
PART 1
दिल्ली के एक नामी स्कूल की जन्मदिन पार्टी में, जब 8 साल के आरव ने अपने केक पर नीले क्रीम से लिखा देखा—“माफ़ करना कि मैं पैदा हुआ”—तो उसके हाथ से मोमबत्ती गिर गई और पूरा कमरा पत्थर जैसा खामोश हो गया।
उस दिन नेहा ने अपने बेटे के लिए 2 हफ्ते से तैयारी की थी। वह गुड़गाँव की एक छोटी-सी लाइब्रेरी में काम करती थी, लेकिन आरव के लिए उसने अपनी हर थकान छिपा ली थी। घर की छत पर रंगीन पतंगें लटकाई थीं, छोटे-छोटे डायनासोर वाले कप रखे थे, समोसे, गुलाब जामुन, चॉकलेट मिल्क और आरव का पसंदीदा ज्वालामुखी वाला केक मंगवाया था। आरव को डायनासोर से अजीब-सा प्यार था। वह 8 साल का होकर भी बड़े-बड़ों को बता देता था कि कौन-सा जीव किस युग में था।
सुबह उसने अपनी पीली टी-शर्ट पहनी थी, जिस पर लिखा था—“मैं अपनी जगह बनाऊँगा।” उसने आईने में खुद को बहुत देर तक देखा था।
“मम्मा, दादी फिर कुछ बोलेंगी क्या?”
नेहा ने उसके बाल सँवारे और मुस्कुराने की कोशिश की।
“आज तुम्हारा दिन है, बेटा। आज कोई तुम्हारी खुशी कम नहीं करेगा।”
लेकिन नेहा अपने ही शब्दों से डर गई थी।
सविता मेहरा, आरव की दादी, दिल्ली के करोल बाग में सबकी “सविता आंटी” थीं। मंदिर समिति की अध्यक्ष, गरीब बच्चों के लिए कंबल बाँटने वाली, हर त्योहार पर भंडारा कराने वाली, और फेसबुक पर संस्कारों की बड़ी-बड़ी बातें लिखने वाली। लोग कहते थे, “क्या महान महिला हैं।” पर घर के भीतर वही महिला शब्दों से बच्चों को तोड़ती थी और फिर मुस्कुराकर कहती थी, “हम तो भलाई के लिए बोल रहे हैं।”
नेहा ने शादी के बाद ही समझ लिया था कि सविता के तानों की धार चाकू जैसी है। पहली बार सगाई में उन्होंने सबके सामने कहा था, “रोहन ने बहू तो लाई है, पर पसंद में हमेशा से थोड़ा कमजोर रहा है।” लोग हँस दिए थे। रोहन ने बाद में नेहा से कहा था, “मम्मी का मज़ाक ऐसा ही है, दिल पर मत लो।”
यही वाक्य अगले 9 साल तक हर चोट पर लगाया जाने वाला झूठा मरहम बन गया।
आरव के जन्म पर सविता ने बच्चे को गोद में लेते ही कहा था, “बहुत नाज़ुक लग रहा है। पता नहीं इस दुनिया में कैसे टिकेगा।” रोहन ने फिर वही कहा, “मम्मी का मतलब बुरा नहीं है।”
पर सविता का मतलब हमेशा बहुत सोच-समझकर चुना हुआ होता था।
रविवार के खाने में वह आरव को सबसे कोने में बैठातीं। कहतीं, “ये चुपचाप बैठेगा तो सबको शांति रहेगी।” रोहन की बहन प्रिया के बच्चों को महंगे खिलौने मिलते, आरव को पुराने कॉमिक्स। जब वह रो पड़ता, सविता आँखें घुमाकर कहतीं, “इतना कमजोर दिल लेकर क्या करेगा?”
