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दीवाली की रात मां ने बहू को सबके सामने थप्पड़ मारकर कहा, “तू इस घर की कभी नहीं होगी”… पति ने बेटी का हाथ पकड़ा, टूटा दीया उठाया और चुपचाप निकल गया, लेकिन अगले दिन 12 साल के बिल और पिता की वसीयत ने पूरे परिवार की नींव हिला दी 😢🪔📜

भाग 1:
दीवाली की रात सवित्री देवी ने अपनी बहू नंदिनी के गाल पर सबके सामने थप्पड़ मार दिया और ठंडी आवाज़ में कहा—

—मेरे लिए तू हमेशा एक बाहर की औरत ही रहेगी, चाहे मेरे बेटे की पत्नी बनकर इस घर में कितने भी साल क्यों न बिता ले।

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पूरे ड्रॉइंग रूम में जैसे पटाखों की आवाज़ भी अचानक मर गई। बाहर आँगन में दीयों की कतार जल रही थी, रंगोली के बीच चांदी की थाली रखी थी, और घर के गेट पर आम के पत्तों का तोरण लहरा रहा था। बाहर से वह कोठी किसी खुशहाल भारतीय परिवार का सपना लगती थी, मगर अंदर कई सालों से दबे अपमान की बदबू थी।

अर्जुन 39 साल का था। उसने अपनी जिंदगी का आधा हिस्सा यह मानते हुए निकाल दिया था कि अच्छा बेटा वही होता है जो मां की हर बात चुपचाप सह ले। उसने अपनी पत्नी नंदिनी से 12 साल तक बस 1 ही बात कही थी—

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—थोड़ा सब्र कर लो, मां ऐसी ही हैं।

और नंदिनी ने सचमुच सब्र किया था। उसने कभी ऊंची आवाज़ नहीं की, कभी सवित्री देवी के ताने का जवाब ताने से नहीं दिया, कभी अर्जुन को उसके परिवार से अलग करने की कोशिश नहीं की। मगर उस रात सब्र के नाम पर उसकी इज्जत की आखिरी डोरी भी टूट गई।

शाम को जब अर्जुन अपनी पत्नी नंदिनी और 11 साल की बेटी तारा को लेकर पुरानी कोठी पहुंचा था, तारा की गोद में एक बड़ा डिब्बा था। उसने पिछले 15 दिनों से स्कूल से लौटने के बाद अपनी मां के साथ बैठकर हाथ से दीये सजाए थे, कपड़े के छोटे हाथी बनाए थे, लकड़ी की छोटी घंटियां रंगी थीं और हर रिश्तेदार के नाम वाला 1 छोटा-सा शुभ दीपक तैयार किया था।

तारा कार में बैठी-बैठी बार-बार डिब्बे को देख रही थी।

—पापा, दादी को मेरा बनाया दीया पसंद आएगा ना?

अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा—

—बहुत पसंद आएगा, बेटा।

नंदिनी ने खिड़की से बाहर देखा। वह जानती थी कि इस घर में हाथ की मेहनत की कीमत तब तक नहीं थी, जब तक वह किसी महंगे शो-रूम से बिल के साथ न आए।

दरवाज़ा रोहन ने खोला। वह अर्जुन का छोटा भाई था, हमेशा की तरह जल्दी में, हमेशा की तरह जिम्मेदारियों से थोड़ा दूर। उसकी पत्नी नेहा अंदर से चमकदार रेशमी साड़ी में निकली। उसके हाथ में महंगे गिफ्ट बैग थे, जिन पर दिल्ली के बड़े मॉल का नाम छपा था।

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नेहा ने तारा के डिब्बे को देखा और होंठ तिरछे कर लिए।

—अरे वाह, इस बार भी घर की बनाई चीजें? बहुत प्यारा है। जब बजट कम हो तो भावनाएं ही गिफ्ट बन जाती हैं।

तारा को बात का पूरा मतलब समझ नहीं आया, पर नंदिनी के चेहरे की हल्की सिकुड़न उसने देख ली।

—चाची, मैंने सबके नाम से दीये बनाए हैं। आपका भी।

तारा ने बड़े प्यार से 1 नीला दीया नेहा की तरफ बढ़ाया। नेहा ने उसे ऐसे पकड़ा जैसे वह कोई सस्ती चीज हो।

—हां, अच्छा है। नौकरों के बच्चों को ऐसे काम बहुत आते हैं।

नंदिनी की आंखों में चोट उतर आई, मगर उसने बस तारा के कंधे पर हाथ रखा।

—तारा ने बहुत मेहनत की है, नेहा। बात ऐसे मत करो।

नेहा हंस पड़ी।

—ओहो, अब तो भाभी को भी बुरा लगने लगा। वैसे भी तुम्हें इस घर में बात करने की बहुत आदत हो गई है।

सवित्री देवी उस समय सोफे पर बैठी थीं। सफेद बनारसी साड़ी, सोने के कंगन, माथे पर बड़ी बिंदी और आवाज़ में वही पुराना अधिकार। उन्होंने सब सुना, मगर चुप रहीं। उनकी चुप्पी हमेशा नेहा को और खुली छूट देती थी।

पूजा शुरू हुई। नंदिनी ने थाली सजाई, तारा ने दीये जलाए, अर्जुन ने चुपचाप मां के पैर छुए। हर रस्म बाहर से सुंदर थी, अंदर से खाली।

खाने की मेज पर असली आग भड़की।

नेहा ने अपनी प्लेट में पनीर रखते हुए कहा—

—वैसे भाभी, आपकी कॉलोनी में भी अब लोग दीवाली पर इतने बड़े-बड़े फंक्शन करते हैं क्या? या अभी भी छत पर मोमबत्ती लगाकर काम चल जाता है?

