
PART 1
सुबह 5:03 बजे, 10 साल का एक बच्चा पूरी तरह भीगा हुआ अपनी बुआ के दरवाज़े पर गिर पड़ा, क्योंकि उसके अपने पिता ने सोसायटी का प्रवेश कोड बदलकर उसे रात भर बाहर खड़ा रहने दिया था।
निशा मेहरा को पहले तो यकीन ही नहीं हुआ कि नोएडा सेक्टर 50 की उस पुरानी अपार्टमेंट इमारत के धुंधले इंटरकॉम स्क्रीन पर जो छोटा-सा साया काँप रहा था, वह आरव है। उसका पतला शरीर पानी से चिपके स्वेटर में सिकुड़ा हुआ था, होंठ नीले पड़ चुके थे, बाल माथे से चिपके थे और जूते से पानी टपक रहा था।
उसने दरवाज़ा 3 बार खटखटाया।
इतना धीमे, जैसे मदद नहीं, माफ़ी माँग रहा हो।
निशा ने कुंडी इतनी जल्दी खोली कि लोहे की चेन दीवार से टकरा गई। जनवरी की ठंडी सुबह की हवा कमरे में घुस आई। सामने आरव खड़ा था, पर खड़ा भी नहीं था। उसकी आँखें आधी खुली थीं, जैसे वह बहुत दूर से लौटकर आया हो।
— बुआ…
बस इतना कहकर उसके घुटने मुड़ गए।
निशा ने उसे बाँहों में थाम लिया। पहला डर उसके नीले होंठ देखकर नहीं लगा। पहला झटका उसके वजन से लगा। आरव इतना हल्का कैसे हो गया था? वही बच्चा जो 2 साल पहले उसकी रसोई में घुसकर पराठे चुराता था, जो सोफे पर कूदते हुए कहता था कि वह बड़ा होकर ट्रेन चलाएगा, आज एक भीगे हुए पंछी जैसा काँप रहा था।
निशा उसे खींचकर अंदर लाई। उसके जूते उतारे, गीले मोज़े फेंके, 2 रज़ाइयों में लपेटा और उसके हाथ अपनी हथेलियों में लेकर रगड़ने लगी।
— आरव, बेटा, तू अंदर है। सुन रहा है न? तू मेरे घर में है।
आरव के दाँत इतनी तेज़ी से बज रहे थे कि शब्द टूट रहे थे।
— उन्होंने… मुझे बाहर छोड़ दिया।
— किसने?
उसने आँखें बंद कर लीं।
— पापा ने… और रितिका आंटी ने। कोड काम नहीं कर रहा था।
आरव का पिता, संजय मेहरा, निशा का बड़ा भाई था। गुरुग्राम में बड़ी प्रॉपर्टी डीलिंग कंपनी चलाता था। सफ़ेद इस्त्री की शर्ट, चमकती घड़ी, मीठी पर नुकीली बातें। माँ की मौत के बाद से वह बार-बार कहता था कि परिवार की इज़्ज़त और संपत्ति संभालना आसान नहीं होता। निशा, जो सरकारी अस्पताल में रात की ड्यूटी करने वाली नर्स थी, उसके लिए हमेशा “भावुक लड़की” थी, जिसे हर बात में नाटक दिखता था।
रितिका, संजय की दूसरी पत्नी, आरव को अक्सर “बहुत बिगड़ा हुआ” कहती थी।
पिछली दीवाली पर उसने सबके सामने कहा था—
— बच्चे अगर हर बात पर रोएँ, तो बड़े होकर दूसरों को ब्लैकमेल करते हैं।
आरव ने तब सिर झुका लिया था।
निशा वह चेहरा कभी नहीं भूल पाई।
उसने तुरंत आपातकालीन सेवा को फोन किया। आवाज़ काँप रही थी, मगर शब्द साफ़ थे।
— 10 साल का बच्चा है, लंबे समय तक ठंड और बारिश में रहा है, कपड़े भीगे हैं, होंठ नीले हैं, शरीर काँप रहा है, हल्का भ्रम है। बच्चा कह रहा है कि उसे जानबूझकर घर के बाहर छोड़ा गया।
आरव ने उसकी कलाई पकड़ ली।
— पापा को मत बुलाना।
— मैं तेरे पापा को नहीं बुला रही। डॉक्टर बुला रही हूँ।
— वो कहेंगे मैंने झूठ बोला।
निशा का गुस्सा गले में अटक गया। एक ठंड से जमे बच्चे को अस्पताल से ज़्यादा अपने पिता की कहानी से डर लग रहा था।
तभी उसके फोन पर संदेश आया।
संजय: आरव तेरे पास है?
