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स्कूल में गोलियों की आवाज गूंजते ही नर्स ने सुरक्षित कमरा छोड़ दिया, क्योंकि बाहर 7 साल की बच्ची खून से भीगी पड़ी थी; उसने बस कहा, “आज नहीं मरोगी,” और फिर दरवाजे के बाहर कदम रुक गए

भाग 1

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सुबह 9:18 बजे स्कूल की गलियारे में पहली तेज आवाज गूंजी, और 42 साल की स्कूल नर्स अनामिका त्रिपाठी ने उसी पल समझ लिया कि यह पटाखा नहीं था, यह वह डर था जिसके लिए कोई मां अपने बच्चे को स्कूल नहीं भेजती।

लखनऊ के गोमती नगर में बने शांतिवन पब्लिक स्कूल की सुबह हमेशा जैसी ही शुरू हुई थी। गेट पर ऑटो रुके थे, बच्चे पानी की बोतलें लटकाए अंदर भाग रहे थे, मांएं आखिरी बार टिफिन पकड़ा रही थीं, और गार्ड रामलाल हर बच्चे को नाम से पहचानकर मुस्कुरा रहा था। स्कूल बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन शहर में उसकी इज्जत थी। यहां पढ़ाई से ज्यादा बच्चों की सुरक्षा और अनुशासन की बात होती थी। माता-पिता गर्व से कहते थे कि शांतिवन में बच्चे घर जैसा महसूस करते हैं।

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अनामिका पिछले 11 साल से इसी स्कूल की नर्स थी। उसका छोटा सा मेडिकल रूम बच्चों के लिए दवा से ज्यादा भरोसे की जगह था। किसी को बुखार होता, कोई खेलते हुए गिरता, कोई सिर्फ इसलिए आता कि उसे मां की याद आ रही होती। अनामिका हर बच्चे को ऐसे संभालती जैसे वह उसका अपना हो।

उस सुबह भी उसने वही किया। दवाइयों की अलमारी जांची, इनहेलर अलग रखे, पट्टियां करीने से जमाईं, आपातकालीन नंबरों की सूची देखी। प्रिंसिपल अरविंद मेहरा दरवाजे पर आए और बोले, “आज तो सब शांत लग रहा है।”

अनामिका मुस्कुराई, “सर, स्कूल में ऐसा बोलना खतरा मोल लेना है।”

दोनों हल्का सा हंसे। उन्हें क्या पता था कि कुछ ही देर में वही स्कूल चीखों, बंद दरवाजों और टूटते भरोसे की आवाजों से भर जाएगा।

9:05 बजे कक्षा 2 की छोटी रिया पेट दर्द का बहाना बनाकर मेडिकल रूम आई थी। अनामिका जानती थी कि असली दर्द पेट में नहीं, मन में है। रिया की मां 3 दिन से अस्पताल में भर्ती थी। अनामिका ने उसे पानी दिया, माथा सहलाया और कहा, “डर लगे तो यहां आ जाना। दरवाजा हमेशा खुला है।”

9:15 बजे वह कक्षा 204 में एक बच्चे का इनहेलर देकर लौटी ही थी कि सामने वाले मुख्य गलियारे से तेज धमाका हुआ। पहले उसे लगा कोई लोहे का शटर गिरा होगा। फिर दूसरी आवाज आई। फिर तीसरी।

अनामिका का चेहरा सफेद पड़ गया।

उसने बिना एक सेकंड गंवाए मेडिकल रूम का दरवाजा खोला और बाहर झांका। गलियारे में 2 बच्चे जमे खड़े थे, जैसे उनके पैरों ने जमीन पकड़ ली हो। दूर से किसी अध्यापिका की चीख सुनाई दी। तभी स्कूल के स्पीकर से अरविंद मेहरा की कांपती, लेकिन नियंत्रित आवाज आई, “सभी कक्षाएं तुरंत बंद करें। यह अभ्यास नहीं है। कोई बाहर न निकले।”

