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बच्चे ने अपना सबसे प्यारा डायनासोर उसकी हथेली में रखकर कहा “ताकि आपको वापस आना पड़े”… लेकिन उससे पहले अखबार की 1 खबर ने उस औरत का भरोसा तोड़ दिया था

भाग 1

जब नंदिनी अपनी तय मुलाकात पर 28 मिनट देर से पहुँची, तो उसकी बाँहों में सोया हुआ 5 साल का बच्चा था और पूरे रेस्टोरेंट की नजरें ऐसे जम गईं जैसे वह कोई गलती नहीं, कोई अपराध लेकर अंदर आई हो।

दिल्ली के उस महंगे रेस्टोरेंट में अर्जुन मल्होत्रा खिड़की के पास बैठा तीसरी बार अपनी घड़ी देख चुका था। वह जाने वाला ही था कि काँच का दरवाजा धड़ाम से खुला। नंदिनी अंदर आई, बाल बिखरे हुए, एक चप्पल की पट्टी ढीली, कंधे पर बड़ा बैग, और सीने से चिपका हुआ छोटा बच्चा, जिसके हाथ में हरे रंग का प्लास्टिक डायनासोर दबा था।

होस्टेस ने उलझन से पूछा, “मैडम, टेबल?”

नंदिनी की नजर अर्जुन पर पड़ी और उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया। वह जल्दी-जल्दी उसके पास आई।

“माफ कीजिए, मैं बहुत देर से आई,” उसने धीमी आवाज में कहा।

अर्जुन ने बच्चे की तरफ देखा। वह सचमुच सो रहा था, जैसे दुनिया की किसी परेशानी से उसका कोई लेना-देना न हो।

“बैठिए,” अर्जुन ने कुर्सी खींच दी।

नंदिनी बैठी तो बैग नीचे गिर गया, उससे पानी की बोतल, टिश्यू, खिलौना कार और आधा खुला बिस्कुट का पैकेट बाहर लुढ़क गया। पास खड़ा वेटर मुस्कुराया नहीं, लेकिन उसकी आँखों में दया थी।

“बेबीसिटर ने 45 मिनट पहले मना कर दिया,” नंदिनी ने हड़बड़ाकर कहा। “मैं 2 बार पहले ही मुलाकात रद्द कर चुकी थी। तीसरी बार करती तो आपको लगता मैं आना ही नहीं चाहती।”

अर्जुन ने पहली बार ध्यान से उसे देखा। वह उन महिलाओं जैसी नहीं थी जिनसे वह आमतौर पर मिलता था। न कोई बनावटी नजाकत, न महंगा दिखने की कोशिश। उसके चेहरे पर थकान थी, आँखों में नींद की कमी थी, और फिर भी बच्चे को पकड़े हुए उसके हाथों में ऐसी सावधानी थी जैसे वह दुनिया की सबसे कीमती चीज हो।

“इसका नाम?” अर्जुन ने पूछा।

“आरव,” नंदिनी ने बच्चे के बाल ठीक करते हुए कहा। “और डायनासोर का नाम मत पूछिए।”

अर्जुन मुस्कुराया। “अब तो पूछना पड़ेगा।”

नंदिनी ने शर्म से आँखें बंद कीं। “महाराजा चॉम्पू।”

अर्जुन हँस पड़ा। सचमुच हँसा। कई महीनों बाद इतनी खुलकर।

कुछ देर तक सब ठीक रहा। उन्होंने खाना मंगाया। नंदिनी ने मेन्यू का सबसे सस्ता व्यंजन चुना। अर्जुन ने चुपचाप दाल, नान, पनीर टिक्का और बच्चों के लिए हल्की खिचड़ी भी मंगवा दी। उसने एहसान जैसा कुछ नहीं दिखाया, बस इतना कहा, “बचा तो घर ले जाएँगे।”

नंदिनी ने पहली बार आराम से साँस ली।

फिर आरव जाग गया।

उसने आँखें मलते हुए पहले नंदिनी को देखा, फिर अर्जुन को। कुछ पल तक वह उसे घूरता रहा।

“ये कौन है?” उसने पूछा।

नंदिनी पानी पीते-पीते रुक गई। “ये अर्जुन हैं।”

“क्यों हैं?”

