
PART 1
चिता की राख अभी पूरी तरह ठंडी भी नहीं हुई थी कि रोहन त्रिवेदी ने 6 लोगों के सामने मीरा शर्मा को ऐसी नज़र से देखा, जैसे 9 साल की सेवा बस गली की कोई फालतू दखलअंदाज़ी हो, और कहा, “आप सिर्फ पड़ोसन थीं।”
लखनऊ के बैकुंठ धाम के बाहर शाम उतर रही थी। अगरबत्ती की गंध, गीली मिट्टी, फूलों के मुरझाए हार और लोगों की धीमी फुसफुसाहटों के बीच मीरा के भीतर कुछ टूटकर आवाज़ करना चाहता था। सामने हरिशंकर त्रिवेदी की अर्थी के पास उनका इकलौता बेटा रोहन खड़ा था—काले कुर्ते पर महँगी जैकेट, हाथ में फोन, चेहरे पर वह थकान जो शोक से नहीं, औपचारिकता निभाने से आती है।
मीरा ने होंठ भींचे। वह 48 साल की थी, बालों में जल्दी-जल्दी बनी चोटी, सूती काली साड़ी, आंखों के नीचे नींद और वर्षों की चिंता के निशान। उसके पास उसकी बेटी अनन्या और बेटा कबीर खड़े थे। दोनों ने अपनी माँ की उंगलियों को सफेद पड़ते देखा।
रोहन ने सफेद गुलाबों की माला रखी और सिर झुकाया। पर मीरा की आँखों में वह सिर झुकाना भी अभिनय लगा।
“अब बेटा बनने मत आइए,” मीरा की आवाज़ धीमी थी, पर सीधी चुभी। “बाबूजी को फूलों की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें ज़रूरत थी कि जब वह फोन करें तो आप उठाएँ।”
सन्नाटा जम गया। मोहल्ले की बूढ़ी मिश्रा आंटी ने नज़रें फेर लीं। पंडित जी ने खाँसकर मंत्रों की पुस्तक बंद कर दी। रोहन ने धीरे से सिर उठाया।
“आप मीरा होंगी,” उसने कहा, “सामने वाली।”
उसने “सामने वाली” ऐसे कहा जैसे किसी नौकरानी को उसके असली स्थान की याद दिला रहा हो।
“हाँ,” मीरा ने जवाब दिया, “सामने वाली।”
“पिताजी आपका ज़िक्र करते थे।”
“आपका भी करते थे।”
इस बार रोहन का जबड़ा कस गया।
हरिशंकर त्रिवेदी पुराने लखनऊ की एक संकरी, पर इज़्ज़तदार गली में रहते थे। उनकी छोटी-सी कोठी के हरे दरवाज़े पर हमेशा धूल जमी रहती थी, आँगन में तुलसी का सूखा गमला था, और बरामदे की पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर उनकी पत्नी सावित्री की सफेद शॉल आज भी टंगी रहती थी। सावित्री को गुज़रे कई साल हो चुके थे, पर हरिशंकर ने उनका कप चाय की रैक से कभी नहीं हटाया।
मीरा उनसे 9 साल पहले मिली थी, तलाक के कुछ महीनों बाद। वह अपने 2 बच्चों के साथ किराए के छोटे मकान में आई थी। महीने के अंत में राशन, फीस, बिजली बिल और पूर्व पति की अधूरी जिम्मेदारियाँ उसके सीने पर पत्थरों की तरह रखी रहतीं।
एक जनवरी की ठंडी रात, उसने देखा कि त्रिवेदी जी के गेट पर दवा की थैली बारिश में भीग रही है और अख़बार 3 दिन से पड़े हैं। मीरा ने पहले खुद से कहा, “किसी और का मामला है।” फिर अनन्या ने धीरे से कहा, “मम्मी, अगर नाना ऐसे अकेले होते तो?”
