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गर्भवती पत्नी की चिता सज चुकी थी, परिवार अंतिम संस्कार की जल्दी में था, तभी पति ने काँपते हुए कहा “ताबूत खोलो, वह जिंदा है” और सफेद कपड़े के नीचे हुई हलचल ने माँ और भाई की साजिश सबके सामने खोल दी

PART 1

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“अगर इस चिता को आग लगी, तो आप लोग मेरी पत्नी और मेरी बेटी को जिंदा जला देंगे।”

नीरज की आवाज़ दिल्ली के निगमबोध घाट के उस ठंडे, धुएँ से भरे कमरे में गूँज गई। बाहर यमुना के किनारे हल्की बारिश हो रही थी, भीतर गीली लकड़ियों, अगरबत्ती और जलते घी की मिली-जुली गंध साँस रोक रही थी।

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सामने सफेद कपड़े में ढका काँच वाला ताबूत रखा था।

उसमें थी अनन्या।

उसकी पत्नी।

7 महीने की गर्भवती।

वही हल्का गुलाबी सूट पहने हुए, जिसे उसने कुछ दिन पहले गोद भराई के लिए खरीदा था। माथे पर छोटी-सी बिंदी, हाथों में चूड़ियाँ, और पेट पर सफेद फूलों की माला। पर चेहरा ऐसा स्थिर था जैसे किसी ने उसकी साँस नहीं, उसकी पूरी कहानी रोक दी हो।

वर्मा परिवार कह रहा था कि अनन्या की मौत अचानक दिल रुकने से हो गई थी। वह दक्षिण दिल्ली की एक निजी क्लिनिक में थी। नीरज को खबर तब मिली, जब मृत्यु प्रमाणपत्र बन चुका था, शरीर घर पहुँच चुका था, और दाह-संस्कार का समय तय हो चुका था।

सब कुछ बहुत जल्दी हुआ था।

कोई बड़ा अस्पताल नहीं।

कोई दूसरा डॉक्टर नहीं।

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कोई पोस्टमार्टम नहीं।

कोई पुलिस सूचना नहीं।

सिर्फ डॉ. राजीव मेहता का हस्ताक्षर, जो वर्षों से वर्मा परिवार का भरोसेमंद डॉक्टर था, और सास सरोज वर्मा की ज़िद कि शाम 5 बजे से पहले अंतिम संस्कार हो जाना चाहिए।

सरोज वर्मा सफेद रेशमी साड़ी में खड़ी थीं। उनकी आँखों पर काला चश्मा था, पर गाल सूखे थे। पास ही अनन्या का भाई युवराज बार-बार अपनी महंगी घड़ी देख रहा था, जैसे बहन की मौत ने उसकी किसी कारोबारी बैठक में देरी कर दी हो।

—नीरज, अब तमाशा मत करो, —सरोज ने धीमे लेकिन कठोर स्वर में कहा। —अनन्या चली गई है। उसे शांति से जाने दो।

नीरज ने ताबूत की ओर देखा।

—मैं उसे आखिरी बार देखना चाहता हूँ।

—नहीं।

यह शब्द इतना जल्दी निकला कि कमरे में खड़े रिश्तेदार भी चौंक गए।

नीरज कोई बड़ा आदमी नहीं था। करोल बाग में उसके पिता की पुरानी गैराज थी, जिसे वह अब संभालता था। अनन्या वर्मा परिवार की बेटी थी, जिनके पास जयपुर से दिल्ली तक होटल, जमीन और आयात-निर्यात का कारोबार था। शादी के बाद भी सरोज ने उसे कभी दामाद नहीं माना, सिर्फ वह गलती माना जिसे अनन्या ने प्रेम कहकर चुना था।

युवराज आगे आया।

—अपनी औकात मत भूलो, नीरज। तूने हमारी बहन से शादी की थी, हमारे खानदान से नहीं।

नीरज की आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ लोहे जैसी हो गई।

—अगर वह सच में मर चुकी है, तो ताबूत खोलने से डर किस बात का है?

