
PART 1
बंद कमरे के भीतर से बूढ़ी माँ की चीख आ रही थी, और बाहर आँगन में उसकी बहू पड़ोसियों से कह रही थी कि “उनका दिमाग अब ठीक नहीं रहा, वह खुद को चोट पहुँचा लेती हैं।”
मेजर अर्जुन राठौड़ 5 हफ्ते बाद कश्मीर सीमा से जयपुर के अपने पुराने घर लौटे थे। कंधे पर फौजी बैग था, चेहरे पर धूप और थकान की परतें थीं, मगर मन में बस 2 तस्वीरें बची थीं—माँ के हाथ की इलायची वाली चाय और पत्नी मीरा का दरवाज़े पर इंतज़ार।
लेकिन दरवाज़े पर मीरा अकेली नहीं थी।
वह हल्की रेशमी साड़ी में, माथे पर छोटी बिंदी लगाए, मोहल्ले की 3 औरतों और सामने वाले शर्मा जी से दुख भरी आवाज़ में कह रही थी, “शारदा माँ अब पहले जैसी नहीं रहीं। रात भर चिल्लाती हैं, चीज़ें फेंकती हैं, कभी कहती हैं मैंने उन्हें कैद कर रखा है। कल तो अलमारी से टकराकर खुद को नीला कर लिया। मैं अकेली क्या-क्या सँभालूँ?”
तभी ऊपर से ज़ोर की धमक हुई।
“अर्जुन! बेटा, मुझे निकाल ले… वह मुझे मार डालेगी!”
अर्जुन का शरीर एक पल के लिए पत्थर हो गया। यह आवाज़ उसकी माँ शारदा देवी की थी, मगर टूटी हुई, दबाई हुई, डरी हुई।
मीरा तुरंत पलटी। उसकी आँखों में घबराहट चमकी, फिर उसने वही बनावटी करुणा चेहरे पर चढ़ा ली।
“देखा? यही हाल है पूरे दिन,” उसने धीमे से कहा। “मैंने कमरे को बाहर से बंद किया है, उनकी सुरक्षा के लिए। डॉक्टर ने कहा है कि उन्हें निगरानी में रखना होगा।”
अर्जुन ने ऊपर खिड़की की ओर देखा। परदा थोड़ा हिला। जैसे कोई साँस रोककर खड़ा हो।
वह चिल्लाया नहीं। उसने फौज में सीखा था कि असली खतरे के सामने गुस्सा नहीं, चुप्पी काम आती है। उसने मीरा को गले लगाया, पड़ोसियों को नमस्ते किया, पूछा बिजली ठीक है या नहीं, पानी की टंकी भर रही है या नहीं। वह थका हुआ पति बना रहा, शक में जलता बेटा नहीं।
जब सब लोग चले गए, मीरा ने रसोई में उसे पानी दिया। ऊपर से फिर हल्की चोट की आवाज़ आई।
मीरा बोली, “अब समझे? मैं क्यों टूट गई हूँ?”
