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गर्भवती पत्नी को मरा समझकर कब्र में छोड़ आया पति, मगर 5 भेड़ियों ने उसे बचा लिया; जब वह कंपनी लौटी तो उसने पूछा, “क्या मेरी मौत की कीमत आधी संपत्ति थी?” और सच सामने आते ही पूरा घर कांप उठा…

PART 1

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अगर कोई औरत आधी रात को अपनी ही कब्र से जागे और 5 भेड़िए उसे घेरकर खड़े हों, तो शायद उसे चीखना नहीं चाहिए, क्योंकि हो सकता है वही जानवर उसके आखिरी रक्षक हों।

नंदिनी मल्होत्रा ने जब आंखें खोलीं, तो उसके मुंह में गीली मिट्टी भरी थी। सांस लेते ही मिट्टी गले में अटक गई। पेट में तेज ऐंठन उठी। हाथों पर खरोंचें थीं, माथे से पसीना और मिट्टी चिपकी हुई थी, और पैर घुटनों तक जमीन में दबे थे। ऊपर अरावली की सूखी पहाड़ियों के बीच आधा चांद लटका था। उसके चारों तरफ 5 बड़े भारतीय भेड़िए घूम रहे थे।

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सबसे बड़ा भेड़िया उसके पास आया। नंदिनी ने आंखें बंद कर लीं। उसे लगा अब दांत उसकी गर्दन में धंस जाएंगे। लेकिन भेड़िए ने उसकी हथेली सूंघी, फिर धीरे से जीभ फेर दी। बाकी भेड़िए कब्र जैसे गड्ढे के किनारे बैठ गए, जैसे किसी को पास आने से रोक रहे हों।

नंदिनी रो पड़ी।

उसके दिमाग में आखिरी याद जयपुर से दूर एक फार्महाउस की थी। पति राघव ने कहा था, “हमें रिश्ते को नया मौका देना चाहिए।” पीतल की थाली में खाना था, केसर वाला दूध था, बाहर अलाव जल रहा था। शादी के 9 साल बाद पहली बार राघव इतना नरम दिखा था। फिर अचानक कमरा घूमने लगा। उसके बाद अंधेरा।

“राघव…” उसने मिट्टी थूकते हुए कहा। “तुम कहां हो?”

तभी पेड़ों के पीछे से लालटेन की रोशनी हिली।

“बादल! धुआं! पीछे हटो!” एक भारी बूढ़ी आवाज आई।

एक सफेद दाढ़ी वाला आदमी आया। खाकी रंग की पुरानी जैकेट, कंधे पर झोला, हाथ में लाठी। उसकी आंखें डराने वाली नहीं, थकी हुई थीं।

“हे भगवान…” उसने गड्ढे में झांका। “बिटिया, तुझे किसने जिंदा गाड़ दिया?”

वह भैरव सिंह था। कभी राजस्थान पुलिस में था, फिर वन विभाग के साथ काम किया। बरसों पहले शिकारियों ने एक मादा भेड़िए को मार दिया था। उसके 5 बच्चों को भैरव ने पाला था। लोग उन्हें दरिंदा कहते थे, पर भैरव कहता था, “जानवर भूख से मारते हैं, इंसान लालच से।”

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वह नंदिनी को खींचकर बाहर लाया। उसके पैर कांप रहे थे। भेड़िए उसके चारों तरफ चलते रहे। भैरव उसे पहाड़ी के नीचे अपनी कच्ची चौकी में ले गया, पानी दिया, कंबल ओढ़ाया, नब्ज टटोली।

उसका चेहरा बदल गया।

“तुझे कोई नशीली चीज दी गई है,” उसने कहा। “और एक बात… शायद तू मां बनने वाली है।”

नंदिनी के हाथ से गिलास गिर गया। वह 9 साल से बच्चे के लिए मंदिरों, डॉक्टरों और दुआओं के बीच टूटती रही थी।

लेकिन उसी पल उसे राघव की मुस्कान याद आई, दूध का गिलास याद आया, और मिट्टी का अंधेरा भी।

जिस आदमी के नाम का सिंदूर वह हर सुबह लगाती थी, शायद उसी ने उसे जिंदा दफन किया था।

