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बेटी के 6वें जन्मदिन पर दादी-दादा ने लाल रिबन वाला टेडी भेजा, बच्ची ने उसे गले लगाकर कहा, “माँ, इसकी आँख मुझे देख रही है,” बहू ने शोर नहीं मचाया, बस मोबाइल निकाला, सिलाई की तस्वीर ली और 3 दिन बाद पुलिस को खिलौने के अंदर छिपी चीज़ ने पूरे खानदान की नींव हिला दी।

PART 1

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6वें जन्मदिन पर तारा ने जैसे ही दादा-दादी का भेजा हुआ भूरा टेडी सीने से लगाया, उसका चेहरा बुझ गया और वह डरकर फुसफुसाई, “मम्मा… इसकी आँख मुझे देख रही है।”

दिल्ली के लक्ष्मी नगर वाले फ्लैट में उस शाम रंग-बिरंगे गुब्बारे छत से झूल रहे थे, मेज पर गुलाब जामुन, समोसे और चॉकलेट केक रखा था, और 7 बच्चे कमरे में ऐसे भाग रहे थे जैसे पूरा घर मेले में बदल गया हो। मीरा ने सुबह से रसोई और सजावट में खुद को झोंक दिया था, क्योंकि वह चाहती थी कि तारा को कम-से-कम आज के दिन किसी तनाव की आहट न मिले।

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लेकिन वह डिब्बा दरवाज़े पर आते ही उसके पेट में अजीब-सा दर्द उठ गया था।

डिब्बे पर लखनऊ का पता था। भेजने वालों के नाम थे—सविता और महेंद्र अवस्थी। यानी रोहन के माता-पिता।

8 महीने से रोहन अपने माता-पिता से लगभग बात नहीं कर रहा था। कारण सिर्फ पारिवारिक तकरार नहीं था। सविता देवी ने एक दिन तारा के स्कूल जाकर रिसेप्शन पर कह दिया था कि वह बच्ची को लेने आई हैं, क्योंकि “उसकी माँ मानसिक रूप से ठीक नहीं रहती।” स्कूल ने तुरंत मीरा को फोन किया था। मीरा काँपती हुई पहुँची, तो सविता सबके सामने रोने लगीं—“बहू ने बेटे को छीन लिया, अब पोती भी छीन रही है।”

उस दिन के बाद से रोहन और मीरा ने स्कूल में साफ लिखवा दिया था कि तारा को कोई और नहीं ले जा सकता।

पर जन्मदिन पर आया पैकेट तारा देख चुकी थी। उसने चमकती आँखों से पूछा था, “मम्मा, खोल लूँ?”

रोहन ने मीरा की तरफ देखा, पर कुछ नहीं बोला। वही चुप्पी, जो वह हमेशा अपनी माँ के नाम पर ओढ़ लेता था।

तारा ने सुनहरा कागज़ फाड़ा। अंदर नरम भूरा टेडी था, गर्दन पर लाल रिबन। कार्ड पर सविता की साफ, बनावटी लिखावट थी—“हमारी राजकुमारी तारा के लिए, दादी-दादा का बहुत सारा प्यार।”

तारा ने टेडी को गले लगाया, फिर अचानक उसे दूर कर दिया।

“मम्मा… इसकी बाईं आँख हिलती है।”

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मीरा ने खिलौना हाथ में लिया। दाईं आँख साधारण काली चमकदार थी, लेकिन बाईं आँख के बीचोंबीच एक बहुत छोटा गोल बिंदु था—इतना गहरा कि खरोंच नहीं लग रहा था। उसने टेडी को रोशनी की तरफ किया। फिर दूर किया। फिर पास लाकर देखा।

उसकी रीढ़ बर्फ हो गई।

“तारा, पापा के साथ मोमबत्तियाँ लगाओ बेटा,” उसने आवाज़ सँभालते हुए कहा।

रोहन पास आया। “क्या हुआ?”

मीरा ने जवाब नहीं दिया। वह टेडी लेकर कमरे में गई, दरवाज़ा बंद किया और पर्दे गिरा दिए। अँधेरे में बाईं आँख के भीतर बहुत हल्की-सी नीली चमक दिखाई दी।

रोहन के होंठ सफेद पड़ गए।

“नहीं… माँ ऐसा नहीं कर सकती…”

मीरा ने टेडी की पीठ दबाई। सिलाई के नीचे एक छोटी सख्त चौकोर चीज़ छिपी थी।

“तुम्हारी माँ ने हमारी बेटी को यह भेजा है,” मीरा ने धीमे, लेकिन टूटे हुए स्वर में कहा।

