
PART 1
अस्पताल से 5 हफ्ते बाद लौटी अदिति शर्मा को अपने ही फ्लैट के दरवाजे पर उसकी सास कमला मल्होत्रा ने रोक दिया और चिल्लाकर कहा, “यह घर मेरे बेटे ने मेरे लिए खरीदा है, तुम अभी बाहर निकलो।”
दिल्ली की उस बरसाती रात में अदिति के हाथ से सूटकेस लगभग छूट गया। उसके बाल बारिश से भीगे थे, आँखों में नींद की किरकिराहट थी और शरीर में लखनऊ के अस्पताल की थकान अटकी हुई थी, जहाँ उसकी छोटी बहन स्नेहा का 5 घंटे लंबा ऑपरेशन हुआ था। वह पूरे रास्ते बस एक ही चीज सोचती आई थी—अपने घर का दरवाजा खोलेगी, चप्पल उतारेगी, पानी पिएगी और बिना किसी सवाल के सो जाएगी।
लेकिन दरवाजा खुलते ही उसका घर उसका नहीं लगा।
कमला मल्होत्रा उसके सोफे पर बैठी थीं, अदिति की नानी की रेशमी शॉल ओढ़े हुए, पैरों में नए मखमली चप्पल, और हाथ में वही सफेद नीली कढ़ाई वाली चाय की प्याली, जिसे अदिति ने अपनी नानी की आखिरी निशानी की तरह संभाल रखा था। प्याली की मूठ में हल्की दरार थी, पर नानी कहा करती थीं, “जो चीज अब भी गर्माहट थाम सके, उसे फेंकना पाप है।”
अब उस प्याली पर कमला की गहरी मरून लिपस्टिक का निशान था।
अदिति ने चारों तरफ देखा। दीवार से उसके माता-पिता की बनारस वाली तस्वीर गायब थी। स्नेहा की बचपन की फोटो, जिसमें वह राखी पर टेढ़ा मुकुट पहने हँस रही थी, नहीं थी। वह फ्रेम भी नहीं था जिसमें अदिति ने फ्लैट की चाबी पकड़कर पहली बार मुस्कुराया था। उनकी जगह अब पीतल की घंटियाँ, भारी अगरबत्तीदान, प्लास्टिक के फूल और परिवार पर लिखे उपदेशों वाले कुशन रखे थे। उसकी खरीदी हुई मधुबनी पेंटिंग उतार दी गई थी और सामने दीवार पर एक विशाल सुनहरी देवी की तस्वीर टाँग दी गई थी।
घर की गंध भी बदल चुकी थी—अगरबत्ती, गरम किया हुआ राजमा, सस्ती फिनाइल और कब्जे की ठंडी बू।
“आप यहाँ क्या कर रही हैं?” अदिति की आवाज थकी हुई थी, मगर टूटी नहीं।
कमला ने प्याली टेबल पर पटक दी। “मुझसे ऐसे बात मत करो जैसे तुम्हारा अभी भी इस घर पर कोई हक है।”
“यह मेरा घर है।”
“था,” कमला ने ठंडी मुस्कान के साथ कहा। “रोहन ने सब कागज ठीक कर दिए हैं। तुम 1 महीने से ज्यादा घर छोड़कर बैठी थीं। पति, ससुराल, जिम्मेदारी सब छोड़ दी। मेरा बेटा कब तक तुम्हारी अकड़ सहता?”
अदिति ने धीरे से सूटकेस नीचे रखा। “मेरी चीजें कहाँ हैं?”
“समेट दीं। जो रखने लायक थीं, वो स्टोर में डाल दीं। बाकी कूड़ा तो कूड़ा ही होता है।”
अदिति के भीतर कुछ चटक गया, मगर उसने चीखा नहीं। वह 2 कदम अंदर बढ़ी। बेडरूम का दरवाजा आधा खुला था। उसकी साड़ियाँ कुर्सी से गायब थीं। दरवाजे के पीछे कमला का फूलदार गाउन टँगा था। ड्रेसिंग टेबल पर उसकी क्रीमों की जगह कमला की दवाइयाँ, तेल और कंघियाँ रखी थीं। दराज पर एक बिजली का बिल पड़ा था, नाम था—कमला मल्होत्रा।
“अब आपके नाम पर चिट्ठियाँ भी आने लगीं?”
