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बेटी की अंतिम विदाई में पति की प्रेमिका मां के कान में फुसफुसाई, “आखिर में जीत मेरी हुई”, लेकिन वकील ने वसीयत खोली तो शोक सभा में छिपे जुल्म, धोखे और असली हारने वाले का चेहरा सबके सामने उतर गया

PART 1

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“इतना मत रोइए आंटी… आखिर में जीत मेरी ही हुई।”

यह बात रुचि ने मेरी बेटी की अर्थी के पास झुककर मेरे कान में फुसफुसाई थी।

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दिल्ली के राजौरी गार्डन की उस पुरानी धर्मशाला में ऐसा सन्नाटा था कि अगरबत्ती की राख गिरने की हल्की आवाज भी सुनाई दे रही थी। सफेद मोगरे की मालाएं मेरी बेटी नंदिनी के शरीर के चारों ओर रखी थीं। वही मोगरे, जिन्हें वह हर सावन सोमवार को शिव मंदिर जाते समय बालों में लगाती थी। अब वही फूल उसकी आखिरी विदाई के गवाह बने थे।

सरला मेहरा 62 साल की थी। 3 दिन पहले उसने अपनी इकलौती बेटी खो दी थी।

नंदिनी 34 साल की थी। सरकारी स्कूल में बच्चों को हिंदी पढ़ाती थी। उसकी हंसी ऐसी थी कि रसोई में रखे पीतल के बर्तन भी जैसे चमक उठते थे। हर रविवार वह मां को फोन करती, चाहे कितनी भी थकी हो। वह कहती, “मां, चाय चढ़ा लो, मैं बात करते-करते पीती हूं।”

अब वही आवाज हमेशा के लिए चुप थी।

धर्मशाला में रिश्तेदार, पड़ोसी, स्कूल की शिक्षिकाएं और मोहल्ले की औरतें बैठी रो रही थीं। पंडित जी धीमी आवाज में मंत्र पढ़ रहे थे। सरला अपनी बेटी के पैरों के पास बैठी थी, हाथ में उसकी पुरानी चूड़ी पकड़े हुए। उसे समझ नहीं आ रहा था कि मां का दिल धड़क कैसे सकता है जब उसकी औलाद सामने सफेद कपड़े में लिपटी पड़ी हो।

सब रो रहे थे।

सिवाय उसके।

दरवाजे पर अचानक चमकदार जूतों की आवाज गूंजी।

लोगों ने मुड़कर देखा।

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राघव मल्होत्रा अंदर आया। नंदिनी का पति। काला कुर्ता, महंगी घड़ी, आंखों में थकान नहीं, चिढ़ थी। जैसे किसी जरूरी कारोबारी बैठक से मजबूरी में उठकर आया हो।

और उसके साथ थी रुचि।

लाल रेशमी साड़ी, खुले बाल, गले में सोने की पतली चेन, होंठों पर हल्की मुस्कान। वह ऐसे आई थी जैसे किसी शोक सभा में नहीं, किसी जीत की दावत में पहुंची हो।

सरला उसे पहचानती थी।

नाम नंदिनी ने कभी साफ नहीं लिया था, पर मां की आंखें बेटी की चुप्पी पढ़ लेती हैं।

राघव सामने आया और बोला, “ट्रैफिक बहुत था, इसलिए देर हो गई।”

पीछे से किसी बूढ़ी औरत ने दुख में सिर हिलाया। किसी ने दबी आवाज में कहा, “बीवी की चिता उठने वाली है और इसे ट्रैफिक याद है।”

राघव ने सुना, पर अनसुना कर दिया।

वह पहली पंक्ति में बैठा। रुचि उसके बिलकुल पास बैठ गई। फिर वह सरला की तरफ झुकी। सरला को लगा, शायद वह औपचारिक दुख जताएगी।

पर उसने कान के पास आकर कहा, “इतना मत रोइए आंटी… आखिर में जीत मेरी ही हुई।”

सरला का गला सूख गया।

उसके हाथ में पकड़ी चूड़ी टूटकर हथेली में चुभ गई। वह उठकर रुचि को धक्का देना चाहती थी, चीखना चाहती थी, सबके सामने कहना चाहती थी कि उसकी बेटी की मौत इतनी सीधी नहीं थी। पर दुख कभी-कभी शरीर को पत्थर बना देता है।

1 महीने पहले नंदिनी मां के घर आई थी। जुलाई की उमस थी, फिर भी उसने पूरी बांह का सूट पहना था।

सरला ने पूछा, “गर्मी नहीं लग रही, बेटा?”

