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बेटे ने खाने की मेज़ पर हँसकर कहा, “इस घर में मेरी पत्नी भी मुझसे बहस नहीं करती” 😡🏠 मैं बूढ़ी माँ बनकर चुप रही, पर रात 3:00 बजे जो देखा उसने मेरे 14 साल पुराने घाव खोल दिए; मैंने सिर्फ वकील को फोन किया, और अगली सुनवाई में एक सीसीटीवी सबके चेहरे उतारने वाला था।

भाग 1
हर रात 3:00 बजे उसके बेटे के बाथरूम से पानी गिरने की आवाज़ आती थी, और उस रात सरोजिनी देवी ने दरवाज़े की पतली दरार से जो देखा, उसने उन्हें अपने ही घर से सूरज निकलने से पहले भागने पर मजबूर कर दिया।

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गुरुग्राम के सेक्टर 57 की ऊँची सोसाइटी में वह पहली रात थी, जब उनके बेटे अरविंद ने खाने की मेज़ पर हँसते हुए कहा था—

—इस घर में मेरी बात के बिना पंखा भी नहीं चलता, माँ तो दूर, मेरी पत्नी भी मुझसे बहस नहीं करती।

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वाक्य हल्का था, आवाज़ मुलायम थी, लेकिन सरोजिनी देवी के हाथ में रखा पानी का गिलास काँप गया। 68 साल की उम्र में उन्होंने बहुत तरह की आवाज़ें सुनी थीं। ऊँची आवाज़, धीमी धमकी, मीठी बेइज्जती और वह हँसी, जिसके बाद घर की औरतें चुप हो जाती हैं।

वह मेरठ के पास एक कस्बे में 38 साल सरकारी स्कूल में हिंदी पढ़ाकर रिटायर हुई थीं। पति नरेश बाबू को गुज़रे 14 साल हो चुके थे। दुनिया उन्हें सम्मानित आदमी कहती थी, लेकिन सरोजिनी जानती थीं कि सम्मानित चेहरों के पीछे भी ताले लगे कमरे, टूटे गिलास और नीले निशान छिपे हो सकते हैं।

अरविंद ने अचानक ज़िद की थी कि माँ अब अकेली नहीं रहेंगी।

—आपकी उम्र हो गई है, माँ। कब तक उस पुराने मकान में तुलसी और गमलों से बातें करती रहेंगी?

—मैं ठीक हूँ बेटा। पड़ोस में लोग हैं, मंदिर है, मेरी दिनचर्या है।

—दिनचर्या से कोई इंसान बचता नहीं, माँ। कल को कुछ हो गया तो लोग मुझे ही दोष देंगे।

वह पूछ नहीं रहा था। आदेश दे रहा था। ठीक अपने पिता की तरह।

फिर राधिका ने फोन लिया था। उसकी आवाज़ धीमी, मीठी और थकी हुई थी।

—माँजी, आप आ जाइए। सच में घर अच्छा लगेगा। मैं आपके लिए मेथी के पराठे बनाऊँगी, शाम को नीचे पार्क में चलेंगे।

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सरोजिनी ने बेटे के लिए नहीं, राधिका के लिए हाँ की थी।

राधिका 31 साल की थी। कभी जयपुर के एक निजी स्कूल में संगीत पढ़ाती थी, पर शादी के बाद अरविंद ने कह दिया था कि उसकी नौकरी घर की इज्जत से छोटी है। वह अब दिन भर महँगे फ्लैट की चमक सँभालती, अरविंद की कमीज़ें प्रेस करती, उसकी चाय सही तापमान पर रखती और हर वाक्य से पहले उसके चेहरे का रंग पढ़ती।

फ्लैट बाहर से स्वर्ग जैसा था। काँच की बालकनी, सफेद सोफ़े, चमकदार रसोई, दीवारों पर महँगी पेंटिंगें, पूजा के कोने में चाँदी का दिया। लेकिन घर में एक अजीब चुप्पी थी, जैसे हर चीज़ बोलना चाहती हो पर डरती हो।

