
PART 1
इमरजेंसी के दरवाजे पर एक अमीर पिता अपनी घायल बेटी को सीने से चिपकाए चीख रहा था, और सामने खड़ी डॉक्टर वही गर्भवती औरत थी जिसे उसने 6 महीने पहले बारिश में अकेला छोड़ दिया था।
दिल्ली के मैक्स अस्पताल की रात हमेशा शोर से भरी रहती थी, लेकिन उस रात सब कुछ जैसे अचानक थम गया। स्ट्रेचर दौड़ रहे थे, नर्सें फाइलें संभाल रही थीं, मॉनिटर की आवाजें हवा में तैर रही थीं, और तभी शीशे के दरवाजे धड़ाम से खुले।
अर्जुन मल्होत्रा अंदर घुसा।
उसकी महंगी शर्ट मिट्टी और पसीने से भीगी थी, बाल बिखरे हुए थे, चेहरे पर वह घमंड नहीं था जिससे वह कभी बड़े-बड़े बोर्डरूम हिला देता था। उसकी बाहों में 7 साल की सिया थी, जिसका दायां हाथ सीने से चिपका हुआ था और आंखों से आंसू बह रहे थे।
—मेरी बेटी को बचाइए! जो भी डॉक्टर है, अभी बुलाइए!
डॉ. अदिति शर्मा ने जैसे ही सिर उठाया, उसके हाथ अपने आप पेट पर चले गए। 7 महीने का उभरा हुआ पेट सफेद कोट के नीचे छिप नहीं सकता था। अर्जुन की नजर पहले उसके चेहरे पर अटकी, फिर पेट पर गिर गई।
उसके होंठ कांपे।
—अदिति…
अदिति ने गहरी सांस ली। उसके भीतर 6 महीने पुराना वह दृश्य चमक उठा, जब गुरुग्राम के उसके फ्लैट के बाहर बारिश हो रही थी और अर्जुन ने कहा था, “मैं परिवार बनाने के लिए तैयार नहीं हूं।” वह जवाब नहीं था, वह त्याग था। अदिति चली गई थी। 3 हफ्ते बाद उसे पता चला कि वह खाली हाथ नहीं गई थी।
उसने आवाज को पत्थर जैसा स्थिर रखा।
—मैं डॉ. अदिति शर्मा हूं। बच्ची का नाम?
सिया ने सिसकते हुए कहा।
—सिया… मैं स्कूल के झूले से गिर गई।
अदिति उसके पास झुकी। उसकी आंखों में डॉक्टर की सख्ती थी, मगर स्पर्श में मां जैसी कोमलता।
—डरो मत बेटा। मैं धीरे से देखूंगी। बहुत दर्द हो तो बताना।
अर्जुन वहीं खड़ा रहा, जैसे फर्श से जड़ गया हो।
—आप पीछे हटिए, मिस्टर मल्होत्रा।
“मिस्टर मल्होत्रा” सुनकर उसका चेहरा और सफेद पड़ गया। कभी वही आवाज उसे “अर्जुन” कहती थी, रात के 2 बजे चाय बनाकर हंसती थी, उसके टूटे बचपन को सीने से लगाती थी। आज वही आवाज पेशेवर, ठंडी और दूर थी।
रिपोर्ट आई। सिया की कलाई में हल्का फ्रैक्चर था। खतरा बड़ा नहीं था, मगर दर्द और सदमे के कारण उसे रात भर निगरानी में रखना था। प्लास्टर बांधते समय सिया अदिति को देखती रही।
—आपके पेट में बच्चा है?
अदिति ने हल्की मुस्कान दी।
—हां।
—उसे दर्द होता है क्या जब आप इतनी देर खड़ी रहती हो?
अदिति का गला भर आया। जिस आदमी ने उसके बच्चे के अस्तित्व को जाने बिना भी उसकी कमी को कभी महसूस नहीं किया, उसकी बेटी उस बच्चे के लिए चिंता कर रही थी।
रात गहरी हुई। सिया को वार्ड में शिफ्ट किया गया। बाहर कॉरिडोर में अर्जुन ने अदिति का रास्ता रोक लिया।
—ये बच्चा… क्या मेरा है?
