, 3 सवाल पूछे, और बिना समय गंवाए कहा, “हम अभी करेंगे।”

इशान को अंदर ले जाया गया।

रैना बाहर की कुर्सी पर बैठ गई। आरिफ थोड़ी दूरी पर दीवार से टिककर खड़ा था। सना को पड़ोस वाली नर्स ने दूध दिया था, वह लॉबी की कुर्सी पर सो रही थी। रैना ने पहली बार उस बच्ची को देखा—पतले हाथ, स्कूल की पुरानी फ्रॉक, बालों में ढीली चोटी। उसे लगा, इस आदमी ने अपनी बेटी को लेकर किसी महंगे अस्पताल के कोने में पूरी रात काट दी, सिर्फ इसलिए कि उसके भीतर की आवाज उसे जाने नहीं दे रही थी।

“तुम्हारी बेटी को डर लग रहा होगा,” रैना ने कहा।

“उसे आदत है,” आरिफ ने धीरे से जवाब दिया। “मैं कोशिश करता हूं कि उसे आदत न पड़े। मगर जिंदगी हमेशा पूछकर नहीं आती।”

रैना ने अपने हाथों को देखा। वे वही हाथ थे जो करोड़ों के कागजों पर हस्ताक्षर करते थे। लेकिन आज वे बेकार थे। न पैसा भीतर जा सकता था, न आदेश, न प्रभाव। भीतर सिर्फ डॉक्टरों के हाथ काम कर रहे थे, और वह आदमी जिसने सही जगह देखने की जिद की।

“मैंने तुम्हारे बारे में पता करवाया था,” रैना ने कहा।

आरिफ हल्का सा मुस्कुराया। “अमीर लोग पहले विश्वास नहीं करते, जांचते हैं।”

रैना को वह जवाब चुभा, क्योंकि वह सच था।

“मुझे लगा तुम शायद फायदा उठाना चाहते हो।”

“तुम्हारा ऐसा सोचना गलत नहीं था,” उसने कहा। “इस देश में गरीब आदमी अगर अमीर के कमरे में सच बोल दे, तो पहले उसका इरादा जांचा जाता है, बात बाद में।”

रैना के पास उस वाक्य का कोई उत्तर नहीं था।

सुबह 4 बजकर 6 मिनट पर सर्जन बाहर आया। उसके मास्क पर थकान थी, मगर आंखों में राहत थी।

“प्रक्रिया सफल रही,” उसने कहा। “रुकावट बंद कर दी गई है। जन्मजात कमजोरी को भी उपकरण से सहारा दे दिया गया है। अगले कुछ दिन निगरानी रहेगी, लेकिन आपका बेटा सामान्य जीवन जी सकेगा।”

रैना ने कुछ नहीं कहा। उसने बस दीवार पकड़ ली, जैसे जमीन अचानक दूर चली गई हो। फिर वह धीरे-धीरे आरिफ की ओर मुड़ी।

“धन्यवाद,” उसने कहा।

2 शब्द। मगर उन 2 शब्दों में उसका डर, उसका गर्व, उसकी टूटी हुई अकड़, उसकी मां होने की पूरी असहायता और उसका बचा हुआ संसार सब था।

आरिफ ने सिर झुका लिया। “वह 8 साल का है। बस इतना काफी था।”

अगले 3 दिन में कहानी अस्पताल की दीवारों से बाहर निकल गई। कुछ चैनलों ने आरिफ को “चमत्कारी मजदूर” कहा। कुछ ने सवाल उठाया कि बिना डिग्री वाले आदमी को आईसीयू में क्यों आने दिया गया। सोशल मीडिया पर लोग लड़ने लगे—कोई कहता डॉक्टरों का अपमान हुआ, कोई कहता गरीब आदमी की समझ अमीरों की डिग्री से बड़ी निकली।

अस्पताल प्रशासन ने पहले खुद को बचाने की कोशिश की। 2 डॉक्टरों ने लिखा कि इलाज टीम ने खुद सुधारा था, बाहरी व्यक्ति की भूमिका सीमित थी। लेकिन डॉ. सरीन ने सच बयान किया। डॉ. अय्यर ने भी साफ लिखा कि दूसरी इमेजिंग का सुझाव आरिफ ने दिया था और उससे सर्जरी की दिशा तय हुई।

रैना ने इस बार चुप्पी नहीं चुनी।

उसने प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की। कैमरों के सामने रोई नहीं। उसने बस अस्पताल ट्रस्ट की बैठक बुलाई। जिस बाल हृदय केंद्र के लिए उसने 25 करोड़ दिए थे, उसके साथ नई शर्त जोड़ी—हर जोखिम वाले बच्चे की गहरी कार्डियक स्क्रीनिंग, सिर्फ सामान्य जांच नहीं। तकनीशियन ट्रेनिंग में वह तिरछा दृश्य शामिल किया गया, जिसे आरिफ ने दिखाया था। गरीब बच्चों के लिए अलग फंड बना, ताकि ऐसी छिपी बीमारी पैसे के कारण अनदेखी न रहे।

बोर्ड में किसी ने पूछा, “क्या यह सब 1 घटना पर आधारित भावनात्मक निर्णय नहीं है?”

रैना ने उसे देखा और कहा, “मेरे बेटे की धड़कन भावनात्मक घटना नहीं थी। वह चिकित्सा की गलती से बची हुई जिंदगी थी।”

कमरा चुप हो गया।

आरिफ को पैसे देने की बात भी आई। रैना ने खुद उससे पूछा, “तुम क्या चाहते हो?”

