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पड़ोसन ने मज़ाक में मिली छुट्टी को सच मान लिया, लेकिन बीच पर वायरल हुई “सगाई” की तस्वीर ने उसके बॉस, एक्स और चोरी हुए काम का ऐसा राज खोल दिया कि सब दंग रह गए

भाग 1

सुबह 6:40 बजे मुंबई की एक पुरानी अपार्टमेंट बिल्डिंग के चौथे फ्लोर पर रोहन मल्होत्रा ने मज़ाक में अपनी पड़ोसन को गोवा चलने को कहा, और वह सचमुच अपना बड़ा सूटकेस लेकर उसके सामने खड़ी हो गई।

रोहन के हाथ में कचरे का फटा हुआ बैग था, जिसमें से कॉफी की गीली पत्तियां और रात की बची हुई सब्ज़ी का पानी उसके ट्रैकपैंट पर टपक रहा था। वह नंगे पैर था, बाल बिखरे हुए थे, और चेहरा ऐसा था जैसे जिंदगी ने उसे नींद से नहीं, सीधे शर्मिंदगी से जगाया हो। उसी वक्त 4B का दरवाजा खुला और अनन्या मेहरा बाहर आई।

अनन्या 29 साल की ग्राफिक डिजाइनर थी। वह शांत रहती थी, लेकिन उसकी चुप्पी में हमेशा कोई तूफान छिपा रहता था। 8 महीनों से वह और रोहन पड़ोसी थे। उनका रिश्ता बस लिफ्ट में हल्की मुस्कान, कभी-कभी चार्जर मांगने और एक रात बाथरूम में कॉकरोच मारने तक सीमित था। उस रात अनन्या ने उसे डरते हुए “स्पाइडर-मैन” कहा था, क्योंकि रोहन ने कॉकरोच को ऐसे मारा था जैसे कोई बड़ा मिशन पूरा कर रहा हो।

उस सुबह अनन्या के हाथ में बड़ा सूटकेस था। आंखों के नीचे थकान थी, बाल जल्दी-जल्दी बांधे हुए थे, और चेहरे पर वह टूटन थी जिसे लोग धूप के चश्मे से छिपाने की कोशिश करते हैं।

रोहन ने आधी नींद में पूछा, “कहीं जा रही हो?”

अनन्या ने सूटकेस की तरफ देखा, जैसे उसे खुद याद आया हो कि वह उसे घसीट रही है। “ऑफिस ट्रिप कैंसल हो गई। छुट्टी पहले ही ले ली थी। अब कहीं नहीं जा रही।”

रोहन ने हंसते हुए कहा, “तो मेरे साथ चलो। मैं आज गोवा जा रहा हूं। सूटकेस तुम्हारे पास है, बुकिंग मेरे पास है। बहुत प्रैक्टिकल प्लान है।”

उसे लगा अनन्या आंखें घुमाकर चली जाएगी। लेकिन वह कुछ सेकंड तक उसे देखती रही, फिर बोली, “ठीक है।”

रोहन की हंसी वहीं मर गई।

“ठीक है मतलब मजाक वाला ठीक है?”

“नहीं। ठीक है मतलब मैं चलूंगी।”

उसी पल लिफ्ट खुली और मिसेज डिसूजा बाहर आईं। उन्होंने रोहन को कचरे के पानी में भीगा हुआ, अनन्या को सूटकेस के साथ और दोनों के चेहरों पर घबराहट देखी। उनके चेहरे पर वही मुस्कान आ गई जो मुंबई की आंटियों को किसी की निजी जिंदगी की खुशबू आते ही आ जाती है।

“अरे वाह,” उन्होंने कहा, “आखिर बात आगे बढ़ ही गई।”

अनन्या के गाल लाल हो गए। रोहन ने जल्दी से कहा, “नहीं, ऐसा कुछ—”