“क्यों नहीं? मैं यहीं रहती हूँ।”
“आप मेरे घर में बिना इजाजत घुसी हैं।”
कमला हँसीं। “बहू, शादी के बाद औरत का घर वही होता है जहाँ उसका पति चाहे। और रोहन ने यह फ्लैट अपनी माँ के लिए लिया है। तुम कमाती थीं तो क्या हुआ? घर आखिर मर्द के नाम से चलता है।”
यह झूठ अदिति की छाती में पत्थर की तरह गिरा।
यह फ्लैट उसने शादी से 3 साल पहले खरीदा था। गुरुग्राम की नौकरी, 10 साल की बचत, बोनस, छोटी-छोटी कटौतियाँ, सस्ती बसें, किराए के कमरे—सब जोड़कर। रोहन ने 1 रुपया भी डाउन पेमेंट में नहीं दिया था। EMI कभी नहीं भरी थी। उल्टा दोस्तों के सामने कहता था, “हमारा फ्लैट मेरी दूरदर्शिता की वजह से इतना महँगा हो गया।”
“फ्लैट मेरे नाम है,” अदिति ने साफ कहा।
कमला ने ठोड़ी उठा ली। “अब नहीं।”
“मतलब?”
“मतलब रोहन ने कागज पर सब संभाल लिया। तुम बस वह औरत हो जिसे अपने पति से ज्यादा अपनी तनख्वाह प्यारी थी।”
अदिति ने घूरकर उन्हें देखा। 4 महीने से वह और रोहन अलग रह रहे थे। तलाक नहीं हुआ था, मगर रिश्ता खत्म हो चुका था। वह कभी-कभी “अपनी फाइल लेने”, “पुरानी शर्ट उठाने” या “आखिरी बार बात करने” के बहाने आता था। अदिति ने दया में उसे 2 बार चाबी दी थी। वही दया अब उसकी नसों में जहर लग रही थी।
“ताला आपने बदला?”
“रोहन ने चाबी दी।”
“इमरजेंसी वाली डुप्लीकेट।”
“चाबी, चाबी होती है।”
कमला और पास आईं। “और बिल्डिंग में ड्रामा मत करना। रोहन ने सबको बता दिया है कि अलगाव के बाद तुम मानसिक रूप से कमजोर हो गई हो। तुम बातें बनाती हो। तुम्हें मुझसे जलन है, क्योंकि मेरा बेटा मुझे तुमसे ज्यादा चाहता है।”
अदिति समझ गई—यह सिर्फ कब्जा नहीं था, कहानी भी पहले से लिखी जा चुकी थी। पड़ोसियों के लिए वह पागल पत्नी थी। कमला बेचारी माँ। रोहन जिम्मेदार बेटा।
सालों से वह छोटे-छोटे अपमान सहती आई थी। रविवार के खाने पर कमला पूछतीं, “बहू, इतना कमाकर भी घर संभालना नहीं सीखा?” रोहन हँसकर कहता, “अदिति थोड़ी बॉस टाइप है, दिल से बुरी नहीं।” हर बार अदिति को ही समझदार, शांत, समायोजक होना पड़ता था।
मगर अपनी नानी की प्याली में किसी और की लिपस्टिक देखकर उसके भीतर की आखिरी नरमी मर गई।
उसने फोन निकाला।
“मिस्टर गुप्ता? मैं अदिति शर्मा, फ्लैट 904। मेरे घर में एक अनधिकृत व्यक्ति कब्जा करके बैठा है और मुझे बाहर निकालने की धमकी दे रहा है। कृपया सिक्योरिटी और एसोसिएशन से किसी को ऊपर भेजिए।”
कमला का चेहरा पल भर को सफेद पड़ा, फिर वह फिर गरजीं। “किसी को भी बुला लो। मेरे बेटे के पास कागज हैं।”
“अच्छा है,” अदिति ने कहा। “वह दिखा देगा।”
