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“कोई तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं करेगा” कहकर 7 साल की बच्ची को डराने वाली अध्यापिका बेनकाब हुई, जब पिता ने मिटाई गई रिकॉर्डिंग खोज निकाली और पूरे निजी विद्यालय की मिलीभगत, पुरानी शिकायतें तथा कई मासूमों का दबा हुआ दर्द सामने आ गया

PART 1

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“पापा, वंदना मैम मुझे तब मारती हैं, जब कक्षा में कोई नहीं होता।”

7 साल की आरोही के मुंह से निकले इन शब्दों ने दीपक अवस्थी के हाथ से रोटी का टुकड़ा गिरा दिया। लखनऊ की उस ठंडी शाम में रसोई के भीतर दाल की खुशबू फैली थी, मगर अचानक पूरा घर किसी सुनसान अस्पताल जैसा भयावह लगने लगा।

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आरोही सिर झुकाए बैठी थी। उसकी दो चोटियां खुल चुकी थीं, नीली स्कूल कमीज की एक बांह मुड़ी हुई थी और दोनों हथेलियां मेज के नीचे छिपी थीं।

दीपक उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।

—बेटा, मैम ने तुम्हें कहां मारा?

आरोही ने कांपते हाथ से अपनी बांह ऊपर की। कंधे के नीचे उंगलियों के आकार का नीला निशान था।

—वह कहती हैं कि मैं बहुत धीमी हूं। जब बाकी बच्चे प्रार्थना या खेल के लिए बाहर जाते हैं, तो मुझे रोक लेती हैं। कभी बांह मरोड़ती हैं, कभी बाल खींचती हैं।

दीपक का गला सूख गया।

—तुमने पहले क्यों नहीं बताया?

आरोही की आंखों से आंसू टपक पड़े।

—उन्होंने कहा था, “कोई तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं करेगा। तुम्हारे पापा भी सोचेंगे कि तुम झूठ बोलती हो। अगर बताया, तो मैं तुम्हें हर परीक्षा में फेल कर दूंगी।”

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दीपक ने बेटी को सीने से लगा लिया। 3 साल पहले आरोही की मां की बीमारी से मृत्यु हो चुकी थी। उसके बाद दीपक ने ही उसके बाल बनाए थे, बुखार में रातभर जागा था और स्कूल की हर बैठक में अकेला गया था। उसे लगा था कि महंगे निजी विद्यालय में बेटी सुरक्षित रहेगी।

उसी रात उसने विद्यालय की प्रधानाचार्या रश्मि कपूर को फोन किया। उन्होंने उसकी बात सुनकर शांत स्वर में कहा—

—आरोही बहुत भावुक बच्ची है। संभव है कि अध्यापिका की सख्ती को उसने गलत समझ लिया हो।

—गलतफहमी शरीर पर उंगलियों के निशान नहीं छोड़ती—दीपक ने कहा।

अगली सुबह वह आरोही को लेकर गोमतीनगर स्थित विद्यालय पहुंचा। कार्यालय में वंदना मैम पहले से बैठी थीं। चेहरे पर ममता से भरी मुस्कान सजाकर उन्होंने कहा—

—आरोही, मेरी प्यारी बच्ची, तुम मुझसे नाराज हो क्या?

आरोही तुरंत दीपक के पीछे छिप गई। उसकी उंगलियां पिता की कमीज में धंस गईं।

दीपक ने वहीं समझ लिया कि डर बनाया नहीं गया था।

उसने गलियारे और कक्षा की रिकॉर्डिंग देखने की मांग की। प्रधानाचार्या ने बच्चों की निजता, नियम और अनुमति का बहाना बनाकर साफ इनकार कर दिया।

उसी शाम अभिभावकों के व्हाट्सऐप समूह में विद्यालय का संदेश आया—

“एक छात्रा की भावनात्मक संवेदनशीलता के कारण फैल रही भ्रामक बातों पर विश्वास न करें। संबंधित अध्यापिका का सेवा रिकॉर्ड निष्कलंक है।”

कुछ ही मिनटों में संदेश आने लगे।

“आरोही हमेशा रोती रहती है।”

“एक सम्मानित अध्यापिका का जीवन बर्बाद करना ठीक नहीं।”

“शायद पिता बेटी को जरूरत से ज्यादा सिर चढ़ाते हैं।”

दीपक की मुट्ठियां भींच गईं। विद्यालय ने आरोपी को बचाने के लिए 7 साल की बच्ची को ही समस्या घोषित कर दिया था।

रात में आरोही नींद से चीखती हुई उठी।

—मैम, मेरा हाथ छोड़ दीजिए! मैं जल्दी लिखूंगी!

