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ट्रेन के 2 डिब्बे खाई में गिर गए, 183 यात्रियों की चीखों के बीच एक छुट्टी पर जा रही नर्स बोली, “बच्चों को पहले निकालो”… फिर पहाड़ ही टूटने लगा

भाग 1

पहाड़ों के बीच दौड़ती ट्रेन अचानक ऐसी चीखी कि पूरा डिब्बा मौत के मुंह में झूल गया। किसी को समझ ही नहीं आया कि पहले झटका लगा था या पहले सन्नाटा टूटा था। कुछ सेकंड पहले तक ट्रेन 27 उत्तराखंड की पहाड़ियों से गुजर रही थी, खिड़कियों पर बारिश की बूंदें बज रही थीं, बच्चे सीटों पर बैठकर चिप्स खा रहे थे, बुजुर्ग दंपति अखबार में सुडोकू भर रहे थे और नंदिता राव अपनी सीट 18A पर आंखें बंद करके पहली बार चैन की सांस ले रही थी।

नंदिता दिल्ली के एक बड़े सरकारी अस्पताल में इमरजेंसी नर्स थी। पिछले 12 घंटों की लगातार ड्यूटी, खून, चीखें, एंबुलेंस और थकान ने उसे भीतर तक खाली कर दिया था। वह देहरादून अपनी बड़ी बहन से मिलने जा रही थी। यह सफर उसके लिए छुट्टी था, पर किस्मत ने उसी छुट्टी को उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा बना दिया।

कंडक्टर की आवाज आई, “यात्रीगण कृपया बैठे रहें, ट्रेन कुछ तीखे मोड़ों से गुजरने वाली है।”

नंदिता ने हल्की मुस्कान के साथ आंखें बंद की ही थीं कि पूरी ट्रेन जोर से हिली। ऊपर रखे सूटकेस नीचे गिरे, चाय के कप उड़ गए, एक बच्चा अपनी मां से छूटकर सीट से टकराया। अगले ही पल लोहे के घिसने की भयानक आवाज आई। पहिए चीखे, कांच टूटे, लोग सीटों से उछलकर गलियारे में गिरने लगे। चौथा डिब्बा बाईं तरफ झुक गया, जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे खाई में धकेल रहा हो।

फिर सब रुक गया।

एक पल का सन्नाटा।

और फिर चारों तरफ चीखें।

“बचाओ!”

“मेरी बेटी कहां है?”

“मेरे पैर में दर्द हो रहा है!”

नंदिता ने सीट पकड़कर खुद को संभाला। उसके माथे पर हल्की चोट आई थी, मगर उसका शरीर नर्स बन चुका था, डरने वाली आम यात्री नहीं। उसने तुरंत आवाज ऊंची की, “सब लोग मेरी बात सुनिए। जो चल सकते हैं, वहीं बैठे रहें। जिनके साथ बच्चे हैं, उन्हें सीने से लगाकर रखें। जिसे ज्यादा चोट लगी है, हाथ उठाए।”

उसकी आवाज में ऐसा ठहराव था कि चीखते हुए लोग भी चुप होने लगे। उसने एक लड़के के माथे की चोट देखी, एक बुजुर्ग महिला का कंधा संभाला, फिर आगे जाकर एक आदमी को टूटी सीटों के नीचे दबा पाया। उसका पैर लोहे की मुड़ी हुई पट्टी में फंसा था।

“मेरा नाम नंदिता है। मैं इमरजेंसी नर्स हूं,” उसने कहा।

आदमी कांपते हुए बोला, “मुझे पैर महसूस नहीं हो रहा।”

नंदिता ने पल्स जांची। धड़कन थी। उम्मीद थी। उसने 3 यात्रियों को बुलाया, टूटी सीट उठवाई और बहुत सावधानी से उसका पैर बाहर निकाला। फिर टूटे आर्मरेस्ट और जैकेट से स्प्लिंट बना दिया।

तभी बाहर से किसी ने चिल्लाकर कहा, “पुल टूट गया है!”