15 मिनट बाद कॉरिडोर में कमला की आवाज गूँज रही थी। गार्ड, सोसायटी सेक्रेटरी और 3 पड़ोसी जमा हो चुके थे। रजिस्टर में फ्लैट 904 की मालिक सिर्फ अदिति शर्मा थी। कमला के नाम कोई एंट्री नहीं, कोई अनुमति नहीं, कोई किरायेदारी नहीं।
लिफ्ट में जाते-जाते कमला ने पलटकर कहा, “रोहन आएगा, तब समझेगी। तूने सिर्फ पति नहीं खोया, छत भी खो देगी।”
दरवाजा बंद हुआ।
अदिति ने घर में लौटकर चाबी घुमाई। फिर नानी की प्याली धोई। दाग तो उतर गया, पर अपमान दिमाग में जलता रहा।
वह कमरे-से-कमरे घूमी। उसके कपड़े काले कचरे के थैलों में भरे थे। किताबें स्टोर में फेंकी थीं। बाथरूम में कमला की चीजें थीं। फिर वह स्टडी कॉर्नर पर पहुँची, जहाँ रोहन महीनों से अपना “अस्थायी ऑफिस” बनाकर बैठता था। नीचे की दराज बंद थी।
अदिति रोहन को जानती थी। वह सिर्फ वही चीज लॉक करता था जिसे छिपाना चाहता था।
पुरानी चाबियों की डिबिया से 4वीं चाबी लगी।
दराज खुली।
अंदर एक भूरे फोल्डर पर लिखा था—“माँ / निवास / बैंक।”
अदिति वहीं फर्श पर बैठ गई, क्योंकि अंदर रखे 3 दस्तावेज पूरे मल्होत्रा परिवार की नींव हिलाने वाले थे।
PART 2
पहला दस्तावेज एक निवास-स्वीकृति पत्र था, जिस पर अदिति के नकली हस्ताक्षर थे। उसमें लिखा था कि कमला मल्होत्रा को फ्लैट 904 में स्थायी पारिवारिक निवास की अनुमति है। हस्ताक्षर इतने मिलते-जुलते थे कि अदिति की उंगलियाँ ठंडी पड़ गईं।
दूसरा दस्तावेज रोहन के बिजनेस लोन की फाइल थी। उसमें फ्लैट को “दंपति की संयुक्त पारिवारिक संपत्ति” बताकर गारंटी की तरह दिखाया गया था।
तीसरा दस्तावेज और भयानक था—एक ब्रोकर को लिखा पत्र, जिसमें रोहन ने लिखा था कि “पत्नी सिद्धांततः सहमत है, मगर पारिवारिक मेडिकल कारणों से फिलहाल उपलब्ध नहीं।”
अदिति ने हर पन्ने की फोटो ली। घर की वीडियो बनाई। कमला के बिल, दवाइयाँ, सामान, सब रिकॉर्ड किया। फिर अपनी वकील नंदिता राव को कॉल किया।
“कुछ मत बोलना। कुछ मत साइन करना। रोहन को अंदर मत आने देना,” नंदिता की आवाज चाकू जैसी शांत थी। “यह अब पति-पत्नी का झगड़ा नहीं, जालसाजी और संपत्ति हड़पने की कोशिश है।”
उसी पल घंटी बजी।
1 बार।
2 बार।
3 बार।
दरवाजे के बाहर रोहन खड़ा था।
“अदिति, दरवाजा खोलो। अगर तुमने अभी बात नहीं की, तो सब बर्बाद हो जाएगा।”
अदिति ने फोन स्पीकर पर रखा।
नंदिता बोलीं, “दरवाजा मत खोलना।”
और उसी क्षण रोहन ने धीमे से कहा, “माँ ने जो किया, वह मेरे कहने पर किया था।”
PART 3
