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बूढ़ी माँ बैठक में खून से भीगी पड़ी रही, बेटा ससुराल वालों संग रसोई में खाना खाता रहा, पर पिता ने जैसे ही सुना “बस यहाँ दस्तखत करवा लो”, पूरे घर की असली गद्दारी बेनकाब हो गई

PART 1

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सूरत के पुराने हवेलीनुमा घर के बैठकखाने में विमला देवी नाक से खून बहाते हुए फर्श पर पड़ी थीं, और उसी समय उनका अपना बेटा रसोई में बैठकर ससुराल वालों के साथ गरमा-गरम ढोकला और कढ़ी खा रहा था।

गोविंदलाल शाह ने जब दरवाज़े के बाहर से वह ठंडी आवाज़ सुनी—“बस यहाँ दस्तखत करवा लो, मम्मी को कागज़ समझ में नहीं आएँगे”—तो उनके सीने में जैसे किसी ने लोहे की कील ठोक दी। धोखा बाहर से नहीं आया था। वह उनके ही घर में पैदा हुआ था, उनके ही बेटे के चेहरे पर।

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गोविंदलाल 64 साल के थे। सफेद बाल, मेहनत से खुरदरे हाथ, और आंखों में ऐसी शांति, जो सिर्फ वही लोग रखते हैं जिन्होंने पूरी उम्र अपने आँसू दूसरों की छत बनाने में खर्च कर दिए हों। सूरत के अडाजन इलाके में उनकी 2 मंजिला कोठी थी। नीचे छोटा-सा आँगन, दरवाज़े पर तुलसी का चौरा, और हरे रंग का लोहे का फाटक, जिसे विमला हर दिवाली से पहले खुद पोंछती थीं। वह कहती थीं, “घर का दरवाज़ा भी मेहमान से पहले नमस्ते करना चाहिए।”

उस दिन वह दरवाज़ा नमस्ते नहीं कर रहा था। वह चुप था, जैसे घर खुद शर्म से सिर झुकाए खड़ा हो।

गोविंदलाल को अहमदाबाद में 3 दिन रुकना था। कपड़े के कारोबार से जुड़ी बैठक थी, पुराने साझेदारों से बात थी। पर अचानक दोपहर में सौदा टल गया। उन्होंने सोचा, घर जल्दी लौटकर विमला को चौंका देंगे। रास्ते में उन्होंने उनके लिए सूखे मेवे की मिठाई खरीदी, क्योंकि विमला हमेशा कहती थीं कि शक्कर से परहेज़ है, और फिर रात को चुपके से 2 टुकड़े खा लेती थीं।

जब वह 4 बजे घर पहुँचे, तो फाटक के पास काली चमचमाती गाड़ी खड़ी थी। नंबर मुंबई का था। वह गाड़ी राजीव मेहता की थी—उनकी बहू रिया के पिता की।

राजीव मेहता ऐसे आदमी थे जो रिश्ते देखने नहीं आते थे, उनका मूल्यांकन करते थे। घर देखते तो गज गिनते, ज़मीन देखते तो भाव बताते, और बुज़ुर्गों को देखते तो विरासत की तारीख़ सोचते। उनकी पत्नी सुनीता हर बात में मुस्कुराती थीं, मगर वह मुस्कान मीठी नहीं, नाप-तौल वाली थी। उनकी बेटी रिया की शादी गोविंदलाल के इकलौते बेटे अर्जुन से 3 साल पहले हुई थी। रिया “परिवार” शब्द ऐसे बोलती थी जैसे वह प्रेम नहीं, भविष्य की पूँजी हो।

गोविंदलाल ने दरवाज़ा खोला।

रसोई से हँसी आ रही थी। बर्तनों की खनक। चम्मच की आवाज़। राजीव का भारी स्वर। सुनीता की बनावटी प्रसन्नता। रिया किसी वकील के बारे में बोल रही थी। अर्जुन धीमे स्वर में जवाब दे रहा था।

और बैठक में एक ऐसा सन्नाटा था, जो खाली घर का नहीं, कुचले हुए इंसान का होता है।

गोविंदलाल 3 कदम आगे बढ़े।

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विमला देवी सोफे के पास फर्श पर थीं। उनका सिर दीवार से टिका था। एक हाथ काँपते हुए नाक पर दबा था। खून उनकी हल्की नीली साड़ी के पल्लू पर फैल गया था। चश्मा टेढ़ा पड़ा था। आँखों में इतनी बेबसी थी कि गोविंदलाल का गला सूख गया।

“विमला…”

आवाज़ उनके मुँह से निकली ही नहीं, टूटकर गिर गई।

वह घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने शोर नहीं किया। पहले उनका सिर सँभाला, फिर तुरंत एम्बुलेंस को फोन किया। उनकी उंगलियाँ काँप रही थीं। वह बार-बार विमला का चेहरा पोंछते रहे।