और असली डर यह था कि उसने ऐसा क्यों किया, यह अभी बाकी था।

PART 2

भैरव सिंह ने उसे 6 दिन तक बाहर नहीं जाने दिया।

“पहले सांस वापस ला, फिर जंग लड़ना,” वह कहता।

नंदिनी चुप रहती, पर भीतर आग जलती रहती। जयपुर में उसकी अपनी टेक्सटाइल एक्सपोर्ट कंपनी थी, जिसे उसने पिता की मौत के बाद 24 की उम्र में संभाला था। राघव सिर्फ नाम का निदेशक था। महंगी घड़ियां, क्लब, रिसॉर्ट, और हाल में किसी और औरत की खुशबू—नंदिनी सब महसूस करती थी, पर भरोसा टूटने से डरती थी।

7वें दिन वह कंपनी पहुंची।

गार्ड का चेहरा पीला पड़ गया। “मैडम… आप जिंदा हैं?”

रिसेप्शन पर उसकी सेक्रेटरी मीरा रोते हुए बोली, “सर ने कहा था आप एक्सीडेंट में चली गईं। वह नई मैडम को आपकी कुर्सी पर बैठाने वाले थे।”

नंदिनी अपने केबिन में बैठी ही थी कि राघव अंदर घुसा। उसे देखकर वह दरवाजे से टिककर नीचे बैठ गया।

“मैंने जहर नहीं दिया,” वह हकलाया। “मैंने समझा तुम मर गई हो। डर गया था।”

“इसलिए मुझे कब्र में डाल दिया?”

उसने सिर झुका लिया। प्रेमिका, तलाक, आधी संपत्ति—सब कबूल किया। पर जहर से इंकार करता रहा।

तभी मीरा ने धीरे से कहा, “मैडम, फार्महाउस से पहले वाले दिन विक्रम सर ने आपकी चाय खुद बनाई थी।”

कंपनी के सीसीटीवी खुले।

स्क्रीन पर साफ दिखा—विक्रम माथुर, उसका सबसे भरोसेमंद मैनेजर, नंदिनी की चाय में सफेद पाउडर मिला रहा था।

और उसी शाम एक और राज खुला—नंदिनी सचमुच गर्भवती थी।

PART 3

विक्रम माथुर की गिरफ्तारी ने पूरे जयपुर को हिला दिया। वही विक्रम, जो हर मीटिंग में नंदिनी को “मैडम, आप मेरी प्रेरणा हैं” कहता था। वही आदमी पुलिस की मेज पर बैठा तो उसकी आंखों में पछतावा नहीं, नफरत थी।

“क्यों?” नंदिनी ने पूछा।

विक्रम हंसा नहीं। उसकी मुस्कान ज्यादा खतरनाक थी।

“आपने मेरे पिता को चोर कहा था।”

नंदिनी के चेहरे पर दर्द तैर गया। “तुम्हारे पिता कंपनी से कपड़ा बाहर बेचते पकड़े गए थे। मजदूरों की तनख्वाह रोकी थी उन्होंने। मैंने उन्हें 3 मौके दिए थे।”

“उनकी इज्जत गई। शराब में डूबे। सड़क पर मर गए। आप अपने बंगले में रहती रहीं।”

“तो तुमने मुझे मारने की कोशिश की?”

“आपको सोता हुआ देखना चाहता था। कमजोर। मिट्टी में।”

नंदिनी ने पेट पर हाथ रखा। “तुमने सिर्फ मुझे नहीं मारा होता। मेरे बच्चे को भी मार देते।”

विक्रम की आंखें पहली बार कांपीं। “मुझे पता नहीं था।”

“लालच और बदले को गर्भ की खबर नहीं चाहिए होती,” नंदिनी ने ठंडे स्वर में कहा।

राघव को जिंदा शरीर छिपाने, मदद न बुलाने और साजिश छुपाने के अपराध में सजा मिली। विक्रम पर हत्या के प्रयास का मुकदमा चला। अखबारों ने कई दिन तक लिखा—“व्यवसायी महिला को जिंदा दफनाया गया।” पर नंदिनी को सुर्खियों से ज्यादा डर उस घर से लगने लगा था, जहां दीवारें अब भी राघव की परछाईं संभाले थीं।

