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मंडप में कुत्ते ने दुल्हन का लहंगा दांतों से खींचा, सबने उसे पागल कहा, पर शादी के बाद जब पत्नी को पति का दूसरा नाम और अपनी मौत की तारीख मिली, तो वह टूटकर बोली, “उसने सच पहले पहचान लिया था”

PART 1

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—यह कुत्ता पागल नहीं है, यह उसे बचाने की कोशिश कर रहा है!

मंदिर के मंडप में यह चीख गूंजी तो शहनाई अचानक थम गई। जयपुर के एक पुराने हवेली जैसे विवाह-स्थल में 150 मेहमान बैठे थे, पीले गेंदे की मालाओं, चांदी के दीयों और कैमरों की चमक के बीच अनाया लाल बनारसी लहंगे में फेरे लेने ही वाली थी। उसके हाथ में जयमाला कांप रही थी, माथे पर सिंदूर की रेखा अभी बाकी थी, और सामने खड़ा था राघव मल्होत्रा—वह आदमी जिसे उसकी मां “घर की इज्जत” कहती थी।

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तभी शेरू, अनाया का 12 साल पुराना काला-भूरा लैब्राडोर, दरवाजे की रस्सी तोड़कर मंडप में घुस आया। उसने अनाया को नहीं काटा। उसने उसके लहंगे का किनारा दांतों में दबाया और पूरी ताकत से उसे पीछे खींचने लगा।

—हटाओ इसे! —अनाया की मां निर्मला देवी चिल्लाईं—आज के दिन अपशगुन कर दिया इस जानवर ने!

लेकिन शेरू नहीं रुका। उसकी आंखें सिर्फ राघव पर टिकी थीं। वह गुर्रा रहा था, जैसे किसी ऐसे चेहरे को पहचान गया हो जिसे इंसान देख ही नहीं पा रहे थे।

राघव ने अजीब शांति से कदम बढ़ाए। उसने अनाया का हाथ नहीं पकड़ा, उसके गिरते हुए घुटने नहीं देखे। वह शेरू के सामने झुका और बहुत धीमी आवाज में बोला—

—छोड़ दे, शेरू।

कुत्ते का गुर्राना और तेज हो गया।

दो चचेरे भाइयों ने उसे घसीटकर बाहर किया। शेरू पूरी देह से विरोध कर रहा था, जैसे उसका हर भौंकना कह रहा हो—मत करो, मत करो। अनाया का लहंगा फट गया, मेहमान फुसफुसाने लगे, पंडित जी ने मंत्र रोक दिए। शादी उसी रात रुक गई।

घर लौटकर दिल्ली के राजौरी गार्डन वाले पुश्तैनी मकान में तूफान उठ गया। निर्मला देवी शर्म से रोती रहीं। पिता गिरीश वर्मा बार-बार कहते रहे कि बूढ़े जानवरों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। राघव सबको शांत करता रहा।

—शेरू को मत डांटिए। वह बूढ़ा है, भीड़ से डर गया होगा। अनाया ठीक है, बस यही जरूरी है।

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सब उसे और भी बड़ा आदमी समझने लगे।

केवल अनाया की छोटी बहन काव्या चुप नहीं रही।

—शेरू भीड़ से नहीं डरा था। उसने सिर्फ राघव पर गुर्राया था।

कमरे में सन्नाटा जम गया।

राघव ने दुखी मुस्कान ओढ़ी।

—काव्या मुझे कभी पसंद नहीं करती। कोई बात नहीं। रिश्ते समय से बनते हैं।

एक वाक्य में उसने काव्या को घर की झगड़ालू लड़की बना दिया।

अगली सुबह शेरू गायब था। अनाया ने उसे आंगन, रसोई, अपनी चारपाई के नीचे, हर जगह खोजा। उसका कटोरा भरा पड़ा था।

राघव छत पर चाय पी रहा था।

—शेरू कहां है?

—मैं उसे अपने दोस्त के फार्महाउस छोड़ आया, मानेसर के पास। बहुत खुली जगह है। तुम्हारी मां उसे मरवाने की बात कर रही थीं। मैंने बचा लिया।

—मुझसे पूछे बिना?