रसोई से फिर हँसी आई।

गोविंदलाल ने उस हँसी को उसी क्षण अपने जीवन की सबसे बदसूरत आवाज़ मान लिया।

9 मिनट बाद एम्बुलेंस आई। सहायक ने विमला का रक्तचाप देखा और उसका चेहरा गंभीर हो गया।

“इन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना होगा। रक्तचाप बहुत ऊपर है। इन्हें इस हालत में अकेला नहीं छोड़ना चाहिए था।”

उसी पल रसोई की हँसी मर गई।

अर्जुन दरवाज़े पर खड़ा था। सफेद कुरता बिलकुल साफ था। हाथ में थाली का रूमाल था। उसके पीछे राजीव, सुनीता और रिया खड़े थे। किसी के चेहरे पर भय था, किसी पर झुंझलाहट, और रिया के चेहरे पर शर्म नहीं, असुविधा थी।

विमला ने गोविंदलाल की उंगलियाँ पकड़ीं। 2 बार दबाया। यह उनका पुराना संकेत था—“मैं हूँ।” गोविंदलाल ने भी 2 बार दबाया।

जब एम्बुलेंस विमला को लेकर चली, गोविंदलाल तुरंत पीछे नहीं गए। वह रसोई में गए। मेज़ पर खाना सजा था। कढ़ी की कटोरी अब भी गरम थी। बीच में लाल रंग का मोटा लिफाफा, कई कागज़, महँगी कलम और पीले निशान लगे पन्ने रखे थे। एक पन्ने पर विमला का नाम था। दूसरे पर उस गोदाम का विवरण था, जिसे गोविंदलाल ने 22 साल पहले कपड़े के व्यापार के लिए खरीदा था।

उन्होंने बस एक शब्द कहा।

“निकलो।”

राजीव ने ठुड्डी उठाई। “गोविंदभाई, भावुक होने से बातें नहीं सुलझतीं।”

“मेरी पत्नी 4 कदम दूर खून बहा रही थी।”

रिया बोली, “हमें लगा चक्कर है। वह हमेशा बात बढ़ा देती हैं।”

गोविंदलाल ने उसकी तरफ देखा। “वह फर्श पर थीं।”

अर्जुन ने होंठ खोले। “पापा, मेरी बात…”

“चुप।”

वह शब्द धीमा था, पर रसोई की दीवारें काँप गईं।

रिया ने लाल लिफाफा उठाना चाहा। गोविंदलाल ने उस पर हाथ रख दिया।

“यह यहीं रहेगा।”

“ये निजी कागज़ हैं,” रिया ने कहा।

“मेरी मेज़ पर, मेरी पत्नी के खून के पास रखे निजी कागज़?”

रिया ने हाथ पीछे खींच लिया।

जब मेहता परिवार चला गया, अर्जुन वहीं खड़ा रह गया। गोविंदलाल ने लिफाफा खोला। कुछ पन्ने पढ़े। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं आया। उससे भी भयानक चीज़ आई—साफ समझ।

“बैठ।”

अर्जुन बैठ गया।

“बता।”

अर्जुन का चेहरा राख जैसा था। “रिया के पापा कह रहे थे कि गोदाम की हिस्सेदारी पहले से तय कर देना समझदारी होगी। कर और कानूनी झंझट कम रहेंगे। मैं… मैं बस सुन रहा था।”

“मेरे रहते?”

“आप अहमदाबाद में थे।”

“और तुम्हारी माँ?”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं। “माँ ने विरोध किया। उन्होंने कहा आप दोनों ने मिलकर सब बनाया है। फिर बहस बढ़ गई। उन्हें सिरदर्द हुआ। उन्होंने कहा धुंधला दिख रहा है। वह बैठक में चली गईं।”

“और तू?”

अर्जुन ने नीचे देखा। “मुझे लगा वह नाटक कर रही हैं ताकि कागज़ रुक जाएँ।”

गोविंदलाल कुर्सी के सहारे खड़े रहे। “तेरी माँ को 7 साल से रक्तचाप की बीमारी है। दवा कहाँ रखी है, यह तुझे पता है। डॉक्टर ने कितनी बार कहा है तनाव मत देना, यह भी पता है। एक अनजान सहायक 30 सेकंड में समझ गया। तूने थाली उठाई और खाना खाता रहा।”

अर्जुन रो पड़ा, मगर गोविंदलाल का चेहरा पत्थर हो चुका था।

तभी लाल लिफाफे से एक पन्ना नीचे गिरा। उस पर रिया की लिखावट में लिखा था—“पहले अर्जुन से हस्ताक्षर, फिर मम्मी को समझा देंगे।”