वह कुछ देर चुप रहा। “सना की पढ़ाई सुरक्षित रहे। और अगर संभव हो तो मुझे फिर से ट्रेनिंग में लौटने का मौका मिले। मैं डॉक्टर नहीं बनना चाहता। पर शायद मैं अपने हाथों को सिर्फ तार जोड़ने तक सीमित करके गलत कर रहा हूं।”

रैना ने उसी महीने अस्पताल के आपात प्रशिक्षण कार्यक्रम में उसके लिए सलाहकार पद बनवाया। नाम बड़ा नहीं था, वेतन बहुत चमकदार नहीं था, मगर काम वही था जिससे वह भाग रहा था—लोगों को यह सिखाना कि संकट में शरीर क्या कहता है, और कब प्रोटोकॉल से ज्यादा जरूरी होता है सही सवाल पूछना।

पहले दिन जब वह प्रशिक्षण कक्ष में गया, उसके हाथ हल्के कांपे। सामने नर्सें, पैरामेडिक छात्र, जूनियर डॉक्टर बैठे थे। उसे लगा जैसे नाज़िया पीछे खड़ी है और पूछ रही है—इस बार चुप रहोगे?

उसने बोर्ड पर लिखा, “चुप्पी भी निर्णय होती है।”

फिर उसने पढ़ाना शुरू किया।

इशान 2 हफ्ते बाद घर लौटा। डॉक्टरों ने उसे क्रिकेट से कुछ महीनों की दूरी रखने को कहा। उसने मुंह बनाया, फिर पूछा, “तो कैरम खेल सकता हूं?” रैना हंस पड़ी। कई दिनों बाद उसकी हंसी कमरे में सचमुच गूंजी।

कुछ समय बाद इशान ने आरिफ को मिलने बुलाया। सना भी साथ आई। वह शर्माते हुए इशान के लिए रंगों का डिब्बा लाई थी। इशान ने उसे अपनी बनाई ड्राइंग दिखाई—एक बड़ा अस्पताल, बीच में एक छोटा बच्चा, एक तरफ सफेद कोट वाले डॉक्टर, दूसरी तरफ पुराने जूते पहने एक आदमी। उस आदमी को उसने सबसे लंबा बनाया था।

आरिफ ने ड्राइंग देखी तो उसकी आंखें भर आईं। उसने जल्दी से चेहरा फेर लिया, मगर सना ने देख लिया। उसने अपने पिता की उंगली पकड़ ली।

“अब्बू, आप रो रहे हो?”

“नहीं,” आरिफ ने कहा। “बस आंख में रोशनी ज्यादा है।”

इशान ने मासूमियत से पूछा, “आप डॉक्टर क्यों नहीं हैं?”

कमरे में हल्की चुप्पी फैल गई।

आरिफ ने झुककर कहा, “कभी-कभी इंसान अपने नाम से ज्यादा अपने काम से पहचाना जाता है।”

इशान ने सोचा, फिर बोला, “तो आप मेरे दिल वाले अंकल हो।”

रैना ने उस वाक्य को अपने भीतर उतरते महसूस किया। दुनिया ने आरिफ को मजदूर, घुसपैठिया, खतरा, बिना डिग्री वाला आदमी कहा था। एक बच्चे ने उसे सबसे सही नाम दे दिया था।

उस शाम आरिफ घर लौटा तो सना सो चुकी थी। उसने इशान की ड्राइंग फ्रिज पर लगा दी। उसके बगल में नाज़िया की पुरानी तस्वीर थी—हल्की मुस्कान, आंखों में वही भरोसा जिसे वह कभी बचा नहीं पाया था।

वह लंबे समय तक दोनों को देखता रहा।

3 साल से उसके भीतर जो अपराधबोध पत्थर की तरह जमा था, वह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। शायद कुछ दर्द कभी पूरी तरह जाता भी नहीं। लेकिन पहली बार वह दर्द उसे कुचल नहीं रहा था। वह बस याद दिला रहा था कि प्रेम का मतलब हमेशा बचा लेना नहीं होता, कभी-कभी अगली बार किसी और को बचाने की हिम्मत जुटा लेना भी होता है।

शहर के बाहर हल्की बारिश शुरू हो गई थी। दिल्ली की सड़कें भीग रही थीं। महंगे अस्पतालों के भीतर मशीनें अब भी बीप कर रही थीं, छोटे घरों में मांएं अब भी बच्चों का माथा छूकर ताप देख रही थीं, और कहीं न कहीं कोई गरीब आदमी अब भी किसी कमरे के बाहर खड़ा था, यह सोचते हुए कि उसकी बात सुनी जाएगी या नहीं।

आरिफ ने लाइट बंद की।

सोने से पहले उसने सना के कमरे का दरवाजा खोला। बेटी गहरी नींद में थी, रंगों वाली किताब छाती पर खुली पड़ी थी। उसने धीरे से किताब हटाई, चादर ठीक की और उसके माथे पर हाथ रखा।

फिर उसने पहली बार मन ही मन नाज़िया से माफी नहीं मांगी।

उसने सिर्फ कहा, “इस बार मैंने आवाज उठा दी।”

और शायद उसी रात, 3 साल बाद, उसके भीतर की सबसे लंबी खामोशी सचमुच टूट गई।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.