भाग 1
नंदिनी ने गली में 2 हथियारबंद आदमियों को इतनी खामोशी से गिराया कि अर्जुन राठौड़ की उंगली ट्रिगर तक पहुंचने से पहले ही दोनों जमीन पर पड़े तड़प रहे थे।
अर्जुन राठौड़ ने उसे पहली बार मुंबई के भायखला की एक पुरानी ईरानी कैफे में देखा था। कैफे रात के 3 बजे तक खुला रहता था। दीवारों पर पुरानी घड़ियां थीं, टेबलों पर कांच के नीचे फीके मेन्यू दबे थे, और काउंटर के पीछे चाय की भाप में इलायची, जली हुई चीनी और थकान की गंध घुली रहती थी। बाहर बारिश हो या दंगे, पुलिस की गाड़ी गुजरे या किसी नेता का काफिला, वह कैफे हमेशा खुला रहता था।
नंदिनी वहीं काम करती थी। सफेद कुर्ती, फीकी नीली एप्रन, बाल हमेशा ढीले जूड़े में, चेहरे पर ऐसी मुस्कान जो स्वागत से ज्यादा माफी जैसी लगती थी। उसकी कलाई पर नीले निशान थे। कभी उंगलियों पर खरोंचें दिखतीं, कभी गर्दन के पास हल्का सूजन। मगर उसकी चाल में डर नहीं था। वह चाय रखती, बिल देती, गिरे हुए चम्मच उठाती और फिर उसी शांति से वापस चली जाती, जैसे उसके भीतर कोई गहरी दीवार हो जिसे कोई छू नहीं सकता।
अर्जुन हर रात उसी कोने वाली मेज पर बैठता था। वह मुंबई के अंडरवर्ल्ड का नाम था, मगर शहर में बहुत कम लोग उसका चेहरा जानते थे। कुछ लोग उसे कारोबारी कहते थे, कुछ बिल्डर, कुछ तस्कर, और कुछ मौत का दूसरा नाम। उसके पास पैसा था, बंदूकें थीं, आदमी थे, और ऐसा डर था कि बड़े-बड़े अफसर भी उसकी आंखों में सीधा नहीं देखते थे।
फिर भी वह हर रात उस गंदी, पुरानी कैफे में आता था।
क्योंकि उसके समंदर किनारे वाले पेंटहाउस में चांदी की प्लेटें थीं, मगर कोई आवाज नहीं थी। उसकी मां, सावित्री देवी, हर दिन उसे याद दिलाती थी कि राठौड़ खानदान को कमजोर आदमी नहीं चला सकता। उसका छोटा भाई विक्रम हर बैठक में मुस्कुराते हुए कहता था कि अर्जुन अब पहले जैसा नहीं रहा।
उसी शाम विक्रम ने 5 आदमियों के सामने कहा था:
—भैया, एक वेट्रेस की चाय पीते-पीते तुम नरम पड़ रहे हो।
कमरे में बैठे लोग चुप हो गए थे। अर्जुन ने सिर्फ उसकी तरफ देखा था। वह नजर इतनी ठंडी थी कि विक्रम की हंसी आधी रह गई। मगर बात अर्जुन के भीतर कहीं अटक गई थी।
नंदिनी को शायद पता नहीं था कि वह कौन है। या वह जानकर भी अनजान बनी रहती थी। उसके लिए अर्जुन सिर्फ काले कपड़ों वाला एक ग्राहक था, जो बिना चीनी की कड़क चाय पीता था और हर बार बिल से कहीं ज्यादा पैसे छोड़ जाता था। वह कभी उससे ज्यादा बात नहीं करती थी।
—चाय और चाहिए?
—नहीं।
—बिल?
—रख दो।
बस इतना ही।
एक रात 1:27 बजे कैफे में 3 लड़के घुसे। नशे में थे। महंगे जूते, गंदी भाषा और आंखों में वही बदतमीजी जो पैसे और शराब साथ मिलकर पैदा करते हैं। उनमें से एक ने टेबल पर हाथ मारा।
—ओए, बहनजी, इधर आओ। पहले चाय लाओ, फिर थोड़ी मुस्कान भी।
नंदिनी ने ट्रे उठाई और शांत चेहरे से उनके पास गई।
—क्या चाहिए?
दूसरे ने उसकी कलाई पकड़ ली।
—तू चाहिए। शिफ्ट कब खत्म होती है?
कैफे का मालिक काउंटर के पीछे जम गया। 2 बुजुर्ग ग्राहक अखबार के पीछे छिप गए। अर्जुन की आंखें कलाई पर टिक गईं। वहां पहले से चोट थी। उसकी उंगलियां धीरे से कोट के अंदर गईं।
नंदिनी ने आदमी की आंखों में देखा।
—हाथ छोड़ो।
वह हंसा।
—नहीं छोड़ूंगा तो?
