
PART 1
बंद ताबूत के सामने, जहाँ उसकी 9 महीने की गर्भवती पत्नी और अजन्मे बेटे की मौत पर पूरा खानदान रो रहा था, विक्रम मल्होत्रा हल्की मुस्कान छिपाते हुए बोला, “वह अपने बच्चे को भी नहीं बचा सकी,” और उसी वक्त उसकी प्रेमिका निधि ने उसका हाथ ऐसे थाम रखा था जैसे कोई शोक नहीं, जीत का जश्न हो।
दिल्ली के सुंदर नगर के उस आलीशान शोक-गृह में सफेद गेंदे, चंदन की खुशबू, महंगे काले कपड़े और धीमी सिसकियाँ थीं। पर विक्रम की आँखों में आँसू नहीं थे। वह बार-बार बंद ताबूत को देखता, फिर लोगों की तरफ गर्दन झुकाकर दुखी पति का चेहरा बना लेता।
सब कह रहे थे कि अनन्या मल्होत्रा पहाड़ों में फिसलकर खाई में गिर गई। उसका शरीर इतनी बुरी हालत में मिला कि ताबूत खोलने की इजाजत नहीं दी गई। लोग उसकी माँ सुनीता को संभाल रहे थे, जो बेटी की तस्वीर से लिपटकर रो रही थी। लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि 9 महीने की गर्भवती औरत को बर्फीले पहाड़ों पर ले जाने की जिद किसने की थी।
3 दिन पहले, अनन्या ने विक्रम के साथ मनाली जाने से मना किया था।
उसका पेट बहुत भारी था। बच्चा सुबह से बेचैन था। डॉक्टर ने साफ कहा था कि लंबा सफर ठीक नहीं। पर विक्रम ने वही पुरानी मीठी आवाज निकाली, जिससे वह हमेशा अनन्या की हिम्मत तोड़ देता था।
“बस आखिरी छुट्टी है, अनन्या। बच्चे के आने के बाद हम कहीं नहीं जा पाएँगे। तुम मुझ पर भरोसा करती हो ना?”
यह सवाल उसके विवाह का सबसे बड़ा हथियार था। जब भी अनन्या कुछ पूछती, जब भी वह विक्रम के फोन पर निधि के आधी रात वाले संदेश देखती, जब भी वह अपने पिता की छोड़ी हुई संपत्ति के कागजों पर हस्ताक्षर करने से मना करती, विक्रम यही कहता—“भरोसा नहीं है मुझ पर?”
अनन्या ने भरोसा किया। शायद इसलिए क्योंकि वह अब भी उस आदमी को याद करती थी जो शादी के बाद पहले करवाचौथ पर उसके लिए खुद रसोई में खीर बनाता था। जो उसके पेट पर हाथ रखकर कहता था कि उनका बेटा आरव उनके घर में रोशनी लाएगा। उसे कहाँ पता था कि कुछ लोग प्यार की भाषा सिर्फ इसलिए सीखते हैं ताकि धोखा ज्यादा सुंदर लगे।
मनाली पहुँचकर विक्रम ने अगले दिन हल्की सैर का बहाना बनाया। “बस 10 मिनट ऊपर चलेंगे। नजारा बहुत सुंदर है,” उसने कहा।
रास्ता 10 मिनट का नहीं था। बर्फ जमी हुई थी। हवा चाकू जैसी चेहरे पर लग रही थी। अनन्या बार-बार रुक रही थी। उसकी कमर में दर्द उठ रहा था।
“विक्रम, वापस चलते हैं। मुझे अच्छा नहीं लग रहा।”
विक्रम ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। “ड्रामा मत करो। थोड़ी हिम्मत रखो।”
जब वे एक सुनसान मोड़ पर पहुँचे, नीचे सफेद धुंध से भरी गहरी खाई थी। आसपास कोई पर्यटक नहीं था। कोई दुकान नहीं। कोई आवाज नहीं। तभी पेड़ों के पीछे से निधि निकली। महंगा क्रीम कोट, चमकते जूते, होंठों पर ठंडी अधीरता।
अनन्या का दिल धड़कना भूल गया।
“जल्दी करो, विक्रम,” निधि ने कहा। “कल सुबह दिल्ली पहुँचना है। बीमा के कागज भी तैयार हैं।”
अनन्या ने डर से विक्रम की तरफ देखा। “कौन-सा बीमा?”