नंदिनी ने जल्दी से मुस्कुराकर कहा, “नहीं मां, ठीक हूं।”

चाय का कप उठाते हुए उसकी बांह से कपड़ा सरक गया। कलाई पर नीला-काला निशान था।

“ये क्या हुआ?”

नंदिनी ने फौरन आस्तीन नीचे कर ली।

“कुछ नहीं।”

“नंदू।”

उसकी आंखें भर आईं।

“मां, बस बहस हुई थी।”

“राघव ने किया?”

“नहीं।”

जवाब बहुत जल्दी आया था। इतना जल्दी कि झूठ साफ दिख रहा था।

फिर उसने मां का हाथ पकड़ा और कहा, “सब ठीक हो जाएगा मां। मैं कुछ कर रही हूं।”

अब वही बात सरला के सीने में हथौड़े जैसी बज रही थी।

तभी भीड़ से एक आदमी उठा। सफेद कुरता, काली जैकेट, हाथ में मुहरबंद मोटी फाइल।

अधिवक्ता हेमंत सूद।

नंदिनी का वकील।

वह आगे आया और पंडित जी से विनम्रता से बोला, “अंतिम संस्कार से पहले मुझे नंदिनी मेहरा मल्होत्रा की कानूनी इच्छा पूरी करनी है।”

धर्मशाला में फुसफुसाहट फैल गई।

राघव ने भौंहें सिकोड़ दीं। “ये नया नाटक क्या है?”

हेमंत ने शांत आवाज में कहा, “नंदिनी जी ने निर्देश छोड़ा था कि उनका वसीयतनामा यहीं, इन्हीं गवाहों के सामने पढ़ा जाए।”

राघव हंसा। “मेरी पत्नी के पास था ही क्या?”

हेमंत ने सीधे उसकी आंखों में देखा।

“आप गलत हैं।”

फाइल खुली।

कागज की आवाज पूरी धर्मशाला में बिजली की तरह गूंजी।

“मुख्य लाभार्थी का नाम है… सरला मेहरा।”

सरला की सांस अटक गई।

और उसी पल राघव के चेहरे से पहली बार रंग उतरने लगा।

PART 2

हेमंत सूद ने कागज ऊंचा किया।

“नंदिनी मेहरा मल्होत्रा अपनी पैतृक हिस्सेदारी, निजी बचत, बीमा राशि, निवेश और वसंत कुंज वाले फ्लैट का अधिकार अपनी मां सरला मेहरा को सौंपती हैं।”

धर्मशाला में शोर उठ गया।

राघव झटके से खड़ा हुआ। “झूठ! मैं उसका पति हूं।”

हेमंत ने पन्ना पलटा। “थे।”

राघव जड़ हो गया। “मतलब?”

“6 महीने पहले नंदिनी जी ने तलाक की अर्जी दी थी। साथ ही घरेलू हिंसा से सुरक्षा की याचिका भी।”

सरला की आंखों के आगे अंधेरा छा गया।

6 महीने?

उसकी बेटी अकेले लड़ रही थी, और मां सिर्फ उसकी मुस्कान के पीछे छिपा डर देख पाई थी।

राघव चिल्लाया, “वह मानसिक रूप से कमजोर थी। उसे समझ नहीं था।”

पीछे से नंदिनी की सहकर्मी अंजलि रोते हुए बोली, “झूठ बोल रहे हो। वह स्कूल में नीले निशान छिपाकर आती थी।”

राघव उसकी तरफ झपटा। “चुप रहो!”

