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बेटे की चिता ठंडी भी नहीं हुई थी, तभी बहू ने माँ को घर से निकालकर कहा, “यह घर अब मेरा है”; लेकिन वकील के बंद लिफाफे ने उसकी पूरी चाल को सबके सामने राख बना दिया

PART 1

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“यह घर अब मेरा है, सावित्री देवी। अपनी गठरी उठाइए और निकल जाइए, वरना शाम तक ताला बदलवा दूँगी।”

अपने बेटे की चिता की राख ठंडी भी नहीं हुई थी, और बहू निशा ने उन्हें दरवाजे पर खड़ा करके यह शब्द सुना दिए।

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सावित्री देवी के माथे पर अब भी सफेद आँचल था। आँखें सूजी हुई थीं, हाथ काँप रहे थे, और सीने में ऐसा खालीपन था जैसे किसी ने भीतर से पूरी दुनिया खींच ली हो। पिछली शाम ही दिल्ली के निगमबोध घाट पर उनके 45 साल के बेटे आरव का अंतिम संस्कार हुआ था। लकड़ियों की आग, मंत्रों की आवाज़, रिश्तेदारों की फुसफुसाहट और राख में बदलते बेटे का चेहरा—सब कुछ अभी भी उनकी आँखों में जिंदा था।

आरव गुरुग्राम की एक बड़ी कंपनी में वरिष्ठ मैनेजर था। मेहनती, शांत और अपनी माँ के लिए पहाड़ की तरह खड़ा रहने वाला बेटा। उस रात 3:12 बजे उसका फोन आया था।

“माँ… सीने में बहुत दर्द है… साँस नहीं ले पा रहा…”

फिर आवाज़ टूट गई।

जब सावित्री देवी अस्पताल पहुँचीं, तो डॉक्टर ने बस इतना कहा, “हार्ट अटैक बहुत तेज था। हम बचा नहीं पाए।”

निशा अस्पताल की कुर्सी पर बैठी थी। चेहरा झुका हुआ, आँखें सूखी। सावित्री देवी ने समझा, शायद सदमा इतना गहरा है कि आँसू भी जम गए हैं। लेकिन बाद में, श्मशान से लौटते वक्त, उन्होंने निशा के चेहरे पर कुछ और देखा था—दुख नहीं, जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो।

सावित्री देवी पिछले 2 साल से आरव और निशा के साथ नोएडा के उस डुप्लेक्स घर में रह रही थीं। उन्होंने मेरठ की अपनी छोटी-सी पुश्तैनी कोठरी बेच दी थी ताकि आरव घर की डाउन पेमेंट भर सके। 18 लाख रुपये उनकी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी थी। आरव ने कहा था, “माँ, यह पैसा मैं आपको वापस करूँगा। बस अभी घर ले लेते हैं। आप भी हमारे साथ रहेंगी।”

सावित्री देवी ने कभी हिसाब नहीं माँगा। वह माँ थीं। सुबह पूजा करतीं, निशा के लिए चाय बनातीं, आरव के लिए टिफिन रखतीं, तुलसी में पानी देतीं, और रात को बेटे के लौटने तक खिड़की के पास बैठी रहतीं।

निशा बाहर वालों के सामने बहुत मीठी बनती थी। “मम्मीजी, आप तो हमारी लक्ष्मी हैं,” वह पड़ोसियों के सामने कहती। लेकिन आरव ऑफिस चला जाता, तो वही आवाज़ काँटे जैसी हो जाती।

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“इतनी हल्दी कौन डालता है सब्जी में?”

“मेरी सहेलियाँ आती हैं तो कमरे से बाहर मत निकला कीजिए।”

“हर बात में आरव को मत बताइए। वह आपका बेटा है, नौकर नहीं।”

सावित्री देवी चुप रहतीं। उन्हें डर था कि बेटे का घर टूट न जाए।

अंतिम संस्कार के दिन भी निशा लोगों के सामने रोती रही। किसी के गले लगते ही उसके कंधे हिलने लगते, लेकिन अकेली होती तो मोबाइल पर बीमा कंपनी के संदेश पढ़ती रहती। रात को, जब रिश्तेदार जा चुके थे, सावित्री देवी ने रसोई के पास उसे अपनी छोटी बहन पायल से बात करते सुना।

“लाइफ इंश्योरेंस का पैसा आ जाए तो लोन का डर खत्म,” निशा ने धीमे कहा। “और अगर ये बूढ़ी औरत यहाँ से हट जाए, तो मैं सच में चैन से जी पाऊँगी।”

पायल ने पूछा, “पर जाएगी कहाँ?”