टेबल पर बैठे रिश्तेदार धीमे-धीमे मुस्कुरा दिए। किसी ने रोकना जरूरी नहीं समझा।

नंदिनी ने गहरी सांस ली।

—नेहा, मेरी परवरिश पर मज़ाक मत करो। मैं यहां किसी से कम नहीं हूं।

बस यही वाक्य था। न नंदिनी ने गाली दी, न आवाज़ उठाई। मगर सवित्री देवी की कुर्सी तेज आवाज़ के साथ पीछे खिसकी।

—तू मेरी बहू होकर मेरी ही बहू को चुप कराएगी?

नंदिनी खड़ी भी नहीं हो पाई थी कि सवित्री देवी उसके पास पहुंचीं। अगले ही पल थप्पड़ की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज गई।

तारा के हाथ से चम्मच गिर गया।

नंदिनी का चेहरा एक तरफ मुड़ गया। उसके गाल पर लाल निशान उभर आया, मगर उससे ज्यादा दर्द उसकी आंखों में था। वह रोना नहीं चाहती थी, क्योंकि उसकी बेटी देख रही थी।

सवित्री देवी ने उंगली दरवाज़े की तरफ उठाई।

—अगर तेरी पत्नी को अपनी औकात नहीं समझ आती, अर्जुन, तो इसे इसकी बेटी समेत अभी इस घर से बाहर ले जा। मेरी दीवाली ऐसे लोगों से खराब नहीं होगी।

अर्जुन जड़ हो गया। यही वह पल था जिसमें उसका पूरा बचपन, उसकी सारी आदतें, मां के सामने झुकने की उसकी पुरानी मजबूरी उसके सामने खड़ी थीं। उसने देखा, मां को उम्मीद थी कि वह फिर वही करेगा, पहले पत्नी को चुप कराएगा, फिर मां से माफी मांगेगा, फिर सब सामान्य होने का नाटक करेगा।

मगर उसी पल तारा ने धीरे से उसकी कुहनी पकड़ी।

—पापा… दादी ने मम्मी को इसलिए मारा क्योंकि मम्मी गरीब घर से हैं?

यह सवाल अर्जुन के सीने में किसी जलते दीये की तरह उतर गया।

वह अपनी बेटी के सामने घुटनों पर बैठा। तारा की आंखों में डर नहीं, टूटन थी।

—नहीं, बेटा। दादी ने मम्मी को इसलिए मारा क्योंकि वह सम्मान का मतलब भूल गई हैं।

कमरे में सन्नाटा फैल गया। रोहन ने पहली बार अर्जुन को उस तरह बोलते सुना था। नेहा का चेहरा उतर गया। सवित्री देवी की गर्दन तन गई।

—अर्जुन, तू मुझसे ऐसे बात करेगा?

अर्जुन धीरे से खड़ा हुआ। उसने नंदिनी की शॉल उठाई, तारा का डिब्बा बंद किया और फर्श पर पड़ा वह टूटा हुआ दीया उठाया, जिसे किसी के पैर से कुचलकर 3 टुकड़े हो चुके थे। वह तारा का बनाया दीया था, जिस पर उसने छोटे अक्षरों में “दादी” लिखा था।

अर्जुन ने वह टूटे टुकड़े डिब्बे में रख दिए।

—चलो।

नंदिनी ने हैरानी से उसे देखा।

—अर्जुन…

—अब नहीं। आज नहीं। कभी नहीं।

सवित्री देवी चिल्लाईं—

—अगर आज गया तो याद रखना, इस घर का दरवाज़ा तेरे लिए बंद हो जाएगा।

अर्जुन ने पलटकर देखा भी नहीं।

—दरवाज़ा बंद करने से पहले यह याद रखिएगा, मां, पिछले 12 साल से इस घर की चाबी, बिल, टैक्स, बैंक के कागज, किरायेदारों के झगड़े, पानी की मोटर, इन्वर्टर, आपकी दवाइयां और कोर्ट के नोटिस कौन संभालता रहा है।

सवित्री देवी कुछ पल के लिए चुप हो गईं। उन्हें लगा वह धमकी दे रहा है। मगर अर्जुन धमकी नहीं दे रहा था। वह पहली बार सच बोल रहा था।

वे 3 लोग घर से निकल गए। बाहर गली में पटाखे फूट रहे थे, बच्चे हंस रहे थे, लोग मिठाई बांट रहे थे। मगर कार के अंदर सन्नाटा था। नंदिनी खिड़की की तरफ मुंह करके बैठी रही। तारा अपने डिब्बे को पकड़कर रोए बिना रोती रही।