नंदिता ने टूटी खिड़की से बाहर देखा और उसका खून जम गया। ट्रेन पहाड़ी पुल पर आधी लटकी हुई थी। आगे के 3 डिब्बे पटरी पर थे, उसका डिब्बा आधा खाई के ऊपर झूल रहा था, पीछे का डिब्बा उलट चुका था और आखिरी 2 डिब्बे 200 फीट नीचे जंगल में गिर चुके थे। धुआं पेड़ों के बीच से उठ रहा था।

बारिश तेज हो गई। पहाड़ गरजने लगे।

रेलवे कर्मचारी ने कांपती आवाज में कहा, “मदद आ रही है, लेकिन हेलिकॉप्टर मौसम की वजह से देर से आएंगे।”

“कितनी देर?” नंदिता ने पूछा।

वह चुप हो गया।

नीचे से बहुत धीमी आवाज आई, “बचाओ…”

नंदिता ने खाई की तरफ देखा। फिर डिब्बे के डरे हुए यात्रियों को देखा। उसने जान लिया कि इंतजार करने का मतलब कई लोगों को मरने देना होगा।

वह सीट पर चढ़ी और बोली, “जब तक रेस्क्यू टीम नहीं आती, हम खुद एक-दूसरे को बचाएंगे। कोई भगदड़ नहीं होगी। कोई अकेला नहीं जाएगा। और मैं नीचे जा रही हूं।”

तभी एक 7 साल की बच्ची ने उसका दुपट्टा पकड़ लिया। उसकी आंखें सूजी हुई थीं।

“आंटी… मेरा भाई और मम्मी आखिरी डिब्बे में थे।”

नंदिता ने उसका नाम पूछा।

“लक्ष्मी।”

नंदिता ने उसके कंधे पर हाथ रखा, “मैं उन्हें ढूंढने जा रही हूं।”

लक्ष्मी ने उसकी आंखों में ऐसा भरोसा देखा जैसे उसने भगवान को देख लिया हो।

और उसी पल नीचे जंगल से फिर वही आवाज आई, इस बार ज्यादा कमजोर।

“कोई है…”

नंदिता ने मेडिकल बैग उठाया, बारिश में कदम रखा और टूटी पहाड़ी पगडंडी की तरफ बढ़ गई।

भाग 2

कीचड़ भरी पगडंडी हर कदम पर फिसल रही थी। नंदिता अकेली नहीं थी। उसके साथ अजय नाम का मजदूर, मीरा नाम की कॉलेज छात्रा, अर्जुन नाम का ऑफ-ड्यूटी फायरमैन और पहाड़ों का रास्ता जानने वाला गाइड देव था। ऊपर डिब्बे में लक्ष्मी खिड़की से उन्हें जाते हुए देख रही थी, जैसे उसकी पूरी दुनिया उसी रास्ते पर उतर रही हो।

नीचे पहुंचते ही सबके कदम रुक गए। आखिरी 2 डिब्बे पेड़ों, पत्थरों और मुड़े हुए लोहे के बीच दबे पड़े थे। एक डिब्बा उल्टा था, दूसरा बीच से फटा हुआ। बारिश टूटी खिड़कियों से अंदर गिर रही थी। हर जगह सूटकेस, स्कूल बैग, चप्पलें और खून के निशान थे।

तभी 3 तेज सीटी की आवाज आई।

कोई जिंदा था।

नंदिता टूटे शीशे से भीतर घुसी। अंदर करीब 20 लोग फंसे थे। कोई सीटों के बीच अटका था, कोई बेहोश था, कोई अपने बच्चे को सीने से लगाए रो रहा था। उसने तुरंत आदेश दिए, “जो चल सकते हैं, पहले बाहर निकलेंगे। बच्चे पहले। घबराना नहीं।”

एक कोने से हल्की सिसकी सुनाई दी। नंदिता रेंगते हुए आगे बढ़ी। वहां 5 साल का बच्चा सीट बेल्ट में बंधा बैठा था। उसका चेहरा धूल और आंसुओं से भरा था।

“तुम्हारा नाम क्या है?”