मीरा ने चुपचाप मूंग दाल की खिचड़ी डिब्बे में भरी, छाता उठाया और गली पार कर गई।
“त्रिवेदी जी?” उसने दरवाज़ा खटखटाया।
बहुत देर बाद दरवाज़ा खुला। सामने दुबले, चिड़चिड़े, सफेद दाढ़ी वाले हरिशंकर खड़े थे।
“मैं ठीक हूँ।”
“आपकी दवाइयाँ ठीक नहीं हैं। वे बाहर नहा रही हैं।”
“दवा सूख जाएगी।”
“और आप?”
उन्होंने उसे घूरा।
मीरा ने डिब्बा आगे बढ़ाया। “गरम खिचड़ी है।”
“भीख नहीं लेता मैं।”
“तो धमकी समझ लीजिए। नहीं खाएँगे तो कल और लाऊँगी।”
अगले दिन उन्होंने डिब्बा धोकर लौटाया और बोले, “नमक कम था।”
“फिर भी खत्म कर दी।”
“खाना फेंकता नहीं।”
यहीं से रिश्ता शुरू हुआ—न नाम दिया गया, न कोई वादा। बस दवा, खिचड़ी, बाज़ार से सब्ज़ी, डॉक्टर का अपॉइंटमेंट, और दो ऐसे लोग जो दुनिया के सामने मजबूत बनने का नाटक करते थे।
सालों में मीरा ने उनका ब्लड प्रेशर पढ़ना सीखा, उनकी दवाइयाँ अलग डिब्बों में रखना सीखा, यह पहचानना सीखा कि वह सच में बीमार हैं या बस जिद में “मैं ठीक हूँ” कह रहे हैं। बदले में हरिशंकर ने उसके घर का टूटा ताला ठीक किया, कबीर की पढ़ाई की मेज़ बनाई, और एक रात जब मीरा का पूर्व पति गली में चिल्लाने आया, तो अपनी लाठी लेकर बाहर खड़े हो गए।
“यहाँ औरतों को डराने नहीं आया जाता,” उन्होंने कहा था। “आवाज़ नीचे, वरना पूरी गली बुला लूँगा।”
मीरा ने उस रात पहली बार महसूस किया था कि कोई उसके अपमान के बीच दीवार बनकर खड़ा हो सकता है।
रोहन कभी-कभी आता। दिवाली पर 12 मिनट, जन्मदिन पर देर से संदेश, और हर बार वही वादा—“अगले महीने पूरा दिन रुकूँगा, पापा।” वह महीना कभी नहीं आया।
अब वही रोहन श्मशान के बाहर मीरा को घूर रहा था।
“मेरे पिता बूढ़े थे,” उसने कहा। “बूढ़ों के आसपास लोग बहुत जल्दी अपनापन दिखाने लगते हैं।”
मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया, पर वह झुकी नहीं।
तभी ग्रे कोट पहने एक आदमी आगे आया।
“मीरा शर्मा जी?”
“जी।”
“मैं अधिवक्ता अरविंद माथुर। त्रिवेदी साहब ने यह लिफाफा आपको अंतिम संस्कार के बाद देने को कहा था।”
रोहन तुरंत आगे बढ़ा। “यह क्या है?”
“निजी पत्र।”
रोहन हँसा, कड़वा और तेज़। “खोलिए न। देख लें, खिचड़ी और दवाइयों का कितना इनाम मिला है।”
मीरा ने लिफाफा सीने से लगा लिया। गली, श्मशान, रिश्तेदार, सब जैसे धुंधला गए। उसे बस कागज़ की ठंडक और हरिशंकर की अनुपस्थित आवाज़ महसूस हुई।
और उस लिफाफे के भीतर लिखा पहला वाक्य उसके पैरों के नीचे की ज़मीन खींच लेने वाला था।
PART 2
घर लौटकर मीरा ने दरवाज़ा बंद किया और लिफाफा खोला। हरिशंकर की लिखावट तिरछी, पर साफ थी।
“मीरा, 9 साल तक तुमने मुझे खाना, दवा, डाँट और इंसानी आवाज़ दी। अब अपने तहखाने में रखे पुराने फ्रीज़र को खोलना।”
कबीर चौंका। “कौन-सा फ्रीज़र?”
