Posted in

“अगर वे फिर रोएँ, तो उन्हें रात का खाना मत देना।”

भाग 2

Advertisements

कॉर्डेलिया की आवाज़ ठंडी हो गई।

उसने कहा,

Advertisements

“जब तुम अपने दुःख में खुद को बंद करके बैठे थे, तब इस घर को मैंने चलाया था।”

“लोहे की सलाख़ों की मंज़ूरी तुमने दी थी।”

“ताले तुमने लगवाए थे।”

“हर मेन्यू पर तुम्हारे हस्ताक्षर हैं।”

“हर दस्तावेज़ पर तुम्हारा नाम है।”

डाइनिंग रूम में सन्नाटा छा गया।

उसके शब्द इसलिए चुभे…

क्योंकि उनमें सच्चाई का एक हिस्सा था।

कॉर्डेलिया ने अकेले वह पिंजरा नहीं बनाया था।

Advertisements

सलाख़ें लगाने का आदेश जूलियन ने दिया था।

उसने केवल यह सीख लिया था कि उनसे फायदा कैसे कमाया जाए।

जूलियन ने कुर्सी की पीठ पर हाथ रखा।

“तुम एक बात में सही हो,” उसने कहा।

“हर पन्ने पर मेरे हस्ताक्षर हैं।”

कॉर्डेलिया हल्का-सा मुस्कुराई।

“तो फिर तुम समझ गए कि मुझे दोष देने से कुछ नहीं बदलेगा।”

जूलियन ने उसकी बात काट दी।

“मैं इसे ठीक करने की कोशिश नहीं कर रहा।”

“मैं न्याय चाहता हूँ।”

उसकी मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

“मेरे वकीलों के पास इन सबकी प्रतियाँ हैं।”

“जैसे ही यह बैठक खत्म होगी, पुलिस के पास भी होंगी।”

“सप्लायरों के पास भी।”

“और जिन-जिन परिवारों के लिए तुमने कभी काम किया है…

वे सब जानेंगे कि तुमने क्या किया।”

ब्लेयर सिसक उठी।

“कॉर्डेलिया कहती थी कि लड़कियाँ बहुत बिगड़ी हुई हैं।”

“अगर उन्हें पूरा खाना दिया गया…

तो वे बर्बाद कर देंगी।”

“और जब तक रिपोर्ट अच्छी दिखती रहेगी…

मिस्टर ऐशफ़र्ड को कभी पता नहीं चलेगा।”

जूलियन ने उसकी ओर देखा।

“क्या तुम उसकी बात पर विश्वास करती थीं?”

ब्लेयर ने सिर झुका लिया।

“नहीं…”

“लेकिन मुझे नौकरी की ज़रूरत थी।”

जूलियन ने सिर हिलाया।

वह माफ़ी नहीं थी।

उससे भी ज़्यादा दुखद कुछ था।

उसने कहा,

“जिन लोगों ने चोरी की…

उनकी रिपोर्ट होगी।”

“जिन लोगों ने मदद की…

उनकी भी रिपोर्ट होगी।”

“और जो सब कुछ देखते रहे…

लेकिन चुप रहे…

वे आज ही इस घर से चले जाएँगे।”

कॉर्डेलिया खड़ी हो गई।

रीड तुरंत दरवाज़े के सामने आकर खड़ा हो गया।

पहली बार…

कॉर्डेलिया का संतुलन टूट गया।

“तुम मुझे यहाँ रोक नहीं सकते।”

“नहीं,” जूलियन ने कहा।

“लेकिन मैं यह ज़रूर सुनिश्चित कर सकता हूँ…

कि तुम मेरी बेटियों की कोई भी चीज़ साथ लेकर यहाँ से न जाओ।”

फिर वह डाइनिंग रूम से बाहर निकल गया।

इसलिए नहीं कि सब कुछ खत्म हो गया था…

बल्कि इसलिए…

क्योंकि सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अभी शुरू हुआ था।

उसे उस औरत को ढूँढ़ना था…

जो उस खाई से आती थी।

और जब उसे पता चला कि वह कौन है…

तब उसे समझ आया…

कि वह अजनबी अपने भीतर ऐसी त्रासदी लिए घूम रही थी…

जिसे सुनना कोई कभी नहीं चाहता था।


ऐशफ़र्ड मेंशन के पीछे की वह खाई…

अंदर से बिल्कुल अलग दिखाई देती थी।

अपने दफ़्तर की खिड़की से जूलियन को वह सिर्फ़ पेड़ों, मिट्टी और अँधेरे का एक धब्बा लगती थी।

लेकिन जैसे ही वह उसके भीतर पहुँचा…

दुनिया बदल गई।

लॉस एंजेलिस का शोर पीछे छूट गया।

पेड़ों की शाखाएँ आसमान को ढँक रही थीं।

प्लास्टिक की थैलियाँ जड़ों से उलझी हुई थीं।

गीले पत्थर ज़मीन पर बिखरे थे।

आवारा कुत्तों के पंजों के निशान कीचड़ में दर्ज थे।

और हवा में पुराने धुएँ की गंध तैर रही थी।

ओवेन साथ चलना चाहता था।

लेकिन जूलियन ने मना कर दिया।

“अगर वह मुझे अकेला देखेगी…

तो शायद भागेगी नहीं।”

ओवेन ने पूछा,

“अगर यह जाल हुआ तो?”