गोविंदलाल ने पन्ना उठाया और बेटे की ओर देखा।

“अब अस्पताल चलूँगा। लेकिन तू नहीं आएगा।”

PART 2

अर्जुन ने कुर्सी पकड़ ली। “पापा, वह मेरी माँ हैं।”

गोविंदलाल की आँखें लाल थीं, पर आवाज़ स्थिर थी। “कल तक इस वाक्य का मतलब था।”

अस्पताल में विमला रात भर निगरानी में रहीं। डॉक्टर ने कहा, “थोड़ी देर और होती तो बात बहुत बिगड़ सकती थी।” गोविंदलाल ने सिर हिलाया, पर भीतर से टूट गए। उनकी पत्नी की जान एक संयोग से बची थी—एक रद्द बैठक, एक जल्दी लौटती रेल, एक मिठाई का डिब्बा।

रात 3 बजे घर लौटकर उन्होंने शराब नहीं पी, किसी को गाली नहीं दी। उन्होंने बैंक खोला। अर्जुन की अतिरिक्त सुविधा बंद की। हर महीने भेजे जाने वाले 1,20000 रुपये रोक दिए। गाड़ी का पारिवारिक बीमा अलग कराया। वकील को संदेश भेजा—“घर, गोदाम और संपत्ति पर कोई दस्तखत बिना मेरे और विमला के मान्य न हों।”

सुबह 8 बजे ताला बदल गया।

9 बजे अर्जुन आया। चाबी नहीं चली। फोन पर उसकी आवाज़ काँपी। “आप मुझे बेइज़्ज़त कर रहे हैं?”

गोविंदलाल ने कहा, “कल तूने खुद को बेइज़्ज़त किया।”

अर्जुन चुप रहा। फिर बोला, “रिया को पता था आप नहीं होंगे। सब उसने और उसके पिता ने पहले से बनाया था।”

गोविंदलाल की साँस रुक गई।

पीछे से रिया चीखी, “कह दो, तुम्हारे पिता हमें धमका नहीं सकते!”

गोविंदलाल ने लाल लिफाफे को देखा।

“11 बजे सबको लेकर आओ। आज कागज़ नहीं, चेहरों पर दस्तखत होंगे।”

PART 3

11 बजकर 5 मिनट पर वही काली गाड़ी फिर फाटक के बाहर खड़ी थी। इस बार गोविंदलाल ने घंटी बजने से पहले दरवाज़ा खोल दिया। राजीव मेहता आगे-आगे आए, महँगी खुशबू और महँगे अहंकार में लिपटे हुए। सुनीता की आँखें इधर-उधर भाग रही थीं। रिया ने हल्के गुलाबी रंग की साड़ी पहनी थी, चेहरे पर वैसी सख्ती थी जैसी अदालत में झूठ बोलने वाले लोग आईने के सामने अभ्यास करके लाते हैं। अर्जुन सबसे पीछे था। उसकी चाल में रात भर का पछतावा और डर दोनों थे।

गोविंदलाल उन्हें बैठक में नहीं, रसोई में ले गए। उसी रसोई में, जहाँ कल खाना चल रहा था। मेज़ साफ थी। ऊपर लाल लिफाफा, 3 प्रतियाँ और उनका फोन रखा था।

ऊपर कमरे में विमला थीं। गोविंदलाल ने उन्हें आराम करने को कहा था, मगर वह जानते थे कि वह हर आवाज़ सुन रही होंगी। यह वही घर था जिसकी हर सीढ़ी की चरमराहट तक विमला पहचानती थीं।

राजीव ने कुर्सी खींची। “देखिए, कल भावनात्मक स्थिति थी। गलती से बात बिगड़ गई।”

गोविंदलाल ने कहा, “गलती से नमक ज्यादा पड़ता है। गलती से किसी की बीमारी के बीच दस्तखत नहीं करवाए जाते।”

रिया ने तीखे स्वर में कहा, “मम्मीजी ने खुद बात बढ़ाई थी। उन्हें हर बात में बीच में बोलने की आदत है।”

अर्जुन ने पहली बार सिर उठाया। “रिया।”

“क्या?” वह पलटी। “मैं सच बोल रही हूँ।”

गोविंदलाल ने लाल लिफाफा खोला। एक पन्ना निकाला। “सच यही है?”

