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अस्पताल के बिस्तर पर पत्नी 14 दिन तक दरवाजे को देखती रही, पति बाहर खड़ा होकर रोता रहा, और जब नर्स ने कहा “वह रोज आता था, पर अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया”, पूरा घर टूट गया

PART 1

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अस्पताल से छुट्टी मिलते ही नंदिता मेहरा ने तय कर लिया था कि वह घर लौटकर अपने पति से 22 साल की शादी का हिसाब नहीं, तलाक माँगेगी।

दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के कमरे 412 में 2 हफ्ते लेटे-लेटे उसकी आँखें दरवाजे पर सूख गई थीं। पेट के भीतर फैले भयानक संक्रमण की वजह से रातोंरात उसका ऑपरेशन हुआ था। डॉक्टरों ने कहा था, कुछ घंटे देर हो जाती तो जान भी जा सकती थी। लेकिन जिस आदमी ने ऑपरेशन थिएटर के बाहर उसका हाथ पकड़कर कहा था, “आँख खोलते ही सबसे पहले मेरा चेहरा देखोगी,” वही आदमी 14 दिनों में एक बार भी उसके सामने नहीं आया।

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नंदिता 49 साल की थी। लाजपत नगर की पुरानी कॉलोनी में रहने वाली, शांत स्वभाव की, घर और सिलाई-कढ़ाई के छोटे से काम से जीवन सँभालने वाली औरत। उसका पति राजीव मेहरा करोल बाग में स्कूटर-पार्ट्स की छोटी दुकान चलाता था। दोनों ने किराए के कमरों, उधार के राशन, बेटी अनाया की पढ़ाई, ससुर की बीमारी और रिश्तेदारों के तानों के बीच घर बसाया था। वह घर बड़ा नहीं था, पर उसमें 22 साल की छोटी-छोटी अधूरी इच्छाएँ थीं।

नंदिता हमेशा कहती थी, “एक दिन बरामदे को काँच से बंद करवा देंगे। सर्दियों में धूप आएगी, बरसात में आवाज आएगी, और मैं वहीं बैठकर चाय पियूँगी।”

राजीव हँसकर कहता, “एक दिन सब होगा।”

वही “एक दिन” कभी नहीं आया।

ऑपरेशन के बाद जब नंदिता ने आँख खोली, सामने सफेद छत थी, बगल में मशीनों की आवाज थी और नर्स आयशा दवा बदल रही थी।

“मेरे पति कहाँ हैं?” नंदिता ने सूखे होंठों से पूछा।

आयशा की पलकें झपकीं। बस उतनी देर में नंदिता का दिल डूब गया।

“अभी नहीं हैं।”

अभी नहीं हैं… यह 1 दिन चला। फिर 3 दिन। फिर 7। फिर 14।

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राजीव फोन पर संदेश भेजता था।

“आराम करो। मैं हूँ। सब समझाऊँगा।”

एक रात नंदिता दर्द और डर से काँपते हुए रो पड़ी। उसने फोन मिलाया।

“राजीव, मैं मर सकती थी।”

दूसरी तरफ लंबी चुप्पी थी।

“मुझे पता है,” उसकी आवाज टूटी हुई थी।

“तो आ जाओ।”

“मैं नहीं आ सकता।”

और फोन कट गया।

उस दिन के बाद नंदिता ने किसी के सामने रोना बंद कर दिया। वह नर्स आयशा के आने पर चेहरा खिड़की की तरफ कर लेती। अस्पताल के बाहर लोग अपने मरीजों के लिए फल, दवा, कंबल और दुआएँ लाते दिखते। नंदिता हर बार खुद से कहती, “मैं किसी का इंतज़ार नहीं कर रही।”

लेकिन वह इंतज़ार कर रही थी।

क्योंकि 22 साल की शादी को कोई औरत 14 दिनों की चुप्पी में दफना नहीं पाती।

छुट्टी के दिन आयशा ने धीरे से कहा, “कभी-कभी लोग डर में गलत व्यवहार कर बैठते हैं।”

नंदिता ने कड़वी मुस्कान से जवाब दिया, “जिसे प्यार होता है, वह डरते हुए भी आता है।”

