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तलाकशुदा पड़ोसन को शादी में अकेला देखकर सब हँस रहे थे, तभी 1 शिक्षक ने उसका हाथ थाम लिया; लेकिन जब उसके पिता ने कहा, “घर चाहिए या यह आदमी?”, उसी नाच ने पूरे परिवार का सच खोल दिया

भाग 1

दूल्हे की माँ ने भरे हुए संगीत समारोह में खाली पड़ी 2 कुर्सियों की तरफ उंगली उठाकर कहा, “अगर अकेले आए हो तो कम से कम माहौल खराब मत करो, किसी को लेकर नाचो,” और उसी पल आरव मल्होत्रा ने 4 महीने से बस दूर से नमस्ते करने वाली अपनी पड़ोसन मीरा सेन का हाथ थाम लिया।

गुरुग्राम के उस महंगे बैंक्वेट हॉल में रोशनी सोने जैसी चमक रही थी, ढोल की आवाज़ दीवारों से टकरा रही थी और मेहमान अपने कपड़ों से ज़्यादा अपने रिश्तों का प्रदर्शन कर रहे थे। आरव 34 साल का इतिहास शिक्षक था, दक्षिण दिल्ली के एक पुराने स्कूल में पढ़ाता था और साकेत की एक शांत गली में अपनी माँ के साथ रहता था। मीरा उसी गली में 3 मकान छोड़कर रहती थी। वह 32 साल की आर्किटेक्ट थी, साफ बोलने वाली, कम मुस्कुराने वाली और ऐसी औरत जिसे इमारतों की दरारें भी कहानी लगती थीं।

दोनों को शादी में बुलाया गया था, लेकिन किसी खास जगह पर नहीं। टेबल 11, यानी वे लोग जिन्हें बुलाना ज़रूरी था, पर सामने बैठाना नहीं। आरव दूल्हे को स्कूल के पुराने सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जानता था। मीरा ने दुल्हन के परिवार के लिए 1 बार घर का नक्शा बनाया था। वे दोनों उसी मेज पर बैठे थे जहाँ 2 बुजुर्ग चाची, 1 नाराज़ मामा और 3 ऐसे मेहमान थे जिन्हें कोई ठीक से पहचान नहीं रहा था।

शुरू में बात बस शिष्टाचार की थी। मीरा ने छत की लकड़ी की नक्काशी देखकर कहा था, “यह पुरानी हवेली बचाई गई है, बस सजाई नहीं गई।” आरव ने मुस्कुराकर जवाब दिया था, “मुझे तारीखें दिखती हैं, आपको दीवारों की उम्र।” मीरा पहली बार खुलकर हँसी थी।

फिर संचालक ने घोषणा की, “अब सभी जोड़े मंच पर आएँगे। दुल्हन की माँ चाहती हैं कि कोई मेज खाली न रहे।”

टेबल 11 पर सन्नाटा पड़ गया। दूल्हे की माँ दूर से देख रही थी, मानो अकेले लोग शादी की इज़्ज़त कम कर रहे हों। तभी आरव ने मीरा की तरफ हाथ बढ़ाया। यह मजबूरी भी थी, बचाव भी, और शायद कुछ ऐसा जिसे वह खुद समझ नहीं पाया।

मीरा ने पूछा, “सिर्फ माहौल बचाने के लिए?”

आरव ने धीमे से कहा, “अभी तो यही बहाना ठीक है।”

वे नाचे। गीत पुराना था, धीमा था, जैसे किसी दादी की याद से निकला हो। आरव थोड़ा असहज था, मीरा हैरानी भरी सहजता से चल रही थी। बीच गीत में जब रोशनी हल्की हुई, मीरा ने पहली बार उसे ऐसे देखा जैसे किसी बंद कमरे में अचानक खिड़की खुल गई हो।

गीत खत्म हुआ तो वे अलग हुए, पर कुछ बचा रह गया।

मेज पर लौटते हुए मीरा ने धीमे से कहा, “सबने देख लिया कि तुमने मुझे चुना।”