दरवाजे धड़ाधड़ बंद होने लगे। बच्चों की रोने की आवाजें दीवारों के पीछे दब गईं। अनामिका ने उन 2 बच्चों को खींचकर मेडिकल रूम में लिया। एक आया भी अंदर भाग आई। उसने दरवाजा बंद किया, कुंडी लगाई, लोहे की मेज खिसकाकर दरवाजे के सामने अड़ा दी।

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कमरे में 5 लोग थे। बाहर पूरा स्कूल था।

सबसे छोटा बच्चा रोते हुए बोला, “मुझे मम्मी के पास जाना है।”

अनामिका घुटनों के बल बैठी, उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया और बोली, “अभी हम सब एक खेल खेलेंगे। जिसका नाम है बिल्कुल चुप रहकर बहादुर बनना। तुम मेरी मदद करोगे?”

बच्चे ने रोते हुए सिर हिलाया।

कुछ सेकंड बाद फिर आवाज आई। इस बार बहुत पास से।

अनामिका ने मेडिकल बैग खोला। पट्टियां, दस्ताने, खून रोकने वाली पट्टी, कैंची। उसने सब जमीन पर रख दिया। उसकी उंगलियां तेज थीं, लेकिन दिल भीतर से कांप रहा था।

तभी दरवाजे के बाहर से बहुत धीमी आवाज आई।

“मैम… बचाइए…”

आया ने उसका हाथ पकड़ लिया, “दरवाजा मत खोलिए। बाहर कौन है, पता नहीं।”

अनामिका पत्थर की तरह जम गई। आवाज फिर आई, इस बार और कमजोर।

“नर्स मैम… बहुत दर्द हो रहा है…”

अनामिका ने कमरे के छोटे कैमरा स्क्रीन की तरफ देखा। स्क्रीन धुंधली थी, पर जो दिखा उसने उसकी सांस रोक दी। रिया दीवार से टेक लगाकर पड़ी थी। उसकी सफेद यूनिफॉर्म की आस्तीन लाल हो चुकी थी।

दरवाजे से दूरी बस 12 कदम थी।

और उन्हीं 12 कदमों के बीच मौत घूम रही थी।

भाग 2

अनामिका ने एक गहरी सांस ली और बैग से सिर्फ जरूरी सामान निकाला। आया फुसफुसाई, “अगर आप गईं तो हम सब मर सकते हैं।”

अनामिका की आंखें स्क्रीन पर जमी थीं। रिया का सिर धीरे-धीरे झुक रहा था। वह वही बच्ची थी जिसने थोड़ी देर पहले मां के लिए रोते हुए पानी पिया था। अनामिका ने धीरे से कहा, “अगर वह तुम्हारी बेटी होती तो?”

कमरे में चुप्पी फैल गई।

उसने बच्चों की तरफ देखा, “कोई आवाज नहीं करेगा। चाहे कुछ भी सुनाई दे। मैं लौटूंगी।”

उसने मेज बस इतनी हटाई कि दरवाजा थोड़ा खुल सके। धातु की रगड़ उसे पहाड़ टूटने जैसी लगी। बाहर धुंधली रोशनी थी, फर्श पर कॉपियां बिखरी थीं, एक छोटी पानी की बोतल लुढ़क रही थी।

अनामिका झुककर भागी नहीं, रेंगते हुए आगे बढ़ी। 3 कदम, 5 कदम, 8 कदम। रिया ने उसे देखा तो आंखों में जान लौटी।

“मैम…”

“कुछ मत बोलो,” अनामिका ने उसका हाथ दबाया।

उसने आस्तीन काटी, घाव पर दबाव डाला, ऊपर पट्टी बांधी। रिया दर्द से कांप रही थी। “मैं मर जाऊंगी क्या?”