ऑटो ने उसे लाजपत नगर की गली में उतारा। पुराना लोहे का गेट, बाहर तुलसी का गमला, दीवार पर उखड़ा हुआ पेंट, सब वही था। लेकिन जब उसने चाबी घुमाई और दरवाजा खोला, तो उसका गुस्सा उसी जगह जम गया।

घर वही नहीं था।

जिस दीवार पर बरसों से फीका पीला पेंट उतर रहा था, वहाँ अब हल्का पिस्ता रंग चमक रहा था। फर्श की टूटी टाइलें बदल दी गई थीं। छत का पुराना पंखा नया था। बैठक में भारी भूरे परदे हटाकर सफेद मलमल के परदे लगाए गए थे। कोने में लकड़ी की नई अलमारी थी, जिसमें उसकी किताबें करीने से रखी थीं। दीवार पर अनाया के बचपन की तस्वीरें, उनकी शादी की धुंधली तस्वीर और नंदिता की माँ की तस्वीर नए फ्रेम में लगी थी।

रसोई में जाकर वह लगभग बैठ गई। टूटी अलमारी बदल चुकी थी। सिंक चमक रहा था। वह दराज, जो हर बार अटक जाती थी और जिसे खींचते हुए वह झल्लाकर कहती थी, “एक दिन यह हाथ में रह जाएगी,” अब बिना आवाज के खुल गई।

दराज पर एक पर्ची रखी थी।

राजीव की लिखावट थी।

“अब यह दराज तुमसे लड़ने की हिम्मत नहीं करेगी।”

नंदिता ने पर्ची मुट्ठी में भींच ली। गुस्सा गया नहीं, पर उसके भीतर शक की दरार पड़ गई।

ऊपर कमरे में साफ चादरें थीं, नई छोटी मेज थी, पानी का गिलास था, दवाओं के लिए डिब्बा था। तकिए के पास दूसरी पर्ची रखी थी।

“बिस्तर की खिड़की वाली जगह हमेशा तुम्हारी थी। मुझे पहले ही मान लेना चाहिए था।”

वह रोना नहीं चाहती थी। वह कमजोर नहीं पड़ना चाहती थी।

फिर उसकी नजर कुर्सी पर पड़े राजीव के कुर्ते पर गई। उस पर पेंट के धब्बे थे। मेज पर बिल पड़े थे—लकड़ी, पेंट, प्लंबर, बिजली मिस्त्री, काँच वाला। सारी तारीखें वही थीं, जब वह अस्पताल में थी।

राजीव गायब नहीं था। वह घर ठीक कर रहा था। वह उनके सारे “एक दिन” को जैसे 14 दिनों में पकड़कर पूरा करने लगा था।

लेकिन तभी स्टोर रूम के पास उसे 3 कागजी थैले मिले।

एक छोटा मुलायम भालू।

एक कार्ड।

एक डिब्बा काजू कतली।

बिल पर लिखा था—सर गंगाराम अस्पताल उपहार दुकान। तारीख—ऑपरेशन के 3 दिन बाद।

नंदिता की साँस अटक गई।

राजीव अस्पताल गया था। वह दरवाजे तक गया था। उसने उसके लिए मिठाई खरीदी थी। कार्ड खरीदा था। शायद उसका नाम भी लिखा था।

और फिर भी अंदर नहीं आया।

तभी बरामदे के दरवाजे पर चिपकी तीसरी पर्ची दिखी।

“बाहर आओ। अब मैं वह सच कहने को तैयार हूँ, जिसे कहने की हिम्मत नहीं हुई।”

नंदिता ने काँपते हाथ से दरवाजा खोला।

PART 2

पीछे का छोटा आँगन पहचान में नहीं आ रहा था। खरपतवार हट चुकी थी। तुलसी, मोगरा, धनिया और गुलाब के गमले कतार में थे। सबसे आगे वही काँच वाला छोटा बरामदा था, जिसके बारे में नंदिता 15 साल से बोलती आ रही थी।

अंदर राजीव प्लास्टिक की कुर्सी पर सोया था। चेहरा थका हुआ, दाढ़ी बढ़ी हुई, हाथों पर कट और पेंट के निशान। वह बेवफा आदमी नहीं लग रहा था। वह टूटा हुआ आदमी लग रहा था।

नंदिता ने भालू उसके सामने रख दिया।

राजीव हड़बड़ाकर उठा।

“नंदिता…”

“14 दिन,” उसने कहा। “तुमने कसम खाई थी।”

राजीव ने सिर झुका लिया। “मैं हर दिन अस्पताल गया।”

“तो अंदर क्यों नहीं आए?”