आरव ने हल्की हँसी में बात टालनी चाही, “टेबल पर तुम ही अकेली थीं।”

मीरा ने उसकी आँखों में देखकर कहा, “वेटर रवि भी अकेला था। तुमने उसे नहीं चुना।”

आरव चुप हो गया। पहली बार उसे लगा कि मीरा सिर्फ इमारतों की दरारें नहीं पढ़ती, लोगों की चुप्पी भी पढ़ लेती है।

उस रात के बाद 2 हफ्ते तक दोनों ने कोई बात नहीं की, पर आरव अब अपने घर से निकलते हुए 3 मकान दूर खड़ी सफेद कार को देखने लगा था। शाम को मीरा के बरामदे की पीली बत्ती जलती तो उसे अजीब-सी शांति मिलती। फिर 1 सुबह दोनों डाक के डिब्बों के पास मिले।

मीरा ने कहा, “इतिहास बदल गया क्या?”

आरव ने जवाब दिया, “इतिहास नहीं, पर शायद कुछ रिकॉर्ड दोबारा पढ़ने पड़ेंगे।”

बात लंबी हो गई। फिर कॉफी, फिर डिनर, फिर शामें। मीरा ने बताया कि उसका तलाक 3 साल पहले हुआ था। उसके पति ने उसे सिर्फ इसलिए छोड़ा था क्योंकि वह उसके परिवार की नक्शे जैसी बनी-बनाई जिंदगी में फिट नहीं बैठती थी। आरव ने बताया कि वह 5 साल पहले एक रिश्ते से निकला था, जहाँ लड़की ने कहा था कि शिक्षक की स्थिर जिंदगी बहुत छोटी होती है।

सब कुछ धीरे-धीरे सही लगने लगा था, जब तक मीरा को बेंगलुरु का 8 महीने लंबा प्रोजेक्ट नहीं मिला। यह उसके करियर का सबसे बड़ा मौका था।

उसने आरव के बरामदे पर बैठकर कहा, “6 महीने पहले मैं बिना सोचे चली जाती।”

आरव ने दिल दबाकर कहा, “मैं तुम्हें रोकने वाला आदमी नहीं बनना चाहता।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा। “समस्या यही है। तुम रोक नहीं रहे, फिर भी रुकने की वजह बन रहे हो।”

उसी रात मीरा ने घर लौटते ही अपने पिता का फोन उठाया। दूसरी तरफ से कठोर आवाज़ आई, “अब फिर किसी आदमी के लिए अपना करियर खराब मत करना। और याद रखना, तलाकशुदा औरत पर समाज दूसरी गलती माफ नहीं करता।”

मीरा ने फोन काट दिया, लेकिन दरवाजे के बाहर उसकी माँ खड़ी थी। उसके हाथ में आरव और मीरा की शादी में नाचती हुई 1 तस्वीर थी, जो किसी रिश्तेदार ने भेजी थी।

माँ ने ठंडे स्वर में पूछा, “यह आदमी कौन है, और क्या तुम्हें फिर से तमाशा बनना है?”

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया, क्योंकि उसी क्षण आरव उसके गेट तक पहुँच चुका था और उसने सब सुन लिया था।

भाग 2

मीरा की माँ ने आरव को देखते ही तस्वीर उसकी तरफ बढ़ा दी। “आप शिक्षक हैं न? तो समझदार होंगे। मेरी बेटी पहले ही 1 शादी में जल चुकी है। अब मोहल्ले की दया बनकर मत खड़े रहिए।”

आरव ने तस्वीर देखी। उसमें मंच की रोशनी में वह मीरा का हाथ पकड़े था। वही गीत, वही पल, पर अब वह किसी सुंदर शुरुआत से ज़्यादा अदालत में रखे सबूत जैसा लग रहा था।

मीरा ने माँ से कहा, “यह दया नहीं है।”

माँ बोली, “तो क्या है? प्यार? 4 महीने की पड़ोसन, 1 शादी का नाच और 3 डिनर? समाज ऐसे रिश्तों पर हँसता है।”

मीरा चुप रही। आरव ने पहली बार उसकी आँखों में डर देखा। वह वही औरत थी जो नक्शे बदल सकती थी, पर अपने घरवालों के सामने अब भी लड़की बन जाती थी।

अगले दिन मीरा ने बेंगलुरु प्रोजेक्ट स्वीकार करने का संदेश लिख दिया, पर भेजा नहीं। उसी शाम गली के व्हाट्सऐप समूह में तस्वीर फैल गई। नीचे लिखा था, “नई कहानी शुरू?”