विक्रम की मुस्कान पहली बार पूरी खुली।
“50 करोड़ रुपये। अगर तुम और बच्चा दोनों मरते हो, तो दावा और आसान हो जाएगा।”
अनन्या पीछे हटी। उसका पैर बर्फ पर फिसला, लेकिन उसने खुद को सँभाल लिया।
“यह हमारा बच्चा है, विक्रम।”
“नहीं,” उसने ठंडी आवाज में कहा, “यह तुम्हारी संपत्ति से बंधी मेरी सजा है।”
फिर उसने उसका हाथ पकड़ा। अनन्या चीखी, पर हवा ने आवाज निगल ली।
“माफ करना,” विक्रम बोला, पर उसकी आँखों में माफी नहीं, हिसाब था।
अगले ही पल उसने अनन्या को धक्का दे दिया।
दुनिया उलट गई। आसमान, पत्थर, बर्फ, चीख, दर्द—सब एक साथ टूट पड़े। उसका शरीर चट्टानों से टकराता हुआ नीचे एक संकरे बर्फीले उभार पर अटक गया। पसलियों में आग लगी थी, पैर सुन्न था, होंठ फट चुके थे।
कुछ पल बाद उसके पेट के भीतर हल्की-सी हरकत हुई।
आरव जिंदा था।
ऊपर से विक्रम की आवाज आई, “नीचे गिर गई। रात तक जम जाएगी।”
निधि ने पूछा, “अगर कोई ढूँढ ले?”
“कौन ढूँढेगा? सब कहेंगे, गर्भ में वजन बढ़ने से पैर फिसल गया।”
कदमों की आवाज दूर चली गई।
अनन्या ने अपनी काँपती हथेली पेट पर रखी और फुसफुसाई, “नहीं बेटा, हम मरेंगे नहीं।”
शाम गहराने लगी। बर्फ तेज हो गई। उसकी साँसें टूट रही थीं। आँखें बंद होतीं तो माँ का चेहरा दिखता, दिल्ली का घर दिखता, वह छोटा-सा पालना दिखता जो उसने आरव के लिए चुना था।
तभी धुंध के बीच हेलिकॉप्टर की आवाज गूँजी।
लाल रोशनी अँधेरे को काटती हुई नीचे आई। रस्सी से एक बुजुर्ग आदमी उतरा। सफेद बाल, भीगी आँखें, चेहरे पर पुराना घाव।
वह अनन्या के पास घुटनों के बल बैठा और काँपती आवाज में बोला, “अनन्या… मेरी बच्ची…”
अनन्या ने उसे कभी नहीं देखा था।
“आप कौन हैं?”
उस आदमी ने उसका बर्फ जैसा ठंडा हाथ थामा।
“मेरा नाम राजवीर कपूर है। तुम्हारी माँ ने 29 साल तक तुम्हें मुझसे छिपाया।”
अनन्या की आँखें फैल गईं।
“मैं तुम्हारा पिता हूँ।”
उसी क्षण उसके पेट में तेज दर्द उठा। राजवीर ने ऊपर चिल्लाकर कहा, “वह प्रसव में जा रही है! अभी ऊपर खींचो!”
अनन्या ने आखिरी ताकत से कहा, “मेरा बच्चा…”
राजवीर की आँखों से आँसू गिर पड़े।
“मैं कसम खाता हूँ, उसे बचाऊँगा।”
और अनन्या बेहोश हो गई।
PART 2
जब अनन्या ने आँखें खोलीं, सफेद रोशनी, मशीनों की आवाज और किसी नवजात की बहुत हल्की रोने की ध्वनि उसके कानों में आई।
डॉक्टर ने झुककर कहा, “आपका बेटा जिंदा है। ऑपरेशन से जन्म हुआ है। वह कमजोर है, पर लड़ रहा है।”
अनन्या रोना चाहती थी, पर दर्द ने उसे जकड़ रखा था।
राजवीर खिड़की के पास खड़ा था, उसके साथ 2 सुरक्षा अधिकारी थे।
“विक्रम?” अनन्या ने पूछा।
“उसे लगता है तुम मर चुकी हो,” राजवीर बोला।
“आरव भी?”