—मैंने तुम्हारी रक्षा की, अनाया।

बात समझदारी जैसी लगी, लेकिन अनाया के भीतर कुछ टूट गया। शेरू कोई सामान नहीं था। वह उसके पिता के बाद उसका सबसे पुराना सहारा था।

2 दिन बाद अनाया ने कोर्ट में राघव से विवाह पर हस्ताक्षर कर दिए। न बैंड, न फेरे, न शेरू।

फोटो में वह मुस्करा रही थी।

लेकिन उसके भीतर शेरू की आखिरी भौंक अब भी गूंज रही थी।

और उसे पता नहीं था कि उसकी अपनी मौत की तारीख पहले ही लिखी जा चुकी थी।

PART 2

गोवा में हनीमून तस्वीरों में सपना लग रहा था। समुद्र किनारे कमरा, महंगे रेस्तरां, सोने की बालियां, और राघव की तस्वीरों पर लिखे वाक्य—“मेरी पत्नी, मेरी दुनिया।” अनाया मुस्कराती रही, पर हर रात उसका मोबाइल धीमे-धीमे बजता।

राघव बालकनी में जाकर फुसफुसाता।

—कारोबार है, दुबई के लोग हैं, समय अलग है।

एक दोपहर उसने अनाया को स्पा भेजा। वह नहीं गई। कमरे में लौटकर उसने राघव का हाथ वाला बैग खोला। कागजों के नीचे कपड़े की तह में छिपा एक दूसरा पासपोर्ट था।

तस्वीर राघव की थी।

नाम लिखा था—समर प्रताप अरोड़ा।

जन्मतिथि अलग। शहर अलग। पूरा जीवन अलग।

बाथरूम का शावर बंद हुआ।

अनाया ने कांपते हाथों से सब वापस रख दिया और बिस्तर पर बैठ गई।

दिल्ली लौटते ही वह काव्या के कमरे में गई। काव्या ने बिना ताना मारे उसकी बात सुनी, फिर एक फाइल खोली।

—उसकी कंपनी 9 महीने पहले बनी है। पता एक डाकघर का बक्सा है। और कोर्ट में जो उसके माता-पिता बने थे, वे असली नहीं थे। दोनों छोटे कलाकार हैं।

तभी अनाया के फोन पर अनजान नंबर आया।

—अगर तुम राघव की पत्नी हो, तो भाग जाओ। मैं भी उसकी पत्नी थी, जब वह समर था। उसने मेरा घर, गहने, सब ले लिया। शक होते ही उसने मेरे कुत्ते को गायब कर दिया। फिर मेरी जिंदगी भी…

लाइन कट गई।

PART 3

अनाया के हाथ से फोन लगभग गिर गया। काव्या ने उसे पकड़ लिया, पर उसके चेहरे पर डर नहीं, आग थी।

—नाम पता है?

—उसने कहा… वह उसकी पत्नी थी। जब वह समर था।

काव्या ने तुरंत अपने पिता के पुराने मित्र, सेवानिवृत्त अपराध शाखा अधिकारी अजय राणा को बुलाया। अजय राणा कभी गिरीश वर्मा के साथ सरकारी मुकदमों में सलाहकार रहे थे। अब वे दक्षिण दिल्ली के एक छोटे से दफ्तर में निजी जांच का काम करते थे। सफेद बाल, शांत आंखें और आवाज ऐसी जैसे किसी ने बहुत सारे झूठों को टूटते देखा हो।

उन्होंने अनाया की पूरी बात सुनी। बीच में टोका नहीं। फिर धीरे से बोले—

—तुम्हारे कुत्ते ने मंडप में जो किया, वह डर नहीं था। वह पहचान थी।

अनाया की आंखें भर आईं।

—मुझे शेरू को बचाना चाहिए था।

—अब खुद को बचाओ। और अगर किस्मत ने साथ दिया, तो बाकी औरतों को भी।

राणा ने सबसे पहले राघव की कंपनी की जांच कराई। “मल्होत्रा वेल्थ कंसल्ट” नाम की जिस चमकदार संस्था की बातें राघव हर रिश्तेदार से करता था, उसका असली दफ्तर कहीं नहीं था। एक नकली वेबसाइट, किराए का पता, और कुछ ऐसे खाते जिनमें कई शहरों से पैसा आता और फिर छोटे-छोटे हिस्सों में बाहर जाता।

फिर काव्या ने उस अनजान महिला को ढूंढने की ठानी। कॉल इंटरनेट से की गई थी, पर राणा ने कुछ सुराग निकाले। 4 दिन बाद वे तीनों करनाल के एक छोटे कैफे में बैठे थे। सामने आई स्त्री के चेहरे पर हल्का दुपट्टा था। उसका नाम मीरा सहगल था।