नंदिनी की उंगलियां ट्रे के किनारे पर कस गईं। उसके चेहरे पर डर नहीं आया। बस उसकी सांस थोड़ी धीमी हुई, जैसे कोई मन ही मन दूरी नाप रहा हो, मेज की ऊंचाई देख रहा हो, आसपास रखी चीजें गिन रहा हो।
—आखिरी बार कह रही हूं, हाथ छोड़ो।
उस लड़के ने मजाक में उसकी कलाई और कस दी। उसी पल नंदिनी ने अपना अंगूठा मोड़ा, कलाई घुमाई और उसका हाथ ऐसे छुड़ाया कि वह दर्द से कुर्सी पर गिर पड़ा। फिर उसने ट्रे मेज पर रख दी, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
तीसरा लड़का गाली देकर उठा, मगर अर्जुन खड़ा हो चुका था।
—बैठ जाओ।
उसकी आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन कैफे में हवा रुक गई। तीनों लड़कों ने उसे देखा। शायद वे पहचान गए, शायद नहीं। मगर उनकी हिम्मत अचानक टूट गई। वे बड़बड़ाते हुए बाहर चले गए।
नंदिनी ने झुककर गिरी हुई चम्मच उठाई।
—आपको बीच में आने की जरूरत नहीं थी।
अर्जुन ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।
—तुम्हें मदद चाहिए थी।
—मुझे कभी मदद नहीं चाहिए।
वह काउंटर की तरफ चली गई। अर्जुन वहीं खड़ा रह गया। यह वाक्य उसके भीतर अजीब तरह से गूंजता रहा।
उस रात 2:12 बजे कैफे बंद हुआ। नंदिनी ने शटर गिराया, पुराना बैग कंधे पर डाला और बारिश में चल दी। उसने ऑटो नहीं लिया। वह पैदल भायखला की तंग गलियों की तरफ मुड़ गई। अर्जुन अपनी काली गाड़ी में बैठा रहा। उसके ड्राइवर शेरा ने पूछा:
—साहब, घर?
अर्जुन ने शीशे के पार नंदिनी को जाते देखा।
—धीरे चलो। उससे दूरी रखना।
—किसी को भेज दूं?
—नहीं। मैं खुद देखूंगा।
शेरा ने कुछ नहीं पूछा। राठौड़ परिवार में सवाल कम पूछे जाते थे।
नंदिनी बारिश में भी जल्दी नहीं चल रही थी। वह हर शीशे में पीछे देखती, बंद दुकानों की परछाइयों को पहचानती, पानी में पड़ते कदमों की आवाज सुनती। वह डरपोक नहीं थी। वह प्रशिक्षित थी।
अर्जुन ने यह शब्द अपने मन में पहली बार साफ सुना।
प्रशिक्षित।
वह भायखला की भीड़ छोड़कर पुराने गोदामों वाले इलाके में मुड़ी। रात गहरी हो चुकी थी। सड़क पर पीली बत्तियां कांप रही थीं। दूर लोकल ट्रेन की आवाज आई और फिर सब शांत हो गया।
नंदिनी एक बंद गली में घुसी।
अर्जुन ने गाड़ी रुकवाई। वह बिना आवाज के उतरा। उसकी कमर पर पिस्तौल थी। वह दीवार के साथ आगे बढ़ा। बारिश उसके चेहरे पर गिर रही थी, मगर उसकी नजर गली के अंत पर थी।
नंदिनी अकेली खड़ी थी। उसकी पीठ अर्जुन की तरफ थी। उसने अपना बैग जमीन पर रखा।
ऊपर जंग लगी लोहे की सीढ़ी से 2 आदमी उतरे। दोनों ने काले रेनकोट पहने थे। उनके हाथ में पिस्तौल थी। अर्जुन ने उन्हें पहचान लिया। वे शेखर कुरैशी के आदमी थे, वही कुरैशी जो बंदरगाह से हथियार और हवाला का काम चलाता था, और पिछले 6 महीने से राठौड़ परिवार की जमीन काटने की कोशिश कर रहा था।
एक आदमी ने कहा:
—पेन ड्राइव लाई?
नंदिनी ने बिना मुड़े जवाब दिया:
—हां।
—बैग खोल।
—पहले रास्ता खाली करो।
दूसरा आदमी हंसा।
—तुझे अभी भी लगता है तू शर्त रख सकती है?