अदिति ने आंखें उठाईं। उनमें आग भी थी और थकान भी।
—तुम्हारी बेटी अंदर है। अभी उसी पर ध्यान दो।
—अदिति, मुझे सच जानने का हक है।
—हक? 180 दिन की चुप्पी के बाद? जब मैं तुम्हारे घर से भीगती हुई निकली थी, तब तुमने एक बार भी नहीं पूछा कि मैं कहां जाऊंगी।
अर्जुन ने नजरें झुका लीं।
—मैं डर गया था।
—तुम डर गए थे, और मैं अकेली रह गई थी।
वह मुड़ गई। अर्जुन वहीं खड़ा रह गया, जैसे किसी ने उसके सारे नाम, दौलत और ताकत उतारकर उसे आईने के सामने खड़ा कर दिया हो।
रात के करीब 1 बजे नर्स ने अदिति को बुलाया। सिया सो नहीं पा रही थी। अदिति ने खुद से कहा कि वह सिर्फ मरीज के लिए जा रही है, अतीत के लिए नहीं।
कमरे में हल्की नीली रोशनी थी। सिया तकिए से टिककर बैठी थी। उसके प्लास्टर पर नर्स ने छोटी-सी बिंदी बना दी थी।
—डॉक्टर आंटी, आपका बच्चा लड़की है?
—शायद।
सिया मुस्कुराई, फिर अचानक गंभीर हो गई। उसने दरवाजे की ओर देखा, जहां अर्जुन खामोश खड़ा था।
—दादी कहती हैं, आपके जैसी औरतें पापा से सब छीन लेती हैं।
अदिति का चेहरा जम गया।
अर्जुन की सांस रुक गई।
सिया ने मासूमियत से अगला वाक्य कहा।
—दादी ने चाचा विक्रम से ये भी कहा था कि वो बच्चा इस घर में पैदा नहीं होना चाहिए।
अदिति के कानों में जैसे अस्पताल का सारा शोर डूब गया। अर्जुन ने पहली बार अपनी बेटी को नहीं, अपनी मां की छाया को देखा। और उस पल अदिति को समझ आ गया कि उसका अतीत अभी खत्म नहीं हुआ था।
PART 2
कमरे में ऐसी चुप्पी फैल गई कि सिया की धीमी सिसकियां भी चाकू जैसी लग रही थीं।
अर्जुन ने बहुत धीरे पूछा।
—सिया, दादी ने कब कहा था?
सिया ने कंबल कसकर पकड़ लिया।
—कल रात। वो फोन पर विक्रम चाचू से बोल रही थीं। कह रही थीं कि अगर पापा को बच्चे के बारे में पता चल गया तो मल्होत्रा परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।
अदिति के भीतर पुराना अपमान फिर जाग गया। सावित्री देवी हमेशा मुस्कुराकर उसे “बेटी” कहती थीं, मगर आंखों से उसका खानदान, उसकी सैलरी और उसके अकेलेपन का हिसाब लगाती रहती थीं।
अर्जुन ने कहा।
—मुझे कुछ नहीं पता था।
अदिति हंसी नहीं, पर उसकी आंखों में तिरस्कार उतर आया।
—तुम्हें कभी कुछ पता नहीं होता, जब सच से भागना आसान होता है।
सिया डर गई। अदिति तुरंत उसके पास झुक गई।
—तुमने कुछ गलत नहीं किया, बेटा।
सुबह अदिति अपने फ्लैट लौटी तो दरवाजे पर एक पीतल की छोटी थाली रखी थी। उसमें बच्चे की बुनी हुई चादर, पुराने मेडिकल नोट्स और एक पेन ड्राइव थी। साथ में कार्ड था।
“सच देर से आए तो भी जान बचा सकता है।”
शाम को दरवाजा खुला तो सामने अर्जुन था, सिया के साथ। उसके पीछे एक औरत खड़ी थी, शांत, सादी, मगर आंखों में वर्षों का दबा तूफान।
—मैं मीरा हूं, अर्जुन की पूर्व पत्नी। पेन ड्राइव मैंने भेजी थी।
अदिति स्तब्ध रह गई।
मीरा ने मेज पर पेन ड्राइव रखी।
—सावित्री आंटी ने मुझे भी ऐसे ही तोड़ा था। अब वे तुम्हारे बच्चे तक पहुंच चुकी हैं।
तभी अदिति के पेट में तेज दर्द उठा। वह दीवार पकड़कर झुकी।
मीरा की आवाज कांपी।
—अर्जुन, तुम्हारी मां को इस गर्भ का पता पहले दिन से था।
PART 3
अदिति ने आंखें खोलीं तो सफेद छत, दवा की गंध और मशीनों की बीप ने उसे घेर लिया। उसके होंठ सूखे थे, शरीर भारी था, मगर पहला सवाल उसी ने पूछा जो हर मां पूछती है।
—मेरा बच्चा?