डॉ. मेहता पीछे खंभे के पास खड़े थे। उनका चेहरा पीला पड़ चुका था। माथे पर पसीना था, जबकि दिसंबर की शाम में हवा ठंडी थी।

सरोज ने कर्मचारियों को इशारा किया।

—चिता तैयार करो।

नीरज ने अपनी कोट की जेब से मुड़ा हुआ कागज़ निकाला।

—यह अनन्या का हस्ताक्षर किया हुआ मेडिकल अधिकार-पत्र है। गर्भावस्था की जटिलता के बाद उसने मुझे अपना कानूनी निर्णयकर्ता बनाया था। जब तक मैं शरीर की पुष्टि नहीं कर लेता, कोई अंतिम संस्कार नहीं होगा।

सरोज का चेहरा पहली बार हिला।

युवराज गुर्राया।

—यह कागज़ नकली है।

—तो पुलिस बुला लेते हैं, —नीरज बोला।

दो कर्मचारी रुक गए। एक बूढ़े पुजारी ने भी लकड़ियों पर रखा घी का कटोरा नीचे रख दिया।

कर्मचारियों ने काँपते हाथों से ताबूत का ढक्कन खोला।

अनन्या का चेहरा मोम जैसा था। होंठ हल्के नीले, पलकें बंद, हाथ पेट पर टिके हुए।

नीरज झुककर उसकी नाक के पास हाथ ले गया।

कुछ नहीं।

फिर अचानक सफेद कपड़े के नीचे उसका पेट हल्का-सा हिला।

बहुत छोटा-सा कंपन।

जैसे भीतर से किसी ने धीमे से दस्तक दी हो।

एक औरत चीखी।

नीरज जम गया।

फिर पेट दोबारा हिला।

इस बार साफ।

युवराज बिजली की तरह आगे बढ़ा।

—बंद करो इसे! अभी बंद करो!

पर नीरज ने उसका हाथ पकड़कर झटक दिया।

सरोज वर्मा की आँखों का चश्मा नीचे सरक गया। उनके चेहरे से सारा रंग उतर चुका था।

नीरज ने उसी पल समझ लिया।

अनन्या मरी नहीं थी।

और उसकी सास यह बात जानती थी।

PART 2

—कोई इस ताबूत को हाथ नहीं लगाएगा, —नीरज ने कहा।

उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, पर उसमें पहली बार वह डर नहीं था, जिसे वर्मा परिवार सालों से खरीदना चाहता था।

सरोज ने खुद को सँभालते हुए कहा।

—गर्भ में बच्चा कभी-कभी मृत्यु के बाद भी हलचल कर सकता है। यह शरीर की प्रतिक्रिया है।

—झूठ, —नीरज ने कहा। —इतनी सफाई से झूठ मत बोलिए।

डॉ. मेहता ने नज़र झुका ली।

नीरज ने 112 पर फोन किया। फिर उसने दूसरी कॉल की।

—इंस्पेक्टर मीरा चौहान, आपने सही शक किया था। ये लोग अंतिम संस्कार जल्दी करवाना चाहते थे। बच्ची हिली है।

दूसरी तरफ कुछ पल सन्नाटा रहा।

—शरीर वहीं है?

—हाँ।

—किसी को बाहर मत जाने देना।

युवराज ने सुन लिया।

—तूने पुलिस को बुलाया?

—हाँ। ऐसे लोगों को, जो तुम्हारे पैसे पर नहीं पलते।

2 हफ्ते पहले अनन्या ने नीरज को बताया था कि पिता की वसीयत बदली गई है। अगर वह और अजन्मा बच्चा जन्म से पहले मर जाएँ, तो वर्मा समूह के मुख्य हिस्से सरोज और युवराज के नाम चले जाएँगे। वह डरी हुई थी। उसने कुछ फाइलें, बैंक लेनदेन और रिकॉर्डिंग एक छोटी मेमोरी में छिपा दी थी।

—अगर मुझे कुछ हो जाए, —उसने कहा था, —मेरी माँ पर भरोसा मत करना।

तभी एंबुलेंस पहुँची। कर्मचारियों ने अनन्या को ताबूत से स्ट्रेचर पर रखा। एक पैरामेडिक ने मॉनिटर लगाया।

पहले तेज धड़कन सुनाई दी।

बच्ची की।

फिर दूसरी।

कमजोर।

धीमी।

पर जिंदा।

—पल्स है! —पैरामेडिक चिल्लाई।

दरवाजे पर इंस्पेक्टर मीरा चौहान 2 कॉन्स्टेबलों के साथ खड़ी थीं।

युवराज बाहर भागने को मुड़ा, पर मीरा ने रास्ता रोक लिया।

—युवराज वर्मा, बैठ जाइए।

—जानती हो मैं कौन हूँ?