निशा हँसी।

“वह मेरी समस्या नहीं है। मेरे पति चले गए, अब उनकी माँ को पालने की जिम्मेदारी मेरी नहीं।”

सावित्री देवी के पैरों के नीचे जैसे जमीन फट गई। वह दीवार पकड़कर खड़ी रहीं। उस रात उन्होंने आरव की तस्वीर सीने से लगाकर बस यही कहा, “बेटा, तूने मुझे किसके हवाले छोड़ दिया?”

अगली सुबह निशा ने सचमुच उनकी अलमारी खोल दी। कपड़े बिस्तर पर फेंक दिए। पूजा की थाली किनारे रख दी। आरव की फ्रेम वाली तस्वीर भी एक डिब्बे में डाल दी, जैसे वह कोई पुरानी चीज़ हो।

“शाम 6 बजे तक चली जाइए,” निशा ने कहा। “यह घर आरव ने मेरे नाम करवाया था। कानून भी मेरे साथ है।”

सावित्री देवी ने काँपती आवाज़ में पूछा, “आरव की वसीयत पढ़ी जाएगी क्या?”

निशा की मुस्कान जहरीली हो गई।

“वसीयत? आरव को आपको क्या देना था? आप सिर्फ उसकी माँ थीं, पत्नी नहीं।”

सावित्री देवी ने 3 सूटकेस भरे। 2 सफेद साड़ियाँ, पति की पुरानी तस्वीर, आरव का बचपन वाला चाँदी का कड़ा, दवा की पर्चियाँ और छोटी-सी गणेश मूर्ति। पड़ोस की बालकनी से लोग झाँक रहे थे, लेकिन कोई नीचे नहीं आया।

जब वह ऑटो में बैठीं, निशा ने दरवाजे से आखिरी वार किया।

“मम्मीजी, अपने बेटे के नाम पर फिर भीख माँगने मत आ जाइएगा।”

ऑटो चल पड़ा। सावित्री देवी ने आँचल से चेहरा ढक लिया।

लेकिन निशा नहीं जानती थी कि आरव ने मरने से 3 महीने पहले एक ऐसा बंद लिफाफा छोड़ा था, जो उसके घमंड की नींव हिला देगा।

PART 2

सावित्री देवी ने 10 रातें पहाड़गंज के एक सस्ते धर्मशाला जैसे कमरे में बिताईं। कमरे में सीलन थी, खिड़की टूटी थी, और नीचे गली में रातभर रिक्शों की आवाज़ आती रहती थी। वह दिन में 2 बार चाय और सूखे मठरी से पेट भरतीं, ताकि पैसे बचें।

हर रात वह आरव की पुरानी तस्वीर देखतीं—स्कूल यूनिफॉर्म में मुस्कुराता हुआ बच्चा, जिसने कभी कहा था, “माँ, बड़ा होकर आपको बड़ा घर दूँगा।”

11वें दिन फोन आया।

“सावित्री देवी? मैं अधिवक्ता राघव भटनागर बोल रहा हूँ। आपके बेटे आरव मल्होत्रा की वसीयत की बैठक मंगलवार 2 बजे है। आपकी उपस्थिति अनिवार्य है।”

सावित्री देवी का गला सूख गया।

“मेरी? निशा ने कहा था कि मेरा वहाँ कोई अधिकार नहीं।”

वकील कुछ पल चुप रहा।

“आरव जी ने आपका नाम स्पष्ट रूप से लिखा है।”

मंगलवार को सावित्री देवी समय से पहले पहुँचीं। निशा काली रेशमी साड़ी, बड़े चश्मे और अपने भाई करण के साथ आई। उसके चेहरे पर वही रानी जैसा भाव था, जैसे सब कुछ पहले से जीत चुकी हो।

वकील ने पहले घर, कार, मुख्य खाते और बीमा की रकम निशा के नाम पढ़ी। निशा की गर्दन तन गई।

फिर राघव ने दूसरा पन्ना खोला।

“अतिरिक्त धारा, आरव मल्होत्रा द्वारा मृत्यु से 3 महीने पूर्व हस्ताक्षरित। मेरी माँ सावित्री देवी, जिन्होंने मेरे घर की नींव में अपनी जिंदगी की कमाई लगाई और कभी प्रतिफल नहीं माँगा, उन्हें स्टेट बैंक के लॉकर नंबर 309 की संपूर्ण सामग्री तथा उससे जुड़े सभी दस्तावेज दिए जाते हैं।”

निशा का चेहरा कस गया।

“कौन-सा लॉकर? आरव ने मुझे कभी नहीं बताया!”