“हॉलिडे है,” अनन्या ने बीच में कहा।

मिसेज डिसूजा मुस्कुराते हुए लिफ्ट में चली गईं। जाते-जाते उन्होंने रोहन को आंख भी मारी।

कुछ देर तक दोनों चुप रहे। फिर अनन्या ने पहली बार बिना बचाव के कहा, “मुझे यहां से दूर जाना है। और मैं अकेले नहीं जाना चाहती।”

रोहन को उसी वक्त समझ जाना चाहिए था कि यह कोई हल्का मजाक नहीं था। लेकिन उसके फोन पर बहन रिया का मैसेज आया—“कृपया ये मत कहना कि तू अकेले उस दुखी गोवा ट्रिप पर जा रहा है।”

अनन्या ने मैसेज पढ़ लिया। उसने रोहन की तरफ देखकर धीमे से पूछा, “तो बताओ, मैं तुम्हें बचा रही हूं या तुम मुझे?”

रोहन ने कहा कि वह उसे 3:00 बजे लेने आएगा। लेकिन वह यह नहीं जानता था कि 3:00 बजे तक सिर्फ उसकी कार नहीं, उसकी पूरी जिंदगी दिशा बदलने वाली थी।

भाग 2

ऑफिस में रोहन पूरे दिन बिखरा रहा। वह एक रेडियो प्रोड्यूसर था, सुबह के शो में दूसरों की आवाज़ों को चमकदार बनाना उसका काम था, लेकिन उस दिन उसकी अपनी आवाज़ कांप रही थी। उसके साथी विक्रम ने पूछा, “तूने सच में अपनी पड़ोसन को गोवा बुला लिया?”

रोहन ने सिर पकड़ लिया। “मजाक में।”

“और वह मान गई?”

“हां।”

“सुंदर है?”

रोहन चुप हो गया। विक्रम हंस पड़ा। “मतलब बहुत सुंदर है।”

दोपहर तक पूरा स्टूडियो जान गया था। किसी ने कहा अलग कमरे रखना, किसी ने कहा दिल संभाल कर रखना। रोहन ने कार वैक्यूम की, स्नैक्स खरीदे और खुद को समझाया कि यह बस 1 अजीब छुट्टी है, कोई फिल्म नहीं।

3:00 बजे से 3 मिनट पहले अनन्या बिल्डिंग के बाहर खड़ी थी। हाथ में 2 कॉफी कप थे। उसने एक रोहन को दिया। “तुम्हारे लिए।”

रोहन ने कहा, “जरूरत नहीं थी।”

अनन्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “पता है। इसलिए तो अच्छा है।”

कार में बैठते ही अनन्या ने नियम बनाए। “अगर कुछ अजीब लगेगा, बोल देंगे। अलग कमरे। और हम ऐसा दिखावा नहीं करेंगे कि हम एक-दूसरे को बहुत अच्छे से जानते हैं।”

रोहन ने कहा, “कोई जल्दी नहीं।”

रास्ते में अनन्या ने बताया कि उसका बड़ा प्रेजेंटेशन उसके बॉस ने चुरा लिया था। वही कैंपेन जिस पर उसने महीनों काम किया था। और उसका एक्स, मानव, उसी ऑफिस में था। उसने उसे मैसेज करके कहा था कि वह “ड्रामा” कर रही है।

रोहन ने पहली बार गुस्से में कहा, “ड्रामा नहीं, चोरी है।”

अनन्या ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा, “कभी-कभी लोग आपका दर्द भी आपसे छीन लेते हैं, और फिर कहते हैं कि तुम ज्यादा महसूस करती हो।”

गोवा पहुंचते-पहुंचते रात हो गई। समुद्र की आवाज़ अंधेरे में गूंज रही थी। छोटा-सा बीच कॉटेज तस्वीरों से ज्यादा पुराना निकला। अंदर 2 कमरे थे, लेकिन दूसरा कमरा बच्चों वाले बंक बेड जैसा था, ऊपर लकड़ी का जहाज़ी पहिया लगा हुआ।