दरवाजे के उस पार कुछ सेकंड तक सन्नाटा छाया रहा। अदिति को लगा जैसे घर की दीवारें भी साँस रोककर खड़ी हों। रोहन ने शायद समझा कि उसकी स्वीकारोक्ति फुसफुसाहट में खो जाएगी, लेकिन फोन स्पीकर पर था, रिकॉर्डिंग चल रही थी, और नंदिता राव की आवाज तुरंत उभरी।
“मिस्टर मल्होत्रा, मैं अधिवक्ता नंदिता राव बोल रही हूँ। आपकी बात दर्ज हो चुकी है। कृपया फ्लैट से दूर हट जाएँ।”
रोहन की आवाज बदल गई। “यह हमारा निजी मामला है।”
“नहीं,” नंदिता ने कहा। “यह निजी संपत्ति, नकली हस्ताक्षर, बैंक को गलत जानकारी और जबरन कब्जे का मामला है।”
बाहर से कमला की तेज आवाज आई, “वह उसकी पत्नी है! शादी में सब कुछ साझा होता है!”
नंदिता ने बिना आवाज ऊँची किए कहा, “गलत बात को ऊँची आवाज में बोलने से वह कानून नहीं बन जाती।”
अदिति दरवाजे के पास गई। उसने चेन लगाकर थोड़ा सा दरवाजा खोला। सामने रोहन था—महँगी शर्ट, थका चेहरा, मगर वही पुराना अहंकार। पीछे कमला खड़ी थीं, हाथ में रूमाल, आँखों में आँसू नहीं, सिर्फ गुस्सा।
“अदिति, बात समझो,” रोहन ने दबे स्वर में कहा। “मुझे बस एक लोन पास कराना था। मैं तुम्हारा घर बेचने नहीं जा रहा था।”
“तुमने मेरी साइन बनाई।”
“तुमने पहले भी ऐसे कागजों पर साइन किए थे। वही तो कॉपी किया।”
“उसे ही जालसाजी कहते हैं।”
रोहन ने दाँत भींचे। “तुम हर चीज को अपराध बना देती हो।”
“नहीं, रोहन। तुम अपराध को एहसान बनाकर पेश करते हो।”
कमला भड़क उठीं। “इतनी पढ़ाई-लिखाई ने इसे जहर बना दिया है। मेरे बेटे ने इसे घर दिया, इज्जत दी—”
अदिति ने पहली बार उन्हें बीच में रोका। “आपके बेटे ने मुझे यह घर नहीं दिया। मेरी नौकरी, मेरी बचत, मेरी रातें, मेरी मेहनत—इनसे यह घर बना है। और जिस रात मैं अस्पताल में अपनी बहन की जान के लिए प्रार्थना कर रही थी, उस रात आप दोनों मेरे घर में मेरी जगह बना रहे थे।”
रोहन ने कॉरिडोर की कैमरा लाइट देखी। उसका चेहरा उतर गया। “वीडियो मत बनाओ। अगर यह बैंक तक पहुँचा तो मेरा करियर खत्म हो जाएगा।”
अदिति की आवाज शांत हो गई। “करियर तुमने खत्म किया। मैंने सिर्फ दराज खोली है।”
नीचे से सोसायटी सेक्रेटरी और गार्ड आ गए। रोहन ने फिर कोशिश की—कभी प्यार से, कभी धमकी से, कभी माँ की तबीयत का हवाला देकर। कमला बार-बार कहती रहीं कि अदिति घर तोड़ने वाली औरत है। मगर जितना वे बोलतीं, उतना ही साफ होता गया कि सच क्या है।
आखिर उन्हें जाना पड़ा।
दरवाजा बंद करते ही अदिति बिखरी नहीं। वह रोई भी नहीं। उसने फोल्डर टेबल पर रखा, लैपटॉप खोला और नंदिता को हर दस्तावेज भेज दिया। रात के 2 बजे तक वह सबूतों की सूची बना रही थी—फोटो, वीडियो, बैंक फाइल, नकली हस्ताक्षर, बिल, सोसायटी रिकॉर्ड, गार्ड का बयान, कॉरिडोर फुटेज।