नेहा चुप रहती रही। उसे लगता था कि घर बचाना है। रिश्ते बचाने हैं। पर उसकी मौसी रेखा हमेशा फोन पर कहती थीं, “बेटी, जिस घर में सच बोलने से डर लगे, वह घर नहीं, पिंजरा होता है।”
जन्मदिन से 3 दिन पहले रोहन ने हिचकते हुए कहा, “मम्मी एक केक लाना चाहती हैं।”
नेहा ने तुरंत सिर उठाया।
“मैंने आरव का केक ऑर्डर कर दिया है। वही ज्वालामुखी वाला।”
“बस, उन्हें भी शामिल होना है।”
“उन्हें शामिल नहीं होना, नियंत्रण करना है।”
“नेहा, इतना मत सोचो।”
“तो साफ बोल देना—सिर्फ ‘हैप्पी बर्थडे आरव’। कोई ताना नहीं। कोई शिक्षा नहीं।”
रोहन ने थके हुए स्वर में कहा, “मैं बात कर लूँगा।”
शनिवार को सविता 35 मिनट देर से आईं। ऑफ-व्हाइट सिल्क साड़ी, मोतियों की माला, माथे पर बड़ी बिंदी, और हाथ में सफेद केक बॉक्स। उन्होंने नेहा को देखा भी नहीं। सीधा बच्चों के बीच जाकर बोलीं, “आओ बच्चों, दादी आरव राजा के लिए खास तोहफ़ा लाई है।”
आरव भागता हुआ आया। उसके 12 दोस्त भी पास आ गए। नेहा का दिल अचानक धड़कना भूल गया। रोहन बालकनी के पास खड़ा था, जैसे उसे पहले से कुछ पता हो।
सविता ने बॉक्स खोला।
सफेद केक पर नीले अक्षर चमक रहे थे।
“माफ़ करना कि मैं पैदा हुआ, आरव।”
आरव ने पहले पढ़ा, फिर फिर से पढ़ा। उसकी आँखों में सवाल आया, फिर शर्म, फिर ऐसा खालीपन जैसे किसी ने उसके भीतर की रोशनी बुझा दी हो। बच्चों ने हँसना बंद कर दिया। एक माँ के मुँह से निकला, “हे भगवान…”
नेहा आगे बढ़ी।
“आरव…”
लेकिन आरव पीछे हट गया। उसके होंठ काँप रहे थे। उसने किसी को कुछ नहीं कहा। बस मुड़ा और अपने कमरे की तरफ भाग गया। दरवाज़ा ज़ोर से बंद हुआ।
सविता ने केक का ढक्कन आधा बंद करते हुए कहा, “बच्चों को जिंदगी की सच्चाई जल्दी समझनी चाहिए।”
नेहा की आवाज़ बर्फ जैसी हो गई।
“मेरे घर से निकल जाइए।”
रोहन बीच में आया, “नेहा, अभी मेहमान हैं…”
नेहा ने उसकी तरफ देखा।
“एक शब्द और नहीं।”
PART 2
पार्टी 4 बजे से पहले खत्म हो गई। छत पर आधे भरे गिलास, फूटे बिना पड़ी पिनाटा, बिखरे गुब्बारे और आरव का अनछुआ ज्वालामुखी केक रह गया। सविता का केक भी वहीं पड़ा था, जैसे किसी ने घर के बीचोंबीच जहर रख दिया हो।
आरव 2 दिन कमरे से बाहर नहीं आया। नेहा दरवाज़े के पास खाना रखती रही—दाल-चावल, दही, पराठा, खीर। सब लगभग वैसा ही लौट आता। कभी तकिए में दबा रोना सुनाई देता, कभी डरावनी खामोशी।
“बेटा, 3 निवाले खा लो।”
“मुझे भूख नहीं है।”
“मैं बाहर बैठ जाऊँ?”
