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सीमा से लौटे फौजी बेटे ने माँ को अंधेरे कमरे में बाहर से लगी कुंडी के पीछे पाया, पत्नी पड़ोसियों से कह रही थी, “इनका दिमाग चला गया है,” वह चिल्लाया नहीं, बस 18,50,000 रुपये की बैंक फाइल और मेडिकल रिपोर्ट उठाई… फिर रक्त समूह की 1 गलती ने सब पलट दिया

PART 1

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घर लौटते ही मेजर आरव सिंह ने अपनी माँ को अपने ही कमरे में बाहर से लगी कुंडी के पीछे कैद पाया, और उसी पल बरामदे में उसकी पत्नी पड़ोसियों से कह रही थी, “बेचारी अब अपनी समझ खो चुकी हैं, मैं ही सब संभाल रही हूँ।”

आरव 8 महीने बाद सिक्किम सीमा की तैनाती से लखनऊ के पुराने पुश्तैनी घर लौटा था। टैक्सी गेट से निकली ही थी कि उसने नंदिनी की आवाज़ सुनी। वह सफेद चिकनकारी कुर्ते में खड़ी थी, आँखों में बनावटी थकान, आवाज़ में मीठा ज़हर। सामने शर्मा आंटी, मिश्रा जी और गली की 2 और औरतें खड़ी थीं।

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“कभी रात को चिल्लाने लगती हैं, कभी खुद को नोच लेती हैं,” नंदिनी बोली, “डॉक्टर ने कहा है, शायद डिमेंशिया या कोई मानसिक बीमारी है। आरव को मैं क्या बताती? वह सीमा पर था।”

शर्मा आंटी ने दुखी होकर सिर हिलाया।

“बहू, तुमने तो धर्म निभा दिया। आजकल कौन सास को ऐसे रखता है?”

नंदिनी ने आँखें झुका लीं। तभी उसकी नज़र आरव पर पड़ी। वह तुरंत उसके पास आई और उसके सीने से लग गई।

“आरव… तुम आ गए। मैं अकेली टूट गई थी।”

आरव ने धीरे से कहा, “माँ कहाँ हैं?”

नंदिनी के चेहरे पर 1 सेकंड के लिए अजीब-सी सख्ती आई, फिर वह बोली, “सो रही हैं। डॉक्टर ने कहा है, उन्हें कम उत्तेजित करना चाहिए।”

घर के अंदर कदम रखते ही आरव रुक गया। दीवारों पर उसकी माँ सावित्री देवी की तस्वीरें गायब थीं। रसोई की खिड़की के पास रखी पीतल की पुरानी डिबिया नहीं थी, जिसमें माँ पूजा के फूल रखती थीं। उनका चश्मा, उनकी रामचरितमानस, उनकी नीली चाय की प्याली—सब जैसे घर से मिटा दिए गए थे।

फिर आरव की नज़र गलियारे के आखिरी कमरे पर गई।

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दरवाज़े के बाहर नई लोहे की कुंडी लगी थी।

उसकी छाती में कुछ ठंडा और धारदार उतर गया।

“कुंडी क्यों लगी है?” उसने पूछा।

नंदिनी ने तुरंत कहा, “वह भागने की कोशिश करती हैं। 3 बजे रात को सड़क पर निकल गई थीं। पड़ोसी गवाह हैं।”

“दरवाज़ा खोलो।”

“आरव, प्लीज़, अभी मत…”

“दरवाज़ा खोलो।”

नंदिनी ने काँपते हाथ से चाबी निकाली। कुंडी खुली। कमरे के भीतर बदबू, बंद हवा और अंधेरा जमा था। परदे खींचे हुए थे। फर्श पर एक पतला गद्दा पड़ा था। सावित्री देवी कोने में बैठी थीं, सूती साड़ी अस्त-व्यस्त, बाल बिखरे हुए। उनके बाएँ हाथ की कलाई पर नीले-काले निशान थे। गर्दन के पास उँगलियों के दबाव जैसा गहरा दाग था।

उन्होंने बेटे को देखा।

उनकी आँखें पागल नहीं थीं।

वे साफ थीं। डरी हुई थीं। जिंदा थीं।

“आरव…” उनकी आवाज़ टूट गई।

नंदिनी तुरंत बीच में आ गई। “देखा? अब रोना शुरू होगा। ये सब नाटक है।”

आरव घुटनों के बल बैठा। उसने माँ की ओर देखा और बहुत शांत स्वर में पूछा, “माँ, बाबूजी हर दशहरा मेले से आपके लिए क्या लाते थे?”