आरव की माँ शकुंतला ने भी तस्वीर देखी। उन्होंने धीरे से कहा, “बेटा, तलाकशुदा लड़की से शादी आसान नहीं होती। लोग पूछेंगे, उसके अपने घरवालों ने क्यों नहीं संभाला?”

आरव ने पहली बार माँ से तेज आवाज़ में कहा, “क्योंकि शायद उसके घरवालों ने उसे संभाला नहीं, डराया है।”

उधर मीरा के पुराने ससुराल से भी फोन आया। पूर्व पति निखिल ने हँसते हुए कहा, “तुम्हें फिर किसी ने गंभीरता से ले लिया? बेचारे को सच बता देना, तुम घर नहीं, करियर चुनती हो।”

मीरा ने फोन काटा, लेकिन इस बार वह रोई नहीं। उसने आरव को संदेश भेजा, “आज मत आना। सब बिगड़ गया है।”

आरव फिर भी आया। उसके हाथ में वही गीत बजता फोन था।

मीरा ने दरवाजा खोला और कहा, “तुम क्यों आए?”

आरव ने हाथ बढ़ाया। “क्योंकि उस रात सबने मुझे तुम्हें चुनते देखा था। आज मैं चाहता हूँ कि तुम खुद तय करो, मुझे बाहर रखना है या अंदर आने देना है।”

मीरा कुछ कहती, उससे पहले उसके पिता भीतर से गरजे, “अगर यह आदमी दहलीज़ पार करेगा, तो मीरा इस घर की बेटी नहीं रहेगी।”

भाग 3

दरवाजे पर खड़े आरव ने पहली बार मीरा के घर के भीतर देखा। यह वही घर था जिसके बाहर वह महीनों से सिर्फ सुंदर पीतल की घंटी, तुलसी का गमला और सलीके से रखे जूते देखता था। अंदर दीवारों पर पुरानी पारिवारिक तस्वीरें थीं, लेकिन किसी भी तस्वीर में मीरा की आँखें वैसी नहीं थीं जैसी उस शादी की रात मंच पर थीं। यहाँ वह हमेशा संयमित, चुप और थोड़ी दूर खड़ी दिखाई देती थी।

मीरा के पिता, संजय सेन, सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी थे। उनके चेहरे पर वह कठोरता थी जो समाज से लड़कर नहीं, समाज के डर से पैदा होती है। माँ अंजना सेन की आँखों में चिंता थी, लेकिन भाषा में आरोप। उनके लिए बेटी की सुरक्षा का मतलब उसे बंद रखना था।

संजय ने फिर कहा, “मीरा, फैसला कर लो। घर चाहिए या यह नई गलती?”

आरव ने शांत स्वर में कहा, “अंकल, मैं गलती नहीं हूँ। और मीरा कोई सामान नहीं कि घर और आदमी में बाँटी जाए।”

“आपसे किसी ने बोलने को नहीं कहा,” संजय गरजे।

मीरा ने पहली बार पिता के सामने गर्दन सीधी की। “लेकिन मुझसे तो कहा है न? फैसला मेरा है।”

कमरे में सन्नाटा हो गया। अंजना ने घबराकर कहा, “बेटी, गुस्से में घर नहीं छोड़ा जाता।”

मीरा ने धीमे से जवाब दिया, “मैंने गुस्से में घर नहीं छोड़ा था, माँ। मैंने निखिल का घर तब छोड़ा था जब उसने मेरे प्रोजेक्ट की फाइल फाड़कर कहा था कि अच्छी बहू का नक्शा रसोई से शुरू होता है और वहीं खत्म। आपने तब भी मुझसे कहा था, थोड़ा सह ले।”