अनामिका ने उसकी आंखों में देखकर कहा, “नहीं। आज नहीं।”

उसी पल गलियारे के मोड़ से भारी कदमों की आवाज आई।

अनामिका ने सिर घुमाया। दूर एक आदमी अंधेरे कोने से बाहर आता दिखा। उसका चेहरा साफ नहीं दिख रहा था, लेकिन उसके हाथ में पकड़ी चीज देखकर अनामिका का खून जम गया।

समय खत्म हो चुका था।

उसने रिया को अपनी बांहों में उठाया और मेडिकल रूम की तरफ भागी। पीछे से कदम तेज हुए। कमरे के भीतर बच्चे सांस रोककर खड़े थे। आया ने जैसे ही 3 हल्की दस्तक सुनी, दरवाजा खोला।

अनामिका अंदर घुसी। दरवाजा बंद हुआ। मेज फिर अड़ गई।

बाहर कदम आकर रुक गए।

कुंडी के ठीक दूसरी तरफ।

भाग 3

मेडिकल रूम में किसी ने सांस तक नहीं ली। दरवाजे के बाहर खड़ा वह आदमी कुछ पल तक चुप रहा। उसकी परछाईं नीचे की दरार से दिखाई दे रही थी। सबसे छोटा बच्चा अपनी ही हथेलियों में मुंह दबाए कांप रहा था। रिया दर्द से कराहना चाहती थी, मगर अनामिका ने उसकी आंखों में देखकर सिर हिला दिया। बच्ची ने होंठ भींच लिए।

फिर बाहर से धीमे कदम आगे बढ़ गए।

उस क्षण कमरे में बैठे लोगों ने समझा कि कभी-कभी बचना भी आवाज किए बिना रोना होता है।

अनामिका ने तुरंत रिया को पलंग पर लिटाया। उसने घाव दोबारा देखा। खून कम हो रहा था, लेकिन बच्ची का चेहरा पीला पड़ता जा रहा था। अनामिका ने कंबल ओढ़ाया, उसकी नब्ज जांची और धीरे से बोली, “रिया, मेरी आवाज सुनो। तुम्हारी मां का नाम क्या है?”

“सु… सुनैना…”

“बहुत अच्छा। तुम उनसे मिलना चाहती हो न?”

रिया ने कमजोर सिर हिलाया।

“तो जागती रहो। मेरी तरफ देखो। तुम बहुत बहादुर हो।”

बाहर से पुलिस की गाड़ियों के सायरन सुनाई देने लगे। बच्चों की आंखों में पहली बार हल्की उम्मीद चमकी। पर अनामिका जानती थी कि खतरा अभी खत्म नहीं हुआ था। जब तक सही सूचना न मिले, दरवाजा खोलना गलती हो सकता था।

उधर स्कूल के दूसरे हिस्से में प्रिंसिपल अरविंद मेहरा सुरक्षा कमरे में कैमरों के सामने बैठे थे। उनके हाथ कांप रहे थे, लेकिन आवाज अब भी संयमित थी। उन्होंने हर कक्षा को संदेश भेज दिया था। बाहर न निकलना, रोशनी बंद रखना, बच्चों को नीचे बैठाना। उनके पास स्कूल के सभी बच्चों की सूची खुली थी। हर नाम उन्हें चाकू की तरह चुभ रहा था।

सुरक्षा गार्ड रामलाल मुख्य गेट पर घायल हो चुका था, पर उसने आखिरी ताकत से गेट बंद कर दिया था ताकि हमलावर बाहर से भागती भीड़ में घुस न सके। शहर की पुलिस रास्ते में थी। पास की पुलिस चौकी से इंस्पेक्टर विक्रम राणा सबसे पहले पहुंचे। वह स्कूल को जानते थे। उनकी अपनी बेटी भी कभी इसी स्कूल में पढ़ चुकी थी।

विक्रम ने वायरलेस पर कहा, “बच्चों को प्राथमिकता। कोई जल्दबाजी नहीं। हर कमरे तक सुरक्षित पहुंचना है।”

मेडिकल रूम के भीतर रेडियो अचानक चीखा, फिर आवाज आई, “पूर्वी गलियारा आंशिक रूप से सुरक्षित। मेडिकल सहायता तैयार रहे।”

आया ने राहत की सांस ली, पर अनामिका ने हाथ उठाकर उसे रोका। “अभी नहीं।”

तभी गलियारे में किसी ने आवाज लगाई, “पुलिस है। दरवाजा खोलिए।”

बच्चे उठने लगे। अनामिका ने उन्हें बैठा दिया। वह दरवाजे के पास गई, लेकिन कुंडी नहीं खोली। उसने ऊंची आवाज में पूछा, “आज का सुरक्षा संकेत क्या है?”