“मम्मा, मैं गायब होना चाहता हूँ।”
नेहा के भीतर कुछ हमेशा के लिए टूट गया।
रविवार रात रोहन ने अपनी माँ को फोन किया। नेहा ने दरवाज़े के पीछे से सुना।
“मम्मी, आपने बहुत गलत किया।”
सविता की आवाज़ तेज थी।
“तेरी पत्नी नाटक कर रही है। लड़का इतना कमजोर है तो परवरिश देख।”
नेहा इंतज़ार करती रही कि रोहन गरजेगा। पर उसने बस कहा, “सब शांत होंगे तो बात करेंगे।”
मंगलवार सुबह नेहा ने प्रिया को मैसेज किया—“तुम्हारी माँ ने आरव के केक पर लिखा था ‘माफ़ करना कि मैं पैदा हुआ’। मैं अब उनकी इज्जत बचाना बंद कर रही हूँ।”
28 मिनट बाद जवाब आया।
“मुझे लगा था कोई तो कभी बोलेगा। मेरे पास भी सबूत हैं।”
फिर ऑडियो, स्क्रीनशॉट, बच्चों के रोने की कहानियाँ, और सविता की असली आवाज़ नेहा के फोन में भरती चली गई।
PART 3
नेहा ने अगले 2 दिन सोए बिना बिताए। वह गुस्से में थी, लेकिन जल्दबाज़ नहीं थी। उसने हर स्क्रीनशॉट प्रिंट किया, हर ऑडियो की पंक्तियाँ लिखीं, हर तारीख नोट की। प्रिया ने बताया कि सविता ने उसकी बेटी अनाया को “नकचढ़ी” कहा था क्योंकि वह दादी की चुनी हुई लहंगा नहीं पहनना चाहती थी। उसके बेटे कबीर से कहा था, “तू अपने पिता जैसा कमजोर निकलेगा।” प्रिया ने यह भी माना कि वह डरती रही, क्योंकि सविता घर की बुज़ुर्ग थीं और हर रिश्तेदार उनके पक्ष में खड़ा हो जाता था।
फिर पार्टी में आए 4 माता-पिता ने नेहा को लिखा। एक ने केक की तस्वीर भेजी। धुंधली थी, मगर शब्द साफ दिख रहे थे। एक माँ ने लिखा, “मेरी बेटी ने रात को पूछा—क्या दादी अपने पोते से नफरत कर सकती है?” दूसरी ने लिखा, “यह गलती नहीं, क्रूरता थी।”
नेहा ने सब कुछ एक लाल फाइल में रखा। पहले पन्ने पर उसने लिखा—“सविता मेहरा बच्चों के साथ क्या करती हैं, जब कोई उन्हें रोकता नहीं।”
गुरुवार सुबह करोल बाग के पुराने बाजार में वह उसी बेकरी पर गई जहाँ से सविता अक्सर मंदिर समिति के लिए केक मंगवाती थीं। दुकानदार ने पूछा, “मैडम, क्या लिखना है?”
नेहा की गर्दन सख्त हो गई।
“लिखिए—माफ़ करना कि मैं पैदा हुई, सविता।”
दुकानदार चौंका, पर नेहा की आँखों में ऐसा तूफान था कि उसने कोई सवाल नहीं किया।
10 बजकर 30 मिनट पर नेहा सविता के घर पहुँची। बाहर 9 कारें खड़ी थीं। अंदर मंदिर समिति की बैठक चल रही थी। ड्राइंग रूम में चाय की खुशबू, अगरबत्ती का धुआँ, फूलों की थालियाँ और दान-पत्रों की फाइलें रखी थीं। सविता क्रीम रंग के सोफे पर बैठी थीं, जैसे कोई रानी दरबार लगाए हो। उनके आसपास अच्छी साड़ियों में महिलाएँ बैठी थीं, जो गरीब बच्चों के लिए स्कूल बैग बाँटने की योजना बना रही थीं।
नेहा ने दरवाज़ा नहीं खटखटाया। वह सीधे अंदर चली गई।
सविता का चेहरा जम गया।
“नेहा? यह क्या बदतमीज़ी है? हमारी बैठक चल रही है।”
नेहा ने केक बॉक्स सेंटर टेबल पर रखा।
“मैं आपकी चीज़ लौटाने आई हूँ।”
कमरे में बातें रुक गईं।
नेहा ने बॉक्स खोला।
सफेद केक पर नीले अक्षर दिखाई दिए।
“माफ़ करना कि मैं पैदा हुई, सविता।”
एक महिला ने मुँह पर हाथ रख लिया। दूसरी फुसफुसाई, “ये क्या है?”
सविता खड़ी हो गईं।
“तुम पागल हो गई हो? मेरे घर में ऐसी घटिया हरकत?”
