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भीगता हुआ 5 साल का बच्चा 7 जंग लगे सिक्के और 2 कुचली कैन लेकर क्लिनिक में बोला, “मेरी टांग ठीक कर दो”, डॉक्टर ने उसका चेहरा देखा तो हाथ कांप गए, क्योंकि 3 करोड़ रुपये के कागज़ों में छिपा वही बेटा सामने खड़ा था, और पिता को अभी असली सच पता भी नहीं था…

PART 1

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भीगता हुआ 5 साल का एक बच्चा दिल्ली की बरसाती रात में छोटे से क्लिनिक के पिछले दरवाज़े पर आया, उसकी मुट्ठी में 7 जंग लगे सिक्के, 2 कुचली हुई कोल्ड ड्रिंक की कैन और तांबे का एक मुड़ा हुआ तार था, और उसने कांपती आवाज़ में कहा, “डॉक्टर आंटी, मेरी टांग ठीक कर दोगी? पैसे कम पड़े तो कल और कचरा उठा लाऊंगा।”

डॉ. मीरा शर्मा वहीं जम गई।

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लाजपत नगर की संकरी गली के उस छोटे से क्लिनिक के बाहर बारिश नाली से उफनकर सड़क पर बह रही थी। बिजली की पीली ट्यूब लाइट में बच्चा किसी टूटे हुए खिलौने जैसा दिख रहा था। उसका स्वेटर इतना बड़ा था कि हाथ आधे ढक गए थे, पैंट घुटने से फटी हुई थी, और पैरों में 2 अलग-अलग चप्पलें थीं। दाहिनी टांग सूजी हुई, नीली और टेढ़ी थी, जैसे कई दिनों से दर्द उसके शरीर में बंद पड़ा हो।

मीरा ने धीरे से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

बच्चे ने सिक्कों को और कसकर पकड़ा।

“आरव।”

मीरा की सांस रुक गई।

आरव।

यही नाम उसने 5 साल पहले मुंबई के एक महंगे अस्पताल में अपने 3 महीने के बेटे के माथे पर चुंबन देते हुए फुसफुसाया था। वही बेटा, जिसे उससे एक कागज़, एक झूठे इल्ज़ाम और 3 करोड़ रुपये के बदले छीन लिया गया था।

उसने बच्चे का चेहरा गौर से देखा। ठोड़ी की बनावट। भीगी पलकों के नीचे डरी हुई आंखें। रोना रोकते समय होंठ के पास पड़ने वाली वही छोटी सी लकीर।

सब कुछ वही था।

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मीरा की आवाज़ टूट गई, “आरव क्या?”

बच्चे ने सिर झुका लिया।

“आरव मल्होत्रा। घर में सब मुझे बस छोटू कहते हैं।”

दीवार सहारा न देती तो मीरा गिर जाती।

मल्होत्रा परिवार दिल्ली के सबसे अमीर अस्पताल समूहों में से एक का मालिक था। 5 प्राइवेट हॉस्पिटल, 3 डायग्नोस्टिक सेंटर, एक चैरिटी फाउंडेशन और टीवी पर मुस्कुराते चेहरे। उनका वारिस था विक्रम मल्होत्रा, मीरा का पूर्व पति। और उस घर की असली मालकिन थी सावित्री देवी मल्होत्रा, विक्रम की दादी, जिसके लिए खानदान की इज़्ज़त इंसान से बड़ी थी।

मीरा एक साधारण परिवार से आई थी। उसके पिता आयुर्वेदिक वैद्य थे, मां सरकारी स्कूल में शिक्षिका। उसने मेहनत से एमबीबीएस किया, सरकारी अस्पताल में काम किया और फिर गरीबों के लिए छोटा क्लिनिक खोला। मल्होत्रा परिवार ने उसे कभी बहू नहीं माना। उनके लिए वह “मध्यमवर्ग की लड़की” थी, “विक्रम की गलती” थी।