बाहर कुछ पल चुप्पी रही।

फिर जवाब आया, “नीम का पेड़।”

अनामिका की आंखों में पहली बार भरोसा आया। यह वही संकेत था जो सिर्फ स्कूल स्टाफ और स्थानीय पुलिस को दिया गया था। उसने मेज हटाई, कुंडी खोली। बाहर इंस्पेक्टर विक्रम राणा बुलेटप्रूफ जैकेट में खड़े थे। उनके पीछे 2 पुलिसकर्मी गलियारा देख रहे थे।

विक्रम ने कमरे में नजर डाली। “कितने बच्चे?”

“5 अंदर। 1 घायल। खून रुक रहा है, पर एंबुलेंस चाहिए।”

विक्रम ने तुरंत इशारा किया। “2 जवान यहीं रहेंगे। आपको हमारे साथ चलना होगा। लाइब्रेरी के पास लोग घायल हैं।”

आया घबरा गई, “नहीं, मैम नहीं जाएंगी। ये बच्चे इन्हीं के भरोसे हैं।”

अनामिका ने रिया का माथा छुआ। “तुम सुरक्षित हो। पुलिस अंकल यहीं रहेंगे।”

रिया ने उसका दुपट्टा पकड़ लिया। “आप वापस आएंगी?”

अनामिका झुककर बोली, “मैंने तुमसे पहले भी झूठ नहीं बोला। अब भी नहीं बोलूंगी।”

वह मेडिकल बैग उठाकर बाहर निकली। जैसे ही उसने गलियारा देखा, उसका दिल टूट गया। वही गलियारा जहां सुबह बच्चे टिफिन बदलते थे, अब टूटे कांच, गिरी कॉपियों और बिखरे जूतों से भरा था। दीवार पर बच्चों की रंगीन ड्रॉइंग लगी थी, जिनके नीचे डर की परछाई फैल चुकी थी।

विक्रम आगे चल रहे थे। अनामिका बीच में थी। 2 पुलिसकर्मी पीछे। वे लाइब्रेरी तक पहुंचे। वहां संस्कृत के शिक्षक श्रीनिवास जोशी जमीन पर बैठे थे, कंधे से खून बह रहा था। एक अध्यापिका अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर घाव दबाए हुए थी।

अनामिका घुटनों के बल बैठ गई। “आपने बहुत अच्छा किया। हाथ मत हटाइए।”

उसने साफ पट्टी लगाई, दबाव बनाया, नब्ज देखी। श्रीनिवास ने मुश्किल से पूछा, “बच्चे?”

“कक्षाओं में हैं। सुरक्षित निकाले जाएंगे।”

उन्होंने आंखें बंद कर लीं। शायद यही सुनना जरूरी था।

दूसरी तरफ सहायक प्रधानाचार्या कविता सिंह बेहोश सी बैठी थीं। माथे पर गहरी चोट थी। अनामिका ने उनकी पुतलियां देखीं, सांस जांची, कपड़ा बांधा। कविता ने होश में आते ही पूछा, “कक्षा 1?”