अनन्या ने देखा और रोहन से बोली, “तुमने कहा था 2 बेडरूम।”

रोहन ने शर्माते हुए कहा, “तकनीकी रूप से यह भी बेडरूम है।”

रात को जब हवा खिड़कियों से टकरा रही थी, अनन्या उसके दरवाजे पर आई। “मुझे नई जगहों पर नींद नहीं आती।”

दोनों ने थोड़ी देर बात की। मानव का नाम फिर आया। अनन्या की आवाज़ टूट गई। रोहन ने मजाक नहीं किया, बस कहा, “वह तुम्हें छोटा महसूस कराता है, क्योंकि सच में तुम उससे बड़ी हो।”

अनन्या उसे देखते-देखते रुक गई।

तभी उसके फोन पर मानव का मैसेज आया—“अगर किसी लड़के के साथ जाकर मुझे जलाना चाहती हो, तो यह बहुत घटिया है।”

अनन्या का चेहरा पीला पड़ गया।

और तभी रोहन की बहन रिया का फोन आया। वह घबराई हुई थी।

“रोहन, तुम दोनों इंटरनेट पर क्यों वायरल हो रहे हो?”

भाग 3

रिया की आवाज़ फोन पर इतनी तेज़ थी कि अनन्या ने भी सुन लिया। रोहन ने फोन हाथ में कस लिया।

“क्या मतलब वायरल?”

रिया ने तुरंत एक लिंक भेजा। रोहन ने स्क्रीन खोली। गोवा के एक लोकल बीच पेज पर उनकी तस्वीर लगी थी। तस्वीर में रोहन रेत पर घुटने के बल बैठा था और अनन्या सामने खड़ी थी। उसके चेहरे पर हंसी थी, बाल हवा में उड़ रहे थे, और रोहन का हाथ उसकी तरफ बढ़ा हुआ था।

सच यह था कि रोहन उसके सैंडल से फंसा हुआ शंख का टुकड़ा निकाल रहा था। लेकिन कैप्शन था—“बारिश से पहले बीच पर प्यारा प्रपोजल। मुंबई कपल की खूबसूरत सगाई।”

अनन्या ने स्क्रीन देखी। फिर रोहन को देखा। फिर दोबारा स्क्रीन देखी।

“कम से कम मेरे बाल अच्छे लग रहे हैं,” उसने धीरे से कहा।

रोहन पहले हंसा। फिर अनन्या भी हंस पड़ी। बारिश बाहर बरस रही थी, समुद्र गरज रहा था, और दोनों कॉटेज के बरामदे में भीगे खड़े थे, जैसे किसी ने उनकी अजीब, टूटी, अनियोजित जिंदगी को गलती से रोमांटिक पोस्ट बना दिया हो।

रिया फोन पर चिल्ला रही थी, “रोहन! तू सगाई कर चुका है या गिरकर सिर फोड़ लिया है?”

अनन्या ने फोन लिया। “हाय रिया, हम सगाई नहीं कर रहे।”

रिया ने तुरंत पूछा, “अभी नहीं?”

अनन्या ने फोन रोहन को ऐसे पकड़ा दिया जैसे वह गर्म तवा हो।

लेकिन यह मजाक ज्यादा देर तक हल्का नहीं रहा। अगले ही घंटे मानव का मैसेज आया—“बहुत जल्दी आगे बढ़ गई। ऑफिस में सबको बता दूंगा कि तुमने कैंपेन के लिए झूठ बोला था।”

अनन्या का चेहरा सख्त हो गया। वह सोफे पर बैठ गई। पहली बार रोहन ने उसके भीतर डर से ज्यादा थकान देखी। वह लड़की जो हमेशा नियंत्रित दिखती थी, भीतर से रोज़ टूट रही थी।

रोहन ने पूछा, “तुम्हारे पास प्रूफ है?”