“यह निजी था,” वकील ने शांत स्वर में कहा। “और इसमें प्रवेश का अधिकार केवल सावित्री देवी को है।”

करण गरजा, “अगर उसमें पैसा है तो वह संपत्ति का हिस्सा है।”

वकील ने सीधा जवाब दिया, “दस्तावेज कुछ और कहते हैं।”

सावित्री देवी को एक बंद लिफाफा मिला। उसमें चाबी और बैंक के कागज थे।

2 दिन बाद जब लॉकर खुला, ऊपर आरव की लिखावट वाला पत्र रखा था।

“माँ, अगर आप यह पढ़ रही हैं, तो शायद निशा ने अपना असली चेहरा दिखा दिया होगा…”

सावित्री देवी की साँस रुक गई।

पत्र के नीचे फाइल थी—“मेरी माँ की सुरक्षा के लिए।”

और उसमें सिर्फ पैसा नहीं था, निशा के संदेशों के प्रिंटआउट भी थे।

PART 3

लॉकर की उस छोटी-सी निजी मेज पर सावित्री देवी बहुत देर तक बैठी रहीं। बैंक की अधिकारी बाहर इंतजार कर रही थी, लेकिन उनके हाथों में पकड़ा आरव का पत्र समय रोक चुका था।

“माँ,” पत्र में लिखा था, “आपने मेरे लिए सब बेच दिया, पर मुझे पता है कि आपने कभी शिकायत नहीं की। मैं जानता था कि निशा आपको बोझ समझती है। शुरू में मैंने खुद को समझाया कि नए घर का दबाव है, नौकरी का तनाव है, लेकिन फिर मैंने उसके संदेश देखे। मुझे शर्म आई कि मेरी माँ मेरे घर में रहकर भी अकेली थी।”

सावित्री देवी के आँसू कागज पर गिरने लगे।

पत्र आगे था।

“आपने जो 18 लाख दिए थे, उन्हें मैंने खर्च नहीं माना। वह आपका अधिकार था। मैंने अपनी बोनस राशि और निवेश से अलग खाता बनाया। उसमें वही रकम बढ़ती रही। यह सब आपके नाम है। कोई इसे आपसे छीन नहीं सकता। अगर निशा आपको घर से निकालने की कोशिश करे, तो राघव जी से मिलना। वह सब संभाल लेंगे।”

फाइल में बैंक खाते, म्यूचुअल फंड, फिक्स्ड डिपॉजिट और एक छोटे फ्लैट की बुकिंग के दस्तावेज थे। कुल रकम देखकर सावित्री देवी की आँखें फैल गईं—1 करोड़ 12 लाख रुपये।

लेकिन पैसा सबसे बड़ा झटका नहीं था।

सबसे बड़ा झटका वह प्रिंटआउट थे, जिनमें निशा अपने भाई करण से लिख रही थी।

“आरव माँ के सामने बहुत पिघल जाता है। पहले उसे समझाओ कि बूढ़ी औरत डिपेंडेंट है।”

“अगर वह अपने पैसे का हिसाब माँगे तो कहना कि कोई लिखित सबूत नहीं।”

“आरव को धीरे-धीरे माँ से अलग करना पड़ेगा।”

एक संदेश पढ़कर सावित्री देवी के हाथ जम गए।

“अगर आरव को कुछ हो गया तो घर, बीमा और सब मेरा। उसकी माँ को 1 हफ्ते भी नहीं रखूँगी।”

यह आरव की मौत से 17 दिन पहले का संदेश था।

सावित्री देवी ने आँखें बंद कर लीं। बेटे की मौत अचानक थी, लेकिन बहू की निर्ममता बहुत पहले से तैयार थी।

बैंक से बाहर निकलते ही उनका फोन बजा। स्क्रीन पर निशा का नाम था। 10 दिनों में पहली बार।

