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जिस बच्ची को शिशु गृह में “तीसरे कमरे वाली” कहकर भुला दिया गया, उसी के लिए एक औरत ने समाज, अफसरों और डॉक्टरों से लड़कर कहा, “फाइल नहीं, मेरी बेटी सांस ले रही है”, फिर अदालत तक सब रो पड़े

PART 1

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सरकारी शिशु गृह के गलियारे में किसी ने इतनी बेरहमी से कहा कि वह बच्ची किसी भी रात मर सकती है, और इसलिए कोई उसे गोद लेने नहीं आता।

अनन्या माथुर वहीं ठिठक गई।

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उसके हाथ में भूरी फाइल थी, जिसमें उसके आधार की कॉपी, नौकरी का प्रमाणपत्र, बैंक स्टेटमेंट और घर की तस्वीरें लगी थीं। वह जयपुर के मालवीय नगर से सिर्फ जानकारी लेने आई थी। वह जानना चाहती थी कि अकेली तलाकशुदा औरत बच्चे को गोद ले सकती है या नहीं, कितने महीने लगेंगे, कितनी बार घर की जांच होगी, कितनी बार उसे अपने अतीत के जख्म कागजों पर खोलने पड़ेंगे।

लेकिन उस वाक्य ने उसके भीतर कुछ ऐसा छू दिया, जिसे उसने 6 साल से बंद कर रखा था।

दो आया पानी के मटके के पास धीमी आवाज में बात कर रही थीं।

“तीसरे कमरे वाली?” एक ने पूछा।

दूसरी ने लंबी सांस ली।

“हाँ वही। 7 महीने की है, पर वजन देखो तो जैसे 3 महीने की हो। दिल में बड़ा छेद है। डॉक्टर बोल रहे थे रात को सांस रुक जाए तो हैरानी नहीं होगी। नाम भी नहीं रखा किसी ने।”

अनन्या के पैर खुद चल पड़े।

“कौन बच्ची?” उसकी आवाज कांप रही थी।

दोनों औरतें चौंक गईं। एक ने नजरें फेर लीं, दूसरी ने पल्लू ठीक किया।

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“मैडम, आपको अंदर की बातें नहीं बताई जा सकतीं।”

“वह अकेली है?” अनन्या ने पूछा।

गलियारे में कुछ सेकंड की खामोशी फैल गई।

वही खामोशी जवाब बन गई।

अनन्या 39 साल की थी। कभी उसके घर में भी एक कमरा नीले पर्दों, लकड़ी के पालने और छोटी-छोटी फ्रॉक के सपनों से भरा था। फिर 2 गर्भ ठहरे, 2 बार अस्पताल की सफेद चादरें खाली लौट आईं, और उसका विवाह धीरे-धीरे तानों, चुप्पियों और अदालत की तारीखों में टूट गया। पति ने जाते-जाते कहा था, “जिस घर में बच्चा नहीं आ सकता, वह घर नहीं, इंतजारघर होता है।”

उस दिन से अनन्या ने वह कमरा बंद कर दिया था।

पर उस गलियारे में उसे लगा, कोई बंद दरवाजा भीतर से खटखटा रहा है।

कुछ देर बाद बाल संरक्षण अधिकारी संगीता राठौर आईं। उनका चेहरा सरकारी थकान से भरा था।

“आपने एक शिशु के बारे में पूछा?” उन्होंने सख्ती से कहा।

“मैं उसे देखना चाहती हूँ।”

“यह सामान्य मामला नहीं है। जन्म के बाद अस्पताल में छोड़ दी गई। कोई परिवार नहीं आया। जन्मजात हृदय रोग है। इलाज महंगा है। भविष्य अनिश्चित है।”

हर शब्द हथौड़े की तरह गिर रहा था।

बीमारी।
अनाथपन।
अनिश्चितता।

“उसका नाम क्या है?” अनन्या ने पूछा।

संगीता ने फाइल खोली, फिर बंद कर दी।

“अभी कोई कानूनी नाम दर्ज नहीं है।”

अनन्या की आंखें भर आईं।

“तो उसे बुलाते क्या हैं?”