—इसीलिए आई हूँ।

सरोज नीरज को घूर रही थी।

पहली बार उसे समझ आया कि गैराज वाले लड़के के पास सिर्फ आँसू नहीं, सबूत भी थे।

PART 3

अनन्या को सफदरजंग अस्पताल के आपातकालीन विभाग में ले जाया गया। वहाँ निजी क्लिनिक के डॉक्टरों की जगह सरकारी विशेषज्ञ, स्त्री-रोग चिकित्सक, फॉरेंसिक अधिकारी और पुलिस खड़े थे। उसकी नाड़ी बहुत कमजोर थी, रक्तचाप खतरनाक रूप से नीचे था, पर उसके भीतर 7 महीने की बच्ची ज़ोर से लड़ रही थी।

नीरज ऑपरेशन थिएटर के बाहर बैठा था। उसके हाथों पर अभी भी ताबूत के सफेद फूलों की गंध लगी थी। रिश्तेदार धीरे-धीरे गायब हो गए थे। जो कुछ घंटे पहले सरोज वर्मा के पीछे खड़े होकर नीरज को पागल कह रहे थे, अब पुलिस कैमरों से बचते हुए बाहर निकल रहे थे।

रात 2 बजे एक वरिष्ठ डॉक्टर बाहर आईं।

—माँ जिंदा है। हालत गंभीर है, पर हमने साँस स्थिर कर दी है। बच्ची भी अभी सुरक्षित है।

नीरज दीवार से टिककर नीचे बैठ गया। उसके मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। बस हाथ जुड़ गए।

उस रात पुलिस ने निजी क्लिनिक सील कर दी। डॉ. मेहता को हिरासत में लिया गया। क्लिनिक के रिकॉर्ड रूम से कई फाइलें गायब थीं, पर सर्वर में बची हुई प्रविष्टियों ने कहानी खोलनी शुरू कर दी। अनन्या को दिल का दौरा नहीं पड़ा था। उसे एक ऐसी दवा दी गई थी जो शरीर की गति और साँस को इतना धीमा कर सकती थी कि अधूरी जाँच में मौत समझ ली जाए। उसके मेडिकल रिकॉर्ड में समय बदला गया था। मृत्यु प्रमाणपत्र पहले तैयार हुआ था, मृत्यु बाद में घोषित की गई थी।

सुबह तक मामला मीडिया में था।

“गर्भवती बहू को जिंदा जलाने की कोशिश।”

यह वाक्य दिल्ली की हर स्क्रीन पर चमक रहा था।

सरोज वर्मा ने अपने वकीलों के साथ बयान दिया कि नीरज संपत्ति के लालच में परिवार को बदनाम कर रहा है। युवराज ने कहा कि बहन पहले से बीमार थी। डॉ. मेहता ने चुप्पी साध ली।

लेकिन चुप्पी ज़्यादा देर नहीं चली।

3 दिन बाद अनन्या ने आँखें खोलीं।

नीरज उसके बिस्तर के पास बैठा था। पुलिस सुरक्षा दरवाजे पर थी। उसके हाथ में वही लाल धागा बंधा था, जो अनन्या ने गर्भ के पहले महीने में मंदिर से लाकर बाँधा था।

अनन्या ने होंठ हिलाए।

—मेरी बच्ची?

नीरज की आँखें भर आईं।

—जिंदा है। तुम्हारी तरह ज़िद्दी है।

अनन्या की पलकों से आँसू बह निकले। वह कुछ देर तक छत देखती रही, फिर उसका चेहरा बदल गया। डर के नीचे दबा हुआ क्रोध धीरे-धीरे ऊपर आया।

—माँ कमरे में थी, —उसने फुसफुसाकर कहा। —मेहता ने इंजेक्शन लगाया। युवराज ने मेरे हाथ पकड़े। मैंने आवाज़ लगाई थी। माँ ने कहा था, “चुप रहो, अनन्या। अब बहुत देर हो चुकी है।”

नीरज के भीतर कुछ टूट गया।

—उन्होंने ऐसा क्यों किया?

अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।

—पापा की असली वसीयत मेरे पास थी।

अनन्या के पिता, महेंद्र वर्मा, की मृत्यु 8 महीने पहले हुई थी। वे कठोर आदमी थे, पर बेटी से प्रेम करते थे। उन्होंने अपने कारोबार का बड़ा हिस्सा अनन्या और उसके होने वाले बच्चे के लिए एक ट्रस्ट में रखा था। सरोज को जीवन भर की सुविधा दी थी, पर नियंत्रण नहीं। युवराज को व्यापार से हटाया गया था क्योंकि उसने कई खातों से पैसा निकाला था।

सरोज और युवराज ने नई वसीयत बनवाई थी। उसमें लिखा था कि अगर अनन्या और उसकी संतान जीवित न रहें, तो पूरा नियंत्रण उनके पास लौट आएगा। असली दस्तावेज़ छिपा दिए गए थे।

पर अनन्या ने अपने पिता की पुरानी अलमारी से असली प्रति ढूँढ ली थी। उसने बैंक लॉकर में कॉपी रखी। अपने मोबाइल में रिकॉर्डिंग चालू रखी। ड्राइवर रमेश को एक लिफाफा दिया। और नीरज के पुराने टूलबॉक्स में एक मेमोरी छिपा दी, क्योंकि वह जानती थी कि उसकी माँ कभी गैराज की ग्रीस लगी चीज़ों को हाथ नहीं लगाएगी।

नीरज को उस मेमोरी की याद आई। वह घर गया। गैराज की पुरानी अलमारी खोली। टूलबॉक्स के नीचे कपड़े में लिपटी छोटी-सी डिवाइस पड़ी थी।

उसमें सिर्फ कागज़ नहीं थे।

आवाज़ें थीं।

पहली रिकॉर्डिंग में युवराज की आवाज़ थी।

—अगर बच्चा पैदा हो गया, तो सब खत्म हो जाएगा।

दूसरी में डॉ. मेहता था।

—दवा असर करेगी, पर देर नहीं करनी होगी। पोस्टमार्टम हुआ तो सब पकड़ा जाएगा।

तीसरी में सरोज वर्मा की आवाज़ आई।

शांत।

ठंडी।

बिना काँपे।

—एक लड़की और उसका बच्चा पूरे परिवार की जायदाद से बड़े नहीं होते। अंतिम संस्कार जल्दी होगा। राख बचेगी, सवाल नहीं।

नीरज ने वही आवाज़ पुलिस को सौंप दी।

मुकदमा 2 महीने बाद शुरू हुआ। अदालत में भीड़ थी। रिपोर्टर बाहर खड़े थे। सरोज सफेद साड़ी, मोतियों की माला और ऊँची गर्दन के साथ आईं, जैसे वह अपराधी नहीं, किसी संस्था की मुख्य अतिथि हों। युवराज महंगे सूट में मुस्कुरा रहा था। डॉ. मेहता की आँखें झुकी हुई थीं।

अनन्या व्हीलचेयर पर आई। उसका चेहरा पीला था, शरीर कमजोर था, पर पेट पर रखा हाथ स्थिर था। नीरज उसके पीछे खड़ा था। यह वही आदमी था जिसे वर्मा परिवार ने शादी के दिन भी रिश्तेदारों के सामने “मिस्त्री दामाद” कहकर हँसी का पात्र बनाया था।

सरकारी वकील ने अदालत में कहा कि यह सिर्फ घरेलू विवाद नहीं, योजनाबद्ध हत्या का प्रयास था। गर्भस्थ शिशु की जान लेने की कोशिश भी थी। मेडिकल रिकॉर्ड में छेड़छाड़, झूठा मृत्यु प्रमाणपत्र, संपत्ति हड़पने की साजिश, निजी क्लिनिक के जरिए अपराध छिपाने का प्रयास—हर परत खुलती गई।

फिर रिकॉर्डिंग चलाई गई।

अदालत में पहले डॉ. मेहता की आवाज़ गूँजी।

—नाड़ी इतनी धीमी हो जाएगी कि सामान्य जाँच में मौत लगेगी।

फिर युवराज।

—चिता तक पहुँच गई तो कोई सबूत नहीं बचेगा।

फिर सरोज।

—बच्चा भी जाएगा तो जाने दो। नाम बचना चाहिए।

अदालत में ऐसी खामोशी छा गई जैसे किसी ने हवा खींच ली हो।

अनन्या ने आँखें बंद कर लीं। नीरज ने उसके कंधे पर हाथ रखा। वह रोई नहीं। शायद आँसू उस दिन खत्म हो गए थे, जब उसने अपनी ही माँ को अपनी मौत की तैयारी करते देखा था।