फिर तुरंत दूसरा।
संजय: अब तूने क्या नया तमाशा खड़ा कर दिया?
निशा ने जवाब नहीं दिया। उसने इंटरकॉम की रिकॉर्डिंग सुरक्षित की—5:03 पर आरव का आना, दीवार पकड़ना, काँपते हुए दरवाज़ा खटखटाना। उसने गीले जूते, स्वेटर, लाल पड़े हाथों की तस्वीरें लीं और अपनी एक सहकर्मी को भेजीं, जिसके पति पुलिस में थे।
एम्बुलेंस 15 मिनट से कम में आ गई। जब डॉक्टरों ने आरव पर चाँदी जैसी गरम चादर डाली, वह बुदबुदाया—
— अब सो सकता हूँ?
किसी ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
अस्पताल में डॉक्टर ने ठंडी आवाज़ में कहा—मध्यम हाइपोथर्मिया।
निशा को कुर्सी पकड़नी पड़ी। मध्यम। यानी बच्चा उस सीमा तक पहुँच चुका था जहाँ कोई भी अपना बच्चा कभी नहीं पहुँचने देता।
सुबह 6:41 पर संजय और रितिका इमरजेंसी वार्ड में आए।
वे घबराए हुए नहीं लग रहे थे।
संजय ने ऊनी कोट पहना था। रितिका के चेहरे पर पिछली रात की पार्टी का मेकअप अभी भी बचा था। वे आरव की तरफ नहीं गए। संजय सीधा निशा के सामने आकर खड़ा हो गया।
— डॉक्टरों से तूने क्या कहा?
निशा ने उसे घूरा।
— वही जो सब देख सकते हैं।
उसने फोन आगे कर दिया। वीडियो चलने लगा। आरव, अकेला, भीगा, 5:03 पर। आरव, दीवार से टिकता हुआ। आरव, दरवाज़े पर उँगलियाँ मारता हुआ।
संजय का चेहरा बदल गया।
शर्म से नहीं।
डर से।
उसी पल एक पुलिस अधिकारी और बाल संरक्षण विभाग की महिला वार्ड में दाखिल हुए। महिला की नज़र प्लास्टिक बैग में रखे गीले जूतों पर टिक गई।
— संजय मेहरा जी, हमें आपके घर पर कुछ बातों की जाँच करनी होगी।
संजय हँसा, पर हँसी खोखली थी।
— यह सब बकवास है। बच्चे से टैबलेट ले लिया था, इसलिए ड्रामा कर रहा है। मेरी बहन को बचपन से ही खुद को पीड़ित दिखाने की आदत है।
बिस्तर पर लेटा आरव रज़ाई के अंदर और सिकुड़ गया।
सबने देखा।
और निशा समझ गई—सबसे भयानक बात यह नहीं थी कि उसे बाहर छोड़ा गया।
सबसे भयानक बात यह थी कि उसे पहले से सिखाया गया था कि सच बोलना खतरनाक है।
PART 2
जाँच टीम संजय के फ्लैट पहुँची, और निशा आरव के बिस्तर के पास बैठी रही। वह उसकी उँगली पकड़े हुए था। गलियारे में किसी के कदमों की आवाज़ आती, तो उसकी आँखें डर से खुल जातीं।
— क्या मुझे पापा के घर भेज देंगे?
निशा ने गुस्सा पी लिया।
— आज तुझे सिर्फ गरम होना है। बाकी बड़े लोग संभालेंगे।
आरव ने धीरे से कहा—
— रितिका आंटी ने कहा था, अगर मैं तुम्हारे पास गया तो पापा मुझे अपना बेटा नहीं मानेंगे।
निशा की आँखें भर आईं।
8:26 पर पुलिस अधिकारी लौटा। उसका चेहरा बता रहा था कि संजय की कहानी टूट चुकी है।
— प्रवेश कोड रात 11:48 पर बदला गया। आरव स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम से करीब 12 बजे लौटा। उसने अपने पिता को 7 बार कॉल किया। सोसायटी कैमरे में वह 52 मिनट तक बाहर दिख रहा है।
निशा सुन्न हो गई।
— संजय कहाँ था?