“दरवाजे बंद हैं। पुलिस पहुंच गई है।”

कविता की आंखों से आंसू बह निकले। “मैंने 2 बच्चों को धक्का देकर कमरे में भेजा… दरवाजा बंद हुआ या नहीं, पता नहीं…”

अनामिका ने उनका हाथ पकड़ा। “आपने जितना कर सकती थीं, उससे ज्यादा किया।”

बाहर मैदान में माता-पिता जमा होने लगे थे। किसी मां की चप्पल टूट गई थी, पर वह नंगे पैर बैरिकेड तक भागती आई। कोई पिता फोन पर बार-बार कह रहा था, “मेरा बेटा कक्षा 3 में है, कोई बता दो।” एक दादी हाथ जोड़कर पुलिस से विनती कर रही थी, “बस एक बार पोती को दिखा दो।”

लेकिन स्कूल से बच्चों को बिना गिनती, बिना पहचान और बिना सुरक्षा बाहर नहीं निकाला जा सकता था। हर नाम, हर कक्षा, हर शिक्षक की पुष्टि जरूरी थी।

अंदर, पुलिस ने धीरे-धीरे सुरक्षित हिस्सों से बच्चों को निकालना शुरू किया। कक्षा 3 के 28 बच्चे सबसे पहले लाइब्रेरी तक लाए गए। उनकी अध्यापिका का चेहरा पीला था, पर उसने बच्चों की गिनती 3 बार की। एक लड़का चुप था, बिल्कुल चुप। अनामिका उसके पास गई।

“नाम?”

लड़के ने कुछ नहीं कहा।

वह उसके पास बैठ गई। “मैं अनामिका हूं। तुम चाहो तो बोलना मत। बस सिर हिला सकते हो।”

कुछ पल बाद उसने बहुत धीरे से पूछा, “मेरी मम्मी बाहर हैं?”

“हां। बहुत सारी मम्मियां बाहर हैं। सब इंतजार कर रही हैं।”

लड़के की आंखें भर आईं। “मैं रोया नहीं।”

अनामिका ने कहा, “रोना कमजोरी नहीं होता। आज तुम जिंदा हो, यही तुम्हारी बहादुरी है।”

धीरे-धीरे और कक्षाएं आईं। कोई बच्चा अपनी पानी की बोतल पकड़े था, कोई स्कूल बैग छोड़ आया था, कोई अपनी छोटी बहन का हाथ नहीं छोड़ रहा था। कुछ बच्चों ने पुलिस देखकर राहत की सांस ली, कुछ और जोर से रोने लगे। हर बच्चा अलग तरह से डर रहा था।

इसी बीच वायरलेस पर आवाज आई, “खतरा समाप्त। सभी इकाइयां सावधानी से निकासी जारी रखें।”

कुछ क्षणों तक किसी ने कुछ नहीं कहा। फिर जैसे पूरे स्कूल ने एक साथ सांस छोड़ी। पर खुशी का शोर नहीं हुआ। डर बहुत गहरा था, राहत भी धीरे-धीरे आती है।

अनामिका मेडिकल रूम लौटी तो रिया को स्ट्रेचर पर बाहर ले जाने की तैयारी हो रही थी। उसकी मां सुनैना स्कूल गेट के बाहर बेहोशी जैसी हालत में खड़ी थी। जब एंबुलेंस तक रिया पहुंची, सुनैना बैरिकेड तोड़कर दौड़ना चाहती थी, पर पुलिस ने पहचान के बाद उसे आगे आने दिया।

“रिया!”

बच्ची ने कमजोर मुस्कान के साथ हाथ उठाया। “मम्मी… नर्स मैम आई थीं…”

सुनैना ने पहले बेटी को चूमा, फिर अनामिका के पैरों की तरफ झुकने लगी। अनामिका पीछे हट गई। “ऐसा मत कीजिए। बच्ची को अस्पताल ले जाइए।”

सुनैना रोते हुए बोली, “आप नहीं जातीं तो मेरी बेटी…”

वाक्य पूरा नहीं हुआ। कुछ बातों के लिए भाषा छोटी पड़ जाती है।

दोपहर 12:20 बजे प्रिंसिपल अरविंद मेहरा ने अंतिम सूची पर निशान लगाया। हर बच्चा, हर शिक्षक, हर कर्मचारी गिना जा चुका था। कुछ घायल थे, कुछ टूट चुके थे, लेकिन कोई बच्चा लापता नहीं था।

अरविंद ने कांपती आवाज में कहा, “सभी बच्चे मिल गए।”

