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सड़क किनारे मरती पड़ी अरबपति की बेटी को गरीब मैकेनिक ने अपने आखिरी 47 रुपये देकर बचाया, लेकिन जब पिता ने 2 करोड़ का चेक बढ़ाया तो उसने कहा—“इंसानियत बिकती नहीं”… फिर असली गद्दार सामने आया

भाग 1

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दिल्ली–जयपुर राजमार्ग के सुनसान किनारे पर पड़े खून से सने शरीर को देखकर भी अर्जुन मेहरा लगभग आगे निकल गया था, लेकिन गाड़ी के पीछे लगे शीशे में दिखी एक काँपती हुई हथेली ने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी।

अर्जुन मेहरा गुरुग्राम के बाहरी इलाके में एक छोटे से गैराज का मालिक था। बोर्ड पर अब भी लिखा था—“मेहरा मोटर्स एंड संस”, जबकि उसके पास कोई बेटा नहीं था। बस 7 साल की बेटी सिया थी, और पत्नी राधिका की तस्वीर, जो 4 साल पहले एक हादसे में उसे अकेला छोड़ गई थी। कभी अर्जुन सरकारी अस्पताल में आपातकालीन सहायक था, लेकिन एक गरीब मरीज की जान बचाने के लिए नियम तोड़ने पर उसका लाइसेंस रद्द कर दिया गया था। उसने किसी की जान बचाई थी, मगर सजा में अपनी पहचान खो दी थी।

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उस शाम उसकी जेब में सिर्फ 47 रुपये बचे थे। सिया के स्कूल से संदेश आया था—दोपहर के भोजन का बकाया 1380 रुपये। अर्जुन ने मोबाइल देखा, फिर बंद कर दिया। झूठ लिखने की हिम्मत नहीं हुई कि कल पैसे भर देगा।

तभी एक अनजान नंबर से कॉल आया। एक घबराई हुई पुरुष आवाज बोली—“मेरी कार पुरानी खदान वाली सड़क पर बंद हो गई है, जल्दी आ जाइए।” अर्जुन ने मोलभाव नहीं किया। 500 रुपये भी मिल जाते तो सिया के लिए राशन आ जाता।

वह अपनी पुरानी पिकअप लेकर निकल पड़ा। सड़क धीरे-धीरे खाली होती गई। खेत, सूखी झाड़ियाँ, टूटी दीवारें और दूर फैली धूल। जिस जगह आदमी ने कार खराब होने की बात कही थी, वहाँ कोई कार नहीं थी। कोई आदमी नहीं। बस उसका अपना डर था।

अर्जुन को लगा उसे फँसाया गया है। वह गाड़ी मोड़कर लौटने ही वाला था कि पीछे वाले शीशे में उसे सड़क किनारे मिट्टी में कुछ हल्का गुलाबी रंग दिखा। उसने गाड़ी रोकी। दौड़कर गया।

वह एक लड़की थी। उम्र करीब 25। महँगे कपड़े फटे हुए, माथे पर गहरी चोट, साँस टूटती हुई। उसके पास कोई पहचान पत्र नहीं था। बस एक टूटा हुआ मोबाइल, जिस पर 17 मिस्ड कॉल चमक रहे थे—“वी. रायज़ादा।”

अर्जुन का पुराना प्रशिक्षण जाग उठा। उसने घाव दबाया, नब्ज देखी, उसे सावधानी से उठाया और गाड़ी में लिटा दिया। वह जानता था, अगर उसने पुलिस या एंबुलेंस का इंतजार किया, तो शायद वह लड़की बच नहीं पाएगी।

वह उसे शहर के एक छोटे से दयालु अस्पताल में ले गया, जहाँ गरीबों से पहले पैसे नहीं पूछे जाते थे। डॉक्टरों ने उसे अंदर ले लिया। कागजों पर हस्ताक्षर करते समय रिसेप्शन वाली ने पूछा—“आप इनके कौन लगते हैं?”

अर्जुन ने थकी आँखों से कहा—“अभी तो बस इतना समझिए, रास्ते में मरने से बचाने वाला आदमी।”

रात में डॉक्टर ने बताया कि लड़की बच सकती है, लेकिन इलाज का खर्च 6400 रुपये तत्काल चाहिए। अर्जुन ने अपनी जेब से 47 रुपये निकालकर काउंटर पर रख दिए। लोग उसे देख रहे थे। उसे शर्म आई, मगर उसने पैसे वापस नहीं लिए।

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सुबह 6 बजे अस्पताल से फोन आया—“वह लड़की होश में आ गई है। वह सिर्फ आपका नाम पूछ रही है।”

अर्जुन अस्पताल पहुँचा तो लड़की ने उसे देखा और धीमे से पूछा—“आपने मुझे क्यों बचाया?”