अर्जुन ने हँसी रोकने के लिए होंठ दबाए। “यह सवाल अच्छा है।”

आरव ने तुरंत दूसरा सवाल दागा, “आप अमीर हो?”

नंदिनी का चेहरा सफेद पड़ गया। “आरव!”

अर्जुन खाँसते-खाँसते बचा। रेस्टोरेंट के पास वाली टेबल पर बैठे लोग मुड़कर देखने लगे।

आरव गंभीर था। “इनके जूते चमक रहे हैं। अमीर लोग ऐसे जूते पहनते हैं।”

अर्जुन फिर हँस पड़ा। “तुम बहुत खतरनाक निरीक्षक हो।”

उस रात मुलाकात पूरी तरह बिगड़ जानी चाहिए थी, लेकिन उल्टा हुआ। आरव ने अर्जुन की प्लेट से पापड़ खाया, उसकी घड़ी पर टिप्पणी की, और घोषणा की कि अर्जुन “राजकुमार नहीं लगते क्योंकि बहुत लंबे हैं।” नंदिनी बार-बार माफी माँगती रही, मगर अर्जुन को अजीब तरह से सुकून मिल रहा था। यहाँ कोई अभिनय नहीं था। कोई दिखावा नहीं। बस एक थकी हुई औरत, एक मासूम बच्चा, और जिंदगी की पूरी अव्यवस्था।

रात खत्म हुई तो अर्जुन उन्हें कार तक छोड़ने गया। आरव फिर नंदिनी के कंधे पर सो चुका था। अचानक नींद में ही उसने बुदबुदाया, “मम्मा…”

नंदिनी वहीं जम गई। उसके चेहरे पर ऐसा दर्द आया जो अर्जुन ने पूरे शाम नहीं देखा था।

उसने बहुत धीरे से कहा, “नहीं बेटा… मैं मौसी हूँ।”

अर्जुन के भीतर कुछ भारी-सा गिरा। मौसी। माँ नहीं।

नंदिनी ने सिर उठाकर अर्जुन को देखा। उसकी आँखें कह रही थीं कि इस बच्चे के पीछे कोई कहानी है, ऐसी कहानी जिसे सुनना आसान नहीं होगा।

तभी आरव ने नींद में डायनासोर कसकर पकड़ा और फुसफुसाया, “मम्मा भी चली गई थी…”

अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।

भाग 2

उस रात के बाद अर्जुन ने सोचा था कि अगली मुलाकात सामान्य होगी, लेकिन जिंदगी ने फिर मजाक किया। दूसरी मुलाकात में भी आरव आया। तीसरी में भी। चौथी बार तो आरव ने खुद दरवाजे पर खड़े होकर कहा, “मौसी, चमकीले जूते वाले अंकल आए?”

नंदिनी शर्मिंदा हो जाती, लेकिन अर्जुन हर बार मुस्कुरा देता। धीरे-धीरे आरव उनकी मुलाकातों में बाधा नहीं, हिस्सा बन गया।

वे कभी इंडिया गेट के पास आइसक्रीम खाते, कभी पुरानी दिल्ली की गलियों में कुलचा बाँटते, कभी पार्क में बैठते जहाँ आरव झूले पर 41 बार चढ़ता और हर बार चिल्लाता, “देखो!”