दीपक ने उसे कांपते हुए सीने से लगाया।

—तुम्हारे पापा तुम्हारी हर बात पर विश्वास करते हैं।

अगले दिन उसने बाल कल्याण पुलिस इकाई में शिकायत दर्ज कराई। लेकिन जब अधिकारी विद्यालय पहुंचे, तो प्रधानाचार्या ने कहा कि रिकॉर्डिंग केवल आधिकारिक आदेश पर दी जाएगी।

2 दिन बाद आदेश आया।

विद्यालय ने सभी दिनों की रिकॉर्डिंग सौंप दी, सिवाय उस शुक्रवार की, जिस दिन आरोही के कंधे पर नीला निशान पड़ा था।

उस एक दिन की पूरी फाइल “तकनीकी खराबी” के कारण मिट चुकी थी।

दीपक स्क्रीन को देखता रह गया।

तभी उसके फोन पर एक अनजान नंबर से संदेश आया—

“रिकॉर्डिंग मिटी नहीं है। विद्यालय झूठ बोल रहा है। आज रात पीछे वाले मंदिर के पास मिलिए। आरोही के साथ जो हुआ, वह पहली बार नहीं था।”

PART 2

रात 8 बजे दीपक विद्यालय के पीछे बने छोटे हनुमान मंदिर के पास पहुंचा। वहां 58 वर्षीय सफाई कर्मचारी रमेश काका उसका इंतजार कर रहे थे।

—मैंने वंदना मैम को आरोही की बांह खींचते देखा था—उन्होंने कांपती आवाज में कहा।—प्रधानाचार्या ने मुझे चुप रहने को कहा। बोलीं, नौकरी चाहिए तो आंखें बंद रखो।

दीपक ने पूछा—

—क्या रिकॉर्डिंग सच में बची है?

रमेश काका ने बताया कि मुख्य व्यवस्था से अलग एक स्वचालित सुरक्षित प्रति तकनीकी कक्ष में 30 दिन तक रहती है।

उसी रात दोनों पिछले दरवाजे से भीतर गए। धूल भरे कमरे में पुराना संगणक चालू हुआ। तारीख खुली। कक्षा दिखाई दी।

वंदना ने दरवाजा बंद किया, आरोही की कॉपी फेंकी, उसकी बांह मरोड़ी और उसे दीवार की ओर धक्का दे दिया। बच्ची नीचे गिर गई। वंदना उसके ऊपर झुककर बोली—

—बोला तो तुम्हारे पापा भी तुम्हें छोड़ देंगे।

दीपक की सांस रुक गई।

तभी बाहर कदमों की आवाज सुनाई दी। दरवाजा खुला और प्रधानाचार्या रश्मि कपूर सामने खड़ी थीं।

उनके पीछे 2 सुरक्षाकर्मी थे।

रश्मि ने ठंडे स्वर में कहा—

—वह सुरक्षित प्रति अभी मिटा दो, वरना तुम दोनों सुबह तक जेल में होगे।

PART 3

कुछ क्षणों के लिए तकनीकी कक्ष में केवल मशीन की धीमी आवाज सुनाई देती रही। दीपक संगणक के सामने खड़ा था। उसकी जेब में लगी छोटी स्मृति-पट्टी में रिकॉर्डिंग की प्रति लगभग पूरी हो चुकी थी। पर्दे पर 96 प्रतिशत लिखा था।

रश्मि कपूर ने सुरक्षाकर्मियों को संकेत किया।

—इन दोनों को बाहर निकालो और उपकरण जब्त कर लो।

एक सुरक्षाकर्मी दीपक की ओर बढ़ा, लेकिन रमेश काका उसके सामने खड़े हो गए।

—पहले मुझे हटाना पड़ेगा।

रश्मि हंस पड़ीं।

—तुम एक मामूली सफाई कर्मचारी हो। कल से तुम्हारी नौकरी नहीं रहेगी। तुम्हारी पत्नी की दवा कौन खरीदेगा?

