Posted in

दवा की दुकान पर पूर्व पत्नी ₹14,680 की दवाओं के लिए गिड़गिड़ा रही थी, बच्ची ने कहा, “माँ, मैं बीमार नहीं पड़ूँगी,” वह चुपचाप अपना कार्ड काउंटर पर रखकर बाहर आया, लेकिन अस्पताल की फाइल में माँ के नाम वाली 1 पुरानी स्वीकृति ने पूरे खानदान को हिला दिया।

PART 1

Advertisements

दवा की दुकान में उसने अपनी पूर्व पत्नी को ₹14,680 की दवाइयों के लिए लगभग हाथ जोड़ते देखा, और उसी पल उसकी छोटी बेटी ने बुखार में डूबी आवाज़ में कहा, “माँ, मैं बीमार होना बंद कर दूँगी, बस तुम मत रोना।”

दिल्ली की उस बरसाती शाम में लाजपत नगर की सड़कें पानी से चमक रही थीं। गाड़ियों के शीशों पर गिरती बूँदें रोशनियों को धुँधला कर रही थीं। अर्जुन मल्होत्रा वहाँ सिर्फ इसलिए रुका था क्योंकि उसकी गाड़ी आगे जाम में फँस गई थी। मल्होत्रा इंफ्रास्ट्रक्चर का मालिक, शहर के बड़े लोगों में गिना जाने वाला आदमी, हमेशा महँगे कपड़ों और ठंडे फैसलों के पीछे छिपा रहता था। पर उस दवा की दुकान के भीतर खड़ी औरत को देखते ही उसकी साँस अटक गई।

Advertisements

मीरा शर्मा।

उसकी पूर्व पत्नी।

वही मीरा, जो 3 साल पहले उसके बंगले से अपनी शादी की चूड़ियाँ पूजा की थाली के पास छोड़कर चली गई थी। पीछे सिर्फ एक मुड़ा हुआ कागज़ था—“माफ़ करना, अब और सहने की हिम्मत नहीं।”

अर्जुन ने उसे ढूँढने का दावा किया था। वकीलों से पूछा, नौकरों से पूछा, पुराने परिचितों से पूछा। सबने कहा था, मीरा मिलना नहीं चाहती। धीरे-धीरे उसका दुख घमंड बना, घमंड काम बना, और काम ने उसे ऐसा आदमी बना दिया जिसकी तस्वीर अखबारों में छपती थी, पर आँखों में कोई घर नहीं बचा था।

काउंटर पर मीरा का चेहरा पीला था। उसके हाथ में पुरानी पर्ची काँप रही थी। उसने दवा वाले से धीमे कहा, “आज आधे पैसे ले लीजिए। बाकी शुक्रवार को दे दूँगी। मेरी बच्ची को सुबह से पहले दवा चाहिए।”

दवा वाला असहाय दिख रहा था। “बहनजी, दवाइयाँ, खाँसी की बूंदें, साँस की दवा और जाँच की शीशी मिलाकर ₹14,680 हो रहे हैं। उधार अब मालिक मना कर चुके हैं।”

मीरा ने पर्स खोला। कुछ सिक्के, ₹100 का एक मुड़ा हुआ नोट, मेट्रो का पुराना पत्रक और अस्पताल की पर्चियाँ। वह चीखी नहीं। उसने बस आँखें बंद कीं, जैसे सोच रही हो कि अगला अपमान कहाँ से खरीदा जाए।

उसके पास खड़ी 3 साल से कम उम्र की बच्ची ने गुलाबी चप्पलें पहनी थीं। गाल बुखार से लाल, साँस सीने में अटकी हुई। पर उसकी आँखें… वही गहरी भूरी आँखें, जो अर्जुन की थीं।

अर्जुन आगे बढ़ा। “सारी दवाइयाँ दे दीजिए।”

Advertisements

मीरा जैसे पत्थर हो गई। उसने धीरे से सिर घुमाया। “अर्जुन…”

उसके नाम में 3 साल की राख थी।

अर्जुन ने बच्ची को देखा। “तुम्हारा नाम क्या है?”