पहले ही दिन सरोजिनी ने देखा कि राधिका गर्मी में भी लंबी बाँहों वाला कुर्ता पहने थी। चाय रखते समय उसकी कलाई काँपी। अरविंद ने बस आँख उठाई, और वह तुरंत बोल पड़ी—

—माफ़ कीजिए, चीनी शायद थोड़ी कम है। अभी ठीक कर देती हूँ।

अरविंद ने माँ की तरफ देखकर मुस्कुराया।

—देखा माँ, मैंने इसे परफेक्शन सिखा दिया है। शादी के बाद औरत को ढलना पड़ता है।

सरोजिनी का मन किया कहें कि औरत मिट्टी नहीं होती जिसे चाक पर घुमाकर कोई भी आकार दे दे, पर वह चुप रहीं। उम्र ने उन्हें शब्दों का वजन सिखा दिया था, और डर ने चुप्पी की कीमत।

रात को 3:00 बजे पहली बार पानी चला।

तेज़, ठंडा, लगातार।

सरोजिनी की नींद खुल गई। कमरे की घड़ी नीली रोशनी में चमक रही थी। बाहर गलियारे में हल्की रोशनी थी। पानी करीब 20 मिनट तक गिरता रहा। फिर कोई दबी हुई सिसकी आई। वह उठीं, पर फिर बैठ गईं। खुद को समझाया कि शायद अरविंद देर तक काम करता होगा। शायद नहाकर तनाव कम करता होगा। बड़े शहरों में लोग अजीब दिनचर्या रखते हैं।

सुबह उन्होंने धीरे से पूछा—

—बेटा, रात को तबीयत तो ठीक थी? 3:00 बजे बाथरूम चल रहा था।

अरविंद अख़बार पढ़ते हुए बोला—

—ऑफिस का तनाव है माँ। कभी-कभी ठंडे पानी से नहा लेता हूँ।

राधिका ने कटोरी गिरा दी। स्टील की आवाज़ मेज़ पर ऐसे गूँजी जैसे किसी ने सच को धक्का दे दिया हो।

—हाँ माँजी, काम बहुत रहता है इन्हें। आप चिंता मत कीजिए।

पर सरोजिनी ने उस “आप चिंता मत कीजिए” में वही काँपती हुई प्रार्थना सुनी, जो वह खुद कभी अपनी सास से कहती थीं।

अगली 2 रातें शांत रहीं। तीसरी रात फिर वही आवाज़ आई।

3:00 बजे।

तेज़ पानी।

फिर अरविंद की आवाज़।

—जब मैं बोलता हूँ, तो बीच में बोलने की हिम्मत कैसे हुई?

सरोजिनी का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया। वह धीरे-धीरे उठीं। घुटनों में दर्द था, पर डर उससे पुराना था। वह नंगे पाँव गलियारे में गईं। बाथरूम का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं था। भीतर से सफेद रोशनी बाहर गिर रही थी।

उन्होंने दरार से देखा।

राधिका पूरे कपड़ों में शॉवर के नीचे खड़ी थी। उसका गुलाबी सूट भीगकर शरीर से चिपक गया था। बाल चेहरे पर चिपके थे। होंठ नीले पड़ रहे थे। अरविंद ने उसके बालों को मुट्ठी में पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ से उसकी ठुड्डी ऊपर कर रखी थी।

—आँख में आँख डालकर बोलो। फिर कहो कि तुम अपने मायके जाओगी।

राधिका काँपती हुई बोली—

—मुझे बस 2 दिन माँ के पास जाना था। पापा की तबीयत—

अरविंद ने पानी और तेज़ कर दिया।

—मेरी इजाज़त के बिना तुम साँस भी नहीं लोगी।

सरोजिनी के भीतर 30 साल पुराना कमरा खुल गया। उन्हें नरेश बाबू का चेहरा दिखा। वही ठंडी आँखें। वही अधिकार। वही वाक्य—“मेरी पत्नी हो, मेरी चीज़ हो।”