नीचे बच्चे “हैप्पी बर्थडे” गा रहे थे। ऊपर, उनके घर की शांति अपराध में बदल चुकी थी।

PART 2

मीरा ने टेडी नहीं फाड़ा। उसने तस्वीरें लीं, वीडियो बनाया, कार्ड और डिब्बा अलग रख दिया। फिर उसने अपने भाई अर्जुन को फोन किया, जो पहले साइबर अपराध शाखा में तकनीकी सलाहकार रह चुका था।

अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा, “इसे खोलना मत। बच्ची से दूर रखो। मैं सुबह आ रहा हूँ।”

रात भर रोहन घर के हर कोने को देखता रहा—खिड़कियाँ, दरवाज़ा, तारा की नाइट लाइट, दीवार घड़ी, पुराने उपहार। मीरा तारा के कमरे के बाहर बैठी रही। उसे लग रहा था जैसे बंद अलमारी में रखा टेडी अब भी साँस ले रहा हो।

सुबह 8 बजे अर्जुन एक विशेषज्ञ महिला, नायरा, को साथ लाया। तारा नानी के घर भेज दी गई थी।

रसोई की मेज पर टेडी रखा गया। नायरा ने सावधानी से सिलाई काटी। रुई के भीतर से छोटा छिपा कैमरा, माइक्रोफोन, पतली बैटरी और मेमोरी कार्ड निकला।

रोहन कुर्सी से उठते ही लड़खड़ा गया।

नायरा ने मेमोरी कार्ड खोला। पहला वीडियो 11 दिन पुराना था।

स्क्रीन पर सविता देवी का लखनऊ वाला रसोईघर दिखा। टेडी मेज पर पड़ा था। महेंद्र की आवाज़ आई, “अगर बात उलटी पड़ गई तो?”

सविता बोलीं, “पोती हमारी है। हमें जानने का हक है कि वह चुड़ैल उसके साथ क्या करती है।”

PART 3

मीरा ने पहली बार महसूस किया कि गुस्सा भी कभी-कभी आवाज़ नहीं निकालता। वह सीधे छाती में जम जाता है और आदमी को पत्थर बना देता है।

रोहन स्क्रीन को देखता रह गया। उसके चेहरे पर ऐसा भाव था जैसे किसी ने उसके बचपन की पूरी इमारत खींचकर गिरा दी हो। सविता का चेहरा वीडियो में साफ दिख रहा था। लाल नेल पॉलिश लगे हाथ टेडी की आँख घुमा रहे थे। फिर वह उसे उठाकर बोलीं, “आवाज़ ठीक आ रही है? अगर मीरा चिल्लाए, तारा रोए, घर गंदा दिखे या रोहन को दबाते हुए दिखे, तो सबूत बन जाएगा।”

महेंद्र ने धीमे कहा, “लेकिन बच्ची के कमरे में रखना…”

सविता ने काट दिया, “बच्ची को बचाना है। अदालत में भावनाएँ नहीं, प्रमाण चलते हैं।”

मीरा का शरीर काँप उठा। “अदालत?”

नायरा ने लैपटॉप बंद नहीं किया। उसने बाकी फाइलें भी खोलीं। एक वीडियो में सविता टेडी को चार्ज कर रही थीं। दूसरे में महेंद्र मोबाइल पर जाँच रहा था कि कैमरा कितनी दूर तक संकेत भेज सकता है। तीसरे में सविता कह रही थीं, “मीरा ने हमारे बेटे को गुलाम बना दिया है। तारा को भी हमसे दूर कर दिया। अब वह औरत बचेगी नहीं।”

रोहन ने अपना माथा पकड़ लिया।

“मैं हमेशा सोचता था माँ बस अधिकार जताती हैं,” उसने फटी आवाज़ में कहा, “पर वह तो हमारी बेटी को हथियार बना रही थीं।”

अर्जुन ने गंभीर होकर कहा, “अब यह पारिवारिक मामला नहीं रहा। पुलिस में शिकायत करनी होगी।”

उसी दोपहर मीरा और रोहन थाने गए। टेडी, कार्ड, डिब्बा, वीडियो, तस्वीरें—सब जमा हुए। अधिकारी ने उनसे पुराने घटनाक्रम पूछे। स्कूल वाला मामला, सविता के 23 फोन, रोहन को भेजे संदेश, जिनमें वह लिखती थीं—“एक दिन तारा समझेगी कि उसकी असली माँ कौन है,” “बहू को सबक सिखाना पड़ेगा,” “बेटा, अगर तू नहीं जागा तो हम कदम उठाएँगे।”

