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पति ने यात्रा से लौटकर उसे महंगा हरा सूट दिया और कहा, “कल इसे पहनना, सबको मेरी पत्नी दिखनी चाहिए,” लेकिन बहन ने जैसे ही सूट पहना, उसका गला बंद होने लगा और पत्नी को समझ आया कि यह उपहार नहीं, साजिश थी

PART 1

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पन्ना-हरे रंग का वह महंगा अनारकली सूट उपहार नहीं था, वह मौत थी, जिसे रेशमी कागज और सुनहरी डोरी में लपेटकर उसके पति ने उसके हाथों में रख दिया था।

अंजलि मेहरा 38 साल की थी। दिल्ली के लाजपत नगर और दरियागंज में उसकी मां द्वारा शुरू की गई 3 छोटी दवा की दुकानों को अब वही संभालती थी। उसकी मां ने उन दुकानों को किसी बड़े कारोबार की तरह नहीं, बल्कि मोहल्ले की जरूरत की तरह खड़ा किया था। आधी रात को किसी बच्चे को बुखार हो, किसी बूढ़े को इंसुलिन चाहिए हो, किसी गरीब को दवा उधार लेनी हो—मेहरा मेडिकोज का शटर कभी सिर्फ पैसों के लिए नहीं खुलता था।

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अंजलि का पति विक्रम खन्ना एक निजी वित्तीय कंपनी में काम करता था। साफ कपड़े, धीमी आवाज, नपा-तुला व्यवहार। वह हमेशा कहता था कि भावनाओं से घर नहीं चलता, हिसाब से चलता है। शादी के 11 साल में उसने अंजलि को कभी बिना वजह फूल तक नहीं दिए थे।

इसलिए जब वह बेंगलुरु के कथित व्यापारिक दौरे से लौटा और हाथ में सफेद डिब्बा लेकर बोला, “कल रात मेरे निवेशकों के साथ डिनर है। इसे पहनना। सबको दिखना चाहिए कि मेरी पत्नी कितनी शान से रहती है,” तो अंजलि के भीतर कुछ चुभ गया।

डिब्बे में गहरा हरा अनारकली सूट था। कपड़ा इतना चमकदार था कि रोशनी पड़ते ही जैसे पानी की लहरें उठती थीं। दुपट्टे पर महीन सुनहरी कढ़ाई थी। अंजलि ने टैग देखा।

₹42,000।

उसने चौंककर पूछा, “विक्रम, इतना महंगा?”

विक्रम ने मुस्कुराकर उसके माथे को छुआ। “कभी-कभी पत्नी के लिए खर्च करना चाहिए।”

अंजलि मुस्कुरा दी, लेकिन उसके मन में ठंडा डर बैठ गया। विक्रम ऐसा आदमी नहीं था जो अचानक प्रेम दिखाए। वह हर खर्च का कारण मांगता था। यहां तक कि अंजलि की मां की बरसी पर फूल खरीदने को भी उसने फिजूल कहा था।

अगली सुबह विक्रम जल्दी ऑफिस चला गया। अंजलि घर में बैठकर दवा की दुकानों के लाइसेंस नवीनीकरण के कागज देख रही थी। दोपहर करीब 2 बजे दरवाजे की घंटी बजी।

बाहर विक्रम की छोटी बहन नेहा खड़ी थी। 35 साल की, सरकारी स्कूल में शिक्षिका, हमेशा जल्दबाजी में, हमेशा किसी न किसी की चिंता लेकर।

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“भाभी, भैया हैं?” उसने पूछा।

“ऑफिस गए हैं। अंदर आओ, चाय बनाती हूं।”

दोनों रसोई में बैठीं। नेहा ने स्कूल के बच्चों, महंगाई और अपने किराए के मकान की सीलन की बातें कीं। फिर उसकी नजर बैठक में रखे सफेद डिब्बे पर पड़ी।

“ये क्या है?”

“तुम्हारे भाई का उपहार,” अंजलि ने हल्की हंसी के साथ कहा।

नेहा ने सूट निकाला और उसकी आंखें चमक उठीं। “भाभी, बहुत सुंदर है। बस 1 मिनट पहनकर देख लूं?”

अंजलि ने मजाक में कहा, “फाड़ दिया तो आधी तनख्वाह तुम्हारी, आधी मेरी।”

नेहा हंसती हुई कमरे में गई। जब बाहर आई तो सचमुच किसी शादी की महफिल जैसी लग रही थी। हरा रंग उसके चेहरे पर खिल उठा था। वह आईने के सामने घूमी।

“भाभी, देखो ना, मैं तो फिल्मी लग रही हूं!”