बच्ची माँ के आँचल में छिप गई। “तारा।”

मीरा ने उसे तुरंत गोद में उठा लिया। “हम जा रहे हैं।”

“नहीं,” अर्जुन की आवाज़ कठोर निकली।

मीरा की आँखें जल उठीं। “मुझे आदेश देने की गलती फिर मत करना।”

अर्जुन ने अपना काला बैंक पत्रक काउंटर पर रख दिया। “दवाइयाँ, ताप नापने का यंत्र, पट्टियाँ, भाप की दवा, सब दे दीजिए।”

मीरा दाँत भींचकर बोली, “नहीं चाहिए।”

अर्जुन ने तारा को देखा। “मैं यह तुम्हारे लिए नहीं कर रहा।”

मीरा ने दवाइयों का थैला लिया, धन्यवाद भी नहीं कहा, और बारिश में निकल गई। अर्जुन उसके पीछे गया। वह एक सँकरी गली में मुड़ी, जहाँ पुरानी इमारतों की दीवारों से नमी टपकती थी। वह एक छोटी सी इमारत में घुसने लगी, जिसके नीचे कपड़े धोने की दुकान थी।

अर्जुन ने पुकारा, “मीरा… कृपया।”

यह शब्द उसके मुँह से अजनबी लगा। मीरा रुक गई।

“उसकी उम्र कितनी है?”

मीरा का चेहरा बंद दरवाजे जैसा हो गया। “यह मत पूछो।”

“सच बताओ।”

“2 साल 9 महीने।”

अर्जुन के पैरों तले ज़मीन हिल गई। “वह मेरी बेटी है।”

मीरा ने झूठ नहीं बोला। “हाँ।”

“मुझे बताया क्यों नहीं?”

मीरा की हँसी कड़वी थी। “बताया था। तुम्हारे दफ्तर में 7 बार संदेश छोड़े। गर्भ की जाँच की प्रतियाँ भेजीं। 6 महीने के पेट के साथ तुम्हारे घर के बाहर रात तक खड़ी रही।”

अर्जुन की मुट्ठियाँ कस गईं। “मुझे कुछ नहीं मिला।”

मीरा ने उसकी आँखों में देखा। “क्योंकि तुम्हारी माँ ने मिलने नहीं दिया।”

तभी तारा खाँसी से काँप उठी। उसने सीना पकड़कर कहा, “माँ, यहाँ दर्द हो रहा है।”

अर्जुन ने तुरंत दूरभाष निकाला। “अभी अस्पताल चलेंगे।”

इस बार मीरा ने विरोध नहीं किया।

PART 2

अस्पताल के बाल आपात कक्ष में तारा की साँस टूटे बाँसुरी जैसी बज रही थी। मीरा उसके माथे पर गीला कपड़ा रखती रही, और अर्जुन दीवार के पास खड़ा रहा, जैसे उसे बैठने का अधिकार न हो।

एक परिचारिका ने यंत्र लगाया, चिकित्सक ने छाती सुनी। फिर अभिलेख कक्ष की स्त्री ने परदे के पीछे से पूछा, “मीरा शर्मा? बच्ची के उपचार पर निजी पारिवारिक निधि की रोक लगी है।”

मीरा सफेद पड़ गई। “कौन सी रोक?”

अर्जुन ने परदे के पास जाकर पट पर लिखी पंक्ति पढ़ी—

मल्होत्रा परिवार न्यास। स्वीकृति: सविता मल्होत्रा। दिनांक: 14 अप्रैल।

उसका खून जम गया। सविता मल्होत्रा, उसकी माँ, 2 साल पहले मर चुकी थी।

“यह झूठा अभिलेख है,” उसने ठंडी आवाज़ में कहा। “मेरी बेटी का उपचार अभी होगा।”

मीरा तड़पकर बोली, “मेरी बेटी कहने से पहले याद करो, वह किन रातों में बिना पिता के साँस लेती रही।”

अर्जुन ने सिर झुका दिया। “सही कहती हो।”

तभी तारा ने आँखें खोलीं। “आप मेरे पापा हो?”

अर्जुन की आवाज़ टूट गई। “हाँ।”

“तो आप घर पर क्यों नहीं थे?”

उससे पहले कि वह जवाब दे पाता, गलियारे में उसके पुराने पारिवारिक वकील, राघव सूद, दिखाई दिए। मीरा के हाथ काँपने लगे।

राघव ने धीमे कहा, “अर्जुन, यह मामला चुपचाप सुलझाना होगा।”

मीरा फुसफुसाई, “यही आदमी मेरे सारे पत्र लेकर गया था।”

अर्जुन ने पहली बार राघव को ऐसे देखा जैसे किसी साँप को पहचान लिया हो।

PART 3

राघव सूद की सफेद कमीज़, चमकते जूते और संतुलित मुस्कान हमेशा अर्जुन को भरोसे का चेहरा लगते थे। वही आदमी उसकी माँ सविता मल्होत्रा की वसीयत सँभालता था, वही पारिवारिक न्यास के कागज़ देखता था, वही 3 साल तक कहता रहा था कि मीरा ने खुद संबंध तोड़े हैं। पर उस रात अस्पताल के गलियारे में उसका शांत चेहरा अचानक बहुत गंदा दिखने लगा।

अर्जुन ने पूछा, “तुम्हें तारा की चिकित्सा-रोक के बारे में पता था?”