काफी देर बाद नंदिनी ने धीमी आवाज़ में कहा—

—मुझे माफ कर दो। मेरी वजह से तुम्हारा घर टूट गया।

अर्जुन ने कार रोक दी। उसने पहली बार अपनी पत्नी की तरफ पूरी तरह देखा।

—घर आज नहीं टूटा, नंदिनी। घर तो तब-तब टूटता रहा जब मैंने तुम्हें चुप रहने को कहा।

उस रात तारा सोते-सोते भी अपनी मां का हाथ पकड़े रही। नंदिनी उसके पास बैठी रही। अर्जुन स्टोर रूम में गया, जहां पुरानी फाइलों, औजारों और अपने पिता हरिशंकर जी की कुछ चीजों को उसने संभालकर रखा था।

हरिशंकर जी को गुज़रे 7 साल हो चुके थे। वह शांत आदमी थे, मगर उनकी आंखें सब देखती थीं। उन्होंने मरने से कुछ महीने पहले अर्जुन को 1 पीला लिफाफा दिया था और कहा था—

—जब तुझे लगे कि इस परिवार में प्यार और गुलामी का फर्क मिट गया है, तब इसे खोलना।

अर्जुन ने वह लिफाफा कभी नहीं खोला था।

उस रात उसने कांपते हाथों से उसे निकाला। अंदर पिता की लिखावट में 1 पंक्ति लाल पेन से रेखांकित थी।

“एक दिन तुझे मां को खुश रखने और अपनी सच्ची परिवार को बचाने में से 1 चुनना पड़ेगा।”

किचन में रखा उसका फोन लगातार बज रहा था। स्क्रीन पर नाम चमक रहे थे: मां, रोहन, नेहा, फिर मां।

अर्जुन ने फोन उल्टा रख दिया।

पहली बार उसने जवाब नहीं दिया।

और उसे यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि अगले ही दिन उसका यह मौन सवित्री देवी की कोठी, बैंक के कागजों और उसके पिता की वसीयत के नीचे दबी 1 ऐसी सच्चाई खोल देगा, जिससे पूरा परिवार हिल जाएगा।

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भाग 2:

अगली सुबह अर्जुन के फोन में 27 मिस्ड कॉल थे, मगर उसने 1 भी कॉल वापस नहीं की। सवित्री देवी के घर में पानी की मोटर बंद पड़ी थी, इन्वर्टर रात से बीप कर रहा था, किरायेदार का चेक अटका हुआ था और नगर निगम का प्रॉपर्टी टैक्स आखिरी तारीख पर पहुंच चुका था। ये सब वही काम थे जिन्हें अर्जुन 12 साल से बिना शोर किए संभालता आया था। वह उस दिन ऑफिस नहीं गया; वह तारा को पास की मिठाई की दुकान पर जलेबी खिलाने ले गया, फिर नंदिनी के साथ बैठकर उसकी सूजी हुई गाल पर हल्दी वाला लेप लगाया। 3 दिन बाद रोहन उसके घर आया। उसके चेहरे पर गुस्सा भी था और घबराहट भी। उसने कहा कि मां परेशान हैं, बैंक वाले नोटिस भेज रहे हैं, दुकान का किराया जमा नहीं हुआ, और पुरानी कोठी की छत की मरम्मत का बिल समझ नहीं आ रहा। अर्जुन ने बस स्टोर से 1 नीली पेटी निकाली और मेज पर रख दी। पेटी में साल-दर-साल रखी फाइलें थीं: टैक्स, बीमा, मेडिकल बिल, बिजली के बकाये, किरायेदारों के एग्रीमेंट, बैंक के नोटिस, मरम्मत की रसीदें और वे खर्चे जो परिवार ने कभी देखे ही नहीं थे। रोहन जब 1-1 कागज पलटता गया, उसका चेहरा सफेद पड़ता गया। उसे पहली बार पता चला कि अर्जुन ने मां की शान बचाने के लिए अपने खाते से 12 साल में 38 लाख से ज्यादा लगाए थे। नंदिनी रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसके गाल का निशान हल्का हो चुका था, लेकिन अपमान अभी भी ताजा था। उसी समय नेहा बिना पूछे अंदर आई और बोली कि अर्जुन अब पैसे गिनाकर मां पर एहसान जताना चाहता है। अर्जुन ने पहली बार उसे सीधे देखा और शांत स्वर में कहा कि मदद और नौकर बन जाना 2 अलग बातें हैं। तभी फोन बजा। कॉल पिता के पुराने वकील मेहरा साहब का था। उन्होंने अर्जुन से कहा कि सवित्री देवी आज उनके दफ्तर गई थीं और उन पर ट्रस्ट का गलत फायदा उठाने का आरोप लगा रही थीं। मेहरा साहब ने धीरे से जोड़ा कि हरिशंकर जी ने वसीयत में 1 शर्त ऐसी रखी थी, जिसे अब सबके सामने पढ़ना जरूरी हो गया है। अर्जुन ने अलमारी से वही पीला लिफाफा निकाला। रोहन और नेहा उसे देखते रह गए। अब खेल पैसों का नहीं, सच का था।