अर्जुन ने पिस्तौल निकाली। वह गोली चलाने ही वाला था कि सब कुछ 3 सेकंड में बदल गया।
पहले आदमी ने नंदिनी पर बंदूक तानी। नंदिनी ने अपने बैग को पैर से उछाला। बैग सीधे उसकी कलाई से टकराया। गोली दीवार में लगी। उसी पल नंदिनी घूमी। उसके हाथ में छोटी मुड़ी हुई धारदार छुरी थी। उसने पहले आदमी की कोहनी के नीचे वार किया, घुटने पर लात मारी, और उसे दीवार से भिड़ा दिया। बंदूक उसके हाथ से गिर गई।
दूसरे आदमी ने गोली चलाई। नंदिनी झुकी, लोहे की बाल्टी उठाकर उसके चेहरे पर दे मारी। गोली ऊपर की दीवार से टकराई। वह आदमी संभलता, उससे पहले नंदिनी ने उसकी गर्दन पर अपनी कोहनी मारी, उसकी कलाई मोड़ी, और उसकी ही बंदूक उसकी ठुड्डी के नीचे लगा दी।
—नाम किसने दिया मेरा?
आदमी कराहते हुए बोला:
—कुरैशी… कुरैशी ने…
नंदिनी की आंखें बर्फ जैसी थीं।
—और किसने बताया कि मैं यहां से गुजरती हूं?
वह चुप रहा।
नंदिनी ने उसकी कलाई और मोड़ दी। हड्डी की आवाज आई।
—राठौड़ के घर से… विक्रम राठौड़ ने…
अर्जुन का खून जम गया।
नंदिनी ने उसे बेहोश कर दिया। पहला आदमी भी जमीन पर पड़ा था, सांस ले रहा था, मगर उठने की हालत में नहीं। नंदिनी ने उनके कोट टटोले और एक काली पेन ड्राइव निकाली। फिर उसने अपनी छुरी कपड़े से पोंछी, बैग उठाया और गली से बाहर आने लगी।
अर्जुन दीवार के पीछे छिपा था। उसने सांस रोक ली। मगर नंदिनी उसके पास आकर रुकी नहीं। उसने बस धीमी आवाज में कहा:
—अर्जुन राठौड़, अगली बार पीछा किया तो आपको बचाने नहीं आऊंगी।
अर्जुन बाहर आया। नंदिनी मुड़ी नहीं।
—तुम कौन हो?
वह बारिश में आगे बढ़ती रही।
—जिसे जानना आपके लिए खतरनाक है।
—मेरे भाई का नाम तुम्हारे दुश्मनों की जुबान पर क्यों है?
इस बार नंदिनी रुक गई। उसने आधा चेहरा घुमाया। उसकी आंखों में पहली बार दर्द दिखा।
—क्योंकि कभी-कभी घर के अंदर बैठा आदमी बाहर के दुश्मन से ज्यादा जहरीला होता है।
अर्जुन के हाथ में पिस्तौल थी, मगर उस पल वह पहली बार बेबस लगा।
दूर पुलिस की सायरन जैसी आवाज उठी। नंदिनी ने पेन ड्राइव अपनी मुट्ठी में दबाई और अंधेरे में गायब हो गई।
अर्जुन उसी गली में खड़ा रह गया। बारिश उसके कंधों से बह रही थी। जमीन पर पड़े आदमियों में से एक ने धीरे से आंख खोली और फुसफुसाया:
—साहब… अगर कुरैशी को वह चीज मिल गई… तो 300 लोग मरेंगे…
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भाग 2
7 दिन तक अर्जुन कैफे नहीं गया, लेकिन नंदिनी उसके दिमाग से नहीं निकली। उसने कैफे से वह कप उठवाया जिसमें उसने आखिरी बार चाय पी थी, और उसे अपने आदमी राघव के पास भेजा, जो दादर के एक बंद प्रिंटिंग प्रेस के तहखाने में कंप्यूटरों के बीच बैठकर लोगों की जिंदगी खोल देता था। कप पर मिली उंगलियों के निशान से कोई नाम नहीं निकला, बल्कि ऐसी सरकारी सुरक्षा खुली कि राघव की 3 मशीनें बंद हो गईं। नंदिनी शर्मा नाम की कोई लड़की 28 साल पहले वाराणसी में बाढ़ में मरी दर्ज थी। उसका किराए का कमरा नकद पैसे से भरा जाता था, उसका आधार नकली था, बैंक खाता नहीं था, फोटो कहीं नहीं थी। अर्जुन समझ गया कि वह वेट्रेस नहीं, किसी ने बनाई हुई परछाई थी। उधर कुरैशी ने शहर बंद कर दिया। बंदरगाह, धारावी, क्रॉफर्ड मार्केट, हर जगह उसके लोग नंदिनी को ढूंढ रहे थे। राठौड़ हवेली में सावित्री