जब विक्रम सिंगापुर बिजनेस डील के लिए गया था, सावित्री देवी ने मीरा को हवेली में बुलाया था। मेज़ पर कागज़ रखे थे। आरोप तैयार थे। उसे मानसिक रूप से अस्थिर साबित करने की धमकी दी गई। कहा गया कि अदालत, पुलिस, मीडिया सब खरीद लिए जाएंगे। फिर 3 करोड़ का चेक आगे बढ़ाया गया।

“बच्चे को छोड़ दो। विक्रम से दूर चली जाओ। वरना तुम्हारा नाम मिटा देंगे।”

मीरा ने रोते हुए हस्ताक्षर किए थे। उसे लगा था, अमीर घर में कम से कम उसका बच्चा सुरक्षित रहेगा।

और आज वही बच्चा उसके सामने कचरे से जमा किए पैसों से इलाज खरीदने आया था।

मीरा ने दरवाज़ा पूरा खोल दिया।

“अंदर आओ, आरव।”

वह डर गया। “आप इलाज करोगी? मेरे पास पूरा पैसा नहीं है।”

“बच्चों से इलाज के पैसे नहीं लिए जाते।”

वह तुरंत अंदर आया, जैसे डर हो कि दया वापस ले ली जाएगी।

जांच टेबल पर उसका शरीर बहुत हल्का था। मीरा ने जब उसकी टांग देखी तो उसकी उंगलियां ठंडी पड़ गईं। पुरानी फ्रैक्चर थी, ठीक से जुड़ी नहीं थी। सूजन, नीले निशान, पीले पड़ चुके घाव, पसलियों के पास उभरे दाग, हाथों पर गोल निशान।

मीरा ने जैसे ही टांग छूनी चाही, आरव ने दोनों हाथ सिर पर रख लिए।

“माफ़ कर दो! मैं नहीं हिलूंगा! मारना मत!”

मीरा की आंखें भर आईं।

“यहां कोई तुम्हें नहीं मारेगा।”

वह बोला, “मैं अच्छा बच्चा बन सकता हूं। सच में।”

“तुम्हें अच्छा बनने की शर्त पर इलाज नहीं मिलेगा। तुम बस बच्चे हो।”

वह समझा नहीं।

मीरा ने उसे गरम दूध, खिचड़ी और कंबल दिया। उसने ऐसे खाया जैसे हर कौर आखिरी हो। फिर बोला, “कटोरी मैं धो दूं?”

“नहीं, तुम बैठे रहो।”

“नहीं धोऊंगा तो घर में बोलेंगे कि मैं मुफ्तखोर हूं।”

मीरा को मुंह फेरना पड़ा।

उसने पूछा, “तुम घर में कहां सोते हो?”

“स्टोर रूम में। झाड़ू-पोछे के पास। खिड़की खोल दूं तो बदबू कम आती है।”

“दरवाज़ा?”

“कभी-कभी कमला आंटी बाहर से बंद कर देती हैं। जब मैं गलती करता हूं। पर मैं इंतज़ार कर लेता हूं।”

कमला। मल्होत्रा हवेली की पुरानी हाउसकीपर।

मीरा ने फोन उठाया। विक्रम का नंबर उसने 5 साल में कभी नहीं मिलाया था। आज मिलाया।

दूसरी घंटी पर आवाज़ आई, “मीरा?”

उस आवाज़ ने 5 साल का घाव खोल दिया।

मीरा ने बच्चे को देखते हुए कहा, “मुझे आरव मिला है।”

उधर सन्नाटा छा गया।

“क्या?”

“तुम्हारा बेटा मेरे क्लिनिक में है। बारिश में आया। 7 जंग लगे सिक्के और 2 कैन लेकर। अपनी टूटी टांग ठीक करवाने।”

उधर कुछ गिरने की आवाज़ आई।

मीरा की आवाज़ पत्थर जैसी हो गई।

“विक्रम, क्या तुम्हें पता था कि तुम्हारा बेटा स्टोर रूम में बंद करके सुलाया जाता है?”