अर्जुन ने कहा—“क्योंकि मैंने तुम्हें देख लिया था। देखने के बाद अनदेखा नहीं कर सकता था।”

लड़की की आँखों में आँसू भर आए। फिर उसने काँपती आवाज में कहा—“मुझे अपना नाम याद नहीं है।”

और उसी पल अर्जुन को नहीं पता था कि जिसे वह अपने टूटे हुए घर में ले जाने वाला है, वह भारत के सबसे ताकतवर उद्योगपति की बेटी है।

भाग 2

अस्पताल ने 2 दिन बाद उसे छुट्टी दे दी, लेकिन बिना पहचान और परिवार के उसे महिला आश्रय गृह भेजा जा रहा था। अर्जुन जानता था कि वह जगह सुरक्षित नहीं होगी। उसने फॉर्म पर हस्ताक्षर किए और उसे अपने घर ले आया। सिया ने उसे देखते ही पूछा—“पापा, ये दीदी परी हैं क्या?” लड़की हल्का मुस्कुराई। उसने अपने लिए नया नाम चुना—लीना। छोटे से घर में सिया ने अपना बिस्तर उसे दे दिया और खुद बैठक में चादर बिछाकर सो गई। लीना को कुछ याद नहीं था, मगर सिया की बातें सुनकर उसके चेहरे पर जीवन लौटने लगा। वह सिया के बाल बनाती, उसके साथ पुराने ताश खेलती, और अर्जुन की टूटी रसोई में चाय बनाना सीखती। पर तीसरी रात से डर घर के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया। एक काली गाड़ी बार-बार गली से गुजरने लगी। कभी बंद शीशे, कभी बिना रोशनी, कभी घर के सामने धीमी चाल। अर्जुन रात भर जागता रहा। चौथी रात लीना चीखते हुए उठी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। उसने अर्जुन का हाथ पकड़कर कहा—“मुझे सब याद आ गया।” उसका असली नाम ईशानी रायज़ादा था। वह विराट रायज़ादा की इकलौती बेटी थी, रायज़ादा समूह की उत्तराधिकारी। उसे मुंबई के एक भूमिगत पार्किंग से अगवा किया गया था। 6 दिन तक उसे एक बंद गोदाम में रखा गया। 20 करोड़ की फिरौती माँगी गई। मगर सौदा बिगड़ गया। किसी अंदर के आदमी ने अपहरणकर्ताओं को खबर दी कि सुरक्षा दल पहुँच रहा है। भगदड़ में उसे बेहोश करके राजमार्ग पर फेंक दिया गया ताकि लगे वह भागते हुए मरी। ईशानी ने काँपते हुए कहा—“अगर मैंने सीधे पिता को फोन किया, तो जिसने मुझे बिकवाया है, उसे पता चल जाएगा कि मैं जिंदा हूँ।” अर्जुन कुछ कह पाता, उससे पहले बाहर कई गाड़ियों के ब्रेक की आवाज आई। खिड़की से उसने देखा—5 काली गाड़ियाँ, हथियारबंद सुरक्षा कर्मी, और बीच में खड़ा एक बूढ़ा, सख्त चेहरा। ईशानी ने फुसफुसाया—“पापा…”

भाग 3

विराट रायज़ादा जब अर्जुन के घर में दाखिल हुआ, तो कमरे की छोटी दीवारें जैसे और सिकुड़ गईं। उसके साथ आए सुरक्षाकर्मी घर के हर कोने में फैल गए। एक ने रसोई देखी, दूसरे ने पिछला दरवाजा, तीसरे ने खिड़की के बाहर झाँका। सिया अपनी गुड़िया को सीने से लगाए सोफे के कोने में बैठी थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि इतने बड़े लोग उसके छोटे से घर में क्यों आए हैं।

ईशानी अपने पिता को देखकर आगे बढ़ी। विराट ने उसे बाँहों में लिया, पर वह आलिंगन वैसा नहीं था जैसा फिल्मों में होता है। उसमें राहत थी, डर था, अपराधबोध था, और 6 दिनों की वह खामोशी थी जिसमें एक पिता ने अपनी बेटी को मृत मान लिया था।