मीरा ने पहले अनाया को बहुत देर तक देखा, जैसे अपने पुराने चेहरे को देख रही हो।

—वह हमेशा अच्छे घर की लड़की चुनता है। जिसकी संपत्ति हो, पर दिल में खालीपन भी हो। पहले वह फूल भेजता है। फिर परिवार को जीतता है। फिर लड़की को उसी परिवार से अलग कर देता है।

—आपने पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की? —काव्या ने पूछा।

मीरा कड़वाहट से हंसी।

—किस नाम से? मेरे कागजों में वह समर था। बैंक में विवेक। होटल में राघव। और जब तक मुझे सच पता चला, मेरा फ्लैट बिक चुका था, मेरे हस्ताक्षर इस्तेमाल हो चुके थे, और मेरा पालतू कुत्ता मर चुका था।

अनाया की सांस रुक गई।

—मर चुका?

मीरा ने आंखें नीचे कर लीं।

—उसने कहा था फार्महाउस भेज दिया। बाद में पता चला, क्लिनिक में मरवा दिया। पशु उसके लिए खतरा होते हैं। वे उसकी गंध पहचान लेते हैं। वे डरते नहीं, चेतावनी देते हैं।

अनाया के कानों में शेरू की भौंक फिर गूंज उठी।

मीरा ने फाइल आगे बढ़ाई। उसमें 2 और औरतों की तस्वीरें थीं। लखनऊ की विधवा निधि, जिसकी मौत सीढ़ियों से गिरने के नाम पर बंद कर दी गई थी। सूरत की व्यापारी रचना, जिसकी कार दुर्घटना से पहले उसकी बीमा राशि बदली गई थी। दोनों के पति के नाम अलग थे, चेहरा एक ही था।

और दोनों मामलों में पालतू जानवर अचानक गायब हुए थे।

राणा ने फाइल बंद की।

—यह आदमी सिर्फ ठग नहीं है। यह योजना बनाकर जीवन मिटाता है।

अनाया ने पहली बार बिना रोए कहा—

—उसकी अगली योजना मैं हूं।

घर लौटकर उसने अभिनय शुरू किया। वह वही पत्नी बनी जो राघव चाहता था—भोली, विश्वास करने वाली, अपराधबोध में डूबी हुई। वह उसके सामने मुस्कराती, सास-ससुर के नाम पर बुलाए गए नकली रिश्तेदारों को नमस्ते करती, उसके कारोबार की बातें ध्यान से सुनती।

राघव ने जल्दी ही पहला जाल सामने रखा।

—तुम्हारा दादी वाला गुरुग्राम का फ्लैट खाली पड़ा है। उसे बेचकर हम उदयपुर के पास रिसॉर्ट में हिस्सा ले सकते हैं। बस एक पावर ऑफ अटॉर्नी साइन करनी होगी।

अनाया ने कागज पलटे। हर पन्ना जैसे उसकी गर्दन पर रखा चाकू था। पर उसने चेहरा नरम रखा।

—अगर तुम्हें सही लगता है, तो मैं करूंगी।

राघव की आंखों में विजय चमकी।

उसी रात राणा ने कागजों की प्रतियां लीं। सब नकली निवेश, खाते और अधिकार हस्तांतरण की तैयारी थी। अनाया के हस्ताक्षर से राघव उसके फ्लैट, बचत और बीमा तक पहुंच सकता था।

फिर राणा ने सबसे दर्दनाक सबूत ढूंढा।

दिल्ली के एक पशु-चिकित्सा क्लिनिक की रसीद। तारीख—कोर्ट विवाह से 1 दिन पहले। अनुरोध करने वाले का नाम—राघव मल्होत्रा। पशु—शेरू। प्रक्रिया—दया-मृत्यु।

कारण में लिखा था—आक्रामक व्यवहार।

अनाया ने कागज हाथ में लिया। न चीखी, न बेहोश हुई। उसके चेहरे पर ऐसी चुप्पी उतर आई जिसने काव्या को भी डरा दिया।

—उसने उसे इसलिए मारा क्योंकि शेरू ने सच देख लिया था।

काव्या ने उसका हाथ पकड़ा।

—अब हम सच दिखाएंगे।

योजना बड़ी सावधानी से बनी। राणा ने कहा कि सीधे सामना करना सबसे खतरनाक होगा। ऐसे लोग पकड़े जाने से पहले आखिरी वार करते हैं। इसलिए अनाया को जिंदा, शांत और मुस्कराती हुई रहना था।