उसकी आवाज फट गई। “क्योंकि मैंने तुम्हें काँच के पार देखा था। मशीनों से घिरी, लगभग बेजान। मुझे लगा अगर अंदर गया तो सच में मानना पड़ेगा कि मैं तुम्हें खो सकता हूँ।”

“तो तुमने मुझे यह मानने दिया कि मैंने तुम्हें खो दिया।”

राजीव ने आँखें बंद कर लीं।

“हाँ। और यह मेरी शर्म है।”

उसी क्षण घंटी बजी।

दरवाजे पर नर्स आयशा खड़ी थी। हाथ में फाइल थी, आँखों में पछतावा।

“नंदिता जी,” उसने धीमे से कहा, “आपके पति ने सिर्फ डर के कारण दरवाजा नहीं छोड़ा था। उस रात एक और बात हुई थी, जो आपको जाननी चाहिए।”

PART 3

बैठक में नए पेंट की गंध थी, पर हवा में पुराने घाव खुलने लगे थे। नंदिता सोफे पर नहीं बैठी। वह खड़ी रही, जैसे बैठते ही टूट जाएगी। राजीव दीवार के पास सिर झुकाए खड़ा था। आयशा ने फाइल मेज पर रखी और धीरे-धीरे पन्ने खोलने लगी।

“ऑपरेशन के बाद वाली रात आपकी हालत फिर बिगड़ गई थी,” आयशा ने कहा। “अंदर खून रिसने लगा था। साँस बहुत धीमी हो गई थी। डॉक्टरों को तुरंत दूसरा छोटा ऑपरेशन करना पड़ा।”

नंदिता ने पेट पर हाथ रख लिया। उसकी उँगलियों के नीचे टाँकों की खिंचाव भरी रेखा थी, पर असली दर्द अब शब्दों से निकल रहा था।

“मुझे क्यों नहीं बताया गया?”

“क्योंकि बाद में आपकी हालत स्थिर हो गई थी। डॉक्टर ने कहा था कि पूरी बात आपको धीरे-धीरे बताई जाएगी। लेकिन उस रात कागज़ों पर हस्ताक्षर करवाने के लिए आपके पति को बुलाना पड़ा।”

नंदिता ने राजीव की तरफ देखा।

राजीव की आँखों से आँसू बह रहे थे।

“मैंने हस्ताक्षर किए,” उसने बमुश्किल कहा। “डॉक्टर ने कहा था कि तुम शायद वापस न आओ। या आओ तो बहुत कमजोर, बहुत बदलकर।”

“और तुम अकेले थे?” नंदिता की आवाज धीमी पड़ गई।

“हाँ। रात के 3 बजे। गलियारे में। अनाया पुणे में थी, माँ गाँव गई हुई थीं। मेरे हाथ काँप रहे थे। डॉक्टर बोल रहे थे और मुझे सिर्फ तुम्हारी आवाज सुनाई दे रही थी—‘राजीव, चाय ठंडी हो जाएगी।’”

कमरे में कोई आवाज नहीं थी। बाहर गली में सब्जीवाले की पुकार आई, फिर दूर चली गई। घर के भीतर 22 साल की चुप्पियाँ बैठी थीं।

आयशा ने आगे कहा, “हस्ताक्षर के बाद उन्होंने आपको देखने की जिद की। मैं उन्हें लेकर आई। वह आपके कमरे के बाहर खड़े रहे। आपने आँखें बंद की हुई थीं। चेहरे पर ऑक्सीजन मास्क था। मशीनें लगी थीं। उन्होंने हैंडल पकड़ा, फिर हाथ छोड़ दिया।”

राजीव ने जैसे अपने ही अपराध को दोबारा देखा।

“मैं डर गया था,” उसने कहा। “मैंने तुम्हें वहाँ देखा, पर तुम जैसी नहीं लग रही थीं। जैसे तुम्हारा शरीर था, पर नंदिता कहीं दूर चली गई थी। मुझे लगा अगर अंदर जाकर तुम्हारा हाथ पकड़ूँगा तो मेरी दुनिया सचमुच खत्म हो जाएगी।”