उसकी सहेली और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. नंदिता ने उसका हाथ पकड़ा।
—बच्चा जिंदा है। लेकिन तुम्हें गंभीर प्री-एक्लेम्पसिया हुआ है। ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया था। थोड़ी देर और होती तो मामला हाथ से निकल सकता था।
अदिति ने गर्दन मोड़ी। अर्जुन कुर्सी पर बैठा था। उसकी आंखें लाल थीं, दाढ़ी उगी हुई थी, और दोनों हाथों से वह अदिति की उंगलियां थामे था, जैसे अगर छोड़ा तो सब फिर बिखर जाएगा।
—मैं गया नहीं, अदिति। इस बार नहीं गया।
वह कुछ कहना चाहती थी। शायद “बहुत देर हो गई” या “अब भरोसा मत मांगो।” मगर शरीर थका था और दिल अभी भी दर्द के नीचे धड़क रहा था।
दरवाजा खुला। मीरा अंदर आई। उसके हाथ में लैपटॉप था। उसके चेहरे पर वह कठोरता थी जो सिर्फ वही औरत रखती है जिसे किसी घर ने बाहर निकाला हो, मगर उसने खुद को टूटने नहीं दिया हो।
—अब आधा सच किसी की जान ले सकता है।
उसने पेन ड्राइव लगाई। कमरे में सावित्री देवी की आवाज गूंजी।
“अदिति गर्भवती है। अगर अर्जुन को पता चला तो वह उससे शादी कर लेगा। रिसेप्शन पर बोल देना कि उसकी कोई चिट्ठी नहीं आई। ऑफिस फोन से उसका नंबर ब्लॉक करवा दो।”
अर्जुन का चेहरा राख जैसा हो गया।
अगली रिकॉर्डिंग चली।
“हमारे खानदान में बिना परिवार की लड़की मां नहीं बनेगी। मैंने मीरा को भी समझाया था, अब अदिति को भी रास्ते से हटाना पड़ेगा।”
अदिति की आंखों से आंसू बह निकले। उसे याद आया कि उसने अर्जुन के ऑफिस में 3 बार फोन किया था। एक चिट्ठी छोड़ी थी। मंदिर मार्ग के कैफे में घंटों इंतजार किया था। जब कोई जवाब नहीं आया, उसने समझ लिया था कि अर्जुन ने उसे और बच्चे को ठुकरा दिया है।
अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।
—मां ने कहा था तुम किसी दूसरे डॉक्टर के साथ चली गई हो। उन्होंने कहा तुमने साफ कहा है कि मैं तुम्हें न ढूंढूं।
—मैंने कभी ऐसा नहीं कहा।
मीरा ने धीमे स्वर में कहा।
—मेरे साथ भी यही हुआ था। मुझे बताया गया कि अर्जुन मुझे बोझ समझता है। अर्जुन को बताया गया कि मैं उसके पैसों के पीछे हूं। हमने एक-दूसरे से सवाल नहीं पूछे, और सावित्री आंटी जीत गईं।
अर्जुन के भीतर कुछ टूटकर गिरा। वह वही आदमी था जिसने करोड़ों की डील में धोखा पहचान लिया था, मगर अपने ही घर में मां के नाम पर नियंत्रण, झूठ और डर को प्रेम समझता रहा।
उसने वहीं से अपनी मां को फोन लगाया और स्पीकर ऑन कर दिया।
—मां, क्या आपको अदिति के गर्भ के बारे में पता था?
दूसरी तरफ कुछ पल की चुप्पी रही।
—बेटा, मैंने तुम्हारी भलाई के लिए…
—मेरी बेटी को मिटाने की बात मेरी भलाई थी?