वह दरवाज़ा खोलना चाहती थीं। चीखना चाहती थीं। बेटे का हाथ पकड़कर अलग करना चाहती थीं। लेकिन उनके पैरों में पुरानी बेड़ियाँ लौट आईं। वह पीछे हट गईं। कमरे में लौटीं। मुँह पर आँचल रखकर रोती रहीं, ताकि कोई आवाज़ बाहर न जाए।

सुबह 5:30 बजे उन्होंने छोटा बैग उठाया। कुछ कपड़े, दवाई, चश्मा, बैंक की पासबुक। उन्होंने रिसेप्शन पर फोन करके टैक्सी बुलवाई। अरविंद और राधिका सो रहे थे, या शायद कोई सो नहीं रहा था।

दरवाज़ा बंद करने से पहले वह रसोई की ओर मुड़ीं। राधिका वहाँ खड़ी थी। आँखें सूजी हुईं, माथे के पास हल्का नीला निशान, बाल अभी भी गीले। वह मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी।

—माँजी, चाय बना दूँ?

सरोजिनी का दिल फट गया।

वह उसके पास गईं। उसके सिर पर हाथ रखा। कुछ कहना चाहा, पर गला बंद हो गया।

—मैं थोड़े दिन आश्रय विहार जा रही हूँ। बुज़ुर्गों वाला निवास है। आराम करूँगी।

राधिका ने बस इतना पूछा—

—आप मुझे छोड़कर जा रही हैं?

यह सवाल नहीं था। यह डूबती हुई लड़की की उँगलियों से छूटती नाव थी।

सरोजिनी ने आँसू रोकते हुए कहा—

—नहीं बेटी। अभी नहीं समझोगी। पर मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा रही।

राधिका ने कुछ नहीं कहा। लेकिन उसकी आँखों में पहली बार डर से ज़्यादा उम्मीद थी।

सरोजिनी लिफ्ट में उतरीं, टैक्सी में बैठीं और सूरज उगने से पहले उस चमकदार कैदखाने से बाहर निकल गईं। पर रास्ते भर उन्हें बाथरूम का पानी सुनाई देता रहा।

और उन्हें पता था, अब चुप रहना पाप होगा।

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भाग 2

आश्रय विहार नाम से वह जगह शांत लगती थी—नीम के पेड़, सुबह की प्रार्थना, डॉक्टर की नियमित जाँच और बरामदे में बैठी बुज़ुर्ग औरतें, जो अपने बच्चों की व्यस्तता को मजबूरी कहकर खुद को समझाती रहती थीं। लेकिन सरोजिनी के लिए वह शांति भी सज़ा थी, क्योंकि हर रात 3:00 बजे उनकी आँख खुल जाती और उन्हें भीगी हुई राधिका दिखती। वहीं उनकी मुलाकात पुरानी सहकर्मी निर्मला से हुई, जिसकी बेटी भी एक हिंसक पति से बचकर निकली थी। निर्मला ने बताया कि समाज रोती हुई औरत से सबूत माँगता है, और मारने वाले आदमी से चरित्र प्रमाणपत्र। उसी ने सरोजिनी को वकील अदिति राव से मिलवाया, जो घरेलू हिंसा के मामलों में काम करती थी। अदिति ने साफ कहा कि राधिका को बचाना है तो जल्दबाज़ी नहीं, जाल काटना होगा—ऑडियो, चोटों की तस्वीरें, बैंक खाते, डॉक्टर की पर्ची, धमकियों के संदेश और सुरक्षित जगह। 5 दिन बाद राधिका आश्रय विहार आई। उसने हल्का मेकअप लगाया था, पर गाल के पास छिपा निशान बोल रहा था। सरोजिनी ने उसका हाथ पकड़ा और बहुत धीरे कहा कि उन्होंने उस रात सब देखा था। राधिका पहले पत्थर जैसी हो गई, फिर ऐसे टूटकर रोई जैसे बरसों से गला दबाकर रोना सीख गई हो। उसने बताया कि अरविंद ने उसका फोन ट्रैक करवा रखा है, मायके वालों से बात करने पर गालियाँ देता है, पैसे नहीं देता, और धमकी देता है कि अगर उसने घर छोड़ा तो वह उसे पागल साबित कर देगा। सरोजिनी ने पहली बार अपने अतीत का सच खोला और कहा कि सहना परिवार बचाना नहीं, अत्याचार को ताकत देना है। अगले 12 दिन राधिका ने चुपचाप सबूत जुटाए। उसने फोन में छिपाकर रिकॉर्डिंग की, नीले निशानों की तस्वीरें लीं, डॉक्टर से पुरानी चोटों का विवरण लिखवाया और अरविंद की धमकियों के स्क्रीनशॉट अदिति को भेजे। फिर 14वीं रात उसने संदेश भेजा कि आज वह तलाक की बात करेगी। रात 10:26 पर सरोजिनी का फोन बजा। दूसरी तरफ राधिका की टूटी आवाज़ थी, फिर तेज़ थप्पड़ की आवाज़, फिर अरविंद गरजा कि किसे फोन किया है। कॉल कट गई। 11:03 पर अरविंद ने खुद फोन किया और बहुत शांत आवाज़ में कहा कि बूढ़ी औरत ने अगर फिर बीच में टाँग अड़ाई, तो राधिका सुबह तक किसी को पहचानने लायक नहीं बचेगी।