अंजना की आँखें झुक गईं।

आरव ने मीरा की तरफ देखा। उसे लगा, वह उस स्त्री का दूसरा चेहरा देख रहा है, जो अब तक सिर्फ अपने दर्द को तहों में मोड़कर रखती आई थी।

संजय ने आवाज़ धीमी पर ज़हरीली कर ली। “और यह शिक्षक? यह क्या देगा तुम्हें? समाज में जवाब हम देंगे। लोग कहेंगे तलाक के बाद बेटी हाथ से निकल गई।”

मीरा ने कहा, “समाज ने मेरे तलाक के कागज़ पर हस्ताक्षर नहीं किए थे, पापा। मैंने किए थे। समाज रातों को मेरे साथ नहीं रोया था। समाज ने निखिल की माँ की बातें नहीं सुनी थीं। समाज ने मुझे उस घर से बिना गहनों के निकलते नहीं देखा था।”

आरव ने पहली बार जाना कि मीरा ने तलाक के बारे में जितना बताया था, वह बस सतह थी। भीतर बहुत कुछ दबा था।

उसी समय गेट पर आवाज़ हुई। शकुंतला, आरव की माँ, वहाँ खड़ी थीं। शायद वे बेटे के पीछे-पीछे चली आई थीं। उनके चेहरे पर बेचैनी थी। मीरा सकपका गई। उसे लगा अब दूसरा फैसला भी उसके खिलाफ आएगा।

शकुंतला ने भीतर आते हुए कहा, “मुझे भी कुछ कहना है।”

आरव ने माँ की तरफ देखा। “माँ, अभी—”

“नहीं,” उन्होंने रोक दिया। “अभी ही।”

उन्होंने संजय और अंजना को folded हाथ जोड़े, फिर मीरा की तरफ देखा। “मैंने आज सुबह अपने बेटे से वही बात कही जो शायद आप लोग कह रहे हैं। कि तलाकशुदा लड़की से रिश्ता मुश्किल होता है। सच कहूँ तो मैंने यह बात डर से कही थी, समझ से नहीं।”

मीरा की आँखें भर आईं, पर उसने आँसू रोक लिए।

शकुंतला बोलीं, “मेरे पति 12 साल पहले चले गए थे। तब रिश्तेदारों ने मुझसे कहा था कि विधवा औरत को सीमा में रहना चाहिए। मैंने नौकरी की, बेटे को पढ़ाया, घर संभाला। तब समाज ने मेरी थाली में खाना नहीं रखा। फिर आज मैं उसी समाज के नाम पर किसी दूसरी औरत को क्यों तौलूँ?”

कमरे का तापमान बदल गया। अंजना की उँगलियाँ काँपने लगीं।

संजय ने असहज होकर कहा, “बहनजी, बात इतनी सरल नहीं है।”

शकुंतला ने शांत आँखों से कहा, “कभी सरल होती भी नहीं। पर गलत को सिर्फ इसलिए सही मत कहिए क्योंकि लोग सुन रहे हैं।”

मीरा ने आरव की तरफ देखा। आरव ने कुछ नहीं कहा। उस क्षण वह समझ गया कि मीरा को बचाने नहीं, उसके साथ खड़े रहने की ज़रूरत है। यह उसकी लड़ाई थी, और उसे अपनी आवाज़ खुद रखनी थी।

मीरा ने पिता से कहा, “मैं बेंगलुरु नहीं जा रही।”

आरव चौंका। अंजना ने तुरंत कहा, “देखा? इसी आदमी के कारण—”

“नहीं,” मीरा ने रोक दिया। “मैं इसलिए नहीं जा रही क्योंकि मैं भागकर फैसला नहीं करना चाहती। मैं यहाँ रहकर अपना नया प्रोजेक्ट लूँगी। मैं अपना काम भी चुनूँगी और अपनी जिंदगी भी। आरव वजह नहीं है, आईना है। उसने मुझे दिखाया कि मैं अभी भी चुनी जा सकती हूँ, बिना बदले।”

आरव की आँखें नम हो गईं।

संजय ने आखिरी कोशिश की। “और अगर हम मना कर दें?”