अगले ही पल उसकी हंसी टूट गई।

नेहा ने गले पर हाथ रखा। फिर खांसी आई। फिर दूसरी। उसके चेहरे का रंग बदलने लगा।

“भाभी… सांस नहीं आ रही…”

अंजलि झटके से उठी। नेहा के गले पर लाल चकत्ते उभर रहे थे। वे चकत्ते तेजी से छाती और बाजुओं तक फैलने लगे।

“इसे उतारो… जल रहा है… भाभी, बचाओ!”

अंजलि के हाथ कांपने लगे। उसने पीछे की जिप खोली। सूट जमीन पर गिरा और नेहा उससे ऐसे दूर हट गई जैसे कपड़े में सांप छिपा हो।

अंजलि ने तुरंत एंबुलेंस बुलाई। घर में रखी एलर्जी की दवा नेहा को दी। उसकी अपनी सांस भी डर से अटक रही थी, क्योंकि वह इस हालत को पहचानती थी।

5 साल पहले एक सिंथेटिक रंग से उपचारित साड़ी पहनने के बाद अंजलि की हालत ऐसी ही हुई थी। उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था। डॉक्टर ने साफ कहा था कि वही रसायन दोबारा शरीर से छू गया तो जान जा सकती है।

विक्रम उस दिन अस्पताल में था। उसने डॉक्टर की बात सुनी थी।

विक्रम जानता था।

एंबुलेंस आई। पैरामेडिक ने नेहा को ऑक्सीजन लगाई। उनमें से एक ने दस्ताने पहनकर सूट उठाया और नाक सिकोड़ ली।

“इसमें बहुत तेज केमिकल की गंध है। सामान्य कपड़े में ऐसा नहीं होता।”

नेहा को ले जाया गया। घर अचानक खाली हो गया। अंजलि उस हरे सूट को देखती रही।

सुंदर।

महंगा।

जहरीला।

उसने सफाई वाले दस्ताने पहने और डिब्बे की तहें खंगालीं। रेशमी कागज के नीचे मोड़ा हुआ बिल मिला।

सूट बेंगलुरु से नहीं खरीदा गया था।

वह दिल्ली के खान मार्केट की एक डिजाइनर दुकान से खरीदा गया था, उसी गुरुवार को, जब विक्रम कथित रूप से शहर से बाहर था।

अंजलि ने विक्रम को फोन किया।

“नेहा ने सूट पहन लिया था। उसकी हालत बिगड़ गई। एंबुलेंस ले गई।”

दूसरी तरफ कुछ सेकंड की चुप्पी रही।

फिर विक्रम बोला, “शायद उसे कोई एलर्जी हो गई होगी।”

“वैसी ही एलर्जी, जैसी मुझे है। और बिल कह रहा है कि सूट दिल्ली से खरीदा गया।”

विक्रम की आवाज कठोर हो गई। “मैंने नहीं खरीदा। ऑफिस की एक सहकर्मी ने लिया था। रिया को कपड़ों की समझ है।”

“उसका नंबर दो।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम पागलपन कर रही हो। एक कपड़े को लेकर हत्या की कहानी मत बनाओ।”

उसने फोन काट दिया।

अंजलि के हाथ में बिल था। जमीन पर जहर था। और पहली बार उसे समझ आया कि उसके पति ने उसे प्रेम नहीं दिया था।

उसने उसे मरने की तैयारी भेजी थी।

उसी शाम उसके घर के कैमरे में कुछ ऐसा कैद हुआ, जिसे देखकर उसकी रीढ़ तक जम गई।

PART 2

कैमरे की रिकॉर्डिंग में गुरुवार रात 11:38 बजे विक्रम अकेला घर लौटा था। उसके हाथ में वही सफेद डिब्बा था। उसने बैठक की लाइट नहीं जलाई। सीधे स्टोररूम में गया, जहां पुराने सफाई के रसायन और बंद डिब्बे रखे थे। 7 मिनट बाद वह बाहर आया, डिब्बे को बंद किया और बड़े आराम से अपने कमरे में चला गया।

अंजलि ने रिकॉर्डिंग 3 बार देखी। फिर उसने अपनी मां के पुराने वकील, अधिवक्ता रमेश भसीन को फोन किया।

रमेश ने केवल इतना कहा, “कपड़े को मत छूना। उसे साफ थैले में सील करो। सुबह मेरे पास आओ। और आज रात दरवाजा भीतर से बंद करके सोना।”