मीरा ने वह स्कूल रिपोर्ट भी दी, जो उसने डरते-डरते संभालकर रखी थी। उसमें लिखा था कि सविता अवस्थी ने स्कूल प्रशासन पर दबाव बनाया, माँ को अस्थिर बताया और बच्ची को अपने साथ ले जाने की कोशिश की।

3 दिन बाद पुलिस लखनऊ में सविता और महेंद्र के घर पहुँची।

जब दरवाज़ा खुला, सविता रेशमी साड़ी, मोती की माला और माथे पर बड़ी बिंदी लगाए खड़ी थीं। उन्हें देखकर लगता था जैसे वह किसी कथा में जाने को तैयार हों, न कि पूछताछ का सामना करने को।

“जी?” उन्होंने भौंहें सिकोड़कर पूछा।

अधिकारी ने कहा, “एक नाबालिग बच्ची के खिलौने में निगरानी उपकरण छिपाकर भेजने की शिकायत है।”

सविता ने एक पल भी नहीं पूछा—कौन-सा खिलौना?

उन्होंने तुरंत कहा, “मीरा ने भेजा है आपको, है न? वह औरत हमारी इज्जत मिट्टी में मिलाना चाहती है।”

महेंद्र पीछे से निकले। उनका चेहरा राख जैसा था।

तलाशी में उनके अध्ययन-कक्ष से छोटे कैमरे का खाली डिब्बा मिला, रेखांकित निर्देश-पुस्तिका मिली, दूसरा उपकरण अभी पैक हालत में मिला। कंप्यूटर में एक फोल्डर था—“हमारी तारा”।

नाम में ममता थी, अंदर जुनून।

उसमें मीरा के सामाजिक माध्यमों से ली गई तस्वीरें थीं, तारा के स्कूल का पता, बस का समय, उनके फ्लैट की इमारत की तस्वीरें, सोसायटी गेट का वीडियो, और एक दस्तावेज़—“मीरा के विरुद्ध चिंताएँ”।

दस्तावेज़ 9 पन्नों का था।

“मीरा बच्ची को पितृ परिवार से जानबूझकर दूर रखती है।”

“रोहन पर मानसिक नियंत्रण है।”

“मीरा अस्थिर व्यवहार करती है।”

“आवश्यक प्रमाण: रोना, चीखना, घर की अव्यवस्था, बच्ची की थकान, पति-पत्नी का विवाद।”

हर पंक्ति सभ्य शब्दों में लिखी गई थी, लेकिन हर शब्द मीरा को तोड़ने के लिए चुना गया था।

सबसे आखिरी पंक्ति पढ़कर रोहन की उँगलियाँ काँप गईं—

“परिवार न्यायालय में तारा की सुरक्षा हेतु हस्तक्षेप की माँग संभव।”

सुरक्षा।

जिस बच्ची के खिलौने में उन्होंने कैमरा छिपाया था, उसी की सुरक्षा के नाम पर।

मीरा ने रोहन की तरफ देखा। वह कुर्सी पर बैठा था, पर ऐसा लग रहा था जैसे उसके भीतर की सारी उम्र अचानक खड़ी होकर उससे सवाल कर रही हो।

“मैंने तुम्हें कई बार कहा था कि तुम्हारी माँ की बातें सामान्य नहीं हैं,” मीरा बोली।

रोहन ने सिर झुका लिया। “मैं डरता था कि लोग कहेंगे बेटा माँ के खिलाफ हो गया। लेकिन आज समझ आया… मैं चुप रहकर तुम्हारे और तारा के खिलाफ खड़ा था।”

मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ माफियाँ तुरंत जवाब के योग्य नहीं होतीं। पहले उन्हें सच का बोझ उठाना पड़ता है।

पूछताछ में महेंद्र टूट गए। उन्होंने कहा कि सविता कई महीनों से रोती थीं, खाना छोड़ देती थीं, कहती थीं कि बहू ने घर का वंश काट दिया। उन्होंने उपकरण मँगवाया। उन्होंने लगाया। उन्होंने जाँचा। पर यह सब “पोती की भलाई” के लिए था।

सविता ने अलग रास्ता चुना। वह रोईं, सीना पीटा, बोलीं, “मैं दादी हूँ। दादी को पोती की चिंता करने का अधिकार नहीं? बहू ने मेरे बेटे को जादू कर दिया है। मेरे घर की इज्जत चली गई।”

जब अधिकारी ने पूछा, “बच्ची किस खतरे में थी?”