नंदिता की आँखें लाल हो गईं।

“मेरी दुनिया तो उसी दिन टूट गई थी, राजीव। मैं हर कदम की आहट पर दरवाजे को देखती थी। हर बार कोई और निकलता था। मैं नर्सों से मुस्कुराकर बात करती थी क्योंकि मुझे शर्म आती थी कि मेरे अपने पति ने मुझे भुला दिया।”

“मैंने तुम्हें नहीं भुलाया।”

“गैरहाजिरी कई बार भूलने जैसी ही दिखती है।”

राजीव ने कोई सफाई नहीं दी। यही पहली बात थी जिसने नंदिता को रोक दिया। पहले वह हर बात पर तर्क देता था। आज वह सिर झुकाकर सजा सुन रहा था।

आयशा की आवाज भर्रा गई।

“मैं भी दोषी हूँ। आपने मुझसे पूछा था कि क्या वह आए थे। मैंने कहा था, ‘अभी नहीं हैं।’ यह झूठ नहीं था, पर सच भी नहीं था। वह कई बार दरवाजे के बाहर थे। कभी 20 मिनट, कभी 1 घंटा। वे पूछते थे कि आपने खाया या नहीं, दर्द कम हुआ या नहीं, नींद आई या नहीं। जब अस्पताल में कुछ चीजें कम थीं, उन्होंने बाहर से दवाएँ, पट्टियाँ, विशेष मोजे और रात की देखभाल के लिए पैसे दिए।”

नंदिता ने राजीव की तरफ देखा।

“तुमने यह सब किया?”

“हाँ।”

“और बताया नहीं?”

“क्योंकि यह बचाव जैसा लगता। जैसे मैं कहूँ—मैं तुम्हारे पास नहीं आया, लेकिन देखो, मैंने पैसे खर्च किए। यह और घटिया लगता।”

“हाँ,” नंदिता ने ठंडे स्वर में कहा, “लगता।”

राजीव ने वह भी स्वीकार कर लिया।

आयशा ने आँसू पोंछे। “मैंने सोचा था कि अगर मैं कह दूँगी कि वे आए थे लेकिन अंदर नहीं आए, तो आपको और चोट लगेगी। मुझे लगा मैं आपको बचा रही हूँ। पर अब समझ रही हूँ कि सच छुपाना भी दर्द देता है। कभी-कभी साफ-सुथरा, शांत झूठ भी हिंसा बन जाता है।”

नंदिता ने उसे लंबे समय तक देखा। यही औरत थी जिसने उसे उठाया, दवा दी, दर्द में पानी पिलाया। और यही औरत थी जिसने उसके अकेलेपन को पूरा सच नहीं बनने दिया।

“आपने मेरी सेवा की,” नंदिता ने कहा।

आयशा ने सिर झुका लिया। “और आपसे सच छुपाया।”

“दोनों बातें सच हैं।”

आयशा जैसे भीतर से काँप गई। यह माफी नहीं थी। यह सजा भी नहीं थी। यह बस वही साफ आईना था, जिसे देखने की हिम्मत हर किसी में नहीं होती।

राजीव ने धीमे से कहा, “मैं तुमसे आज माफी की उम्मीद नहीं कर रहा। शायद मैं खुद को भी जल्दी माफ नहीं कर पाऊँगा। मैंने घर इसलिए बदला क्योंकि मुझे डर था कि तुम लौटोगी और हर दीवार कहेगी—हमने जीवन को हमेशा टाला। मुझे लगा अगर मैं सब ठीक कर दूँ तो तुम देखोगी कि मैंने तुम्हारी हर बात सुनी थी।”

“तुमने भविष्य बनाया,” नंदिता ने कहा, “और मुझे वर्तमान में अकेला छोड़ दिया।”

राजीव का चेहरा राख जैसा हो गया।

“हाँ।”

“तुम फर्क समझते हो?”