PART 2

विक्रम 20 मिनट में क्लिनिक पहुंचा। महंगे सूट वाला वह आदमी उस रात खाली आंखों वाला पिता लग रहा था। जैसे ही उसने आरव को कंबल में कांपते देखा, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

आरव ने आंखें खोलीं और फौरन सिकुड़ गया।

“पापा, सॉरी। मैं भागा नहीं था। टांग बहुत जल रही थी। मैं वापस चला जाऊंगा।”

विक्रम वहीं रुक गया।

“किसने किया ये?”

आरव ने सिर हिलाया। “मैं गिरता हूं। मैं ही खराब हूं। दादी मां कहती हैं मम्मी भी इसलिए चली गईं, क्योंकि मैं बचपन से मुश्किल था।”

मीरा ने आंखें बंद कर लीं।

विक्रम फुसफुसाया, “झूठ है।”

आरव ने पहली बार मीरा को देखा।

“आप मेरी मम्मी को जानती हो?”

कमरा चुप हो गया।

मीरा उसके पास बैठी। “मैं ही हूं, बेटा।”

आरव बहुत देर तक उसे देखता रहा। फिर बोला, “लेकिन दादी मां ने कहा था आपने पैसे लेकर मुझे बेच दिया।”

मीरा का दिल फट गया।

“नहीं। मुझे तुमसे अलग किया गया था।”

आरव ने अपनी छोटी उंगलियां उसके दुपट्टे में फंसा दीं।

“तो आप मुझे लेने आई थीं?”

मीरा रो पड़ी। “हर दिन।”

सुबह सरकारी अस्पताल की रिपोर्ट ने सब साफ कर दिया—पुराना फ्रैक्चर, कुपोषण, बार-बार चोट और डर से जुड़ा ट्रॉमा।

तभी दरवाज़ा खुला।

सावित्री देवी अंदर आईं।

“नाटक खत्म। बच्चा घर चलेगा।”

आरव ने चीखकर मीरा को पकड़ लिया।

और विक्रम पहली बार अपनी दादी के सामने खड़ा हो गया।

“आज कोई उसे छूकर दिखाए।”

PART 3

सावित्री देवी ने विक्रम को ऐसे देखा जैसे उसने पूरे खानदान को चौराहे पर नंगा कर दिया हो। सफेद सिल्क की साड़ी, मोतियों की माला, हाथ में चांदी की मूठ वाली छड़ी और चेहरे पर वही पुराना घमंड—मानो अस्पताल का कमरा भी उनके आदेश से झुक जाएगा।

“तुम्हें होश है किससे बात कर रहे हो?” उन्होंने धीमी लेकिन ठंडी आवाज़ में कहा।

विक्रम ने पहली बार सिर नहीं झुकाया।

“हां। उस औरत से, जिसने मेरे बेटे को 5 साल तक मेरी आंखों से छिपाकर रखा।”

सावित्री देवी हंसीं। “बच्चे गिरते हैं। नौकरों के कमरे में जाकर खेलता होगा। यह लड़की फिर से तुम्हें फंसाना चाहती है। याद रखो, इसने पैसा लिया था।”

मीरा के हाथ कांप उठे, लेकिन उसने आरव को और कसकर पकड़ लिया।

विक्रम ने बैग से फाइल निकाली। “ये वही कागज़ हैं जिन पर आपने मीरा से साइन करवाए थे। ये बैंक ट्रांसफर की कॉपी है। ये आपके वकील के ईमेल हैं। ये पुराने ड्राइवर शंकर काका का बयान है। उन्होंने बताया कि मीरा 9 घंटे हवेली के गेट पर आरव को गोद में लेकर रोती रही थी, और आपने मुझे फोन तक नहीं लगने दिया।”

मीरा ने चौंककर उसे देखा।

“तुम्हें पता चल गया?”