अर्जुन ने गिलास रखा। “मैं नहा लेता हूँ।”
वह सीढ़ियाँ चढ़ा। उसे पता था मीरा घर की ज़रूरी चाबियाँ कहाँ छिपाती है—पूजा की अलमारी के नीचे चूड़ियों के डिब्बे में। चाबी वहीं थी।
दरवाज़ा खुलते ही बंद हवा, गीले कपड़ों और डर की गंध ने उसका स्वागत किया।
कमरे में पलंग नहीं था। फर्श पर पतली गद्दी पड़ी थी। कोने में आधा भरा गिलास था। न पंखा ठीक चल रहा था, न रोशनी। उसकी माँ, 72 साल की शारदा देवी, दीवार से सटी बैठी थीं। वही हल्का पीला स्वेटर पहने, जो उन्होंने 4 दिन पहले चित्र-संदेश वाली बातचीत में पहना था।
उन्होंने सिर उठाया।
आँखें साफ थीं।
कलाई पर गहरे नीले निशान थे।
“बेटा,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा, “मैं पागल नहीं हूँ।”
अर्जुन के भीतर कुछ टूटकर गिरा।
“मुझे पता है, माँ।”
शारदा देवी कुछ कहना चाहती थीं, पर नीचे से मीरा के कदमों की आहट आई। पलक झपकते ही उनकी आँखें धुँधली, चेहरा खाली और आवाज़ बुझी हुई हो गई।
“अभी नहीं,” उन्होंने होंठ हिलाए। “वह सब देखती है।”
अर्जुन समझ गया। उसने दरवाज़ा बाहर से बंद किया। ताला लगाते समय माँ की उँगलियाँ क्षण भर उसकी उँगलियों से चिपक गईं।
“नाटक करना,” माँ ने कहा।
उस रात मीरा ने दाल बाटी, चूरमा और कढ़ी बनाई, जैसे घर में त्योहार हो। खाने की मेज़ पर उसने एक मोटी फाइल रखी।
“अर्जुन, माँ की हालत बहुत बिगड़ गई है,” उसने रोटी तोड़ते हुए कहा। “डॉक्टर माथुर ने कहा है कि यह गंभीर भूलने की बीमारी हो सकती है। कल हमें एक मनोचिकित्सक से मिलना है। अगर वह लिख दें कि माँ अपनी संपत्ति नहीं सँभाल सकतीं, तो तुम्हें बस यहाँ दस्तखत करने होंगे।”
फाइल में कागज़ थे—चिकित्सकीय प्रमाणपत्र, बैंक संबंधी अधिकार पत्र, संरक्षकता के आवेदन, और सबसे नीचे हवेली बेचने का प्रारूप। वह हवेली शारदा देवी को उनके दिवंगत पति से मिली थी, पुरानी जयपुर में जौहरी बाज़ार के पास, जिसकी कीमत करोड़ों में थी।
मीरा ने धीरे से कहा, “हवेली बेच देंगे। माँ को अच्छे निजी वृद्धाश्रम में रख देंगे। यह सब उनके सम्मान के लिए है।”
अर्जुन ने सिर उठाया।
“माँ की हवेली नहीं बिकेगी।”
मीरा मुस्कुराई, जैसे किसी बच्चे को समझा रही हो।
“भावुक मत बनो, अर्जुन। इतनी पुरानी इमारत संभालने से अच्छा है उसे पैसे में बदल देना।”
यही वाक्य अर्जुन के लिए काफी था।
रात 2 बजे, जब मीरा सो गई, अर्जुन अध्ययन-कक्ष में गया। उसने सुरक्षा कैमरों की रिकॉर्डिंग खोली। पिछले 3 महीने गायब थे। लेकिन मिटाने का हिसाब बचा था। हर बार रिकॉर्डिंग मीरा के निजी यंत्र से हटाई गई थी।
उसने माँ की डाक और बैंक संदेश देखे। सारी सूचना मीरा के दूसरे पते पर जा रही थी। फिर उसने एक लंबित लेन-देन पाया—74,80000 रुपये एक ऐसी कंपनी के खाते में जाने वाले थे, जिसका नाम था “राजवाड़ा विरासत प्रॉपर्टीज़।”
अर्जुन की आँखें ठंडी हो गईं।
उसने पासवर्ड बदले, सबूत सुरक्षित किए, रसोई की मेज़ के नीचे छोटा ध्वनि-रिकॉर्डर चिपकाया और अपने पुराने फौजी मित्र, जो अब अपराध शाखा में था, उसे संदेश भेजा।
भोर से पहले वह खिड़की से माँ के कमरे में साफ कपड़े और पानी पहुँचा गया।
शारदा देवी जाग रही थीं।
“माँ,” अर्जुन ने धीमे से कहा, “कल तुम्हें थोड़ी उलझी हुई दिखना होगा।”
शारदा देवी ने अपनी नीली कलाई देखी, फिर बेटे की आँखों में देखा।
उनके होंठों पर ठंडी, तेज मुस्कान आई।
“कितनी उलझी हुई, बेटा?”