“अब समझ रहा हूँ।”

“नहीं,” नंदिता ने कहा, “अभी तुम मुझे खोने से डर रहे हो। समझ तब होगी जब तुम्हारे पास कुछ बचाने को न हो, फिर भी तुम सच बोलोगे।”

आयशा ने फाइल समेटी। “मैं अपने वरिष्ठ को यह बात बताऊँगी। मुझे आपके पति की बात माननी नहीं चाहिए थी। मरीज को उसके रिश्तों की सच्चाई से दूर रखना मेरा अधिकार नहीं था।”

नंदिता ने दरवाजा खोला। जाते-जाते आयशा ने कहा, “मुझे सच में अफसोस है।”

नंदिता ने बस इतना कहा, “मुझे भी।”

दरवाजा बंद हुआ तो घर बहुत सुंदर और बहुत भारी लगने लगा। हर नई दीवार पर राजीव का प्रेम था, और हर कोने में उसकी कायरता की छाया।

नंदिता काँच वाले बरामदे में चली गई। वही जगह, जिसका सपना उसने कभी एक पुरानी कॉपी में बनाया था। अंदर हल्की धूप थी। बाहर गमलों में पौधे नए थे, मिट्टी ढीली थी, जड़ें अभी पकड़ नहीं पाई थीं।

राजीव दरवाजे पर रुका रहा।

“अंदर आ सकते हो,” नंदिता ने कहा, “लेकिन पास मत बैठना।”

वह प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गया, थोड़ा दूर। जैसे उसे पहली बार समझ आया हो कि किसी टूटे हुए भरोसे के कमरे में जगह माँगकर लेनी पड़ती है।

“तुमने मेरा वह पुराना चित्र संभालकर रखा?” नंदिता ने पूछा।

“हाँ। तुम्हारी अलमारी में था। उसमें लिखा था—‘बुढ़ापे के लिए, अगर हम वहाँ तक पहुँचे।’”

नंदिता ने आँखें मूँद लीं। उसे याद भी नहीं था कि उसने यह लिखा था।

“तुम्हें सब याद था,” उसने कहा।

“हाँ।”

“लेकिन यह याद नहीं रहा कि अस्पताल में पत्नी को पति का चेहरा चाहिए, काँच का बरामदा नहीं।”

राजीव ने सिर झुका लिया। “मैं मदद लेने जाऊँगा। किसी सलाहकार के पास। क्योंकि मैंने डर को प्यार समझ लिया। मैं सोचता रहा कि घर ठीक कर रहा हूँ, इसलिए तुम्हारे साथ हूँ। पर मैं दरवाजे के बाहर छिपा था।”

नंदिता ने उसे देखा। “प्यार दीवार रंगना नहीं है, जब सामने वाला सोच रहा हो कि वह देखने लायक भी नहीं रहा।”

“नहीं है।”

“प्यार है कमरे में जाना, चाहे उल्टी आने जैसी घबराहट हो।”

“हाँ।”

“प्यार है कहना—मैं डर रहा हूँ, पर मैं यहीं हूँ।”

राजीव की आवाज भर्रा गई। “मैं डर रहा था कि तुम्हें मरते देखूँगा।”

इस बार नंदिता का चेहरा थोड़ा मुलायम हुआ। पहली बार वह वाक्य बिना पेंट, बिना बिल, बिना पर्ची, बिना बहाने के आया था।

“और मैं डर रही थी कि मैं जिंदा बच जाऊँगी, लेकिन ऐसी दुनिया में जहाँ तुम मुझसे प्यार नहीं करते।”

राजीव दोनों हाथों से चेहरा ढककर रो पड़ा।

“मैं तुमसे प्यार करता हूँ। गलत तरह से, डरपोक तरह से, लेकिन करता हूँ।”

“तो सही तरह से सीखो।”

उस रात कोई मेल-मिलाप नहीं हुआ। नंदिता ने उसके गले लगकर सब माफ नहीं किया। उसने अतिथि कमरे में सोने का फैसला किया। राजीव ने विरोध नहीं किया। वह बस दरवाजे के बाहर खड़ा होकर बोला, “दवा 10 बजे वाली है। मैं बाहर हूँ।”

नंदिता ने भीतर से कहा, “दरवाजा बंद मत करना।”

उसने दरवाजा आधा खुला छोड़ दिया।

अगले 9 दिनों तक घर में शांति भी थी और तूफान भी। कभी नंदिता बिना वजह चिढ़ जाती। कभी चाय के कप की आवाज से उसे अस्पताल की मशीन याद आ जाती। कभी राजीव देर से जवाब देता तो वह फट पड़ती।

“फिर गायब हो गए?”