रमेश काका का चेहरा पीला पड़ गया। उनकी पत्नी का गुर्दे का उपचार चल रहा था और विद्यालय की नौकरी ही घर का एकमात्र सहारा थी। फिर भी वह पीछे नहीं हटे।

—मेरी गरीबी मुझे अपराध देखने के बाद चुप रहने का अधिकार नहीं देती।

उसी क्षण पर्दे पर 100 प्रतिशत चमका। दीपक ने स्मृति-पट्टी निकालकर मुट्ठी में कस ली।

एक सुरक्षाकर्मी ने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की। दीपक ने विरोध किया तो धक्का-मुक्की शुरू हो गई। तभी गलियारे में पुलिस की गाड़ी की आवाज गूंजी।

रश्मि का चेहरा बदल गया।

दीपक ने तकनीकी कक्ष में आने से पहले बाल कल्याण अधिकारी को संदेश भेज दिया था। उसने लिखा था कि उसे विद्यालय में छिपी रिकॉर्डिंग मिलने वाली है और उसके मिटाए जाने का खतरा है।

कुछ ही क्षणों में महिला उपनिरीक्षक कविता चौहान, 2 पुलिसकर्मी और जिला बाल संरक्षण इकाई की अधिकारी कमरे में पहुंच गए।

—कोई भी उपकरण को हाथ नहीं लगाएगा—कविता ने कड़े स्वर में कहा।

रश्मि तुरंत बोलीं—

—ये लोग गैरकानूनी ढंग से विद्यालय में घुसे हैं। हमारे आंकड़े चुराने की कोशिश कर रहे थे।

दीपक ने अपनी हथेली खोली।

—इसमें मेरी बेटी पर हुए अत्याचार का प्रमाण है। और ये उसे मिटाना चाहती थीं।

कविता ने पूरे तकनीकी कक्ष को सील करवा दिया। संगणक, सुरक्षित प्रति रखने वाला यंत्र और प्रवेश-द्वार की रिकॉर्डिंग जब्त कर ली गई। दीपक तथा रमेश काका के बयान लिए गए।

सुबह होने तक वंदना मैम को भी पूछताछ के लिए बुला लिया गया।

लेकिन असली तूफान तब उठा, जब जांच अधिकारियों ने केवल आरोही की रिकॉर्डिंग नहीं, बल्कि पिछले 2 वर्षों की कई सुरक्षित प्रतियां बरामद कर लीं।

वंदना की कक्षा से जुड़ी 11 ऐसी घटनाएं मिलीं, जिनमें वह बच्चों को अकेला रोकती, उनके कान खींचती, कॉपियां चेहरे पर फेंकती और उन्हें डराती दिखाई दे रही थी। एक रिकॉर्डिंग में उसने 8 साल के बच्चे को लगभग 40 मिनट तक दीवार की ओर मुंह करके खड़ा रखा था। दूसरी में वह एक बच्ची को यह कह रही थी कि उसकी मां उसे विद्यालय से निकालकर घरेलू काम करवाएगी।

कई रिकॉर्डिंग में रश्मि कपूर भी कक्षा के बाहर से गुजरती दिखाई दीं। एक अवसर पर उन्होंने रोते हुए बच्चे को देखा था, फिर वंदना से कुछ बात करके दरवाजा बंद कर दिया था।

अगली सुबह विद्यालय ने अभिभावकों को नया संदेश भेजा—

“कुछ दृश्य संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किए जा रहे हैं। अनुशासनात्मक प्रक्रिया को शारीरिक हिंसा बताना दुर्भाग्यपूर्ण है।”