उसी पल अर्जुन समझ गया कि मीरा ने जिस औरत को तोड़ने की सोची थी, वह अब भी भीतर से लोहे की बनी थी।
PART 2
सुबह शारदा देवी रसोई में उतरीं। मीरा ने ऊँची आवाज़ में कहा, “माँ जी, रात अच्छी नींद आई?”
शारदा देवी ने गैस-चूल्हे को ध्यान से देखा और बोलीं, “यहाँ जयपुर से अजमेर वाली बस मिलती है क्या?”
मीरा ने अर्जुन की ओर विजयी नज़र से देखा। “देखा? इन्हें रसोई और बस अड्डे में फर्क नहीं दिखता।”
अर्जुन ने चाय की प्याली उठाई। “धैर्य रखना पड़ेगा।”
तभी शारदा देवी ने चीनीदान गिरा दिया। चीनी फर्श पर बिखर गई।
मीरा बिजली की तरह लपकी। उसने शारदा देवी की कलाई ऐसे पकड़ी कि नीले निशान और गहरे हो गए।
“बूढ़ी चुड़ैल,” वह दाँत भींचकर बोली, “अपना नाटक बंद कर। आज सब बिगाड़ दिया तो याद रखना, वृद्धाश्रम में तुझे कोई पानी भी नहीं देगा।”
अर्जुन ने मेज़ के नीचे लगे रिकॉर्डर की हल्की चमक देखी।
“मीरा,” उसने शांत स्वर में कहा, “हाथ छोड़ो। माँ को चोट लग सकती है।”
मीरा तुरंत पीछे हटी।
“तुम देख रहे हो न? वह मुझे मजबूर कर देती हैं।”
10 बजे वे मनोचिकित्सक डॉ. नंदिता कपूर के क्लिनिक पहुँचे। मीरा फाइल सीने से चिपकाए थी। उसे लगा आज शारदा देवी की आवाज़ हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।
लेकिन जैसे ही अर्जुन ने अपना अलग लिफाफा डॉक्टर की मेज़ पर रखा, मीरा के चेहरे से रंग उड़ गया।
PART 3
डॉ. नंदिता कपूर का क्लिनिक मालवीय नगर की शांत इमारत में था। बाहर नीम का पेड़ था, भीतर सफेद दीवारें, पीतल की छोटी घंटी और काँच की मेज़ पर ताजे गेंदे के फूल। मीरा ऐसे बैठी थी जैसे वह कोई पीड़ित बहू हो, जिसने घर बचाने के लिए खुद को जला दिया हो।
“डॉक्टर,” उसने नम आवाज़ में कहा, “मैंने सब प्रमाण लाए हैं। माँ जी को भ्रम होता है, वह कहती हैं मैंने उन्हें बंद किया, मारा, उनकी संपत्ति छीनना चाहती हूँ। वह कभी-कभी बहुत आक्रामक हो जाती हैं। अर्जुन अभी सीमा से लौटे हैं, भावुक हैं, सच स्वीकार नहीं कर पा रहे।”
अर्जुन चुप रहा।
डॉक्टर ने फाइल ली। कुछ पन्ने देखे। फिर अर्जुन की ओर मुड़ीं।
“आपने भी कुछ लाया है?”
अर्जुन ने लिफाफा आगे कर दिया।
“जी। कुछ तस्वीरें, ताले की जाँच, बैंक की सूचना, और एक दृश्य-संग्रह।”
मीरा ने तुरंत गर्दन घुमाई।
“कौन-सा दृश्य-संग्रह?”
अर्जुन ने उसे नहीं देखा।
डॉ. नंदिता ने लिफाफा खोला। पहले शारदा देवी की कलाई और बाँहों की तस्वीरें थीं। फिर ताला बनाने वाले का लिखित बयान था कि कमरा भीतर से नहीं खुल सकता था। फिर बैंक से निकाले गए दस्तावेज़, जिनमें 74,80000 रुपये के संदिग्ध भुगतान का अनुरोध था। फिर शारदा देवी के नाम से बने फर्जी हस्ताक्षरों की तुलना।
डॉक्टर का चेहरा कठोर होता गया।
“शारदा जी,” उन्होंने नरम आवाज़ में पूछा, “आज कौन-सा दिन है?”