अगली सुबह नंदिता राव ने 5 नोटिस भेजे। बैंक को सूचना दी गई कि फ्लैट पर रोहन का कोई अधिकार नहीं है। ब्रोकर को चेतावनी भेजी गई। सोसायटी को लिखा गया कि बिना अदिति की लिखित अनुमति कोई भी डुप्लीकेट चाबी मान्य नहीं होगी। नोटरी से प्रमाणपत्र आया कि फ्लैट शादी से पहले अदिति शर्मा ने अकेले खरीदा था। पुलिस शिकायत दर्ज हुई।
2 हफ्तों में रोहन का लोन रुक गया।
1 महीने में उसका रियल एस्टेट नेटवर्क दरकने लगा। जिस बाजार में भरोसा ही पूँजी होता है, वहाँ शक आग से तेज फैलता है। पार्टनर फोन काटने लगे। एक ग्राहक ने डील वापस ली। दूसरे ने पूछा, “जिस संपत्ति को तुम अपनी बता रहे थे, वह तुम्हारी थी ही नहीं?” रोहन के पास जवाब नहीं था।
फिर संदेश आने लगे।
“तुम इतनी कठोर कैसे हो सकती हो?”
“हमने अच्छे दिन भी देखे हैं।”
“माँ बीमार है।”
“मैंने तुमसे प्यार किया था।”
अदिति ने कोई जवाब नहीं दिया। हर संदेश उसे उसी दरवाजे की याद दिलाता, जहाँ खड़े होकर उसे अपने घर से निकल जाने को कहा गया था।
सबसे मुश्किल दिन रविवार था। वह नीचे दूध लेने गई तो पड़ोस की मिसेज अरोड़ा ने धीरे से कहा, “बेटा, बुरा मत मानना, रोहन कह रहा था कि तुम्हें अलगाव के बाद थोड़ा मानसिक तनाव है। तुमने उसकी माँ पर झूठे आरोप लगा दिए।”
अदिति ने थकी हुई मुस्कान से पूछा, “क्या उसने बताया कि उसने मेरी नकली साइन बनाई?”
मिसेज अरोड़ा चौंक गईं। “नहीं।”
“क्या उसने बताया कि यह घर शादी से पहले मेरे नाम था?”
“नहीं।”
“तो उसने आपको कहानी नहीं सुनाई, आपको किरदार दिया।”
यह बात पूरी सोसायटी में हवा की तरह फैल गई। अगले दिन वही लोग, जो उसे अजीब नजरों से देख रहे थे, स्टोर से उसका सामान निकालने में मदद करने लगे। गार्ड ने 4 बड़े थैले वापस दिए। उनमें कपड़े, किताबें, फोटो फ्रेम और यादें थीं। एक थैले में नानी की बुनी हुई हल्दी रंग की शॉल मिली, जिस पर फिनाइल की बोतल गिरकर दाग छोड़ गई थी।
अदिति ने वह शॉल सीने से लगाई और पहली बार रो पड़ी।
वह शॉल के लिए नहीं रो रही थी। वह इस बात के लिए रो रही थी कि कुछ लोग सिर्फ घर नहीं लेते, वे उन चीजों को भी कुचल देते हैं जिनसे किसी की आत्मा बनी होती है।
तलाक की मध्यस्थता 4 महीने बाद दक्षिण दिल्ली के एक शांत दफ्तर में हुई। सफेद दीवारें, लंबी टेबल, 1 पानी की बोतल, करीने से रखे पेन—सब कुछ इतना सभ्य था कि पिछली रातों की गंदगी झूठ लगती थी।
रोहन दुबला लग रहा था। आँखों के नीचे काले घेरे थे। कमला काली साड़ी में थीं, जैसे अपने ही अधिकार के अंतिम संस्कार में आई हों। रोहन के पिता महेश मल्होत्रा भी साथ थे—एक शांत आदमी, जो शादी के 30 सालों में कमला की तेज आवाज के पीछे अपनी आवाज भूल चुका था।