देवी ने खाने की मेज पर अर्जुन को घेरा। विक्रम ने मीठी आवाज में कहा कि एक अजनबी औरत के कारण राठौड़ नाम खतरे में पड़ रहा है। अर्जुन चुप रहा, मगर उसे अपनी ही मेज से सड़ांध आने लगी। अगली रात कुरैशी ने पुराने मिल कंपाउंड में मुलाकात रखी। वहां उसने बताया कि पेन ड्राइव में पैसा नहीं, बल्कि उन गुप्त अधिकारियों की सूची है जो अपराधियों, नेताओं और हथियार गिरोहों में घुसे हुए हैं। अगर सूची बाहर गई तो शुक्रवार से पहले 300 से ज्यादा परिवारों में चिताएं जलेंगी। कुरैशी ने अर्जुन को धमकाया कि वह नंदिनी सौंप दे। अर्जुन ने इनकार किया, मगर अंदर से जान गया कि नंदिनी लालच में नहीं लड़ रही थी। लौटते समय विक्रोली फ्लाईओवर पर एक ट्रक ने रास्ता रोका। 2 गाड़ियां पीछे लग गईं। गोलियां शीशों पर बरसने लगीं। शेरा के कंधे में गोली लगी। अर्जुन ने जवाबी फायर किया, मगर हमलावर प्रशिक्षित थे। तभी पुल से एक काली परछाई उतरी। नंदिनी ने पीछे से 1-1 करके हमलावर गिराए। आखिरी आदमी भागने लगा, पर उसने उसकी टांग में गोली मारकर रोक दिया। अर्जुन बारिश और खून के बीच गाड़ी से निकला। नंदिनी ने उसकी तरफ चाबी फेंकी। —तुम्हारा रास्ता तुम्हारे दुश्मन ने नहीं बेचा, तुम्हारे भाई विक्रम ने बेचा है। फिर उसने घायल शेरा की तरफ देखा और पहली बार उसकी आवाज कांपी। —अगर इसे बचाना है तो मेरे साथ चलो, अभी।
भाग 3
गुप्त क्लिनिक किसी अस्पताल जैसा नहीं था। वह परेल की एक बंद पशु दवा दुकान के नीचे बना था, जहां ऊपर जंग लगे शटर पर अब भी लिखा था, “पालतू जानवरों की दवा मिलती है।” नीचे सीढ़ियां उतरते ही शराब, दवा, पसीने और डर की मिली-जुली गंध आती थी। राठौड़ परिवार के घायल आदमी अक्सर वहीं लाए जाते थे, क्योंकि सरकारी अस्पताल में गोली का जवाब पुलिस मांगती थी।
शेरा लोहे की मेज पर पड़ा था। उसकी सांस भारी थी। कंधे से खून बह रहा था। डॉक्टर म्हात्रे, जो कभी बड़े सर्जन थे और अब कर्ज और जुए के कारण अर्जुन के एहसान में दबे थे, कांपते हाथों से गोली निकाल रहे थे।
—हाथ स्थिर रखो, डॉक्टर।
अर्जुन की आवाज में धमकी नहीं थी, मगर डर काफी था।
डॉक्टर ने पसीना पोंछा।
—गोली अंदर फंसी है। बच जाएगा, पर खून बहुत गया है।
नंदिनी कमरे के कोने में बैठी थी। उसके माथे पर कट था, होंठ फटा हुआ था, और बांह पर लंबी खरोंच थी। उसने छोटी सुई उठाई और अपना जख्म खुद सीने लगी।
अर्जुन उसके पास गया।
—रुको।
—मेरे पास समय नहीं है।
—तुम्हारा हाथ कांप रहा है।
—तुम्हारे आदमी को डॉक्टर चाहिए। मुझे नहीं।
अर्जुन ने सुई उसके हाथ से ली। नंदिनी ने विरोध नहीं किया। यह बात उससे ज्यादा अर्जुन को हैरान कर गई।
वह उसके सामने बैठा। पहली बार उसने उस औरत को करीब से देखा, जिसे वह एक कमजोर वेट्रेस समझ रहा था। उसकी आंखों में नींद नहीं, बरसों का बोझ था। चेहरा सुंदर था, मगर उस सुंदरता के पीछे इतनी थकान थी कि कोई भी उसे देखकर समझ जाता कि उसने सिर्फ उम्र नहीं, कई जिंदगियां काटी हैं।
—दर्द होगा।
—दर्द से पुरानी पहचान है।
अर्जुन ने सुई त्वचा में डाली। नंदिनी ने दांत भींचे, मगर आवाज नहीं निकाली।
—अब सच बताओ।
—सच सुनकर तुम वापस नहीं जा पाओगे।
—मैं वैसे भी वापस नहीं जाना चाहता।
नंदिनी ने कुछ सेकंड उसे देखा, फिर धीरे से बोली:
—मेरा असली नाम नंदिनी नहीं है।
—तो क्या है?