उस पन्ने पर लिखा था—“गोविंदलाल अहमदाबाद में। अवसर ठीक। विमला भावुक होंगी। अर्जुन पर दाम्पत्य दबाव प्रभावी रहेगा।”

सुनीता का चेहरा पीला पड़ गया।

राजीव ने पन्ना छीनने की कोशिश की। “ये निजी नोट्स हैं।”

“निजी?” गोविंदलाल ने कागज़ ऊँचा किया। “मेरे घर में, मेरी संपत्ति पर, मेरे बेटे को मेरी अनुपस्थिति में दबाव में लाने की योजना निजी नहीं, चरित्र का प्रमाण है।”

राजीव ने मेज़ पर हथेली मारी। “शब्द संभालकर बोलिए। हम चोर नहीं हैं। हम अपनी बेटी का भविष्य सुरक्षित कर रहे थे।”

“मेरी पत्नी के वर्तमान को कुचलकर?”

रिया ने हँसकर कहा, “वह मर तो नहीं गईं।”

उस एक वाक्य ने कमरे की हवा काट दी।

अर्जुन कुर्सी से उठ गया। उसकी आँखों में पहली बार डर नहीं, घृणा थी। “तुमने क्या कहा?”

रिया ने होंठ भींचे। “मेरा मतलब था कि आप सब बात को बहुत बड़ा बना रहे हैं।”

“वह फर्श पर थीं,” अर्जुन ने धीमे लेकिन साफ स्वर में कहा। “और मैं… मैं वहाँ नहीं गया। पर तुम अभी भी उन्हें दोष दे रही हो।”

रिया की आँखें फैल गईं। “अब नाटक मत करो। कल तुम भी हमारे साथ थे।”

“हाँ,” अर्जुन ने सिर झुका लिया। “यही मेरी सबसे बड़ी शर्म है।”

गोविंदलाल ने फोन उठाया। “शायद तुम्हें सबको अपनी आवाज़ें सुननी चाहिए।”

उन्होंने रिकॉर्डिंग चलाई। घर के प्रवेशद्वार के पास लगी सुरक्षा युक्ति ने पिछली दोपहर की आवाज़ें साफ नहीं, पर पर्याप्त पकड़ ली थीं।

विमला की आवाज़ आई, कमजोर पर दृढ़—“राजीवभाई, गोविंदलाल के बिना अर्जुन से कुछ मत लिखवाइए। यह गोदाम सिर्फ कागज़ नहीं, हमारी उम्र है।”

राजीव की आवाज़ आई—“विमलाबेन, आप भावुक हो रही हैं। संपत्ति की बातें पुरुष बेहतर समझते हैं।”

फिर विमला—“पुरुष? जब 1999 में बैंक वाला घर लेने आया था, तब मैंने अपनी शादी के कंगन बेचे थे। जब दुकान में घाटा हुआ, तब मैंने खाताबही लिखी थी। जब यह बेटा बुखार में जलता था, तब मैं रात भर जागती थी। किस अधिकार से कह रहे हैं कि मैं नहीं समझती?”

फिर रिया का स्वर—“मम्मीजी, आप हर बात में त्याग गिनाने लगती हैं। हमें भी अपनी ज़िंदगी बनानी है।”

विमला—“बनाओ। पर किसी की पीठ पर पैर रखकर नहीं।”

कुर्सी घिसटने की आवाज़ आई। फिर राजीव—“अर्जुन, अपनी माँ को भीतर भेजो। बात बिगड़ रही है।”

अर्जुन की आवाज़, धीमी, दब्बू—“माँ, आप बैठक में बैठ जाइए। हम बस देख रहे हैं।”

फिर विमला—“सिर फट रहा है… आँखों के आगे अँधेरा…”

कुछ कदम। फिर खामोशी।

और उसके बाद राजीव की आवाज़—“चलो, अब शांति है। अर्जुन, यहाँ हस्ताक्षर करो।”

गोविंदलाल ने फोन बंद कर दिया।

रसोई में कोई आवाज़ नहीं थी। सिर्फ घड़ी टिक-टिक कर रही थी।

अर्जुन ने अपने चेहरे पर हाथ रख लिया। उसके कंधे काँप रहे थे। वह रो रहा था, मगर इस बार अपने लिए नहीं। उसे शायद पहली बार वह दृश्य सच में दिखाई दिया था—माँ फर्श पर, वह मेज़ पर।

राजीव ने गला साफ किया। “धुंधली आवाज़ों से अदालत नहीं चलती।”

गोविंदलाल ने शांत स्वर में कहा, “अदालत का काम वकील देखेंगे। आज परिवार का काम है—चेहरे पहचानना।”

रिया अर्जुन की ओर मुड़ी। “तुम्हें समझ में नहीं आ रहा। तुम्हारे पापा तुम्हें फिर बच्चा बना रहे हैं। तुम्हारे पास कमाई कितनी है? तुम्हारी गाड़ी, तुम्हारा खर्च, तुम्हारा घर—सब किसके दम पर था? मेरे पिता ने सिर्फ तुम्हें तुम्हारा हक दिलाना चाहा।”

अर्जुन ने कहा, “हक माँ के खून के पास रखकर नहीं लिया जाता।”

रिया का चेहरा लाल हो गया। “तुम मुझे छोड़ दोगे? अपने माता-पिता के लिए?”