भाग 3

सरोजिनी के हाथ से फोन गिरते-गिरते बचा। 68 साल की उम्र में उन्होंने बहुत भय झेला था, लेकिन उस क्षण डर से बड़ा कुछ जागा—गुस्सा। वह गुस्सा, जो किसी माँ को अपने बेटे से भी सवाल पूछने की ताकत देता है।

उन्होंने तुरंत वकील अदिति राव को फोन किया।

—बेटी, उसने राधिका को बंद कर दिया है। उसने अभी धमकी दी है। मैं फिर देर नहीं करूँगी।

अदिति की आवाज़ तेज़ और साफ थी।

—112 पर कॉल कीजिए। घरेलू हिंसा, जान का खतरा और गैरकानूनी कैद—तीनों बताइए। मैं महिला हेल्पलाइन और स्थानीय थाने को साथ जोड़ती हूँ। आप अभी आश्रम से बाहर मत निकलिए।

सरोजिनी ने कॉल किया। फिर आश्रय विहार की प्रबंधिका, शांता माथुर, उनके कमरे में आईं। शांता कोई साधारण प्रबंधिका नहीं थीं। उनके पति रिटायर्ड पुलिस अधिकारी थे, और वह वर्षों से बुज़ुर्ग और बेसहारा महिलाओं के मामलों में मदद करती रही थीं।

—दीदी, अब पीछे मत हटिएगा। जो आदमी घर में शेर बनता है, कानून के सामने अक्सर काँपता है।

करीब 45 मिनट बाद पुलिस अरविंद के फ्लैट पर पहुँची। सोसाइटी के गार्ड पहले हिचकिचाए, क्योंकि अरविंद वहाँ की समिति का उपाध्यक्ष था। लेकिन जब महिला कांस्टेबल ने ऊपर से आती चीख सुनी, तो दरवाज़ा तोड़ने की नौबत आ गई।

अरविंद ने दरवाज़ा खोला तो वह सफेद कुर्ते में था, चेहरे पर बनावटी थकान और आवाज़ में वही सभ्य ज़हर।

—ऑफिस का तनाव था मैडम। पत्नी को पैनिक अटैक आया है। मेरी माँ बूढ़ी हैं, उन्हें गलतफहमी हो गई होगी।

तभी राधिका कमरे के भीतर से निकली। उसके होंठ के कोने से खून सूख चुका था। बाँह पर उँगलियों के निशान थे। दुपट्टा गले से आधा खिंचा हुआ था। वह कुछ सेकंड तक सबको देखती रही, फिर महिला कांस्टेबल के सामने बैठ गई और बोली—