“मम्मीजी…” आवाज़ मीठी थी। “आप कहाँ हैं? घर आइए न। मैंने सोचा, दुख में परिवार को साथ रहना चाहिए। बात करके सब ठीक कर लेते हैं।”

सावित्री देवी ने सड़क के किनारे खड़े नीम के पेड़ को देखा। हवा में धूल थी, लेकिन उनके भीतर पहली बार धुंध साफ हो रही थी।

“मैं आऊँगी,” उन्होंने शांत स्वर में कहा।

अगले दिन दोपहर 12 बजे वह उसी घर के सामने खड़ी थीं, जहाँ से उन्हें अपमानित करके निकाला गया था। दरवाजा निशा ने खोला। आज उसके माथे पर छोटी बिंदी थी, हल्की गुलाबी साड़ी, और चेहरे पर बनावटी दुख।

“अरे मम्मीजी, आप ऑटो से आईं? मुझे बोलतीं तो ड्राइवर भेज देती।”

सावित्री देवी ने उसकी आँखों में देखा। वही आँखें, जिन्होंने कुछ दिन पहले उन्हें सड़क पर अकेला छोड़ दिया था।

घर वैसा ही था, लेकिन अब हर चीज़ अजनबी लग रही थी। ड्राइंग रूम में आरव की बड़ी तस्वीर पर ताजा माला थी। नीचे अगरबत्ती जल रही थी। सावित्री देवी को लगा, जैसे बेटा चुपचाप सब देख रहा हो।

निशा ने रसोई से आवाज़ दी, “मैंने आपके लिए आलू-पूरी बनाई है। आरव कहता था आपको बहुत पसंद है।”

सावित्री देवी के होंठ काँपे। आरव सच में जानता था। निशा को अब याद आया था।

करण भी वहीं बैठा था। हाथ में मोबाइल, चेहरे पर वकीली अकड़।

“देखिए आंटी,” वह बोला, “अब परिवार में बैठकर बात करना ही समझदारी है। कोर्ट-कचहरी में सम्मान खराब होता है।”

सावित्री देवी ने धीरे से पूछा, “किसका सम्मान?”

करण चुप हो गया।

निशा पानी का गिलास लेकर सामने बैठी।

“मम्मीजी, उस दिन जो हुआ… मैं बहुत टूट गई थी। आरव के जाने का दुख था। गुस्से में कुछ गलत बोल दिया।”

सावित्री देवी ने गिलास नहीं छुआ।

“दुख में इंसान गलती कर सकता है,” उन्होंने कहा, “लेकिन योजना बनाकर क्रूर नहीं बनता।”

निशा का चेहरा सफेद पड़ा।

“आप क्या कहना चाहती हैं?”

सावित्री देवी ने बैग से पहला कागज निकाला और मेज पर रख दिया।

निशा ने पढ़ा। उसकी उँगलियाँ काँप गईं।

“आरव की माँ को बहुत दिन नहीं सह सकती। बस मौका चाहिए।”

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

करण ने तुरंत कहा, “ये सब निजी चैट है। इसका कोई मतलब नहीं।”

सावित्री देवी ने दूसरा पन्ना रखा।

“आरव को समझाओ कि माँ को वृद्धाश्रम भेजना सामान्य बात है। अगर वह माने नहीं तो उसे भावनात्मक रूप से दबाओ।”

निशा ने कागज मोड़ने की कोशिश की।

“ये गलत संदर्भ में है।”

सावित्री देवी की आवाज़ पहली बार सख्त हुई।

“मेरी जिंदगी भी तुम्हारे लिए गलत संदर्भ थी क्या, निशा? मेरी चुप्पी? मेरा बेटा? मेरा घर?”

निशा की आँखों में आँसू आ गए, पर उनमें पछतावा नहीं था। बस डर था।

“मम्मीजी, आप समझ नहीं रहीं। मुझे भी सुरक्षा चाहिए थी। आरव सब आप पर लुटा देता था। शादी के बाद पत्नी का भी हक होता है।”

“हक होता है,” सावित्री देवी ने कहा, “पर किसी माँ को दरवाजे से निकालने का हक नहीं होता। किसी बूढ़ी औरत की बेबसी पर हँसने का हक नहीं होता।”

करण आगे झुका।

“ठीक है, बात साफ करते हैं। लॉकर में जो भी है, उसका आधा निशा को दे दीजिए। मामला खत्म।”

सावित्री देवी ने उसे देखा।

“तुम्हें पता भी है उसमें क्या है?”