“तुम जिंदा हो,” विराट की आवाज टूट गई।

ईशानी ने कहा—“मैं इसलिए जिंदा हूँ क्योंकि इन्होंने मुझे सड़क से उठाया।”

विराट की आँखें अर्जुन पर टिक गईं। उसने घर को देखा—छत का पंखा काँप रहा था, दीवार पर सीलन थी, खाने की मेज पर सिया की अधूरी कॉपी पड़ी थी, और कोने में राधिका की पुरानी तस्वीर। उसके चेहरे पर आभार से पहले संदेह आया।

“आपने पुलिस को तुरंत सूचना क्यों नहीं दी?” उसने पूछा।

अर्जुन ने शांत स्वर में कहा—“मैंने पहले आपकी बेटी की साँस बचाई।”

“आपने कागजों पर अपना नाम लिखा। आपने खुद को जिम्मेदार व्यक्ति घोषित किया।”

“क्योंकि अस्पताल को किसी नाम की जरूरत थी।”

विराट ने अपनी जेब से चेकबुक निकाली। उसने बिना पलक झपकाए एक चेक लिखा और मेज पर रख दिया।

“2 करोड़ रुपये। आपके खर्च, समय और चुप्पी के लिए। इसके साथ एक समझौता होगा। आप इस घटना के बारे में किसी से बात नहीं करेंगे।”

सिया ने मासूमियत से पूछा—“पापा, इतने पैसों से हमारा घर ठीक हो जाएगा?”

अर्जुन ने चेक उठाया। उसकी आँखों के सामने स्कूल का बकाया, खाली डिब्बे, गैराज का किराया, राधिका का अधूरा इलाज, सिया की पुरानी चप्पलें, सब एक साथ तैर गए। वह पैसे उसका जीवन बदल सकते थे। उसकी बेटी को वह सब दे सकते थे जो वह कभी नहीं दे पाया।

फिर उसने चेक विराट की ओर वापस बढ़ा दिया।

“मैंने आपकी बेटी को पैसे के लिए नहीं बचाया। वह सड़क पर मर रही थी। मैंने बस वही किया जो करना चाहिए था।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

ईशानी की आँखें भर आईं। उसने पिता से कहा—“इन्होंने अपने आखिरी 47 रुपये मेरे इलाज में दिए थे। इनके पास कुछ नहीं था, फिर भी इन्होंने मुझे आश्रय दिया। सिया ने अपना कमरा मुझे दे दिया।”

विराट ने पहली बार अर्जुन को सचमुच देखा। गरीब आदमी नहीं। मौका तलाशने वाला नहीं। कोई छोटा व्यक्ति नहीं। बस वह आदमी, जिसने दुनिया की सबसे महँगी सुरक्षा व्यवस्था से पहले उसकी बेटी को बचा लिया था।

विराट ने चेकबुक बंद कर दी।

“ठीक है,” उसने धीमे से कहा, “आपका कर्ज पैसे से नहीं उतरेगा। लेकिन जब तक यह मामला खत्म नहीं होता, आपके घर और आपकी बेटी की सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है।”

अर्जुन ने तुरंत कहा—“मुझे अपने घर के बाहर बंदूकें नहीं चाहिए।”

“आपको दिखेंगी नहीं,” विराट बोला, “लेकिन रहेंगी।”

ईशानी जाने से पहले सिया के सामने झुकी। “मैं वापस आऊँगी।”

सिया ने पूछा—“सच में? आप फिर से मेरे साथ ताश खेलेंगी?”

ईशानी ने उसे गले लगा लिया। “हाँ, और इस बार मैं हारने का नाटक नहीं करूँगी।”

काली गाड़ियाँ चली गईं। धूल बैठ गई। घर फिर वही था, लेकिन अब बाहर हर परछाईं अलग लगती थी। कभी गली के मोड़ पर एक दूध वाला बहुत देर खड़ा रहता, कभी बिजली विभाग की गाड़ी बिना काम के घंटों खड़ी रहती, कभी कोई आदमी अखबार पढ़ता हुआ भी घर की तरफ देखता रहता। विराट की अदृश्य सुरक्षा सचमुच हर जगह थी।