“तीसरे कमरे की बच्ची।”

अनन्या के भीतर गुस्सा उठा, मगर वह चीखी नहीं। कुछ दुख इतने गहरे होते हैं कि आवाज तक नहीं निकालते।

“मुझे उसके पास ले चलिए।”

वे शिशु वार्ड की ओर बढ़े। दीवारों पर दानदाताओं के नाम थे, भगवान कृष्ण की बाल रूप वाली तस्वीर थी, और लोहे की खिड़की के बाहर धूल भरी गुलमोहर की डाल हिल रही थी। अंदर दूध, दवा और पुराने कपड़ों की मिली-जुली गंध थी।

पहले मशीन की आवाज सुनाई दी।

पीं।
पीं।
पीं।

फिर वह दिखी।

एक छोटी-सी बच्ची, सफेद टोपी में, नाक के पास पतली नली लगी हुई, दोनों मुट्ठियां बंद, जैसे पूरी दुनिया से कह रही हो कि अभी हार नहीं मानेगी। उसकी त्वचा हल्की पीली थी, होंठों पर नीला-सा साया था, लेकिन आंखें… आंखें ऐसी शांत थीं जैसे किसी पुराने मंदिर का दीपक तूफान में भी जल रहा हो।

अनन्या धीरे से पालने के पास गई।

“हाथ मत लगाइए,” नर्स ने कहा।

अनन्या रुक गई।

तभी बच्ची ने आंखें खोलीं।

कुछ पल के लिए उसने अनन्या को देखा। फिर होंठ हल्के से हिले। वह मुस्कान नहीं थी, शायद सांस का कंपन था, शायद थकान थी, शायद कुछ भी नहीं।

पर अनन्या के लिए वह पूरी जिंदगी थी।

“आस्था,” उसने फुसफुसाया।

संगीता ने तुरंत कहा, “मैडम, अभी नाम रखने का अधिकार…”

“मैं कागज की बात नहीं कर रही,” अनन्या की आवाज भर्रा गई, “मैं उसकी बात कर रही हूँ।”

क्योंकि वह यही थी। आस्था। टूटे शरीर में अटकी हुई एक जिद। दुनिया ने जिसे मृत्यु की प्रतीक्षा समझ लिया था, वह जीवन की सबसे छोटी, सबसे साहसी लौ थी।

उस दिन अनन्या उसे घर नहीं ले जा सकी। कोई अनुमति नहीं थी, कोई फाइल पूरी नहीं थी, कोई वादा संभव नहीं था। लेकिन जाते-जाते उसने पालने के पास झुककर कहा, “कल फिर आऊंगी।”

रात भर वह सोई नहीं। उसने 6 साल बाद बच्चे का कमरा खोला। धूल की परत उड़ी। पालना अब भी कोने में था। अलमारी में रखी पीली रजाई अब भी नई जैसी थी। उसने कपड़े निकाले, धुले हुए मुलायम तौलिए रखे, और एक कॉपी के पहले पन्ने पर लिखा—“आस्था की बातें।”

उसे दवाइयों का ज्ञान नहीं था। उसे नहीं पता था कि सांस कब टूटती है, नाड़ी कब गिरती है, रात भर मशीन की आवाज में माँ कैसे जागती है। उसे यह भी नहीं पता था कि किसी ऐसे बच्चे से कैसे प्रेम किया जाए, जिसे अगले मौसम तक देखने की गारंटी कोई डॉक्टर नहीं दे सकता।

लेकिन उसे एक बात पता थी।

वह बच्ची फिर कभी “तीसरे कमरे वाली” नहीं कहलाएगी।

अगली सुबह वह नैपी, एक पीली रजाई और छोटे चांदी के कड़े लेकर लौटी। उसके हाथ कांप रहे थे। वार्ड के बाहर बाल हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. मीरा खन्ना उसका इंतजार कर रही थीं।

“भावनाओं में बहने से पहले सच समझ लीजिए,” डॉक्टर ने कहा, “यह बच्ची शायद बच न पाए।”

अनन्या ने रजाई सीने से लगा ली।

उसी समय भीतर से बेहद छोटा, टूटा हुआ रोना उठा।

और अनन्या समझ गई कि लौट जाने का समय अब खत्म हो चुका था।

PART 2

नंदिनी ने सबसे पहले कहा कि अनन्या पागल हो गई है।

“दीदी, बच्चा गोद लेना अलग बात है, अस्पताल में मौत के इंतजार में माँ बनना अलग,” उसने फोन पर रोते हुए कहा।