राघव ने चश्मा ठीक किया। “शायद कोई पुराना प्रवेश बचा रह गया होगा। आपकी माँ के जाने के बाद कई व्यवस्था बंद नहीं हुईं।”

“मेरी माँ मर चुकी है। 14 अप्रैल को उसने कुछ स्वीकृत नहीं किया।”

राघव की आँखों में 1 पल की झिझक तैर गई। वही 1 पल अर्जुन के लिए काफी था।

मीरा आगे आई। “जैसे आपने मेरी चिट्ठियाँ पहुँचाईं? जैसे आपने कहा था कि अर्जुन मुझे चरित्रहीन कहता है? जैसे आपने कहा था कि अगर मैंने बच्ची को जन्म दिया तो मल्होत्रा परिवार उसे मुझसे छीन लेगा?”

राघव की आवाज़ सख्त हो गई। “मीरा जी, आप भावनाओं में बात कर रही हैं।”

“नहीं,” मीरा ने काँपते हाथों से अपने थैले से मोटी फाइल निकाली, “मैं प्रमाण में बात कर रही हूँ।”

अर्जुन ने फाइल देखी। पुराने डाक-प्रमाण, गर्भ-जाँच की प्रतियाँ, संदेशों की लिखित प्रतिलिपियाँ, अस्पताल के बिल, और एक छोटा यंत्र जिसमें ध्वनि सुरक्षित थी। मीरा ने उसे चलाया। राघव की आवाज़ स्पष्ट थी—“चुपचाप चली जाइए। बच्चे का नाम मल्होत्रा से जोड़ने की कोशिश की तो आपके पास बच्चा भी नहीं बचेगा।”

गलियारे में खड़े 2 परिचारक भी चुप हो गए।

अर्जुन की आवाज़ धीमी थी, पर उसमें तूफान था। “यह सब किसके कहने पर किया?”

राघव ने होंठ भींचे। “आपकी माँ नहीं चाहती थीं कि वह बच्ची कभी परिवार का हिस्सा बने।”

मीरा की आँखों में आँसू थे, लेकिन पीठ सीधी थी। “और आपकी माँ के मरने के बाद?”

राघव चुप रहा।

अर्जुन समझ गया। “बुआजी।”

उसकी माँ की बड़ी बहन, देवयानी कपूर, परिवार की सबसे पुरानी और सबसे निर्दयी आवाज़। वही जो हर पूजा में कुल की मर्यादा पर प्रवचन देती थी, वही जो गरीब रिश्तेदारों को आशीर्वाद की तरह अपमान देती थी, वही जो न्यास की बैठक में कहती थी कि धन खून से चलता है, दया से नहीं।

अर्जुन ने सुरक्षा प्रमुख को बुलाया। “राघव सूद बाहर जाएगा। वह मेरी बेटी के कमरे के पास फिर दिखाई दिया तो पुलिस को सौंप देना।”

राघव का चेहरा उतर गया। “अर्जुन, सोचकर बोलो। परिवार टूट जाएगा।”

“परिवार उस दिन टूट गया था, जब गर्भवती औरत को दरवाजे से लौटाया गया।”

वह मुड़ा और तारा के कमरे में गया। बच्ची की छोटी उँगली में यंत्र लगा था। उसकी साँस अब भी भारी थी। मीरा उसके सिरहाने बैठी थी, आँखें जागी हुई रातों से सूजी हुईं। अर्जुन ने कमरे की चौखट पकड़ी। इतनी दौलत, इतने बंगले, इतने लोग उसके इशारे पर चलते थे, पर उस पल वह अपनी ही बेटी की खाँसी के सामने खाली खड़ा था।

चिकित्सक ने बताया कि संक्रमण गहरा है, पर समय पर उपचार मिला तो खतरा टल सकता है। मीरा ने पहली बार आँखें बंद कर भगवान का नाम लिया। अर्जुन ने पहली बार मन ही मन कोई सौदा नहीं, सिर्फ प्रार्थना की।