हेमंत ने आवाज कड़ी की। “नंदिनी जी ने प्रमाण छोड़े हैं। तस्वीरें, चिकित्सकीय रिपोर्ट, संदेश, ध्वनि अभिलेख, बैंक कागज और निजी डायरी।”

रुचि धीरे से राघव से दूर खिसक गई।

हेमंत ने दूसरी फाइल खोली। “यदि राघव मल्होत्रा अंतिम विदाई में रुचि को साथ लाए, तो यह भी पढ़ा जाए—नंदिनी ने अपने नाम पर लिए गए झूठे ऋण, नकली हस्ताक्षर और संयुक्त खातों से निकाले गए 2 करोड़ 70 लाख रुपये की शिकायत दर्ज कराई थी।”

भीड़ कांप उठी।

रुचि के होंठ सूख गए। “राघव… तुमने कहा था नंदिनी पागल है।”

हेमंत ने आखिरी पंक्ति पढ़ी।

“अगर मेरी मृत्यु के बाद यह पढ़ा जा रहा है, तो मां से कहना—मैं हारकर नहीं गई। सच को जगा कर गई हूं।”

तभी बाहर पुलिस की जीप रुकी।

और राघव पहली बार सचमुच डर गया।

PART 3

धर्मशाला में अब कोई मंत्र नहीं सुन रहा था। अगरबत्ती का धुआं हवा में अटका हुआ था, जैसे वह भी जानना चाहता हो कि नंदिनी ने मरने से पहले कितनी आग अपने भीतर दबाकर रखी थी।

राघव ने चारों तरफ देखा। जिन लोगों के सामने वह सालों तक सम्मानित कारोबारी, संस्कारी दामाद और सफल पति बनकर घूमता रहा था, वे अब उसे ऐसे देख रहे थे जैसे उसके चेहरे से मुखौटा उतर चुका हो।

रुचि अब उसकी बांह पकड़े नहीं थी। वह 2 कदम दूर खड़ी थी। जिस मुस्कान के साथ वह आई थी, वह गायब हो चुकी थी। उसकी लाल साड़ी अब चमक नहीं रही थी, बल्कि उस शोक सभा में बेइज्जती की तरह चुभ रही थी।

सरला ने अपनी बेटी के चेहरे की ओर देखा। सफेद कपड़े के बीच नंदिनी का माथा शांत था। जैसे उसने सब पहले से सोच लिया था। जैसे वह जानती थी कि उसकी आवाज उसके बाद भी उठेगी।

हेमंत सूद ने तीसरी फाइल उठाई।

“नंदिनी जी ने एक अंतिम निर्देश भी छोड़ा है।”

सरला ने कांपते हुए कहा, “बस कीजिए बेटा… मेरी बच्ची ने कितना सहा होगा…”

हेमंत की आंखें भीग गईं, पर उसने खुद को संभाला। “आंटी, उन्होंने कहा था—मां टूटेंगी, लेकिन सच पूरा सुनेंगी। तभी मैं मुक्त होऊंगी।”

सरला चुप हो गई।

हेमंत ने पास रखे छोटे यंत्र को चालू किया। धर्मशाला के प्रबंधक ने ध्वनि बढ़ा दी। पहले हल्की खरखराहट सुनाई दी। फिर नंदिनी की आवाज आई।

कमजोर। डरी हुई। पर साफ।

“राघव, दरवाजा खोलो। मुझे मां के पास जाना है।”

फिर राघव की आवाज आई।

“तुम कहीं नहीं जाओगी। तुम्हारी मां क्या कर लेगी? रोएगी, पूजा करेगी, फिर मान जाएगी।”

नंदिनी रो रही थी। “तुमने मेरे नाम पर कर्ज क्यों लिया? मेरा हस्ताक्षर किसने किया?”

राघव हंसा। “जिस दिन शादी हुई थी, उसी दिन सब मेरा हो गया था। तुम्हारी तनख्वाह, तुम्हारा फ्लैट, तुम्हारी जिंदगी।”

कई औरतों ने मुंह पर हाथ रख लिया।

आवाज फिर आई।

“मैं पुलिस में जाऊंगी।”

राघव गरजा। “जाओ। कह दूंगा तुम हिस्टीरिया में हो। तुम्हारी मां बूढ़ी है, अदालत-कचहरी के चक्कर नहीं काट पाएगी। और याद रखना, अगर तुमने मुझे छोड़ा, तो तुम्हारी चिता पर भी मैं रोऊंगा नहीं।”