विक्रम की आंखें लाल थीं। “आज रात। जब मैंने सब खोला।”

सावित्री देवी का चेहरा तन गया।

“मैंने परिवार बचाया था।”

“नहीं,” विक्रम गरजा, “आपने अपनी झूठी इज़्ज़त बचाई। और उसके लिए एक बच्चे को यह विश्वास दिलाया कि वह प्यार के लायक नहीं है।”

आरव के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। वह मीरा की गोद में मुंह छिपाकर रोने लगा, मगर बिना आवाज़ के। जैसे उसे रोना भी चोरी से सीखना पड़ा हो।

मीरा ने उसके कान में कहा, “आवाज़ से रो सकते हो, बेटा। यहां कोई सज़ा नहीं देगा।”

वह पहली बार फूटकर रोया।

कमरे के बाहर नर्सें रुक गईं। डॉक्टर भी चुप हो गए। उस रोने में 5 साल का डर था, बंद दरवाज़ों की रातें थीं, भूख थी, चोट थी, और मां के नाम पर बोला गया हर झूठ था।

विक्रम धीरे से घुटनों के बल बैठ गया, मगर दूरी बनाकर, ताकि बच्चा डर न जाए।

“आरव, पापा ने गलती की। बहुत बड़ी गलती। मुझे देखना चाहिए था। पूछना चाहिए था। तुम्हारी चुप्पी को समझना चाहिए था।”

आरव ने सुबकते हुए पूछा, “आप मुझे फिर बड़ी हवेली ले जाओगे?”

“कभी नहीं।”

“अगर मैं दूध गिरा दूं तब भी?”

“तब हम मिलकर साफ करेंगे।”

“अगर मैं रोऊं?”

विक्रम की आवाज़ टूट गई। “तब मैं तुम्हारे पास बैठूंगा।”

सावित्री देवी ने घृणा से कहा, “एक औरत और एक कमजोर बच्चे के लिए तुम मल्होत्रा नाम मिटा दोगे?”

विक्रम उठ खड़ा हुआ। उसने फोन लगाया।

“इंस्पेक्टर राजन? शिकायत दर्ज कीजिए। कमला देवी, हाउसकीपर, और सावित्री देवी मल्होत्रा के खिलाफ। बच्चे पर अत्याचार, गैरकानूनी कैद, मेडिकल नेग्लिजेंस और सबूत छिपाने के लिए।”

सावित्री देवी का चेहरा पहली बार सचमुच डर से बदल गया।

“तुम ऐसा नहीं कर सकते।”

“मैं कर चुका हूं।”

अगले 48 घंटों में मल्होत्रा परिवार की चमकदार दीवारों से सड़ांध बाहर आने लगी। पुलिस जब हवेली पहुंची, तो स्टोर रूम मिला—लोहे की अलमारी, झाड़ू, फिनाइल की बोतलें, टूटा गद्दा और बाहर से लगने वाली कुंडी। एक कोने में बच्चे की छोटी सी शर्ट मिली, जिस पर सूखे खून का दाग था। कमला देवी के कमरे से एक पुरानी डायरी मिली, जिसमें तारीखों के सामने लिखा था: “आज खाना नहीं”, “दादी मां ने कहा रात भर बंद रखना”, “फिर मां को पुकारा”, “बहुत रोया, पर दरवाज़ा नहीं खोला।”

विक्रम ने वह डायरी पढ़ी तो उसकी आंखें सूख गईं। वह चिल्लाया नहीं। बस कुर्सी पर बैठ गया, जैसे शरीर से सारी हड्डियां निकाल ली गई हों।

मीरा ने अस्पताल के गलियारे में उससे कहा, “दर्द दिखाकर कुछ नहीं होगा। अब उसे सुरक्षा चाहिए।”

विक्रम ने सिर उठाया। “मैं सब दूंगा।”

“अपने अपराधबोध के लिए नहीं।”

“आरव के लिए।”

उस दिन से उसने हर सबूत पुलिस को सौंपा। सीसीटीवी फुटेज, कर्मचारियों के बयान, दादी के संदेश, घर के डॉक्टर की झूठी पर्चियां, वह नकली मेडिकल रिपोर्ट जिसमें मीरा को अस्थिर बताया गया था। परिवार के लोग उसके खिलाफ हो गए। चाचा ने कहा, “घर की बात घर में रहती है।”

विक्रम ने जवाब दिया, “जिस घर में बच्चे की चीख बंद कर दी जाए, उस घर की बात अदालत में ही जानी चाहिए।”