“हाँ।”
फिर उसने टैबलेट आगे किया। स्क्रीन पर दिल्ली का वही शोक-गृह था। बंद ताबूत। उसकी तस्वीर। रोती हुई माँ। और विक्रम, निधि के साथ खड़ा, किसी मेहमान से धीमे कह रहा था, “सब निपटते ही सुंदर नगर वाला बंगला बेचूँगा। दुबई में नई जिंदगी शुरू करेंगे।”
अनन्या की आँखों में आखिरी भ्रम भी मर गया।
तभी फोन बजा। अनजान नंबर।
राजवीर ने रिकॉर्डिंग चालू करवाई।
दूसरी तरफ निधि थी, रोती हुई।
“अनन्या, अगर तुम जिंदा हो तो अस्पताल मत छोड़ना। विक्रम ने किसी को भेजा है। बच्चा बच गया तो 50 करोड़ रुक जाएँगे। वह आरव को भी खत्म करवाएगा।”
लाइन कट गई।
उसी पल नर्स दौड़ती आई।
“मैडम, नवजात वार्ड की कैमरे बंद हो गए हैं… और एक अनजान डॉक्टर अंदर घुसा है।”
PART 3
अनन्या ने अपने हाथ की सलाइन खींचकर निकाल दी। खून की पतली धार उसकी कलाई से बहने लगी। डॉक्टर घबरा गई।
“आप उठ नहीं सकतीं। आपका ऑपरेशन हुआ है, चोटें हैं, हड्डी में दरार है।”
अनन्या की आवाज धीमी थी, लेकिन उसमें ऐसा लोहा था कि कमरे में मौजूद हर आदमी चुप हो गया।
“मुझे व्हीलचेयर पर ले चलो। जिसने मुझे खाई में फेंका, उसे मेरे बेटे तक पहुँचने से पहले मेरी साँसें गिननी पड़ेंगी।”
राजवीर ने तुरंत सुरक्षा कर्मियों को इशारा किया। कुछ ही मिनटों में अनन्या कंबल में लिपटी, पीली, घायल और काँपती हुई व्हीलचेयर पर नवजात गहन चिकित्सा कक्ष की तरफ जा रही थी। उसके दाएँ राजवीर था, बाएँ महिला पुलिस अधिकारी एसीपी मीरा राणा, पीछे 2 सशस्त्र गार्ड।
गलियारे में अजीब सन्नाटा था। कुछ लाइटें बंद थीं। नर्सें दूसरी तरफ भेज दी गई थीं, मानो किसी ने जानबूझकर रास्ता खाली करवाया हो। नवजात वार्ड का शीशे वाला दरवाजा आधा खुला था।
अंदर, आरव की इनक्यूबेटर के पास एक आदमी डॉक्टर का कोट पहने खड़ा था। मास्क लगा था। हाथ में सिरिंज चमक रही थी।
“रुको!” मीरा राणा की आवाज बिजली की तरह गूँजी। “सिरिंज नीचे रखो।”
आदमी भागने को मुड़ा, मगर गार्ड ने उसे पकड़कर दीवार से चिपका दिया। मास्क हटते ही अनन्या का खून जम गया।
वह डॉक्टर विवेक सूद था—वही स्त्री रोग विशेषज्ञ जिसने 2 महीने से बार-बार कहा था कि डिलीवरी विक्रम की पसंद वाली निजी क्लिनिक में होनी चाहिए। वही डॉक्टर जो हर जांच के बाद विक्रम से अलग कमरे में बात करता था।
“मैं उसे मारने नहीं आया था,” वह हकलाया। “बस… बस उसे गहरी नींद में रखना था।”
मीरा ने उसकी जेब से दूसरा इंजेक्शन निकाला। लेबल देखकर डॉक्टरों के चेहरे बदल गए। वह दवा एक कमजोर नवजात के लिए जानलेवा हो सकती थी।