करण की आँखें चमक उठीं।

“जो भी है, वह आरव की संपत्ति थी।”

तभी दरवाजे की घंटी बजी।

निशा चौंकी। सावित्री देवी उठीं नहीं। दरवाजा खोलने गई नौकरानी ने अंदर आकर कहा, “वकील साहब आए हैं।”

राघव भटनागर अंदर आए। उनके हाथ में फाइल थी। निशा की साँस जैसे अटक गई।

“आपको किसने बुलाया?” उसने पूछा।

“सावित्री देवी ने,” राघव ने शांत स्वर में कहा। “और अब बात कानूनी रूप से होगी।”

उन्होंने मेज पर दस्तावेज रखे।

“पहली बात, लॉकर की संपत्ति आरव जी ने अपने जीवनकाल में सावित्री देवी के नाम नामांकित कर दी थी। यह उत्तराधिकार का विवाद नहीं है। दूसरी बात, 18 लाख रुपये का बैंक ट्रांसफर और बिक्री दस्तावेज साबित करते हैं कि घर की डाउन पेमेंट सावित्री देवी की रकम से हुई थी। तीसरी बात, आरव जी ने एक लिखित बयान छोड़ा है कि उनकी माँ को इस घर में रहने का नैतिक और आर्थिक अधिकार है, क्योंकि उनकी पूंजी से यह घर खरीदा गया।”

निशा बिफर उठी।

“घर मेरे नाम है!”

“फिलहाल,” राघव ने कहा। “लेकिन अगर सावित्री देवी चाहें, तो वह आर्थिक शोषण और वरिष्ठ नागरिक संरक्षण अधिनियम के तहत दावा कर सकती हैं। आपने उन्हें उनके बेटे की मृत्यु के 24 घंटे के भीतर घर से निकाला। गवाह हैं। संदेश हैं। रिकॉर्डिंग भी है।”

निशा का चेहरा सूख गया।

“रिकॉर्डिंग?”

राघव ने मोबाइल निकाला। आवाज़ कमरे में गूँज उठी।

“वह मेरी समस्या नहीं है। मेरे पति चले गए, अब उनकी माँ को पालने की जिम्मेदारी मेरी नहीं।”

यह निशा की ही आवाज़ थी।

सावित्री देवी ने आँखें झुका लीं। वह आवाज़ दोबारा सुनना भी उन्हें भीतर से काट रहा था।

करण ने धीमे से कहा, “निशा, ये मामला बिगड़ सकता है।”

“चुप रहो!” निशा चीखी। फिर सावित्री देवी की ओर मुड़ी। “आप क्या चाहती हैं? पैसा? बदला? मुझे जेल भेजना चाहती हैं?”

सावित्री देवी ने आरव की तस्वीर की ओर देखा।

“नहीं,” उन्होंने बहुत शांत होकर कहा। “मैं बस चाहती हूँ कि तुम मेरी गरीबी, मेरी उम्र और मेरे दुख को अपनी जीत मत समझो।”

राघव ने एक और कागज आगे किया।

“आरव जी ने अपनी माँ के लिए गाजियाबाद में 2 बेडरूम फ्लैट बुक करवाया था। अंतिम भुगतान लॉकर वाले खाते से हो जाएगा। साथ में मासिक आय के लिए निवेश भी है। सावित्री देवी किसी पर निर्भर नहीं रहेंगी।”

निशा के चेहरे पर अविश्वास फैल गया।

“मतलब… आरव ने यह सब मुझसे छिपाया?”

सावित्री देवी ने उत्तर दिया, “उसने तुम्हारी क्रूरता से मुझे छिपाया।”

यह सुनते ही निशा कुर्सी पर बैठ गई। पहली बार उसके चेहरे पर हार दिखाई दी। पर वह हार भी प्रेम खोने की नहीं, धन छूटने की थी।

“1 करोड़ 12 लाख…” करण ने धीमे से बुदबुदाया। शायद उसने दस्तावेज की झलक देख ली थी।

निशा की आँखें फैल गईं।

“इतना पैसा? यह तो मेरा होना चाहिए था। मैं उसकी पत्नी थी।”

सावित्री देवी का चेहरा काँपा, लेकिन आवाज़ नहीं टूटी।

“और मैं उसकी माँ थी। वह माँ जिसने उसे 9 महीने पेट में रखा, 25 साल पढ़ाया, विधवा होकर भी उसकी फीस भरी, और अपनी छत बेचकर उसे यह घर बनाने में मदद दी। पत्नी होने का अर्थ यह नहीं कि माँ को कूड़ा समझकर बाहर फेंक दिया जाए।”

निशा ने आखिरी दाँव चला।

“लोग क्या कहेंगे? कि सास ने विधवा बहू को कोर्ट में घसीट लिया?”