नेहा ने उनकी आँखों में आँखें डाल दीं।
“ठीक वैसी ही हरकत, जैसी आपने मेरे 8 साल के बच्चे के जन्मदिन पर की थी।”
कमरा जैसे सांस लेना भूल गया।
शकुंतला जी, जो मंदिर समिति में सविता की सबसे करीबी मानी जाती थीं, धीरे से बोलीं, “बच्चे के लिए?”
सविता हँसीं, मगर आवाज़ में डर था।
“मेरी बहू को हमेशा से मुझे बदनाम करना था। मेरा बेटा मेरे करीब है, यही इसे चुभता है।”
नेहा ने लाल फाइल खोली।
“आज आप हर चीज़ को बहू की जलन बताकर नहीं बचेंगी।”
उसने कागज़ महिलाओं में बाँट दिए। शुरुआत में सबने शिष्टाचार में पकड़ा, फिर पढ़ते-पढ़ते चेहरे बदलने लगे। किसी की भौंहें सिकुड़ीं, किसी के होंठ खुल गए, किसी ने पन्ना नीचे कर लिया जैसे उससे बदबू आ रही हो। वहाँ केक की तस्वीर थी। माता-पिता के बयान थे। प्रिया के स्क्रीनशॉट थे। तारीखें थीं। बच्चों पर किए गए ताने थे।
सविता चिल्लाईं, “ये सब संदर्भ से बाहर है!”
नेहा ने फोन खोला और ऑडियो चला दिया।
सविता की आवाज़ कमरे में गूँजी—“आरव पैदा होने के बाद से ही समस्या है। नेहा ने उसे इतना सिर चढ़ाया है कि कल को उसे सच में लगने लगेगा कि उसकी कोई कीमत है।”
ऑडियो बंद हुआ।
किसी कप की चम्मच काँपकर प्लेट से टकराई।
शकुंतला जी की आँखें भर आईं।
“सविता, यह केक सच था?”
सविता ने चारों ओर देखा। वह सहयोग ढूँढ रही थीं, पर हर चेहरा उनसे थोड़ा दूर खिसक चुका था।
“मैंने उसे सबक दिया था। आजकल के बच्चे बहुत नाज़ुक हैं।”
नेहा की आवाज़ अब शांत थी, मगर वही शांति सबसे डरावनी थी।
“वह उसका जन्मदिन था।”
“तो क्या हुआ? दुनिया उसके हिसाब से नहीं चलेगी।”
“दुनिया नहीं। पर उस दिन, उस 1 दिन, उसे यह हक था कि वह खुश रहे।”
सविता का चेहरा लाल हो गया।
“तुमने उसे कमजोर बनाया है। रोहन पहले ऐसा नहीं था।”
“रोहन ऐसा इसलिए है क्योंकि इस घर में कोई बोलता नहीं था।”
एक महिला उठी। फिर दूसरी। शकुंतला जी ने अपना पर्स उठाया।
“मैं यहाँ नहीं रह सकती।”
सविता ने तीखे स्वर में कहा, “तुम इस औरत पर विश्वास करोगी?”