मगर असली हमला बंदूक से नहीं हुआ।

3 दिन बाद खबरों में अर्जुन का नाम आया—“गरीब मैकेनिक ने अरबपति की बेटी को बचाया या पहले से रची साजिश?” कुछ अज्ञात सूत्रों ने कहा कि अर्जुन अपहरणकर्ताओं से मिला हुआ हो सकता है। किसी ने लिखा कि उसने ईशानी को इसलिए अस्पताल पहुँचाया ताकि बाद में रायज़ादा परिवार से मुआवजा माँग सके। किसी ने कहा कि वह पहले अस्पताल कर्मचारी था और इसी कारण उसने कानूनी फायदा उठाने के लिए कागजों पर अपना नाम लिखा।

गैराज के बाहर कैमरे लग गए। ग्राहक आना बंद हो गए। एक रात किसी ने शटर पर काले रंग से लिख दिया—“झूठा नायक।”

अर्जुन सुबह 5 बजे उठकर वह रंग मिटा रहा था, तभी सिया स्कूल जाने के लिए बाहर आई। उसने पूछा—“पापा, उन्होंने ऐसा क्यों लिखा?”

अर्जुन ने बाल्टी नीचे रखी। उसके हाथ काँप रहे थे, मगर उसने मुस्कुराने की कोशिश की।

“क्योंकि लोग कभी-कभी पूरी कहानी जाने बिना फैसला कर लेते हैं।”

उस दिन दोपहर में स्कूल से फोन आया। प्रधानाचार्य ने विनम्र आवाज में कहा कि जब तक खबरें शांत न हो जाएँ, सिया को घर पर रखना बेहतर होगा। बाकी माता-पिता को डर था कि पत्रकार स्कूल तक पहुँच रहे हैं।

सिया गाड़ी में बैठकर रोई। “मेरे दोस्त ने कहा आप बुरे आदमी हैं। क्या आप बुरे आदमी हैं?”

अर्जुन का दिल टूट गया। उसने गाड़ी रोकी, सिया की तरफ मुड़ा और कहा—“नहीं, बेटा। लेकिन कभी-कभी अच्छा काम करने के बाद भी दुनिया देर से समझती है।”

“तो हम इंतजार करेंगे?”

“हाँ,” अर्जुन ने कहा, “पर सिर झुकाकर नहीं।”

उसी शाम विराट का फोन आया।

“मुझे पता है किसने खबरें लीक की हैं,” उसने कहा। “मेरी कंपनी के अंदर कोई है। वही जिसने ईशानी के अपहरण की योजना बनवाई। वह तुम्हें लालची साबित करना चाहता है ताकि असली अपराध छिप जाए।”

“तो मैं क्या करूँ?” अर्जुन ने पूछा।

“कुछ मत करो। मैं सच सामने लाऊँगा।”

“मेरी बेटी स्कूल नहीं जा पा रही। मेरा गैराज बंद होने वाला है। लोग मेरे घर के बाहर गालियाँ लिख रहे हैं। कुछ न करना आसान सलाह है, जब आपके पास 8 अरब की कंपनी हो।”

दूसरी तरफ कुछ पल चुप्पी रही।

फिर विराट बोला—“तुम सही हो। इसलिए इस बार सच बंद कमरे में नहीं, सबके सामने बोला जाएगा।”

2 हफ्ते बाद मुंबई के एक बड़े परोपकारी समारोह में अर्जुन को बुलाया गया। वह जाना नहीं चाहता था। किराए का बंदगला उसे अजीब लग रहा था। बड़े होटल की चमकदार फर्श पर चलते हुए उसे अपने पुराने जूतों की आवाज तक शर्मनाक लग रही थी। लेकिन ईशानी उसके पास आई और बोली—“आज आपको अपने लिए नहीं, सिया के लिए खड़ा होना है।”

मंच के सामने उद्योगपति, नेता, अभिनेता और बड़े पत्रकार बैठे थे। कैमरे चालू थे। विराट रायज़ादा ने मंच पर आकर माइक पकड़ा।

“आज मैं अपनी बेटी के अपहरण की बात नहीं छिपाऊँगा,” उसने शुरू किया। “6 दिन तक मेरी बेटी को बंधक रखा गया। उसे सड़क किनारे मरने के लिए छोड़ दिया गया। मेरी सुरक्षा, मेरा पैसा, मेरा प्रभाव—सब देर से पहुँचे। एक आदमी पहले पहुँचा। अर्जुन मेहरा।”