“आरव।”

“घरवाले?”

आरव ने आगे इशारा किया। उसका पिता टूटी धातु के नीचे दबा था। आदमी ने नंदिता को देखते ही कहा, “मेरे बेटे को बचा लो।”

नंदिता ने आरव को बाहर मीरा के पास भेजा। बच्चा उसका हाथ छोड़ने को तैयार नहीं था।

“आप वापस आओगी?” उसने पूछा।

“हां,” नंदिता ने कहा, “मैं वापस आऊंगी।”

उसी समय देव बाहर से चिल्लाया, “ऊपर की मिट्टी खिसक रही है!”

नंदिता बाहर आई। पहाड़ी कीचड़ धीरे-धीरे नीचे बह रहा था। एक पेड़ की जड़ें जमीन से बाहर आने लगी थीं। देव का चेहरा सफेद पड़ गया।

“हमारे पास 30 मिनट से ज्यादा नहीं हैं। अगर भूस्खलन हुआ तो पूरा डिब्बा दब जाएगा।”

नंदिता ने भीतर देखा। अभी भी कई लोग फंसे थे। कुछ को हिलाना खतरनाक था, मगर न हिलाना मौत था।

तभी डिब्बे के भीतर से आरव के पिता की टूटी आवाज आई, “नर्स मैडम… पहले दूसरों को निकालो।”

नंदिता की आंखें भर आईं, पर उसने जवाब नहीं दिया। उसने अजय से कहा, “ट्रेन का हाइड्रोलिक जैक ढूंढो।”

अजय दौड़ा। कुछ ही देर में लाल जैक मिल गया। नंदिता ने उसे लोहे के फ्रेम के नीचे लगाया। धातु धीरे-धीरे ऊपर उठी। आरव के पिता दर्द से चीखे, लेकिन उनका पैर आजाद हो गया।

फिर अचानक पहाड़ से भयानक दरार की आवाज आई।

एक बड़ा देवदार का पेड़ जड़ों समेत हिल गया।

देव चिल्लाया, “भागो! पहाड़ टूट रहा है!”

भाग 3

अब इलाज का समय खत्म हो चुका था। अब हर सांस, हर कदम और हर फैसला मौत से सीधी दौड़ था। नंदिता ने तुरंत लोगों को बांटा। बच्चों और चलने वालों को पहले भेजा गया। मीरा आरव को लेकर ऊपर की तरफ चली, मगर बच्चा बार-बार पीछे मुड़कर अपने पिता को देखता रहा। लक्ष्मी की मां और भाई भी दूसरे डिब्बे के पीछे के हिस्से से मिल गए थे, घायल मगर जिंदा। लक्ष्मी की मां के माथे पर गहरी चोट थी और भाई के हाथ में फ्रैक्चर था, पर जब मीरा उन्हें लेकर ऊपर बढ़ी, तो लक्ष्मी की मां बस एक ही बात दोहरा रही थी, “मेरी बेटी… मेरी लक्ष्मी…”

नंदिता ने सुन लिया। यह वादा टूटने वाला नहीं था।

डिब्बे में अब 7 गंभीर मरीज बचे थे। एक बुजुर्ग के सीने में चोट थी और सांस आधी आ रही थी। एक महिला का टखना टूट चुका था। एक कंडक्टर की रीढ़ पर चोट का शक था। एक व्यापारी भारी सामान के नीचे फंसा था। आरव के पिता का पैर बुरी तरह घायल था। एक बेहोश आदमी अपने बेटे की आवाज पर भी नहीं उठ रहा था। और एक युवा महिला बार-बार पूछ रही थी कि उसका मंगलसूत्र कहां है, जैसे उसे चोट से ज्यादा अपने टूटे घर का डर हो।