लेकिन इस बार अभिभावक चुप नहीं रहे।

पहला फोन एक मां का आया। उसका बेटा उसी विद्यालय से 1 वर्ष पहले निकाला गया था। वह हर रविवार रात पेट दर्द का बहाना बनाता था, क्योंकि अगले दिन विद्यालय जाना होता था।

दूसरे पिता ने बताया कि उनकी बेटी अचानक लिखना छोड़ चुकी थी। वंदना ने उन्हें समझाया था कि बच्ची पढ़ाई में कमजोर है, जबकि घर पर वह डर के कारण पेंसिल पकड़ते ही कांपने लगती थी।

एक अन्य परिवार ने स्वीकार किया कि उन्होंने पहले शिकायत की थी, लेकिन विद्यालय ने फीस में छूट और अगले वर्ष की निःशुल्क पढ़ाई का प्रस्ताव देकर उन्हें समझौते के लिए राजी कर लिया था।

धीरे-धीरे 7 परिवार सामने आ गए।

सभी बच्चों ने लगभग एक जैसी बात कही—

“मैम कहती थीं कि कोई विश्वास नहीं करेगा।”

आरोही को बाल मनोवैज्ञानिक डॉ. नंदिनी श्रीवास्तव के पास ले जाया गया। पहले दिन वह कमरे के कोने में बैठी रही। उसने अपने खरगोश वाले खिलौने को इतनी मजबूती से पकड़ रखा था कि उसकी उंगलियां सफेद हो गईं।

डॉ. नंदिनी ने उससे कोई कठिन प्रश्न नहीं पूछा। उन्होंने मेज पर रंग रखे और कहा—

—जो मन में आए, बना दो।

आरोही ने एक छोटा कमरा बनाया। कमरे में एक लाल दरवाजा था, ऊपर पीला बल्ब और कोने में बिना मुंह वाली बच्ची।

—इस बच्ची का मुंह क्यों नहीं है?—नंदिनी ने पूछा।

—क्योंकि वह बोलती है तो कोई सुनता नहीं।

दीपक एकतरफा शीशे के पीछे खड़ा था। उसके आंसू बह निकले।

अगली बैठकों में आरोही ने बताया कि वंदना उसे धीमा, मूर्ख और बोझ कहती थीं। जब भी दीपक किसी शिकायत के बारे में पूछता, वंदना अगले दिन उसे और परेशान करतीं। उन्होंने आरोही से कहा था कि उसकी मां मर चुकी है और यदि पिता भी उससे परेशान हो गए, तो उसे छात्रावास भेज देंगे।

यही वह वाक्य था जिसने आरोही को पूरी तरह तोड़ दिया था।

मां को खोने के बाद उसे पिता से अलग होने का डर सबसे अधिक था। वंदना ने उसी घाव को हथियार बना लिया था।

डॉ. नंदिनी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि बच्ची में लगातार डर, नींद टूटने, स्वयं को दोष देने और विद्यालय से जुड़ी तीव्र घबराहट के लक्षण हैं। यह साधारण अनुशासन के कारण नहीं, बल्कि बार-बार दिए गए शारीरिक और मानसिक भय का परिणाम था।

आरोही का बयान बाल-अनुकूल कमरे में दर्ज किया गया। वहां न पुलिस की वर्दी थी, न ऊंची मेज। दीवारों पर पेड़ों और पतंगों की तस्वीरें थीं।

महिला मजिस्ट्रेट ने उससे कहा—

—तुम्हें केवल वही बताना है जो तुम्हारे साथ हुआ। यहां कोई तुम्हें डांटेगा नहीं।

आरोही ने अपने खरगोश को गोद में रखा और धीरे-धीरे सब कुछ बताया।

उसने उस दिन का भी जिक्र किया, जब वंदना ने उसकी बांह मरोड़ी थी। आरोही गणित का सवाल पूरा नहीं कर पाई थी। वंदना ने बाकी बच्चों को बाहर भेज दिया, दरवाजा बंद किया और उसे कुर्सी से खींचकर उठा दिया। धक्का लगने से उसका कंधा दीवार से टकराया।

—मैंने कहा था कि दर्द हो रहा है—आरोही ने बताया।—उन्होंने कहा, “दर्द याद रहेगा तो अगली बार जल्दी लिखोगी।”

बयान समाप्त हुआ तो कमरे में बैठे सभी लोग कुछ क्षण मौन रहे।

दीपक बाहर आया तो आरोही ने उसे कसकर पकड़ लिया।

—पापा, आप मुझसे परेशान तो नहीं हैं?