अनन्या ने धीरे से सिर हिलाया। “हां। ईमेल, ड्राफ्ट, फाइल टाइमस्टैम्प, सब कुछ। लेकिन मैं बोलती हूं तो लोग कहते हैं मैं भावुक हूं।”

रोहन ने टेबल पर रखी मोमबत्ती की लौ को देखा। “तो इस बार भावुक मत बनो। साफ बनो।”

अगली सुबह अनन्या ने समुद्र किनारे खड़े होकर अपने बॉस को फोन किया। रोहन बरामदे से उसे देख रहा था। हवा में नमक था, सूरज हल्का था, और अनन्या की आवाज़ पहली बार कांप नहीं रही थी।

“सर, जिस कैंपेन को आप प्रेजेंट कर रहे हैं, वह मेरा काम है। मेरे पास सारे दस्तावेज़ हैं। अगर मेरा नाम हटाया गया, तो मैं क्लाइंट और एचआर दोनों को पूरी फाइल भेजूंगी।”

दूसरी तरफ से शायद कुछ कठोर कहा गया। अनन्या ने आंखें बंद कीं, फिर बोली, “नहीं, मैं ओवररिएक्ट नहीं कर रही। मैं अपना काम वापस मांग रही हूं।”

कुछ देर बाद उसने फोन काट दिया। वह वापस आई तो उसके हाथ ठंडे थे, लेकिन आंखें चमक रही थीं।

“शायद मैंने नौकरी खो दी,” उसने कहा।

रोहन ने उसे कॉफी देते हुए कहा, “या शायद तुमने खुद को वापस पा लिया।”

अनन्या ने उसे देखा। इस बार उसके चेहरे पर हंसी नहीं थी, बचाव नहीं था, बस एक सवाल था।

“तुम हमेशा मजाक करते हो, लेकिन कभी-कभी लगता है सच बोल देते हो।”

रोहन ने धीरे से कहा, “क्योंकि सच सीधे बोलूं तो डर लगता है।”

“किस बात का डर?”

“कि तुम वापस मुंबई जाकर इस सबको एक अजीब छुट्टी कह दोगी।”

अनन्या ने कप नीचे रख दिया। “मुझे डर है कि अगर मैंने इसे सच माना, तो फिर मुझे अपने पुराने डर से बाहर निकलना पड़ेगा।”

दोनों के बीच समुद्र की आवाज़ भर गई। उस पल कोई फिल्मी संगीत नहीं था, कोई बड़ा इजहार नहीं था। बस 2 लोग थे, जो अपनी-अपनी थकान से बाहर निकलकर एक-दूसरे को देखने लगे थे।

दिन धीरे-धीरे बीतने लगे। सुबह वे चाय बनाते, फिर बीच पर जाते। अनन्या शंख इकट्ठा करती और हर शंख को ऐसे देखती जैसे उसमें कोई कहानी छिपी हो। रोहन उसके सैंडल हाथ में लेकर चलता, क्योंकि अनन्या कहती थी कि महिलाओं के कपड़ों में जेबें न होना समाज की सबसे बड़ी साजिश है।

एक दोपहर रसोई में एक छोटा केकड़ा घुस आया। अनन्या कुर्सी पर चढ़ गई और बोली, “यह काटेगा क्या?”

रोहन ने कटोरा हाथ में लेते हुए कहा, “मुझे नहीं पता, लेकिन मैं नेतृत्व दिखाने की कोशिश कर रहा हूं।”

केकड़े ने पंजा उठाया। रोहन पीछे हट गया। अनन्या चिल्लाई, “मुंबई के हीरो, आगे बढ़ो!”