नंदिता ने अपने दिमाग को पत्थर बनाया। वह हर किसी को बचाना चाहती थी, पर उसे क्रम चुनना था। यही इमरजेंसी का सबसे क्रूर सच था।

अर्जुन ने पूछा, “रीढ़ वाले मरीज को कैसे ले जाएंगे? गलत हिलाया तो जिंदगी भर चल नहीं पाएगा।”

नंदिता ने बाहर की पहाड़ी देखी। कीचड़ अब पतली धारा नहीं था। वह भूरे रंग की नदी बन चुका था।

“अगर यहीं छोड़ा तो वह सांस भी नहीं ले पाएगा,” उसने कहा। “हम उसे हिलाएंगे, लेकिन जितनी सावधानी इंसान कर सकता है, उतनी करेंगे।”

उन्होंने सीटों की एल्यूमिनियम रेल, कंबल और बेल्ट से स्ट्रेचर बनाए। टूटे बैगों से गर्दन स्थिर की गई। दुपट्टों को पट्टी बनाया गया। पानी की बोतलों से खून साफ हुआ। एक मां की साड़ी फाड़कर बुजुर्ग के सीने को बांधा गया। उस मां ने बिना एक पल सोचे कहा, “कपड़ा फिर आ जाएगा, आदमी नहीं।”

आरव के पिता को बाहर निकालते समय उनका दर्द इतना बढ़ा कि उन्होंने नंदिता का हाथ पकड़ लिया।

“अगर मैं बेहोश हो जाऊं तो आरव से कहना…”

नंदिता ने तुरंत रोका, “आप खुद कहेंगे। अभी हारने की इजाजत नहीं है।”

वह मुस्कुराने की कोशिश करने लगे। “आप बहुत सख्त हैं।”

“दिल्ली की इमरजेंसी ने बनाया है,” नंदिता ने कहा।

ऊपर से देव की आवाज आई, “जल्दी करो!”

पहाड़ अब सचमुच टूट रहा था। पत्थर लुढ़कने लगे थे। पेड़ एक-एक कर झुक रहे थे। दूर से आती गड़गड़ाहट किसी ट्रेन की आवाज जैसी थी, मगर ट्रेन तो अब नीचे मलबे में पड़ी थी। यह पहाड़ था, जो अपने साथ सब कुछ बहाकर ले जाने वाला था।

पहला स्ट्रेचर निकला। फिर दूसरा। अर्जुन और अजय कंधों पर वजन लेकर चढ़ने लगे। कीचड़ में पैर धंस रहे थे। नंदिता कंडक्टर की गर्दन दोनों हाथों से पकड़े साथ-साथ चल रही थी। एक बार अजय फिसला, स्ट्रेचर झुका, कंडक्टर दर्द से कराह उठा, लेकिन नंदिता ने उसका सिर नहीं हिलने दिया। उसका अपना घुटना पत्थर से टकराकर छिल गया, पर उसकी पकड़ नहीं टूटी।

पीछे से भयंकर आवाज आई।

नंदिता ने मुड़कर देखा। वही डिब्बा, जिसमें कुछ मिनट पहले लोग जिंदगी से चिपके हुए थे, मिट्टी और पेड़ों की दीवार के नीचे गायब हो रहा था। लोहे की छत ऐसे मुड़ी जैसे कागज हो। अगर वे 5 मिनट भी देर करते, कोई नहीं बचता।

“तेज!” अर्जुन चिल्लाया।

रास्ता खत्म हो रहा था। भूस्खलन अब पगडंडी की तरफ मुड़ चुका था। देव ने अचानक ऊपर चट्टान की तरफ इशारा किया। “वहां प्राकृतिक शेल्टर है। सब अंदर!”