राजीव हर बार गहरी साँस लेकर कहता, “नहीं। मैं यहाँ हूँ।”

पहले वह कह देता, “इतनी छोटी बात पर गुस्सा मत करो।” अब वह कहता, “तुम्हारा गुस्सा सही है।”

यह सुनकर नंदिता और रो पड़ती, क्योंकि उसे समझ नहीं आता था कि देर से सही, यह आदमी अब वही क्यों कर रहा था जिसकी उसे अस्पताल में जरूरत थी।

पहली जांच के दिन राजीव उसे अस्पताल ले गया। कार के भीतर उसकी उँगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं। अस्पताल का बोर्ड देखते ही उसका चेहरा पीला पड़ गया। नंदिता ने चुपचाप देखा। वह चाहती तो कह देती, “मत आओ।” पर अब परीक्षा उसी की नहीं, राजीव की थी।

राजीव ने कार रोकी। आँखें बंद कीं। फिर बाहर निकला। उसने नंदिता का दरवाजा खोला।

“मुझे डर लग रहा है,” उसने साफ कहा।

नंदिता ने पूछा, “और?”

उसने हाथ आगे किया। “और मैं फिर भी आ रहा हूँ।”

नंदिता ने थोड़ी देर बाद उसका हाथ पकड़ लिया।

अस्पताल के गलियारे में आयशा सामने से आई। उसने कदम रोक दिए।

“नमस्ते, नंदिता जी।”

“नमस्ते, आयशा।”

तीनों कुछ पल चुप रहे। कोई नाटक नहीं हुआ। कोई अचानक माफी नहीं मिली। लेकिन इस बार कोई दरवाजे के पीछे नहीं छिपा।

घर लौटने के बाद बरामदा नंदिता की जगह बन गया। वह दोपहर में वहीं बैठती, घुटनों पर शॉल रखकर किताब खोलती और अक्सर एक ही पन्ना बार-बार पढ़ती रहती। बाहर मोगरे में पहली कली आई थी। राजीव रोज पूछता, “चाय यहीं लाऊँ?” कभी वह हाँ कहती, कभी चुप रहती। वह चुप्पी को भी जवाब मानना सीख रहा था।

हर गुरुवार शाम 6 बजे राजीव सलाहकार के पास जाने लगा। वापस आता तो लंबे समय तक कुछ नहीं बोलता। एक शाम उसने कहा, “आज मुझे याद आया, बचपन में जब माँ बीमार पड़ती थीं, पिताजी घर की मरम्मत शुरू कर देते थे। लोग कहते थे—देखो, कितना काम कर रहे हैं। लेकिन वे माँ के पास नहीं बैठते थे। शायद मैंने वही सीखा।”

नंदिता ने किताब बंद की।

“तो तुमने समझा कि चीजें ठीक करना ही साथ रहना है।”

“हाँ।”

“लेकिन कई बार मरम्मत भी भागना होती है।”

राजीव ने धीरे से कहा, “अब जानता हूँ।”

कुछ हफ्तों बाद उनकी बेटी अनाया पुणे से आई। राजीव ने उसे सब बताया था, बिना खुद को अच्छा साबित किए। अनाया दरवाजे से अंदर आते ही रो पड़ी, फिर गुस्से से बोली, “पापा, आप सच में अस्पताल नहीं गए? मम्मी अकेली थीं और आप घर सजाते रहे?”

राजीव ने सिर झुका लिया। “मैं गया था, पर अंदर नहीं गया। और यही मेरी गलती है।”

“अगर मेरे पति ने ऐसा किया होता तो मम्मी मुझे वापस आने को कहतीं।”

नंदिता ने धीमे से कहा, “अनाया…”

“नहीं, मम्मी। यह कोई छोटी बात नहीं है।”

राजीव ने कहा, “तुम सही हो। तुम्हारी माँ को पूरा अधिकार है कि वह मुझसे नाराज़ रहें। मैं उसे जल्दी खत्म करवाने की कोशिश नहीं करूँगा।”

अनाया का गुस्सा जैसे अचानक काँप गया। वह कुर्सी पर बैठी और रोते हुए बोली, “मैं आपसे बहुत नाराज़ हूँ, पापा। लेकिन अच्छा है कि आप भाग नहीं रहे। वरना मैं यह गुस्सा किससे कहती?”