अर्जुन ने देखा कि नंदिनी दिन में प्ले स्कूल में पढ़ाती थी, शाम को बच्चों की ट्यूशन लेती थी, और रात में आरव के स्कूल प्रोजेक्ट बनाती थी। वह हमेशा थकी रहती, मगर आरव को कभी बोझ महसूस नहीं होने देती।

एक दिन नंदिनी को अचानक अस्पताल जाना पड़ा। आरव को 1 घंटे के लिए अर्जुन के पास छोड़ना पड़ा। अर्जुन ने आत्मविश्वास से कहा, “मैं संभाल लूँगा।”

20 मिनट बाद उसके फ्लैट का हाल युद्धभूमि जैसा था। सोफे के कुशन अस्पताल बने हुए थे, चम्मच ऑपरेशन के औजार थे, अर्जुन की टाई घायल साँप थी और पड़ोसी का पालतू कुत्ता बादल माथे पर टूथपेस्ट लगाए दरवाजे पर बैठा था।

जब नंदिनी लौटी, अर्जुन बाहर फर्श पर बैठा था। दरवाजा अंदर से बंद था और आरव भीतर से चिल्ला रहा था, “मैं सीरियल वाली खिचड़ी बना रहा हूँ!”

नंदिनी इतना हँसी कि उसकी आँखों से आँसू आ गए। उसी पल अर्जुन ने पहली बार समझा कि उसकी थकान मजाक नहीं थी। और नंदिनी ने पहली बार महसूस किया कि अर्जुन भागा नहीं था।

लेकिन हर रिश्ता बाहर से जितना प्यारा दिखता है, भीतर उतना ही डर छिपाए रहता है।

अर्जुन की माँ सविता मल्होत्रा ने एक फोटो देखी, जिसमें अर्जुन नंदिनी और आरव के साथ एक छोटे मेले में हँस रहा था। अगले दिन उसने बेटे को घर बुलाया।

“वह बच्चा उसका है?” सविता ने सीधा पूछा।

“उसका भांजा है।”

“और तुम उस बच्चे की जिंदगी में जगह बना रहे हो?”

अर्जुन चुप रहा।

सविता की आवाज ठंडी थी। “बेटा, गरीब लड़की से शादी करने में दिक्कत नहीं। दिक्कत तब है जब तुम किसी टूटे हुए घर में उम्मीद बनकर जाओ और फिर निकल आओ।”

अर्जुन को यह बात चुभी, क्योंकि कहीं न कहीं वह खुद भी डरता था।

उसी हफ्ते रात को नंदिनी ने उसे अपनी बहन रिया के बारे में बताया। रिया की बीमारी, अस्पताल, आखिरी दिन, और वह वादा कि आरव कभी अनाथालय नहीं जाएगा।

अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया। वह कुछ कहने ही वाला था कि तभी आरव कमरे से बाहर आया।

“मुझे आपातकालीन सीरियल चाहिए।”

दोनों अलग हट गए। माहौल हल्का हो गया। मगर उसी रात अर्जुन के फोन पर एक कॉल आया। बेंगलुरु में 1 साल का बड़ा व्यवसायिक अवसर था।

अर्जुन ने सोचा आरव सो चुका है।

“हाँ, शायद मुझे 1 साल के लिए बेंगलुरु जाना पड़े,” उसने धीमे कहा।

फर्श पर बैठे आरव के हाथ से महाराजा चॉम्पू गिर गया।

“आप भी दूर चले जाओगे?” बच्चे ने काँपती आवाज में पूछा। “मेरी मम्मा की तरह?”

भाग 3

उस सवाल के बाद कमरे में जो सन्नाटा फैला, उसने तीनों को अलग-अलग तरह से तोड़ दिया।

नंदिनी हाथ में कपड़े की टोकरी पकड़े खड़ी रह गई। अर्जुन फोन काट चुका था, लेकिन बात खत्म नहीं हुई थी। आरव की आँखें अर्जुन पर थीं। वह रो नहीं रहा था, और यही बात ज्यादा डरावनी थी। बच्चे जब बहुत डर जाते हैं तो कई बार आँसू भी रास्ता भूल जाते हैं।