लेकिन शेल्टर छोटा था। सब नहीं आ सकते थे। नंदिता ने बिना सोचे कहा, “चलने वाले पहले अंदर जाएं। स्ट्रेचर वाले आखिरी में।”

किसी ने विरोध नहीं किया। उस समय सब समझ चुके थे कि नंदिता जो कहेगी, वही जीवन और मौत के बीच की रेखा है।

आरव, मीरा, लक्ष्मी, उसकी मां और भाई पहले चट्टान के नीचे पहुंचे। फिर घायल यात्री। अब केवल 2 स्ट्रेचर और 4 स्वयंसेवक खुले में थे। कीचड़ उनकी ओर दौड़ रहा था। एक पत्थर अर्जुन के कंधे से टकराया। वह लड़खड़ाया, लेकिन गिरा नहीं।

अजय की सांस फूल गई। “मैं नहीं कर पा रहा…”

नंदिता ने तुरंत उसकी जगह पकड़ ली। “तुम कर सकते हो। बस 4 कदम और।”

कभी-कभी हिम्मत शरीर से नहीं, किसी दूसरे की आवाज से आती है। अजय फिर सीधा हुआ।

3 कदम।

2 कदम।

1 कदम।

जैसे ही अंतिम स्ट्रेचर चट्टान के नीचे धकेला गया, कीचड़ की दीवार उनके पीछे से गुजर गई। मिट्टी, पेड़, टूटे ट्रैक, पत्थर सब बहते चले गए। जमीन कांपती रही। किसी ने सांस तक नहीं ली। आरव अपनी मां की तरह मीरा से चिपका था। लक्ष्मी अपनी मां को पकड़े रो रही थी। कंडक्टर आंखें बंद किए पड़ा था। नंदिता घुटनों के बल बैठ गई, पर उसके हाथ अब भी उसकी गर्दन को स्थिर किए हुए थे।

2 मिनट बाद सब शांत हो गया।

सिर्फ बारिश बची थी।

देव ने बाहर झांका और धीरे से कहा, “रास्ता खत्म हो गया।”

सचमुच पगडंडी गायब थी। पुल की तरफ लौटने का कोई रास्ता नहीं बचा था। नीचे ट्रेन मलबे में दबी थी। ऊपर पहाड़ कट चुका था। वे बच गए थे, पर फंस गए थे।

मीरा ने घबराकर पूछा, “अब क्या करेंगे?”

नंदिता ने चारों तरफ देखा। दूर पेड़ों के बीच एक पुरानी कच्ची सड़क दिखाई दी। घास से ढकी, लगभग भुला दी गई। देव ने उसे देखा और पहली बार हल्का मुस्कुराया।

“यह वन विभाग की पुरानी सड़क है। 3 किलोमीटर बाद रेंजर चौकी है।”

अर्जुन ने पूछा, “एम्बुलेंस वहां आ सकती है?”

“अगर उन्हें पता चल जाए कि हम वहां हैं,” देव ने कहा।

नंदिता उठी। उसकी साड़ी का पल्लू कीचड़ और खून से सना था, बाल चेहरे से चिपके थे, होंठ ठंड से नीले हो रहे थे। फिर भी उसकी आवाज वैसी ही शांत थी।

“हम वहीं जाएंगे।”

यह आसान नहीं था। बुजुर्ग की सांसें धीमी हो रही थीं। ऑक्सीजन सिलेंडर लगभग खाली था। आरव के पिता दर्द से पसीने-पसीने थे। लक्ष्मी की मां बार-बार चक्कर खा रही थी। कंडक्टर को हिलाना हर कदम पर खतरा था। लेकिन अब रुकना विकल्प नहीं था।

बारिश धीरे-धीरे कम हुई। 3 घंटे की कठिन चाल, रुक-रुककर मरीजों की जांच, स्ट्रेचर उठाने वालों की अदला-बदली और बच्चों को संभालने के बाद वे पुरानी सड़क तक पहुंचे। वहां से देव ने सूखी टहनियों से निशान बनाया। अर्जुन ने ट्रेन से लाई आपात फ्लेयर नंदिता को दी।

नंदिता ने लाल फ्लेयर जलाया।

धुआं आसमान में उठा।

कुछ मिनट बाद हेलिकॉप्टर की आवाज सुनाई दी। सबने ऊपर देखा। हेलिकॉप्टर ने चक्कर लगाया, फिर एक तरफ झुका। पायलट ने उन्हें देख लिया था।