उस शाम तीनों ने साथ खाना खाया। कोई हँसी नहीं थी, पर एक परिवार था—टूटा हुआ, शर्मिंदा, फिर भी एक ही मेज पर बैठा हुआ।

समय ने चोट को मिटाया नहीं। पर उसने उसे देखने की आदत दी। नंदिता ने तलाक के कागज़ नहीं निकाले, लेकिन उसने यह भी नहीं कहा कि सब पहले जैसा हो गया है। उसने साफ कहा, “भरोसा वापस माँगा नहीं जाता। रोज कमाया जाता है।”

राजीव ने जवाब दिया, “मैं रोज कमाऊँगा। और अगर तुम कभी कहो कि अब नहीं, तो भी मैं सच से भागूँगा नहीं।”

बरसात की पहली शाम थी, जब नंदिता ने बरामदे की मेज पर एक नई पर्ची देखी।

“अब कोई ‘एक दिन’ नहीं। जिसे प्यार करते हैं, उससे पूछकर आज देखभाल करते हैं।”

वह पर्ची लेकर बाहर आई। राजीव घुटनों के बल बैठा गमलों में गेंदे लगा रहा था।

“ये गलत जगह हैं,” नंदिता ने कहा।

राजीव ठिठका। पहले होता तो कहता, “अरे ठीक है, दिखने में अच्छे लगेंगे।” पर उसने छोटी खुरपी नीचे रख दी।

“तुम बताओ, कहाँ लगाऊँ?”

नंदिता ने काँच की तरफ इशारा किया। “वहाँ। ताकि मैं कुर्सी से देख सकूँ।”

राजीव ने एक-एक पौधा उठाकर वहीं लगा दिया।

उस रात कोई फिल्मी माफी नहीं हुई। कोई बारिश में गले मिलना नहीं हुआ। बस काँच पर बूँदें पड़ती रहीं। नंदिता अपने fauteuil जैसी नई कुर्सी पर बैठी थी, राजीव थोड़ी दूरी पर चाय लिए बैठा था। वह पहली बार हर आवाज से नहीं डर रही थी।

कई महीनों बाद एक सुबह नंदिता जल्दी जागी। बरामदे से हल्की आवाज आ रही थी। वह धीरे से वहाँ पहुँची। राजीव अकेला बैठा था, हाथ में चाय, सामने बरसती बारिश।

“क्या कर रहे हो?” उसने पूछा।

राजीव ने मुड़कर देखा। आँखों में थकान नहीं, शांति थी।

“बारिश सुन रहा हूँ,” उसने कहा, “भीगे बिना।”

नंदिता के होंठों पर बहुत हल्की मुस्कान आई। इतनी हल्की कि कोई और देखता तो शायद समझता भी नहीं। लेकिन राजीव ने देख ली। उसकी आँखें भर आईं, पर वह चुप रहा।

क्योंकि अब उसे पता था कि हर भावना पर अपना शब्द रखना जरूरी नहीं। कभी-कभी साथ रहने का मतलब सिर्फ कमरे में मौजूद रहना होता है।

नंदिता ने उस दिन पहली बार उससे कहा, “चाय थोड़ी और बना दोगे?”

राजीव उठा। “अभी लाता हूँ।”

वह गया, और नंदिता ने दरवाजे की तरफ देखा। इस बार उसे डर नहीं लगा कि वह लौटेगा या नहीं। उसे पता था, वह आएगा।

परिवारों में सबसे बड़ा शोर हमेशा चीखों से नहीं होता। कई बार सबसे गहरी चोट वह दरवाजा होता है, जो खुल सकता था पर खुला नहीं। वह चुप्पी होती है, जिसे लोग सुरक्षा कहते हैं। वह प्यार होता है, जो औजार लेकर आता है, जबकि उसे काँपता हुआ हाथ लेकर आना चाहिए था।

और मरम्मत का मतलब मिटाना नहीं होता।

मरम्मत का मतलब है शर्मनाक सच के कमरे में टिके रहना।

यह कहना, “मैं डर गया था।”

यह सुनना, “तुमने मुझे तोड़ा।”

और फिर फूल लगाने से पहले पूछना—“तुम्हें रोशनी कहाँ चाहिए?”

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.