मीरा को याद आया। 6 साल पहले उसका फ्रिज खराब हो गया था। दूध, सब्ज़ियाँ, चिकन, बच्चों का आइसक्रीम सब खराब होने वाला था। वह रसोई में खड़ी रो रही थी। उसी शाम हरिशंकर एक पुराना सफेद डीप फ्रीज़र रिक्शे पर लादकर लाए थे।
“सावित्री का था,” उन्होंने कहा था। “उधार रख लो।”
उन्होंने कभी वापस नहीं माँगा।
मीरा काँपते हाथों से नीचे उतरी। तहखाने में नमी, पुराने अख़बार और धूल की गंध थी। फ्रीज़र के भीतर सब्ज़ियों के पैकेट, जमी रोटियाँ और नीचे भूरे कागज़ में लिपटा एक डिब्बा था।
उसने खोला।
अंदर वही पुराना प्लास्टिक डिब्बा था। ढक्कन पर टेढ़ी चिट लगी थी—
“मीरा की पहली खिचड़ी। 14 जनवरी।”
मीरा की साँस अटक गई।
डिब्बे के नीचे पीतल की चाबी और दूसरी चिट्ठी थी।
“तुमने समझा था, यह सिर्फ खिचड़ी थी। मेरे लिए यह सबूत था कि मेरी गुमशुदगी किसी को दिखेगी। यह चाबी भी उसी बात का जवाब है।”
PART 3
मीरा वहीं तहखाने की ठंडी सीढ़ी पर बैठ गई। अनन्या ने उसके कंधे पर हाथ रखा, पर मीरा जैसे बहुत दूर चली गई थी—उस रात में, जब उसने पहली बार खिचड़ी दी थी और उस बूढ़े आदमी ने नमक कम बताकर अपनी भूख छुपा ली थी।
कबीर ने चाबी उठाई। “मम्मी, यह किसकी है?”
मीरा ने दूसरी चिट्ठी खोली। कागज़ पर हरिशंकर की लिखावट पहले से धीमी थी, जैसे हर शब्द लिखते समय उन्होंने साँस बचाई हो।
“मीरा, तुमने मुझे 9 साल की साधारण दया दी। ऐसी दया, जिसे लोग एहसान नहीं मानते क्योंकि उसमें न फोटो खिंचता है, न ताली बजती है। तुमने मेरे लिए सब्ज़ी खरीदी, दवाइयाँ लाईं, अस्पताल में मेरे बगल में बैठीं, सावित्री की बरसी पर बेसन के लड्डू बनाए, भले ही वे इतने सख्त थे कि दाँत टूट सकता था।
पर मैंने भी तुम्हें देखा।
मैंने देखा कि तुम बच्चों की फीस भरने से पहले अपने लिए चप्पल नहीं खरीदती थीं। मैंने देखा कि तुम मुस्कुराकर कहती थीं ‘सब ठीक है’, जबकि गैस सिलेंडर, स्कूल नोटिस और बैंक के संदेश तुम्हारी नींद चुरा लेते थे। मैंने वह शाम भी याद रखी, जब तुमने कहा था—‘कभी लगता है, कहीं शांत जगह हो, जहाँ 24 घंटे कोई मुझे माँ, दीदी, मैडम या जिम्मेदारी कहकर न पुकारे।’
बेटी, नैनीताल के पास भीमताल वाली छोटी कोठरी अब तुम्हारी है।
वह महल नहीं है। नीला दरवाज़ा उखड़ा हुआ है। छत बरसात में रूठती है। रसोई छोटी है। पर वहाँ झील दिखती है, और सुबह इतनी शांत होती है कि आदमी खुद की आवाज़ सुन सके।
तुमने मेरे दिनों में जगह बनाई।
मैं तुम्हें एक जगह दे रहा हूँ, जहाँ तुम खुद को वापस पा सको।”
मीरा ने चाबी होंठों से लगा ली। उसके आँसू कागज़ पर गिरने लगे।
“उन्होंने सुना था,” वह फुसफुसाई। “मैंने तो बस एक बार कहा था।”
अनन्या रोते हुए बोली, “किसी ने पहली बार तुम्हारी भी सुनी, मम्मी।”
अगली सुबह मीरा अधिवक्ता अरविंद माथुर के दफ्तर पहुँची। कमरा पुरानी फाइलों, लकड़ी की मेज़ और दीवार पर टंगी कानून की डिग्रियों से भरा था। रोहन पहले से वहाँ बैठा था। उसकी आँखें लाल थीं, पर दुख से नहीं; अपमान और गुस्से से।
“यह सब नाटक है,” वह मीरा के बैठते ही बोला। “पिताजी का दिमाग आख़िर में ठीक नहीं था।”
माथुर साहब ने चश्मा ठीक किया। “वसीयत 11 महीने पहले बनी थी। मेडिकल प्रमाणपत्र, 2 गवाह और वीडियो बयान मौजूद हैं। सब वैध है।”
रोहन ने मेज़ पर हाथ पटका। “वह औरत हर समय मेरे पिता के घर में रहती थी!”