—कभी आर्या था। कभी मीरा। कभी फरजाना। कभी कोई नाम नहीं। मैं एक अंतरराष्ट्रीय गुप्त इकाई में थी। हमें अपराधियों के बीच भेजा जाता था। नकली पहचान, नकली परिवार, नकली मौत। हम उन जगहों पर रहते थे जहां कानून सिर्फ कागज पर होता है।
अर्जुन ने दूसरा टांका लगाया।
—और कैफे?
—कैफे के नीचे पुरानी फाइबर लाइन जाती है। कुरैशी और उसके विदेशी साझेदार उसी लाइन से एन्क्रिप्टेड डेटा भेजते थे। मैं 1 महीने से चाय नहीं परोस रही थी, उनकी चाबी कॉपी कर रही थी।
—और मैं?
नंदिनी की आंखों में हल्की थकान भरी मुस्कान आई।
—तुम समस्या थे। रोज उसी मेज पर बैठकर रास्ता रोक देते थे।
अर्जुन ने पहली बार हल्की सांस छोड़ी।
—मेरी चाय भी खराब थी।
—वह जानबूझकर खराब बनाती थी।
—क्यों?
—ताकि तुम दोबारा न आओ।
कमरे में 1 पल के लिए अजीब सी खामोशी छा गई। फिर शेरा दर्द से कराह उठा। नंदिनी तुरंत उठी, उसके पास गई, उसके माथे पर हाथ रखा।
—शेरा, आंखें खोलो।
शेरा ने मुश्किल से आंख खोली।
—मैडम… साहब को बचा लिया आपने?
—तुम्हें बचाना ज्यादा मुश्किल है।
शेरा ने कमजोर हंसी की कोशिश की और बेहोश हो गया।
अर्जुन ने नंदिनी को देखा। वह सिर्फ मारना नहीं जानती थी। वह बचाना भी जानती थी।
—पेन ड्राइव में क्या है?
नंदिनी ने अपने बैग से काली पेन ड्राइव निकाली।
—300 से ज्यादा गुप्त अधिकारियों के असली नाम, उनके परिवार, उनके ठिकाने, उनके बच्चे किस स्कूल में पढ़ते हैं, सब कुछ। कुरैशी इसे विदेशी गिरोहों को बेचेगा। उसके बाद सिर्फ अधिकारी नहीं मरेंगे, उनकी पत्नियां, बच्चे, बूढ़े मां-बाप सब निशाने पर होंगे।
—तुम इसे पुलिस को क्यों नहीं दे देती?
—क्योंकि पुलिस में भी कुरैशी है। मंत्रालय में भी। तुम्हारे घर में भी।
अर्जुन चुप हो गया।
नंदिनी ने छोटा फोन खोला। उसमें रिकॉर्डिंग थी। आवाज साफ थी। विक्रम की।
—भैया रात 11:30 पर विक्रोली से निकलेगा। गाड़ी काली होगी। ड्राइवर शेरा। गोली पहले ड्राइवर पर चलाना। अर्जुन जिंदा नहीं बचना चाहिए। उसके बाद मां को मैं संभाल लूंगा।
कमरे में मौजूद हर आदमी पत्थर बन गया।
रिकॉर्डिंग आगे बढ़ी।
—और वह लड़की?
—वह भी चाहिए। उसके पास पेन ड्राइव है। जरूरत पड़े तो जिंदा मत छोड़ना।
अर्जुन का चेहरा नहीं बदला, मगर उसकी मुट्ठी इतनी कस गई कि उंगलियां सफेद हो गईं।
—विक्रम ने मुझे बचपन से नफरत की है। मगर मारने तक आ जाएगा, यह नहीं सोचा था।
नंदिनी ने फोन बंद किया।
—जो कुर्सी चाहता है, वह पहले खून का रिश्ता भूलता है।
सुबह 5:55 बजे अर्जुन राठौड़ हवेली पहुंचा। हवेली मालाबार हिल पर थी। बाहर सुरक्षाकर्मी, अंदर संगमरमर, बड़े झूमर, भगवान की चांदी की मूर्तियां और दीवारों पर पूर्वजों की तस्वीरें थीं। सब कुछ शानदार था, मगर उस सुबह घर श्मशान जैसा लग रहा था।
सावित्री देवी पूजा कमरे से बाहर आईं। हाथ में माला थी।
—कहां थे तुम? सारी रात खबरें आ रही थीं। कुरैशी के लोग मारे गए। पुलिस शहर में घूम रही है।
विक्रम सीढ़ियों से उतरा। उसने महंगा गाउन पहना था, चेहरा नींद से भरा दिखाने की कोशिश कर रहा था।
—भैया, आप ठीक हो? मुझे तो लगा…
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
—क्या लगा?