शारदा देवी ने सीधा बैठकर कहा, “सोमवार, 18 मार्च। हम मालवीय नगर में आपके क्लिनिक में हैं। मेरा नाम शारदा राठौड़ है। उम्र 72 साल। पति स्वर्गीय महेंद्र सिंह राठौड़। मेरा घर पुरानी जयपुर में है। मैं सुबह रक्तचाप की दवा लेती हूँ और रविवार को विटामिन की गोली। मेरे 2 बैंक खाते हैं। और नहीं, मुझे भूलने की बीमारी नहीं है।”
मीरा हँस पड़ी, पर हँसी में डर था।
“इनसे रटवाया गया है। मेरी सास बहुत चालाक हैं।”
डॉक्टर ने उसे चुप रहने का संकेत दिया। फिर उन्होंने 40 मिनट तक शारदा देवी से बातें कीं। शब्द याद करवाए, घड़ी बनवाई, रकम का हिसाब पूछा, घरेलू खर्च समझाने को कहा, पड़ोसियों के नाम पूछे, पुरानी रसोई की विधि पूछी, अखबार की ताज़ा खबर पर राय माँगी, जयपुर से दिल्ली का रास्ता पूछा।
शारदा देवी ने सब बताया।
जब डॉक्टर ने उनके पति की मृत्यु का साल गलत कहा, शारदा देवी ने तुरंत सुधार दिया।
“वह 2019 नहीं, 2020 में गए थे। और जाते-जाते एक बात कह गए थे—बेटी, घर की दीवारों से डरना मत, कभी-कभी दीवारें ही गवाही देती हैं।”
मीरा का चेहरा तना।
अर्जुन ने छोटा यंत्र निकाला।
दरअसल पिछले रात माँ ने उसे एक और बात बताई थी। महेंद्र सिंह राठौड़ पुराने ज़माने के कारोबारी थे, जिन्हें चोरी और लालच दोनों से डर लगता था। उन्होंने बरसों पहले पूजा-घर की धूपदानी के पास एक छोटा गुप्त कैमरा लगवाया था, जो मुख्य सुरक्षा व्यवस्था से अलग चलता था। मीरा ने नए कैमरे मिटाए थे, पर पुराने कैमरे का पता उसे कभी नहीं चला।
अर्जुन ने रिकॉर्डिंग चलायी।
पहला दृश्य आया।
मीरा कमरे में घुसती है, शारदा देवी के हाथ से दूरभाष छीनती है।
“किसे बुलाओगी? अर्जुन पहाड़ों पर है। जब लौटेगा, तब तक मैं सबको बता चुकी होऊँगी कि तुम्हारी याददाश्त चली गई है।”
दूसरा दृश्य।
मीरा शारदा देवी को धक्का देकर कमरे में बंद करती है।
“जितना चिल्लाओगी, उतना अच्छा। मोहल्ले वाले सोचेंगे बीमारी बढ़ रही है।”
तीसरा दृश्य और भी भयानक था।
रसोई में एक आदमी बैठा था—विक्रम बंसल, “राजवाड़ा विरासत प्रॉपर्टीज़” का मालिक। सफेद कुर्ता, महँगी घड़ी, हाथ में चाय।
वह कह रहा था, “जैसे ही डॉक्टर अक्षमता लिख देगी, हम हवेली की बिक्री दिखा देंगे। असली कीमत 6 करोड़ से कम नहीं, पर कागज़ में 2 करोड़ 10 लाख रखेंगे। बाकी हिस्सा अलग से। तुम्हारा फौजी पति कागज़ी चाल समझ नहीं पाएगा।”
मीरा ने हँसकर कहा, “उसे बस माँ की बीमारी दिखेगी। वह घर बेचकर सोचता रहेगा कि मैंने सेवा की।”
फिर उसने विक्रम का हाथ पकड़ा।
कमरे में सन्नाटा जम गया।
मीरा खड़ी हो गई।
“यह झूठ है! यह काट-छाँट है! अर्जुन, तुम अपनी पत्नी के साथ ऐसा करोगे?”