आरव पहली बार मुस्कुराया। “उन्होंने हमें ढूंढ लिया।”

नंदिता ने कहा, “हां, लेकिन अभी हमें संभलकर रहना है।”

हेलिकॉप्टर उतर नहीं सकता था। पेड़ बहुत घने थे। लाउडस्पीकर से आवाज आई, “ग्राउंड रेस्क्यू 20 मिनट में पहुंचेगा।”

20 मिनट सुनकर सबने राहत की सांस ली, पर नंदिता बुजुर्ग मरीज की तरफ झुक गई। उसका सीना तेजी से उठ-गिर रहा था। ऑक्सीजन सिलेंडर की सुई लगभग शून्य पर थी। उसके चेहरे पर चिंता साफ थी।

तभी दूर से जीप की आवाज आई। वन विभाग की एक पुरानी गाड़ी कीचड़ उछालती हुई आई। उसके पीछे रेस्क्यू टीम थी। गाड़ी से ऑक्सीजन सिलेंडर, फर्स्ट एड किट और स्ट्रेचर उतारे गए। नंदिता ने राहत की सांस ली, लेकिन वह बैठी नहीं। उसने हर मरीज की जानकारी पैरामेडिक्स को दी।

“इसकी रीढ़ पर चोट का शक है, गर्दन स्थिर रखना। इनके पैर में क्रश इंजरी है, हर 5 मिनट में पल्स देखना। इनके सीने में ब्लंट ट्रॉमा है, ऑक्सीजन हाई फ्लो पर लगाइए। यह बच्चा शॉक में है, मां के साथ रहने दीजिए।”

रेस्क्यू कैप्टन कविता सिंह ने उसे देखा और कहा, “आपने यहां पूरा ट्रायाज सेंटर चला दिया।”

नंदिता ने थके हुए स्वर में कहा, “जो करना था, वही किया।”

जब एंबुलेंस में आरव के पिता को रखा जा रहा था, आरव दौड़कर नंदिता के पास आया। उसने उसके कीचड़ भरे हाथों को पकड़ लिया।

“आप वापस आई थीं,” उसने धीरे से कहा।

नंदिता का गला भर आया। “मैंने कहा था न।”

लक्ष्मी भी अपनी मां का हाथ पकड़े आई। उसकी मां ने कुछ बोलने की कोशिश की, पर शब्द नहीं निकले। उसने बस नंदिता के पैर छूने चाहे। नंदिता तुरंत पीछे हटी और उन्हें गले लगा लिया।

“ऐसा मत कीजिए। बस ठीक हो जाइए।”

उस रात ऋषिकेश के सरकारी अस्पताल की इमरजेंसी घायलों से भर गई। नंदिता उस ट्रेन की यात्री थी, ड्यूटी पर नहीं थी, फिर भी वह नए स्क्रब पहनकर फिर काम करने लगी। डॉक्टरों ने कहा, “आप आराम कर लीजिए।” उसने पानी की बोतल पीते हुए सिर्फ इतना कहा, “जब सब भर्ती हो जाएंगे, तब।”

रात के करीब 11 बजे कैप्टन कविता फिर आईं। उनके हाथ में यात्रियों की अंतिम सूची थी। नंदिता ने तुरंत पूछा, “कितने?”