विक्रम हकलाया नहीं। वह जन्मजात झूठा था।
—लगा कि कुरैशी ने कुछ कर दिया होगा। मैं तो रात भर परेशान था।
अर्जुन ने जेब से फोन निकाला और संगमरमर की मेज पर रख दिया।
—तुम्हारी परेशानी सुनना चाहता हूं।
उसने रिकॉर्डिंग चला दी।
विक्रम की अपनी आवाज पूरे हॉल में गूंज गई।
—गोली पहले ड्राइवर पर चलाना। अर्जुन जिंदा नहीं बचना चाहिए।
सावित्री देवी के हाथ से माला गिर गई। मोती फर्श पर बिखर गए।
—विक्रम…
विक्रम का चेहरा पहले पीला हुआ, फिर लाल। उसने हंसी निकाली।
—नकली है। आजकल आवाज बनाई जा सकती है। भैया एक वेट्रेस के लिए अपने भाई पर आरोप लगा रहे हैं?
अर्जुन ने दूसरा ऑडियो चलाया।
इस बार विक्रम कुरैशी से कह रहा था:
—राठौड़ नाम मेरा होगा। अर्जुन की कमजोरी वही लड़की है। उसे पकड़ो, अर्जुन खुद टूट जाएगा।
सावित्री देवी कुर्सी पर बैठ गईं। उनकी आंखों में सिर्फ डर नहीं था, अपराध भी था। शायद उन्हें याद आ गया था कि उन्होंने हमेशा विक्रम को बचाया, अर्जुन से उम्मीद की, और दोनों बेटों के बीच जहर को प्रेम समझकर अनदेखा किया।
विक्रम ने अचानक गाउन के अंदर हाथ डाला। उससे पहले अर्जुन के 2 आदमी आगे आए और उस पर बंदूक तान दी। मगर विक्रम तेज था। उसने छोटी पिस्तौल निकाल ली और सीधे अपनी मां की तरफ पकड़ ली।
—कोई आगे आया तो मां यहीं गिरेगी।
सावित्री देवी का चेहरा सफेद पड़ गया।
—विक्रम, पागल मत बन।
—पागल? पागल तो मैं बचपन से था, मां। आप ही कहती थीं, अर्जुन जिम्मेदार है, अर्जुन बड़ा है, अर्जुन घर संभालेगा। मैं क्या था? आरती की थाली? मेहमानों के सामने मुस्कुराने वाला बेटा?
अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ा।
—बंदूक नीचे रख।
—नहीं, भैया। आज फैसला होगा। या तुम मरोगे, या मैं।
दरवाजे के पास खड़ी नंदिनी ने सब देखा। वह चुपचाप हवेली में घुसी थी। किसी ने उसे नहीं रोका, क्योंकि अर्जुन ने पहले ही कह दिया था कि जो सफेद दुपट्टे वाली औरत आए, उसे अंदर आने देना।
विक्रम की नजर अर्जुन पर थी, नंदिनी पर नहीं।
नंदिनी ने फर्श पर बिखरे माला के मोतियों को देखा। उसने अपना पैर धीरे से आगे किया। एक मोती उसकी एड़ी के नीचे आया। उसने उसे हल्का धक्का दिया। मोती लुढ़कता हुआ विक्रम के पैर के पास गया।
विक्रम का पैर उस पर पड़ा। उसका संतुलन बिगड़ा। उसी पल नंदिनी बिजली की तरह बढ़ी। उसने उसकी कलाई पकड़ी, पिस्तौल ऊपर मोड़ी। गोली झूमर में लगी। कांच टूटकर बरसा। अर्जुन ने मां को पीछे खींच लिया। नंदिनी ने विक्रम की कोहनी मोड़ी, उसे घुटनों पर गिराया और पिस्तौल दूर फेंक दी।
विक्रम चीखा:
—मार दो मुझे! यही तो चाहते हो ना? सबको दिखा दो कि अर्जुन राठौड़ खूनी है!
अर्जुन उसके सामने खड़ा रहा। उसके चेहरे पर गुस्सा था, मगर आंखों में थकान ज्यादा थी।
—तुमने मुझे नहीं, घर को बेचा है।
—घर? यह घर कभी मेरा था ही नहीं!