—वो औरत तुम्हें हमसे दूर कर देती।
अर्जुन की आवाज पहली बार अपने घर की दीवारों से आजाद थी।
—मुझे अदिति ने दूर नहीं किया। आपने मुझे पिता बनने से दूर किया। आपने सिया के मन में जहर डाला। आपने मीरा की जिंदगी तोड़ी। अब आप अदिति, सिया या मेरे बच्चे के पास नहीं आएंगी।
—मैं तुम्हारी मां हूं, अर्जुन।
—और मैं पिता हूं।
फोन कट गया।
कमरे में कोई विजय नहीं थी। सिर्फ एक लंबा, भारी सच था, जिसने सभी को घायल किया था।
अर्जुन अदिति के पास आया।
—मैं आज माफी मांगने नहीं आया। माफी इतनी सस्ती नहीं होनी चाहिए। मैं बस ये कहने आया हूं कि अब कोई और मेरे फैसले नहीं करेगा। अगर तुम मुझे अपने दरवाजे के बाहर भी खड़ा रखोगी, तो मैं वहीं खड़ा रहूंगा, मगर इस बच्चे से भागूंगा नहीं।
अदिति ने आंखें बंद कर लीं। जवाब नहीं दिया। लेकिन उसने अपना हाथ नहीं छुड़ाया।
अगले कई दिन अस्पताल और डर के बीच गुजरे। अदिति को पूर्ण आराम की सलाह दी गई। वह जो रोज 14 घंटे खड़े होकर दूसरों की जान बचाती थी, अब बिस्तर से उठने के लिए भी किसी की मदद चाहती थी। उसे यह निर्भरता अपमान जैसी लगती थी। हर बार जब अर्जुन पानी का गिलास पकड़ाता, दवा का समय नोट करता, बिना नमक का दलिया बनाना सीखता, अदिति के भीतर का जख्म कहता—अब क्यों?
मगर अर्जुन चुपचाप करता रहा।
वह सिया को स्कूल से लाता। सिया अपने प्लास्टर पर बने फूल दिखाती और अदिति के पेट से बात करती।
—छोटी बहन, जल्दी मत आना। डॉक्टर आंटी को आराम चाहिए।
अदिति हर बार उसे देखती और सोचती कि बच्चे कितनी जल्दी सच की भाषा सीख लेते हैं, अगर बड़े लोग उनके मन में झूठ न बोएं।
मीरा भी आती रही। कभी फल लेकर, कभी पुराने कागज लेकर, कभी सिर्फ बैठने। उसके और अदिति के बीच अजीब रिश्ता बन गया था। एक ही आदमी से जुड़ी 2 औरतें, जिन्हें उसी घर की एक ही चाल ने अलग-अलग समय पर घायल किया था। उनमें ईर्ष्या नहीं थी, एक थकी हुई समझ थी।
—अर्जुन बदल सकता है? —अदिति ने एक दिन पूछा।
मीरा ने थोड़ी देर सोचा।
—आदमी बदल सकता है, अगर उसे पहली बार अपनी कमजोरी से नफरत हो जाए। लेकिन तुम जल्दी मत पिघलना। टूटी हुई चीज जोड़ने वाले हाथ पहले छिलते हैं।
इस बीच सावित्री देवी ने हार नहीं मानी। उन्होंने रिश्तेदारों में बात फैलाई कि अदिति ने अर्जुन को फंसा लिया है। पुराने कारोबारियों को फोन किए। परिवार के पुश्तैनी घर में अर्जुन की हिस्सेदारी रोकने की धमकी दी। मगर अर्जुन ने पहली बार अपने पिता की छोड़ी कंपनी के बोर्ड मीटिंग में खड़े होकर कहा—
—जिस परिवार की इज्जत एक अजन्मी बच्ची से डर जाए, उसे इज्जत नहीं, इलाज चाहिए।
उसने कानूनी नोटिस भेजा। सिया की काउंसलिंग शुरू करवाई। घर के स्टाफ से बयान लिए। रिसेप्शनिस्ट, जिसने अदिति की चिट्ठी छिपाई थी, रोते हुए सच बोल गई कि उसे सावित्री देवी ने नौकरी बचाने के बदले ऐसा करने को कहा था। विक्रम, अर्जुन का छोटा भाई, पहले मां के पक्ष में था, पर जब ऑडियो में अपना नाम सुना तो चुप हो गया। वह अदालत में गवाही देने को तैयार नहीं हुआ, लेकिन उसने झूठ भी नहीं बोला। कभी-कभी न्याय पूरी तरह नहीं आता, मगर झूठ की रीढ़ टूट जाती है।