अनन्या आस्था के पालने के पास बैठी थी। बच्ची की छोटी उंगली उसकी उंगली पकड़े हुए थी।

“मैं मौत का इंतजार नहीं कर रही,” अनन्या ने धीमे कहा, “मैं अपनी बेटी का साथ दे रही हूँ।”

“बेटी?” नंदिनी चुप हो गई।

वह जानती थी कि अनन्या कितनी बार टूटी थी। अगले दिन वह गुस्से में अस्पताल आई, पर जैसे ही आस्था ने आंखें खोलकर उसे ऐसे देखा जैसे जांच रही हो कि यह नई औरत भरोसे लायक है या नहीं, नंदिनी का चेहरा पिघल गया।

“अरे वाह,” उसने आंसू पोंछे, “नखरा तो पूरा माथुर परिवार वाला है।”

फिर दौड़ शुरू हुई—कागज, जांच, घर का निरीक्षण, मनोवैज्ञानिक सवाल, पैसों का हिसाब। हर टेबल पर एक ही वाक्य फेंका जाता, “आपको पता है, यह बच्ची कभी भी जा सकती है?”

अनन्या हर बार कहती, “इसीलिए तो जल्दी कीजिए।”

एक रात आस्था की सांस अचानक अटक गई। होंठ नीले पड़ गए। नर्सें दौड़ीं। अनन्या को दीवार से चिपका दिया गया।

उसने सिर्फ इतना कहा, “आस्था, मेरी आवाज पकड़ो।”

बच्ची की डरी हुई आंखें उसकी तरफ घूमीं।

और वह रुक गई।

सुबह डॉ. मीरा ने कहा, “सर्जरी तुरंत चाहिए, मगर कानूनी अभिभावक के बिना अनुमति उलझ जाएगी।”

अनन्या बाल कल्याण समिति के दफ्तर पहुंची।

“फाइल नहीं, बच्ची मर रही है,” उसने मेज पर हाथ रखकर कहा।

उसी शाम उसे अस्पताल-आधारित अस्थायी देखभाल की अनुमति मिली।

नर्स ने मुस्कुराकर कहा, “आस्था की माँ आ गई।”

अनन्या दरवाजे से टिक गई।

माँ।

और तभी संगीता का फोन आया।

“एक बात है,” उनकी आवाज भारी थी, “जन्म देने वाली माँ मिल गई है। वह आस्था को देखना चाहती है।”

PART 3

बाल कल्याण समिति के छोटे से कमरे में जाते हुए अनन्या के पैरों में जैसे जान नहीं थी।

आस्था उस दिन नंदिनी के पास थी। अनन्या ने जानबूझकर उसे साथ नहीं लाया था। वह नहीं चाहती थी कि उसकी बेटी उसके डर की धड़कन सुन ले। रास्ते भर उसकी आंखों के सामने एक ही दृश्य घूमता रहा—कोई औरत आकर कहेगी कि यह बच्ची उसकी है, फिर सारी रातें, सारे इंजेक्शन, सारी दुआएं, सारे नाम, सब एक फाइल में बदल जाएंगे।

कमरे में बैठी लड़की को देखकर उसका गुस्सा अचानक भटक गया।

वह मुश्किल से 20 साल की लगती थी। सस्ती सूती सलवार, घिसी हुई चप्पल, हाथ में कपड़े की थैली, आंखों के नीचे काले गड्ढे। उसका चेहरा उन लोगों जैसा था जो उम्र से नहीं, डर से बूढ़े होते हैं।

“आप अनन्या जी हैं?” लड़की ने उठते हुए पूछा।

अनन्या ने सिर हिलाया।

“मेरा नाम पायल है,” उसने कहा, और अगला ही पल रो पड़ी, “मैंने उसे इसलिए नहीं छोड़ा कि मैं उससे प्यार नहीं करती थी।”

अनन्या ने होंठ भींच लिए। उसके भीतर का एक हिस्सा चीखना चाहता था—तो फिर छोड़ा क्यों? वह 7 महीने तक बिना नाम के क्यों पड़ी रही? उसके होंठ नीले होते रहे और तुम कहाँ थीं?