अर्जुन उसके पास घुटनों के बल बैठा। “आरव, सुनो…”

आरव ने महाराजा चॉम्पू उठाकर सीने से लगा लिया। “आप बोलते हो कि वापस आओगे। सब लोग बोलते हैं।”

नंदिनी का चेहरा पल भर में बदल गया। उसके अंदर दबा हुआ पुराना डर बाहर आ गया था। उसने आरव को गोद में उठाया, मगर उसकी नजर अर्जुन से नहीं हटी।

उस रात अर्जुन देर तक समझाने की कोशिश करता रहा कि बेंगलुरु जाना भागना नहीं है, यह उसके काम का बड़ा मौका है। मगर हर वाक्य अधूरा लगा। नंदिनी केवल सिर हिलाती रही। उसने कोई झगड़ा नहीं किया, कोई आरोप नहीं लगाया, पर उसकी चुप्पी किसी भी चिल्लाहट से ज्यादा भारी थी।

अगले 10 दिन अजीब बीते। अर्जुन रोज संदेश भेजता। नंदिनी जवाब देती, मगर पहले जैसी गर्माहट नहीं होती। आरव वीडियो कॉल पर आता, पर अब वह अर्जुन को “चमकीले जूते वाले अंकल” नहीं कहता। वह बस पूछता, “आप कब जा रहे हो?”

अर्जुन को पहली बार समझ आया कि बड़े लोग दूरी को कैलेंडर में नापते हैं, बच्चे दिल में नापते हैं।

फिर एक शाम नंदिनी को सच्चाई फोन कॉल से नहीं, अखबार की खबर से मिली। व्यापार पन्ने पर अर्जुन की तस्वीर थी। खबर में लिखा था कि मल्होत्रा टेक सॉल्यूशंस बेंगलुरु में बड़ा विस्तार कर रही है और संस्थापक अर्जुन मल्होत्रा कम से कम 1 साल के लिए वहाँ रहेंगे।

नंदिनी ने खबर 3 बार पढ़ी। हर बार उसे वही बात चुभी। अर्जुन जा रहा है, यह दर्द था। लेकिन उसने बताया नहीं, यह विश्वासघात था।

उस शाम जब अर्जुन उसके घर आया, हाथ में छोले-कुलचे और आरव के लिए आमरस था, तो नंदिनी दरवाजे पर ही खड़ी थी। उसके हाथ में वही अखबार था।

अर्जुन ने अखबार देखा और समझ गया।

“नंदिनी…”

“तुम बताने वाले थे?” उसने पूछा।

अर्जुन ने धीमे से कहा, “हाँ।”

“कब? जब टिकट कट जाता? जब गाड़ी नीचे आ जाती? या जब आरव फिर पूछता कि लोग क्यों चले जाते हैं?”

अर्जुन ने गहरी साँस ली। “मैं खुद तय नहीं कर पा रहा था।”

“तय करना अलग बात है,” नंदिनी की आवाज काँपी, “छिपाना अलग बात है।”

आरव अंदर कमरे में सो रहा था। दीवार पर उसके बनाए हुए टेढ़े-मेढ़े डायनासोर चिपके थे। एक चित्र में 3 लोग थे। मौसी, आरव और एक लंबा आदमी जिसके जूतों के चारों तरफ पीली चमक बनी थी।

अर्जुन की नजर उस चित्र पर पड़ी और उसका गला भर आया।

“मैं तुम दोनों की परवाह करता हूँ,” उसने कहा।

“मुझे पता है।”

“मैं आरव की भी परवाह करता हूँ।”

“मुझे यह भी पता है।”

“तो फिर तुम ऐसे क्यों बात कर रही हो जैसे मैं कोई गलत आदमी हूँ?”