ध्वनि बंद हो गई।

सरला के भीतर कुछ टूट गया। वह धीरे-धीरे उठी, अपनी बेटी के पास गई और उसके माथे पर हाथ रखा।

“मुझे माफ कर दे, नंदू,” उसने फुसफुसाकर कहा। “तू मदद मांग रही थी और मैं तेरी मुस्कान पर भरोसा करती रही।”

अंजलि आगे आई। वह नंदिनी की सहकर्मी थी, पर उस दिन बहन की तरह रो रही थी। उसके हाथ में भूरे रंग का लिफाफा था।

“आंटी, नंदिनी ने ये मुझे दिया था। कहा था, अगर कुछ हो जाए तो आपको दूं।”

सरला ने कांपते हाथों से लिफाफा लिया।

अंदर कई कागज थे। चिकित्सकीय पर्चियां। तस्वीरें। बैंक विवरण। शिकायत की प्रतियां। और एक चिट्ठी।

नंदिनी की लिखावट।

मां,

अगर यह चिट्ठी आपके हाथ में है, तो शायद मैं आपके सामने बैठकर सब नहीं कह पाई। मुझे शर्म आती थी कि जिस आदमी को मैंने पति कहा, वही मुझे रोज थोड़ा-थोड़ा खत्म कर रहा था।

मैंने झूठ बोला कि सब ठीक है। मैंने आस्तीनों से निशान छिपाए। मैंने आवाज को हंसी में बदल दिया, ताकि आप न टूटें।

पर मां, अब मैं डरना बंद कर चुकी हूं।

मैंने तलाक की अर्जी दी है। मैंने शिकायत दर्ज कराई है। मैंने उसके झूठे कागजों की प्रतियां जमा कर दी हैं। अगर मैं बच गई, तो आपके साथ रहूंगी। अगर नहीं बची, तो मेरी आवाज बन जाना।

राघव को मेरी चुप्पी मत दे देना।

आपकी नंदू।

सरला वहीं बैठ गई। चिट्ठी उसकी छाती से चिपक गई। वह रोई नहीं, वह फट गई। ऐसा रोना जिसमें पछतावा, प्यार, गुस्सा और एक मां की अधूरी रक्षा सब मिलकर बाहर आ रहे थे।

राघव ने मौका देखकर बाहर निकलने की कोशिश की।

पर दरवाजे पर 2 महिला पुलिसकर्मी और 1 निरीक्षक खड़े थे।

निरीक्षक कविता राणा ने आगे बढ़कर कहा, “राघव मल्होत्रा, आपको पूछताछ के लिए हमारे साथ चलना होगा। आपके विरुद्ध घरेलू हिंसा, आर्थिक धोखाधड़ी, जालसाजी और धमकी से जुड़े मामले दर्ज हैं।”

राघव ने गुस्से से सरला की तरफ देखा। “आपने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी।”

सरला की आंखें सूखी थीं, पर आवाज पत्थर जैसी मजबूत।

“नहीं। तूने मेरी बेटी की जिंदगी बर्बाद की। अपनी जिंदगी तूने खुद बर्बाद की।”

रुचि घबराकर बोली, “मैंने कुछ नहीं किया। मुझे नहीं पता था।”

हेमंत ने उसकी तरफ देखा। “आपका नाम उन खर्चों में है, जो नंदिनी जी के खाते से निकले धन से किए गए। सच बोलना आपके लिए बेहतर होगा।”

रुचि के चेहरे की अकड़ पिघल गई। वह पहली बार सचमुच शोक सभा जैसी दिख रही थी—डरी हुई, छोटी, और अपने लालच में फंसी हुई।

राघव को धर्मशाला के भीतर हथकड़ी नहीं लगाई गई। पंडित जी ने कहा, “मृतका की विदाई का सम्मान रहना चाहिए।” पुलिस उसे बाहर ले गई। पर बाहर खड़े लोगों की नजरें किसी हथकड़ी से कम नहीं थीं।

जब नंदिनी की अर्थी उठी, तो पूरा हॉल खड़ा हो गया।

स्कूल की बच्चियां रो रही थीं। मोहल्ले की आंटियां सिर ढककर खड़ी थीं। एक बूढ़े पड़ोसी ने आंखें पोंछते हुए कहा, “बेटी ने मरकर भी सच बोल दिया।”