सावित्री देवी के होंठ काँपे।

“गुलाबी रेवड़ी… और अपने लिए मिट्टी की सीटी। कहते थे, फौजी बूढ़ा हो जाए, बच्चा नहीं मरना चाहिए।”

कमरे में सन्नाटा जम गया।

नंदिनी का चेहरा सफेद पड़ गया।

आरव ने माँ का हाथ पकड़ा। वह बर्फ जैसा ठंडा था।

“अब मैं आ गया हूँ,” उसने कहा।

सावित्री देवी ने फुसफुसाकर कहा, “उसने कहा था, तू मुझे पागल समझेगा।”

नंदिनी झल्ला उठी। “बस! फिर वही आरोप!”

आरव ने धीरे से दरवाज़ा बंद किया, मगर कुंडी नहीं लगाई। चाबी उसने अपनी मुट्ठी में रख ली।

रात को नंदिनी ने खाना परोसा, जैसे सब सामान्य हो। उसने बताया कि कल सुबह डॉ. विनीत कपूर से अपॉइंटमेंट है, बड़े नामी मनोचिकित्सक हैं, वे सावित्री देवी को “सुरक्षित केंद्र” भेजने की सलाह दे सकते हैं।

“स्थायी रूप से?” आरव ने पूछा।

“अगर ज़रूरी हुआ तो,” नंदिनी बोली, “तुम्हारी माँ हमारे लिए खतरा बन गई हैं।”

आरव ने थके हुए पति का अभिनय किया। सिर झुकाया। बोला, “तुमने बहुत सहा।”

नंदिनी के चेहरे पर जीत की हल्की मुस्कान आई।

पर जब वह कागज़ों की फाइल लेकर आई, आरव की नज़र एक मेडिकल रिपोर्ट पर अटक गई। उसमें सावित्री देवी का रक्त समूह लिखा था—एबी नेगेटिव।

आरव की साँस रुक गई।

क्योंकि 6 साल पहले घुटने की सर्जरी के समय उसने खुद माँ के कागज़ों पर हस्ताक्षर किए थे।

सावित्री देवी का रक्त समूह ओ पॉजिटिव था।

PART 2

रात 1 बजकर 20 मिनट पर नंदिनी सो चुकी थी, लेकिन आरव नहीं। उसने बाथरूम में बंद होकर पूरी फाइल की तस्वीरें खींचीं। बैंक से निकाले गए 18,50,000 रुपये, माँ के नाम की सावधि जमा तुड़वाने का आवेदन, सोने के 7 पुराने गहनों की रसीद, और एक झूठी रिपोर्ट—सब कुछ सावधानी से जोड़ा गया था।

एक बिल पर घरेलू देखभाल सेवा का नाम था, पर उसका पंजीकरण नंबर नकली था। एक पड़ोसी के बयान पर उस महिला के हस्ताक्षर थे जो 4 साल पहले कानपुर चली गई थी।

फिर वही रक्त समूह।

यही गलती पूरी साजिश की गर्दन थी।

आरव ने अपने पुराने कोर्समेट डीसीपी कबीर अंसारी को संदेश भेजा। कुछ ही देर में जवाब आया, “सुबह क्लिनिक जाओ। उसे शक मत होने देना। महिला प्रकोष्ठ और मजिस्ट्रेट को सूचना दे दी है।”

भोर से पहले आरव माँ के कमरे में गया।

सावित्री देवी जाग रही थीं।

“सब बताइए,” आरव ने कहा।

उन्होंने काँपती उँगली से सिलाई की पुरानी डिबिया की ओर इशारा किया। अंदर धागों के नीचे छोटा-सा रिकॉर्डर छिपा था।

“तेरे बाबूजी कहते थे,” माँ बोलीं, “जिस घर में भरोसा टूटे, वहाँ आवाज़ बचाकर रखनी चाहिए।”

रिकॉर्डर में नंदिनी की 21 दिनों की आवाज़ कैद थी।

“कागज़ पर अंगूठा लगा दो, नहीं तो खाना नहीं मिलेगा…”

“तेरा बेटा मुझे चुनेगा, बूढ़ी औरत को नहीं…”

“डॉक्टर साइन कर देगा, फिर तू कहीं नहीं बचेगी…”

सुबह नंदिनी ने क्रीम रंग की साड़ी पहनी, लाल बिंदी लगाई और मुस्कुराकर बोली, “आज सब ठीक हो जाएगा।”