— अंदर। ड्रॉइंग रूम का मोशन सेंसर चालू था। टीवी चल रहा था।
तभी रितिका ने निशा से अकेले बात करने की विनती की। उसका चेहरा पीला था।
— मुझे लगा था वह 5 मिनट बाद दरवाज़ा खोल देगा। संजय उसे सबक सिखाना चाहता था।
— और तुमने रोका नहीं?
रितिका रो पड़ी।
— आरव ने कुछ सुन लिया था। आपकी माँ की वसीयत के बारे में। उन कागज़ों के बारे में, जो मौत से पहले साइन करवाए गए थे।
निशा जम गई।
— कौन से कागज़?
रितिका ने शीशे के पार देखा।
संजय उन्हें घूर रहा था।
पहली बार वह भाई नहीं लगा। वह एक ऐसा आदमी लगा, जिसकी बंद तिजोरी खुलने वाली थी।
PART 3
कई सालों से संजय ने एक ही कहानी इतने आत्मविश्वास से दोहराई थी कि परिवार ने उसे सच मान लिया था। उनकी माँ, सावित्री मेहरा, ने लाजपत नगर वाला पुराना मकान, 2 बीमा पॉलिसियाँ और बैंक की बड़ी जमा राशि संजय के नाम कर दी थी, क्योंकि वह “सबसे ज़िम्मेदार” था।
रिश्तेदारों ने भी यही कहा था।
— माँ को पता था संजय संभाल लेगा।
— निशा, तू तो वैसे भी बहुत भावुक है।
— माँ के जाने के बाद पैसों की बातें अच्छी नहीं लगतीं।
निशा ने तब लड़ाई नहीं की। इसलिए नहीं कि उसे भरोसा था, बल्कि इसलिए कि माँ की चिता की राख ठंडी भी नहीं हुई थी और वह टूट चुकी थी। रात की ड्यूटी, किराए का मकान, अधूरी नींद और भीतर यह चुभन कि उसका अपना भाई माँ का घर ऐसे खाली कर रहा था जैसे कोई फाइल बंद कर रहा हो।
मगर उस सुबह अस्पताल के सफेद बिस्तर पर पड़े आरव ने सब बदल दिया।
उसे सिर्फ सज़ा नहीं दी गई थी।
उसे चुप कराने की कोशिश की गई थी।
दोपहर तक बाल संरक्षण अधिकारी ने शुरुआती रिपोर्ट तैयार कर ली। उसकी हर पंक्ति हथौड़े जैसी थी। कोड बच्चे के लौटने से पहले बदला गया था। कॉल रिकॉर्ड में आरव की 7 कॉल थीं। कैमरों में वह बारिश में गेट से दरवाज़े तक भागता, हाथ जोड़कर सुरक्षा गार्ड से कुछ कहता, फिर दीवार से टिककर काँपता दिख रहा था।
संजय कह रहा था कि वह सो रहा था।
घर के सेंसर कह रहे थे कि वह झूठ बोल रहा था।
टीवी रात 12:37 तक चल रहा था।
रितिका पहले चुप थी। शायद डर से। शायद सुविधा से। शायद इसलिए कि जिस घर में वह रानी बनकर आई थी, वहाँ सच बोलना अपने पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकाना था। लेकिन जब संजय ने अस्पताल के गलियारे में उसे दाँत भींचकर कहा—
— एक शब्द भी बोला तो याद रखना, तेरे मायके वालों को भी सड़क पर ला दूँगा।
तब उसने पहली बार सिर उठाकर कहा—
— मैं बयान दूँगी।
संजय की आँखों में वह क्रोध आया जो अक्सर कमजोर आदमी ताकत समझ बैठते हैं।
— तुझे पता भी है किससे बात कर रही है?