काफी संघर्ष के बाद रोहन ने केकड़े को कटोरे में बंद किया और दोनों ने उसे बाहर रेत पर छोड़ दिया। केकड़ा आज़ादी की तरफ भाग गया। अनन्या ने तालियां बजाईं। “मेरे हीरो।”

रोहन ने कहा, “मैं सिर्फ 1 बार चिल्लाया था।”

“2 बार,” अनन्या ने तुरंत कहा।

उन हंसी वाले पलों के बीच भी अनन्या के फोन पर मानव के मैसेज आते रहे। कभी ताना, कभी धमकी, कभी नकली चिंता। लेकिन हर बार अनन्या थोड़ी कम कांपती। एक रात उसने मानव का नंबर ब्लॉक कर दिया। उसने फोन टेबल पर रखा और लंबी सांस ली, जैसे किसी ने उसके गले से अदृश्य हाथ हटा दिया हो।

उसी रात बिजली चली गई। कॉटेज अंधेरे में डूब गया। रोहन ने मोमबत्तियां जलाईं। बारिश छत पर बज रही थी। अनन्या कंबल ओढ़े सोफे पर बैठी थी।

“हर हॉरर फिल्म ऐसे ही शुरू होती है,” उसने कहा।

रोहन ने कहा, “हॉरर फिल्म तब शुरू होती है जब लोग अलग-अलग कमरों में जाते हैं। हम ऐसा नहीं करेंगे।”

“अगर बेसमेंट से आवाज़ आए?”

“यहां बेसमेंट नहीं है।”

“यही तो बेसमेंट चाहता है कि हम सोचें।”

दोनों हंस पड़े। फिर वही हंसी धीरे-धीरे शांत हुई। मोमबत्ती की रोशनी में अनन्या ने पूछा, “तुम अकेले 2 कमरों वाला कॉटेज क्यों बुक करते?”

रोहन ने पहली बार अपना बचाव नहीं किया। “शायद मुझे लगा, ज्यादा जगह होगी तो जिंदगी कम खाली लगेगी।”

अनन्या चुप रही। यह वह चुप्पी थी जिसमें कोई आपको जज नहीं करता, बस आपके पास बैठता है।

“मैं काम बहुत करता हूं,” रोहन ने कहा। “क्योंकि रुकता हूं तो पता चलता है कि मैं किससे भाग रहा हूं।”

“किससे?”

“अकेलेपन से। और शायद इस डर से कि कोई रुकना चाहेगा ही नहीं।”

अनन्या की आंखें नरम हो गईं। “मैं भी भाग रही थी। फर्क बस इतना है कि मैं सूटकेस लेकर भागी।”

“और मैं कचरे का बैग लेकर।”

वह हंसी, लेकिन आंखों में नमी थी।

तीसरे दिन अनन्या को ऑफिस से कॉल आया। क्लाइंट ने सीधे उससे बात करने की मांग की थी। उसके बॉस की चाल खुल चुकी थी, क्योंकि अनन्या ने दस्तावेज़ भेज दिए थे। उसे वापस प्रोजेक्ट लीड बनने का प्रस्ताव मिला, लेकिन उसी बॉस के नीचे। उसने बिना ज्यादा सोचे कहा, “नहीं। मैं अपना काम बेच सकती हूं, अपनी आवाज़ नहीं।”

फोन कटते ही वह कुछ पल तक स्थिर खड़ी रही। फिर रोहन के सामने बैठ गई। “मैंने इस्तीफा दे दिया।”

रोहन ने पूछा, “डर लग रहा है?”

“बहुत।”

“अच्छा है। इसका मतलब यह सच है।”

उस शाम वे चाय लेकर बरामदे में बैठे। हवा में बारिश के बाद की नमी थी। अनन्या ने धीरे से कहा, “मैं नहीं चाहती कि यह सब रिबाउंड लगे। न तुम्हारे लिए, न मेरे लिए।”

रोहन ने सिर हिलाया। “मुझे भी नहीं।”

“मैं नहीं चाहती कि गोवा, समुद्र और वायरल फोटो मिलकर हमें झूठा साहस दे दें।”

“तो हम मुंबई लौटेंगे,” रोहन ने कहा। “लिफ्ट में मिलेंगे। कॉफी पिएंगे। धीरे-धीरे प्लान बनाएंगे। कोई जल्दी नहीं।”

अनन्या ने पूछा, “नियम वाला ‘कोई जल्दी नहीं’?”

