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आधी रात चोरी करने घुसी गरीब औरत ने जब रस्सी से बंधी बच्ची को रजाई बचाते सुना, “क्या माँ मुझे फिर बेचने आई है?”, तो एक गंदे घर की दीवारों के पीछे छिपा बच्चा बेचने वाला नरक सबके सामने खुल गया

PART 1

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“क्या मेरी माँ मुझे फिर से बेचने आई है?”

7 साल की बच्ची ने यह पूछा, और नीलम के हाथ से चोरी की टॉर्च लगभग छूट गई।

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उस रात नीलम किसी की जान बचाने नहीं निकली थी। वह चोर बनकर उस बंद से दिखने वाले मकान में घुसी थी। पुरानी सलवार के ऊपर काला दुपट्टा, जेब में छोटा चाकू, कंधे पर खाली थैला और पेट में 2 दिन की अधपकी भूख। पुरानी दिल्ली की एक तंग गली में, जामा मस्जिद से आगे, रात के 1 बजे सब दुकानें बंद थीं। लोहे का गेट आधा खुला था, सीसीटीवी कैमरे टूटे हुए थे और ऊपर की बालकनी में कपड़े ऐसे लटक रहे थे जैसे घर में लोग हों, पर जिंदगी न हो।

नीलम ने सोचा था, अंदर कुछ नकद, कुछ गहना, कोई मोबाइल मिल जाएगा। वह गलत थी।

घर के भीतर अगरबत्ती की बुझी गंध, बासी दाल, गीले कपड़ों और बंद डर की मिली-जुली हवा थी। कमरे में बिखरे खिलौने थे, एक टूटी गुड़िया थी, दीवार पर देवी की छोटी तस्वीर थी, और फर्श पर चिपका हुआ दूध का पुराना दाग। मगर कोई आवाज नहीं थी।

फिर अंधेरे गलियारे से एक बहुत हल्की आवाज आई।

“मेरी रजाई मत ले जाना, प्लीज।”

नीलम ने मोबाइल की रोशनी उस तरफ घुमाई और जम गई।

दीवार से सटी एक बच्ची बैठी थी। बहुत दुबली, आंखें बड़ी लेकिन सूखी, होंठ फटे हुए, कलाई में नायलॉन की रस्सी बंधी हुई। उसने बैंगनी रजाई को ऐसे सीने से चिपका रखा था जैसे वही उसकी आखिरी दुनिया हो।

वह रो नहीं रही थी। यही सबसे डरावना था।

“तेरा नाम क्या है?” नीलम ने फुसफुसाकर पूछा।

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“आरुही।”

“तेरी माँ कहाँ है?”

बच्ची ने दरवाजे की तरफ देखा, जैसे वहां कोई अदृश्य आवाज खड़ी हो।

“वो अंकल के साथ गई है। जिसके हाथ में बहुत सारी अंगूठियां होती हैं। बोली, आज अगर चुप रही तो खाना मिलेगा।”

नीलम के भीतर कुछ उलट गया। वह चोरी करने आई थी, लेकिन उस पल उसे लगा असली चोरी इस घर में पहले से हो चुकी थी—किसी ने एक बच्ची से उसका बचपन चुरा लिया था।

रसोई में उसे आधी सूखी रोटी, थोड़ा चावल और स्टील के गिलास में बदबू मारता पानी मिला। उसने चावल गरम करने की कोशिश की, पर गैस खाली थी। उसने रोटी के छोटे टुकड़े किए और बच्ची के सामने रखे।

आरुही ने पहले रोटी को छुआ, फिर सूंघा।

“इसमें दवा नहीं है?” उसने पूछा।

नीलम का गला भर आया।

“नहीं।”

“सच?”

“सच।”

बच्ची ने इतने धीरे खाना शुरू किया जैसे हर कौर वापस छिन सकता था।

नीलम ने रस्सी खोलनी चाही तो आरुही पत्थर हो गई।

“नहीं। अगर उसने देखा तो मारेगी। पिछली बार बहुत मारा था।”

“कौन?”