बाल संरक्षण अधिकारी ने शांति से कहा—
— और यह धमकी भी नोट की जाएगी।
संजय चुप हो गया।
वह दृश्य अविश्वसनीय था। वही आदमी जो हर पारिवारिक बैठक में आखिरी शब्द बोलता था, वही जो माँ की बीमारी से लेकर बैंक के खाते तक हर बात पर फैसला सुनाता था, अब एक अस्पताल के गलियारे में खड़ा था और उसके शब्द पहली बार वजन खो रहे थे।
क्योंकि इस बार सामने निशा की भावना नहीं थी।
सामने समय था।
रिकॉर्ड था।
वीडियो था।
मेडिकल रिपोर्ट थी।
और एक बच्चे के नीले पड़े होंठ थे।
आरव दोपहर बाद जागा। उसका शरीर थोड़ा गरम हो चुका था, मगर आँखों में वही डर था—जैसे उसे हर साँस के लिए सफाई देनी पड़ेगी। डॉक्टर ने नरम आवाज़ में पूछा कि वह धीरे-धीरे बता सकता है। कोई जल्दी नहीं है। कोई उसे डाँटेगा नहीं।
आरव ने पहले निशा की तरफ देखा।
निशा ने बस उसका हाथ दबाया।
— पापा रात को किसी वकील से बात कर रहे थे, उसने कहा।
कमरे में अचानक सन्नाटा हो गया।
— कौन वकील? पुलिस अधिकारी ने पूछा।
— माथुर अंकल। वही जो दादी के कागज़ देखते थे।
निशा का गला सूख गया। अधिवक्ता रमेश माथुर। वही व्यक्ति जिसने सावित्री मेहरा की आखिरी वसीयत तैयार की थी। वही जिसने कहा था कि सब कानूनी है। वही जिसने निशा की एक भी बात ठीक से सुने बिना उसे सलाह दी थी कि “घर की बात घर में रहने दो।”
आरव धीरे-धीरे बोलता गया।
— पापा कह रहे थे कि अगर बुआ ने पूरी कॉपी माँग ली तो परेशानी हो जाएगी। माथुर अंकल ने कहा था कि पुरानी मेडिकल फाइल मत निकलने देना। फिर पापा ने कहा… दादी को आखिर में सब याद भी कहाँ रहता था।
निशा ने कुर्सी का किनारा पकड़ लिया।
उसकी माँ के आखिरी महीने आँखों के सामने घूम गए। सावित्री कभी चाय में नमक डाल देती थीं, कभी एक ही सवाल 5 बार पूछती थीं, कभी निशा को अपनी छोटी बहन समझकर पुकारती थीं। संजय तब कहता था कि माँ बस उम्र के कारण भूलती हैं। डॉक्टर के पास ले जाने की बात होती तो वह टाल देता।
अब समझ आ रहा था क्यों।
आरव ने होंठ भींचे।
— मैंने पूछा था कि दादी को क्या याद नहीं रहता था। पापा बहुत गुस्सा हुए। बोले, शरीफ बच्चे बड़ों की बात नहीं सुनते। फिर रितिका आंटी ने मुझे कमरे में भेज दिया। लेकिन मैंने सुना… पापा कह रहे थे, यह लड़का सब कुछ निशा को बता देगा। इसे समझना पड़ेगा कि इसका घर किस तरफ है।
निशा ने आँखें बंद कर लीं।
वह वाक्य किसी चाकू जैसा भीतर उतरा।
इसका घर किस तरफ है।
एक बच्चा, जिसका घर उसे ठंड में दरवाज़े के बाहर छोड़ आया था।
संजय बिना अनुमति कमरे में घुस आया।
— बस करो, आरव। तुम थके हुए हो। बातें मिला रहे हो।
आरव का शरीर तन गया। एक पल के लिए लगा कि वह फिर रज़ाई में छिप जाएगा। लेकिन उसने चेहरा ढका नहीं।
— मैं बातें नहीं मिला रहा।
— मैं तुम्हारा बाप हूँ।
यह वाक्य संजय ने शायद सौ बार इस्तेमाल किया होगा। फैसले बंद करने के लिए। डर खोलने के लिए। सवाल मारने के लिए।
लेकिन इस बार आरव ने पहली बार सीधा देखा।
— तो आपने दरवाज़ा क्यों नहीं खोला?