अनन्या को बाकी कुछ सुनाई नहीं दिया। वह व्हीलचेयर से थोड़ा आगे झुकी और इनक्यूबेटर के शीशे पर हथेली रख दी। आरव बहुत छोटा था। लाल-सा चेहरा, नाक में नली, छाती बहुत धीरे-धीरे उठती-गिरती हुई। उसकी मुट्ठियाँ बंद थीं, जैसे वह जन्म लेते ही दुनिया से लड़ने को तैयार हो।
अनन्या ने फुसफुसाकर कहा, “माँ आ गई है, बेटा।”
एक पल के लिए आरव की रोने की लय थमी।
अनन्या टूटकर रो पड़ी।
वह 1 पल उसके लिए किसी मंदिर के चमत्कार से कम नहीं था। उस बच्चे ने न आँखें खोलीं, न आवाज दी, फिर भी जैसे कह दिया—“मैं रुका रहा।”
डॉक्टर विवेक ने गिरफ्तारी के डर से सब उगल दिया। विक्रम ने उसे पैसा दिया था। फर्जी मेडिकल रिपोर्ट बनवाई जानी थी। बच्चे को किसी दूसरे अस्पताल में शिफ्ट दिखाया जाता, रास्ते में सांस रुकने की बात लिखी जाती, और फिर केस बंद। माँ मृत। बच्चा मृत। संपत्ति पर कोई वारिस नहीं। बीमा की रकम पर पति का दावा।
“कागज किसने तैयार किए?” एसीपी मीरा ने पूछा।
विवेक की नजर राजवीर की तरफ चली गई।
“अजय कपूर ने,” उसने कहा।
राजवीर का चेहरा पत्थर हो गया।
अजय कपूर उसका छोटा भाई था। दिल्ली का मशहूर वकील। टीवी चैनलों पर कानून समझाने वाला, बड़े उद्योगपतियों का सलाहकार, और वही आदमी जिसने कभी सुनीता को डराया था कि अगर वह बच्ची को लेकर राजवीर के पास गई, तो कपूर परिवार उसे अदालतों में कुचल देगा।
अनन्या ने पहली बार अपने नए पिता की आँखों में असहायता देखी।
“मुझे माफ कर दो,” राजवीर ने धीमे कहा। “मैंने तुम्हें ढूँढने में बहुत देर कर दी।”
अनन्या ने जवाब नहीं दिया। उसके भीतर इतना दर्द था कि किसी को दोष देने की जगह भी नहीं बची थी। अभी उसकी दुनिया सिर्फ शीशे के उस डिब्बे में साँस ले रहे बच्चे तक सीमित थी।
विक्रम 22 मिनट बाद अस्पताल की पार्किंग से पकड़ा गया। उसने काली टोपी पहन रखी थी, नकली नाम पर पासपोर्ट था और कार में नकदी से भरा बैग। निधि भी उसके साथ थी, चेहरा आँसुओं से भीगा, हाथ काँपते हुए।
लिफ्ट का दरवाजा खुला। सामने अनन्या व्हीलचेयर पर बैठी थी।
विक्रम का चेहरा राख जैसा हो गया।
“नहीं…”
अनन्या ने हल्के से कहा, “मुझे देखकर दुख हुआ?”
विक्रम ने तुरंत अपना चेहरा बदला। उसकी आवाज में वही पुरानी नरमी लौट आई।
“अनन्या, मेरी जान… मुझे लगा तुम मर गई। मैं नीचे उतरना चाहता था, पर तूफान था। मैं पागल हो गया था।”
एसीपी मीरा ने मोबाइल से रिकॉर्डिंग चलाई।
पहले विक्रम की आवाज आई—“रात तक जम जाएगी।”
फिर दूसरी आवाज—“50 करोड़ के लिए बस शरीर जल्दी नहीं मिलना चाहिए।”
विक्रम ने निधि की तरफ देखा। “तुमने रिकॉर्ड किया?”