मीरा ने धीमे से कहा, “तो आप मुझे बेटी कह सकते हैं, पर मेरी जिंदगी के मालिक नहीं।”

यह वाक्य उस घर में शायद पहली बार बोला गया था। दीवारों पर लगी तस्वीरें जैसे सचमुच सुन रही थीं।

उस रात कोई नाटकीय विदाई नहीं हुई। मीरा घर से निकली नहीं। आरव भी वहाँ ठहरा नहीं। लेकिन जाते-जाते उसने वही पुराना गीत फोन पर नहीं बजाया। उसने बस मीरा से कहा, “जब भी नाचना चाहो, इस बार बहाने की ज़रूरत नहीं होगी।”

मीरा ने पहली बार अपने माता-पिता के सामने मुस्कुराकर कहा, “मुझे पता है।”

अगले कुछ हफ्ते आसान नहीं थे। गली के लोग फुसफुसाते रहे। कोई कहता, “शिक्षक है, अच्छा आदमी लगता है।” कोई कहता, “तलाक के बाद इतनी जल्दी?” किसी को यह याद नहीं था कि मीरा 3 साल से अकेली थी, क्योंकि समाज औरत के अकेलेपन को समय नहीं, शक की तरह गिनता है।

गली के अनौपचारिक मुखिया जतिन भसीन ने सबसे पहले खुलेआम बात छेड़ी। दशहरे के बाद वाली रविवार की शाम पूरी कॉलोनी में सामूहिक चाय का कार्यक्रम था। बच्चे पटाखों की बातें कर रहे थे, औरतें मिठाई की रेसिपी बदल रही थीं, पुरुष राजनीति पर बहस कर रहे थे। आरव और मीरा अलग-अलग पहुँचे थे, पर 10 मिनट में ही पास खड़े मिल गए।

जतिन ने कुल्हड़ हाथ में लेकर जोर से कहा, “अब साफ-साफ बता भी दो। यह पड़ोसी वाली जान-पहचान है या शादी वाला मामला? पूरी गली को जिज्ञासा है।”

कुछ लोग हँस पड़े। कुछ चुप हो गए। मीरा का चेहरा सख्त हो गया। आरव ने देखा कि वही पुराना डर फिर उसकी आँखों में आया, पर इस बार वह पीछे नहीं हटी।

आरव ने कहा, “हम एक-दूसरे को समझ रहे हैं।”

जतिन हँसा, “इतना संभलकर बोल रहे हो जैसे अदालत में बयान दे रहे हो।”

मीरा ने पहली बार सार्वजनिक रूप से उत्तर दिया, “क्योंकि लोगों ने औरतों की जिंदगी को अदालत ही बना रखा है। हर हँसी में सवाल, हर रिश्ते में फैसला।”

आसपास सन्नाटा हो गया। जतिन की पत्नी ने उसे कोहनी मारी। शकुंतला थोड़ी दूर खड़ी थीं। उन्होंने आगे बढ़कर कहा, “और अगर किसी को जानना ही है, तो इतना जान लीजिए कि मेरे बेटे ने किसी को छिपाकर नहीं चुना। और मीरा कोई शर्म की बात नहीं है।”

यह सुनकर मीरा की आँखें भर आईं। उसके माता-पिता भी आए थे, थोड़ी दूरी पर खड़े। संजय के चेहरे पर अभी भी कठोरता थी, लेकिन अंजना का चेहरा बदल चुका था। शायद उन्होंने पहली बार देखा कि उनकी बेटी को जिस समाज से वे बचाना चाहती थीं, उसी समाज के सामने कोई उसके साथ खड़ा हो सकता है।