मामला मीडिया तक पहुंचा। मल्होत्रा चाइल्ड केयर फाउंडेशन, जो हर साल गरीब बच्चों के नाम पर दान समारोह करता था, जांच के घेरे में आ गया। जिन मंचों पर सावित्री देवी अनाथ बच्चों के लिए भाषण देती थीं, उन्हीं भाषणों के पीछे उनके अपने परनाती का स्टोर रूम छिपा था।

आरव अस्पताल में 4 हफ्ते रहा। उसकी टांग की सर्जरी हुई। संक्रमण रोका गया। पोषण दिया गया। लेकिन शरीर की हड्डी जोड़ना आसान था, भीतर का डर नहीं।

वह रोटी के टुकड़े तकिए के नीचे छिपाता था। पानी मांगने से पहले “सॉरी” कहता था। नर्स कमरे का दरवाज़ा बंद करती तो उसका चेहरा पीला पड़ जाता। रात में नींद टूटती तो वह कहता, “मैंने दही नहीं चुराया। बस सूंघा था।”

हर बार मीरा उसके माथे पर हाथ रखती।

“तुम्हें भूख लग सकती है।”

“तुम डर सकते हो।”

“तुम ना कह सकते हो।”

“तुम्हें प्यार कमाने की जरूरत नहीं है।”

विक्रम रोज आता। पहले आरव उससे बात नहीं करता। वह दूर कुर्सी पर बैठकर डायनासोर की किताब पढ़ता, संतरा छीलता, पानी का गिलास हमेशा उसी जगह रखता, ताकि बच्चा बिना पूछे उठा सके। वह कभी अचानक छूता नहीं। पहले पूछता, “मैं पास बैठ सकता हूं?”

एक रात बारिश फिर खिड़की पर पड़ रही थी। आरव नींद से जागा और धीमे से बोला, “पापा?”

विक्रम तुरंत सीधा हो गया। “हां, बेटा?”

“अगर मैं सो गया तो आप चले जाओगे?”

“नहीं।”

“अगर मैं उठ गया?”

“तब भी यहीं रहूंगा।”

“लाइट बंद मत करना।”

“नहीं करूंगा।”

बस इतना। लेकिन विक्रम के लिए वह किसी अदालत की माफी से बड़ा था।

मीरा उसे देखती रही। उसके भीतर गुस्सा था, शिकायत थी, 5 साल की खाली गोद थी। वह विक्रम को आसानी से माफ नहीं कर सकती थी। लेकिन वह यह भी देख रही थी कि इस बार वह भाग नहीं रहा था।

जब आरव अस्पताल से निकला, मीरा ने सोचा विक्रम उसे किसी सुरक्षित फ्लैट में ले जाएगा। निजी नर्स, गार्ड, ड्राइवर—सब कुछ। पर वह लाजपत नगर के क्लिनिक के सामने आया, हाथ में एक छोटी हरी बैग, आंखों के नीचे गहरी थकान।

“आरव ने पूछा है कि वह मां के पास रह सकता है?”

आरव उसके पीछे खड़ा था, टांग पर सपोर्ट, चेहरे पर डर और उम्मीद दोनों।

मीरा ने हाथ फैलाए। वह लंगड़ाता हुआ उसकी ओर आया और छाती से लग गया।

“मम्मी…”

उस शब्द में घर की पूरी तलाश थी।

विक्रम ने बैग दरवाज़े के पास रख दी। “मैं दावा करने नहीं आया। अगर तुम कहो तो चला जाऊंगा। अगर वह चाहे, तो पास रहूंगा।”

मीरा ने बहुत देर तक उसे देखा।

“यह मेरा घर है। नियम मेरे होंगे।”

“ठीक है।”

“आरव पर कोई ऊंची आवाज़ नहीं।”

“कभी नहीं।”

“उसे छूने से पहले पूछोगे।”

“हां।”

“और अगर तुमने कभी परिवार की इज़्ज़त को उसके दर्द से बड़ा समझा, तो यह दरवाज़ा तुम्हारे लिए हमेशा बंद हो जाएगा।”