अर्जुन ने बहुत देर बाद उत्तर दिया। “मैं तुम्हें नहीं छोड़ रहा। मैं उस आदमी को छोड़ रहा हूँ जो तुम्हारे डर और लालच में अपनी माँ को छोड़ आया।”

सुनीता ने काँपती आवाज़ में कहा, “रिया, चलो।”

लेकिन रिया नहीं हटी। “तुम पछताओगे। तुम्हारे पिता ने पैसे बंद कर दिए हैं। बिना हमारी मदद के तुम 3 महीने भी नहीं टिकोगे।”

अर्जुन ने पहली बार पिता की ओर देखा। गोविंदलाल ने कुछ नहीं कहा। कोई सहारा नहीं, कोई बचाव नहीं। सिर्फ सत्य।

अर्जुन ने गहरी साँस ली। “तो मैं सीखूँगा कि जितना कमाता हूँ, उतना ही जीना होता है।”

तभी सीढ़ियों से धीमे कदमों की आवाज़ आई।

विमला देवी दरवाज़े पर खड़ी थीं। हल्की सूती साड़ी, माथे पर फीकी बिंदी, चेहरा पीला, पर आँखों में ऐसी आग थी जिसने पूरे कमरे को छोटा कर दिया। गोविंदलाल तुरंत उठे।

“विमला, तुम्हें आराम करना चाहिए।”

वह बोलीं, “कल बहुत आराम कर लिया। फर्श पर।”

किसी में हिम्मत नहीं हुई कि कुछ कहे।

विमला धीरे-धीरे मेज़ तक आईं। अर्जुन ने एक कदम बढ़ाया, फिर रुक गया। वह समझ चुका था कि माँ तक पहुँचने का अधिकार सिर्फ जन्म से नहीं मिलता, आचरण से भी मिलता है।

“माँ…” उसकी आवाज़ टूट गई।

विमला ने उसे देखा। बहुत देर तक। फिर बोलीं, “कल जब मैं गिरी थी, मैंने चम्मच की आवाज़ सुनी।”

अर्जुन की आँखें भर आईं। “माँ, मैं गलत था। मैं बहुत छोटा निकला।”

“हाँ,” विमला ने कहा। “तू छोटा निकला। पर बच्चा नहीं। बच्चा गलती करे तो माँ उठा लेती है। बड़ा आदमी गिराए तो उसे अपने पैरों पर लौटना पड़ता है।”

अर्जुन ने सिर झुका लिया।

विमला ने रिया की तरफ देखा। “तुमने कहा था कि मैं समझती नहीं।”

रिया ने जवाब देना चाहा। “मेरा वह मतलब—”

“मतलब वही था जो मुँह से निकला,” विमला ने रोक दिया। “धीमे बोलने वाली औरत मूर्ख नहीं होती। चुप रहने वाली औरत बेखबर नहीं होती। मैंने इस घर की दीवारों में अपना सोना नहीं, अपनी नींद गाड़ रखी है। मैंने तुम्हारे पति को सिर्फ जन्म नहीं दिया, अपनी हड्डियों की गर्मी से पाला है। तुम उसे सम्मान देना सिखातीं तो मैं तुम्हें बेटी कहती। तुमने उसे माँ से नज़र फेरना सिखाया।”

रिया के चेहरे पर अपमान और क्रोध मिल गए। “आप मुझे दोष दे रही हैं? अर्जुन ने खुद साथ दिया।”

“हाँ,” विमला बोलीं। “और उसका हिसाब उससे होगा। पर तुम्हारा हिसाब तुम्हारे शब्दों से होगा।”

राजीव ने ऊँची आवाज़ में कहा, “बस बहुत हुआ। हम किसी के घर अपमान सहने नहीं आए।”

विमला ने उसकी ओर देखा। “तो आए क्यों थे? सम्मान करने? या मेरे पति की अनुपस्थिति में मेरे बेटे से कागज़ लिखवाने?”