सावित्री देवी रो रही थीं।
—बेटा, मैंने गलती की… पर यह मत कर…
अर्जुन ने अपनी मां की तरफ देखा।
—आपने मुझसे हमेशा कहा कि परिवार बचाना। आज परिवार को उसी से बचा रहा हूं जिसे आपने सबसे ज्यादा बचाया।
विक्रम हंसा।
—तो मारो।
—नहीं।
अर्जुन ने अपने आदमियों को इशारा किया।
—इसे जिंदा ले जाओ। सारे सबूतों के साथ।
—कहां?
अर्जुन ने नंदिनी की तरफ देखा।
—जहां तुम्हारी सूची सुरक्षित पहुंचेगी।
नंदिनी ने सिर हिलाया।
उस दिन पहली बार अर्जुन राठौड़ ने अपने परिवार के अंदर कानून को बुलाया। यह पुलिस की आम गाड़ी नहीं थी। केंद्रीय एजेंसी के 4 अधिकारी आए, वही लोग जिनकी जान उस पेन ड्राइव से जुड़ी थी। उन्होंने विक्रम को हथकड़ी लगाई। विक्रम आखिरी पल तक गालियां देता रहा।
—भैया, तुम पछताओगे! वह औरत तुम्हें छोड़ जाएगी! तुम अकेले रह जाओगे!
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। शायद वह जानता था कि यह बात झूठ नहीं थी।
दोपहर तक शहर में खबर फैल गई कि कुरैशी के कई अड्डों पर छापे पड़े। बंदरगाह से हथियार मिले, हवाला खाते पकड़े गए, और कई पुलिस अफसरों के नाम बाहर आए। मगर अखबारों में नंदिनी का नाम कहीं नहीं था। वह फिर वही बन गई जो वह हमेशा थी, एक परछाई।
शाम 6 बजे अर्जुन उसे नवी मुंबई के एक पुराने मछली घाट पर लेकर गया। वहां कोई आलीशान गाड़ी नहीं थी। वे एक मछली वाले ट्रक में पहुंचे थे, जिसमें बर्फ, रस्सियां और खाली टोकरियां पड़ी थीं। समुद्र पर हल्की धूप बची थी। दूर एक मालवाहक जहाज श्रीलंका की तरफ जाने वाला था। वहां से नंदिनी का नया नाम, नया पासपोर्ट और नई जिंदगी शुरू होनी थी।
वह अब वेट्रेस वाली नंदिनी नहीं लग रही थी। उसने साधारण सलवार-कुर्ता पहना था, बाल खुले थे, चेहरे पर 3 काले टांके थे। आंखों में वही ठंडक थी, मगर उसके नीचे एक ऐसी उदासी थी जो किसी भी हथियार से गहरी लगती थी।
अर्जुन ने पूछा:
—अब कौन सा नाम होगा?
—नाम जानकर क्या करोगे?
—याद रखूंगा।
—यही तो नहीं करना चाहिए।
समुद्र की हवा तेज हुई। नंदिनी ने दुपट्टा संभाला।
—अर्जुन, तुम्हारी दुनिया और मेरी दुनिया एक जैसी दिखती हैं, पर हैं नहीं। तुम छाया में रहते हो क्योंकि तुमने उसे चुना। मैं छाया में रहती हूं क्योंकि मेरा असली चेहरा कई लोगों की मौत बन सकता है।
—मैंने भी बहुत लोगों को मरते देखा है।
—पर तुमने आज बचाना चुना। उसी दिन से तुम मेरे लिए खतरनाक हो गए।
अर्जुन ने हल्की कड़वाहट से पूछा:
—क्योंकि मैं कमजोर हो गया?
—क्योंकि तुम इंसान निकले।
कुछ देर दोनों चुप रहे। घाट पर मजदूर रस्सियां खींच रहे थे। कोई नहीं जानता था कि उनके बीच खड़ी यह औरत 300 परिवारों की जान बचाकर जा रही है।
अर्जुन ने जेब से एक छोटा कागज निकाला। वह कैफे का पुराना बिल था, जिस पर नंदिनी ने कभी चाय का दाम लिखा था। नीचे गलती से हल्का सा दाग था, शायद चाय का।
—तुम्हारी सबसे खराब चाय का बिल।
नंदिनी ने उसे देखा। पहली बार उसकी आंखें सचमुच भीग गईं।
—तुम्हें वह चाय पसंद नहीं थी।
—इसीलिए याद है।
नंदिनी ने बिल नहीं लिया। उसने सिर्फ अपनी उंगलियां अर्जुन के सीने पर रखीं, ठीक दिल के ऊपर।
—इसे संभालकर रखना। तुम्हारे घर में इसकी ज्यादा जरूरत पड़ेगी।
अर्जुन ने उसका हाथ नहीं पकड़ा, क्योंकि शायद वह जानता था कि पकड़ लेने से भी वह रुकने वाली नहीं थी।
—क्या तुम कभी लौटोगी?