उस रात के बाद गली की भाषा बदलने लगी। फुसफुसाहटों में तीखापन कम हुआ। बच्चे उन्हें साथ देखकर सामान्य मानने लगे। आरव के स्कूल के 1 छात्र ने मज़ाक में कहा, “सर, इतिहास में प्रेम कहानियाँ भी पढ़ाएँगे क्या?” आरव ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “पहले क्रांति समझ लो, प्रेम बाद में।”

मीरा के काम में भी नया मोड़ आया। बेंगलुरु प्रोजेक्ट छोड़ने के बाद उसे लगा था कि शायद उसके करियर पर दाग लगेगा, लेकिन 1 पुराने ग्राहक ने उसे जयपुर की हवेली पुनर्निर्माण परियोजना दी। शर्त यह थी कि वह महीने में 5 दिन साइट पर रहेगी, बाकी काम दिल्ली से करेगी। यह वही संतुलन था जिसकी उसे तलाश थी। उसने आरव को बताया तो वह सचमुच खुश हुआ, राहत से नहीं, गर्व से।

मीरा ने पूछा, “तुम्हें डर नहीं लगेगा कि मैं चली जाऊँगी?”

आरव ने कहा, “मुझे डर लगेगा। पर डर और रोकना 2 अलग चीज़ें हैं।”

मीरा देर तक उसे देखती रही। “तुम्हें पता है, निखिल ने कभी यह फर्क नहीं समझा।”

आरव ने कहा, “मैं निखिल नहीं हूँ। और तुम वह मीरा नहीं रहीं जो उसके घर से रोते हुए निकली थी।”

धीरे-धीरे दोनों के बीच रिश्ता नाम लेने लगा, पर जल्दबाज़ी से नहीं। वे मंदिर साथ गए, लेकिन दिखावे के लिए नहीं। वे बाजार में सब्ज़ी खरीदते दिखे, तो लोग मुस्कुराने लगे। वे शाम को आरव के बरामदे में बैठते, जहाँ से डूबता सूरज सबसे अच्छा दिखता था। मीरा ने 1 बार कहा, “तुम्हारे बरामदे का कोण अच्छा है। घर लेते समय सोचा था?”

आरव ने हँसकर कहा, “इतिहास शिक्षक भी कभी-कभी भविष्य देख लेते हैं।”

दीवाली से 1 दिन पहले आरव अचानक मीरा के घर पहुँचा। इस बार उसके हाथ में मिठाई नहीं थी, न कोई अंगूठी, न कोई बड़ा ऐलान। उसके फोन में वही पुराना गीत था, जो शादी की रात बजा था। मीरा ने दरवाज़ा खोला तो पूछा, “आज फिर कोई दुल्हन की माँ घूर रही है क्या?”

आरव ने सिर हिलाया। “नहीं। इसलिए आया हूँ।”

मीरा समझ गई। उसने दरवाजा पूरा खोल दिया। घर में इस बार उसके माता-पिता भी थे। अंजना पूजा की थाली सजा रही थीं। संजय अखबार पढ़ने का दिखावा कर रहे थे, पर उनकी आँखें पन्नों से ज़्यादा दरवाजे पर थीं।

आरव ने फोन मेज पर रखा। गीत धीमे से बजने लगा। वही धुन, वही पुरानी मिठास, वही याद जिसने 1 मजबूरी को पहचान में बदल दिया था।

उसने मीरा की तरफ हाथ बढ़ाया। “इस बार किसी टेबल की इज़्ज़त बचाने के लिए नहीं। इस बार सिर्फ इसलिए कि मैं तुम्हें चुनना चाहता हूँ, सबके सामने नहीं, तुम्हारे सामने।”

मीरा ने हाथ देखा। इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था। उसने माँ की तरफ देखा। अंजना ने थाली नीचे रखी और बहुत हल्का-सा सिर हिलाया। संजय ने अखबार मोड़ दिया। यह अनुमति नहीं थी, लेकिन प्रतिरोध भी नहीं था। कभी-कभी घर इसी छोटी चुप्पी से बदलते हैं।