विक्रम ने सिर झुका दिया। “अब मेरे पास बचाने लायक सिर्फ वही है।”

ठीक होना किसी फिल्म जैसा नहीं था। न संगीत बजा, न अचानक मुस्कान लौट आई। वह लंबा, थका देने वाला, टूटता-जुड़ता सफर था।

रात 3 बजे आरव चीखकर उठता। मीरा फर्श पर बैठकर उसे समझाती कि दरवाज़ा खुला है। सुबह वह कटोरी धोने भागता। विक्रम कहता, “तुम मेहमान नहीं, घर के बच्चे हो।” बाज़ार में कोई आदमी तेज आवाज़ में बोलता तो आरव मीरा के पीछे छिप जाता। स्कूल का नाम सुनते ही उसे डर लगता कि कहीं वापस न भेज दिया जाए।

फिजियोथेरेपी में वह दर्द से दांत भींचता, पर कहता नहीं। मीरा कहती, “दर्द बोलना कमजोरी नहीं है।” धीरे-धीरे वह “दर्द हो रहा है” कहना सीख गया।

3 महीने बाद क्लिनिक बदल गया। पहले वहां दवा, पुरानी फाइलें और बारिश में भीगे जूतों की गंध होती थी। अब बच्चों के रंगीन पोस्टर, रिहैब मैट, छोटी कुर्सियां, खिलौने और गरम पराठों की खुशबू भी थी। विक्रम ने एक पेडियाट्रिक रिहैब यूनिट के लिए पैसा दिया, मगर मीरा ने शर्त रखी—सबसे पहले गरीब बच्चे, बिना कागज़ वाले बच्चे, और वे बच्चे जिनकी आवाज़ कोई नहीं सुनता।

विक्रम ने बिना बहस साइन कर दिया।

सावित्री देवी को आरव से मिलने पर रोक लगा दी गई। कमला देवी की गिरफ्तारी हुई। अदालत में जब डायरी पढ़ी गई, तो कई पुराने कर्मचारी रो पड़े। 2 नौकरानियों ने गवाही दी कि उन्होंने कई बार रोने की आवाज़ सुनी थी, पर नौकरी जाने के डर से चुप रहीं। जज ने कहा, “चुप्पी भी कभी-कभी हिंसा की साथी बन जाती है।”

सावित्री देवी की प्रतिष्ठा ढह गई। चैरिटी फाउंडेशन बंद हुआ। मल्होत्रा हॉस्पिटल समूह की जांच बैठी। विक्रम ने चेयरमैन पद छोड़ दिया। परिवार ने उसे गद्दार कहा। उसने एक ही जवाब दिया, “मैं देर से सही, अपने बेटे के पक्ष में खड़ा हूं।”

एक बुधवार दोपहर, मीरा क्लिनिक के पीछे दवा मिला रही थी कि बाहर से आरव की आवाज़ आई।

“मम्मी! पापा ने 2 समोसे खा लिए!”

विक्रम पीछे से आया, चेहरे पर पकड़े जाने वाला अपराध।

“1 और आधा था।”

आरव ने हाथ कमर पर रखा। “झूठ। मैंने देखा था। 2।”

मीरा ने बनावटी सख्ती से पूछा, “डॉक्टर ने तेल के बारे में क्या कहा था?”

आरव ने हंसते हुए कहा, “पापा को कंट्रोल सीखना चाहिए।”

विक्रम ने बेटे को देखा। “तुम दोनों बहुत सख्त अदालत हो।”

आरव हंसा। फिर बिना सोचे विक्रम की टांग से लिपट गया।

विक्रम बिल्कुल स्थिर हो गया।

मीरा भी।

आरव को उस क्षण की गहराई नहीं पता थी। उसके लिए यह बस प्यार की छोटी सी हरकत थी। विक्रम के लिए यह पहली बार था जब उसके बेटे ने उसे डर के बिना छुआ था।

उस रात बारिश हुई।

आरव क्लिनिक के कांच वाले दरवाज़े के पास खड़ा होकर पानी देख रहा था।

“मम्मी?”