सावित्री देवी पहली बार हल्का-सा मुस्कुराईं। वह मुस्कान दुख से बनी थी, पर कमजोर नहीं थी।

“लोग तो उस दिन भी देख रहे थे, जब तुमने मुझे सूटकेस के साथ बाहर निकाला था। उस दिन तुम्हें लोगों की चिंता नहीं थी।”

राघव ने कानूनी नोटिस मेज पर रखा।

“सावित्री देवी अभी कोई आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं करा रहीं। लेकिन शर्तें स्पष्ट हैं। आप उनके खिलाफ कोई झूठा दावा, बदनामी, धमकी या संपत्ति पर विवाद नहीं करेंगी। घर की डाउन पेमेंट की रकम के संबंध में समझौता अलग से दर्ज होगा। और अगर आपने इन्हें परेशान किया, तो सभी प्रमाण पुलिस और न्यायालय में जमा होंगे।”

निशा ने कागजों को ऐसे देखा जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे से संगमरमर खींच लिया हो।

“आरव मुझसे प्यार करता था,” उसने टूटती आवाज़ में कहा।

सावित्री देवी की आँखें भर आईं।

“हाँ, करता था। इसीलिए उसने तुम्हें घर, गाड़ी, खाते और बीमा दिया। लेकिन वह मुझे भी प्यार करता था। इतना कि मरने के बाद भी मेरी छत बचा गया।”

कमरे में आरव की तस्वीर के सामने अगरबत्ती की राख गिर रही थी। निशा की झूठी मजबूती बिखर चुकी थी। करण चुपचाप दरवाजे की तरफ देखने लगा। पड़ोस की खिड़की से फिर कोई झाँक रहा था, लेकिन इस बार सावित्री देवी को शर्म नहीं आई।

उन्होंने अपना बैग उठाया। इस घर में उनका अपमान हुआ था, पर अब वह टूटी हुई औरत बनकर नहीं निकल रही थीं।

दरवाजे पर पहुँचकर उन्होंने पीछे मुड़कर कहा, “निशा, आरव ने तुमसे बदला नहीं लिया। उसने बस यह तय किया कि तुम्हारी निर्दयता मेरी आखिरी पहचान न बन जाए।”

निशा कुछ नहीं बोल सकी।

उस शाम सावित्री देवी धर्मशाला नहीं लौटीं। राघव ने उन्हें अस्थायी गेस्ट हाउस पहुँचाया। 20 दिन बाद वह अपने नए फ्लैट में शिफ्ट हुईं। छोटा-सा घर था, लेकिन बालकनी में धूप आती थी। उन्होंने सबसे पहले तुलसी रखी, फिर आरव की तस्वीर दीवार पर लगाई।

गृहप्रवेश के दिन उन्होंने कोई बड़ा आयोजन नहीं किया। बस मंदिर से प्रसाद लाई, 2 पड़ोसी और राघव आए। उन्होंने आरव की तस्वीर के सामने दीपक जलाया और बहुत देर तक हाथ जोड़े खड़ी रहीं।

“देख बेटा,” उन्होंने धीरे से कहा, “तेरी माँ अब किसी के दरवाजे की मोहताज नहीं।”

उस रात बरसों बाद उन्होंने बिना डर के दरवाजा बंद किया। न कोई ताना, न कोई आदेश, न किसी के कदमों की आहट से सिकुड़ता दिल। सिर्फ दीवार पर मुस्कुराता आरव और कमरे में तैरती चंदन की हल्की खुशबू।

कभी-कभी न्याय अदालत की ऊँची आवाज़ों में नहीं आता। कभी-कभी वह एक बंद लिफाफे में आता है, बेटे की लिखावट में, उस माँ के लिए जिसने सब कुछ खोकर भी अपने प्यार का हिसाब नहीं माँगा।

और आरव, आग की राख में बदल जाने के बाद भी, अपनी माँ का हाथ नहीं छोड़ पाया।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.