मीरा ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

वे ड्राइंग रूम में नाचे। कोई सजावटी मंच नहीं था, कोई कैमरा नहीं, कोई हँसता हुआ रिश्तेदार नहीं। सिर्फ दीये की रोशनी थी, हल्की अगरबत्ती की गंध थी और 2 लोग थे, जिन्होंने एक-दूसरे को पहले भी चुना था, पर अब उसे छिपाना नहीं चाहते थे।

गीत के बीच मीरा ने धीरे से कहा, “उस रात सबने देखा था कि तुमने मुझे चुना।”

आरव ने उत्तर दिया, “आज तुमने खुद देखा कि तुमने भी मुझे चुना।”

मीरा की आँखों से आँसू गिर गए, पर वह मुस्कुरा रही थी। “मैंने शायद उसी रात चुन लिया था। बस मुझे अपने ही डर से अनुमति लेनी थी।”

आरव ने कहा, “अब?”

मीरा ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया। “अब अनुमति नहीं, फैसला।”

गीत खत्म हुआ, पर वे अलग नहीं हुए।

कुछ महीनों बाद उसी गली में फिर शादी हुई। इस बार किसी और की बेटी की नहीं, आरव और मीरा की सगाई थी। यह समारोह बड़ा नहीं था। 82 लोग थे, जिनमें गली वाले, स्कूल के कुछ शिक्षक, मीरा की टीम, आरव की माँ और मीरा के माता-पिता शामिल थे। जतिन भसीन ने फिर मज़ाक किया, “मैंने कहा था न, पूरी गली को जिज्ञासा थी।”

मीरा ने मुस्कुराकर कहा, “जिज्ञासा से दुआ तक आने में आपको समय लगा।”

सब हँस पड़े। संजय चुप बैठे रहे, फिर अचानक उठे। सबको लगा शायद वह कोई औपचारिक बात कहेंगे। उन्होंने मीरा के पास जाकर उसके सिर पर हाथ रखा। उनकी आवाज़ भारी थी।

“मैंने तुम्हें समाज से बचाने के नाम पर बहुत बार रोकना चाहा। पर आज समझ आया, बेटी को बचाने का मतलब उसके रास्ते बंद करना नहीं होता। अगर यह आदमी तुम्हें चलते रहने देता है, तो मैं इसे रोकने वाला कौन हूँ?”

मीरा रो पड़ी। वह पिता से लिपट गई। अंजना ने शकुंतला का हाथ पकड़ लिया। दोनों औरतें कुछ नहीं बोलीं, लेकिन उनकी चुप्पी में वर्षों की थकान और राहत साथ बैठी थी।

फिर वही गीत बजा। इस बार किसी ने घोषणा नहीं की। किसी माँ ने खाली कुर्सी की तरफ नहीं देखा। किसी ने मजबूर नहीं किया। आरव ने बस मीरा की तरफ हाथ बढ़ाया, और मीरा ने बिना पूछे हाथ रख दिया।

लोगों ने उन्हें नाचते देखा, पर इस बार तमाशे की तरह नहीं। इस बार जैसे सब किसी अधूरे वाक्य का पूरा होना देख रहे हों।

टेबल 11, वह पुरानी शादी, वह झिझक, वह तस्वीर, वह आरोप, वह दहलीज़, वह फैसला—सब उस धीमे गीत में घुल गए।

और जब गीत खत्म हुआ, मीरा ने आरव से फुसफुसाकर कहा, “कभी-कभी जिंदगी पहले सबको दिखा देती है कि हमारा सच क्या है, बस हमें ही देर लगती है उसे मानने में।”

आरव ने उसके माथे को हल्के से छुआ और कहा, “देर से पहचाना हुआ सच भी सच ही होता है।”

उस रात गली की दीवारों पर दीये जल रहे थे। 3 मकान की दूरी अब दूरी नहीं रही थी। और जिस औरत को कभी उसके अतीत से तौला गया था, वही औरत अब अपने भविष्य की तरफ ऐसे चल रही थी जैसे कोई पुरानी हवेली टूटकर नहीं, संभलकर फिर से जी उठी हो।

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