डॉ. मेहता टूट गया। उसने बयान दिया कि सरोज ने उसे सालों से पैसे दिए थे। कभी मेडिकल रिपोर्ट बदलवाने के लिए, कभी युवराज की शराब और नशे से जुड़ी दुर्घटनाएँ छिपाने के लिए, कभी कर्मचारियों की चोटों को “घरेलू हादसा” लिखने के लिए। उसने स्वीकार किया कि अनन्या को दी गई दवा जानलेवा नहीं दिखती, पर समय पर इलाज न मिले तो मृत्यु निश्चित थी।

फिर ड्राइवर रमेश गवाही देने आया। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ साफ थी।

—मैडम अनन्या ने कहा था, अगर वह अस्पताल से वापस न आएँ, तो यह लिफाफा साहब नीरज को देना। पर मुझे उसी शाम नौकरी से निकाल दिया गया। मेरा फोन भी छीन लिया गया।

लिफाफे में महेंद्र वर्मा की असली वसीयत की कॉपी थी।

एक नर्स ने बताया कि अनन्या इंजेक्शन लगने के बाद भी हल्का-हल्का हाथ हिला रही थी। उसने डॉ. मेहता से कहा था कि मरीज प्रतिक्रिया दे रही है, पर उसे कमरे से बाहर भेज दिया गया।

सरोज ने आखिरी तक खुद को निर्दोष बताया। वह कहती रही कि नीरज ने अनन्या को परिवार से दूर किया, उसे संपत्ति के लिए भड़काया, और अब वर्मा नाम को मिटाना चाहता है।

तब अदालत ने अनन्या को बोलने की अनुमति दी।

वह खड़ी होना चाहती थी।

डॉक्टर ने मना किया। नीरज ने भी।

लेकिन अनन्या ने उसका हाथ पकड़ा और धीरे से उठी। उसका शरीर काँप रहा था, पर आवाज़ साफ थी।

—माँ, मैंने तुमसे कभी महल नहीं माँगा। मैंने बस इतना चाहा था कि जब मेरी बेटी जन्म ले, तो उसकी नानी उसे आशीर्वाद दे। तुमने उसे राख बनाने की कोशिश की।

सरोज की आँखें पहली बार नीचे झुक गईं।

अनन्या ने आगे कहा।

—तुमने मुझे इसलिए नहीं मारा कि मैं गलत थी। तुमने मुझे इसलिए मारना चाहा क्योंकि मैं बचपन से तुम्हारे झूठ जानती थी। और मेरी बेटी जन्म लेकर तुम्हारे नाम से बड़ी हो जाती।

यह बात अगले दिन हर अखबार में छपी।

मुकदमे के अंत में सरोज वर्मा को आजीवन कारावास की सजा मिली। युवराज को लंबी कैद हुई। डॉ. मेहता का लाइसेंस रद्द हुआ, क्लिनिक बंद हुआ, और उसे भी जेल भेजा गया। वर्मा समूह की जाँच में कई बेनामी खाते, झूठे अनुबंध और कर्मचारियों के शोषण के मामले सामने आए। अदालत ने महेंद्र वर्मा की असली वसीयत मान्य की और अनन्या की बेटी के नाम बने ट्रस्ट को सुरक्षित किया।

4 महीने बाद, एक बारिश भरी सुबह, अनन्या ने बेटी को जन्म दिया।

बच्ची कमजोर थी, पर जीवित। उसने जन्म लेते ही रोने में देर की, और उस 1 पल में नीरज की साँस रुक गई। फिर उसने आँखें बंद करके जोर से रोया, जैसे दुनिया को बता रही हो कि उसे राख नहीं, आसमान चाहिए।

अनन्या ने उसका नाम रखा—आशा।

नीरज ने पूछा।

—तुम्हें यकीन है?

अनन्या ने बच्ची को सीने से लगाते हुए कहा।

—जिसने चिता से पहले अपनी माँ को वापस बुला लिया, उसका नाम और क्या हो सकता है?

सालों बाद भी निगमबोध घाट का वह कमरा नीरज के सपनों में आता था। सफेद ताबूत, गीली लकड़ियाँ, सरोज का ठंडा चेहरा, और कपड़े के नीचे हिलता हुआ वह छोटा-सा जीवन।

लोग अक्सर कहते थे कि नीरज ने वर्मा परिवार को बर्बाद कर दिया।

नीरज बस शांत होकर कहता था—

उसने किसी परिवार को नहीं जलाया।

उसने तो सिर्फ ताबूत खुलवाया था।

अंदर पहले से सच्चाई साँस ले रही थी।