निधि रो पड़ी। “मैंने नहीं। तुम्हारी स्मार्टवॉच ने किया। तुमने ट्रेकिंग मोड चालू किया था, ताकि बाद में सबको दिखा सको कि तुम कितने फिट हो।”
राजवीर ने आगे बढ़कर कहा, “हमारे पास बैंक ट्रांसफर, डॉक्टर विवेक की कबूलनामे, फर्जी मेडिकल फाइलें और अजय कपूर के संदेश भी हैं।”
विक्रम का चेहरा अब डर से नहीं, नफरत से भरा था।
“तुम्हारे पास सब था, अनन्या। बंगला, शेयर, जमीन, नाम। मैं क्या था? तुम्हारी अमीर पत्नी का पति? लोग मुझे तुम्हारे कारण पहचानते थे।”
अनन्या ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम मेरे साथ जीना नहीं चाहते थे। तुम मुझे मरने के बाद भी इस्तेमाल करना चाहते थे।”
विक्रम हँसा, मगर उसकी हँसी टूट चुकी थी।
“मेरे बिना तुम कुछ नहीं हो।”
अनन्या ने बहुत शांत आवाज में कहा, “तुम्हारे बिना मैं जिंदा हूँ।”
वह वाक्य पार्किंग की ठंडी दीवारों से टकराया और विक्रम की आखिरी अकड़ चुप हो गई।
अगले दिन सुबह दिल्ली, मनाली और मुंबई के समाचार चैनलों पर एक ही खबर थी—गर्भवती पत्नी को खाई में धक्का, 50 करोड़ का बीमा, पति गिरफ्तार, नवजात की हत्या की साजिश नाकाम। सोशल मीडिया पर लोग भड़क उठे। कुछ ने विक्रम को राक्षस कहा। कुछ ने सवाल पूछा कि इतने बड़े घरों में बंद दरवाजों के पीछे कितनी और अनन्याएँ चुप मरती होंगी। कुछ ने तस्वीरें देखकर कहा कि विक्रम तो कितना सभ्य लगता था।
यही तो सबसे डरावना था।
वह सभ्य लगता था।
सुनीता अस्पताल पहुँची तो उसकी चाल लड़खड़ा रही थी। वह उसी बेटी के सामने खड़ी थी जिसकी तस्वीर पर सुबह उसने माला चढ़ाई थी। अनन्या ने माँ को देखा, पर कुछ नहीं कहा।
सुनीता रोती हुई पास आई।
“अनु…”
अनन्या ने सिर्फ 1 शब्द पूछा, “क्यों?”
उस 1 शब्द में बचपन, झूठ, खाली जगहें, हर त्यौहार पर पिता के बारे में पूछने की अधूरी कोशिशें, और आज की खाई सब शामिल थे।
सुनीता ने राजवीर की ओर देखा। वह दूर खड़ा रहा।
“मैं 24 साल की थी,” सुनीता बोली। “राजवीर से प्यार करती थी। जब गर्भवती हुई तो अजय कपूर मेरे पास आया। उसने कहा कि कपूर परिवार मुझे मिटा देगा, बच्ची छीन लेगा। मैं गरीब थी, अकेली थी, डर गई। मैंने सोचा, अगर तुझे उससे दूर रखूँगी तो बचा लूँगी।”
अनन्या की आँखें भर आईं, मगर आवाज कठोर रही।
“तुमने मुझे बचाया नहीं, माँ। तुमने मुझे सच से दूर रखा। और मैं उसी आदमी के जाल में शादी करके चली गई जिसके पीछे अजय कपूर था।”
सुनीता कुर्सी पर बैठ गई। उसका शरीर जैसे भीतर से खाली हो गया।
“जब समझी, तब तू शादीशुदा थी, खुश दिखती थी, माँ बनने वाली थी। मुझे लगा अगर सच बताऊँगी तो तू मुझसे नफरत करेगी।”
अनन्या ने नवजात वार्ड की तरफ देखा।
“मैं भी पहाड़ पर डरी थी। पर आरव हिला। तब समझ आया, माँ होने का मतलब डर के हिसाब से जिंदगी नहीं चलाना होता।”
सुनीता ने चेहरा ढक लिया।