राजीव ने उंगली उठाई। “आप भावुक हो रही हैं।”

विमला ने एक कदम आगे बढ़कर कहा, “कल जब मैंने कहा था कि मुझे धुंधला दिख रहा है, तब आपको हस्ताक्षर साफ दिख रहे थे। आज आपकी आवाज़ मुझे साफ सुनाई दे रही है। मेरे घर में अब आप चुप रहेंगे।”

वह “चुप” इतना ठंडा था कि राजीव की उठी हुई उंगली हवा में ही रुक गई।

गोविंदलाल ने मेज़ से 3 प्रतियाँ उठाईं। “ये हमारे वकील की सूचना है। गोदाम, घर, खाते—सब पर दोहरी सहमति की व्यवस्था होगी। किसी भी तरह की लिखत, दबाव, दावा या पारिवारिक प्रस्ताव बिना मेरे और विमला के अमान्य माना जाएगा। और अगर किसी ने फिर इस तरह की कोशिश की, तो मामला परिवार की बात नहीं रहेगा।”

राजीव ने कागज़ देखा। उसकी आँखों में पहली बार डर आया। “आप धमका रहे हैं?”

“नहीं,” गोविंदलाल बोले। “दरवाज़े बंद कर रहा हूँ।”

रिया ने अर्जुन की ओर हाथ बढ़ाया। “चलो।”

अर्जुन ने सिर हिलाया। “नहीं।”

“मतलब?”

“मैं आज तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगा।”

रिया की आवाज़ काँपी, मगर क्रोध से। “तुम्हें लगता है तुम्हारे माता-पिता तुम्हें फिर अपना लेंगे? ये तुम्हें भूखा रखेंगे, फिर शर्तों पर माफ करेंगे।”

विमला ने धीरे कहा, “माफी सौदा नहीं होती। और भूख कभी-कभी आदमी को पहली बार खुद का स्वाद चखाती है।”

अर्जुन ने आँसू पोंछे। “मुझे उनसे अभी माफी नहीं चाहिए। मुझे अपने किए का भार चाहिए।”

रिया पीछे हट गई। उसके लिए यह सबसे बड़ा पराजय था—अर्जुन पहली बार उसके पिता की भाषा में जवाब नहीं दे रहा था।

सुनीता ने रिया का हाथ पकड़ा। “चलो बेटी।”

दरवाज़े तक पहुँचकर रिया पलटी। “आप लोगों ने मेरा घर तोड़ दिया।”

विमला ने थकी हुई आँखों से कहा, “जिस घर की नींव किसी माँ के अपमान पर रखी हो, उसे टूटना ही चाहिए।”

दरवाज़ा बंद हुआ। बाहर गाड़ी की आवाज़ आई। फिर घर में सन्नाटा लौट आया।

अर्जुन बैठक के बीच खड़ा था। वहीं, जहाँ कल विमला गिरी थीं। उसने फर्श की ओर देखा, जैसे वहाँ अभी भी खून का धब्बा दिख रहा हो।

“मैं कैसे ठीक करूँ?” उसने पूछा।

गोविंदलाल के पास उत्तर था, पर विमला ने पहले कहा, “एक वाक्य से नहीं। एक बदली हुई जिंदगी से।”

अर्जुन ने सिर हिलाया। “मैं आज चला जाऊँगा।”

“हाँ,” गोविंदलाल ने कहा।

यह “हाँ” जरूरी था, और निर्मम भी।

अर्जुन ने माँ को देखा। “क्या मैं कल फोन कर सकता हूँ?”

विमला ने बहुत देर बाद कहा, “संदेश भेजना। अगर मन हुआ, पढ़ लूँगी।”

अर्जुन ने आगे बढ़कर उनके पैर छूने चाहे। विमला पीछे नहीं हटीं, पर उन्होंने उसे उठाया भी नहीं। उसने उनके पाँव छुए, रोया, फिर बिना चाबी, बिना गाड़ी, बिना बैंक की छाया के घर से निकल गया। पहली बार वह उस फाटक से बेटे की तरह नहीं, अपने कर्मों का बोझ उठाए आदमी की तरह निकला।

अगले दिन आसान नहीं थे। कोई फिल्मी मिलन नहीं हुआ। कोई त्यौहार जैसी माफी नहीं आई।

गोविंदलाल ने वकील के साथ सारी संपत्ति की व्यवस्था बदली। गोदाम ऐसी कानूनी सुरक्षा में गया जिसमें विमला की स्पष्ट सहमति के बिना कुछ नहीं हो सकता था। बैंक में अधिकार बदले गए। साझेदारों को सूचना दी गई कि मेहता परिवार की किसी बात को शाह परिवार की सहमति न माना जाए।

मेहता परिवार ने पहले कठोर पत्र भेजा। उसमें लिखा था कि अर्जुन पर पारिवारिक दबाव है, आर्थिक हिंसा है, और संपत्ति छुपाई जा रही है। गोविंदलाल के वकील ने अस्पताल की रिपोर्ट, सुरक्षा रिकॉर्डिंग, कागज़ों की प्रतियाँ और एम्बुलेंस विवरण भेजा। अगला पत्र बहुत छोटा था। उसमें समझौते की भाषा थी, धमकी की नहीं।