गिरीश वर्मा का 60वां जन्मदिन आने वाला था। घर में छोटा समारोह रखा गया। राघव ने सबके सामने महंगे इत्र, रेशमी शॉल और मीठी बातें बांटीं। निर्मला देवी अब भी उसे आदर्श दामाद मानती थीं।

काव्या ने वही रात चुनी।

केक काटते समय उसने जानबूझकर राघव के कुर्ते पर काली कॉफी गिरा दी। एक पल के लिए उसकी आंखों में पशु जैसी क्रूरता चमकी। फिर उसने मुस्कान ओढ़ ली।

—कोई बात नहीं, छोटी बहन है।

वह ऊपर कपड़े बदलने गया। अपना कोट सोफे पर छोड़ गया।

अनाया ने कोट की जेब से फोन निकाला। राणा ने दिया हुआ छोटा उपकरण लगाया। स्क्रीन जगी। उसकी उंगलियां कांप रही थीं, पर वह रुकी नहीं। 12 सेकंड। 25 सेकंड। 40 सेकंड। डेटा उतर गया।

फोन वापस जेब में पहुंच गया।

अगली सुबह राणा के दफ्तर में वे सब बैठे थे। फोन से निकली चीजें किसी अंधे कुएं जैसी थीं। नकली नामों की सूची। महिलाओं के पहचान-पत्र। बैंक खातों के नंबर। बीमा दस्तावेज। और एक चैट—किसी “रिया” नाम की महिला से।

रिया केवल प्रेमिका नहीं थी। वह एक निजी बैंक में काम करती थी और पैसे बाहर भेजने में उसकी मदद करती थी।

संदेश पढ़कर अनाया का खून जम गया।

“पत्नी ने भरोसा कर लिया है। फ्लैट जल्द मिल जाएगा।”

रिया का जवाब था—

“फिर दिसंबर वाला काम तय?”

राघव ने लिखा था—

“हां। दिल की बीमारी का कागज तैयार है। अचानक मौत। कोई सवाल नहीं।”

एक फोल्डर में अनाया का नाम था। उसके साथ तारीख—17 दिसंबर।

आज 3 नवंबर थी।

अनाया अपनी कुर्सी से उठकर खिड़की के पास चली गई। बाहर बच्चे स्कूल से लौट रहे थे। दुनिया चल रही थी, और उसकी मौत कैलेंडर पर रखी थी।

राणा ने गंभीर आवाज में कहा—

—सबूत मजबूत हैं, पर गिरफ्तारी के लिए हमें उसके मुंह से योजना चाहिए। वह भागने में माहिर है।

अनाया ने पीछे मुड़कर देखा।

—मैं उसे बोलने पर मजबूर करूंगी।

उसने राघव से कहा कि वह 2 दिन के लिए मुंबई जा रही है, दादी की पुरानी संपत्ति के कागजों के काम से। राघव खुद उसे हवाई अड्डे छोड़ने गया। उसने माथे पर चुंबन दिया।

—अपना ध्यान रखना, जान।

अनाया ने मुस्कराकर सिर हिलाया, सुरक्षा द्वार तक गई, फिर राणा की व्यवस्था से दूसरी निकासी से बाहर आ गई। काव्या कार में इंतजार कर रही थी।

उसी शाम राणा ने उनके घर के ड्राइंग रूम में पहले से लगाए गए कैमरे चालू कर दिए।

रात 9 बजे राघव ने रिया को बुलाया।

रिया गहरे नीले सूट में आई, हाथ में शराब की बोतल थी। उसी कमरे में दोनों हंसे, जहां अनाया ने शेरू के लिए रोते हुए रातें काटी थीं।

राघव ने गिलास भरे।

—मूर्ख लड़की। उसे लगता है मैं उसके लिए घर बसा रहा हूं। 17 दिसंबर के बाद सब हमारा होगा।

रिया ने पूछा—

—अगर उसे शक हो गया तो?

राघव हंसा।

—शक और सबूत में फर्क होता है। मीरा भी शक करती थी। रचना भी। निधि तो आखिरी दिन रो रही थी। फिर भी क्या हुआ?

रिया के चेहरे पर डर की हल्की छाया आई।

—और कुत्ता?