32वें हफ्ते में नंदिता ने अल्ट्रासाउंड के लिए अदिति को अस्पताल बुलाया। अर्जुन ने कार ऐसे चलाई जैसे सीट पर शीशे की बनी दुनिया रखी हो। अस्पताल में भीड़ थी, इसलिए अदिति ने सर्विस लिफ्ट लेने को कहा।
—मैंने रेजिडेंसी में इसे 100 बार लिया है। कुछ नहीं होगा।
अर्जुन ने आधी मुस्कान दी।
—तुम डॉक्टर हो, आदेश मानता हूं।
लिफ्ट बंद हुई। 2 मंजिल ऊपर गई। अचानक तेज झटका लगा। रोशनी झपकी और बुझ गई। अंधेरे में सिर्फ अर्जुन के फोन की टॉर्च जली।
—घबराओ मत। मैं अलार्म दबा रहा हूं।
अदिति ने जवाब देना चाहा, तभी उसके पैरों के पास गर्माहट फैल गई। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
—अर्जुन… पानी उतर गया।
अर्जुन की आंखों से खून उतर गया।
—नहीं। अभी नहीं। अभी समय नहीं हुआ।
पहला दर्द आया तो अदिति लिफ्ट की दीवार से चिपक गई। उसका शरीर कांप गया, मगर उसकी आवाज डॉक्टर वाली हो गई।
—सुनो। मैं तुम्हें बताऊंगी। तुम मेरे हाथ बनोगे।
—मैं नहीं कर पाऊंगा।
—करोगे। क्योंकि इस बार भागने की जगह नहीं है।
अर्जुन ने अपना कोट फर्श पर बिछाया। हाथ धोने को सैनिटाइजर निकाला। फोन को दीवार से टिकाया। बाहर से गार्ड की आवाज आ रही थी कि टीम रास्ते में है, मगर अंदर हर सेकंड पहाड़ था।
अदिति ने दांत भींचे।
—जब बच्ची निकले, उसे संभालना। गर्दन का ध्यान रखना। अगर रोए नहीं, तो मुंह साफ करना, पीठ मलना। घबराना मत।
—मैं यहीं हूं।
दर्द ने अदिति को दोहरा कर दिया। अर्जुन उसके पास घुटनों पर बैठा रहा। उसकी आवाज कांपती थी, पर टूटती नहीं थी।
—अदिति, मेरी तरफ देखो। तुम अकेली नहीं हो। एक सांस और। मैं देख रहा हूं। हां, बस… बस…
अदिति चीखी। अंधेरी लिफ्ट में उसका स्वर सीमेंट की दीवारों से टकराकर वापस आया। उसने धक्का दिया। फिर दूसरा। फिर तीसरा।
अचानक दर्द का आकार बदल गया।
फिर खामोशी।
अदिति की आंखें फैल गईं।
—रो क्यों नहीं रही?
अर्जुन की हथेलियों में बहुत छोटी, नाजुक, नीली-सी बच्ची थी। उसका पूरा अहंकार, पूरा अतीत, पूरा डर उस छोटे-से शरीर के सामने धूल हो गया।
—मेरी बच्ची… आवाज दो… प्लीज…
उसने वैसा ही किया जैसा अदिति ने कहा था। मुंह साफ किया। पीठ रगड़ी। एक पल। 2 पल। 3 पल।
फिर लिफ्ट के अंधेरे में एक पतली, गुस्सैल, जिंदा चीख गूंजी।
अदिति रो पड़ी।
अर्जुन ने बच्ची को अदिति के सीने पर रखा।
—वो आ गई। हमारी बेटी आ गई।
जब लिफ्ट खुली, नंदिता और पूरी टीम बाहर तैयार थी। बच्ची को तुरंत नवजात आईसीयू ले जाया गया। वह बहुत छोटी थी, मगर उसकी मुट्ठियां बंद थीं, जैसे दुनिया से पहले ही लड़ने को तैयार हो।
अदिति ने उसका नाम रखा—आशा।
3 हफ्ते अस्पताल में बीते। अर्जुन ने प्लास्टिक की कुर्सी पर रातें काटीं। वह आशा की इनक्यूबेटर के पास बैठकर उसे सिया की कहानियां सुनाता, अदिति की ड्यूटी वाली आदतों पर हंसता, फिर अचानक चुप होकर कांच पर हाथ रख देता।
सावित्री देवी एक बार अस्पताल आईं। महंगी रेशमी साड़ी, माथे पर बड़ी बिंदी, चेहरे पर पश्चाताप से ज्यादा अधिकार। रिसेप्शन ने उन्हें रोका। अर्जुन खुद नीचे गया।
—मुझे मेरी पोती देखनी है।
—आपकी पोती नहीं, मेरी बेटी। और अभी उसकी सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है।
—मैंने गलती की, पर मैं मां हूं।
—मां होना किसी की जिंदगी पर मालिकाना हक नहीं देता।