राजवीर ने बस इतना कहा, “हमसे 29 साल छीन लिए गए।”
सुनीता ने सिर झुका दिया। “हाँ।”
मगर हाँ कह देने से साल वापस नहीं आते। भरोसा टूटने की आवाज अदालत में दर्ज नहीं होती, पर वह जिंदगी भर कानों में बजती रहती है।
2 दिन बाद अजय कपूर अपने फार्महाउस से पकड़ा गया। वह दस्तावेज जलवाने की कोशिश कर रहा था। निधि ने सरकारी गवाह बनने के बदले सारी चैट, वॉइस नोट्स और बैंक रिकॉर्ड दे दिए। उसने बताया कि विक्रम महीनों से योजना बना रहा था। उसने बीमा करवाया, मनाली का सुनसान रास्ता चुना, मौसम देखा, डॉक्टर विवेक को खरीदा, और दिल्ली में बंद ताबूत का इंतजाम भी पहले से सोच रखा था।
अनन्या ने यह सब अस्पताल के कमरे से सुना।
वह नहीं रोई।
सबसे ज्यादा दर्द यह नहीं था कि पति ने उसे मारने की कोशिश की। सबसे ज्यादा दर्द यह था कि कई लोग एक अजन्मे बच्चे की मौत पर ऐसे बात कर रहे थे जैसे किसी फाइल की तारीख बदलनी हो।
पहली सुनवाई में विक्रम जेल की साधारण वर्दी में था। उसके बाल बिखरे थे, दाढ़ी बढ़ी थी, आँखों में नींद नहीं थी। पर जब अनन्या छड़ी के सहारे अदालत में दाखिल हुई, और उसके पीछे नर्स छोटे मेडिकल पालने में आरव को लाई, विक्रम की आँखों में फिर वही खाई वाला भाव लौट आया—जैसे गलती उसकी नहीं, अनन्या की थी कि वह बच गई।
अनन्या ने अदालत में सब बताया। बर्फ, धक्का, निधि का चेहरा, विक्रम की आवाज, पेट के भीतर आरव की हलचल, वह रात जब नींद मौत की तरह उसे बुला रही थी। फिर उसने शोक-गृह की रिकॉर्डिंग का जिक्र किया, जहाँ उसके बंद ताबूत के सामने उसके ही पति ने कहा था कि वह अपने बच्चे को नहीं बचा सकी।
न्यायाधीश ने पूछा, “क्या आप कुछ और कहना चाहती हैं?”
अनन्या ने विक्रम की तरफ देखा।
“मैंने कई महीनों तक सोचा कि विवाह निभाने का मतलब सहना है। सवाल न पूछना है। हर अपमान के बाद मुस्कुराना है, ताकि परिवार की इज्जत बची रहे। लेकिन उस रात बर्फ पर पड़े-पड़े मुझे समझ आया कि जो आदमी आपकी मौत की कीमत गिन रहा हो, वह पति नहीं हो सकता। और जो बच्चा आपके पेट में हल्का-सा हिलकर कहे कि माँ, अभी मत हारो—वही आपका असली परिवार है।”
अदालत में सन्नाटा छा गया।
विक्रम ने नजरें झुका लीं।
पछतावे से नहीं।
हार से।
महीने बीतने लगे। अनन्या ने फिर चलना सीखा। हर कदम उसके शरीर से ज्यादा उसके मन की हड्डियाँ जोड़ता था। आरव ने मशीनों के बिना साँस लेना सीखा। वह इतना छोटा था कि उसकी उँगलियाँ अनन्या की उंगली के आधे हिस्से को ही पकड़ पाती थीं, मगर पकड़ता ऐसे था जैसे कह रहा हो—छोड़ना मत।
राजवीर हर दिन अस्पताल आता। वह पिता बनने की कोशिश करता, मगर अनन्या पर कोई रिश्ता थोपता नहीं। कभी चुपचाप बिल भर देता, कभी डॉक्टर से रिपोर्ट समझता, कभी आरव के लिए छोटे कपड़े लाता और फिर दरवाजे पर खड़ा रह जाता, जैसे अनुमति माँग रहा हो।