मीरा ने पहली बार उसकी आँखों में बिना झिझक देखा। “हाँ। क्योंकि आप नहीं रहते थे।”
“तुमने उन्हें बहकाया।”
“मैंने उन्हें खाना दिया। दवाइयाँ दीं। डॉक्टर के पास ले गई। उस रात अस्पताल में बैठी जब आपका फोन बंद था। आपकी माँ की बरसी पर उनके साथ चुप बैठी। मेरी मदद को गंदा मत बनाइए, सिर्फ इसलिए कि आपको अपनी गैरहाज़िरी साफ दिख रही है।”
रोहन खड़ा हो गया। “भीमताल वाली जगह मेरी माँ की थी।”
माथुर साहब ने एक और लिफाफा खोला। “त्रिवेदी जी ने यह आपके लिए पढ़ने को कहा था।”
रोहन का चेहरा तन गया।
“रोहन,” अधिवक्ता ने पढ़ना शुरू किया, “मैंने भीमताल का घर मीरा को इसलिए नहीं दिया कि मैंने तुम्हें प्यार करना छोड़ दिया। मैंने वह इसलिए नहीं दिया क्योंकि तुमने आना छोड़ दिया। जीवन बड़े भाषणों से नहीं, रोज़ के छोटे दिनों से बनता है। तुम मेरे बहुत से दिन छोड़ गए।”
कमरे में भारी चुप्पी उतर आई।
रोहन ने मीरा की ओर देखा, जैसे वह उसकी विरासत चुरा लाई हो।
“यह खत्म नहीं हुआ,” उसने दाँत भींचे।
माथुर साहब ने मेज़ की दराज़ से छोटा रिकॉर्डर निकाला। “अभी एक और बात है। आपके पिता की आवाज़।”
रिकॉर्डर चला। हरिशंकर की कर्कश, थकी, पर साफ आवाज़ कमरे में फैल गई।
“अगर यह सुन रहे हो, तो मैं चला गया हूँ और रोहन शायद बहुत गुस्से में होगा।”
रोहन पत्थर हो गया।
“बेटा, मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम कहोगे मीरा ने मुझे फँसाया, मुझे घुमाया, मेरा फायदा उठाया। किसी और पर उंगली उठाना आसान है, अपने खाली हाथ देखना मुश्किल।”
रोहन ने धीमे से कहा, “बकवास।”
माथुर साहब ने हाथ उठाया। “पूरा सुनिए।”
आवाज़ आगे बढ़ी।
“मीरा ने कभी मुझसे 1 रुपया नहीं माँगा। न कुर्सी, न ज़मीन, न नाम। वह पहली बार इसलिए आई क्योंकि उसने देखा कि मेरी दवाइयाँ बारिश में भीग रही हैं। इतना ही था। और मेरे लिए वही बहुत बड़ा था।
तुम्हें याद है, बेटे? शायद नहीं। पर मुझे याद है। हर दिवाली मैं तुम्हारे लिए खिड़की की तरफ कुर्सी रखता था। हर जन्मदिन तुम्हारे फोन की घंटी का इंतज़ार करता था। हर बार तुम कहते—काम है, मीटिंग है, फ्लाइट है, अगली बार आऊँगा। मैं तुम्हारे लिए बहाने बनाता रहा। फिर एक दिन थक गया।
पिता अपने बेटे से प्रेम करना बंद नहीं करता। पर वह झूठ बोलना बंद कर सकता है।”
मीरा ने सिर झुका लिया। आँसू चुपचाप गिरते रहे।