नंदिता राव ने फाइल खोली। नकली निवास पत्र। बैंक दस्तावेज। ब्रोकर को भेजी ईमेल। सोसायटी फुटेज। गार्ड का बयान। फ्लैट की खरीद का प्रमाण। सामान हटाने के वीडियो। अदिति के अस्पताल टिकट। सब टेबल पर रख दिया गया।
“मेरी मुवक्किल बदला नहीं चाहती,” नंदिता ने कहा। “वह लिखित स्वीकारोक्ति, कानूनी खर्च की भरपाई, संपत्ति पर किसी भी दावे से स्थायी त्याग और कमला मल्होत्रा के लिए नो-कॉन्टैक्ट शर्त चाहती हैं।”
कमला उछल पड़ीं। “मेरे लिए नो-कॉन्टैक्ट? मैं उसकी सास हूँ!”
अदिति ने पहली बार उनकी आँखों में सीधे देखा। “आप उस रात मेरी सास होना बंद हो गई थीं, जब आपने मेरी नानी की प्याली हाथ में लेकर मुझे मेरे ही घर से निकलने को कहा था।”
कमला कुछ बोलने वाली थीं, तभी महेश मल्होत्रा ने उनका हाथ पकड़कर कहा, “कमला, चुप रहो।”
कमरे में भारी सन्नाटा फैल गया। कमला ने अपने पति को ऐसे देखा जैसे 30 साल बाद पहली बार उन्हें पहचान रही हों।
रोहन ने अदिति की ओर देखा। “तुम सच में इतना आगे जाओगी?”
“हाँ।”
“इतने सालों के बाद?”
अदिति की आँखों में थोड़ी नमी आई, मगर आवाज नहीं टूटी। “इसीलिए। इतने सालों के बाद तुम्हें पता था कि यह घर मेरे लिए क्या है। यह मेरी सुरक्षा था, मेरी मेहनत थी, मेरा आसरा था। तुमने चोट वहीं मारी जहाँ मुझे सबसे ज्यादा भरोसा था।”
रोहन ने सिर झुका लिया। “मैं दबाव में था।”
“नहीं,” अदिति ने कहा। “तुम जलन में थे। तुम कभी सह नहीं पाए कि मैं तुमसे ज्यादा कमाती हूँ। तुम कहते थे कोई फर्क नहीं पड़ता, फिर हर बिल, हर EMI, हर सफलता का बदला मुझे ताने देकर लेते थे। तुम्हें पत्नी नहीं चाहिए थी, संसाधन चाहिए था।”
कमला ने अपमान से साँस खींची, मगर इस बार किसी ने उनका साथ नहीं दिया।
रोहन ने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। उसने लिखित रूप में माना कि फ्लैट पर उसका कोई अधिकार नहीं है। उसने बैंक को अलग बयान देने पर सहमति दी। कानूनी खर्च और नुकसान की भरपाई मान ली। उसने यह भी माना कि अदिति ने कभी अपने फ्लैट को उसके बिजनेस लोन की गारंटी बनाने की अनुमति नहीं दी थी।
बैठक खत्म होने लगी तो कमला अचानक अदिति के सामने आ खड़ी हुईं। आवाज पहली बार धीमी थी। “अदिति, मेरे बेटे को मत बर्बाद करो। वह मेरा बच्चा है।”
अदिति ने बहुत देर तक उन्हें देखा। “और मैं क्या थी? एक ऐसी बहू जिसे मिटाया जा सकता था क्योंकि उसके बच्चे नहीं थे? एक कमाने वाली औरत, जिसकी चाबी काम आ सकती थी? एक नाम, जिसकी साइन कॉपी की जा सकती थी?”