भैरव सिंह जयपुर आया। वह पहले दिन से बोला, “तेरे चारों तरफ सूट-बूट वाले भेड़िए थे। असली भेड़िए तो उस रात पहरा दे रहे थे।”

नंदिनी ने उसे अपने घर और कंपनी की सुरक्षा संभालने को कहा। भैरव ने मना किया, फिर उसके चेहरे की थकान देखकर मान गया।

“ठीक है, बिटिया। जब तक तू बच्चा जन्म न दे, मैं तेरे दरवाजे पर खड़ा रहूंगा।”

घर में नई व्यवस्था शुरू हुई। पुराने नौकर हटाए गए। कागज जांचे गए। दरवाजों पर कैमरे लगे। नंदिनी ने सोचा अब खतरा बाहर रह जाएगा।

लेकिन धोखा इस बार दरवाजे की घंटी बजाकर अंदर आया।

उसका नाम कविता था। वह खुद को घरेलू सहायिका बताती थी। उम्र 28 के आसपास, चेहरे पर मीठी मुस्कान, हाथ में सस्ती फाइल, आवाज में दुख की आदत।

“मैडम, पति छोड़कर चला गया। काम चाहिए। खाना बना दूंगी, झाड़ू-पोंछा कर दूंगी। आप गर्भवती हैं, आपको आराम चाहिए।”

नंदिनी ने बिना ज्यादा पूछताछ के रख लिया। भैरव ने उसी शाम कहा, “उसकी आंखें कमरे नहीं, ताले गिन रही थीं।”

नंदिनी मुस्कुरा दी। “आप हर किसी पर शक करते हैं।”

“इसीलिए जिंदा हूं,” भैरव ने जवाब दिया।

कुछ दिन सब ठीक चला। कविता हल्का खाना बनाती, नारियल पानी रखती, दवाइयों का डिब्बा सजा देती। लेकिन जब भी भैरव सामने आता, उसके हाथ थोड़े कांपते। एक बार भैरव ने उसे पूजा-घर के पास फोन पर फुसफुसाते पकड़ा। वह बोली, “बहन से बात कर रही थी।” भैरव ने कुछ नहीं कहा, पर उस रात उसने स्टोररूम में एक छोटा कैमरा लगा दिया।

उसी बीच नंदिनी की जिंदगी में एक और मोड़ आया।

एक शाम वह डॉक्टर से लौट रही थी, जब सिग्नल के पास उसने 10 साल के बच्चे को देखा। धूल से भरे बाल, फटी शर्ट, और उसके पास एक दुबली-सी कुतिया, जो हर आती गाड़ी पर भौंकती थी। बच्चा फूल बेच रहा था। एक आदमी आया, उसकी मुट्ठी से पैसे छीन लिए और धक्का देकर बोला, “आज कम कमाया है।”

कुतिया ने आदमी की पैंट पकड़ ली। उसने लात मारी। नंदिनी गाड़ी से उतर गई।

“हाथ मत लगाना उसे!”

आदमी भीड़ देखकर भाग गया। बच्चा नाक से खून पोंछ रहा था।

“नाम क्या है?” नंदिनी ने पूछा।

“कबीर,” उसने कहा। “और यह बिजली है। काटती नहीं… जब तक कोई बदतमीज न हो।”

नंदिनी उसे क्लिनिक ले गई। डॉक्टर ने कहा, बच्चा कुपोषित है, पुराने घाव हैं। कबीर ने बताया कि मां मर चुकी है। पिता को लोग “गायब” कहते हैं। वह एक संस्था से भागा था, जहां बड़े बच्चे रात में छोटे बच्चों का खाना छीनते थे।

“मेरे साथ चलोगे?” नंदिनी के मुंह से अचानक निकला।

कबीर ने शक से पूछा, “काम क्या करना पड़ेगा?”

“मेरे बगीचे में गिलहरियां गिनना।”

“उसकी तनख्वाह?”