आरव ने माँ का हाथ पकड़ा।

“हाँ,” उसने कहा, “आज सब ठीक हो जाएगा।”

PART 3

डॉ. विनीत कपूर का क्लिनिक हजरतगंज की एक महंगी इमारत की 3 मंज़िल पर था। बाहर चमकता बोर्ड लगा था, अंदर सुगंधित अगरबत्ती और कीटाणुनाशक की मिली-जुली गंध थी। दीवार पर डिग्रियाँ टंगी थीं, जिनके फ्रेम इतने महंगे लगते थे कि जैसे बीमारी से पहले भरोसा खरीदा जा रहा हो।

नंदिनी सावित्री देवी का हाथ पकड़े हुए थी। पकड़ इतनी कसकर थी कि बूढ़ी कलाई पर उँगलियों की नई लकीरें उभर आईं, मगर बाहर से वह देखभाल जैसी लगती थी।

“मम्मी जी, शांत रहिएगा,” नंदिनी ने कान के पास फुसफुसाया, “ज़्यादा बोलेंगी तो आपके लिए ही बुरा होगा।”

आरव ने सुन लिया। वह चुप रहा।

कभी-कभी न्याय को जल्दी लाने के लिए गुस्से को थोड़ी देर और जिंदा निगलना पड़ता है।

डॉक्टर ने उन्हें 11 मिनट बाद अंदर बुलाया। वह पतला, चमकदार घड़ी पहने, तेज़ बोलने वाला आदमी था। उसने सावित्री देवी से यह तक नहीं पूछा कि उन्हें पानी चाहिए या नहीं। सीधे आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

“फाइल लाई है?”

नंदिनी ने तुरंत मुस्कुराकर कहा, “जी डॉक्टर साहब, मैंने सब तैयार कर दिया है। इनकी हालत पिछले 2 महीनों में बहुत खराब हो गई है। कभी खुद को चोट पहुँचाती हैं, कभी मुझे मारने दौड़ती हैं।”

सावित्री देवी ने सिर झुका लिया।

आरव ने फाइल डॉक्टर को दे दी।

लेकिन वह नंदिनी वाली फाइल नहीं थी।

रात में डीसीपी कबीर के आदमी ने वैसी ही नीली फाइल घर के बाहर कार में रख दी थी। उसमें नकली कागज़ नहीं, असली सबूत थे—माँ के चोटों की तस्वीरें, बैंक लेन-देन, रक्त समूह का फर्क, नकली सेवा बिल, रिकॉर्डर की प्रतिलिपि, और वरिष्ठ नागरिक उत्पीड़न की तत्काल शिकायत।

डॉक्टर ने पहला पन्ना खोला। फिर दूसरा। उसके चेहरे की कठोरता ढीली पड़ने लगी। तीसरे पन्ने पर आते-आते उसकी भौंहें सिकुड़ गईं। जब उसने रक्त समूह वाली गलती देखी, उसका गला सूख गया।

“ये… ये क्या है?” उसने कहा।

नंदिनी ने हड़बड़ाकर फाइल की तरफ देखा। “डॉक्टर साहब, आप पहले मरीज की स्थिति देखिए। ये बहुत चालाक हैं। ये सब बनावटी…”

“मैं आपसे नहीं पूछ रहा,” डॉक्टर ने पहली बार उसे रोका।

आरव ने अपना फोन मेज पर रखा और रिकॉर्डिंग चला दी।

नंदिनी की आवाज़ कमरे में फैल गई।

“एक बार डॉक्टर ने लिख दिया कि तू दिमाग से ठीक नहीं है, फिर तेरी कोई नहीं सुनेगा। घर भी हमारा, पैसा भी हमारा, और आरव भी मेरा…”

नंदिनी की आँखें फैल गईं। वह फोन छीनने के लिए उठी, पर दरवाज़ा खुल गया।

अंदर डीसीपी कबीर अंसारी, 2 महिला पुलिसकर्मी, एक मजिस्ट्रेट प्रतिनिधि और वरिष्ठ नागरिक कल्याण अधिकारी आए। पीछे बैंक की धोखाधड़ी शाखा का अधिकारी भी था।

नंदिनी पीछे हट गई।

“ये पारिवारिक मामला है,” वह चीखी, “आप लोग बीच में नहीं आ सकते!”