कमला ने नजरें फेर लीं।
“आपने रोहन पर भरोसा नहीं किया,” अदिति ने कहा। “आपने उस झूठ पर भरोसा किया जिसमें आपको फायदा दिख रहा था।”
महेश मल्होत्रा धीरे से बोले, “मुझे माफ कर दो, अदिति। मुझे बहुत पहले बोलना चाहिए था।”
अदिति ने उनकी माफी स्वीकार की, मगर मुस्कुराई नहीं। कुछ देर से आई सच्चाइयाँ घाव नहीं भरतीं, बस यह साबित करती हैं कि घाव सचमुच था।
7 महीने बाद तलाक पूरा हुआ। रोहन जेल की सबसे कठोर सजा से समझौते और भरपाई के कारण बच गया, लेकिन उसका नाम पहले जैसा नहीं रहा। रियल एस्टेट की दुनिया में लोग नमस्ते तो करते थे, पर दस्तावेज 2 बार पढ़ते थे। कमला दिल्ली छोड़कर जयपुर की एक रिश्तेदार के पास चली गईं। शायद वहाँ उन्होंने कहानी बदली होगी। शायद कहा होगा कि पढ़ी-लिखी बहू ने परिवार तोड़ दिया। अब अदिति को फर्क नहीं पड़ता था।
तलाक के अंतिम आदेश वाले दिन दिल्ली में हल्की बारिश हो रही थी। अदिति कोर्ट से निकली तो हवा में मिट्टी की गंध थी। उसने रास्ते से सफेद राजनिगंधा खरीदे, एक छोटा चॉकलेट केक लिया और सीधे घर पहुँची। स्नेहा लखनऊ से आई हुई थी। ऑपरेशन के बाद उसके बाल फिर बढ़ने लगे थे और हँसी में पहले वाली चमक लौट आई थी।
दोनों बहनें फर्श पर बैठकर केक खाती रहीं, क्योंकि अदिति ने अभी तक नया सेंटर टेबल नहीं खरीदा था। उन्होंने पुराने गिलासों में चाय पी। स्नेहा ने अपनी सर्जरी के निशान पर मजाक किया। अदिति ने बताया कि उसने मधुबनी पेंटिंग फिर दीवार पर लगा दी है, थोड़ी टेढ़ी है, मगर अब उसे सीधा करने की जल्दी नहीं।
रात को स्नेहा सो गई। अदिति रसोई में अकेली खड़ी थी। उसने नानी की सफेद-नीली प्याली उठाई, धीरे से धोई, उसमें गरम चाय डाली और दोनों हथेलियों से पकड़ लिया। मूठ की दरार अब भी थी—पतली, साफ, हमेशा दिखने वाली।
उसे समझ आया कि हिंसा हमेशा थप्पड़ बनकर नहीं आती। कभी वह मजाक बनकर आती है। कभी पति की नाराज चुप्पी बनकर। कभी सास की सलाह बनकर। कभी डुप्लीकेट चाबी बनकर। कभी आपकी तस्वीर हटाकर। कभी आपकी प्याली पर पराई लिपस्टिक बनकर। और कभी आपकी साइन बनाकर।
अदिति ने खिड़की से बाहर बारिश में धुँधली होती दिल्ली को देखा।
फ्लैट अभी पूरा सजा नहीं था। कुछ फ्रेम गायब थे। दरवाजे के पास डिब्बे रखे थे। फर्श पर हल्का निशान था। खिड़की के पास एक कुर्सी डगमगा रही थी।
फिर भी उस रात घर पहली बार शांत नहीं, सुरक्षित लगा।
यह अब किसी झूठ का युद्धक्षेत्र नहीं था।
यह उसकी चाबी थी।
उसकी मेहनत थी।
उसकी प्याली थी।
उसका नाम था।
यह उसका घर था।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.