सावित्री देवी ने पहली बार अर्जुन को ऐसे देखा जैसे वह उनका बेटा नहीं, कोई दरवाजा हो जो बंद हो चुका हो। वे लौट गईं। बाद में अदालत ने अदिति और दोनों बच्चियों के लिए सुरक्षा आदेश दिया। सावित्री देवी को काउंसलिंग और परिवार अदालत की निगरानी में सीमित दूरी के नियम मानने पड़े। यह फिल्मी सजा नहीं थी, मगर असली दुनिया में कभी-कभी यही सबसे बड़ा दंड होता है—जिस घर को नियंत्रित किया, उसी घर के बाहर खड़ा रह जाना।
आशा जब अस्पताल से घर जाने वाली थी, अर्जुन अदिति के पास एक साधारण कपड़े की डायरी लेकर आया। उसमें किसी बड़े महल का नक्शा नहीं था। गुरुग्राम की ऊंची दीवारों वाला बंगला भी नहीं। उसमें दिल्ली के एक शांत मोहल्ले में छोटा-सा घर बना था। एक कमरा अदिति की किताबों के लिए, एक कोना सिया के पियानो के लिए, धूप वाला कमरा आशा के लिए, और बालकनी में तुलसी का गमला।
आखिरी पन्ने पर उसने लिखा था—
“इस बार घर दीवारों से नहीं, सच से बनेगा।”
वह अदिति के सामने झुका। अंगूठी बहुत महंगी नहीं थी। सोने की पतली अंगूठी थी, जिसमें 2 धागों जैसा डिजाइन था—जैसे टूटी रेखाएं मिलकर फिर रास्ता बनाती हों।
—मैं तुम्हें भूलने को नहीं कहूंगा। मैं तुम्हें जल्दी माफ करने को भी नहीं कहूंगा। बस इतना पूछता हूं, क्या मुझे तुम्हारे साथ चलते हुए वह सब ठीक करने का मौका मिलेगा जिसे मैंने डर और चुप्पी से तोड़ा?
अदिति ने आशा को सीने से लगाया। सिया उसके पास खड़ी थी, आंखों में उम्मीद लेकर। मीरा दरवाजे से टेक लगाए मुस्कुरा रही थी, जैसे कह रही हो—सोच-समझकर, पर डरकर नहीं।
अदिति ने अर्जुन को देखा। वह अब वही आदमी नहीं था जो बारिश में चुप खड़ा रहा था। वह घायल था, पछता रहा था, मगर पहली बार भाग नहीं रहा था।
—हां —अदिति ने धीरे कहा— लेकिन इस बार कोई तीसरा हमारे लिए फैसला नहीं करेगा।
3 साल बाद उस छोटे घर की बालकनी में सचमुच तुलसी का गमला है। सिया बेसुरी धुन बजाती है और खुद ही ताली बजा देती है। आशा नंगे पांव भागती है और हर चीज को जीत की तरह पकड़ती है। अर्जुन रविवार को चाय बनाता है, कभी ज्यादा अदरक डाल देता है, कभी दूध उबाल देता है। अदिति अब भी अस्पताल जाती है, मगर लौटते समय उसे पता होता है कि घर में रोशनी जल रही होगी।
मीरा त्योहारों पर आती है। सिया उसे “मीरा मां” नहीं कहती, मगर उसके लिए राखी पर मिठाई जरूर बचाती है। रिश्ते नाम से नहीं, निभाने से बनते हैं।
सावित्री देवी कभी-कभी चिट्ठियां भेजती हैं। अदिति उन्हें तुरंत नहीं खोलती। कुछ घावों को जवाब देने से पहले सांस लेना जरूरी होता है। मगर उसने नफरत को अपनी बेटियों की विरासत नहीं बनने दिया।
एक शाम आशा ने पुरानी टूटी हुई संगीत डिब्बी घुमा दी, जिसे अर्जुन ने अदिति के जाने के बाद ठीक किया था। धीमी धुन कमरे में फैल गई। अदिति ने उसे सुनते हुए सोचा, कुछ चीजें टूटने के बाद पहले जैसी नहीं बनतीं।
वे अगर सच, पछतावे और धैर्य से जुड़ें, तो पहले से ज्यादा गहरी आवाज में बजती हैं।
और शायद घर भी वही होता है—जहां कोई बच्चा यह सुनकर बड़ा न हो कि उसका जन्म किसी की इज्जत के खिलाफ था, बल्कि यह जानकर बड़ा हो कि उसके आने से किसी ने पहली बार सच का दरवाजा खोला था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.