पर पायल ने थैली इतनी कसकर पकड़ रखी थी कि उसकी उंगलियों के पोर सफेद हो गए थे।

“मैं अजमेर के पास के गांव से भागकर जयपुर आई थी,” पायल बोली, “जिस आदमी ने शादी का वादा किया था, उसने गर्भ का पता चलते ही मुझे छोड़ दिया। घर वालों ने कहा वापस आई तो जिंदा नहीं छोड़ेंगे। अस्पताल में जब डॉक्टर ने कहा कि बच्ची के दिल में बड़ा रोग है, पैसे लगेंगे, हर समय देखभाल चाहिए… मैं टूट गई।”

संगीता चुपचाप खड़ी थीं। कमरे में पुराना पंखा घूम रहा था, पर हवा भारी थी।

“मैंने उसे कूड़े में नहीं फेंका,” पायल ने जल्दी से कहा, जैसे अपनी आखिरी सफाई बचा रही हो, “मैंने उसे अस्पताल में छोड़ा। नर्स के हाथ में दिया। मैं चाहती थी वह जिए। मेरे साथ रहती तो शायद 2 दिन भी नहीं बचती।”

अनन्या का गुस्सा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। खत्म होना भी नहीं चाहिए था। एक बच्ची को छोड़ देना घाव था, और घाव को सिर्फ आंसू धो नहीं सकते। लेकिन उस गुस्से के नीचे पहली बार उसने एक और सच देखा—कभी-कभी अपराध और मजबूरी एक ही चेहरे पर खड़े मिलते हैं।

पायल ने थैली खोली। उसमें गुलाबी कपड़े का छोटा टुकड़ा था, कई बार धुला हुआ, किनारे से घिसा हुआ।

“यह उसके लिए खरीदा था,” पायल ने कहा, “पर अस्पताल में नहीं छोड़ा। डर लगा, मेरी गंध से वह और रोएगी।”

अनन्या की आंखें भर आईं। वह पायल को माफ नहीं कर रही थी, लेकिन उसे राक्षस भी नहीं कह पा रही थी।

“आप उसे देखना चाहती हैं?” संगीता ने पूछा।

पायल ने अनन्या की तरफ देखा। उस नजर में मांग कम, अपराध ज्यादा था।

अनन्या ने बहुत देर बाद कहा, “देख सकती हो। लेकिन उसे मैं गोद में रखूंगी।”

अगले दिन अस्पताल के एक शांत कमरे में मुलाकात हुई। आस्था हल्की पीली फ्रॉक में थी। उसकी नाक पर नली थी, छाती धीरे-धीरे उठ रही थी। अनन्या ने उसे अपने सीने से लगाया हुआ था।

पायल अंदर आई और दरवाजे पर ही रुक गई।

कुछ पल तक वह सिर्फ देखती रही। फिर उसके घुटने मुड़ गए। वह जमीन पर बैठ गई और दोनों हाथ मुंह पर रखकर रो पड़ी।

“वह जिंदा है,” उसने फुसफुसाया।

अनन्या ने आस्था को और कसकर पकड़ा।

“हाँ,” उसने कहा, “वह जिंदा है।”

पायल ने हाथ नहीं बढ़ाया। शायद उसे डर था कि छूते ही उसके भीतर की सारी दीवारें गिर जाएंगी। उसने बस दूर से अपनी बच्ची को देखा—वह बच्ची जिसे उसने बचाने की गलत, अधूरी, दर्दनाक कोशिश में छोड़ दिया था।

“मैं उसे वापस नहीं मांगूंगी,” पायल ने कहा, “मुझे पता है मैं उसके लायक नहीं हूँ। मैं बस चाहती हूँ… जब वह बड़ी हो, तो उसे मत कहना कि कोई उसे नहीं चाहता था। कहना कि उसकी पहली माँ कमजोर थी, पर पत्थर नहीं थी।”

अनन्या के गले में कुछ अटक गया।

उस दिन पायल ने कानूनी सहमति पर हस्ताक्षर किए। उसने अपना दावा छोड़ दिया, मगर अपना अपराध नहीं छोड़ा। जाते समय उसने गुलाबी कपड़ा अनन्या को दिया।

“इसे रख लीजिए। फेंकना चाहें तो फेंक दीजिए।”