नंदिनी हँसी, मगर हँसी में टूटन थी। “गलत आदमी हमेशा बुरा नहीं होता, अर्जुन। कई बार वह अच्छा होता है, बहुत अच्छा। बस रुकता नहीं।”

अर्जुन चुप हो गया।

नंदिनी ने धीरे से कहा, “मेरे पापा भी अच्छे थे। उन्होंने भी कहा था कि बस कुछ महीनों के लिए जा रहा हूँ। फिर एक और शहर, एक और नौकरी, एक और परिवार। आरव के पिता ने भी कहा था कि वह जिम्मेदारी नहीं उठा पाएगा, पर कभी-कभी मिलने आएगा। वह कभी नहीं आया। रिया भी अस्पताल में हर दिन कहती थी कि जल्दी घर चलेंगे। वह भी नहीं आई।”

कमरे में पंखा घूम रहा था, पर हवा भारी थी।

अर्जुन ने पहली बार बिना बचाव किए उसकी बात सुनी। नंदिनी उस पर आरोप नहीं लगा रही थी। वह अपने जीवन के सारे खाली दरवाजे दिखा रही थी।

“तुम्हें लगता है मैं भाग रहा हूँ?” उसने धीमे पूछा।

नंदिनी ने जवाब देने से पहले आँखें बंद कीं। “मुझे डर है कि तुम भी वही साबित कर दोगे जिससे मैं आरव को बचाना चाहती हूँ।”

“मैं तुम पर कोई एहसान नहीं कर रहा।”

“मुझे एहसान नहीं चाहिए।”

“मैं भी यही कह रहा हूँ,” अर्जुन की आवाज भर्रा गई। “मैं एहसान नहीं करना चाहता। मैं चुनना चाहता हूँ। तुम्हें। आरव को। इस उलझी हुई जिंदगी को।”

नंदिनी की आँखों में आँसू भर आए। वह कुछ क्षण उसे देखती रही, फिर बोली, “तो सच चुनो। जाओ अगर जाना है। लेकिन किसी बच्चे के सामने आधे वादे मत छोड़ो।”

कुछ दिन बाद अर्जुन ने बेंगलुरु का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। नंदिनी ने रिश्ता खत्म कर दिया। यह कोई नाटकीय टूटन नहीं थी। न कोई थप्पड़, न कोई चीख, न कोई फिल्मी संवाद। सिर्फ एक लंबी चुप्पी थी, जिसमें दोनों समझ रहे थे कि प्यार मौजूद है, लेकिन भरोसा घायल हो चुका है।

अर्जुन जाने से पहले 2 बार आरव से मिलने आया। तीसरी बार नंदिनी ने मना कर दिया, क्योंकि हर मुलाकात के बाद आरव रात में उठकर दरवाजा देखने लगता था।

जाने की सुबह दिल्ली में हल्की बारिश थी। अर्जुन की गाड़ी नीचे खड़ी थी। सूटकेस डिक्की में रखे जा चुके थे। वह नंदिनी के फ्लैट के सामने आखिरी बार आया। नंदिनी दरवाजे पर खड़ी थी। आँखें सूजी हुई थीं, पर वह रोना नहीं चाहती थी।

“अपना ख्याल रखना,” अर्जुन ने कहा।

“तुम भी,” नंदिनी ने जवाब दिया।

दोनों ने बहुत कुछ नहीं कहा। शायद इसलिए कि जो कहना था, वह कहने से ज्यादा दुख देता।

अर्जुन मुड़कर जाने लगा तभी भीतर से तेज कदमों की आवाज आई।

“रुको!”

आरव नंगे पाँव बाहर दौड़ा। उसकी टी-शर्ट उलटी पहनी थी, बाल खड़े थे, और हाथ में वही हरा डायनासोर था।

“आरव!” नंदिनी घबरा गई।

अर्जुन तुरंत झुक गया। “क्या हुआ, कप्तान?”

आरव ने डायनासोर उसकी हथेली में रख दिया।

अर्जुन ने उसे देखा। “महाराजा चॉम्पू?”

आरव ने होंठ दबाए। वह बहादुर बनने की कोशिश कर रहा था। “आप इसे ले जाओ।”

“क्यों?”