“हां, बेटा?”

“आपको याद है, मैं कैन लेकर आया था?”

मीरा की आंखें भर आईं। “हां।”

“मुझे लगा था आप मना कर दोगी, क्योंकि मेरे पास पैसे कम थे।”

विक्रम ने पीछे खड़े होकर आंखें बंद कर लीं।

मीरा उसके सामने बैठ गई।

“तुम्हें अब कभी किसी को प्यार या इलाज के पैसे नहीं देने पड़ेंगे।”

“तांबे से भी नहीं?”

“तांबे से भी नहीं।”

“अगर मैं बहुत अच्छा बच्चा नहीं रहा तब भी?”

मीरा ने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया।

“तुम्हें अच्छा बनने के लिए प्यार नहीं मिलेगा। तुम्हें इसलिए प्यार मिलेगा क्योंकि तुम हो।”

आरव ने धीरे से विक्रम की तरफ देखा।

“आप भी?”

विक्रम घुटनों पर बैठ गया।

“मैं भी। तुम हंसो, रोओ, डरो, गलती करो, 100 सवाल पूछो—मैं तुम्हें प्यार करूंगा। क्योंकि तुम मेरे बेटे हो। क्योंकि तुम मेरे हो। आज्ञाकारी होने की वजह से नहीं।”

आरव कुछ देर उसे देखता रहा। फिर उसके गले में बांहें डाल दीं।

“तो अब मुझे बारिश से डर नहीं लगता।”

विक्रम ने उसे बहुत सावधानी से पकड़ा, जैसे कोई टूटी हुई चीज़ नहीं, बल्कि लौट आई हुई रोशनी हो।

कुछ महीने बाद आरव ने पास के सरकारी स्कूल में दाखिला लिया। उसके पास हरे रंग का डायनासोर वाला बैग था, नई जूती थी जिसे वह गंदा करने से डर रहा था, और जेब में एक छोटी सी पर्ची।

स्कूल के गेट पर बच्चों की आवाज़ सुनकर वह ठिठक गया। उसने मीरा का हाथ पकड़ा, फिर विक्रम का।

“आप लेने आओगे?”

मीरा ने माथा चूमा। “हमेशा।”

विक्रम ने उसकी जेब की तरफ इशारा किया। “डर लगे तो पर्ची पढ़ लेना।”

आरव ने पर्ची खोली। उस पर बड़े टेढ़े अक्षरों में लिखा था, “मम्मी और पापा वापस आएंगे।”

“सच?” उसने पूछा।

“सच,” विक्रम ने कहा।

आरव ने 3 कदम स्कूल की ओर बढ़ाए, फिर लौटकर दोनों को गले लगा लिया।

“अब मैं जा सकता हूं।”

मीरा ने उसे बच्चों के बीच जाते देखा। उसकी चाल अभी भी थोड़ी टेढ़ी थी, मगर अब वह टांग घसीट नहीं रहा था। वह चल रहा था। अपने दम पर।

विक्रम ने मीरा का हाथ पकड़ा। उसने हाथ नहीं हटाया।

कभी-कभी न्याय सब कुछ ठीक नहीं करता। कभी माफी अधूरी रहती है। कभी परिवार वैसा नहीं बनता जैसा होना चाहिए था, इसलिए उसे फिर से बनाना पड़ता है—धीरे, डरते हुए, सच के ऊपर।

लेकिन उस सुबह दिल्ली की एक साधारण गली के स्कूल के बाहर मीरा ने जाना कि बच्चे को बड़े घर, खानदानी नाम या करोड़ों की विरासत नहीं चाहिए। उसे चाहिए कोई जो उसे देखे, माने, और लौटकर आए।

और आरव, जो एक रात 7 जंग लगे सिक्कों और 2 कुचली हुई कैन से थोड़ा सा इलाज खरीदने आया था, आखिरकार वह चीज़ पा चुका था जिसे 3 करोड़ रुपये कभी नहीं खरीद सके थे।

घर।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.