“जो सबके सामने कहती है कि मैं उसकी बेटी हूँ।”

तभी बाहर एक कार रुकी। आरुही की सांस अटक गई।

“वो आ गई।”

नीलम ने मोबाइल बंद किया, बच्ची को अपनी तरफ खींचा और भागने का रास्ता देखने लगी। तभी उसकी नजर मुख्य दरवाजे के पीछे चिपके एक मुड़े हुए कागज पर पड़ी। उसने उसे खींचकर देखा।

वह गुमशुदा पोस्टर था।

आरुही शर्मा। उम्र 7। लापता: 11 महीने से।

और तभी दरवाजा खुल गया।

PART 2

पहले सस्ते इत्र और बीड़ी की गंध आई, फिर चूड़ियों की खनक।

“आरुही बेटा, माँ आ गई,” एक औरत ने मीठी आवाज में कहा।

नीलम टूटे सोफे के पीछे बच्ची को सीने से चिपकाकर बैठ गई। आरुही इतनी कांप रही थी कि उसकी हड्डियां नीलम की बांहों में चुभ रही थीं।

औरत ने लाइट जलाई। उसके पीछे एक भारी आदमी खड़ा था, जिसकी हर उंगली में मोटी अंगूठी थी।

“तैयार है माल?” उसने पूछा।

औरत बोली, “पहले थोड़ा खिला दूं। इतनी कमजोर दिखेगी तो दाम घटा देंगे।”

नीलम की सांस रुक गई।

आदमी हंसा। “कमजोर रहेगी तो छोटी लगेगी। खरीदार को यही चाहिए।”

उस एक वाक्य ने नीलम की सारी चोरी, सारी भूख, सारी गंदगी को पीछे धकेल दिया।

औरत ने खाली कोना देखा।

“आरुही?”

आदमी सीधा सोफे की तरफ बढ़ा।

नीलम ने सोचा नहीं। वह उठी, गुमशुदा पोस्टर उसके चेहरे पर फेंका और आरुही को उठाकर गलियारे की ओर भागी।

“चोर!” औरत चिल्लाई। “मेरी बेटी को ले जा रही है!”

“बेटी” शब्द उसके मुंह में जहर जैसा लगा।

आदमी ने नीलम का दुपट्टा पकड़ लिया। नीलम लड़खड़ाई, पर बच्ची को नहीं छोड़ा। उसने चाकू से उसके पैर पर हल्का वार किया और सीढ़ियों की तरफ भागी।

“ऊपर छत है,” आरुही ने कांपते हुए कहा। “बाएं तरफ रोटी की खुशबू आती है।”

वे छत पर पहुंचे। दीवार के उस पार छोटी बेकरी थी। नीलम ने पहले आरुही को उतारा, फिर खुद कूदी। उसका टखना मुड़ गया, पर उसने चीख दबा ली।

दरवाजा खुला। सफेद बनियान और एप्रन पहने एक बूढ़ा आदमी बाहर आया।

“कौन है?”

नीलम हांफी। “बचाइए। इसे बेचने वाले हैं।”

बूढ़े ने बच्ची की कलाई की रस्सी देखी। उसने कोई सवाल नहीं किया।

“अंदर आओ। भट्ठी के पीछे छिपो।”

बाहर से औरत ने दरवाजा पीटा।

“हरभजन! दरवाजा खोल! वो मेरी बेटी है!”

बूढ़े ने बेलन उठाया।

“मेरी दुकान में आज झूठ नहीं बिकेगा।”

तभी आरुही ने फुसफुसाया, “मुझे उस कमरे में मत भेजना जहाँ बच्चों के नाम बदलते हैं।”

नीलम और बूढ़े की आंखें मिलते ही दूर से पुलिस की नीली रोशनी गली में चमक उठी।

PART 3

पुलिस की जीप गली में ऐसे घुसी जैसे किसी सोए हुए पाप का गला पकड़ने आई हो। बेकरी के टिन वाले शटर पर औरत अब रो रही थी, चीख रही थी, पड़ोसियों को जगा रही थी।

“मेरी बच्ची चुरा ली! एक नशेड़ी औरत मेरी बच्ची ले गई!”

नीलम ने आरुही को और कसकर पकड़ लिया। उसे पता था, उसकी शक्ल देखकर कोई भी सबसे पहले उसी पर यकीन करेगा। फटी चप्पल, मैले कपड़े, जेब में चाकू, रात के 1 बजे किसी और के घर से भागती हुई। सच उसके पास था, पर सच अक्सर गरीब के मुंह में झूठ जैसा लगता है।

हरभजन सिंह, जो 62 साल का पुराना बेकरी वाला था, शटर खोलकर बाहर आया। उसके हाथ में अभी भी बेलन था। उसने पुलिस वाले से कहा, “साहब, पहले बच्ची की कलाई देखिए। फिर इस औरत का नाटक सुनिए।”

एक महिला कॉन्स्टेबल अंदर आई। उसने आरुही को देखा, फिर नीलम को।

“बच्ची को अलग करो।”

आरुही अचानक चिल्लाई, “नहीं! इसे मत हटाओ! ये अच्छे कदमों वाली दीदी है!”

कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा भर गया।

नीलम ने धीरे से कहा, “मैं इसकी कोई नहीं हूँ।”

आरुही ने उसका दुपट्टा पकड़कर कहा, “झूठ। अगर कोई नहीं होती तो मुझे छोड़ देती।”

महिला कॉन्स्टेबल की आंखों में एक पल के लिए नरमी आई, लेकिन नियम नियम था। उसने सावधानी से आरुही को देखा, कलाई की रस्सी की फोटो ली, उसके गाल के पुराने निशान नोट किए। बाहर वही औरत जमीन पर बैठकर अपने सिर पर हाथ मार रही थी।

“मेरा घर बर्बाद कर दिया! मेरी बेटी बीमार है, कहानियां बनाती है!”

अंगूठियों वाला आदमी गली के मोड़ की तरफ खिसकने लगा। उसे लगा भीड़ और रोने-धोने में कोई ध्यान नहीं देगा। मगर हरभजन ने उसे देख लिया। बूढ़े ने उम्र से नहीं, गुस्से से दौड़ लगाई और उसके सामने आकर अड़ गया।

“किधर, राजा बाबू?”

आदमी ने धक्का दिया। हरभजन गिरा, पर उसने उसके पैर पकड़ लिए। पुलिस ने दौड़कर आदमी को दबोच लिया। उसकी जेब से 3 फोन निकले, 1 छोटा पाउच, और कुछ पर्चियां जिन पर बच्चों के नाम, उम्र और अजीब कोड लिखे थे।

नीलम को भी पकड़ा गया। वह विरोध नहीं कर सकती थी। उसने सचमुच चोरी के इरादे से घर में घुसपैठ की थी। उसे अलग जीप में बैठाया गया। आरुही ने जैसे ही उसे जाते देखा, वह फिर टूट गई।

“दीदी को मत ले जाओ! वो मुझे बेचने नहीं आई थी!”

एक इंस्पेक्टर ने नीलम से पूछा, “नाम?”

“नीलम।”

“पूरा नाम?”

“नीलम यादव।”

“घर?”

वह चुप रही। घर नाम की चीज उसके पास 4 साल से नहीं थी। कभी गाजीपुर मंडी के पीछे, कभी पुरानी दिल्ली स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर, कभी किसी धर्मशाला के बरामदे में। उसके पिता की मौत के बाद रिश्तेदारों ने उसे बोझ कहा, पति ने दहेज कम बताकर पीटा, और शहर ने उसे धीरे-धीरे इंसान से छाया बना दिया।

“मैं भागूंगी नहीं,” उसने थके स्वर में कहा। “बस बच्ची को उसी औरत को मत देना।”

उन्हें थाने नहीं, सीधे महिला थाना और फिर अस्पताल ले जाया गया। आरुही की मेडिकल जांच हुई। उसके शरीर पर पुराने चोटों के निशान थे, कलाई पर रगड़, पीठ पर नीले धब्बे, और पेट में कुपोषण की लकीरें। डॉक्टर ने रिपोर्ट लिखते हुए आंखें झुका लीं।

चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की अधिकारी आईं। उन्होंने आरुही से बहुत धीरे-धीरे बात की। पहले रंग पूछे, फिर रजाई के बारे में, फिर घर के बारे में। आरुही हर बार रजाई को पकड़े रहती।

“तुम्हें उस औरत का नाम पता है?” अधिकारी ने पूछा।

“वो अपना नाम कभी पूजा बताती थी, कभी रीना। मुझे बोलती थी, बाहर किसी से कहना कि मैं उसकी बेटी हूँ।”

“और असली माँ?”

आरुही की आंखें पहली बार पूरी तरह भर आईं।

“मेरी माँ का नाम सविता है। वो रात को तेल लगाकर मेरी चोटी बनाती थी। उसके हाथ से हल्दी और साबुन की खुशबू आती थी। वो मुझे आरु नहीं, गुड़िया बुलाती थी।”

नीलम, जो दरवाजे के बाहर बेंच पर बैठी थी, यह सुनकर दीवार से सिर टिकाकर रो पड़ी। वह रोना अपने लिए नहीं था। वह उस माँ के लिए था जो 11 महीने से अपनी बच्ची की चोटी बनाने को हाथ फैलाए रही होगी।