कविता ने धीरे से कहा, “ट्रेन में कुल 183 लोग थे। 169 बच गए।”

नंदिता ने आंखें बंद कर लीं।

“14 नहीं बच सके,” कविता ने कहा। “लेकिन रेस्क्यू कमांड का अनुमान है कि 40 से ज्यादा लोग इसलिए बचे क्योंकि इलाज रेस्क्यू टीम पहुंचने से पहले शुरू हो गया था।”

नंदिता ने जवाब नहीं दिया। उसकी नजर अस्पताल के उस कोने पर गई, जहां आरव अपने पिता के बिस्तर के पास कुर्सी पर सो रहा था। दूसरी तरफ लक्ष्मी अपनी मां की हथेली पकड़े बैठी थी। कंडक्टर ऑपरेशन थिएटर में था। बुजुर्ग ऑक्सीजन पर था। लोग जिंदा थे। टूटे हुए, डरे हुए, मगर जिंदा।

6 हफ्ते बाद पहाड़ी पुल फिर खुल गया। पटरियां बदल दी गईं, मलबा हटा दिया गया, अखबारों ने नई खबरें छाप दीं। दुनिया आगे बढ़ गई। पर ट्रेन 27 के लोग आगे नहीं बढ़ पाए थे। उनके भीतर लोहे की चीख अब भी गूंजती थी।

नंदिता वापस दिल्ली के अस्पताल में अपनी ड्यूटी करने लगी। वह उस हादसे की बात नहीं करती थी। जब कोई पूछता, वह कहती, “हम भाग्यशाली थे।”

एक दिन अस्पताल के रिसेप्शन से फोन आया, “नंदिता मैम, कुछ लोग आपसे मिलने आए हैं।”

वह लॉबी में पहुंची तो ठिठक गई। करीब 50 लोग खड़े थे। आरव अपने पिता का हाथ पकड़े था, जो अब छड़ी के सहारे चल रहे थे। लक्ष्मी अपनी मां और भाई के साथ थी। मीरा, अजय, अर्जुन, देव, कंडक्टर, वह बुजुर्ग दंपति, सब वहीं थे। कोई कैमरा नहीं, कोई मीडिया नहीं, बस वे लोग जिनके साथ उसने मौत को पहाड़ के नीचे छोड़ा था।

आरव आगे आया। उसके हाथ में छोटा सा डिब्बा था।

“हम धन्यवाद कहने आए हैं,” उसने कहा।

कंडक्टर धीरे-धीरे चला। उसकी चाल अभी भी कमजोर थी, लेकिन वह खड़ा था। उसने कहा, “डॉक्टरों ने बताया, अगर मेरी गर्दन गलत हिलती तो मैं कभी नहीं चल पाता।”

लक्ष्मी ने एक ड्राइंग दी। उसमें पहाड़, ट्रेन, बारिश, बहुत सारे लोग और बीच में नीले कपड़ों वाली एक नर्स बनी थी। ऊपर सूरज था। नीचे बच्चे वाली लिखावट में लिखा था, “सब घर लौट आए।”

नंदिता उस कागज को देखती रही। पहली बार उसकी आंखों से आंसू गिरे।

फिर आरव ने डिब्बा खोला। अंदर पीतल की छोटी सी सीटी थी। वही जैसी ट्रेन के आपात किट में होती है। उस पर लिखा था, “जब उम्मीद को आवाज चाहिए थी।”

नंदिता ने सीटी को हाथ में लिया। उसके होंठ कांपे, पर शब्द नहीं निकले।

तभी इमरजेंसी पेजर बजा। बाहर एंबुलेंस की आवाज आई। एक और दुर्घटना। एक और परिवार। एक और रात।

डॉक्टर ने कहा, “नंदिता, वापस काम?”

नंदिता ने लक्ष्मी की ड्राइंग और वह सीटी अपने लॉकर में रखी। फिर उसने आंसू पोंछे, बाल बांधे और इमरजेंसी रूम की तरफ चल दी।

क्योंकि उसके लिए बहादुरी कोई मंच पर दिया जाने वाला भाषण नहीं थी। बहादुरी वह शांत आवाज थी, जो चीखों के बीच कहती है, “सब लोग मेरी बात सुनिए।”

और चाहे अस्पताल हो, पहाड़ी पुल हो या टूटे हुए डिब्बे के नीचे दबे अजनबी, नंदिता राव का काम हमेशा एक ही था।

जिसकी सांस बच सकती है, उसे आखिरी सांस तक बचाने की कोशिश करना।

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