सरला ने अर्थी के एक कोने को छुआ। उसे लगा, आज उसकी बेटी सिर्फ जा नहीं रही, एक बंद दरवाजा तोड़कर जा रही है।

अंतिम संस्कार निगमबोध घाट पर हुआ। चिता की आग उठी तो सरला ने आंखें बंद कर लीं। उसे याद आया जब नंदिनी 7 साल की थी और राखी के दिन उसने कहा था, “मां, मैं बड़ी होकर कमजोर लोगों की मदद करूंगी।” तब सबने हंसकर कहा था, “पहले खुद बड़ी हो जा।”

नंदिनी सचमुच बड़ी हो गई थी। इतनी बड़ी कि मरकर भी कई जिंदगियों के लिए रास्ता छोड़ गई।

अगले 3 महीने धुंध जैसे बीते। पुलिस स्टेशन, अदालत, बैंक, वकील, कागज, बयान। सरला ने कभी जीवन में थाने की चौखट नहीं देखी थी। अब वह हर तारीख पर जाती। सफेद सूती साड़ी पहनती, नंदिनी की चूड़ी बैग में रखती और कहती, “मैं मां हूं, गवाह भी हूं।”

जांच में खुला कि राघव ने 4 साल से नंदिनी के नाम पर ऋण लिए थे। उसने उसके हस्ताक्षर नकली बनाए, उसके वेतन खाते से रकम निकाली, उसके फ्लैट को गिरवी रखने की कोशिश की। रुचि के लिए गुरुग्राम में किराए का फ्लैट, जयपुर की यात्राएं, सोने के गहने और महंगे फोन उसी धन से खरीदे गए थे।

राघव हमेशा कहता था कि नंदिनी मानसिक रूप से अस्थिर है। लेकिन नंदिनी ने हर घाव का प्रमाण इकट्ठा किया था। डॉक्टर की पर्ची। तारीखें। संदेश। बातचीत। यहां तक कि अपनी डायरी में उसने लिखा था कि किस दिन कौन सा झूठ बोला गया।

रुचि ने अंततः बयान दिया कि राघव ने उसे बताया था कि नंदिनी “पागल” है और जल्दी ही संपत्ति उसके हाथ आ जाएगी। उसने यह भी स्वीकार किया कि शोक सभा में सरला को चुभाने की बात उसने जानबूझकर कही थी, क्योंकि राघव ने उसे विश्वास दिलाया था कि वसीयत उसके पक्ष में होगी।

राघव की जमानत कई बार अटकी। मामला लंबा चला, पर पहली सुनवाई में ही अदालत ने कहा कि नंदिनी के दस्तावेज गंभीर हैं। उसकी संपत्ति पर राघव का अधिकार रोक दिया गया। बैंक खातों पर जांच बैठी। नकली हस्ताक्षरों की पुष्टि हुई। घरेलू हिंसा की शिकायतों को दबाने वाले स्थानीय प्रभावशाली लोगों के नाम भी सामने आए।

सरला को नंदिनी का वसंत कुंज वाला फ्लैट मिला।

पहले दिन वह दरवाजा खोलकर अंदर गई तो घुटनों के बल बैठ गई।

रसोई में नंदिनी की नीली चाय की केतली रखी थी। अलमारी में स्कूल की कॉपियां थीं। एक दराज में बच्चों के बनाए कार्ड—“नंदिनी मैम, आप सबसे अच्छी हैं।” बिस्तर के पास एक आधा खुला उपन्यास था। तकिए के नीचे एक छोटा सा गणेश जी का चित्र।

हर चीज चीख रही थी कि नंदिनी जीना चाहती थी।

सरला 2 महीने तक उस फ्लैट में कुछ छू नहीं पाई। वह रोज आती, फर्श साफ करती, चुपचाप बैठती और लौट जाती।

फिर एक दिन उसे डायरी का आखिरी पन्ना मिला।

उस पर लिखा था:

“अगर मैं बच गई, तो मां के साथ एक ऐसा घर खोलूंगी जहां कोई औरत अपने घाव छिपाने के लिए आस्तीन लंबी न करे।”