सविता ने कहा, “हमसे दूर हो जाने के खतरे में।”

कमरे में कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।

खतरा हिंसा नहीं था। खतरा उपेक्षा नहीं था। खतरा बीमारी नहीं था।

खतरा यह था कि बच्ची उनके नियंत्रण से बाहर थी।

सबसे कठिन काम तारा को सच बताना था। मीरा उसे झूठ नहीं सिखाना चाहती थी, लेकिन 6 साल की बच्ची को दादा-दादी की साजिश कैसे समझाई जाती?

एक रात, जब बाहर हल्की बारिश हो रही थी और तारा अपनी छोटी रजाई में सिकुड़ी हुई थी, रोहन उसके पास बैठा। मीरा ने उसके सिर पर हाथ रखा।

“बेटा,” मीरा ने कहा, “उस टेडी में एक छिपा हुआ कैमरा था।”

तारा की आँखें फैल गईं। “फिल्मों जैसा?”

“हाँ,” रोहन बोला, “लेकिन यह खेल नहीं था। किसी भी बड़े को बच्चे के खिलौने में ऐसी चीज़ छिपाने का अधिकार नहीं होता।”

तारा ने धीरे से पूछा, “दादी ने किया?”

रोहन का गला भर आया। “दादी-दादा ने बहुत गलत काम किया।”

“क्या मैं बुरी हूँ?”

मीरा की आँखें जल उठीं। “नहीं, मेरी जान। तुमने कुछ नहीं किया। गलती उनकी थी।”

तारा ने कमरे की तरफ देखा—गुड़िया, किताबें, रात की हल्की पीली बत्ती, खिलौनों की टोकरी।

“वे मुझे सोते हुए देखना चाहते थे?”

रोहन ने चेहरा फेर लिया।

मीरा ने बेटी को बाँहों में भर लिया। “अब कोई तुम्हें ऐसे नहीं देखेगा। हम तुम्हारे साथ हैं।”

तारा ने धीरे से कहा, “अब मुझे बिना पूछे कोई गिफ्ट मत खोलने देना।”

6 साल की उम्र में उसने सीख लिया था कि रिबन लगा डिब्बा भी डर बन सकता है।

परिवार में तूफान उठ गया। कुछ रिश्तेदारों ने रोहन को फोन किया।

“माँ से गलती हो गई, पर पुलिस तक बात ले जाना ज़रूरी था?”

“दादी का प्यार थोड़ा ज़्यादा हो गया, बस।”

“बहू ने तुम्हें अपने माँ-बाप से अलग कर दिया।”

रोहन पहले सुनता था। इस बार उसने सिर्फ एक वाक्य दोहराया—

“उन्होंने मेरी बेटी के खिलौने में कैमरा छिपाया था।”

ज्यादातर लोग उसके बाद चुप हो जाते। क्योंकि पूरी बात सुनते ही बहाने छोटे पड़ जाते हैं।

5 हफ्ते बाद अदालत में अंतरिम आदेश आया। सविता और महेंद्र को तारा, मीरा और रोहन से सीधे या परोक्ष संपर्क से रोका गया। स्कूल, घर, सोसायटी, नृत्य कक्षा—कहीं जाने की अनुमति नहीं। उपहार, पत्र, कॉल, संदेश सब प्रतिबंधित। आपराधिक प्रक्रिया अलग जारी रहनी थी।

सविता अदालत में भी रोईं। बाहर निकलते समय उन्होंने रोहन की तरफ हाथ बढ़ाया।

“बेटा, मैं तेरी माँ हूँ।”

इस बार रोहन पीछे नहीं हटा, न झुका। उसने सिर्फ कहा, “माँ होतीं तो मेरी बेटी की निजता नहीं चुरातीं। आपको प्यार नहीं, पहुँच चाहिए थी।”

सविता का चेहरा पहली बार खाली पड़ गया। जैसे कोई संवाद याद न रहा हो।

उसके बाद जीवन तुरंत सामान्य नहीं हुआ। दरवाज़े की कुंडियाँ बदली गईं। स्कूल में नई अनुमति सूची दी गई। तारा की हर गतिविधि पर सुरक्षा निर्देश लगाए गए। मीरा ने पुराने खिलौने जाँचे। रोहन ने पासवर्ड बदले, कैमरे ढूँढ़े, स्मोक अलार्म तक खोला।

मीरा को सबसे ज़्यादा नफरत उस पल से होती जब तारा पूछती—

“मम्मा, यह वाला ठीक है?”

“इसमें कोई आँख तो नहीं?”

“यह किसने भेजा?”