दीपक वहीं जमीन पर बैठ गया।

—तुम मेरी परेशानी नहीं हो, बेटा। तुम मेरी पूरी दुनिया हो। गलती तुम्हारी नहीं थी। कभी भी नहीं।

यह सुनते ही आरोही पहली बार खुलकर रोई। वह कई सप्ताह से आंसू रोक रही थी, मानो रोने से भी कोई उसे कमजोर घोषित कर देगा।

जांच आगे बढ़ी तो एक और रहस्य सामने आया। वंदना विद्यालय के प्रबंधक मंडल के अध्यक्ष की रिश्तेदार थीं। कई शिकायतों के बावजूद उन्हें इसलिए नहीं हटाया गया था, क्योंकि विद्यालय की प्रतिष्ठा और परिवार के प्रभाव को बचाना प्रबंधन की प्राथमिकता थी।

प्रधानाचार्या रश्मि कपूर ने 3 पुरानी शिकायतों पर हस्ताक्षर किए थे। हर बार उन्होंने लिखा था कि “अभिभावकों ने भावनात्मक आवेश में गलत आरोप लगाए।” एक शिकायत के बाद संबंधित बच्चे की मासिक प्रगति रिपोर्ट अचानक खराब कर दी गई थी।

विद्यालय की शैक्षणिक सहायक पूजा मिश्रा ने भी बयान दिया। उसने स्वीकार किया कि उसने कई बार बच्चों के रोने की आवाज सुनी थी। एक दिन उसने रश्मि से कहा भी था कि वंदना की कक्षा की जांच होनी चाहिए।

रश्मि ने उसे उत्तर दिया था—

—इस विद्यालय में काम करना है तो हर रोती हुई बच्ची को पीड़ित समझना बंद करो।

पूजा महीनों तक अपराधबोध में जीती रही। आरोही का वीडियो सामने आने के बाद उसने चुप्पी तोड़ दी।

—मैंने पहले बोल दिया होता, तो शायद आरोही को इतना नहीं सहना पड़ता—उसने दीपक से कहा।

दीपक ने उत्तर दिया—

—देर से बोलीं, लेकिन अब पीछे मत हटिए। दूसरे बच्चों के लिए आपका बयान जरूरी है।

रमेश काका को उसी रात सेवा से निकालने का पत्र भेज दिया गया था। विद्यालय ने उन पर सुरक्षा नियम तोड़ने और आंकड़े चुराने का आरोप लगाया। उनके घर में चिंता छा गई। पत्नी की दवाएं खत्म होने वाली थीं और मकान का किराया बाकी था।

जब यह बात अभिभावकों तक पहुंची, तो कई परिवारों ने मिलकर उनकी सहायता के लिए धन इकट्ठा किया। लेकिन रमेश काका ने केवल पत्नी के 2 महीने के उपचार जितनी राशि स्वीकार की।

—मैंने सच पैसे के लिए नहीं बोला था—उन्होंने कहा।—मुझे दान नहीं, काम चाहिए।

कुछ सप्ताह बाद पास के एक अन्य विद्यालय ने उन्हें रख लिया। प्रधानाचार्य ने नियुक्ति-पत्र देते हुए कहा—

—हमें ऐसे कर्मचारी की जरूरत है जो बच्चों की सुरक्षा को नौकरी से बड़ा समझे।

मामले की प्रारंभिक सुनवाई के दिन अदालत के बाहर पत्रकारों और अभिभावकों की भीड़ थी। दीपक आरोही को वहां नहीं लाया। वह अपने नाना-नानी के घर पर थी, जहां नानी उसके लिए सूजी का हलवा बना रही थीं।

अदालत में वंदना के वकील ने कहा कि वीडियो में दिखाई गई हरकतें “कठोर शिक्षण पद्धति” थीं और बच्ची अत्यधिक संवेदनशील थी।

सरकारी अधिवक्ता ने रिकॉर्डिंग रोककर वह दृश्य दिखाया, जिसमें आरोही जमीन पर बैठी रो रही थी और वंदना उसके चेहरे के पास उंगली दिखाकर धमका रही थीं।

—क्या 7 साल की बच्ची की बांह मरोड़ना शिक्षण पद्धति है? क्या माता-पिता से अलग कर देने की धमकी पाठ्यक्रम का भाग है?