अनन्या ने कपड़ा लिया।

“मैं नहीं फेंकूंगी,” उसने कहा, “आस्था की कहानी में दर्द होगा, लेकिन झूठ नहीं होगा।”

सर्जरी की तारीख 12 दिन बाद मिली। अस्पताल के बाहर चायवाले तक को पता चल गया था कि आस्था का ऑपरेशन है। नंदिनी प्रसाद लेकर आई। संगीता फाइल लेकर आईं। डॉ. मीरा ने पूरी टीम तैयार कर दी।

सुबह 6 बजे अनन्या को पहली बार आस्था को थोड़ा देर तक गोद में रखने दिया गया। बच्ची बहुत हल्की थी, जैसे सांस से बनी हो। उसने अपनी पीली रजाई में उसे लपेटा और कान में कहा, “देखो, तुम कोई बेचारी नहीं हो। तुम आस्था हो। तुम्हें लौटना है, क्योंकि मासी ने 3 दर्जन नैपी खरीद ली हैं और इतना खर्च बेकार जाना पाप है।”

डॉ. मीरा हल्का मुस्कुराईं, पर उनकी आंखों में चिंता साफ थी।

जब स्ट्रेचर अंदर गया, अनन्या ने हाथ जोड़ लिए। उसने भगवान से सौदेबाजी नहीं की। उसने यह नहीं कहा कि बच्ची बच गई तो वह व्रत रखेगी, दान करेगी, मंदिर जाएगी। उसने सिर्फ कहा, “उसे अकेला मत छोड़ना। चाहे मेरी आवाज वहां तक न पहुंचे, किसी तरह उसे बता देना कि मैं बाहर हूँ।”

ऑपरेशन 5 घंटे चला। हर मिनट दीवार पर टिक-टिक करता रहा। नंदिनी चुपचाप मंत्र पढ़ती रही। संगीता पहली बार अधिकारी नहीं, परिवार जैसी लग रही थीं। पायल नहीं आई थी, पर उसने संगीता को संदेश भेजा था—“उसके लिए दुआ कर रही हूँ।”

जब डॉ. मीरा बाहर आईं, उनके चेहरे पर थकान थी।

“ऑपरेशन हो गया,” उन्होंने कहा, “अगले 48 घंटे बहुत कठिन हैं। लेकिन अभी वह हमारे साथ है।”

अनन्या वहीं बैठ गई। रोना उसके भीतर से ऐसे फूटा जैसे बरसों से बंद कुआं भरकर बह निकला हो।

आस्था ने 48 घंटे लड़े। फिर 72 घंटे। फिर 10 दिन। फिर एक सुबह उसने आंखें खोलीं और अनन्या की उंगली पकड़ ली। इतनी कमजोर पकड़ थी कि कोई और शायद महसूस भी न करे, पर अनन्या के लिए वह हस्ताक्षर था—मैं लौट आई।

कुछ महीनों बाद आस्था पहली बार अनन्या के घर आई।

मालवीय नगर की वह बंद कमरा खुला। नीले पर्दे धोकर फिर लगाए गए। पालना साफ हुआ। दीवार पर छोटी-सी घंटी टांगी गई। गैस के पास दवाइयों की सूची चिपकी। फ्रिज पर ऑक्सीजन की सावधानियां, डॉक्टर के नंबर और खिलाने का समय लिखा गया। घर अब अस्पताल जैसा भी था और मंदिर जैसा भी।

पहली रात अनन्या सोई नहीं। वह कुर्सी पर बैठी आस्था की सांस सुनती रही। कभी छाती गिनती, कभी होंठों का रंग देखती, कभी डरती कि कहीं खुशी से लापरवाह न हो जाए। सुबह 4 बजे नंदिनी ने उठकर कहा, “दीदी, तुम 10 मिनट सो जाओ।”

अनन्या ने सिर हिलाया।

“मैं सोऊंगी तो यह कैसे जानेगी कि मैं यहीं हूँ?”