—मुझे यहाँ से निकाल दीजिए। नहीं तो मैं बचूँगी नहीं।

अरविंद पहली बार सचमुच घबराया।

—राधिका, सोचकर बोलो। ये सब तुम्हारे खिलाफ जाएगा।

राधिका ने उसकी तरफ देखा। वह वही औरत थी जो कल तक चाय में चीनी कम होने पर माफी माँगती थी। मगर उस रात उसकी आँखों में पानी नहीं, आग थी।

—मेरे खिलाफ इतना कुछ हो चुका है कि अब सच मेरे पक्ष में खड़ा होगा।

पुलिस उसे अस्पताल ले गई। मेडिकल रिपोर्ट बनी। अदिति ने तुरंत संरक्षण आदेश की अर्जी डाली। राधिका को आश्रय विहार के सुरक्षित कमरे में लाया गया, जहाँ सरोजिनी दरवाज़े पर खड़ी थीं।

राधिका ने उन्हें देखते ही रोते हुए कहा—

—माँजी, आपने मुझे बचा लिया।

सरोजिनी ने उसे सीने से लगा लिया।

—मैंने बहुत देर की बेटी। अब देर नहीं करूँगी।

अगले दिन से अरविंद का असली चेहरा बाहर आने लगा। उसने पहले परिवार को फोन किया। बुआ, चाचा, मौसी, सबको बताया कि राधिका मानसिक रूप से अस्थिर है और सरोजिनी को किसी ने भड़का दिया है। फिर उसने राधिका के पिता को धमकाया कि बेटी को वापस भेजो वरना वह उनकी छोटी दुकान बंद करवा देगा। उसने अपने ऑफिस में खबर फैलाई कि पत्नी उसे फँसाकर पैसे लेना चाहती है।

तीसरे दिन वह आश्रय विहार पहुँच गया।

महँगी कार, काला चश्मा, हाथ में फूलों का गुलदस्ता। बाहर से पछतावा, भीतर से वही अहंकार।

सरोजिनी बरामदे में बैठी तुलसी को पानी दे रही थीं।

—माँ, घर चलिए। लोग बातें बना रहे हैं।

—लोग हमेशा बातें बनाते हैं, अरविंद। इस बार सच भी सुनेंगे।

वह पास आकर फुसफुसाया—

—आपको समझ नहीं आ रहा। आप मेरी माँ हैं। आपके बयान से मेरा करियर खत्म हो सकता है।

सरोजिनी ने उसकी आँखों में देखा।

—किस दिन से शुरू हुआ तुम्हारा करियर? उस दिन से जब तुमने अपनी पत्नी को पानी के नीचे खड़ा किया? या उस दिन से जब तुमने उसे पागल साबित करने की तैयारी की?

अरविंद का चेहरा सख्त हो गया।

—आप भूल रही हैं कि मैंने आपको अपने घर लाकर रखा।

—मुझे घर नहीं, गवाही मिली थी वहाँ।

—मैं आपका बेटा हूँ।

यह सुनकर सरोजिनी की आँखें भर आईं। माँ का दिल पत्थर नहीं होता। जिसने बच्चे को बुखार में रात भर गोद में रखा हो, वह उसे अचानक पराया नहीं कह सकती। मगर कभी-कभी माँ होने का मतलब बेटे की रक्षा नहीं, उसके अपराध का नाम लेना होता है।

—तुम मेरे बेटे थे जब मैंने तुम्हें चलना सिखाया था। तुम मेरे बेटे थे जब मैंने अपनी साड़ी बेचकर तुम्हारी कोचिंग की फीस भरी थी। लेकिन जिस रात मैंने तुम्हें राधिका के बाल पकड़कर पानी के नीचे दबाते देखा, उस रात मैंने अपने पति का भूत तुम्हारे चेहरे पर देखा। मैं उस भूत को फिर घर नहीं दूँगी।