कबीर ने शांत स्वर में कहा, “गलत। यह अवैध कैद, मारपीट, धोखाधड़ी, जालसाजी और वरिष्ठ नागरिक के उत्पीड़न का मामला है।”

डॉक्टर कपूर के माथे पर पसीना आ गया। “मैंने कुछ साइन नहीं किया था। मुझे केवल बहू ने जानकारी दी थी। मैं आज मूल्यांकन करने वाला था।”

मजिस्ट्रेट प्रतिनिधि ने ठंडे स्वर में कहा, “लेकिन आपने प्रारंभिक मानसिक अस्थिरता प्रमाणपत्र जारी करने के लिए 75,000 रुपये लिए। बैंक भुगतान का रिकॉर्ड हमारे पास है।”

नंदिनी ने तुरंत दिशा बदली। वह रोने लगी।

“मैं अकेली थी! 8 महीने तक इनके साथ कौन रहा? ये मुझे हर बात पर ताने देती थीं। कहती थीं, मैं इस घर के लायक नहीं। आरव ने मुझे छोड़ दिया था। मैंने जो किया, मजबूरी में किया।”

आरव ने पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा।

“मजबूरी में तूने माँ का फोन छीना?”

नंदिनी चुप।

“मजबूरी में तूने उनका अंगूठा बैंक ऐप पर दबाया?”

कमरे में सन्नाटा।

“मजबूरी में तूने उन्हें खाना रोककर धमकाया?”

सावित्री देवी ने धीरे से अपना बैग खोला। उसमें वही पुरानी सिलाई की डिबिया थी। उन्होंने रिकॉर्डर निकाला और मेज पर रख दिया।

“बेटा,” उन्होंने कहा, “बाकी भी सुनवा दे।”

रिकॉर्डर फिर चला।

नंदिनी की आवाज़ इस बार और साफ थी।

“तूने अगर आरव को बताया, तो मैं कहूँगी तू मुझे मारती है। तू बूढ़ी है, तेरी बात कौन मानेगा? मैं पढ़ी-लिखी हूँ, सुंदर हूँ, उसकी पत्नी हूँ। तू बस उसके बाप की बची हुई जिम्मेदारी है।”

सावित्री देवी का चेहरा काँप रहा था, पर उनकी आँखें अब झुकी हुई नहीं थीं।

रिकॉर्डिंग में दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। फिर सावित्री देवी की आवाज़, दर्द से भरी।

“नंदिनी, मत दबा मेरा हाथ… दर्द हो रहा है…”

फिर नंदिनी की फुफकार।

“अंगूठा लगा, वरना आज पानी भी नहीं मिलेगा।”

महिला पुलिसकर्मी के चेहरे पर गुस्सा साफ था। बैंक अधिकारी ने फाइल बंद कर दी। डॉक्टर कपूर कुर्सी पर बैठ गया, जैसे उसकी टाँगों से ताकत निकल गई हो।

नंदिनी अचानक चीखी, “हाँ, किया मैंने! तो क्या? मैं कोई नौकरानी नहीं थी कि इस बूढ़ी औरत की सेवा करती रहती। इस घर में मेरा भी हक था। आरव ने शादी के बाद भी माँ-माँ किया। हर चीज़ इनके नाम, हर फैसला इनके नाम! मैंने 5 साल दिए इस घर को। मुझे क्या मिला?”

आरव की आवाज़ बहुत धीमी थी, मगर कमरे में हर किसी ने सुनी।

“तुझे घर मिला था। परिवार मिला था। भरोसा मिला था। तूने उन्हें जेल बना दिया।”

नंदिनी हँसी, पर वह हँसी टूट चुकी थी।

“तुम मुझे छोड़ दोगे?”

“मैंने तुझे उसी दिन खो दिया था,” आरव बोला, “जिस दिन तूने मेरी माँ को अंधेरे कमरे में बंद किया।”

कबीर ने इशारा किया। महिला पुलिसकर्मी आगे बढ़ीं।

“नंदिनी सिंह, आपको मारपीट, अवैध बंधन, धोखाधड़ी, जालसाजी, संपत्ति हड़पने की कोशिश और वरिष्ठ नागरिक उत्पीड़न के आरोप में हिरासत में लिया जाता है।”

जब हथकड़ी उसके हाथों में लगी, नंदिनी ने आखिरी बार आरव को देखा। वह शायद उम्मीद कर रही थी कि पति का दिल पिघल जाएगा, जैसे समाज अक्सर बहू के आँसू देखकर सच भूल जाता है।

“आरव,” उसने धीमे से कहा, “सब लोग मुझे गलत समझ रहे हैं।”