शकुंतला जी ने धीरे से जवाब दिया, “मैंने तुम्हारी आवाज़ सुनी है, सविता।”
फिर कुर्सियाँ खिसकने लगीं। साड़ियाँ सरसराईं। चप्पलों की आवाज़ दरवाज़े तक गई। कोई उनसे आँख नहीं मिला रहा था। कुछ महिलाएँ सचमुच रो रही थीं। कुछ सिर्फ असहज थीं कि जिस महिला को वे आदर्श मानती थीं, वह अपने ही पोते को भीतर से तोड़ सकती है।
जब कमरा लगभग खाली हो गया, नेहा ने केक उनकी ओर सरकाया।
“यह बच्चे के लिए नहीं है। यह आपके लिए है।”
सविता की आँखें गुस्से से चमक रही थीं।
“रोहन तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेगा।”
“शायद।”
“तुम एक केक के कारण अपना घर तोड़ रही हो।”
नेहा ने सिर हिलाया।
“यह केक की बात नहीं है। यह उस औरत की बात है जिसने 8 साल के बच्चे को पढ़वाया कि उसे पैदा होने के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए, और फिर भी उसे शर्म नहीं आई।”
सविता ने धीमे, खतरनाक स्वर में कहा, “तुम मेरा पोता मुझसे नहीं छीन सकती।”
“आपने उसे खुद खोया है।”
“मैं उसकी दादी हूँ।”
“दादी होना कोई ऐसा अधिकार नहीं है, जिससे बच्चे की आत्मा कुचल दी जाए।”
नेहा ने फाइल बंद की। उसके हाथ काँप रहे थे, आवाज़ नहीं।
“आज के बाद आप आरव से नहीं मिलेंगी। न दिवाली पर, न जन्मदिन पर, न स्कूल के बाहर, न फोन पर। कोई तोहफ़ा, कोई चिट्ठी, कोई संदेश नहीं। अगर आपने रोहन, प्रिया या किसी रिश्तेदार के जरिए कोशिश की, तो यह फाइल पूरे परिवार, मंदिर समिति और उन सब लोगों तक पहुँचेगी जिनके सामने आप दया की देवी बनी फिरती हैं।”
सविता ने फुसफुसाया, “तुम राक्षस हो।”
नेहा ने 1 पल उन्हें देखा। उसे दया आई, मगर इतनी नहीं कि वह पीछे हटे।
“नहीं। राक्षस वह है जो बच्चे को खुद से नफरत करना सिखाए। मैं सिर्फ उसकी माँ हूँ, जो देर से सही, उसके सामने खड़ी हो गई।”
नेहा बाहर आई तो उसके कदम भारी थे। यह जीत नहीं थी। कोई माँ तब जीतती नहीं जब उसे अपने बच्चे की रक्षा के लिए परिवार की नकली इज्जत जलानी पड़े। वह कार में बैठी और कुछ देर स्टीयरिंग पर हाथ रखे रही। फिर मौसी रेखा को फोन किया।
“मैंने कर दिया।”
उधर से बस इतना आया, “अब घर जा। वह बच्चा तेरा इंतज़ार कर रहा होगा।”
घर पहुँचते ही नेहा ने आरव को रसोई में बैठा पाया। 2 दिन बाद पहली बार वह कमरे से बाहर था। बाल बिखरे थे, पजामा ढीला था, और कटोरे में कॉर्नफ्लेक्स भीगकर मुलायम हो चुके थे। वह चम्मच घुमा रहा था।
“आप कहाँ गई थीं?” उसने नज़र उठाए बिना पूछा।
नेहा उसके पास बैठ गई।
“दादी से बात करने।”
चम्मच रुक गई।
“वो नाराज़ हैं?”
“हाँ।”
“मेरी वजह से?”
नेहा का दिल सिकुड़ गया।
“नहीं, बेटा। उनकी वजह से। उन्होंने जो किया, उसकी वजह से। तुमने कुछ गलत नहीं किया।”
आरव ने होंठ भींचे।
“वो मुझे पसंद क्यों नहीं करतीं?”
नेहा पहले की तरह झूठ बोल सकती थी—कि दादी का प्यार अलग होता है, कि बुज़ुर्ग कभी-कभी कठोर बोलते हैं, कि मन में प्यार है। लेकिन इस बार उसने दोषी को बचाने वाली कोई बात नहीं कही।
“शायद उनके अंदर कुछ बहुत टूटा हुआ है। और उसे ठीक करने के बजाय वह दूसरों पर फेंक देती हैं। लेकिन किसी के प्यार न कर पाने से तुम प्यार के लायक कम नहीं हो जाते।”
आरव की आँख से आँसू गिरा।
“सबको ऐसा लगता होगा?”
“नहीं।”
“पापा को भी?”
नेहा ने लंबी सांस ली।
“पापा बहुत सालों से अपनी माँ से डरते रहे हैं। इससे उनका चुप रहना सही नहीं हो जाता। अब उन्हें तुम्हें अपने कामों से दिखाना होगा कि वह बदल सकते हैं।”
आरव ने पहली बार नेहा की तरफ देखा।
“मुझे उनसे मिलना पड़ेगा?”