अर्जुन ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।
“पत्नी घर बनाती है, मीरा। तुमने मेरी माँ को ताले में रखा।”
मीरा ने रोना शुरू किया।
“मैं थक गई थी। तुम्हारी माँ मुझे कभी स्वीकार नहीं करती थीं। हर बात में टोकती थीं। मैं अकेली थी। विक्रम ने बस सलाह दी।”
शारदा देवी ने धीमे से कहा, “सलाह में नीले निशान नहीं पड़ते, बहू।”
डॉक्टर ने अपना दूरभाष उठाया।
“कृपया बाहर का दरवाज़ा बंद रखिए। पुलिस को ऊपर भेजिए।”
मीरा चौंकी। “आप मुझे रोक नहीं सकतीं।”
डॉ. नंदिता का स्वर ठंडा था। “जब वृद्ध व्यक्ति को बंद रखने, मारने, संपत्ति हथियाने और मानसिक रोग का झूठा प्रमाण बनवाने का मामला हो, तो यह केवल पारिवारिक झगड़ा नहीं रहता।”
कुछ ही मिनटों में 2 पुलिस अधिकारी अंदर आए। उनके पीछे अर्जुन का पुराना मित्र करण भी था, अब अपराध शाखा में निरीक्षक। उसने अर्जुन को बस हल्का-सा सिर झुकाकर देखा, जैसे कह रहा हो—अब कानून बोलेगा।
“मीरा राठौड़,” अधिकारी ने कहा, “आपको वृद्ध महिला को अवैध रूप से बंद रखने, हिंसा, विश्वास का दुरुपयोग, जाली दस्तावेज़, धोखाधड़ी के प्रयास और संपत्ति हड़पने की साज़िश के आरोपों में पूछताछ के लिए चलना होगा।”
मीरा पीछे हट गई।
“मैं इस घर की बहू हूँ!”
शारदा देवी धीरे से उठीं। उनकी चाल कमजोर थी, पर आवाज़ नहीं।
“बहू वह होती है जो घर में दीप जलाए। तुमने तो दरवाज़े पर अंधेरा टाँग दिया।”
मीरा ने अर्जुन की ओर हाथ बढ़ाया।
“कुछ तो बोलो। मैंने तुम्हारा इंतज़ार किया। तुम्हारी पोस्टिंग, तुम्हारी गैरहाजिरी, सब सहा।”
अर्जुन के चेहरे पर थकान थी, घृणा नहीं।
“तुमने मेरा इंतज़ार नहीं किया। तुमने सही समय का इंतज़ार किया।”
“विक्रम ने मुझे उकसाया!”
“लेकिन माँ की कलाई तुम्हारे हाथ ने पकड़ी थी।”
मीरा की आँखें खाली हो गईं। उसके हाथ काँपने लगे। वही चेहरा, जिसे वह पड़ोसियों के सामने आँसुओं से पवित्र बना देती थी, अब बिना रंग का दिख रहा था।
पुलिस उसे ले गई।
उसी समय विक्रम बंसल पुरानी जयपुर के एक वकील के दफ्तर में फाइल लेकर बैठा था। उसे लगता था आज हवेली का रास्ता खुल जाएगा। लेकिन वहाँ पहले से अधिकारी मौजूद थे। उसकी फाइलों से सिर्फ शारदा देवी का मामला नहीं निकला। 3 और बुज़ुर्गों की संपत्तियों के कागज़ निकले—हर जगह वही कहानी, बीमारी का प्रमाण, डराया हुआ परिवार, सस्ती बिक्री, और मोटा लाभ।
शारदा देवी शिकार नहीं थीं।
वह उस जाल की पहली आवाज़ थीं, जो सुनी गई।
डॉ. नंदिता ने साफ लिखा कि शारदा देवी पूरी तरह सचेत, निर्णयक्षम और अपनी संपत्ति संभालने में सक्षम हैं। उन्होंने शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न का उल्लेख किया, अदालत को त्वरित संरक्षण की सलाह दी और पुलिस रिपोर्ट जोड़ी।