अर्जुन ने महँगा किराये का घर छोड़ा। वह अपने पुराने मित्र के छोटे कमरे में रहने लगा। उसने गाड़ी लौटा दी। उसने पिता से पैसे नहीं माँगे। रोज़ एक संदेश भेजता।

“आज पहली बार बस से दफ्तर गया।”

“आज अपने खर्च लिखे।”

“आज चिकित्सक से बात की।”

“आज समझ आया कि मैं डर को प्रेम समझता रहा।”

“आज माँ का रक्तचाप पूछने का मन हुआ, पर अधिकार नहीं समझा।”

विमला सारे संदेश पढ़तीं। जवाब नहीं देतीं।

15वें दिन उन्होंने सिर्फ लिखा—“समझ तभी सच है जब वह व्यवहार बदल दे।”

अर्जुन ने 1 मिनट में जवाब दिया—“मैं आपको देखने के लिए मजबूर नहीं करूँगा। बस बदलता रहूँगा।”

विमला ने फोन बंद कर दिया। फिर रसोई में बैठकर रोईं। गोविंदलाल ने उनके पास बैठकर उनका हाथ पकड़ा। उन्होंने कोई बड़ी बात नहीं कही। कुछ दुखों को शब्द छूते हैं तो वे और फैल जाते हैं।

3 महीने बाद अर्जुन ने डाकपेटी में एक लिफाफा डाला। उसने घंटी नहीं बजाई। अंदर 1,20000 रुपये का चेक था और एक पर्ची।

“यह माफी खरीदने के लिए नहीं है। यह उस सहारे की पहली किश्त है जिसे मैं अधिकार समझ बैठा था।”

विमला ने पर्ची 4 बार पढ़ी। चेक नहीं भुनाया। उसे उस दराज़ में रख दिया जहाँ अर्जुन की बचपन की तस्वीरें, टूटी हुई पेंसिल, पहली कक्षा का पहचानपत्र और पुराने राखी के धागे रखे थे।

दीपावली आई। पहले घर में रोशनी होती थी, इस बार सादगी थी। तुलसी के पास 5 दीये जलाए गए। गोविंदलाल ने फाटक खुद साफ किया। विमला ने रंगोली बनाई, मगर बीच में रंग भरते हुए हाथ काँप गया। उन्होंने कहा, “ठीक नहीं बन रही।”

गोविंदलाल ने देखा। “घर भी तो धीरे-धीरे ठीक बनता है।”

वह हल्का-सा मुस्कुराईं।

उस रात अर्जुन का संदेश आया—“दीपावली की शुभकामनाएँ। मैं मिठाई नहीं भेज रहा, क्योंकि शायद अभी मेरा भेजा मीठा लगे भी नहीं। बस इतना कि आज पहली बार समझा, घर रोशनी से नहीं, भरोसे से जगता है।”

विमला ने देर तक फोन देखा। फिर जवाब लिखा—“दीया जलाए रखो। दरवाज़ा अभी बंद है।”

अर्जुन ने सिर्फ लिखा—“समझ गया।”

6 महीने बाद, मकर संक्रांति के आसपास, विमला ने पहली बार उसे मिलने का समय दिया। रविवार सुबह 10 बजे। 30 मिनट। कोई बहस नहीं। कोई सफाई नहीं।

अर्जुन आया तो हाथ में महँगा उपहार नहीं था। बस घर के पास वाली दुकान से तिलगुड़ था, वही जो विमला को पसंद था। उसने फाटक खोला नहीं; बाहर खड़ा रहा। गोविंदलाल ने दरवाज़ा खोला।

“अंदर आओ,” उन्होंने कहा, पर आवाज़ में पुरानी गर्मी नहीं थी।

अर्जुन ने जूते उतारे। बैठक में कदम रखते ही उसकी आँखें उस जगह चली गईं जहाँ माँ गिरी थीं। नया कालीन था, पर उसे पुराना धब्बा दिख रहा था। शायद कुछ धब्बे वस्तु पर नहीं, आत्मा पर लगते हैं।

विमला कुर्सी पर बैठी थीं। वह पहले से मजबूत लग रही थीं, पर उनकी आँखों के नीचे बीती रातों की छाया थी।

अर्जुन ने कहा, “मैं यहाँ माफी लेने नहीं आया। मैं बताने आया हूँ कि मैं याद रखता हूँ।”

विमला ने पूछा, “क्या याद रखते हो?”