“भीमताल का घर तुम्हारी माँ सावित्री का था,” आवाज़ ने कहा। “इसलिए मैं उसे उस व्यक्ति को नहीं दे सकता था जो उसकी याद को बेचने की बात कर चुका था। उस क्रिसमस की शाम तुम 17 मिनट के लिए आए थे। फोन पर तुमने कहा था—‘पुरानी झील वाली प्रॉपर्टी बेच देंगे, अच्छा पैसा मिलेगा।’ तुमने समझा मैं सुन नहीं रहा। बूढ़े लोग बहुत कुछ सुनते हैं, बस हर बार बोलते नहीं।”
रोहन के चेहरे से रंग उतर गया।
मीरा को वह शाम याद थी। हरिशंकर ने 3 प्लेटें लगाई थीं। रोहन देर से आया, फोन पर ही रहा, मिठाई से पहले चला गया। तीसरी प्लेट हरिशंकर ने अगले दिन सुबह हटाई थी।
रिकॉर्डर में हरिशंकर फिर बोले—
“मीरा ने एक शाम कहा था कि वह थक गई है सबकी ज़रूरत बनते-बनते। उस दिन समझा कि यह औरत दूसरों को बचाते-बचाते खुद से दूर चली गई है। मैं उसे भीमताल इसलिए दे रहा हूँ कि वह वहाँ नौकरानी की तरह नहीं, इंसान की तरह बैठे। यह दया नहीं, कृतज्ञता है।
रोहन, तुम्हारे लिए भी कुछ छोड़ा है—मेरी डायरी। उनमें वे तारीखें हैं जब तुमने फोन किया, जब आने का वादा किया, जब नहीं आए, और जब मीरा थी। यह सज़ा नहीं है। यह हिसाब भी नहीं। यह सिर्फ सच है। उम्र याददाश्त कम कर देती है, पर उपेक्षा को याद रखने के लिए कैलेंडर की ज़रूरत नहीं पड़ती।”
रिकॉर्डर बंद हो गया।
कुछ पल कोई नहीं बोला।
रोहन ने धीरे से कुर्सी पकड़ी। पहली बार उसका चेहरा घमंड से खाली लगा, जैसे भीतर कोई पुरानी दरार खुल गई हो।
“वह कभी कहते ही नहीं थे कि उन्हें मेरी ज़रूरत है,” उसने टूटे स्वर में कहा।
मीरा ने उसे देखा। “कहते थे। बस आपने सुना नहीं।”
रोहन ने डायरी का बंडल लिया, पर खोला नहीं। उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं।
“मैं अदालत जाऊँगा,” उसने आखिरी कोशिश की।
माथुर साहब ने शांत स्वर में कहा, “आप जा सकते हैं। पर आपके पिता ने सब बहुत सावधानी से किया है।”
मीरा उठी। दरवाज़े तक पहुँचते ही रोहन ने कहा, “आपको जो चाहिए था, मिल गया।”
मीरा रुकी। उसकी जेब में चाबी थी, पर उसकी आवाज़ में पहली बार बोझ नहीं, स्पष्टता थी।
“नहीं। मुझे वह मिला जो उन्होंने देना चाहा।”
“वह मेरे पिता थे।”
“हाँ,” मीरा ने धीमे से कहा, “और मुझे आपके लिए दुख है। क्योंकि जब वह जिंदा थे, आपने उन्हें बोझ समझा। अब वह नहीं हैं, तो उन्हें संपत्ति समझ रहे हैं।”
रोहन के पास जवाब नहीं था।
3 दिन बाद मीरा, अनन्या और कबीर भीमताल पहुँचे। लखनऊ की भीड़, हॉर्न, धूल और गलियों की घुटन धीरे-धीरे पीछे छूट गई। पहाड़ों की सड़कें मुड़ीं, देवदार के पेड़ पास आए, हवा में ठंडक घुली, और झील पहली बार दिखी तो मीरा की आँखें भर आईं।