“नहीं।”
“कभी नहीं?”
“जब तक तुम सुरक्षित महसूस नहीं करते, कभी नहीं।”
आरव उठकर नेहा से लिपट गया। पहले उसका शरीर सख्त था, फिर धीरे-धीरे ढीला पड़ गया। नेहा ने उसे कसकर पकड़ा और चुपचाप रोती रही।
शाम को दोनों ने घर पर चॉकलेट केक बनाया। केक बीच से दब गया था, किनारे जल गए थे, और चॉकलेट ऊपर से टेढ़ी बह रही थी। आरव ने खाने वाले पेन से खुद लिखा—“जन्मदिन मुबारक आरव।” अक्षर टेढ़े थे, पर वे उसके थे। जब नेहा ने 8 मोमबत्तियाँ जलाईं, आरव ने हल्की-सी मुस्कान दी। पूरी नहीं, मगर इतनी कि रसोई फिर से घर जैसी लगने लगी।
रोहन रात 8 बजे लौटा। उसका फोन लगातार बज रहा था। माँ की 16 मिस्ड कॉल्स थीं। प्रिया का लंबा संदेश था। शकुंतला जी ने लिखा था—“अपने बेटे को बचाओ। बाकी सब बाद में।”
वह दरवाज़े पर खड़ा रहा। नेहा प्लेटें धो रही थी। आरव सोफे पर कार्टून देख रहा था, मगर उसके कंधे तन गए थे।
रोहन ने धीमे कहा, “तुम मम्मी के घर गई थीं।”
“हाँ।”
“वो कह रही हैं तुमने उन्हें सबके सामने अपमानित किया।”
“सच कह रही हैं।”
रोहन ने नेहा को देखा। उसे शायद उम्मीद थी कि वह सफाई देगी, पछताएगी, रोएगी। पर नेहा ने कुछ नहीं छिपाया।
रोहन कुर्सी पर बैठ गया और चेहरा हाथों में छिपा लिया।
“जब मैंने केक देखा था, मुझे पता था कि वह जानबूझकर था। फिर भी मैंने उसे कम करने की कोशिश की। क्योंकि अगर सच मान लेता, तो मानना पड़ता कि मेरी माँ मेरे बेटे के साथ क्रूर हो सकती है। और मैं उसे रोकता नहीं रहा।”
नेहा की आँखें भर आईं। प्रेम अभी मरा नहीं था, मगर उसके नीचे गुस्से की राख जल रही थी।
“तुमने हमें अकेला छोड़ दिया, रोहन।”
“मुझे पता है।”
“नहीं। तुम्हें अभी पता चलना शुरू हुआ है।”
रोहन उठकर सोफे के पास गया। वह आरव से थोड़ा दूर फर्श पर बैठा, जैसे अनुमति माँग रहा हो।
“आरव…”
आरव ने टीवी से नज़र नहीं हटाई।
“मैंने वह नहीं किया जो एक पिता को करना चाहिए था। मुझे उसी पल दादी को रोकना चाहिए था। मुझे तुम्हारे सामने खड़ा होना चाहिए था। मैं अपनी माँ से डर गया, और तुम्हें मेरी डर की कीमत चुकानी पड़ी। मुझे माफ़ कर दो।”
आरव ने धीरे से पूछा, “आपको पता था कि वो मुझे दुख देती हैं?”
रोहन की आवाज़ टूट गई।
“हाँ। मुझे पता था। मैंने दिखावा किया कि इतना गंभीर नहीं है। मैं गलत था।”
“वो माफी माँगेंगी?”