नंदिनी ने समुद्र की तरफ देखा।
—जो लोग कई बार मर चुके हों, वे लौटते नहीं। वे सिर्फ किसी की याद में जिंदा रह जाते हैं।
जहाज की सीटी बजी। नंदिनी मुड़ी और सीढ़ियों की तरफ चल दी। 5 कदम बाद वह रुकी। बिना पीछे देखे बोली:
—अगर कभी बहुत खराब चाय पीनी हो, तो किसी छोटे स्टेशन पर जाना। अच्छी जगहों पर खराब चाय नहीं मिलती।
अर्जुन के चेहरे पर एक टूटी हुई मुस्कान आई।
—मैं ढूंढूंगा।
—मत ढूंढना।
फिर वह जहाज पर चढ़ गई। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अर्जुन बहुत देर तक घाट पर खड़ा रहा। सूरज डूब गया, लोग चले गए, नावों की आवाज कम हो गई, मगर वह वहीं रहा। उसके पास पैसा था, साम्राज्य था, हवेली थी, नाम था। मगर उस शाम उसे पहली बार समझ आया कि कुछ लोग मिलते नहीं, बस किसी की आत्मा में एक दरवाजा खोलकर चले जाते हैं।
वह रात को हवेली लौटा। सावित्री देवी पूजा कमरे में बैठी थीं। उनके सामने बिखरी माला फिर से पिरोई जा रही थी। उनके हाथ कांप रहे थे।
—अर्जुन…
वह रुका।
—मैंने तुम्हें कभी बेटा नहीं रहने दिया। हमेशा ढाल बना दिया।
अर्जुन ने बहुत देर बाद कहा:
—ढाल भी टूटती है, मां।
सावित्री देवी रो पड़ीं। अर्जुन पहली बार उनके पास बैठा। उसने उन्हें गले नहीं लगाया, मगर उनके पास बैठना ही उनके लिए सजा भी था और सहारा भी।
विक्रम जेल में था। कुरैशी पकड़ा नहीं गया था, पर उसका जाल टूट चुका था। शहर में रातें फिर वैसी ही थीं, गीली, खतरनाक, चमकदार और झूठ से भरी। मगर अर्जुन बदल गया था। उसने कुछ धंधे बंद किए, कुछ रास्ते काट दिए, कुछ लोगों को अपने घर से निकाल दिया। लोग बोले, वह कमजोर हो गया। कुछ बोले, वह और खतरनाक हो गया, क्योंकि अब वह सिर्फ लालच से नहीं, किसी अदृश्य हिसाब से काम करता था।
पुरानी ईरानी कैफे 2 महीने बाद फिर खुली। अर्जुन एक रात वहां गया। वही कांच वाली मेज, वही चाय की भाप, वही दीवार की घड़ी। बस नंदिनी नहीं थी। नया लड़का चाय रख गया।
—साहब, चीनी?
अर्जुन ने कप उठाया। चाय ठीक थी। न ज्यादा कड़वी, न जली हुई, न खराब।
उसे अजीब दुख हुआ।
—नहीं। इसे वापस ले जाओ।
लड़का घबरा गया।
—गलती हो गई क्या?
अर्जुन ने खिड़की के बाहर बारिश देखी।
—नहीं। यही गलती है। यह बहुत अच्छी है।
उसने कैफे के काउंटर पर पुराने बिल को मोड़कर अपनी जेब में रखा और बाहर चला गया। उस रात मुंबई की बारिश में उसे हर मोड़ पर सफेद दुपट्टा दिखता रहा। हर बंद गली में लगा जैसे कोई आवाज कहेगी, “पीछा मत करो।” मगर कोई आवाज नहीं आई।
सालों बाद भी जब शहर सो जाता, अर्जुन राठौड़ किसी न किसी छोटी दुकान पर कड़क चाय मांगता। लोग उसे सबसे अच्छी चाय देते। वह हर बार सिर हिलाकर कहता:
—नहीं, इससे भी खराब बनाओ।
किसी को समझ नहीं आता था कि मुंबई का सबसे डरावना आदमी खराब चाय क्यों ढूंढता है।
क्योंकि वह जानता था, कुछ स्वाद जीभ पर नहीं, दिल पर रह जाते हैं। और कुछ लोग बचाकर चले जाते हैं, मगर भूलने नहीं देते।
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