अगले दिन अंजलि ने दस्तावेज बदले। उसकी दुकानों, फ्लैट और बैंक खातों से विक्रम का नाम हटाया गया। उत्तराधिकारी बनाई गई उसकी मौसी सुधा और उसकी पुरानी साझेदार प्रीति, जिसने मां की बीमारी से लेकर कारोबार तक हर मोड़ पर अंजलि का साथ दिया था।

रात को विक्रम ने जैसे ही सुना, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

“तुमने मेरा नाम हटा दिया?” उसने दांत भींचकर पूछा।

“जिस आदमी के दिए कपड़े से मौत आ सकती हो, उसे विरासत नहीं मिलती।”

विक्रम हंसा, मगर उसकी आंखों में डर था। “संभलकर बोलो, अंजलि। शक घर तोड़ देता है।”

“झूठ घर नहीं, जान भी लेता है।”

अगली सुबह रमेश भसीन अंजलि को थाने ले गए। सूट, बिल, मेडिकल रिपोर्ट, नेहा का अस्पताल रिकॉर्ड और कैमरे की फुटेज जमा हुई।

महिला निरीक्षक कविता राणा ने सब सुना, फिर बोलीं, “अब यह घरेलू झगड़ा नहीं रहा। अब यह जांच है।”

2 दिन बाद रिया को भी बुलाया गया।

और जैसे ही उसे कैमरे की फुटेज दिखाई गई, उसका चेहरा बिखर गया।

PART 3

रिया मल्होत्रा विक्रम के ऑफिस में वरिष्ठ सलाहकार थी। पहली बार थाने आई तो उसके कपड़ों से महंगे इत्र की गंध आ रही थी, आंखों पर बड़े चश्मे थे, और चाल में वही अहंकार था जो अक्सर सच से पहले टूटता है।

उसने कहा कि उसने सिर्फ एक मदद की थी। विक्रम कपड़े नहीं समझता था, इसलिए उसने उसकी पत्नी के लिए सूट चुना। उसे किसी एलर्जी के बारे में जानकारी नहीं थी। उसने यह भी कहा कि विक्रम उस दिन दुकान के बाहर केवल भुगतान करने आया था।

लेकिन जांच में झूठ जल्दी बूढ़ा हो जाता है।

डिजाइनर दुकान की फुटेज में रिया सूट चुनती दिखी, पर विक्रम भी उसके साथ था। दोनों ने लंबे समय तक किसी बात पर चर्चा की। फिर विक्रम ने फोन पर किसी को सूट के कपड़े और रंग के बारे में पूछते हुए फोटो भेजी। दुकान के कर्मचारी ने बयान दिया कि विक्रम बार-बार पूछ रहा था, “इस कपड़े में सिंथेटिक डाई ज्यादा है न? रंग जल्दी नहीं उतरता न?”

लैब रिपोर्ट आने में 4 दिन लगे।

जब रिपोर्ट रमेश भसीन के हाथ में आई, अंजलि उनके सामने चुप बैठी रही। रमेश ने चश्मा उतारा, आंखें बंद कीं, फिर धीमे से बोले, “यह सिर्फ कपड़ा नहीं था। इसके गले, बगल और कमर वाले हिस्सों पर अतिरिक्त रासायनिक पदार्थ लगाया गया था। वही पदार्थ तुम्हारे पुराने मेडिकल रिकॉर्ड में खतरनाक लिखा है।”

अंजलि ने मेज पकड़ ली।

उसकी उंगलियां सफेद पड़ गईं।

“मतलब…” उसकी आवाज सूख गई।

“मतलब यह कि अगर तुम इसे पूरी शाम पहनतीं, तो शायद अस्पताल तक पहुंचने से पहले सांस बंद हो जाती।”

नेहा अभी भी कमजोर थी, लेकिन उसने बयान दिया। उसने निरीक्षक कविता राणा के सामने रोते हुए कहा, “मेरे भाई को भाभी की एलर्जी पता थी। उस रात अस्पताल में डॉक्टर ने हमारे सामने कहा था कि अगली बार यह जानलेवा हो सकता है।”

उस बयान ने जांच की दिशा बदल दी।

फोन रिकॉर्ड निकाले गए। विक्रम और रिया पिछले 8 महीनों से लगातार संपर्क में थे। रात के 1 बजे तक लंबी कॉलें। जयपुर और चंडीगढ़ के होटलों की बुकिंग। छोटी-छोटी रकमों के ट्रांसफर। फिर कुछ हटाए गए संदेश, जिन्हें डिजिटल जांच में वापस निकाला गया।

एक संदेश ने अंजलि की दुनिया तोड़ दी।

विक्रम ने लिखा था, “कल डिनर में पहन लेगी तो सब प्राकृतिक लगेगा। एलर्जी अटैक। कोई शक नहीं करेगा।”

रिया का जवाब था, “और दुकानें?”