सुनीता भी आती। घर का बना दलिया, हल्दी वाला दूध, छोटी-छोटी माफियाँ लेकर। अनन्या हर बार उसे माफ नहीं कर पाती थी, पर हर बार उसे बाहर भी नहीं भेजती थी। कभी-कभी यही शुरुआत होती है।
एक दिन आरव को अस्पताल से छुट्टी मिली। राजवीर उन्हें दिल्ली नहीं, बल्कि ऋषिकेश के पास गंगा किनारे अपने पुराने घर ले गया। “छिपने के लिए नहीं,” उसने कहा, “साँस लेने के लिए।”
सुबह अनन्या बरामदे में बैठती, आरव को सीने से लगाए। दूर मंदिर की घंटियाँ बजतीं। गंगा धीरे बहती। पहाड़ दिखते तो उसके हाथ काँप जाते, पर फिर वह आरव की साँसें गिनती और खुद को याद दिलाती—हर पहाड़ मौत नहीं होता, कुछ पहाड़ वापसी के गवाह भी बनते हैं।
एक शाम अदालत से खबर आई—विक्रम पर हत्या के प्रयास, बीमा धोखाधड़ी, नवजात की हत्या की साजिश और आपराधिक षड्यंत्र के आरोप तय हुए। अजय कपूर की वकालत का लाइसेंस निलंबित हुआ। डॉक्टर विवेक जेल भेजा गया। निधि ने सबकुछ खो दिया—नौकरी, समाज, चमकदार जिंदगी और वह झूठा प्रेम, जिसके लिए उसने किसी और की मौत पर चुप्पी खरीदी थी।
राजवीर ने धीरे से पूछा, “अब तुम्हें शांति महसूस होती है?”
अनन्या ने आरव को देखा। वह सो रहा था। उसके गाल अब थोड़े भरने लगे थे। उसकी मुट्ठी अब भी बंद थी।
“शांति नहीं,” अनन्या बोली।
“तो क्या?”
उसने बच्चे के माथे को चूमा।
“कल।”
उस रात अनन्या ने सोशल मीडिया पर 1 तस्वीर डाली। उसमें आरव की नन्ही उँगलियाँ उसकी उँगली को पकड़े हुए थीं। नीचे उसने लिखा—
“उन्होंने मुझे समय से पहले दफना दिया था, लेकिन वे भूल गए कि माँ तब तक नहीं मरती, जब तक उसका बच्चा जिंदगी की तरफ से उसे पुकारता रहता है।”
हजारों लोगों ने लिखा—न्याय। चमत्कार। हिम्मत। बहुत-सी औरतों ने कुछ नहीं लिखा, सिर्फ आँसू वाला चिन्ह भेजा। शायद वे समझती थीं। वे, जिन्हें कभी पागल कहा गया क्योंकि उन्होंने झूठ की गंध समय से पहले पहचान ली थी। वे, जिन्हें परिवार की इज्जत के नाम पर चुप रहने को कहा गया। वे, जिन्होंने मुस्कुराते चेहरों के पीछे बंद दरवाजों की चीखें सुनी थीं।
अनन्या ने बहुत कम जवाब दिए।
वह लौटकर कोई देवी नहीं बनी थी। वह बदला लेने नहीं लौटी थी। वह बस जीने लौटी थी—आरव की पहली हँसी सुनने, सुबह की धूप में खिड़की खोलने, अपने नाम से बैंक कागजों पर हस्ताक्षर करने, और यह सीखने कि प्यार कभी भी कैद जैसा महसूस नहीं होना चाहिए।
कहीं जेल की ठंडी कोठरी में विक्रम शायद अब भी 50 करोड़ का हिसाब लगाता होगा।
पर उसकी सबसे बड़ी हार पैसा नहीं थी।
उसकी सबसे बड़ी हार यह थी कि उसने सोचा था, एक गर्भवती औरत को खाई में धक्का देकर वह उसकी कहानी खत्म कर देगा।
उसे क्या पता था, उस औरत के भीतर सिर्फ बच्चा नहीं था।
वहाँ लौट आने की वजह धड़क रही थी।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.