सावित्री देवी ने पहली बार बीच में कहा, “नहीं बहू। पहली बार सब लोग तुझे सही समझ रहे हैं।”

डॉक्टर कपूर को उसी दिन पूछताछ के लिए रोका गया। बाद में उसकी चिकित्सा परिषद में शिकायत हुई। उसका क्लिनिक कुछ हफ्तों तक खुला रहा, पर मरीजों की कुर्सियाँ खाली होती गईं। शहर में खबर फैल चुकी थी कि उसने बिना जाँच एक बूढ़ी माँ की जिंदगी को कागज़ के पन्ने पर पागल घोषित करने की तैयारी कर ली थी।

घर लौटते समय सावित्री देवी कार की पिछली सीट पर बैठी थीं। आरव उनके पास ही था। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। लखनऊ की सड़कें वैसी ही थीं—चाट की दुकानें, मंदिर के बाहर फूल, ट्रैफिक में अटकी स्कूटी, स्कूल से लौटते बच्चे। दुनिया चल रही थी। बस उनकी दुनिया 2 महीनों तक एक बंद कमरे में अटक गई थी।

घर पहुँचे तो गली के लोग दरवाज़ों के पीछे से झाँक रहे थे। शर्मा आंटी सबसे पहले आईं। उनके हाथ में दूध का भगोना था, शायद शर्म छिपाने का बहाना।

“बहनजी,” उन्होंने धीरे से कहा, “हमें पता नहीं था…”

सावित्री देवी ने उन्हें बहुत देर तक देखा। फिर बोलीं, “कभी-कभी पड़ोसी आवाज़ सुनकर भी कहानी उसी की मान लेते हैं जो साफ कपड़े पहनकर बोलता है।”

शर्मा आंटी की आँखें भर आईं।

“माफ कर दीजिए।”

सावित्री देवी ने दरवाज़ा थोड़ा और खोला।

“चाय पीकर जाइए।”

आरव ने माँ की तरफ देखा। उसे लगा, इतनी बड़ी चोट के बाद भी उसकी माँ दूसरों को छोटा करके नहीं, खुद को बड़ा करके खड़ी हो रही है।

अगले कुछ महीने आसान नहीं थे। नंदिनी ने पहले आरोपों से इनकार किया, फिर जब बैंक रिकॉर्ड, रिकॉर्डिंग, नकली रिपोर्ट और डॉक्टर के बयान सामने आए, तो उसका बचना मुश्किल हो गया। अदालत ने उसे न्यायिक हिरासत में भेजा। बाद में वह कई धाराओं में दोषी मानी गई। उसे 6 साल की सजा हुई, आरव और सावित्री देवी से संपर्क पर रोक लगी, और बैंक से निकाली गई रकम व गहनों की कीमत लौटाने का आदेश दिया गया। गहनों में से माँ की शादी की 2 चूड़ियाँ कभी नहीं मिलीं। सावित्री देवी ने कहा, “सोना गया तो गया। आवाज़ लौट आई, वही काफी है।”

आरव ने तलाक की अर्जी दी। नंदिनी ने पहले गुज़ारा भत्ता और घर में हिस्सेदारी माँगी, लेकिन विवाह से पहले बने संपत्ति दस्तावेज़ और उसके धोखाधड़ी वाले लेन-देन ने अदालत में उसकी चालें कमजोर कर दीं। पुश्तैनी घर सावित्री देवी के नाम सुरक्षित रहा।

मगर कानून की जीत के बाद भी घर की दीवारों से डर तुरंत नहीं गया।

सावित्री देवी रात में हल्की आवाज़ पर जाग जातीं। कई बार रसोई तक जाकर चावल की डिब्बी में फोन छिपा देतीं, फिर सुबह भूल जातीं कि क्यों। उनके कमरे में पानी की 2 बोतलें रहतीं। तकिए के नीचे बिस्कुट का पैकेट रहता। आरव ने कभी नहीं पूछा, “माँ, इसकी क्या जरूरत है?” वह जानता था, भूख से ज्यादा भयानक वह याद होती है जब किसी ने खाने को हथियार बना दिया हो।

उसने घर की हर अंदरूनी कुंडी निकाल दी। सिर्फ मुख्य दरवाज़े पर ताला रहा। गलियारे में नई रोशनी लगवाई। माँ की तस्वीरें फिर दीवारों पर आईं। बाबूजी की पुरानी फौजी टोपी अलमारी से निकालकर बैठक में रखी गई। नीली चाय की प्याली गैराज के एक डिब्बे में मिली, टूटी नहीं थी, बस धूल में दब गई थी।