नंदिनी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“बच्चे माँ की नींद से नहीं, माँ की मौजूदगी से सुरक्षित होते हैं। और तुम तो दीवारों में भी मौजूद हो गई हो।”

गोद लेने का अंतिम आदेश आने में लगभग 1 साल लगा। अदालत की छोटी-सी कक्ष में उस दिन नंदिनी ने पीली मिठाई का डिब्बा दबा रखा था। संगीता पीछे खड़ी थीं। डॉ. मीरा नहीं आ सकीं, पर उन्होंने सुबह संदेश भेजा था, “मेरी छोटी योद्धा को आशीर्वाद।”

आस्था ने हल्के पीले रंग की फ्रॉक पहनी थी। उसकी छाती की पतली रेखा अब सूखकर चमकती हुई निशान बन चुकी थी। वह जज की मेज पर रखी घंटी को घूर रही थी, जैसे मौका मिले तो बजा दे।

जज ने फाइल पढ़ी।

“बच्ची का नाम?”

अनन्या ने सीधा होकर कहा, “आस्था अनन्या माथुर।”

जज ने मुस्कुराकर दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।

“आज से यह आपकी कानूनी पुत्री है।”

अनन्या ने आस्था को देखा। बच्ची अपने पैर से जूता उतारने में व्यस्त थी।

“यह तो पहले दिन से मेरी बेटी थी,” अनन्या ने धीमे कहा, “आज कागज को भी समझ आ गया।”

मगर जीवन किसी फिल्म की तरह एक आदेश पर आसान नहीं हुआ। अगले 5 सालों में 2 और छोटे ऑपरेशन हुए। कई रातें आपातकालीन वार्ड में बीतीं। जन्मदिन कभी घर पर, कभी अस्पताल के कमरे में मनाए गए। केक पर मोमबत्ती कम और दवाइयों की शीशियां ज्यादा दिखतीं। आस्था को दवा पिलाने के लिए केले में छिपाना पड़ता, खिचड़ी में मिलाना पड़ता, कभी कहानी बनानी पड़ती कि यह सुपरहीरो का रस है।

वह कमजोर थी, पर शांत नहीं। उसने बोलना शुरू किया तो पहला शब्द “रोटी” था।

नंदिनी ने इस बात पर महीनों अनन्या को चिढ़ाया।

“देखा, माँ से पहले खाना। यही सच्ची भारतीय बेटी है।”

फिर एक शाम जब अनन्या रसोई में बर्तन धो रही थी, पीछे से छोटी आवाज आई, “माँ।”

स्टील का गिलास हाथ से छूटकर गिर गया। आस्था हंस पड़ी, जैसे उसने दुनिया का सबसे मजेदार खेल खोज लिया हो।

उस दिन अनन्या ने महसूस किया कि कुछ शब्द जन्म प्रमाणपत्र से नहीं मिलते। वे अचानक आते हैं और आदमी को भीतर से नया बना देते हैं।

आस्था धीरे-धीरे बड़ी हुई। स्कूल में वह खेल के मैदान में सबसे तेज नहीं दौड़ती थी, लेकिन सबसे ज्यादा आदेश देती थी। अपनी छाती के निशान को वह “बिजली की रेखा” कहती थी। जब किसी बच्चे ने पूछा कि यह क्या है, उसने गर्दन उठाकर कहा, “सुपरहीरो बनने की फीस।”

अनन्या हंसते-हंसते रो पड़ी।

हर साल उसके जन्मदिन पर वे अस्पताल जाते। शिशु वार्ड में फल देते, नर्सों को मिठाई खिलाते, डॉ. मीरा को फूल देते। आस्था जानती थी कि वह वहाँ बहुत छोटी थी, बीमार थी, और माँ उसे देखने आई थी। पूरी कहानी उसे अभी नहीं बताई गई थी। कुछ सच बच्चों की उम्र देखकर धीरे-धीरे दिए जाते हैं, जैसे गर्म दूध फूंककर पिलाया जाता है।

एक दिन, जब आस्था 8 साल की थी, वे रसोई में सूजी का हलवा बना रही थीं। बाहर सावन की बारिश थी। आस्था ने अचानक पूछा, “जब मैं छोटी थी, तब कोई मुझे चाहता नहीं था क्या?”

अनन्या का हाथ रुक गया। चम्मच कड़ाही में ठहर गया।

उसने गैस धीमी की, फिर आस्था के सामने घुटनों के बल बैठ गई।

“नहीं, मेरी जान,” उसने बहुत संभलकर कहा, “लोग डर गए थे। कुछ लोग समझ नहीं पाए कि इतने छोटे दिल को कैसे संभालें। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम चाहने लायक नहीं थीं।”

आस्था ने माथा सिकोड़कर पूछा, “तो आपने कैसे समझा?”