सुबह होने से पहले उसके दूरभाष पर अज्ञात संदेश आया—“बीती बातों को मत खोदो। बच्ची को शांत जीवन चाहिए तो उसे नाम मत दो।”

साथ में एक चित्र था। मीरा की इमारत, तारा उसकी गोद में, पिछली रात का दृश्य। किसी ने उनका पीछा किया था।

मीरा ने चित्र देखा और उसका चेहरा राख हो गया। “वे हमें ढूँढ चुके हैं।”

तभी परिचारिका ने बताया, “नीचे एक बुज़ुर्ग महिला हैं। कह रही हैं, बच्ची परिवार की संपत्ति से जुड़ा मामला है और उन्हें मिलना ही होगा।”

अर्जुन ने पूछा, “नाम?”

“देवयानी कपूर।”

मीरा ने तारा की चादर कसकर पकड़ी। “यही सबके पीछे है।”

अर्जुन नीचे उतरा। उसके साथ 2 सुरक्षाकर्मी थे। स्वागत कक्ष के पास देवयानी कपूर मोती की माला, रेशमी साड़ी और तिरस्कार से भरे चेहरे के साथ खड़ी थीं। उन्हें अस्पताल की गंध से घृणा हो रही थी, बच्ची की बीमारी से नहीं।

“अर्जुन,” उन्होंने कहा, “तुम एक छोटी औरत के चक्कर में पूरा कुल बाजार में नचाने जा रहे हो।”

अर्जुन ने सीधा पूछा, “माँ के नाम से झूठी स्वीकृति किसने डाली?”

देवयानी मुस्कराईं। “सविता होतीं तो यही करतीं। हमने बस उनकी इच्छा पूरी की।”

“मेरी बेटी को दवा से रोकना तुम्हें इच्छा-पूर्ति लगता है?”

“वह बच्ची तुम्हारी बेटी है, यह साबित किसने किया? एक औरत अचानक लौटती है, जब उसे पता चलता है कि न्यास की शर्त में वारिस को हिस्सा मिलेगा। क्या यह संयोग है?”

अर्जुन की आँखें लाल हो गईं। “मीरा लौटकर नहीं आई। मैं उसे दवा की दुकान में मिला, जहाँ वह अपनी बच्ची के इलाज के लिए पैसे गिन रही थी।”

देवयानी ने तिरस्कार से कहा, “ऐसी औरतें रोना जानती हैं।”

पीछे से मीरा की आवाज़ आई, “और ऐसी औरतें सबूत भी संभालकर रखती हैं।”

वह धीरे-धीरे आई। थकी हुई, बाल बिखरे, आँखें भीगी हुईं, लेकिन हाथ में फाइल मजबूत थी। उसने पुलिस को बुलाने की बात कही और अपने पास रखे प्रमाण दिखाए—पत्र, डाक-रसीदें, ध्वनि, अस्पताल की अस्वीकृतियाँ, और वे संदेश जिनमें उसे धमकाया गया था कि बच्ची का जन्म किसी अभिशाप की तरह उसके जीवन को बर्बाद कर देगा।

देवयानी का चेहरा पहली बार काँपा। “तुमने हमें रिकॉर्ड किया?”

मीरा ने शांत आवाज़ में कहा, “मैंने अपना डर कैद किया था, ताकि कभी मेरी बेटी पूछे कि मैं क्यों चुप रही, तो मैं कह सकूँ—मैं चुप नहीं रही थी।”

अर्जुन ने मीरा को देखा। 3 साल तक उसे बताया गया था कि मीरा स्वार्थी थी, अस्थिर थी, धन के लिए लौटेगी। पर सामने खड़ी स्त्री ने अकेले गर्भ सहा, अकेले जन्म दिया, अकेले बुखारों से लड़ी, अकेले किराया भरा, और फिर भी बेटी के नाम की सच्चाई को गंदे सौदे में नहीं बदला।

पुलिस आई। राघव सूद को उसके कार्यालय से उसी दिन पूछताछ के लिए ले जाया गया। उसके अभिलेखों में झूठी पहुँच, मृत सविता के नाम से किए गए निर्देश, चिकित्सा सहायता रोकने के पत्र और एक बिचौलिये को दिए भुगतान मिले, जो मीरा की हर कोशिश पर निगरानी रखता था। देवयानी कपूर को उस दिन गिरफ्तार नहीं किया गया, पर उनके चेहरे पर वह अभिमान नहीं बचा था जिसके सहारे वे वर्षों से लोगों को कुचलती आई थीं। उन्हें अपने वकीलों के साथ अस्पताल से निकलना पड़ा, और कैमरों ने पहली बार उनके भय को दर्ज किया।