अरविंद ने दाँत भींचे।

—अगर आपने अदालत में कुछ कहा, तो मैं आपको भी दिमागी तौर पर अस्थिर साबित कर दूँगा। आपकी उम्र है, आपकी दवाइयाँ हैं, आपके पुराने दुख हैं। कोई आपकी बात नहीं मानेगा।

सरोजिनी ने बहुत शांत होकर कहा—

—इस बार मेरी बात अकेली नहीं है।

केस अदालत पहुँचा तो अरविंद ने वही किया जिसकी उम्मीद थी। उसके वकीलों ने राधिका को नाटकबाज़ कहा। कहा कि वह बच्चा न होने के तनाव में झूठ बोल रही है। कहा कि सरोजिनी अपने बेटे से नाराज़ होकर बहू के पक्ष में खड़ी हो गई हैं। उन्होंने राधिका की पुरानी चिंता की दवाई को मानसिक बीमारी का प्रमाण बनाने की कोशिश की।

राधिका कटघरे में काँप रही थी। उसके हाथ में सरोजिनी की दी हुई छोटी रुद्राक्ष माला थी। वह बार-बार उसे दबा रही थी।

अरविंद अदालत में सफेद शर्ट पहनकर आया था। वह दुखी पति की तरह बैठा था। कभी आँखें बंद करता, कभी सिर झुकाता। बाहर पत्रकार भी खड़े थे, क्योंकि मामला एक बड़ी फार्मा कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी से जुड़ चुका था।

अदिति ने पहले ऑडियो चलाए। उनमें अरविंद की आवाज़ थी—

—तुम मेरे बिना कुछ नहीं हो।

—मैं तुम्हें ऐसी हालत में छोड़ूँगा कि तुम्हारे माँ-बाप भी पहचानने से मना कर देंगे।

—मेरे घर से बाहर जाने की सोचना भी मत।

अरविंद के वकील बोले कि रिकॉर्डिंग अधूरी है।

फिर चोटों की तस्वीरें दिखाई गईं। वे बोले कि गिरने से भी निशान आ सकते हैं।

फिर मेडिकल रिपोर्ट रखी गई। वे बोले कि चोट किसने दी, यह रिपोर्ट नहीं बताती।

राधिका का चेहरा बुझता जा रहा था। सरोजिनी ने पीछे से उसे देखा और उनका दिल काँप गया। क्या सच फिर कागज़ों में हार जाएगा?

तभी अदिति खड़ी हुईं।

—माननीय अदालत, हमारे पास एक और साक्ष्य है, जो कल रात प्राप्त हुआ है।

पूरा कमरा चुप हो गया।

वह साक्ष्य सोसाइटी की लिफ्ट लॉबी का सीसीटीवी था। लेकिन यह सिर्फ वह रात नहीं दिखा रहा था जब पुलिस आई थी। सोसाइटी के पुराने तकनीशियन ने, जिसे अरविंद ने कभी सबके सामने थप्पड़ मारा था, अदिति को 3 महीनों की क्लाउड बैकअप कॉपी भेजी थी। अरविंद ने समझा था कि कैमरे सिर्फ प्रवेश द्वार पर हैं। उसे पता नहीं था कि लिफ्ट लॉबी के कोने में नया कैमरा लगा था।

वीडियो चला।

रात 3:04।

अरविंद राधिका को गलियारे से खींचकर वापस फ्लैट में ले जा रहा था।

रात 3:17।

राधिका भीगे कपड़ों में दरवाज़े के पास घुटनों के बल बैठी थी और अरविंद उसके ऊपर झुककर कह रहा था—

—रोना बंद करो, वरना अगली बार पानी नहीं, आग होगी।

फिर 14वीं रात का वीडियो आया।

राधिका फोन लेकर दरवाज़े की ओर भागती है। अरविंद पीछे से पकड़ता है। फोन छीनता है। उसका सिर दीवार से टकराता है। फिर वह दरवाज़ा अंदर से बंद कर देता है।

अदालत में किसी ने साँस तक नहीं ली।

अरविंद का चेहरा सफेद पड़ गया। उसके वकील ने कागज़ों में नज़रें गड़ा लीं।

फिर आखिरी वीडियो चला, जो सबसे बड़ा मोड़ था। उसी लॉबी में अरविंद अपने ड्राइवर से कह रहा था—