“हां। कोई स्पीड नहीं।”

उसने पहली बार खुद आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ा। कोई किस नहीं, कोई बड़ा वादा नहीं, कोई नाटकीय संवाद नहीं। बस उसकी उंगलियां रोहन की उंगलियों में आकर ठहर गईं। उस छोटे-से स्पर्श में जितनी सच्चाई थी, उतनी शायद किसी बड़े इजहार में नहीं होती।

लेकिन मुंबई लौटना आसान नहीं था। बिल्डिंग के नीचे पहुंचते ही मिसेज डिसूजा तैयार बैठी थीं। उन्होंने दोनों के अलग-अलग सूटकेस देखे, फिर हाथों को देखा।

“अरे, अंगूठी नहीं?”

अनन्या ने बिना सोचे कहा, “अभी प्रोबेशन पर हैं।”

मिसेज डिसूजा ने रोहन के कंधे पर हाथ रखा। “अच्छा है बेटा, चरित्र बनेगा।”

पूरी बिल्डिंग में उनकी “झूठी सगाई” की कहानी फैल चुकी थी। वॉचमैन से लेकर दूधवाले तक सब मुस्कुरा रहे थे। रोहन शर्मिंदा था, लेकिन अनन्या अब पहले जैसी सिकुड़ी हुई नहीं लग रही थी। उसने लिफ्ट में खड़े होकर कहा, “कम से कम लोग अब मुझे उस लड़की की तरह नहीं देखेंगे जिसे उसका एक्स कंट्रोल करता था।”

रोहन ने कहा, “अब वे तुम्हें उस लड़की की तरह देखेंगे जिसने पड़ोसी को छुट्टी पर उठा लिया।”

“और यह ज्यादा बेहतर है।”

अगले 6 महीनों में सब कुछ धीरे-धीरे बदला। अनन्या ने अपना फ्रीलांस स्टूडियो शुरू किया। उसके छोटे-से ऑफिस में तुलसी का पौधा, दीवार पर रंगीन पोस्टर और दरवाजे पर उसका नाम था—“अनन्या मेहरा डिजाइन स्टूडियो।” पहली बार उसका नाम किसी और की फाइल में छिपा नहीं था।

मानव ने 2 बार मैसेज किया। उसने जवाब नहीं दिया। तीसरी बार उसने सीधे ब्लॉक कर दिया। उसे अब अपनी शांति बचाने के लिए बहस की जरूरत नहीं थी।

रोहन ने रेडियो स्टेशन में हर अतिरिक्त शिफ्ट लेना बंद किया। रिया ने फोन पर रोते हुए कहा, “मेरा भाई आखिर छुट्टी लेना सीख गया।”

वह और अनन्या अभी भी 4A और 4B में रहते थे। दरवाजे अलग थे, लेकिन चाय अक्सर साथ बनती थी। कभी अनन्या उसके घर में बैठकर डिजाइन पर काम करती, कभी रोहन उसके लिए सुबह की प्लेलिस्ट बनाता। दोनों डेट पर जाते, लेकिन किसी दौड़ में नहीं थे। वे अपने रिश्ते को साबित नहीं कर रहे थे, बस जी रहे थे।

कभी-कभी मिसेज डिसूजा जानबूझकर लिफ्ट रोककर पूछतीं, “तो शादी कब है?”