ऊपर, तारा की साँस धीरे-धीरे स्थिर हो रही थी। बुखार उतर रहा था। चिकित्सक ने कहा, “स्थिति गंभीर थी, पर अब उम्मीद अच्छी है।”

मीरा बाहर आई और दीवार से टिककर रो पड़ी। वह तेज़ आवाज़ में नहीं रोई। वह ऐसे रोई जैसे किसी ने 3 साल बाद उसके कंधों से अदृश्य बोरी उतारी हो।

अर्जुन ने पास जाकर कहा, “मीरा…”

“नहीं,” उसने हाथ उठा दिया।

वह रुक गया।

मीरा बोली, “अगर तुम यह कहने आए हो कि मैं वापस चलूँ, तो मत कहना।”

“मैं तुम्हें वापस नहीं बुला रहा।”

“तो?”

“मुझे तारा का पिता बनने देना। तुम्हारा पति नहीं। तुम्हारा उद्धारक नहीं। वह आदमी नहीं जो पैसे से पछतावा खरीदना चाहता है। बस पिता, अगर कभी तुम्हें लगे कि मैं उसके लायक हो सकता हूँ।”

मीरा ने लंबी देर तक उसे देखा। “बेटी को पैसे वाला आदमी नहीं चाहिए। उसे वह चाहिए जो दवा का नाम याद रखे, समय पर आए, रात के 3 बजे खाँसी सुनकर उठे, अस्पताल की कतार में खड़ा रहे, और गुस्से में माँ को छोटा न करे।”

अर्जुन ने कहा, “मैं सीखूँगा।”

“सीखना शब्दों से नहीं होता।”

“तो मैं कम बोलूँगा।”

मीरा ने पहली बार उसमें वह अहंकार नहीं देखा जिससे वह कभी डरती थी। उसे सिर्फ एक थका हुआ आदमी दिखा, जो अपने ही घर की साज़िश में देर से जागा था।

तारा ने भीतर से आवाज़ दी, “माँ…”

मीरा दौड़ी। अर्जुन दरवाजे पर ठहर गया।

तारा ने कमजोर आँखों से उसे खोजा। “पापा चले गए?”

अर्जुन आगे आया। “नहीं, बेटा। यहीं हूँ।”

तारा ने धीरे से मुस्कराया। “जब मैं ठीक हो जाऊँगी, आप मुझे आम वाली मिठाई दिलाएँगे?”

मीरा ने बीच में कहा, “सिर्फ 1। ज्यादा से पेट दुखता है।”

तारा ने गंभीरता से सिर हिलाया। “ठीक है। 1। लेकिन बड़ी वाली।”

अर्जुन हँस पड़ा, और हँसते-हँसते उसकी आँखें भर आईं।

तारा 8 दिन बाद अस्पताल से निकली। उसके सिर पर पीली टोपी थी, हाथ में छोटा कपड़े का खरगोश, और दवाइयों की लंबी पर्ची। अर्जुन ने पहले बहुत बड़ा खिलौना खरीदना चाहा था, पर मीरा ने रोक दिया। “3 साल की कमी खिलौनों से मत भरना।”

उसने छोटा खरगोश लिया।

अर्जुन ने बंगले की बात भी नहीं की। उसने उपचार के खर्च कानूनी तरीके से संभाले, पारिवारिक न्यायालय में तारा के अधिकार दर्ज कराए, और हर मुलाकात मीरा की उपस्थिति में स्वीकार की। वह मंगलवार शाम 5 बजे आया। फिर गुरुवार आया। फिर अगले मंगलवार। वह सीखा कि छोटी बच्ची की दवा कैसे नापी जाती है, साँस की भाप कब देनी है, कौन सी खाँसी साधारण है और कौन सी खतरनाक। उसने यह भी सीखा कि पिता होने का अर्थ दरवाजा खोलकर आना नहीं, बार-बार लौटना है।

शुरुआत में मीरा पार्क में उनसे 2 कदम से अधिक दूर नहीं जाती थी। तारा झूले पर बैठती, फिर दौड़कर माँ को छूती, जैसे डरती हो कि माँ हवा में गायब न हो जाए। अर्जुन उसे मजबूर नहीं करता। जब तारा हाथ बढ़ाती, वह पकड़ता। जब वह झिझकती, वह हाथ पीछे कर लेता।