वकील चुप हो गया।

रश्मि ने स्वयं को बचाने की कोशिश की।

—मुझे सुरक्षित प्रतियों की जानकारी नहीं थी।

लेकिन तकनीकी विभाग के ईमेल सामने रखे गए। उनमें रश्मि ने 6 महीने पहले ही सुरक्षित प्रतियों की अवधि बढ़ाने की अनुमति दी थी। उसी रात तकनीकी कक्ष में उनकी उपस्थिति भी प्रवेश रिकॉर्डिंग में कैद थी।

न्यायालय ने वंदना को बच्चों से संपर्क करने वाले किसी भी कार्य से तत्काल रोक दिया। रश्मि को पद से हटाने और जांच पूरी होने तक विद्यालय प्रबंधन के निर्णयों में भाग न लेने का आदेश दिया गया। विद्यालय की मान्यता और सुरक्षा प्रक्रियाओं की अलग जांच शुरू हुई।

कई महीनों तक सुनवाई चली। वीडियो, चिकित्सकीय तस्वीरें, मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट, कर्मचारियों के बयान और 7 परिवारों की गवाही एक-दूसरे से मेल खाती रही।

अंततः वंदना को नाबालिग बच्चों के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार, लगातार मानसिक उत्पीड़न और धमकी देने का दोषी पाया गया। रश्मि कपूर को प्रमाण छिपाने, शिकायतों की जानबूझकर अनदेखी करने और जांच प्रभावित करने के लिए दंड मिला। विद्यालय प्रबंधन पर भारी आर्थिक दंड लगाया गया और उसे बच्चों की सुरक्षा के लिए स्वतंत्र समिति बनाने का आदेश दिया गया।

निर्णय सुनाते समय न्यायाधीश ने कहा—

—विद्यालय की प्रतिष्ठा किसी बच्चे की गरिमा से बड़ी नहीं हो सकती। जब कोई बच्चा भय में बोलता है, तब बड़े लोगों का पहला कर्तव्य उसकी आवाज दबाना नहीं, उसे सुरक्षित करना है।

विद्यालय ने सार्वजनिक क्षमा-पत्र जारी किया। उसने स्वीकार किया कि उसकी व्यवस्था बच्चों की रक्षा करने में असफल रही।

दीपक ने पत्र पढ़ा, फिर उसे मोड़कर दराज में रख दिया। कोई क्षमा-पत्र आरोही की चीखती हुई रातें वापस नहीं कर सकता था। लेकिन अब कोई उसे झूठी, कमजोर या समस्याग्रस्त नहीं कह सकता था।

आरोही ने पुराने विद्यालय में लौटने से साफ इनकार कर दिया। दीपक ने उसका दाखिला घर से कुछ दूर एक छोटे विद्यालय में कराया, जिसके आंगन में नीम के पेड़ थे और दीवारों पर बच्चों ने स्वयं चित्र बनाए थे।

पहले दिन नई अध्यापिका सुषमा जोशी उसके सामने झुककर बैठीं।

—यहां गलती करने पर कोई तुम्हें चोट नहीं पहुंचाएगा। गलती का अर्थ है कि तुम कुछ नया सीख रही हो।

आरोही ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। उसने दीपक का हाथ कसकर पकड़ रखा था।

सुषमा ने मुस्कराकर कहा—

—तुम्हारे पापा बाहर तब तक खड़े रह सकते हैं, जब तक तुम तैयार न हो जाओ।

करीब 10 मिनट बाद आरोही ने धीरे से पिता का हाथ छोड़ दिया।

वह 3 कदम चली, फिर पीछे मुड़ी।

दीपक वहीं था।

उसने हाथ हिलाया।

आरोही के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

शुरुआती सप्ताह आसान नहीं थे। किसी अध्यापिका की ऊंची आवाज सुनते ही वह सहम जाती। दरवाजा बंद होने पर उसके हाथ कांपने लगते। यदि कोई उसकी कॉपी छूता, तो वह उसे सीने से लगा लेती।