भाग 3:

मेहरा साहब का दफ्तर लखनऊ के हजरतगंज में 1 पुराने बंगले की दूसरी मंजिल पर था। लकड़ी की सीढ़ियां चढ़ते समय अर्जुन को अपने पिता की चाल याद आ रही थी। हरिशंकर जी हमेशा कहते थे कि कागज सिर्फ संपत्ति नहीं बचाते, कभी-कभी रिश्तों की असलियत भी बचाते हैं।

जब अर्जुन अंदर पहुंचा, सवित्री देवी पहले से बैठी थीं। उनकी साड़ी हमेशा की तरह महंगी थी, मगर चेहरा थका हुआ था। माथे की बिंदी टेढ़ी लगी थी, बालों में वह कड़क सलीका नहीं था, और हाथों की उंगलियां बार-बार पल्लू मरोड़ रही थीं। नेहा उनके पास बैठी थी, पर आज उसकी हंसी गायब थी। रोहन सामने कुर्सी पर झुका बैठा था, जैसे रात भर सोया न हो।

मेहरा साहब ने दरवाज़ा बंद किया और मेज पर मोटी फाइल रखी।

—आज यहां कोई बहस जीतने नहीं आया है। आज सिर्फ वह पढ़ा जाएगा जिसे हरिशंकर जी ने 7 साल पहले लिखवाया था।

सवित्री देवी ने तेज स्वर में कहा—

—मुझे सिर्फ इतना जानना है कि मेरे ही बेटे ने मुझे अचानक बेसहारा क्यों छोड़ दिया।

अर्जुन के अंदर कुछ कांपा, मगर उसने चुप्पी रखी।

मेहरा साहब ने चश्मा ठीक किया।

—बेसहारा शब्द इस्तेमाल करने से पहले कुछ तथ्य देख लेने चाहिए, सवित्री जी।

उन्होंने फाइल खोली। कागज 1-1 करके मेज पर आने लगे। नगर निगम के टैक्स की रसीदें। कोठी की छत की मरम्मत। किरायेदार से मुकदमे का खर्च। आपकी दवाइयों की रसीदें। दिल की जांच का भुगतान। पुरानी दुकान का बैंक लोन। पानी की मोटर। इन्वर्टर की बैटरी। त्योहारों पर घर की सजावट तक का खर्च।

हर कागज पर भुगतानकर्ता अर्जुन का नाम था।

सवित्री देवी ने पहली रसीद उठाई।

—यह तो ट्रस्ट से गया था।

मेहरा साहब ने शांत आवाज़ में कहा—

—नहीं। यह अर्जुन के निजी खाते से गया था।

उन्होंने दूसरी रसीद दिखाई।

—और यह?

—यह भी।

तीसरी।

—यह भी अर्जुन ने भरा।

रोहन ने दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया।

नेहा कुर्सी पर असहज होकर बैठी रही।

—लेकिन बेटा अपनी मां के लिए करता ही है —नेहा ने धीमे मगर ताने भरे स्वर में कहा।

मेहरा साहब ने उसे देखा।

—बेटा मां के लिए कर सकता है, मगर कोई मां अपने बेटे के विवाह, उसकी बेटी की बचपन और उसकी पत्नी की इज्जत को कुचलकर उससे सेवा की उम्मीद नहीं रख सकती।

कमरे में गहरा सन्नाटा उतर गया।

सवित्री देवी ने पहली बार अर्जुन की ओर देखा। उनकी आंखों में गुस्से से ज्यादा उलझन थी।

—तूने मुझे बताया क्यों नहीं?

अर्जुन की आवाज़ भारी थी।

—क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि आपको लगे आप बोझ हैं।

सवित्री देवी का चेहरा झुक गया।

—और मैंने तेरी पत्नी को बोझ बना दिया।

यह पहली बार था जब उन्होंने नंदिनी के लिए “तेरी पत्नी” कहते हुए तिरस्कार नहीं मिलाया।

मेहरा साहब ने अब वसीयत का पन्ना निकाला।

—हरिशंकर जी ने मुख्य कोठी आपके रहने के लिए छोड़ी थी, सवित्री जी। मगर अधिकार आजीवन निवास का था, असीमित खर्च का नहीं। उन्होंने ट्रस्ट का प्रशासक अर्जुन को बनाया, क्योंकि उन्हें भरोसा था कि वह न्याय करेगा। पर उन्होंने 1 विशेष शर्त भी रखी थी।

सवित्री देवी तड़पकर बोलीं—

—कौन सी शर्त?