घर सचमुच छोटा था। नीला दरवाज़ा उखड़ा हुआ। बरामदे की लकड़ी चरमराती। दीवारों पर सीलन के निशान। पर सामने झील चुपचाप फैली थी—इतनी शांत, जैसे पानी ने भी वर्षों से किसी का इंतज़ार किया हो।
कबीर ने बैग उतारा। “यह घर थोड़ा तिरछा है।”
अनन्या ने उसे घूरा। “इसमें जान है।”
“और शायद छिपकली की पूरी बिरादरी भी,” कबीर बुदबुदाया।
मीरा हँस पड़ी, आँसुओं के बीच।
चाबी ताले में घुमी। अंदर धूल, बंद लकड़ी, पुराने पर्दों और समय की गंध थी। सफेद चादरों से ढके फर्नीचर, छोटी रसोई, गोल मेज़ और झील की तरफ खुलती खिड़की। मेज़ पर एक और चिट्ठी रखी थी।
मीरा का दिल धक से रह गया।
अनन्या ने उसका हाथ थामा। “पढ़ो।”
लिखावट और काँपती थी।
“अगर यहाँ पहुँच गई हो, तो पहले झाड़ू मत उठाना।
मैं तुम्हें जानता हूँ।
बैठो।
चाय बनाओ।
झील देखो।
फिर अगर हाथ बहुत खुजला रहा हो तो सफाई कर लेना। पर जिस घर को मैंने तुम्हें आराम के लिए छोड़ा है, उसकी पहली नौकरानी मत बन जाना।”
मीरा रोते-रोते हँसी। “बूढ़े जासूस।”
कबीर ने जल्दी से आँखें पोंछीं। “धूल की एलर्जी है।”
अनन्या ने माँ को कुर्सी पर बैठा दिया। “नया नियम। यहाँ पहले चाय, फिर काम।”
रसोई में उन्हें पुरानी केतली मिली, चीनी का डिब्बा, 3 अलग-अलग कप और एक पीला कप, जिसके किनारे पर हल्की दरार थी। नीचे नीले अक्षरों में लिखा था—“सावित्री।”
मीरा ने उसे हाथ में ऐसे लिया जैसे किसी की हथेली पकड़ ली हो।
“क्या इसे इस्तेमाल करना ठीक होगा?”
अनन्या ने मुस्कुराकर कहा, “शायद यह इसी इंतज़ार में था।”
उन्होंने चाय बनाई। चाय थोड़ी कड़वी, थोड़ी ज्यादा उबली, पर अजीब तरह से घर जैसी थी। कबीर को पुराने फोटो मिले। एक तस्वीर में जवान हरिशंकर और सावित्री बरामदे में खड़े थे, दोनों के कपड़ों पर आटा लगा था। पीछे लिखा था—
“बेसन के लड्डू बिगड़ गए। फिर भी खुश।”
मीरा ने तस्वीर पर अंगुली फेरी। “वह मेरे सख्त लड्डुओं पर खूब हँसतीं।”
कबीर बोला, “पहले डाँटतीं।”
“बिल्कुल,” मीरा मुस्कुराई।
उस रात उन्होंने पूरा घर साफ नहीं किया। बस खिड़कियाँ खोलीं, 3 कुर्सियाँ झाड़ीं और साथ बैठकर खाना खाया। मीरा कई बार उठी—प्लेट उठाने, कप धोने, गैस बंद देखने, बिस्तर ठीक करने। हर बार अनन्या या कबीर ने उसे वापस बैठा दिया।
“यहाँ सब काम बाँटेंगे,” अनन्या ने कहा।
कबीर ने प्लेट उठाई। “मैं धो दूँगा।”
मीरा ने उसे आश्चर्य से देखा। “कब से?”