“ताकि आपको वापस आना पड़े।”

अर्जुन की आँखें भर आईं। वह कुछ भी कह सकता था। “मैं जरूर आऊँगा।” “मैं कभी नहीं भूलूँगा।” “बस 1 साल।” लेकिन उसने सीखा था कि बच्चों को दिलासा नहीं, सच चाहिए।

उसने बहुत सावधानी से डायनासोर को पकड़ा। “मैं इसका ख्याल रखूँगा।”

आरव ने उसे गले लगा लिया। “झूठ मत बोलना।”

अर्जुन ने आँखें बंद कर लीं। “कोशिश करूँगा कि कभी ऐसा न करूँ।”

नंदिनी ने यह सुना। पहली बार उसे लगा कि शायद अर्जुन पूरी तरह गया नहीं है। फिर भी उसने उसे रोका नहीं।

गाड़ी चली गई। आरव खड़ा रहा, जब तक मोड़ के बाद गाड़ी दिखनी बंद नहीं हुई। फिर उसने नंदिनी का हाथ पकड़ा और पूछा, “मौसी, लोग वापस आते हैं क्या?”

नंदिनी ने बहुत देर बाद कहा, “कुछ लोग आते हैं बेटा। पर हमें इंतजार करते हुए जीना भी सीखना पड़ता है।”

बेंगलुरु ने अर्जुन को वह सब दिया जिसके लिए उसने वर्षों मेहनत की थी। नया दफ्तर, बड़े निवेशक, अखबारों में इंटरव्यू, पुरस्कार, मंच, तालियाँ। लेकिन हर रविवार शाम 7 बजे वह किसी भी बैठक को रोक देता।

वीडियो कॉल पर आरव आता। कभी उसके मुँह पर चॉकलेट लगी होती, कभी वह स्कूल की कविता सुनाता, कभी गुस्सा करता कि अर्जुन ने डायनासोर को गलत नाम से पुकारा।

“वह महाराजा चॉम्पू है, सिर्फ चॉम्पू नहीं,” आरव डाँटता।

अर्जुन हाथ जोड़कर कहता, “माफ कीजिए, महाराज।”

धीरे-धीरे आरव फिर हँसने लगा। नंदिनी पहले कॉल के दौरान दूर बैठती थी। फिर स्क्रीन के पास आने लगी। फिर कभी-कभी चाय लेकर बैठ जाती। बातचीत सावधानी से शुरू हुई। फिर सच में बदलने लगी।

अर्जुन ने हर रविवार फोन किया। उसने आरव का 6वां जन्मदिन नहीं छोड़ा। उसने वीडियो पर कागज का डायनासोर मुकुट पहना, जिसे देखकर आरव इतना हँसा कि केक पर थूकते-थूकते बचा। नंदिनी भी हँसी, फिर कैमरा थोड़ा हटाकर आँसू पोंछे।

एक दिन आरव ने पूछा, “आपने वहाँ नई मौसी बना ली?”

अर्जुन चौंका। “नहीं।”

“नई बच्चा?”

“नहीं।”

“नई डायनासोर?”

अर्जुन ने मेज से एक छोटा खिलौना उठाया। “यह तुम्हारे भेजे हुए प्रहरी डायनासोर हैं। ये मुझे निगरानी में रखते हैं।”

आरव संतुष्ट हुआ। “ठीक है।”

नंदिनी उस दिन देर तक चुप रही। कॉल खत्म होने के बाद उसने अर्जुन को संदेश भेजा, “तुमने उसे हल्का महसूस कराया। धन्यवाद।”

अर्जुन ने जवाब लिखा, “मैं उसे कभी भारी महसूस नहीं कराना चाहता था।”