सुषमा ने कभी जल्दबाजी नहीं की। उन्होंने कक्षा का दरवाजा खुला रखा, आरोही को सामने बैठने दिया और हर दिन उससे पूछा—

—आज तुम्हें किस बात से सुरक्षित महसूस होगा?

धीरे-धीरे आरोही फिर से रंग भरने लगी। उसने कविता प्रतियोगिता में भाग लिया। वह कार में बैठकर पुराने गीत गुनगुनाने लगी। रात को कमरे की बत्ती बंद करके सोने लगी।

3 महीने बाद विद्यालय में चित्रकला दिवस आयोजित हुआ। विषय था—“वह व्यक्ति जिसने मेरी मदद की।”

आरोही ने एक बड़ा चित्र बनाया। उसमें 4 लोग थे—एक छोटी बच्ची, उसके पिता, हाथ में झाड़ू लिए रमेश काका और चश्मा लगाए डॉ. नंदिनी। चारों के ऊपर एक विशाल पीला सूरज था।

चित्र के नीचे उसने टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा—

“जब मैंने सच बोला, इन लोगों ने मुझे सुना।”

चित्र देखते ही दीपक की आंखें भर आईं।

रमेश काका भी कार्यक्रम में आए थे। आरोही दौड़कर उनके पास गई और उन्हें एक छोटा पौधा दिया।

—यह आपके लिए है।

—क्यों, बिटिया?

—क्योंकि आपने वह वीडियो बचाया था। पापा कहते हैं, आपने मेरी आवाज बचाई।

रमेश काका ने पौधा दोनों हाथों से पकड़ लिया। उनकी आंखों से आंसू बह निकले।

—नहीं, बिटिया। आवाज तुम्हारी थी। मैंने केवल दरवाजा खोला था।

उस शाम दीपक और आरोही घर लौटे तो हल्की बारिश शुरू हो गई। आरोही ने छाता बंद कर दिया और बूंदों में घूमने लगी। उसकी हंसी गली में गूंज उठी।

कुछ घाव जल्दी नहीं भरते। कभी-कभी आरोही अब भी नींद में घबरा जाती थी। कभी किसी तेज कदमों की आवाज सुनकर पिता का हाथ खोजने लगती थी। लेकिन अब वह जानती थी कि डर लगने पर उसे चुप नहीं रहना है।

उस रात सोने से पहले उसने दीपक से पूछा—

—पापा, अगर कोई बच्चा सच बोले और बड़े लोग उसकी बात न मानें, तो क्या करना चाहिए?

दीपक ने उसके माथे को चूमते हुए कहा—

—उसे तब तक बोलते रहना चाहिए, जब तक कोई सही व्यक्ति उसकी आवाज सुन न ले। और हम बड़े लोगों को पहली बार में ही सुनना सीखना चाहिए।

आरोही ने अपना खरगोश सीने से लगाया और आंखें बंद कर लीं।

खिड़की के पास रखा रमेश काका का दिया पौधा हवा में धीरे-धीरे हिल रहा था। उसकी नई पत्तियां निकल आई थीं।

कभी एक अध्यापिका ने आरोही से कहा था कि कोई उस पर विश्वास नहीं करेगा।

लेकिन अंत में एक पिता ने विश्वास किया, एक गरीब कर्मचारी ने अपनी नौकरी दांव पर लगाई, कुछ डरे हुए लोगों ने चुप्पी तोड़ी और एक बच्ची ने अपनी छीनी हुई आवाज वापस पा ली।

क्योंकि किसी बच्चे को बचाने की शुरुआत अक्सर न्यायालय, पुलिस या बड़े आंदोलन से नहीं होती।

वह केवल 4 शब्दों से शुरू होती है—

“मैं तुम्हारी बात मानता हूं।”

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.