मेहरा साहब ने पन्ना पढ़ना शुरू किया।

—यदि परिवार में किसी भी बहू, बच्चे या आश्रित सदस्य के साथ बार-बार अपमानजनक व्यवहार हो और प्रशासक को लगे कि संपत्ति का उपयोग सम्मान के बजाय नियंत्रण के लिए किया जा रहा है, तो प्रशासक को अधिकार होगा कि वह मुख्य कोठी के अतिरिक्त खर्च रोक दे, गैर-लाभकारी संपत्ति बेचने की प्रक्रिया शुरू करे और ट्रस्ट की आय को पहले बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा और वैधानिक देनदारियों में लगाए।

नेहा ने फुसफुसाकर कहा—

—इसका मतलब?

मेहरा साहब ने कहा—

—इसका मतलब यह है कि अर्जुन ने अगर चाहा होता, तो वह 4 साल पहले ही वह दुकान बेचने की सिफारिश कर सकता था, जो कर्ज में डूबी है। उसने ऐसा नहीं किया। उसने अपनी मां की इज्जत बचाने के लिए खुद पैसे लगाए।

सवित्री देवी की आंखों से रंग उतर गया।

अर्जुन चुप था। उसे कोई विजय महसूस नहीं हो रही थी। सच कई बार तलवार नहीं, आईना होता है। वह सामने वाले को काटता नहीं, उसे खुद से मिला देता है।

मेहरा साहब ने पीला लिफाफा उठाया।

—यह हरिशंकर जी का निजी पत्र है। उन्होंने कहा था, इसे तभी पढ़ा जाए जब परिवार प्रेम और अधिकार में फर्क भूल जाए।

उन्होंने पत्र खोला और पढ़ा।

“सवित्री, अगर यह पत्र तुम्हारे सामने पढ़ा जा रहा है, तो समझ लेना अर्जुन टूटने की जगह खड़ा होना सीख गया है। मुझे अपने बेटे की सबसे बड़ी कमजोरी पता थी। वह चुपचाप सब संभाल लेता है और सोचता है यही प्रेम है। मैं भी कई बार यही गलती करता रहा। पर मैं नहीं चाहता कि मेरा बेटा अपनी पत्नी की आंखों की रोशनी और अपनी बेटी के बचपन की हंसी देकर हमारा अहंकार बचाए।

घर ईंट से नहीं चलता, उस औरत की गरिमा से चलता है जो उसमें रोज अपना मन लगाती है। अगर तुमने अर्जुन की पत्नी को नीचा दिखाया, तो तुमने अर्जुन को नहीं, मुझे भी अपमानित किया। क्योंकि मैंने उसे यही सिखाया था कि पत्नी घर लाने वाली चीज नहीं, बराबरी से साथ चलने वाली इंसान होती है।

अगर कभी तुझे लगे कि बहू गरीब घर से आई है, तो अपना बचपन याद करना। वह कच्चा कमरा, वह उधार की साड़ी, वह दिन जब तुमने रोते हुए कहा था कि लोग गरीबी से ज्यादा गरीब की आत्मा को कुचलते हैं। सावधान रहना, कहीं तुम वही लोग न बन जाना जिनसे कभी नफरत करती थीं।

अर्जुन, अगर तू यह सुन रहा है, तो देर हो गई है, मगर सब खत्म नहीं हुआ। अपनी मां से प्यार कर, मगर अपनी पत्नी और बेटी की कीमत पर नहीं। जिस दिन चुनाव करना पड़े, उस दिन डरना मत। सच्चे बेटे वही होते हैं जो अन्याय को मां का अधिकार नहीं मानते।”

मेहरा साहब की आवाज़ अंतिम पंक्ति पर धीमी हो गई।

सवित्री देवी ने दोनों हाथ मुंह पर रख लिए। उनके चेहरे पर पहली बार वह घमंड नहीं था जिसने सालों से नंदिनी को छोटा किया था। वहां शर्म थी, पछतावा था, और शायद अपने पुराने जीवन की वह राख थी जिसे उन्होंने सोने की चूड़ियों से ढक दिया था।

रोहन की आंखें भर आईं।

—भैया, मुझे माफ कर दो। मैं पास था, पर कभी देखा ही नहीं कि तुम कितना उठा रहे थे।

अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

—तुम अभी देख रहे हो। शुरुआत यहीं से हो सकती है।

नेहा उठी, कुछ कहना चाहती थी, पर शब्द नहीं मिले। उसके लिए शायद यह सबसे कठिन पल था, क्योंकि वह तानों से जीती थी, सच से नहीं।

मीटिंग बिना चीख-पुकार खत्म हुई। यह बात अर्जुन को सबसे अजीब लगी। वह सोचकर आया था कि मां रोएंगी, आरोप लगाएंगी, शाप देंगी। मगर कभी-कभी सच इतना भारी होता है कि नाटक उसके नीचे दब जाता है।

दफ्तर से बाहर निकलते समय सवित्री देवी ने धीरे से कहा—

—अर्जुन…

वह रुका।

—नंदिनी कैसी है?

यह सवाल छोटा था, मगर उसके स्वर में पहली बार अधिकार नहीं, चिंता थी।

—आपने उसे जिस तरह चोट दी, उसके बाद जैसी कोई भी होती।

सवित्री देवी की आंखें झुक गईं।

—और तारा?