“आपकी आवाज़। ‘आँखों के आगे अँधेरा’… और मेरा न आना।”

कमरे में भारी चुप्पी फैल गई।

गोविंदलाल खिड़की के पास खड़े रहे। वह बेटे को बचाना चाहते थे, पर अब उन्होंने सीखा था—हर गिरावट से बचा लेने वाला पिता कभी-कभी बेटे को इंसान बनने से रोक देता है।

विमला ने धीरे से हाथ आगे बढ़ाया।

बाँहें नहीं। सिर्फ हाथ।

अर्जुन उनके पास आया, जैसे मंदिर की सीढ़ियों पर कोई अपराधी पैर रखता है। उसने उनकी उंगलियाँ पकड़ लीं। विमला ने 1 बार दबाया। फिर 2वीं बार।

अर्जुन का चेहरा फट गया। वह बच्चे की तरह नहीं, पछतावे से भरे आदमी की तरह रोया।

विमला ने कहा, “यह क्षमा नहीं है। यह दरवाज़े की पहली सांकल खुली है।”

अर्जुन ने सिर झुका दिया। “मैं जल्दी नहीं करूँगा।”

“करना भी मत,” गोविंदलाल ने कहा।

उस मुलाकात में 27 मिनट लगे। जाते समय अर्जुन ने दरवाज़े पर मुड़कर कहा, “पापा, आपने पैसे बंद किए, तब लगा आपने मुझे छोड़ दिया। अब समझता हूँ, शायद पहली बार आपने मुझे मेरे पैरों पर छोड़ा।”

गोविंदलाल ने कोई भावुक उत्तर नहीं दिया। बस इतना कहा, “पैरों पर खड़े रहना सीख। किसी की गर्दन पर नहीं।”

अर्जुन चला गया।

घर फिर शांत हो गया। पर वह वैसा सन्नाटा नहीं था जैसा उस दिन था। इसमें साँस थी। दर्द था, पर जगह भी थी। जैसे टूटी दीवार में दरार के बीच से रोशनी की एक पतली रेखा अंदर आ गई हो।

रात को विमला रसोई में खड़ी थीं। उन्होंने तिलगुड़ का छोटा टुकड़ा काटा। बोलीं, “शक्कर ठीक नहीं है।”

गोविंदलाल ने कहा, “फिर भी 2 टुकड़े रख दो।”

वह मुस्कुराईं। पहली बार सचमुच।

फिर अचानक उनका चेहरा गंभीर हो गया। “गोविंद, क्या हम बहुत कठोर हो गए?”

गोविंदलाल ने उनकी ओर देखा। “जिस दिन तुम फर्श पर थीं, लोग रसोई में खा रहे थे। कठोरता हमने नहीं शुरू की।”

विमला ने आँखें झुका लीं। “वह मेरा बेटा है।”

“हाँ,” गोविंदलाल बोले। “और इसी कारण उसे सच से बचाना अब प्रेम नहीं होगा।”

विमला ने उनका हाथ पकड़ा। वही पुराना संकेत। 2 बार दबाया।

गोविंदलाल ने भी 2 बार दबाया।

उन्हें पता था कि बाहर दुनिया इस कहानी के अपने निर्णय बनाएगी। कुछ कहेंगे, पिता ने बेटे को बहुत कठोर दंड दिया। कुछ कहेंगे, माँ को जल्दी माफ कर देना चाहिए था। लोग हमेशा क्षमा बाँटने में उदार होते हैं, जब खून किसी और के फर्श पर गिरा हो।

लेकिन गोविंदलाल ने जो देखा था, उसे कोई बहस मिटा नहीं सकती थी—पत्नी फर्श पर, बेटा थाली के पास, ससुराल वाले कागज़ों पर झुके हुए, और वह वाक्य—“बस यहाँ दस्तखत करवा लो”—जैसे पूरी उम्र की मेहनत, प्रेम, बीमारी, त्याग और भरोसा एक कलम की नोक से मिटाया जा सकता हो।

उस दिन के बाद उन्होंने परिवार को तस्वीरों की मुस्कान से नहीं, कठिन क्षणों के व्यवहार से मापना शुरू किया। उन्हें समझ आया कि बेटे को हर सुविधा देना पालन नहीं, कभी-कभी कमजोरी की खेती होता है। विमला ने भी सीखा कि माँ होना अपने आप को मिटा देना नहीं होता। माँ प्यार कर सकती है, पर अपने लहू पर किसी को पैर रखने की अनुमति नहीं दे सकती।

कई रातों तक विमला अब भी चौंककर जाग जाती थीं। कभी-कभी उन्हें लगता, बैठक से चम्मच की आवाज़ आ रही है। वह अँधेरे में गोविंदलाल का हाथ खोजतीं। जब हाथ मिल जाता, वह 2 बार दबातीं।

हर बार गोविंदलाल जवाब देते।

क्योंकि उस हाथ को उन्होंने अपने मन में वचन दिया था—अब कोई भी उसे अकेला, खून से भीगा, बैठक के फर्श पर छोड़कर रसोई में खाना नहीं खाएगा।

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