—कल डॉक्टर वाला कागज़ तैयार हो जाएगा। उसमें लिखवा देना कि राधिका भ्रम देखती है। पागल साबित कर दूँगा तो सब खत्म।

अब अदालत में मामला पति-पत्नी की बहस नहीं था। यह हिंसा, धमकी, फर्जी दस्तावेज़ और साजिश का मामला बन चुका था।

जज ने अरविंद की तरफ देखा।

—आपकी चुप्पी भी रिकॉर्ड हो रही है, श्री अरविंद।

उस दिन अंतरिम सुरक्षा आदेश मजबूत हुआ। अरविंद पर आपराधिक मामला दर्ज हुआ। कंपनी ने उसे निलंबित कर दिया। सोसाइटी समिति से उसका नाम हट गया। जो लोग कल तक उसे आदर्श बेटा और सफल पति कहते थे, वे अब सिर झुकाकर निकलते थे।

महीनों की कानूनी लड़ाई आसान नहीं थी। राधिका कई बार टूटती। कभी रात में नींद से चीखकर उठती। कभी पानी की आवाज़ सुनते ही बाथरूम का नल बंद कर देती। कभी सोचती कि वापस चली जाए, क्योंकि समाज अकेली औरत को हर मोड़ पर सवाल देता है।

सरोजिनी हर बार उसके साथ बैठतीं।

—डर वापस बुलाता है बेटी, लेकिन आत्मा आगे धकेलती है।

राधिका ने धीरे-धीरे अपने जीवन के छोटे टुकड़े वापस जोड़े। उसने संगीत फिर उठाया। पहले आश्रय विहार की महिलाओं को भजन सिखाए। फिर बच्चों को ऑनलाइन संगीत की कक्षाएँ देने लगी। उसकी आवाज़, जो कभी घर में दबा दी गई थी, फिर खुलने लगी।

तलाक का आदेश आया तो राधिका ने कोई जश्न नहीं मनाया। उसे कानूनी सुरक्षा, भरण-पोषण, साझा संपत्ति का हिस्सा और स्वतंत्र रहने का अधिकार मिला। अरविंद को अनिवार्य काउंसलिंग, कानूनी निगरानी और मामले की सुनवाई तक राधिका से दूर रहने का आदेश मिला। पर कागज़ पर जीत और दिल की मुक्ति में फर्क था।

उस शाम राधिका ने सरोजिनी के सामने चाय रखी।

—माँजी, मुझे डर लगता है कि मैं फिर कभी सामान्य नहीं हो पाऊँगी।

सरोजिनी ने कप उठाया।

—सामान्य होना जरूरी नहीं। जिंदा, स्वतंत्र और सम्मानित होना जरूरी है।

कुछ सप्ताह बाद राधिका डॉक्टर के पास गई। वह कई दिनों से कमजोर महसूस कर रही थी। सरोजिनी बाहर बैठी माला फेर रही थीं। जब राधिका बाहर आई, उसके चेहरे पर डर, अविश्वास और आँसू साथ थे।

—क्या हुआ बेटी?

राधिका ने काँपते हाथ से रिपोर्ट बढ़ाई।

—मैं 3 महीने की गर्भवती हूँ।

सरोजिनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह खुशी और डर के बीच अटक गईं। अरविंद ने शादी के वर्षों में राधिका को “बाँझ”, “अधूरी” और “नकली औरत” कहकर तोड़ा था। अब उसी अंधेरे से एक जीवन निकल रहा था।

राधिका ने पेट पर हाथ रखा।

—यह बच्चा किसी शादी को बचाने नहीं आएगा, माँजी। यह डर से बाहर जन्म लेगा।

सरोजिनी ने उसे बाँहों में भर लिया।

—हाँ बेटी। यह बच्चा आवाज़ में जन्म लेगा, चुप्पी में नहीं।

खबर किसी रिश्तेदार के रास्ते अरविंद तक पहुँची। उसके कॉल आने लगे। पहले गुस्सा, फिर मिन्नत, फिर अधिकार।