सुबह 5 बजे पुलिस ने गुमशुदा पोस्टर के पुराने केस को मिलाया। आरुही सच में गायब थी। उसे 11 महीने पहले गाजियाबाद के एक मेले से उठाया गया था। उसकी माँ सविता शर्मा, एक स्कूल की रसोई में काम करने वाली विधवा, रोज थाने जाती रही थी। कई लोगों ने उसे पागल कहा था। कुछ रिश्तेदारों ने कहा था कि बच्ची शायद मर चुकी है। लेकिन उसने पोस्टर छपवाए, मंदिरों के बाहर लगाए, बस अड्डों पर चिपकाए, और हर राखी, हर दिवाली, हर होली पर दरवाजा खुला रखा।

सुबह 8 बजे सविता अस्पताल पहुँची।

उसका दुपट्टा उल्टा था, बाल बिखरे थे, हाथ में पुरानी फाइल थी जिसमें एफआईआर की कॉपी, आरुही की फोटो, जन्म प्रमाण पत्र और 11 महीने की थकान भरी हुई थी। वह दौड़ती हुई कमरे तक आई, लेकिन दरवाजे पर रुक गई।

अंदर आरुही बैठी थी, रजाई पकड़े हुए।

“आरु…” सविता की आवाज टूट गई।

आरुही ने गर्दन उठाई। उसकी आंखें खाली से भरी हुई होने लगीं।

“माँ?”

सविता उस पर झपटी नहीं। वह घुटनों के बल बैठ गई, दोनों हाथ जोड़ दिए, जैसे अपनी ही बच्ची से इजाजत मांग रही हो।

“गुड़िया, मैं हूँ। मैं देर से आई, पर मैंने ढूंढना बंद नहीं किया।”

आरुही धीरे-धीरे उठी। उसने पहले रजाई छोड़ी, फिर 1 कदम चली, फिर दौड़ पड़ी। सविता ने उसे पकड़ा और ऐसी आवाज निकली जैसे 11 महीने से अटका हुआ जीवन एक साथ बाहर आया हो।

नीलम ने चेहरा फेर लिया। यह आलिंगन उसका नहीं था। लेकिन उसे देखकर उसके भीतर की कोई सूखी जगह पहली बार भीग गई।

सविता ने बाद में नीलम को देखा। उसके सामने आई। पुलिस, डॉक्टर, अधिकारी सब खड़े थे।

“आपने मेरी बेटी को पाया?”

नीलम ने सिर झुका लिया।

“मैं चोरी करने गई थी।”

सविता ने उसके हाथ पकड़ लिए।

“लेकिन लौटी मेरी बेटी के साथ।”

नीलम शर्म से काँप गई। “मैं अच्छी औरत नहीं हूँ।”

सविता ने कहा, “उस रात आपने अच्छा चुना। कभी-कभी आदमी की पूरी जिंदगी एक ही रात में तौली जाती है।”

जांच आगे बढ़ी तो घर की दीवारों के पीछे छिपे नरक खुलने लगे। पूजा उर्फ रीना के फोन में कई बच्चों की तस्वीरें मिलीं। कुछ को नए नाम दिए गए थे। कुछ को “काम के लिए”, कुछ को “गोद” के नाम पर, कुछ को दूर शहर भेजने की बातें थीं। अंगूठियों वाला आदमी पहले दलाल निकला, फिर मुखबिरों के जरिए पूरी श्रृंखला खुलने लगी। मेरठ, जयपुर, आगरा और दिल्ली की झुग्गियों से जुड़े नाम सामने आए।

हर सच राहत नहीं देता। कुछ सच सीने में पत्थर रख देते हैं।

2 बच्चे उसी हफ्ते बरामद हुए। 1 लड़का अपने असली नाम को भूल चुका था। 1 बच्ची किसी को छूने नहीं देती थी। कई पते झूठे निकले। कई दरवाजे खाली मिले। पुलिस ने कहा जांच जारी है। मीडिया आई, कैमरे आए, सवाल आए। सविता ने किसी कैमरे पर चेहरा नहीं दिखाया। उसने सिर्फ इतना कहा, “मेरी बेटी कोई खबर नहीं है। वह बच्ची है। उसे शांति चाहिए।”

नीलम पर केस दर्ज हुआ, पर उसके बयान, कॉल रिकॉर्ड, बच्ची की गवाही और हरभजन की पुष्टि के बाद अदालत ने उसे हिरासत में रखने के बजाय निगरानी में छोड़ा। उसे थाने में नियमित हाजिरी लगानी थी। चाकू जब्त हुआ। चोरी का प्रयास लिखा गया। पर उसी फाइल में यह भी लिखा गया कि उसने अपहृत बच्ची को तत्काल खतरे से निकाला।

हरभजन तीसरे दिन थाने आया। हाथ में गरम बन और कड़क चाय थी।

“चल,” उसने नीलम से कहा।

“कहाँ?”