अनन्या मुस्कुराई, आंखें भीगती हुईं।

“मैंने भी समझना सीखा। तुमने सिखाया।”

आस्था ने अपनी हथेली छाती पर रखी।

“अगर मेरा दिल बंद हो गया तो?”

वह सवाल कमरे में बिजली की तरह गिरा। इतने साल बाद भी यह डर कहीं गया नहीं था। बस घर के कोने में चुप बैठना सीख गया था।

अनन्या ने उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

“आज तुम्हारा दिल धक-धक कर रहा है। आज उसे हलवा चाहिए। आज उसे बारिश सुननी है। हम आज को जीते हैं, ठीक है?”

आस्था ने कुछ पल सोचा।

“आज को जीते हैं,” उसने दोहराया।

वह उनकी पंक्ति बन गई।

जब रिपोर्ट अच्छी आती—आज को जीते हैं।
जब डॉक्टर भौंहें सिकोड़ते—आज को जीते हैं।
जब आस्था ज्यादा नाचकर थक जाती—आज को जीते हैं।
जब रात को डरकर पूछती, “माँ, वही बेसुरी लोरी सुनाओ”—आज को जीते हैं।

वह लोरी सच में बेसुरी थी। अनन्या ने पहली बार अस्पताल में उसे गाया था, जब आस्था को थोड़ी देर गोद में लेने दिया गया था। शब्द भी ठीक नहीं थे, सुर भी नहीं, पर वही उनका पहला घर था।

कभी-कभी अनन्या सोचती, अगर उस दिन उसने गलियारे में वह वाक्य न सुना होता तो क्या होता। शायद वह फॉर्म लेकर लौट आती। शायद बच्चे का कमरा फिर बंद रहता। शायद वह सुरक्षित जीवन जीती, जिसमें दुख कम और अर्थ भी कम होता।

आस्था ने उसे सिखाया कि माँ होना गारंटी का नाम नहीं है।

माँ होना उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करना है जिसमें भविष्य धुंधला हो।
माँ होना मशीन की आवाज में सांस पहचानना है।
माँ होना दफ्तरों से लड़ना, डॉक्टरों पर भरोसा करना और डर के बावजूद मुस्कुराना है।
माँ होना आधा किलो वजन बढ़ने पर लड्डू बांटना है।
माँ होना यह समझना है कि नाजुक जिंदगी कम कीमती नहीं होती।

एक रात आस्था ने सोते-सोते पूछा, “माँ, आपने मुझे पहली बार कब चुना था?”

अनन्या ने उसके बाल सहलाए।

“जब तुमने मुझे देखा था।”

“मैंने क्या किया था?”

“बस आंखें खोली थीं।”

“इतना काफी था?”

अनन्या ने झुककर उसके माथे को चूमा।

“कभी-कभी पूरी जिंदगी बदलने के लिए बस इतना ही काफी होता है।”

आस्था मुस्कुराई।

“मैं आपको ढूंढ रही थी क्या?”

अनन्या की आंखें भर आईं।

“शायद। और शायद मैं भी तुम्हें ढूंढ रही थी।”

कमरे में पीली रात की रोशनी थी। खिड़की के बाहर बारिश रुक चुकी थी। आस्था की सांस धीमी और साफ चल रही थी। अनन्या दरवाजे पर खड़ी होकर उसे सुनती रही, जैसे वह अब भी अस्पताल के उस वार्ड में हो, जहां कोई उसे नाम से नहीं बुलाता था।

एक समय था जब लोग कहते थे कि वह बच्ची किसी भी रात चली जाएगी।

आज वही बच्ची सुबह उठकर स्कूल की बोतल ढूंढती है, हलवा मांगती है, अपनी मासी से बहस करती है, और अपनी छाती की रेखा को बिजली कहकर दुनिया को चुनौती देती है।

वह तीसरे कमरे की बच्ची नहीं है।

वह आस्था है।

अनन्या की बेटी।

और जब तक उसके छोटे दिल की धक-धक चलती रहेगी, चाहे धीमी, चाहे कांपती, चाहे डर से भरी, दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े रहेंगी।

आज को जीते हुए।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.