सरला ने वह पन्ना पढ़ा और पहली बार रोने के बजाय खड़ी हो गई।

उसने नंदिनी के बीमा धन और कुछ निवेशों से फ्लैट को बदलना शुरू किया। दीवारों पर हल्का पीला रंग कराया। एक कमरे में 3 बिस्तर लगवाए। दूसरे कमरे में बच्चों के लिए किताबें, रंग और खिलौने रखे। रसोई को बड़ा किया। बालकनी में तुलसी, चमेली और मोगरे के गमले लगाए।

दरवाजे पर एक छोटा-सा बोर्ड लगा:

नंदिनी आश्रय

यह कोई बड़ा संस्थान नहीं था। कोई चमकदार दफ्तर नहीं। बस एक सुरक्षित घर था उन औरतों के लिए जो रात में बच्चों को लेकर भागती थीं, जिनके पास सिर्फ एक थैला, कुछ कागज और बहुत सारा डर होता था।

पहली औरत आधी रात आई। उसके साथ 5 साल की बच्ची थी। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने कहा, “क्या मुझे कोई यकीन करेगा?”

सरला ने उसे अंदर बैठाया, पानी दिया और वही शब्द कहे जो वह नंदिनी से समय पर नहीं कह पाई थी।

“यहां तू सुरक्षित है।”

धीरे-धीरे खबर फैली। स्कूल की अंजलि मदद करने लगी। अधिवक्ता हेमंत मुफ्त सलाह देने लगे। डॉक्टर सीमा हफ्ते में 1 दिन आतीं। पड़ोस की महिलाएं कपड़े, किताबें, राशन देने लगीं।

सरला का दर्द खत्म नहीं हुआ। दर्द कभी सचमुच खत्म नहीं होता। वह बस रूप बदल लेता है।

कभी रविवार की सुबह वह 2 कप चाय बना देती। फिर याद आता, दूसरा कप पीने वाली अब नहीं आएगी। कभी फोन बजता तो दिल कहता, नंदू होगी। कभी मोगरे की खुशबू आती तो वह सांस रोक लेती।

लेकिन अब उसी घर में बच्चों की हंसी भी थी। वही दीवारें, जिन्होंने नंदिनी की चुप्पी देखी थी, अब औरतों की पहली खुली नींद देखती थीं। वही रसोई, जहां कभी डर के बीच चाय बनी होगी, अब भागकर आई महिलाओं के लिए गरम खाना बनाती थी।

1 साल बाद नंदिनी की बरसी पर सरला ने किसी बड़ी पूजा का आयोजन नहीं किया। उसने आश्रय में रहने वाली महिलाओं और बच्चों के साथ साधारण भंडारा रखा। मोगरे की मालाएं आईं, पर इस बार वे अर्थी पर नहीं, दरवाजे पर टांगी गईं।

अंजलि ने नंदिनी की आखिरी डायरी से एक पंक्ति फ्रेम कराकर दी।

वह पंक्ति आश्रय के मुख्य दरवाजे पर टांगी गई:

“चुप्पी हमेशा अत्याचारी को बचाती है, पीड़ित को नहीं।”

सरला रोज उस पंक्ति को पढ़ती।

कभी वह सोचती, उस दिन धर्मशाला में रुचि ने कहा था—“मैं जीत गई।”

कितनी बड़ी भूल थी वह।

क्योंकि जीत किसी क्रूर आदमी को हासिल करना नहीं होती।

जीत वह होती है जब एक मां अपनी बेटी की आवाज बन जाए।

जीत वह होती है जब सच चिता की आग से भी जलकर खत्म न हो।

जीत वह होती है जब एक मृत बेटी की हिम्मत कई जिंदा औरतों की ढाल बन जाए।

और उस दिन, जब एक छोटी बच्ची ने आश्रय की दीवार पर रंगों से मोगरे का फूल बनाकर नीचे लिखा—“नंदिनी दीदी का घर”—सरला ने पहली बार आसमान की तरफ देखकर मुस्कुराया।

उसे लगा, उसकी बेटी सचमुच नहीं हारी।

वह हर उस दरवाजे में जिंदा थी जो अब डर से नहीं, उम्मीद से खुलता था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.