अर्जुन ने जेब में हाथ डाला। उसे तारा का टूटा नीला दीया याद आया।

—वह समझने की कोशिश कर रही है कि बड़े लोग प्यार के नाम पर किसी को छोटा क्यों करते हैं।

सवित्री देवी ने कुछ नहीं कहा।

अगले 2 महीने अर्जुन ने अपने पुराने जीवन को धीरे-धीरे हाथ से छोड़ा। अब वह मां के घर हर छोटी चीज ठीक करने नहीं भागता था। रोहन ने बैंक के कागज संभालना सीखा, किरायेदारों से बात की, दुकान बेचने की प्रक्रिया शुरू की। कई बार वह गलती करता, फिर अर्जुन से पूछता। अर्जुन बताता, मगर खुद जाकर सब नहीं करता।

नंदिनी भी बदल रही थी। यह बदलाव कठोरता का नहीं था, लौटती हुई सांसों का था। वह फिर से हंसने लगी। उसने अपनी पुरानी सिलाई मशीन निकाली। मोहल्ले की महिलाओं को ब्लॉक प्रिंटिंग सिखानी शुरू की। तारा स्कूल से लौटकर उसके साथ बैठती और नए दीये बनाती। घर में अब कम पैसे थे, मगर कम डर भी था।

1 शाम तारा स्कूल से दौड़ती हुई आई। उसके हाथ में प्रमाणपत्र था।

—मम्मी, पापा! मेरा दीवाली आर्ट वाला दीया स्कूल की प्रदर्शनी में पहला आया!

नंदिनी ने उसे गले लगा लिया। अर्जुन ने प्रमाणपत्र पढ़ा। तारा की आंखों में चमक थी, वही चमक जिसे उस रात सवित्री देवी के थप्पड़ ने बुझाने की कोशिश की थी।

—टीचर ने कहा कि इसमें सबसे ज्यादा प्यार दिखता है —तारा बोली।

नंदिनी मुस्कुराई, मगर उसकी आंखें भर गईं।

उसी रात तारा ने पूछा—

—पापा, अगर दादी इसे देखतीं तो क्या उन्हें अच्छा लगता?

अर्जुन ने जवाब देने से पहले नंदिनी को देखा।

नंदिनी ने कहा—

—शायद अब उन्हें समझ आए कि चीज महंगी होने से सुंदर नहीं होती।

तारा ने धीमे से पूछा—

—क्या लोग भी ऐसे ही होते हैं?

नंदिनी ने उसके बाल सहलाए।

—हां। किसी का घर, पैसा, कपड़े या अंग्रेजी बोलना उसकी कीमत तय नहीं करते। मगर जो किसी को दुख देता है, उसे माफी मांगनी पड़ती है।

अर्जुन ने महसूस किया कि उसकी बेटी उस उम्र में जीवन की वह सीख सीख रही है, जो उसे 39 साल में मिली थी।

अप्रैल की शुरुआत में 1 पत्र आया। लिफाफे पर सवित्री देवी की लिखावट थी। अर्जुन ने पहले नंदिनी को दिया। नंदिनी ने कुछ देर उसे देखा, फिर खोला।

पत्र में लिखा था—

“मुझे तुम्हारे घर में आने का अधिकार नहीं है। अगर कभी नंदिनी और तारा मुझे 10 मिनट सुनना चाहें, तो मैं बिना सफाई दिए माफी मांगना चाहती हूं। मैंने कुछ लौटाने की कोशिश की है, जो मैंने उसी रात तोड़ा था।”

नंदिनी ने पत्र बंद कर दिया।

—मैं अभी तैयार नहीं हूं।

अर्जुन ने तुरंत कहा—

—तो नहीं मिलते।

नंदिनी ने उसकी तरफ देखा। इस बार उसकी आंखों में वह पुराना डर नहीं था कि अर्जुन मां का पक्ष लेगा।

—मुझे सोचने दो। तारा को भी पूछेंगे।

जब तारा को बताया गया, वह काफी देर चुप रही।

—दादी ने मम्मी से माफी मांगी?

—अभी नहीं —अर्जुन ने कहा—वह मांगना चाहती हैं।

—तो अगर वह मम्मी को फिर रुलाएंगी तो?

नंदिनी ने तारा का हाथ थामा।

—तो वह फिर हमारे घर नहीं आएंगी।

तारा ने सिर हिलाया।

—ठीक है। वह यहां आएं। उनकी कोठी में नहीं।

यह फैसला छोटा नहीं था। नंदिनी ने उस जगह मिलने से इनकार किया था जहां उसे थप्पड़ पड़ा था। इस बार जमीन उसकी थी, दरवाज़ा उसका था, शर्तें उसकी थीं।

शनिवार को सवित्री देवी अकेली आईं। न रोहन, न नेहा, न कोई नौकर। उन्होंने साधारण सूती साड़ी पहनी थी। हाथ में भूरे कागज में लिपटा 1 छोटा डिब्बा था। दरवाज़े पर उन्होंने पहली बार बेल बजाकर इंतजार किया, जैसे किसी के घर आई मेहमान हों, मालकिन नहीं।