“खाना, बिस्तर, स्कूल और रविवार को जलेबी।”

कबीर ने बिजली को देखा। बिजली ने पूंछ हिलाई।

“ठीक है,” उसने कहा। “पर बिजली भी आएगी।”

घर में पहली बार हंसी लौटी। कबीर ने भैरव को पहले दिन “दादू” कहा और भैरव की आंखें भर आईं। बिजली ने 5 दिन तक किसी को अपने पास नहीं आने दिया, फिर रात को नंदिनी के दरवाजे के बाहर सोने लगी।

कबीर चालाक था। सड़क ने उसे जल्दी बड़ा कर दिया था। वह घर के चेहरे पढ़ना जानता था। एक दोपहर वह दौड़ता हुआ भैरव के पास आया।

“दादू, कविता दीदी मैडम के कमरे में थीं। फाइलों की फोटो ले रही थीं। और तिजोरी में नंबर लगा रही थीं।”

भैरव ने उसी शाम कैमरा चेक किया। स्क्रीन पर कविता थी—अलमारी खोलती हुई, फाइलें निकालती हुई, मोबाइल से तस्वीरें खींचती हुई। फिर उसने तिजोरी पर 3 बार गलत पासकोड डाला।

नंदिनी ने उसे बुलाया।

“कविता, किसे भेज रही थी ये कागज?”

कविता का चेहरा उतर गया। कुछ पल तक वह रोने का अभिनय करती रही, फिर अचानक बोली, “वह पैसा राघव जी का भी है। उन्होंने कहा था आपकी जगह मुझे मिलेगी। उन्होंने मुझसे शादी का वादा किया था।”

कमरा जम गया।

“तुम वही हो?” नंदिनी ने धीमे से पूछा। “राघव की प्रेमिका?”

कविता की आंखों में जलन थी। “आपके पास सब था। पैसा, नाम, घर। उन्हें कभी इज्जत नहीं दी आपने।”

“मैंने उन्हें मुफ्त की कुर्सी दी थी,” नंदिनी की आवाज कठोर हो गई। “इज्जत कमानी पड़ती है। और तुम प्रेमिका नहीं, किसी औरत की कब्र पर महल बनाने वाली साझेदार थीं।”

भैरव पुलिस बुलाना चाहता था। मगर नंदिनी ने कविता को सिर्फ निकाल दिया।

“कभी वापस आई,” उसने कहा, “तो कानून दरवाजा खोलेगा।”

भैरव नाराज था। “जहर छोड़ोगी तो वह फिर फैलेगा।”

नंदिनी ने थके हुए स्वर में कहा, “मैं हर दिन अदालत नहीं जी सकती। मुझे अपना बच्चा बचाना है।”

पर भैरव ने अपनी खोज नहीं छोड़ी। कबीर की बातों में उसे कई टुकड़े मिले—एक पुराना नाम, “इमरती वाली गली”, एक मजदूर ठेकेदार, और पिता की कलाई पर त्रिशूल का निशान। 3 हफ्ते बाद भैरव ने पता लगा लिया कि कबीर का पिता जिंदा है।

नाम था आदित्य रावत। वह हरियाणा की सीमा पर एक पुनर्वास केंद्र में था। अवैध पत्थर खदान में हादसा हुआ था, रीढ़ की चोट से सालों तक बिस्तर पर पड़ा रहा। पत्नी को बोझ न बनने की जिद में उसने कोई खबर न भेजी। उसे यह भी नहीं पता था कि पत्नी बीमारी से मर गई और उसका बेटा सड़क पर आ गया।

कबीर जब कमरे में दाखिल हुआ, आदित्य ने उसे देखते ही रोना शुरू कर दिया।

“कबीर…”

बच्चा कुछ पल जड़ खड़ा रहा। फिर दौड़कर उसके सीने से लग गया। “पापा, आप भागे क्यों?”

आदित्य का शरीर कमजोर था, पर रोना मजबूत। “मैं शर्म से मर गया था बेटा। सच में नहीं, अंदर से।”

नंदिनी ने उसका इलाज अपने खर्च पर करवाया। डॉक्टरों ने कहा, सर्जरी और लंबी फिजियोथेरेपी से वह सहारे के साथ चल सकता है।

कागजी कार्रवाई के दौरान भैरव ने आदित्य की पुरानी फाइल देखी। उसमें एक धुंधली तस्वीर थी—एक जवान औरत, गोद में 2 साल का बच्चा, पीछे सेना कैंप जैसा बैकग्राउंड।

भैरव का हाथ कांप गया।

“यह औरत कौन है?”