विक्रम ने लिखा, “पुराने कागजों में मेरा नाम है। मौत के बाद सब संभाल लूंगा।”

अंजलि को लगा जैसे किसी ने उसके सीने के बीचोंबीच बर्फ रख दी हो। 11 साल का विवाह, 11 साल की थाली, बिस्तर, रिश्तेदारी, त्योहार, करवाचौथ की रातें, मां की बरसी, बीमारी के दिन—सबके नीचे यह आदमी हिसाब लगा रहा था कि उसकी मौत कितने रुपये की होगी।

रिया 6 घंटे की पूछताछ के बाद टूट गई।

उसने बताया कि विक्रम कर्ज में डूबा था। शेयर बाजार में घाटा, निजी उधार, छिपे हुए ऑनलाइन सट्टे, क्रेडिट कार्ड की सीमा पूरी। उसने रिया से वादा किया था कि अंजलि के मरते ही वह एक दवा की दुकान बेच देगा, कर्ज चुकाएगा और दोनों गुरुग्राम में नया घर लेंगे।

रिया ने रोते हुए कहा, “वह कहता था कि अंजलि बहुत सावधान औरत है, पर पति के उपहार पर शक नहीं करेगी।”

यह वाक्य सुनकर अंजलि ने पहली बार सिर झुका लिया।

वह रोई नहीं।

कुछ दर्द आंसुओं से बड़े होते हैं। वे भीतर चुपचाप खून बनकर बहते हैं।

विक्रम को गिरफ्तार किया गया। पहले उसने सब रिया पर डालने की कोशिश की। बोला कि रिया उससे प्रेम करती थी, जलती थी, और उसने अकेले योजना बनाई। लेकिन कैमरे, संदेश, बिल, मेडिकल रिकॉर्ड और नेहा की गवाही ने उसके हर रास्ते पर ताला लगा दिया।

जब अदालत में मामला चला, अंजलि हर तारीख पर सफेद सूती साड़ी पहनकर गई। न कोई आभूषण, न कोई दिखावा। बस मां की पुरानी चांदी की अंगूठी, जो वह हमेशा पहनती थी।

विक्रम कभी उसकी तरफ सीधा नहीं देख पाया।

रिया अक्सर रोती थी। पर अंजलि ने सीखा था कि देर से आए आंसू सच नहीं धोते।

एक दिन अदालत के बाहर नेहा ने अंजलि का हाथ पकड़ लिया। उसका चेहरा अपराधबोध से बुझा हुआ था।

“भाभी, अगर मैं वह सूट न पहनती…”

अंजलि ने उसे रोक दिया। “तो शायद आज मैं यहां नहीं होती।”

नेहा की आंखों से आंसू गिर पड़े। “मैंने तो बस मजाक में पहना था।”

“कभी-कभी भगवान किसी को गलती से नहीं भेजता। तुम मेरी रक्षा बनकर आई थीं।”

उस दिन नेहा अंजलि से लिपटकर बहुत देर रोती रही। खून का रिश्ता विक्रम से था, पर उस दिन नेहा ने साबित किया कि रिश्ता जन्म से नहीं, सच के साथ खड़े होने से बनता है।

मुकदमा 9 महीने चला। अदालत ने माना कि विक्रम ने जानबूझकर अंजलि की जान लेने की साजिश रची, ताकि संपत्ति और व्यापार पर कब्जा कर सके। विक्रम को हत्या के प्रयास, आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी से जुड़े अपराधों में कठोर सजा मिली। रिया को सहयोग के कारण कम सजा मिली, लेकिन वह भी जेल गई।

फैसला सुनते समय अदालत कक्ष में सन्नाटा था।

अंजलि को खुशी नहीं हुई।

उसे केवल थकान महसूस हुई।

वह थकान जो किसी लंबी लड़ाई से नहीं, बल्कि उस सच्चाई से आती है कि जिस आदमी के साथ उसने जीवन बांटा था, वही उसकी आखिरी सांस गिन रहा था।