—माँ, उससे कहो फोन उठाए। वह मेरा बच्चा है।

सरोजिनी ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर बोलीं—

—बच्चा खून से पहले सुरक्षा माँगता है। जिस स्त्री को तुमने उस बच्चे के साथ पीटा, उससे पिता होने का अधिकार मत माँगो। अधिकार पहले इंसान बनकर कमाया जाता है।

—मैं बदल गया हूँ माँ।

—जो आदमी सच सामने आने के बाद बदलता है, वह पश्चाताप से नहीं, डर से बदलता है।

उन्होंने फोन काट दिया।

राधिका ने नंबर ब्लॉक कर दिया। अदालत ने भी स्पष्ट आदेश दिया कि कोई संपर्क सीधे नहीं होगा।

6 महीने बाद एक बरसाती रात, दिल्ली के एक अस्पताल में बच्ची पैदा हुई। बाहर बादल गरज रहे थे, पर कमरे में एक अजीब शांति थी। बच्ची ने रोते ही अपनी छोटी मुट्ठी बंद कर ली, जैसे दुनिया से कह रही हो कि वह खाली हाथ नहीं आई।

राधिका ने उसका नाम रखा—आशा।

सरोजिनी ने जब उसे पहली बार गोद में लिया, तो उनकी बूढ़ी आँखों से आँसू टपक पड़े। उन्हें लगा, जैसे उनके भीतर बरसों से जमा डर में पहली बार कोई दीपक जला है।

राधिका ने कमजोर आवाज़ में कहा—

—माँजी, मेरी माँ बहुत पहले चली गई थीं। उस दिन बाथरूम से मुझे आप ही ने बाहर निकाला था। क्या मैं आपको सच में माँ कह सकती हूँ?

सरोजिनी ने बच्ची के माथे को चूमा।

—मैंने एक बेटा खोया है, क्योंकि वह ज़ुल्म का वारिस बन गया। लेकिन भगवान ने मुझे एक बेटी और एक नातिन लौटा दी।

राधिका रोई। सरोजिनी भी रोईं। उस रोने में शर्म नहीं थी। वह रोना साफ था, जैसे कई सालों बाद किसी बंद कमरे की खिड़की खुली हो।

समय के साथ राधिका ने एक छोटा संगीत केंद्र खोला। नाम रखा—“आशा स्वर”। वहाँ वह लड़कियों को गाना सिखाती, और हर महीने 1 दिन ऐसी महिलाओं के लिए मुफ्त सत्र रखती जो हिंसा से निकल रही थीं। सरोजिनी आश्रय विहार में ही रहीं, क्योंकि वहाँ अब उन्हें कैद नहीं, समुदाय मिला था। लेकिन हर रविवार वह राधिका और आशा के घर जातीं। साथ में पराठे बनते, पुराने गाने चलते, और आशा अपने छोटे हाथों से सरोजिनी की ऐनक खींचकर हँसती।

कभी-कभी आज भी सरोजिनी की नींद रात 3:00 बजे खुल जाती है। शरीर पुराने डर की घड़ी जल्दी नहीं भूलता। वह उठकर पानी पीती हैं, खिड़की से बाहर देखती हैं और कुछ देर तक सुनती रहती हैं।

अब उन्हें किसी बंद बाथरूम से गिरता ठंडा पानी नहीं सुनाई देता।

अब उन्हें दूसरे कमरे से आशा की नींद भरी किलकारी सुनाई देती है।

और हर बार वह मन ही मन कहती हैं कि परिवार वह नहीं, जो हिंसा छिपाकर नाम बचाए। परिवार वह है, जो सच बोलकर किसी की जान बचाए।

क्योंकि कभी-कभी एक बूढ़ी माँ को अपने बेटे के खिलाफ खड़ा होना पड़ता है, ताकि किसी और की बेटी जिंदा रह सके।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.