बच्चों का डर बहुत छोटा दिखता है, लेकिन घर की हवा बदल देता है।

रोहन ने सलाहकार से मिलना शुरू किया। पहले उसने कहा, “मुझे बस तनाव संभालना है।” फिर धीरे-धीरे समझा कि उसे 36 साल की अपराध-बोध वाली परवरिश खोलनी है। उसे बचपन से सिखाया गया था—अच्छा बेटा माँ को कभी ना नहीं कहता, पत्नी को समझाता है, माँ की बात टालता नहीं, घर की इज्जत बाहर नहीं ले जाता।

अब वह नई पंक्तियाँ सीख रहा था—

“मेरा परिवार मीरा और तारा भी हैं।”

“चुप रहना भी कभी-कभी अपराध के साथ खड़ा होना है।”

“खून का रिश्ता किसी को चाबी, कैमरा या अधिकार-पत्र नहीं देता।”

मीरा ने उसे तुरंत माफ नहीं किया, पर उसने उसके बदलते कदम देखे। वह हर सुनवाई में उसके साथ खड़ा रहा। हर रिश्तेदार को एक ही बात साफ कही। तारा के सामने कभी सविता का बचाव नहीं किया। कभी यह नहीं कहा कि “दादी ने प्यार में किया।”

क्योंकि वह प्यार नहीं था।

वह कब्ज़ा था।

1 साल बाद तारा का 7वाँ जन्मदिन आया। इस बार उसने घर के नीचे सोसायटी लॉन में पार्टी माँगी। रंगीन पताकाएँ लगीं, साबुन के बुलबुले उड़ रहे थे, बच्चों ने चाट और केक खाया, और तारा ने अपनी पसंद का गीत 12 बार चलवाया।

सविता और महेंद्र को कोई निमंत्रण नहीं था।

यह अनुपस्थिति पहली बार खालीपन नहीं लगी। यह सुरक्षा लगी।

शाम को तारा ने उपहार खोले। रंगों का डिब्बा, ग्रहों की किताब, बालों की क्लिप, एक छोटी गुलाबी साइकिल की घंटी। फिर उसकी सहेली आन्या ने उसे सफेद-नारंगी लोमड़ी वाली मुलायम गुड़िया दी।

तारा ने उसे हाथ में लिया। उसके चेहरे पर मुस्कान आई, फिर रुक गई।

“मम्मा…”

मीरा ने तुरंत उसका हाथ पकड़ा। “साथ में जाँचें?”

तारा ने सिर हिलाया।

रोहन भी पास आ गया। उसने सामान्य आवाज़ में कहा, “पहले आँखें देखते हैं, फिर सिलाई, फिर पेट।”

तीनों ने मिलकर गुड़िया देखी। आँखें साधारण थीं। सिलाई नरम थी। भीतर कोई सख्त चीज़ नहीं थी। बस रुई थी, कपड़ा था, और एक छोटी टेढ़ी पूँछ।

“यह वाली सुरक्षित है,” रोहन ने कहा।

तारा ने पहले उसे हल्के से छुआ। फिर धीरे-धीरे सीने से लगा लिया। कुछ क्षण बाद वह उसी लोमड़ी को बाँहों में दबाए बुलबुलों के बीच भागने लगी। उसके बाल शाम की सुनहरी रोशनी में उड़ रहे थे।

मीरा ने उसे देखा और उसकी आँखें भर आईं। बचपन पूरी तरह वापस नहीं आता। लेकिन कभी-कभी वह घायल पाँव से भी फिर दौड़ना सीख लेता है।

रोहन ने मीरा का हाथ दबाया। “हम ठीक हो जाएँगे।”

मीरा ने दूर हँसती हुई तारा को देखा। “नहीं,” उसने धीरे से कहा, “हम पहले से बेहतर जीना सीखेंगे।”

उस रात तारा लोमड़ी लेकर सोने गई। मीरा उसके पास बैठी तो तारा ने पूछा, “मम्मा, क्या एक दिन मैं गिफ्ट खोलते समय डरूँगी नहीं?”

मीरा ने झूठी जल्दी नहीं दिखाई। उसने बेटी के बाल सहलाए।

“हाँ, बेटा। इसलिए नहीं कि दुनिया में सब अच्छे हैं। इसलिए कि अब तुम अकेली नहीं देखतीं। हम भी तुम्हारे साथ देखते हैं।”

तारा ने आँखें बंद कर लीं। कमरे में अँधेरा शांत था। किसी खिलौने की आँख नहीं चमक रही थी। किसी परदे के पीछे कोई स्क्रीन नहीं थी। किसी दादी का अधिकार उस नींद तक नहीं पहुँच रहा था।

मीरा ने दरवाज़ा धीरे से बंद किया।

उस रात घर में पहली बार सन्नाटा डर जैसा नहीं लगा।

वह स्वतंत्रता जैसा लगा।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.