1 साल पूरा होने से पहले ही बेंगलुरु परियोजना सफल हो गई। कंपनी चाहती थी कि अर्जुन वहीं स्थायी रूप से रहे। पहले वाला अर्जुन शायद मान जाता। वह उपलब्धियों का आदमी था। उसे हमेशा आगे बढ़ना था। लेकिन अब हर निर्णय के सामने 2 चेहरे खड़े हो जाते थे। एक स्त्री जो थकान में भी गरिमा संभालती थी। एक बच्चा जिसने अपना सबसे प्यारा खिलौना विश्वास की रसीद की तरह सौंप दिया था।

अर्जुन ने बोर्ड मीटिंग में कहा, “दफ्तर बेंगलुरु रहेगा, लेकिन मेरा घर दिल्ली में है।”

किसी ने पूछा, “निजी कारण?”

अर्जुन मुस्कुराया। “बहुत निजी। और बहुत जरूरी।”

वह लौटने से पहले सीधे नंदिनी को बताना चाहता था, पर इस बार उसने कोई अधूरा संकेत नहीं छोड़ा। उसने फोन किया।

“मैं वापस आ रहा हूँ,” उसने कहा।

नंदिनी कुछ पल चुप रही। “किसलिए?”

“क्योंकि काम हो गया।”

“और अगर काम नहीं होता?”

अर्जुन ने सच बोला। “तब भी रास्ता ढूँढता। देर होती, पर इस बार बताकर।”

नंदिनी की साँस काँपी। “आरव को मैं खुद बताऊँगी।”

“ठीक है।”

“और अर्जुन…”

“हाँ?”

“वापस आना सिर्फ शहर में लौटना नहीं होता।”

अर्जुन ने आँखें बंद कीं। “मुझे पता है। इस बार मैं दरवाजे पर खड़ा रहने नहीं, घर के अंदर जगह कमाने आ रहा हूँ।”

वापसी वाले दिन नंदिनी की सहेली सान्वी ने एक योजना बनाई। उसने नंदिनी को उसी रेस्टोरेंट में बुलाया जहाँ पहली मुलाकात हुई थी। बहाना था कि स्कूल की फंडिंग पर बात करनी है। नंदिनी गई तो टेबल पर आरव पहले से बैठा था। उसने लाल रंग की छोटी बो टाई पहनी थी और सामने कागज रखा था।

“तुम यहाँ?” नंदिनी हैरान रह गई।

आरव ने गंभीरता से कहा, “मीटिंग है।”

तभी अर्जुन खड़ा हुआ। वही लंबा कद, वही शांत आँखें, मगर जूतों की चमक पहले जैसी घमंडी नहीं, इस बार कुछ संकोची लगी।

नंदिनी वहीं रुक गई। उसका चेहरा पढ़ना मुश्किल था।

“यह क्या है?” उसने पूछा।

आरव ने कागज उसकी तरफ बढ़ाया। ऊपर बड़े टेढ़े अक्षरों में लिखा था, “मेरी मौसी से मिलने के नियम।”

अर्जुन ने पेन उठाया।

नंदिनी ने तुरंत कहा, “तुम पढ़े बिना हस्ताक्षर कर रहे हो?”

अर्जुन ने आरव की तरफ देखा। “लेखक पर भरोसा है।”

नंदिनी ने कागज पढ़ा।

नियम 1: गायब नहीं होना।
नियम 2: झूठ नहीं बोलना।
नियम 3: स्कूल कार्यक्रम में आना।
नियम 4: डायनासोर फिल्म देखते समय सोना नहीं।
नियम 5: मौसी को बुरे वाले आँसू नहीं देना।
नियम 6: रविवार वाली कॉल कभी मत भूलना।
नियम 7: पैनकेक जरूरी है।

नंदिनी की आँखें आखिरी नियम तक आते-आते धुंधली हो गईं।

अर्जुन ने बहुत धीरे से कहा, “मैं इन नियमों को मानता हूँ। लेकिन एक नियम मैं जोड़ना चाहता हूँ।”

आरव ने भौंहें चढ़ाईं। “कौन-सा?”