कमरे में कोई आवाज़ नहीं रही।
संजय का मुँह खुला, मगर शब्द नहीं निकले। न कोई सफाई, न कोई आरोप, न कोई सजाई हुई झूठी कहानी। बस एक पिता खड़ा था, अपने 10 साल के बेटे के सामने, और यह नहीं बता पा रहा था कि उसका अहंकार बच्चे की जान से बड़ा कैसे हो गया।
शाम तक निर्णय आ गया। आरव पिता के घर वापस नहीं जाएगा। अस्थायी संरक्षण आदेश की प्रक्रिया शुरू होगी। बाल कल्याण समिति को मामला भेजा जाएगा। पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने की तैयारी करेगी। जब तक जाँच पूरी न हो, आरव निशा के पास रह सकता था, विभाग की निगरानी में।
संजय फट पड़ा।
— यह सब संपत्ति के लिए है! मेरी बहन हमेशा जलती रही है! बच्चा बहकाया गया है! रितिका मानसिक दबाव में है! सब मुझे फँसा रहे हैं!
वह जितना चिल्लाता, उतना छोटा लगता। क्योंकि हर झूठ अब किसी न किसी प्रमाण से टकरा रहा था। हर आरोप के सामने एक रिकॉर्ड था। हर नाटक के सामने एक भीगा स्वेटर था।
सच को चिल्लाने की ज़रूरत नहीं थी।
वह पहले ही लिखा जा चुका था।
अगले कुछ दिनों में मेहरा परिवार दो हिस्सों में बँट गया। एक मौसी ने निशा को फोन कर कहा—
— तूने खानदान की नाक कटवा दी।
एक चचेरे भाई ने संदेश भेजा—
— बच्चे को कभी-कभी अनुशासन सिखाना पड़ता है।
एक पड़ोसी ने कहा—
— घर की बात पुलिस तक ले जाना ठीक नहीं।
निशा ने वह सब पढ़ा, फिर फोन बंद कर दिया। उसी समय आरव रसोई की मेज़ पर बैठा गरम दूध में हल्दी मिलाकर पी रहा था। उसके बाल अभी नहाने के बाद गीले थे। उसने कप को दोनों हाथों से पकड़ा हुआ था, जैसे गर्माहट को खोना नहीं चाहता।
घर की बात घर में रहनी चाहिए।
निशा ने सोचा—पर घर क्या होता है?
क्या वह दीवारें हैं?
क्या वह नाम की इज़्ज़त है?
क्या वह पिता की आवाज़ है?
या वह दरवाज़ा है, जो बच्चे के खटखटाने पर खुलता है?
उस रात आरव लंबे समय तक निशा के फ्लैट के दरवाज़े के पास खड़ा रहा। वह ताले को देखता रहा, फिर नीचे पड़े छोटे से पुराने पायदान को। सुबह उसके जूतों से जो पानी टपका था, उसकी हल्की गहरी लकीरें अभी भी फर्श पर थीं।
— बुआ, फर्श गंदा हो गया था न? उसने धीरे से कहा।
निशा उसके सामने घुटनों के बल बैठ गई।
— कभी माफ़ी मत माँगना कि तू जिंदा यहाँ पहुँचा।
आरव के होंठ काँपे। उसने रोने से खुद को रोकना चाहा। शायद उसने सीख लिया था कि आँसू बड़े लोगों को और गुस्सा दिलाते हैं। फिर अचानक वह टूट गया। बिना किसी सुंदरता के, बिना रोक-टोक के, हिचकियों के साथ। एक 10 साल का बच्चा, जो रात भर दरवाज़े के बाहर खड़ा रहा था, आखिरकार अंदर रो रहा था।
निशा ने उसे यह नहीं कहा कि मजबूत बनो।
उसने यह भी नहीं कहा कि सब ठीक हो जाएगा।
कुछ दर्द इतने बड़े होते हैं कि उन पर झूठी सांत्वना रखना भी अन्याय लगता है।
उसने बस उसे बाँहों में भर लिया।
दरवाज़े के पास।
उस दरवाज़े के पास, जो खुला था।