रोहन ने नेहा की तरफ देखा, फिर बेटे की ओर।
“पता नहीं। लेकिन मैं अब उन्हें तुम्हें चोट नहीं पहुँचाने दूँगा।”
आरव ने बहुत देर बाद कहा, “तो अभी उनका नंबर ब्लॉक कर दो।”
रोहन ने फोन निकाला। आरव और नेहा के सामने उसने सविता का नंबर ब्लॉक कर दिया। यह छोटा-सा काम था, पर आरव की आँखों में जैसे कोई गाँठ हल्की हुई।
अगले महीने आसान नहीं थे। सविता ने दूसरे नंबरों से संदेश भेजे। रिश्तेदारों को फोन किया। कहा कि बहू ने बेटा छीन लिया। फेसबुक पर लिखा—“आजकल घर तोड़ने वाली औरतें बुज़ुर्गों को अकेला कर देती हैं।” पर पहली बार लोग चुप रहे। मंदिर समिति ने उन्हें कुछ समय के लिए अलग रहने को कहा। प्रिया ने अपने बच्चों को उनके पास भेजना बंद कर दिया। शकुंतला जी ने समिति छोड़ दी।
सविता की दुनिया पूरी तरह नहीं टूटी, पर दरारें इतनी गहरी हो गईं कि सच दिखने लगा।
आरव धीरे-धीरे ठीक होने लगा। स्कूल की काउंसलर ने उसे समझाया कि शर्म हमेशा गलती की निशानी नहीं होती, कभी-कभी किसी और की क्रूरता का बोझ होती है। उसके दोस्त विवान ने उसे डायनासोर की ड्राइंग दी, जिस पर लिखा था—“संवेदनशील डायनासोर भी बचते हैं।” आरव ने वह ड्राइंग अपने स्टडी टेबल के ऊपर चिपका दी।
कई रातों को वह फिर पूछता, “मम्मा, मुझे सच में माफी नहीं माँगनी?”
नेहा हर बार कहती, “तुम्हें जिंदा होने के लिए कभी माफी नहीं माँगनी।”
उसके 9वें जन्मदिन पर आरव ने छोटी-सी पार्टी चाही। सिर्फ 5 दोस्त, पिज्जा, मिट्टी में छिपे नकली फॉसिल, और घर का चॉकलेट केक। मोमबत्तियाँ जलने से पहले उसने दरवाज़े की ओर देखा।
नेहा समझ गई।
“वो नहीं आएँगी।”
आरव ने पूछा, “पक्का?”
इस बार जवाब रोहन ने दिया।
“पक्का। इस घर में कोई तुम्हें चोट पहुँचाने नहीं आएगा।”
आरव ने 9 मोमबत्तियाँ बुझाईं। इस बार कोई ताना नहीं था। कोई शिक्षा नहीं। कोई दादी नहीं जो बच्चे की खुशी को अपनी सत्ता के नीचे कुचल दे। बस एक बच्चा था, जो डरते-डरते फिर से दुनिया पर भरोसा करना सीख रहा था।
नेहा कभी नहीं जान पाई कि सविता को सच में पछतावा हुआ या नहीं। शायद कुछ लोग अपने किए पर नहीं, अपने अधिकार खोने पर रोते हैं। शायद वे टूटे हुए बच्चों को नहीं देखते, सिर्फ वह दिन देखते हैं जब कोई उन्हें तोड़ने से रोक देता है।
लेकिन नेहा ने एक बात हमेशा के लिए सीख ली—परिवार हमेशा तब नहीं टूटता जब माँ “बस” कहती है। कई बार परिवार बहुत पहले टूट चुका होता है, और माँ की आवाज़ सिर्फ पहला सच होता है जो उस टूटन को नाम देता है।
8 साल तक वह सोचती रही कि बच्चे को बचाने का मतलब झगड़े से बचना है। फिर उसने सीखा कि कभी-कभी बच्चे को बचाने का मतलब है खुद को पागल, कठोर और बदतमीज़ कहलाने देना, ताकि एक छोटा बच्चा फिर कभी यह न माने कि उसे पैदा होने के लिए माफी माँगनी चाहिए।
और हर साल, जब आरव मोमबत्तियाँ बुझाता, नेहा आखिरी लौ तक उसे देखती रहती।
डर से नहीं।
याद रखने के लिए।
उस दिन को, जब उसके बेटे की रोशनी सबके सामने बुझने वाली थी।
और उस दिन को, जब उसने आखिरकार खुद को उसके और अंधेरे के बीच खड़ा कर दिया।
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