“अगर कभी मुझसे गलती हो, तो मुझे भागने से पहले ठीक करने का मौका मिलेगा। और अगर गलती बड़ी हो, तो तुम दोनों मुझे सच में डाँटोगे।”

आरव ने सोचा। “जुर्माना भी होगा।”

“कितना?”

“3 पैनकेक।”

अर्जुन ने गंभीरता से सिर हिलाया। “मंजूर।”

नंदिनी हँस पड़ी, लेकिन आँसू उसके गालों तक आ चुके थे। अर्जुन ने हाथ बढ़ाया, पर उसे छुआ नहीं। जैसे वह फैसला उसी पर छोड़ रहा हो। वही पुरानी बात, लेकिन इस बार ज्यादा परिपक्व। नंदिनी ने कुछ पल बाद उसका हाथ पकड़ लिया।

खाना आया। आरव ने अर्जुन की प्लेट से नान चुराया। सान्वी ने खुद को “भावनात्मक साजिश की रानी” घोषित किया। रेस्टोरेंट के लोग फिर मुड़कर देख रहे थे, लेकिन इस बार नंदिनी को शर्म नहीं आई।

रात को वे 3 लोग इंडिया गेट के पास टहलने गए। बारिश के बाद सड़क चमक रही थी। आरव आगे-आगे दौड़ रहा था, हाथ में महाराजा चॉम्पू हवा में उठाए। अर्जुन और नंदिनी पीछे चल रहे थे। उनके बीच कोई बड़ा वादा नहीं था। न शादी की जल्दी, न परीकथा का झूठ। बस एक शुरुआत थी, जो टूटने के बाद ज्यादा सच हो गई थी।

नंदिनी ने धीरे से पूछा, “तुम्हें याद है, पहली मुलाकात पर मैं 28 मिनट देर से आई थी?”

अर्जुन मुस्कुराया। “हाँ।”

“तुम जा सकते थे।”

“जाता तो जिंदगी की सबसे बड़ी मुलाकात छूट जाती।”

नंदिनी ने उसकी तरफ देखा। “इतनी बड़ी?”

अर्जुन ने सामने दौड़ते आरव को देखा। “मेरी जिंदगी में जो सबसे जरूरी चीजें आईं, वे कभी समय पर नहीं आईं। पर जब आईं, तो उन्होंने समय का मतलब बदल दिया।”

नंदिनी ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

आरव अचानक मुड़ा और चिल्लाया, “चमकीले जूते वाले अंकल, तेज चलो!”

अर्जुन ने हँसते हुए जवाब दिया, “आ रहा हूँ, कप्तान।”

उस रात कोई चमत्कार नहीं हुआ। कोई आसमान से फूल नहीं बरसे। बस एक बच्चा पहली बार चैन से सोया, अपनी मौसी के घर में, यह जाने बिना कि उसने 1 आदमी को वापस आना सिखा दिया था।

और नंदिनी ने दरवाजा बंद करते हुए पहली बार डर के बजाय शांति महसूस की।

क्योंकि प्यार हमेशा किसी को बचाने का नाम नहीं होता। कभी-कभी प्यार बस इतना होता है कि कोई चला भी जाए, फिर भी रास्ता भूलता नहीं। कोई वादा कम करे, पर निभाए ज्यादा। कोई बच्चे के हाथ से मिला छोटा-सा डायनासोर खिलौना समझकर नहीं, भरोसा समझकर संभाले।

आरव ने उस रात नींद में बुदबुदाया, “मौसी, वो वापस आ गए न?”

नंदिनी ने उसके माथे को चूमा। “हाँ बेटा।”

अगले कमरे में मेज पर महाराजा चॉम्पू रखा था। उसके पास अर्जुन के चमकीले जूते नहीं, बल्कि भीगे हुए साधारण जूते पड़े थे, जिनमें वह सचमुच वापस चलकर आया था।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.