आने वाले महीने आसान नहीं थे। मनोवैज्ञानिक से मुलाकातें हुईं। बाल कल्याण समिति के सामने बयान हुआ। पुलिस ने सोसायटी के कैमरे, गार्ड की ड्यूटी रजिस्टर, कॉल रिकॉर्ड, घर के सेंसर और संजय के फोन की लोकेशन जाँची। संजय ने मामला पलटने की पूरी कोशिश की। उसने कहा कि निशा को मकान चाहिए। उसने कहा रितिका अस्थिर है। उसने कहा आरव बुआ के घर रहना चाहता है क्योंकि वहाँ उसे डाँटा नहीं जाता। उसने यह तक कहा कि 10 साल के बच्चे ठंड को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं।
पर फाइल बढ़ती रही।
वकील माथुर से पूछताछ हुई। सावित्री मेहरा की मेडिकल फाइल आखिरकार निकली। उसमें दर्ज था कि उनके अंतिम महीनों में स्मृति और निर्णय क्षमता को लेकर डॉक्टर ने चिंता जताई थी। उसी अवधि में कई कागज़ों पर उनके हस्ताक्षर लिए गए थे। घर की पुरानी मददगार, कमला दीदी, ने बयान दिया कि संजय कई बार सावित्री के जवाब खुद देता था। वह दस्तावेज़ों पर हाथ पकड़कर साइन करवाता था। निशा को मिलने से पहले ही कह देता था कि माँ आराम कर रही हैं।
सब कुछ अभी अदालत में साबित होना बाकी था। फैसला नहीं आया था। लेकिन पहली बार संजय की कहानी परिवार का धर्मग्रंथ नहीं रही। वह सिर्फ एक कहानी रह गई थी।
और उसमें दरारें थीं।
आरव धीरे-धीरे जीना सीख रहा था। वह रात को छोटी रोशनी जलाकर सोता। सोने से पहले दरवाज़ा 2 बार जाँचता। अपने जूते हमेशा सोफे के पास रखता, जैसे भीतर का कोई हिस्सा अभी भी भागने के लिए तैयार रहता हो।
कभी-कभी खाना खाते-खाते पूछता—
— आप भी मुझसे परेशान हो जाओगी?
निशा हर बार वही कहती—
— इस घर की चाबी तेरे लिए हमेशा काम करेगी।
एक दिन मार्च की हल्की दोपहर में वह पहली बार सचमुच हँसा। सिर्फ होंठ हिलाकर नहीं। किसी बड़े को खुश करने के लिए नहीं। सचमुच हँसा। कारण छोटा था—मक्खन लगी रोटी प्लेट से फिसलकर उल्टी गिर गई थी और पड़ोस की बिल्ली खुली खिड़की से आकर उस पर पंजा रखकर भागी थी।
आरव हँसता रहा।
निशा ने खिड़की की तरफ चेहरा घुमा लिया, ताकि वह आँसू न देख सके।
उसे नहीं पता था कि अदालत सब ठीक कर पाएगी या नहीं। उसे नहीं पता था कि संजय को उस रात की ठंड, माँ के कागज़ों और सालों की चालाक चुप्पियों की सज़ा कितनी मिलेगी। पर उसे इतना पता था कि 5:03 बजे एक बच्चा लगभग आखिरी ताकत से उसके दरवाज़े तक आया था।
और 5:04 बजे किसी ने दरवाज़ा खोल दिया था।
कभी-कभी नई ज़िंदगी किसी बड़ी जीत से शुरू नहीं होती। न किसी अदालत के फैसले से, न किसी भाषण से, न किसी चमत्कार से।
वह बस एक कुंडी खुलने से शुरू होती है।
कुछ हफ्तों बाद, जब किसी रिश्तेदार ने फिर कहा कि निशा ने पुलिस बुलाकर परिवार तोड़ दिया, तो उसने बहस नहीं की। उसे आरव के नीले होंठ याद आए। वह काँपती आवाज़ याद आई—पापा कहेंगे मैंने झूठ बोला। वह सवाल याद आया जिसने संजय की सारी ताकत छीन ली थी।
— तो आपने दरवाज़ा क्यों नहीं खोला?
निशा अब जानती थी।
परिवार उस दिन नहीं टूटा था, जब उसने मदद के लिए फोन किया।
परिवार तो बहुत पहले टूट चुका था।
उस रात, जब एक पिता ने अपने बेटे की दस्तक सुनी थी…
और दरवाज़े की दूसरी तरफ चुप रहना चुना था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.