अदालत ने हवेली की बिक्री पर रोक लगा दी। बैंक खातों को सुरक्षित किया गया। फर्जी अधिकार पत्र रद्द हुए। जिस स्थानीय डॉक्टर ने बिना ठीक से जाँचे भ्रम की बात लिखी थी, उसे भी नोटिस मिला। वकील और संपत्ति दलालों से पूछताछ शुरू हुई।
जब अर्जुन माँ को घर लेकर लौटा, मोहल्ले वाले बाहर खड़े थे।
शर्मा जी ने सिर झुका लिया। सामने वाली रेखा आंटी रो रही थीं।
“शारदा दीदी,” उन्होंने कहा, “हमने आपकी आवाज़ सुनी थी। मगर मीरा कहती थी कि आपको रोकना ही आपकी भलाई है। हमें माफ कर दीजिए।”
शारदा देवी ने उन्हें देर तक देखा। अर्जुन को लगा माँ गुस्से में सबको डाँटेंगी। लेकिन उन्होंने बस इतना कहा—
“अगली बार अगर कोई बूढ़ा बंद दरवाज़े के पीछे से मदद माँगे, तो चाबी रखने वाले की बात पहले मत मान लेना।”
मोहल्ले में यह बात आग की तरह फैल गई। हर कोई अब याद करने लगा कि कैसे मीरा हमेशा शारदा देवी का दूरभाष अपने पास रखती थी, कैसे वह किसी को मिलने नहीं देती थी, कैसे तेज भजन चलाकर ऊपर की आवाज़ दबा देती थी, कैसे नीले निशान को सीढ़ी से गिरना कहती थी। सच सामने आने के बाद लोगों को अपनी चुप्पी सबसे भारी लगी।
शारदा देवी ने किसी को अपमानित नहीं किया।
यही सबके लिए सबसे बड़ा दंड बन गया।
अगले कई महीने अदालत, पुलिस, बयान और उपचार में बीते। मीरा ने पहले खुद को पीड़ित बताया। फिर बोली विक्रम ने उसे बहकाया। फिर कहा अर्जुन ने उसे फँसाया। लेकिन दृश्य-संग्रह, आवाज़, बैंक दस्तावेज़ और फर्जी हस्ताक्षर उसकी हर कहानी को निगल गए।
आखिर उसने अपराध स्वीकार किया।
मीरा को वृद्ध महिला पर हिंसा, अवैध बंदीकरण, संपत्ति धोखाधड़ी के प्रयास और जाली दस्तावेज़ के लिए सज़ा मिली। उसे शारदा देवी के पास आने से रोक दिया गया। विक्रम को और कठोर दंड मिला, क्योंकि उसकी ठगी से 3 और परिवार टूटते-टूटते बचे थे।
अर्जुन का तलाक जल्दी हो गया। मीरा घर से, नाम से, भरोसे से और उस झूठी इज्जत से बाहर चली गई, जिसे उसने आँसुओं से बनाया था। लोगों ने कहा उसे जेल से ज्यादा यह बात तोड़ गई कि अब कोई उसके रोने पर विश्वास नहीं करता था।
8 महीने बाद घर बदल चुका था।
जिस कमरे में शारदा देवी बंद थीं, उसकी दीवारें हल्के गुलाबी रंग से रंगी गईं। खिड़की पर सफेद परदे लगे। बाहर से बंद होने वाला ताला हटाकर ऐसी कुंडी लगाई गई जो दोनों तरफ से खुलती थी। फर्श पर गद्दा नहीं, अब लकड़ी की छोटी मेज़, आरामकुर्सी, किताबें, तुलसी का गमला और महेंद्र सिंह की तस्वीर थी।
शारदा देवी ने उस कमरे को पाठ-कक्ष बना दिया।
पहली बार अकेली अंदर गईं तो बीच में खड़ी रहीं। अर्जुन दरवाज़े पर खड़ा था।
“पुराना गद्दा फेंक दूँ?” उसने पूछा।
शारदा देवी ने सिर हिलाया।
“नहीं। जला दो।”