“जब से मरने के बाद भी त्रिवेदी अंकल हमें डाँट रहे हैं।”
तीनों हँस पड़े।
रात में वे बरामदे पर बैठे। झील पर दूर के घरों की रोशनियाँ काँप रही थीं। हवा में ठंड, लकड़ी की हल्की चरमराहट और ऐसा सन्नाटा था जिससे पहले-पहल डर लगता है, क्योंकि जीवन भर शोर में जीने वाला मन शांति को पहचानना भूल जाता है।
मीरा सावित्री के पीले कप में चाय पी रही थी।
कई सालों बाद कोई उसे दूसरे कमरे से नहीं पुकार रहा था। कोई नहीं पूछ रहा था कि मोज़े कहाँ हैं, दवा कहाँ है, खाना कब बनेगा, फीस कब जमा होगी, फाइल कहाँ रखी है।
अनन्या ने सिर उसकी गोद में रख दिया। “मम्मी, अजीब लग रहा है?”
मीरा ने झील को देखा।
“हाँ।”
“बुरा?”
“नहीं। अजीब इसलिए, क्योंकि मैं भाग नहीं रही।”
कबीर सीढ़ी पर बैठा रहा। फिर बोला, “त्रिवेदी अंकल सच में परिवार थे, ना?”
मीरा ने बहुत देर बाद जवाब दिया।
उसने सोचा—भीगी दवाइयाँ, पहली खिचड़ी, सावित्री की चाय, हर जन्मदिन की प्रतीक्षा, अस्पताल की रातें, स्क्रैबल की बाज़ी, लाठी लेकर खड़ा वह बूढ़ा आदमी, और वह बेटा जो बहुत देर से समझा कि पिता इंतज़ार करते-करते भी बूढ़े होते हैं।
“परिवार हमेशा खून से नहीं बनता,” मीरा ने कहा। “कभी-कभी परिवार वह होता है जो देख ले कि तुम 2 दिन से नहीं दिखीं। जो तुम्हारी पहली खिचड़ी संभालकर रखे। जो तुम्हारी कही हुई एक थकी बात याद रखे, जबकि तुम्हें खुद याद नहीं कि उस दिन तुम मदद माँग रही थीं।”
अनन्या चुपचाप रोई। कबीर ने झील की तरफ मुँह फेर लिया।
रोहन ने सचमुच कानूनी चुनौती देने की कोशिश की, पर वसीयत, मेडिकल प्रमाणपत्र, गवाह, रिकॉर्डिंग और माथुर साहब की तैयारी के सामने मामला टिक नहीं पाया। कुछ ही हफ्तों में रास्ता साफ हो गया।
1 महीने बाद मीरा को एक पैकेट मिला। भेजने वाले का नाम नहीं था। भीतर हरिशंकर की डायरी थीं। साथ में रोहन की छोटी-सी चिट्ठी थी—
“मैं इन्हें पढ़ नहीं पा रहा। शायद आप इन्हें बेहतर संभाल सकें।”
मीरा नहीं समझ पाई कि यह माफी थी, हार थी या किसी आदमी का पहला ईमानदार कदम, जिसने अपने पिता से बहुत-सी मुलाकातें खो दी थीं।
उसने जवाब नहीं भेजा। डायरी भीमताल वाले घर में तस्वीरों के पास रख दी।
हर 14 जनवरी को मीरा खिचड़ी बनाती। नमक थोड़ा कम रखती। फिर खुद ही मुस्कुरा देती।
कभी अनन्या और कबीर आते। कभी मीरा अकेली जाती। वह खिड़कियाँ खोलती, चाय बनाती, झील के सामने बैठती और सन्नाटे को अपनी थकी आत्मा की सिलवटें सीधा करने देती।
9 साल तक उसने सोचा था कि वह बस एक जिद्दी बूढ़े पड़ोसी के दरवाज़े पर खाना रख रही है।
उसे क्या पता था कि उसी दरवाज़े के पीछे कोई उसे भी उतनी ही गहराई से देख रहा था।
और जब वह उसे अकेलेपन से बचाने के लिए खिचड़ी ले जा रही थी, तब हरिशंकर चुपचाप एक चाबी संभाल रहे थे—ताकि एक दिन उसे वह जीवन वापस दे सकें, जिसे बचाना मीरा खुद भूल चुकी थी।
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