तलाक बाद में हुआ। अंजलि ने अपना फ्लैट बेच दिया। वह घर अब घर नहीं रहा था। उन दीवारों ने विक्रम की फुसफुसाहटें, उसकी झूठी मुस्कानें, उसकी रात की चालें और अंजलि की घुटती हुई नींदें देखी थीं।

वह दक्षिण दिल्ली में एक छोटे, धूपदार मकान में चली गई। बरामदे में तुलसी रखी, खिड़की पर मोगरे का पौधा लगाया और दरवाजे के पास मां की तस्वीर। मौसी सुधा ने पहली शाम आलू के पराठे बनाए। प्रीति मिठाई लेकर आई। नेहा चुपचाप चाय बनाती रही, जैसे हर कप में अपने अपराधबोध की थोड़ी-थोड़ी माफी घोल रही हो।

धीरे-धीरे अंजलि ने फिर सांस लेना सीखा।

रात को दरवाजे की कुंडी 3 बार जांचने की आदत थी। कोई पैकेट आए तो वह पहले गंध पहचानती। नए कपड़े खरीदती तो उन्हें अलग धुलवाती। किसी के अचानक दिए उपहार पर उसके भीतर अब भी ठंड उतर आती।

लेकिन वह जिंदा थी।

वह सुबह दुकानों पर जाती। ग्राहकों से बात करती। बूढ़ी अम्माओं को दवा समझाती। किसी बच्चे को बुखार की दवा देते समय मुस्कुरा देती। हर शाम मां की तस्वीर के सामने दीपक जलाती और चुपचाप कहती, “मैं बच गई।”

6 महीने बाद उसने मेहरा मेडिकोज की चौथी शाखा खोली।

उद्घाटन वाले दिन दुकान के बाहर छोटी-सी पूजा हुई। नारियल फूटा। हल्दी और फूलों की गंध हवा में घुली। पुराने ग्राहक आए। कर्मचारियों ने ताली बजाई। प्रीति ने बोर्ड की तरफ देखते हुए कहा, “आंटी होतीं तो बहुत खुश होतीं।”

अंजलि ने ऊपर देखा।

बोर्ड पर लिखा था—मेहरा मेडिकोज।

नीचे एक छोटी पंक्ति और जुड़वाई गई थी—

“भरोसा, सिर्फ दवा में नहीं, रिश्तों में भी जरूरी है।”

नेहा भी आई थी। उसने अंजलि को हल्का गुलाबी सूती कुर्ता दिया। डिब्बा साधारण था, बिना सुनहरी डोरी के। नेहा ने संकोच से कहा, “पहले धुलवा लेना। मैंने बिल भी रखा है।”

अंजलि पहली बार खुलकर हंसी।

उस हंसी में दर्द भी था, मुक्ति भी।

1 साल बाद जेल से विक्रम की चिट्ठी आई।

उसने लिखा कि वह पछता रहा है। उसने लिखा कि कर्ज ने उसका दिमाग खराब कर दिया था। उसने लिखा कि वह अंजलि को सच में कभी खोना नहीं चाहता था। उसने लिखा कि उसे अब समझ आया कि अंजलि ने उससे सच्चा प्रेम किया था।

अंजलि ने चिट्ठी पूरी पढ़ी।

फिर वह बरामदे में गई। पीतल की छोटी थाली में चिट्ठी रखी। माचिस जलाई।

कागज धीरे-धीरे मुड़ा। स्याही काली हुई। शब्द राख बन गए। विक्रम की आवाज धुएं की पतली लकीर बनकर हवा में खो गई।

अंजलि देर तक बैठी रही।

सामने मोगरे के फूल रात में भी सफेद चमक रहे थे। भीतर रसोई में चाय उबल रही थी। मां की तस्वीर के सामने दिया स्थिर जल रहा था।

उसने अपना गला छुआ।

सांस पूरी थी।

डर अभी पूरी तरह गया नहीं था, पर अब वह मालिक नहीं था।

अंजलि उठी, दरवाजा बंद किया, कुंडी लगाई और अपने कमरे में चली गई। वह अब किसी की पत्नी के नाम से नहीं जी रही थी। न किसी की विरासत, न किसी की योजना, न किसी की आसान शिकार।

वह अंजलि मेहरा थी।

वह औरत, जिसे मौत पन्ना-हरे कपड़े में पहनाई जाने वाली थी।

मगर उसने उसे उतार फेंका।

और अपनी जिंदगी फिर से अपने नाम लिख दी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.