जूलियन ने बच्चों के कमरे की ओर देखा।

आइवी और मेव पहली बार कई हफ़्तों बाद रसोई में बैठकर नाश्ता कर रही थीं।

गरम अंडे।

टोस्ट।

स्ट्रॉबेरी।

दूध में ओट्स।

शुरुआत में वे धीरे-धीरे और संकोच से खा रही थीं।

फिर पूरी तल्लीनता से।

उन्हें खाते देख उसका दिल टूट गया।

आइवी ने पूछा,

“क्या खिड़की वाली आंटी फिर आएँगी?”

जूलियन मुश्किल से बोल पाया।

“मैं उन्हें ढूँढ़कर लाऊँगा।”


वह अकेला उस खाई में चला गया।

न कोई बंदूक।

न कोई गार्ड।

सिर्फ़ उधार के जूते…

और एक पुरानी जैकेट।

करीब बीस मिनट बाद…

उसे वह मिल गई।

तीन पेड़ों के बीच बँधे नीले तिरपाल के नीचे उसका छोटा-सा आश्रय था।

ज़मीन पर गत्ते बिछे थे।

एक तह किया हुआ कंबल।

साफ़ पानी की एक बाल्टी।

दो पिचके हुए बर्तन।

एक टूटा हुआ मग।

और ओट्स का एक छोटा-सा थैला।

वह एक पत्थर पर बैठी कटोरे में ब्लैकबेरी साफ़ कर रही थी।

उसने जूलियन को उसके बोलने से पहले ही देख लिया।

वह न चीखी।

न माफ़ी माँगी।

बस खड़ी हो गई।

पहले उसके हाथों को देखा।

फिर उसकी आँखों में देखा।

जूलियन बोला,

“मैंने तुम्हें अपने कैमरे में देखा था।”

उसने थकी हुई लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा,

“मुझे पता था…

एक दिन ऐसा होगा।”

“तुम कौन हो?”

“जूलियन ऐशफ़र्ड।”

वह हल्का-सा मुस्कुराई।

“मुझे पहले से पता था।”

“तुम्हारे गार्ड तुम्हारा नाम ऐसे लेते हैं…

जैसे किसी राजा का।”

“और तुम?”

वह कुछ पल चुप रही।

फिर बोली,

“एडिथ मार्लो।”

“सब मुझे एडी कहते हैं।”

जूलियन ने उसका नाम दोहराया।

वह भौंह उठाकर बोली,

“अगर मुझे यहाँ से निकालने आए हो…

तो मुझे एडी मत कहना।”

जूलियन ने सिर हिलाया।

“मैं तुम्हें निकालने नहीं आया।”

“न पुलिस बुलाने।”

“न तुम्हें पैसे देने।”

एडी वापस अपने ब्लैकबेरी साफ़ करने लगी।

फिर उसने पूछा,

“लड़कियाँ ठीक हैं?”

यह सवाल…

किसी भी आरोप से ज़्यादा भारी था।

“आज सुबह…

हाँ।”

उसके कंधे थोड़ा ढीले पड़ गए।

उसी पल जूलियन समझ गया…

कि एडी ने उसकी बेटियों को इसलिए खाना नहीं खिलाया…

क्योंकि उसे कुछ चाहिए था।

वह मेंशन के अंदर नहीं आना चाहती थी।

उसे पैसे नहीं चाहिए थे।

वह किसी की कहानी का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी।

वह सिर्फ़ यह जानना चाहती थी…

कि वे दोनों सुरक्षित हैं या नहीं।

“तुम कितने समय से उनकी मदद कर रही हो?”

“उन्नीस रातों से।”

जूलियन का गला सूख गया।

“तुमने उन्हें क्या खिलाया?”