अनन्या कहती, “जब वह कॉकरोच के अलावा भावनाओं से भी लड़ना सीख जाएगा।”

रोहन कहता, “मैंने केकड़े का सामना किया था।”

“तुम चिल्लाए थे,” अनन्या कहती।

“रणनीतिक चिल्लाहट थी।”

एक साल बाद वे फिर उसी गोवा वाले कॉटेज में लौटे। इस बार रोहन ने बुकिंग बहुत ध्यान से देखी थी। कोई बंक बेड नहीं, कोई नकली 2 बेडरूम नहीं। वही नीले शटर, वही टेढ़ा झूला, वही समुद्र की आवाज़। बस इस बार दोनों वहां दुर्घटना की तरह नहीं, चुनाव की तरह आए थे।

शाम को सूरज नारंगी होकर समुद्र में पिघल रहा था। अनन्या रेत पर आगे चल रही थी। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे, और वह पानी से बचने की कोशिश करते हुए हंस रही थी। रोहन के जेब में एक छोटा मखमली डिब्बा था। वह कई दिनों से उसे छिपा रहा था।

वह जानता था कि इंटरनेट ने कभी मजाक में उनकी सगाई घोषित कर दी थी। मिसेज डिसूजा ने 100 बार पूछ लिया था। रिया ने भी संकेत दिए थे। लेकिन यह अंगूठी किसी वायरल फोटो, किसी दबाव या किसी मजाक की वजह से नहीं थी।

यह उस सुबह की वजह से थी जब एक टूटे हुए सूटकेस वाली लड़की ने “ठीक है” कहा था।

यह उस बरामदे की वजह से थी जहां बारिश में 2 लोग पहली बार सच बोल पाए थे।

यह उस हाथ की वजह से थी जिसने जल्दी नहीं की, लेकिन छोड़ा भी नहीं।

अनन्या अचानक मुड़ी। उसने दूर से आवाज़ लगाई, “आ रहे हो, स्पाइडर-मैन?”

रोहन ने डिब्बे को जेब में ही रहने दिया। वह पहले उसके पास गया, उसका हाथ पकड़ा और कुछ पल बिना बोले समुद्र को सुनता रहा। अंगूठी 1 मिनट और इंतजार कर सकती थी। क्योंकि उस क्षण वह प्रस्ताव रखने से पहले यह याद रखना चाहता था कि उनका रिश्ता मांगने से पहले साथ चलने से शुरू हुआ था।

अनन्या ने उसकी तरफ देखा। “क्या हुआ?”

रोहन मुस्कुराया। “कुछ नहीं। बस सोच रहा हूं, अगर उस दिन तुमने ‘ठीक है’ नहीं कहा होता तो?”

अनन्या ने उसका हाथ और कस लिया। “तो तुम अभी भी कचरे का बैग पकड़े अकेले छुट्टी पर जाते।”

“और तुम?”

“शायद मैं अभी भी किसी और को अपनी कहानी लिखने देती।”

रोहन ने जेब से डिब्बा निकाला। अनन्या की सांस अटक गई। समुद्र की आवाज़ अचानक बहुत साफ सुनाई देने लगी।

वह घुटने पर नहीं बैठा। इस बार वह तस्वीर जैसी गलती नहीं चाहता था। वह बस उसके सामने खड़ा रहा, बराबर, शांत, सच्चा।

“अनन्या,” उसने कहा, “क्या तुम मेरे साथ हमेशा धीरे-धीरे चलोगी?”

अनन्या की आंखों में आंसू आ गए। वह हंसी भी, रोई भी। “कोई स्पीड नहीं?”

“कोई स्पीड नहीं।”

उसने हाथ आगे बढ़ाया। “ठीक है।”

इस बार “ठीक है” कोई भागना नहीं था। कोई मजाक नहीं था। कोई गलती नहीं थी। यह 2 लोगों का चुना हुआ घर था।

समुद्र उनके पास सांस ले रहा था, सूरज डूब रहा था, और भविष्य उनके सामने ऐसे खुल रहा था जैसे कोई दरवाजा, जिसे खोलने की हिम्मत दोनों ने आखिर पा ली थी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.