पूरे हॉल की नज़र अर्जुन पर गई। वह असहज होकर खड़ा था।

विराट ने आगे कहा—“इन पर आरोप लगा कि इन्होंने मेरी बेटी को पहचानकर फायदा उठाने की कोशिश की। सच यह है कि जब इन्होंने उसे पाया, तब वह अपना नाम तक नहीं बता सकती थी। सच यह है कि इनके पास केवल 47 रुपये थे और इन्होंने वे भी उसके उपचार में दे दिए। सच यह है कि मैंने इन्हें 2 करोड़ रुपये देने चाहे, और इन्होंने इंकार कर दिया।”

हॉल में हलचल हुई। कैमरे अर्जुन के चेहरे पर आ टिके।

विराट ने जेब से वही चेक निकाला। “यह वह चेक है। इस पर इनके हस्ताक्षर नहीं हैं, क्योंकि इन्होंने इसे लिया ही नहीं। इन्होंने मुझसे कहा—‘मैंने आपकी बेटी को पैसे के लिए नहीं बचाया। वह मर रही थी, इसलिए बचाया।’”

तालियाँ धीरे-धीरे शुरू हुईं। पहले एक मेज से, फिर दूसरी से, फिर पूरा हॉल खड़ा हो गया। अर्जुन की आँखें झुक गईं। उसे सम्मान की आदत नहीं थी। अपमान सहना उसने सीख लिया था, लेकिन सम्मान उसके लिए भारी था।

ईशानी मंच पर आई। उसने माइक लिया।

“जब मुझे अपना नाम याद नहीं था, तब इनकी बेटी सिया ने मुझे अपना कमरा दिया। जब मुझे अपने घर का रास्ता याद नहीं था, तब अर्जुन जी ने मुझे घर दिया। जब मुझे अपने पिता तक पहुँचने से डर लग रहा था, तब इन्होंने मेरे डर को समझा। ये नायक इसलिए नहीं हैं कि इन्होंने अरबपति की बेटी बचाई। ये नायक इसलिए हैं कि अगर मैं कोई अनजान गरीब लड़की भी होती, तब भी ये रुकते।”

उस रात खबरें बदल गईं। “जिस आदमी ने 2 करोड़ ठुकराए।” “रायज़ादा की बेटी ने बचाने वाले मैकेनिक को बताया असली नायक।” “झूठी अफवाहों के पीछे कंपनी का बड़ा अधिकारी।”

कुछ दिनों में जाँच खुली। रायज़ादा समूह का वित्त प्रमुख ही अपहरण की साजिश में शामिल निकला। उसने कंपनी के शेयर गिराने के लिए अंदर की जानकारी बाहर बेची थी, ताकि भारी लाभ कमा सके। 3 अपहरणकर्ताओं में से 2 पकड़े गए, 1 नेपाल सीमा के पास गिरफ्तार हुआ। ईशानी सुरक्षित थी। सिया फिर स्कूल जाने लगी। वही लड़का जिसने कहा था अर्जुन बुरा है, अगले दिन उसके लिए चॉकलेट लेकर आया। सिया ने चॉकलेट ली, लेकिन कहा—“पहले मेरे पापा से माफी माँगो।”

6 महीने बाद गुरुग्राम के उसी इलाके में एक नई इमारत खुली। बहुत बड़ी नहीं थी। 12 कमरों का छोटा स्वास्थ्य केंद्र, दवा घर, प्राथमिक उपचार कक्ष और गरीबों के लिए निशुल्क जाँच। दरवाजे पर नाम लिखा था—“राधिका मेहरा स्मृति सेवा केंद्र।”

विराट ने 2 करोड़ रुपये अर्जुन को नहीं दिए। अर्जुन ने कहा था, “अगर सचमुच कुछ करना है, तो ऐसा कीजिए कि कोई गरीब आदमी इलाज के लिए अपनी आखिरी 47 रुपये की जेब न टटोले।”

विराट ने वही किया।

सबसे बड़ा चमत्कार सिर्फ इमारत नहीं थी। दीवार पर अर्जुन का नया प्रमाणपत्र टंगा था। उसका आपातकालीन चिकित्सा सहायक का लाइसेंस बहाल हो चुका था। पुराने मामले की समीक्षा में साबित हुआ कि उसे गलत तरीके से सजा दी गई थी। उसने नियम तोड़े थे, लेकिन किसी का जीवन बचाने के लिए; और जिस विभाग ने उसे दोषी ठहराया था, उसने प्रक्रिया में ही गलती की थी।