जिस दिन प्याली वापस रसोई की शेल्फ पर रखी गई, सावित्री देवी बहुत देर तक उसे देखती रहीं। फिर उन्होंने उसमें चाय पी। पहला घूँट लेते ही उनकी आँखें भर आईं।

“ऐसा लग रहा है,” उन्होंने कहा, “जैसे घर ने मुझे पहचान लिया।”

आरव ने जवाब नहीं दिया। वह बरामदे की तरफ देखने लगा, क्योंकि सैनिकों को भी कभी-कभी रोने के लिए चेहरा मोड़ना पड़ता है।

6 महीने बाद घर सचमुच बदल गया था। परदे दिन भर खुले रहते। आँगन में तुलसी के पास गेंदे के फूल लगे। सावित्री देवी ने पुराने रेडियो पर सुबह भजन सुनना शुरू किया। रविवार को वह गली के बच्चों को परांठे खिलातीं। कभी-कभी कोई महिला चुपचाप उनके पास आकर बैठती और पूछती, “अगर घर में कोई बूढ़े को तंग करे तो क्या करना चाहिए?” सावित्री देवी उन्हें फोन नंबर लिखकर देतीं—पुलिस हेल्पलाइन, वरिष्ठ नागरिक प्रकोष्ठ, महिला आयोग, बैंक शाखा प्रबंधक। वह कहतीं, “डर को ताला मत बनने देना। आवाज़ को सबूत बना देना।”

आरव ने भी वर्दी का मतलब नया सीखा। पहले उसे लगता था कि सीमा पर बंदूक लेकर खड़ा होना ही रक्षा है। अब वह समझता था कि कभी-कभी रक्षा का मतलब माँ के साथ बैंक जाना है, डॉक्टर के सामने सवाल पूछना है, और घर के भीतर होने वाले अन्याय को “घर की बात” कहकर दबने नहीं देना है।

एक शाम बारिश के बाद मिट्टी की खुशबू आ रही थी। सावित्री देवी बरामदे में बैठी थीं। सामने नीली प्याली, बगल में बाबूजी की पुरानी मिट्टी की सीटी। आरव उनके पास आकर बैठ गया।

काफी देर तक दोनों चुप रहे।

फिर माँ ने पूछा, “तू मुझसे नाराज़ तो नहीं?”

आरव चौंका। “किस बात पर?”

“कि मैं चिल्लाई नहीं। भागी नहीं। मैंने जल्दी हार मान ली।”

आरव ने उनकी ओर देखा। उनकी कलाई पर अब निशान नहीं थे, पर वह जानता था, कुछ निशान त्वचा से उतरकर आत्मा में चले जाते हैं।

“माँ,” उसने धीमे से कहा, “जो अकेला बंद कमरे में डर से लड़ता है, वह हारता नहीं। वह बस बचने का रास्ता ढूँढता है।”

सावित्री देवी की आँखें भर आईं।

“मुझे लगा था तू देर से आएगा।”

“मैं देर से आया,” आरव बोला।

उन्होंने सिर हिलाया।

“नहीं। तू उस दिन आया, जब सच अभी जिंदा था।”

बरामदे की लाइट जल उठी। घर के भीतर कोई दरवाज़ा बंद नहीं था। गलियारे में अंधेरा नहीं था। दीवार पर लगी तस्वीरों में बाबूजी मुस्कुरा रहे थे, जैसे मिट्टी की सीटी फिर बजने वाली हो।

गली से शर्मा आंटी की आवाज़ आई, “सावित्री बहन, कल कीर्तन में चलेंगी?”

सावित्री देवी ने प्याली उठाई और पहली बार बिना डर के ऊँची आवाज़ में जवाब दिया, “चलूँगी। अब घर में बंद रहने का समय खत्म हो गया।”

आरव ने माँ को देखा। वह बूढ़ी थीं, चोट खाई हुई थीं, मगर टूटी नहीं थीं।

उसने समझा, ताकत हमेशा युद्ध जीतने में नहीं होती। कभी-कभी ताकत यह होती है कि आदमी घर लौटे, झूठ को मुस्कुराकर सुन ले, गुस्से को जेब में रख ले, और फिर सच को इतनी साफ जगह रख दे कि न्याय की आँखें चाहकर भी उससे मुड़ न सकें।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.