उस शाम बगीचे में कोई बड़ा कर्मकांड नहीं हुआ। बस एक पुराना गद्दा, कुछ फटे कपड़े और वह ताला रखा गया जिसने 1 माँ को कैदी बना दिया था।
शारदा देवी ने माचिस जलाई।
लपटें धीरे-धीरे उठीं।
“घर भी कभी-कभी साँस लेना भूल जाता है,” उन्होंने कहा। “आज इसे फिर साँस लेने दो।”
अर्जुन माँ के साथ रहने के लिए छुट्टी बढ़वाना चाहता था। वह रात में उठकर दरवाज़े देखता, खिड़कियाँ जाँचता, हल्की आवाज़ पर चौंक जाता। युद्ध से लौटा आदमी अब अपने ही घर की चुप्पी से डरता था।
शारदा देवी ने यह देख लिया।
एक सुबह वह रसोई में चाय बना रही थीं। उन्होंने अर्जुन के हाथ पर हाथ रखा।
“बेटा, अब तुम फिर से जी सकते हो।”
“मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकता।”
“तुम मुझे अकेला नहीं छोड़ोगे। तुम मुझे आज़ाद छोड़ोगे।”
अर्जुन की आँखें झुक गईं।
“मैं देर से आया, माँ।”
शारदा देवी ने उसकी उँगलियों पर हल्की चपत लगाई।
“नहीं। तुम आए। देर से वे आते हैं जो सुनते हैं और कुछ करते नहीं।”
यह बात अर्जुन के भीतर बहुत देर तक गूंजती रही।
कुछ हफ्तों बाद जब उसकी नई ड्यूटी का आदेश आया, तो शारदा देवी ने खुद उसका बैग तैयार किया। उसमें कपड़े, दवा, महेंद्र सिंह की पुरानी छोटी माला और घर के बने बेसन के लड्डू रखे।
“रास्ते में उल्टा-सीधा मत खाना,” उन्होंने कहा।
अर्जुन मुस्कुराया।
“जी, माँ साहब।”
उन्होंने भौंह उठाई।
“मेजर साहब, यहाँ हुक्म मेरा चलता है।”
जाने से पहले अर्जुन ने उन्हें रसोई में पाया। वह आम का अचार धूप में रख रही थीं। सुबह की रोशनी उनके चेहरे पर थी। दीवार पर अब नया कैमरा था, पर वह उन्हें देखने के लिए नहीं था।
वह उनकी शांति की रखवाली के लिए था।
अर्जुन ने हल्के मजाक में पूछा, “माँ, आज फिर याददाश्त गड़बड़ है क्या?”
शारदा देवी ने अचार का मसाला चखा।
“बहुत।”
“क्या भूल गईं?”
“हर दिन थोड़ा-थोड़ा भूल जाती हूँ कि मैं उससे क्यों डरती थी।”
अर्जुन हँसा, मगर आँखें भीग गईं।
शारदा देवी ने उसे चाय दी।
“जाओ। यह घर अब बाहर से बंद होने वाले दरवाज़ों का घर नहीं रहा।”
अर्जुन ने माँ को लंबे समय तक गले लगाया। उस आलिंगन में फौजी की कठोरता नहीं थी, न जाँचकर्ता की सतर्कता। उसमें सिर्फ एक बेटा था, जो माँ की धड़कन सुनकर खुद को माफ करना सीख रहा था।
जब गाड़ी बाहर निकली, शारदा देवी बरामदे में गरम चाय लेकर खड़ी रहीं। सामने से रेखा आंटी ने झिझकते हुए हाथ उठाया।
“नमस्ते, शारदा दीदी।”
शारदा देवी ने शांत मुस्कान से जवाब दिया।
“नमस्ते।”
पुरानी हवेली अब भी उनकी थी।
उनकी याददाश्त भी।
और महीनों बाद जब उन्होंने अपने घर का दरवाज़ा भीतर से बंद किया, तो वह आवाज़ कैद जैसी नहीं लगी।
वह आवाज़ शांति जैसी लगी।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.