आदित्य ने कहा, “मेरी मां, सुहासिनी। कहती थीं मेरे पिता सीमा पर शहीद हो गए। मेरे पास बस यही फोटो है।”

भैरव कुर्सी पर बैठ गया। उसके होंठ सूख गए।

“मैं शहीद नहीं हुआ था,” उसने फुसफुसाया। “मैं घायल होकर महीनों अस्पताल में पड़ा रहा। जब लौटा, तेरी मां अपना गांव छोड़ चुकी थी। मैंने बहुत खोजा… बहुत।”

आदित्य ने उसे देखा। कमरे में जैसे हवा रुक गई।

“आप…?”

भैरव की आंखों से आंसू बह निकले। “मैं तेरा बाप हूं, बेटा।”

कबीर ने दोनों को देखा। फिर धीरे से बोला, “तो दादू सच में दादू हैं?”

कोई हंस नहीं पाया। तीनों रोते रहे। नंदिनी दरवाजे पर खड़ी थी, पेट पर हाथ रखे। उसे लगा जैसे वह रात, वह कब्र, वह मिट्टी सिर्फ मौत नहीं थी। वह किसी छिपे हुए परिवार की ओर खुलने वाला अंधेरा दरवाजा था।

महीनों बाद घर बदल चुका था।

आदित्य बैसाखी के सहारे चलना सीख रहा था। कबीर स्कूल जाने लगा। बिजली बरामदे की रानी बन चुकी थी। भैरव हर महीने अरावली की चौकी जाता और 5 भेड़ियों को खाना देता। कभी-कभी नंदिनी भी जाती। वही जगह, वही मिट्टी, पर अब वहां डर नहीं, कृतज्ञता थी।

राघव की अपील खारिज हो गई। विक्रम को लंबी सजा मिली। कविता ने एक बार धमकी भरा संदेश भेजा, लेकिन पुलिस नोटिस के बाद गायब हो गई। नंदिनी ने कंपनी में महिलाओं के लिए सुरक्षा कोष बनाया और कबीर जैसे बच्चों की पढ़ाई के लिए ट्रस्ट खोला।

सर्दियों की एक सुबह, अस्पताल के प्रसूति कक्ष के बाहर सब बेचैन थे। भैरव राम-नाम की माला फेर रहा था। कबीर बिजली की फोटो मोबाइल में दिखाकर नर्सों को हंसा रहा था। आदित्य दीवार पकड़कर खड़ा था।

अंदर से नवजात के रोने की आवाज आई।

नर्स बाहर आई। “बेटी हुई है।”

भैरव ने दोनों हाथ जोड़ लिए। कबीर उछल पड़ा। आदित्य की आंखें भीग गईं।

जब नंदिनी को कमरे में लाया गया, बच्ची गुलाबी कंबल में लिपटी थी। नंदिनी ने थकी हुई मुस्कान के साथ कहा, “इसका नाम आशा होगा।”

कबीर ने पूछा, “क्यों?”

नंदिनी ने बच्ची को सीने से लगाया। “क्योंकि जब जिंदगी मिट्टी में दबा दे, तब भी कहीं न कहीं कोई सांस बची रहती है।”

भैरव ने बच्ची के माथे को छुआ। बाहर सर्द धूप खिड़की से भीतर आ रही थी।

नंदिनी ने आंखें बंद कीं। उसे वह रात याद आई—मिट्टी, चांद, 5 भेड़िए, और मौत की गंध। फिर उसने कमरे में खड़े चेहरों को देखा—एक बूढ़ा जो पिता निकला, एक बच्चा जो परिवार बना, एक टूटा आदमी जो फिर चलना सीख रहा था, और उसकी गोद में एक नई धड़कन।

उसने समझ लिया था कि खून से रिश्ते शुरू हो सकते हैं, लेकिन परिवार वहां बनता है जहां कोई तुम्हें मिट्टी से निकालकर कहे—

अब डर मत, तू अकेली नहीं है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.