—जानवर जल्दी समझ जाते हैं। उस बूढ़े शेरू ने मंडप में सब बिगाड़ दिया था। अच्छा हुआ अगले दिन खत्म कर दिया। नहीं तो वह और भौंकता।

स्क्रीन के सामने बैठी अनाया ने आंखें बंद कर लीं। इस बार आंसू बहे, पर उसके हाथ नहीं कांपे।

राणा ने संकेत दिया।

20 मिनट बाद पुलिस घर में दाखिल हुई। राघव पहले तो हंसता रहा।

—यह सब पारिवारिक गलतफहमी है।

फिर उसने अनाया को दरवाजे पर खड़ा देखा। उसके चेहरे की रंगत बदल गई।

—तुम मुंबई नहीं गईं?

अनाया आगे बढ़ी। पुलिस के बीच खड़े उस आदमी को उसने पहली बार बिना डर के देखा।

—नहीं। मैं वहां गई जहां शेरू चाहता था कि मैं जाऊं—सच तक।

राघव ने दांत भींचे।

—तुम नहीं जानतीं मैं कौन हूं।

—मैं जानती हूं। तुम वह आदमी हो जो एक बूढ़े कुत्ते से डर गया, क्योंकि वह तुम्हारी असलियत इंसानों से पहले पहचान गया था।

रिया सबसे पहले टूट गई। उसने बैंक खातों, नकली दस्तावेजों, बीमा धोखाधड़ी और पुराने मामलों की जानकारी दी। मीरा ने बयान दिया। लखनऊ और सूरत के बंद मामले फिर खुले। रचना के भाई ने पुराने कागज जमा किए। निधि की बेटी ने अदालत में रोते हुए कहा कि उसकी मां ने मौत से 3 दिन पहले कहा था—“मेरा पति मुझे देखता नहीं, गिनता है।”

निर्मला देवी का संसार टूट गया। जिस दामाद को उन्होंने देवता कहा था, वह उनकी बेटी की मौत खरीद रहा था। वे अनाया के पैरों में गिरकर रोने लगीं।

—मैंने शेरू को अपशगुन कहा था। पाप किया मैंने।

अनाया ने उन्हें उठाया, पर कुछ नहीं बोली। कुछ पछतावे शब्दों से हल्के नहीं होते।

राघव पर धोखाधड़ी, पहचान बदलने, जाली दस्तावेज, आपराधिक षड्यंत्र और हत्या की साजिश के मुकदमे चले। पुराने मामलों में भी जांच शुरू हुई। उसकी कंपनियों के खाते जब्त हुए। नकली माता-पिता बने कलाकारों ने स्वीकार किया कि उन्हें पैसे दिए गए थे। रिया सरकारी गवाह बनी। अदालत ने अनाया की संपत्ति, खाते और सुरक्षा पर तुरंत संरक्षण आदेश दिया।

कई महीनों बाद अनाया उसी विवाह-स्थल पर लौटी। इस बार न लहंगा था, न मेहमान, न शहनाई। उसके हाथ में मिट्टी का छोटा कलश था। राणा ने क्लिनिक से शेरू की बची हुई राख निकलवाई थी। काव्या उसके साथ थी।

हवेली के पिछवाड़े एक नीम का पेड़ था। वहीं अनाया ने छोटा गड्ढा खोदा। उसने राख रखी, फूल चढ़ाए और एक पीतल की छोटी पट्टिका लगवाई—

“शेरू। जिसने भौंककर सच कहा, जब सब चुप थे।”

अनाया घुटनों के बल बैठ गई।

—माफ कर देना। उस दिन मैं तुम्हारी भाषा नहीं समझ पाई।

हवा चली। नीम की पत्तियां धीरे-धीरे हिलीं, जैसे कोई पुराना दोस्त आखिरी बार पूंछ हिला रहा हो।

काव्या ने अनाया के कंधे पर हाथ रखा।

—तू बच गई।

अनाया ने आंखें पोंछीं।

—नहीं। उसने बचाया।

उस दिन अनाया ने पहली बार समझा कि प्रेम हमेशा मनुष्यों की भाषा में नहीं बोलता। कभी वह फटे लहंगे को दांतों से खींचता है, कभी मंडप में अपमान बनकर खड़ा होता है, कभी सबकी नजरों में पागल कहलाता है।

पर सच्चा प्रेम चुप नहीं रहता।

और जिस शादी को सबने अपशगुन कहा था, वही उसकी जिंदगी की आखिरी चेतावनी थी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.