“जो भी मेरे पास था।”

“ओट्स।”

“चावल।”

“मसली हुई बीन्स।”

“फल।”

“ब्लैकबेरी।”

“एक बार इंगलवुड के चर्च से चिकन का शोरबा लाई थी।”

“लेकिन छोटी वाली ने नहीं खाया।”

“मेव,” जूलियन बुदबुदाया।

उसने नाम दोहराया।

“आइवी ने मुझे बताया था।”

आइवी…

उसकी अपनी बेटी…

एक अजनबी को अपना नाम बता चुकी थी…

क्योंकि घर में…

कोई उसकी बात सुनने वाला नहीं था।

जूलियन ने नज़रें फेर लीं।

उसकी आँखों के सामने सब धुँधला हो गया।

एडी ने उसकी ओर नहीं देखा।

उसने उसे टूटते हुए देखने की कोशिश भी नहीं की।

और यही संवेदनशीलता…

उसे और भी अधिक शर्मिंदा कर गई।

“मुझे पता ही नहीं था…”

उसने धीमे से कहा।

यह कमज़ोर था।

अपर्याप्त था।

एडी ने उसे आसान नहीं बनाया।

“तुम्हें पता होना चाहिए था।”

जूलियन ने सिर झुका दिया।

“हाँ।”

“तुम सही कहती हो।”

एडी ने कटोरा एक ओर रख दिया।

फिर बोली,

“अमीर लोग सोचते हैं…

कि ख़तरा हमेशा दरवाज़ा तोड़कर अंदर आता है।”

“लेकिन ज़्यादातर बार…

उसके पास पहले से चाबी होती है।”

जूलियन ने उसकी ओर देखा।

“तुम सही हो।”

इस जवाब से वह खुद चौंक गई।

“तो फिर तुम यहाँ क्यों आए हो?”

“तुम्हें घर चलने का निमंत्रण देने।”

वह सूखी हँसी हँसी।

“तुम्हारे मेंशन में?”

“हाँ।”

“तुम मुझे जानते तक नहीं।”

“लेकिन मेरी बेटियाँ तुम्हें जानती हैं।”

“इतना काफ़ी नहीं है।”

“शुरुआत करने के लिए…

इतना ही काफ़ी है।”


वह खड़ी हुई।

अब जूलियन ने पहली बार देखा…

कि उसके कपड़ों के नीचे वह कितनी दुबली हो चुकी थी।

कमज़ोर नहीं…

बल्कि भूख…

ठंड…

और अपमान ने उसे पतला कर दिया था।

फिर भी…

वह टूटी नहीं थी।

“मैं दान नहीं लेती।”

“मैं दान नहीं दे रहा।”

“मैं नौकरी की पेशकश कर रहा हूँ।”

उसने बाँहें मोड़ लीं।

“कैसी नौकरी?”

“आइवी और मेव की देखभाल।”

“उचित वेतन।”

“बीमा।”

“अगर चाहो तो रहने के लिए कमरा।”

“या फिर तुम्हारे लिए अलग घर ढूँढ़ने में मदद।”

“जहाँ कोई ताला न हो।”

“कोई सलाख़ें न हों।”

“और तुम्हारे ऊपर…

मेरे अलावा कोई न हो।”

“मैंने बहुत महँगी कीमत चुकाकर सीखा है…

कि किसी की बात न सुनना कितना विनाशकारी होता है।”

एडी कुछ देर तक उसे देखती रही।

फिर बोली,

“क्या तुम्हें लगता है…

कि उन्नीस रात खिड़की से ओट्स का कटोरा पकड़ाने से…

मैं नैनी बन जाती हूँ?”

“नहीं।”

जूलियन ने शांत स्वर में कहा।

“लेकिन उन्नीस लगातार रातें…

अँधेरे में…

यह साबित करती हैं…

जो कोई भी सिफ़ारिशी पत्र कभी साबित नहीं कर सकता।”

एडी ने अपने छोटे-से आश्रय की ओर देखा।

नीला तिरपाल।

गत्ते।

और बची-खुची चीज़ों से बनाई हुई पूरी ज़िंदगी।

फिर उसने कहा,

“मेरा एक बेटा था।”

“थियो।”

“चार साल का।”

“उसे तेज़ बुखार था।”

“मेरे पास बीमा नहीं था।”

“पैसे नहीं थे।”

“और मदद माँगने वाला कोई नहीं था।”

“जब तक मैं उसे अस्पताल ले गई…

बहुत देर हो चुकी थी।”

उसकी आवाज़ नहीं टूटी।

बस और धीमी हो गई।

“उसके बाद…

सब बिखर गया।”

“मेरे पति चले गए।”

“किराया भरना बाकी था।”

“एक चीज़ टूटी…

फिर दूसरी…”

“और देखते ही देखते…

तुम ऐसी जगह सोने लगते हो…

जहाँ कोई तुम्हें देखता भी नहीं।”

जूलियन कुछ नहीं बोला।

एडी ने आगे कहा,

“जब मैंने तुम्हारी बेटियों को रोते सुना…

मैंने खुद से कहा…

यह मेरा मामला नहीं है।”

“इतना बड़ा घर।”

“इतना अमीर पिता।”

“स्टाफ।”

“गार्ड।”

“कोई न कोई तो उनके पास जाएगा।”

“किसी न किसी को जाना ही चाहिए था।”

उसके होंठ हल्के से काँपे।

“लेकिन…”

“कोई भी नहीं गया।”

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.