इस बार भी ताली नहीं बजी। बस कुछ अध्यापक वहीं बैठकर रो पड़े।

उस रात पूरे लखनऊ में सिर्फ एक नाम था, अनामिका त्रिपाठी। खबरों में कहा गया कि स्कूल की नर्स ने बच्चों की जान बचाई। चैनलों ने उसे नायिका कहा। अखबारों ने उसकी तस्वीर छापी। लेकिन अनामिका अस्पतालों और घरों के बीच दौड़ रही थी। उसे कैमरे नहीं, बच्चों की हालत जाननी थी।

3 दिन बाद स्कूल बंद था। गलियारे खाली थे। ब्लैकबोर्ड पर अधूरा वाक्य लिखा था। “मेरा प्रिय त्योहार…” कक्षा 1 की मेज पर रंगीन पेंसिल खुली पड़ी थीं। मैदान में झूले स्थिर थे। स्कूल जैसे सांस रोककर बैठा था।

अनामिका घर लौटी तो पहली बार उसके हाथ कांपे। उसने नल चलाया, बहुत देर तक हाथ धोती रही। खून के निशान चले गए, लेकिन उसकी उंगलियों को लगता रहा जैसे अभी भी कोई बच्चा उन्हें पकड़े हुए है।

उसके पति निखिल ने पूछा, “तुम ठीक हो?”

वह हमेशा की तरह कहना चाहती थी, “हां।” लेकिन इस बार शब्द गले में अटक गए। वह फर्श पर बैठ गई और रो पड़ी। 11 साल में पहली बार निखिल ने उसे इतना टूटते देखा।

“मैं डर गई थी,” उसने फुसफुसाकर कहा। “बहुत डर गई थी।”

निखिल ने बस उसे पकड़े रखा। उस रात उसने कोई सलाह नहीं दी। कभी-कभी सहारा शब्दों से नहीं, चुप्पी से मिलता है।

अगले हफ्ते बच्चों के लिए परामर्श सत्र शुरू हुए। कई बच्चे स्कूल लौटने से डर रहे थे। किसी को घंटी की आवाज से घबराहट होती, कोई दरवाजे की दस्तक सुनते ही छिप जाता। रिया अस्पताल से लौट आई थी। उसका हाथ पट्टी में था, पर वह बार-बार कहती, “जब मैम आई थीं, तब मुझे लगा मैं बच जाऊंगी।”

अनामिका हर सत्र में गई। पहले उसने सोचा था कि वह सिर्फ बच्चों के लिए जाएगी। फिर एक मनोवैज्ञानिक ने उससे पूछा, “आप रात को सो पा रही हैं?”

अनामिका चुप रही।

“आवाज सुनकर चौंक जाती हैं?”

उसने सिर झुका लिया।

“बार-बार वही गलियारा याद आता है?”

उसकी आंखें भर आईं।

मनोवैज्ञानिक ने धीरे से कहा, “दूसरों को संभालने वाले लोगों को भी संभाले जाने का अधिकार है।”

उस दिन अनामिका ने पहली बार माना कि उसके भीतर भी घाव है, बस दिखाई नहीं देता।

1 महीने बाद स्कूल फिर खुला। गेट पर सुरक्षा ज्यादा थी, पुलिस की मौजूदगी थी, माता-पिता की आंखों में चिंता थी। फिर भी बच्चों को पढ़ना था, खेलना था, धीरे-धीरे सामान्य जीवन में लौटना था।

पहली सुबह अनामिका मेडिकल रूम का दरवाजा खोल रही थी कि उसने देखा, दरवाजे पर बड़ा सा चार्ट चिपका था। उस पर सैकड़ों छोटी पर्चियां थीं।

“मैम, आपने मेरा हाथ पकड़ा।”

“मैं चुप रहा, क्योंकि आपने कहा था।”

“मेरी मम्मी कहती हैं आप भगवान का भेजा फरिश्ता हैं।”

“मैं बड़ा होकर नर्स बनूंगा।”