अर्जुन ने दरवाज़ा खोला। उन्होंने अंदर कदम रखते ही नंदिनी की तरफ देखा।

—धन्यवाद, मुझे सुनने देने के लिए।

नंदिनी ने बस सिर हिलाया। तारा उसके पास बैठी थी, दोनों हाथ छाती पर बांधे हुए।

सवित्री देवी खड़ी रहीं। उन्होंने बैठने की कोशिश नहीं की।

—नंदिनी, मैंने तुम्हें सिर्फ उस रात नहीं, कई सालों तक अपमानित किया। तुम्हारे कपड़ों पर, तुम्हारे मायके पर, तुम्हारी बोली पर, तुम्हारे हाथ के खाने पर, तुम्हारे गिफ्ट पर। मैं नेहा को रोक सकती थी, पर मैंने उसे बढ़ावा दिया। क्योंकि सच यह है कि मैं भी तुम्हें अपने बराबर मानना नहीं चाहती थी।

नंदिनी की आंखें स्थिर थीं।

सवित्री देवी की आवाज़ कांपी।

—मैं गरीब घर में पैदा हुई थी। मेरे पिता रिक्शा चलाते थे। मेरी मां दूसरों के घरों में खाना बनाती थीं। जब मैं हरिशंकर के घर आई, तो मुझे बहुत बार एहसास कराया गया कि मैं कम हूं। मैंने कसम खाई थी कि एक दिन कोई मुझे कम नहीं समझेगा। मगर मैं भूल गई कि सम्मान पाने के लिए किसी और को कम करना जरूरी नहीं होता।

तारा चुपचाप सुन रही थी।

सवित्री देवी ने उसकी तरफ मुड़कर कहा—

—और तारा, मैंने तुम्हें यह महसूस कराया कि तुम्हारी मां पैसे की वजह से कम है। मैंने तुम्हारे हाथ का बनाया गिफ्ट तोड़ा। वह सिर्फ दीया नहीं था, तुम्हारा प्यार था। मैंने उसे पैरों तले कुचल दिया। मुझे माफ कर देना आसान नहीं होगा, और मैं आसान माफी मांगने नहीं आई।

उन्होंने भूरे कागज का डिब्बा खोला।

अंदर वही नीला दीया था। 3 टुकड़ों को सावधानी से जोड़ा गया था। दरारें साफ दिख रही थीं, मगर उन दरारों पर सुनहरी पेंट की बारीक रेखाएं खींची गई थीं। पीछे छोटे अक्षरों में लिखा था: “मुझे देर से समझ आया।”

तारा धीरे-धीरे उठी।

—आपने इसे फेंका नहीं?

सवित्री देवी की आंखों से आंसू निकल पड़े।

—नहीं। तुम लोगों के जाने के बाद मैंने टुकड़े उठाए। पहले मुझे लगा बस इसे जोड़ दूंगी। फिर समझ आया कि चीजें जोड़ने से पहले इंसान को खुद टूटना पड़ता है।

नंदिनी ने पहली बार बोलना शुरू किया।

—1 दीया जोड़ने से 12 साल वापस नहीं आएंगे।

—मुझे पता है।

—अगर आपने मेरे सामने, मेरी बेटी के सामने, फिर कभी मुझे छोटा किया, तो यह आखिरी मुलाकात होगी।

—मैं समझती हूं।

—और नेहा अगर फिर वही करेगी, तो उसे भी मेरे घर में जगह नहीं मिलेगी।

—मैं उससे बात कर चुकी हूं। लेकिन तुम्हें उसे माफ करने की कोई जल्दी नहीं है।

तारा ने दीया हाथ में लिया। उसने दरारों पर उंगली फिराई।

—यह पहले जैसा नहीं हुआ।

सवित्री देवी ने सिर झुका दिया।

—नहीं हुआ।

—हम भी पहले जैसे नहीं होंगे।

—हां।

तारा ने थोड़ी देर बाद कहा—

—मेरी स्कूल प्रदर्शनी है अगले शुक्रवार। आप आ सकती हैं। लेकिन अगर मम्मी रोईं, तो आप जाएंगी।

सवित्री देवी रोते-रोते हल्का-सा मुस्कुराईं।

—यह शर्त मुझे मंजूर है।

अर्जुन दरवाज़े के पास खड़ा था। उसने पहली बार खुद को बीच में लाने की जरूरत महसूस नहीं की। यह नंदिनी और तारा का क्षण था। वह अब निर्णय थोपकर उन्हें बचाना नहीं चाहता था। वह उनके लिए सुरक्षित जगह बनाना सीख रहा था।

प्रदर्शनी वाले दिन सवित्री देवी सचमुच आईं। उन्होंने तारा के लिए गेंदे के फूल लाए और नंदिनी के लिए 1 छोटी-सी सूती दुपट्टा। कोई भारी गहना नहीं, कोई दिखावा नहीं। उन्होंने तारा का विजेता दीया शीशे के पीछे देखा और बहुत देर तक देखती रहीं।