पहले दिन एक मजदूर अपनी बीमार बेटी को लेकर आया। बच्ची को तेज बुखार था। मजदूर ने पर्ची भरते समय पूछा—“साहब, पैसे अभी देने होंगे क्या? मेरे पास बस 60 रुपये हैं।”

अर्जुन ने बच्ची की नब्ज देखते हुए कहा—“यहाँ पहले इलाज होगा। पैसे की बात बाद में भी नहीं होगी।”

मजदूर की आँखें भर आईं। अर्जुन को अपना अतीत दिख गया। वह खुद भी कभी इसी तरह खड़ा था—लाचार, शर्मिंदा, डरता हुआ कि गरीबी कहीं उसके बच्चे की साँसों से महँगी न पड़ जाए।

ईशानी हर महीने वहाँ आती। कभी दवाइयों का डिब्बा लेकर, कभी बच्चों के लिए किताबें लेकर, कभी बस सिया के साथ ताश खेलने। विराट भी कभी-कभी आता, लेकिन अब वह पहले जैसा कठोर नहीं दिखता था। वह छोटे रोगियों के बीच बैठना सीख रहा था। शायद अपनी बेटी को खोते-खोते उसने पहली बार जाना था कि जीवन की कीमत बैलेंस शीट में नहीं लिखी जाती।

एक शाम उद्घाटन के बाद अर्जुन अपने घर की पिछली सीढ़ी पर बैठा था। सिया उसके पास आकर टिक गई। आसमान में हल्की धूल थी, दूर से मंदिर की घंटी सुनाई दे रही थी।

“पापा,” सिया ने कहा, “जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, मैं आपके जैसी बनूँगी।”

अर्जुन मुस्कुराया। “मैकेनिक?”

“नहीं।”

“डॉक्टर?”

“नहीं।”

“तो क्या?”

सिया ने उसकी बाँह पकड़ ली। “ऐसी इंसान, जो सड़क पर किसी को देखकर आगे नहीं निकलती।”

अर्जुन बहुत देर तक कुछ नहीं बोल पाया। उसने बस बेटी को अपने पास खींच लिया। उसे राधिका की याद आई। अगर वह होती, तो शायद यही कहती—कभी-कभी भगवान चमत्कार नहीं भेजता, वह बस किसी थके हुए आदमी को सही समय पर पीछे देखने की हिम्मत दे देता है।

उस रात अर्जुन ने वह पुराना कार्ड फेंक दिया, जो विराट ने पहले दिन मेज पर छोड़ा था। अब उसे किसी बड़े आदमी की सीधी लाइन की जरूरत नहीं थी। उसे अपनी कीमत समझ आ चुकी थी।

बाहर सड़क पर एक कार धीरे से गुजरी। इस बार वह सुरक्षा की गाड़ी नहीं थी, न कोई पीछा करने वाला। बस पड़ोस की आंटी मंदिर से लौट रही थीं। उन्होंने हाथ हिलाया। अर्जुन ने भी हाथ हिला दिया।

घर के अंदर सिया सो रही थी, उसकी कॉपी खुली पड़ी थी। उसमें उसने लिखा था—“मेरे पापा हीरो हैं, क्योंकि उन्होंने 47 रुपये में दुनिया की सबसे अमीर चीज बचाई—किसी की जिंदगी।”

अर्जुन ने कॉपी बंद की, सिया के माथे पर चुंबन रखा और कमरे की बत्ती बुझा दी।

दुनिया अब भी वैसी ही थी—अन्याय से भरी, अफवाहों से भरी, डर और लालच से भरी। मगर उसी दुनिया में कुछ लोग अब भी रुकते थे। कुछ लोग खाली जेब के बावजूद हाथ बढ़ाते थे। कुछ लोग जानते थे कि इंसानियत का असली वजन बैंक खाते से नहीं, उस पल से मापा जाता है जब कोई मर रहा हो और आप तय करते हैं कि आप आगे बढ़ेंगे या लौटेंगे।

अर्जुन उस दिन लौट आया था।

और उसी एक फैसले ने सिर्फ ईशानी की जिंदगी नहीं बचाई, उसने सिया को यह सिखा दिया कि गरीब होना शर्म की बात नहीं, लेकिन किसी को मरता छोड़ देना सबसे बड़ी गरीबी है।