एक कोने में रिया की लिखावट थी, टेढ़ी-मेढ़ी, लेकिन साफ।

“आप वापस आई थीं।”

अनामिका ने उस वाक्य को बहुत देर तक देखा। यही शायद उसकी पूरी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान बन गया था। न कोई मेडल, न कोई समाचार, न कोई भाषण। बस एक बच्ची का विश्वास कि कोई लौटकर आया था।

धीरे-धीरे स्कूल में फिर हंसी लौटने लगी। बच्चे फिर मैदान में दौड़ने लगे। घंटी फिर बजी। टिफिन फिर बदले गए। लेकिन मेडिकल रूम पहले से ज्यादा भरा रहने लगा। किसी को सचमुच बुखार होता, किसी को सिर्फ डर। कोई कहता पेट दुख रहा है, कोई कहता घर फोन करना है। अनामिका समझती थी कि शरीर कई बार मन की भाषा बोलता है।

वह किसी बच्चे को जल्दी नहीं भगाती। पानी देती, बैठाती, नाम से बुलाती, पूछती, “आज दिल कैसा है?”

बहुत से बच्चे जवाब नहीं दे पाते। वह फिर भी इंतजार करती।

कई महीने बाद राज्य सरकार ने स्कूल के कर्मचारियों, पुलिस, डॉक्टरों और नर्सों को सम्मानित करने का कार्यक्रम रखा। अनामिका जाना नहीं चाहती थी। उसने अरविंद मेहरा से कहा, “मैंने सिर्फ अपना काम किया।”

अरविंद ने शांत स्वर में कहा, “हो सकता है। लेकिन बच्चों को यह देखना चाहिए कि डर के दिन में दया भी जीत सकती है।”

कार्यक्रम के दिन मंच पर अनामिका को बुलाया गया। भीड़ में बैठे माता-पिता खड़े हो गए। रिया अपनी मां के साथ पहली पंक्ति में थी। उसका हाथ ठीक हो चुका था, लेकिन उस दिन उसने वही छोटा लाल रिबन पहना था जो अस्पताल में भी उसके बालों में था।

सम्मान पत्र लेते समय अनामिका ने भाषण देने से मना कर दिया। फिर उसने बच्चों की तरफ देखा और माइक के पास आई।

“मैं हीरो नहीं हूं,” उसने कहा। “उस दिन हर शिक्षक जिसने दरवाजा बंद किया, हर बच्चा जिसने रोते हुए भी चुप रहना सीखा, हर पुलिसकर्मी जो अंदर गया, हर मां-बाप जो बाहर इंतजार करते रहे, सब बहादुर थे। डरना गलत नहीं है। डर के बावजूद किसी का हाथ न छोड़ना, यही हिम्मत है।”

हॉल में सन्नाटा था। फिर धीरे-धीरे तालियां शुरू हुईं। इस बार तालियों में शोर नहीं, कृतज्ञता थी।

सालों बाद भी शांतिवन पब्लिक स्कूल के बच्चे उस दिन को अलग-अलग तरह से याद करते रहे। किसी को टूटे कांच याद रहे, किसी को सायरन, किसी को अंधेरा कमरा। लेकिन ज्यादातर बच्चों को एक आवाज याद रही।

“मेरे पास रहो। मैं हूं।”

रिया बड़ी होकर डॉक्टर बनी। उसने अपने क्लिनिक की दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लगाई, जिसमें स्कूल की नर्स एक घायल बच्ची का हाथ पकड़े बैठी थी। नीचे उसने सिर्फ 1 पंक्ति लिखी।

“कभी-कभी जिंदगी बचाने वाली दवा नहीं, लौटकर आने वाला इंसान होता है।”

और शांतिवन के उस छोटे मेडिकल रूम में आज भी दरवाजा खुलते ही अनामिका की वही आवाज सुनाई देती थी, धीमी, स्थिर और भरोसे से भरी।

“आओ बेटा, डर को पहले पानी पिलाते हैं, फिर इलाज करते हैं।”

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.