“बेकरी।”

“मुझे रोटी बनाना नहीं आता।”

“मुझे भी उस रात हीरो बनना नहीं आता था। फिर भी बन गया।”

नीलम ने पहली बार हल्की मुस्कान दी।

“मैं चोर हूँ।”

हरभजन ने तिरछी नजर से देखा। “तो आटा संभाल। वहाँ चोरी करने को कुछ नहीं, मेहनत बहुत है।”

बेकरी का नाम था “नई उम्मीद बेकर्स।” पहले यह नाम नीलम को मजाक लगा। फिर धीरे-धीरे उसने सीखा कि आटे को कैसे गूंधना है, खमीर को कैसे इंतजार देना है, भट्ठी की आग को कब तेज करना है। उसे समझ आया कि रोटी भी इंसान जैसी होती है—जल्दी धकेलो तो टूटती है, समय दो तो फूलती है।

आरुही कुछ महीनों तक बाल मनोवैज्ञानिक के पास गई। वह अचानक तेज आवाज से डर जाती। कोई दरवाजा जोर से बंद करता तो रजाई खोजती। रात में कई बार उठकर सविता का चेहरा छूती, जैसे जांचती हो कि माँ सच में है या सपना। सविता ने नौकरी छोड़ी नहीं। सुबह स्कूल की रसोई, दोपहर काउंसलिंग, शाम आरुही की चोटी। गरीबी अभी भी थी, पर अब घर में ताला बाहर से नहीं, अंदर से लगता था।

नीलम आरुही से मिलने पहले झिझकती थी। उसे डर था कि बच्ची उसे उस रात से जोड़ देगी। लेकिन एक रविवार को सविता खुद बेकरी आई। आरुही उसके पीछे छिपी थी, हाथ में वही बैंगनी रजाई।

“आरु, बोलो,” सविता ने धीरे कहा।

आरुही ने नीलम की तरफ देखा।

“दीदी, आपने मेरे लिए गोल बन बनाया?”

नीलम हंसते-हंसते रो पड़ी। उसने ताजा बन में मक्खन लगाया और प्लेट आगे कर दी।

“ये तेरे लिए। इसमें दवा नहीं है।”

आरुही ने पहली बार बिना सूंघे खाया।

1 साल बाद आरुही का 8वां जन्मदिन उसी बेकरी के पीछे वाले आंगन में मनाया गया। रंग-बिरंगी झालरें थीं, छोटे समोसे थे, गुलाब जामुन थे, और हरभजन ने थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा केक बनाया था जिस पर क्रीम से लिखा था—“आरु की नई सुबह।”

पड़ोस की औरतें आईं, स्कूल की रसोई वाली आंटियां आईं, महिला कॉन्स्टेबल भी आई जिसने उस रात आरुही को अलग करना चाहा था, और नीलम आटे से सने हाथों में मोमबत्तियां लेकर खड़ी थी।

जब सबने जन्मदिन का गीत गाया, आरुही ने मोमबत्ती बुझाने से पहले नीलम का हाथ पकड़ा।

“दीदी।”

“हाँ, आरु?”

“अब मुझे वो बुरा घर कम सपने में आता है।”

“अच्छा है।”

“लेकिन जब आता है ना, तो आप दरवाजा तोड़कर आती हो। फिर मुझे पता चल जाता है कि मैं बिकूंगी नहीं।”

नीलम ने कुछ कहना चाहा, पर शब्द गले में अटक गए। उसने बस उसके सिर पर हाथ रखा।

उस रात वह चोरी करने गई थी। वह किसी की अलमारी खाली करना चाहती थी, किसी अनजान घर से कुछ उठाकर भागना चाहती थी। पर उसी अंधेरे घर से वह एक बच्ची को उठाकर लाई, जिसने रोना भी छोड़ दिया था, पर अपनी रजाई नहीं छोड़ी थी।

और शहर की उस तंग गली ने देखा कि इंसान हमेशा अपने पिछले पापों से नहीं पहचाना जाता। कभी-कभी वह उस एक दरवाजे से पहचाना जाता है, जिसे खोलकर वह भाग सकता था, मगर उसने किसी और को साथ लेकर भागना चुना।

नीलम आज भी हर सुबह भट्ठी जलाने से पहले दरवाजे के बाहर देखती है। उसे याद रहता है कि अंधेरा हमेशा बुरा नहीं होता। कभी-कभी वही अंधेरा किसी भूखी चोरनी को उस सही घर तक ले जाता है, जहाँ चोरी करने से पहले उसे इंसान बनना पड़ता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.