—यह सचमुच सुंदर है —उन्होंने धीमे से कहा—मैंने उस रात सुंदरता को पहचाना ही नहीं।

तारा ने हल्की मुस्कान दी। पूरी माफी अभी दूर थी, मगर शुरुआत हो चुकी थी।

नेहा को बदलने में ज्यादा समय लगा। उसने पहले कई हफ्ते तक कोई माफी नहीं मांगी। फिर 1 दिन उसने नंदिनी को फोन किया, मगर नंदिनी ने साफ कह दिया कि माफी फोन पर नहीं, व्यवहार में दिखेगी। नेहा को यह बात पसंद नहीं आई, मगर अब अर्जुन उसके बचाव में नहीं आया। रोहन ने पहली बार अपनी पत्नी से कहा कि हर बात पैसे और स्टेटस से बड़ी नहीं होती। घर में पुराने नियम बदल रहे थे, और हर बदलाव किसी न किसी के अहंकार को चुभता था।

सवित्री देवी ने कर्ज में डूबी दुकान बेच दी। कोठी का खर्च कम किया। 2 नौकरों की जगह 1 रखा। कई रिश्तेदारों ने कहा कि अर्जुन ने मां की शान छीन ली। सवित्री देवी ने 1 दिन खुद जवाब दिया—

—शान तब नहीं गई जब खर्च कम हुआ। शान उस दिन गई थी जब मैंने अपनी बहू को मारा था।

यह सुनकर अर्जुन को पहली बार लगा कि पिता का पत्र व्यर्थ नहीं गया।

दीवाली फिर आई। इस बार कोई बड़ा पारिवारिक जलसा नहीं था। अर्जुन के घर छोटी-सी पूजा रखी गई। नंदिनी ने रवा लड्डू बनाए, तारा ने नए दीये सजाए, रोहन अपने बेटे के साथ आया। नेहा भी आई, मगर इस बार उसने महंगे गिफ्ट बैग नहीं लाए। वह चुपचाप 1 थाली में फल लेकर आई और नंदिनी के पास रुककर बोली—

—मुझे तुम्हारे हाथ से सीखना है कि ये दीये कैसे बनते हैं, अगर तुम सिखाना चाहो तो।

नंदिनी ने उसे तुरंत गले नहीं लगाया। उसने बस कहा—

—पहले बैठो। रंग फैलते हैं, साड़ी संभाल लेना।

यह कोई फिल्मी मिलन नहीं था। मगर शायद असली रिश्ते ऐसे ही लौटते हैं, धीरे-धीरे, शर्तों के साथ, यादों की चोटों के बीच।

पूजा के बाद तारा ने पुराने नीले दीये को शेल्फ से उतारा। उसने उसे सबसे बीच में रखा। उसकी दरारों पर सुनहरी रेखाएं दीपक की लौ में चमक रही थीं।

सवित्री देवी ने उसे देखा और धीरे से पूछा—

—क्या इसे यहां रखना ठीक है?

तारा ने कहा—

—हां। ताकि सबको याद रहे कि तोड़ना आसान है, जोड़ना मुश्किल।

सवित्री देवी की आंखें भर आईं।

रात को सबके जाने के बाद अर्जुन आंगन में खड़ा था। दीयों की लौ धीमी हो रही थी। नंदिनी उसके पास आई और उसका हाथ पकड़ लिया।

—तुम्हारे पिता सही थे —उसने कहा।

अर्जुन ने खिड़की से तारा को देखा, जो अपना स्कूल बैग ठीक कर रही थी।

—मैंने बहुत देर कर दी।

नंदिनी ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।

—लेकिन तुम लौट आए। कई लोग कभी नहीं लौटते।

अर्जुन की आंखें भर आईं। इतने साल वह सोचता रहा था कि परिवार बचाने का मतलब है चुप रहना, मां को नाराज़ न करना, रिश्तेदारों के सामने झगड़ा न करना। उस रात उसे समझ आया था कि कई घरों में शांति सिर्फ इसलिए दिखती है क्योंकि कोई अच्छी औरत चुपचाप अपना अपमान निगल रही होती है।

अब उसके घर में आवाज़ें थीं, सीमाएं थीं, सवाल थे, और कभी-कभी असहज सन्नाटा भी था। मगर वह सन्नाटा डर का नहीं था। वह सच के बाद आने वाली सांस जैसा था।

तारा ने अंदर से पुकारा—

—पापा, यह नीला दीया हर साल जलाएंगे ना?

अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा—

—हां, हर साल।

नंदिनी ने धीमे से जोड़ा—

—मगर इस बार कोई इसे पैरों तले नहीं कुचलेगा।

दीये की लौ छोटी थी, मगर स्थिर थी। जैसे 1 परिवार टूटकर फिर से बना हो, पहले जैसा नहीं, मगर शायद पहले से ज्यादा सच्चा।

क्योंकि प्रेम का मतलब यह नहीं कि कोई कितना अपमान सह सकता है। प्रेम का मतलब है उस हाथ को पकड़ लेना, जिसे दुनिया अकेला छोड़ रही हो। और कभी-कभी, एक अच्छा बेटा बनने के लिए सबसे पहले अच्छा पति और अच्छा पिता बनना पड़ता है।

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