एक शाम इंडिया गेट के पास घास पर बैठते हुए मीरा ने कहा, “तुम खुद आए हो।”

“हाँ।”

“मुझे लगा, चालक को भेजोगे, साथ में कोई महँगा तोहफा।”

अर्जुन ने तारा की पानी की बोतल बंद करते हुए कहा, “मैं उसका पिता हूँ। भेजी हुई सुविधा नहीं।”

मीरा ने नीचे देखा। उसके होंठों पर बहुत हल्की मुस्कान आई।

कुछ हफ्तों बाद मल्होत्रा परिवार का मामला समाचारों में फैल गया। मृत महिला के नाम से हस्ताक्षर, बच्ची की चिकित्सा सहायता रोकना, गर्भवती स्त्री को धमकाना, संपत्ति की शर्तें—सबने शहर को हिला दिया। अर्जुन ने किसी पत्रकार से बात नहीं की। उसने सिर्फ एक छोटा वक्तव्य जारी किया—“मेरी बेटी कोई संपत्ति का दावा नहीं है। वह एक बच्ची है। और बहुत से बड़े लोग उसे बचाने में असफल रहे।”

देवयानी कपूर पर अभियोग लगा। राघव सूद ने अपनी सजा कम कराने के लिए सच स्वीकार किया। सविता मल्होत्रा ने सचमुच मीरा को हटाने की शुरुआत की थी, क्योंकि उन्हें एक साधारण अध्यापिका परिवार की लड़की अपने औद्योगिक घराने के योग्य नहीं लगती थी। सविता की मृत्यु के बाद देवयानी ने योजना जारी रखी, ताकि तारा का नाम समय पर दर्ज न हो और न्यास की हिस्सेदारी उनके पक्ष में रहे। सच ठंडा था, कुरूप था, व्यवस्थित था। पर अब वह अंधेरे में नहीं था।

अर्जुन ने तारा को कानूनी रूप से अपना नाम दिया। वह दिन कोई फिल्मी समारोह नहीं था। छोटे से सरकारी कार्यालय में पंखा चरमराता रहा, कलम बार-बार रुकती रही, और तारा कागज़ के कोने पर सूरज बनाती रही। पर जब अर्जुन ने अपनी बेटी का नाम अपने नाम के साथ लिखा देखा, उसे बाहर आँगन में जाकर साँस लेनी पड़ी।

मीरा उसके पीछे आई। “रो रहे हो?”

“नहीं।”

“जब सच में टूटते हो, तब झूठ बहुत खराब बोलते हो।”

वह आँसुओं के बीच मुस्करा दिया। “मैंने बहुत समय खो दिया।”

मीरा ने भीतर बैठी तारा को देखा। “हाँ।”

उसने सच को मीठा नहीं बनाया। और अर्जुन ने पहली बार समझा कि क्षमा माँगने से पहले सच सहना पड़ता है।

1 साल बाद, एक बरसाती शाम नहीं, बल्कि हल्की धूप वाले दिन, मीरा फिर दवा की दुकान में गई। इस बार उसके हाथ में काँपती पर्ची नहीं थी। तारा उसके साथ चल रही थी, गुलाबी चप्पलें अब छोटी हो चुकी थीं पर वह उन्हें छोड़ना नहीं चाहती थी। अर्जुन पीछे था, तारा का छोटा थैला कंधे पर, पानी की बोतल, रूमाल, और मीरा की लिखी सूची हाथ में।

“नमक वाला पानी, पट्टियाँ, धूप से बचाने वाली मरहम,” वह गंभीरता से पढ़ रहा था, “और कुछ नहीं।”

तारा ने उँगली उठाई। “और इमली की गोली।”

मीरा ने भौं उठाई। “वह सूची में नहीं है।”

तारा ने लंबी साँस ली। “पर मेरे दिल में है।”

अर्जुन हँस पड़ा। मीरा भी हँसी। दुकान की रोशनी, बोतलों की कतारें, भुगतान की आवाज़ें, सब कुछ कुछ पल को दूर चला गया। फर्क बस इतना था कि अब वहाँ डर नहीं था। न कोई छिपा हुआ अभिलेख। न कोई बीमार बच्ची, जो अपनी माँ के आँसू रोकने के लिए खुद को मिटा देना चाहती हो।

दुकान से बाहर निकलते हुए अर्जुन ने मीरा से कहा, “धन्यवाद, तुमने हार नहीं मानी।”

मीरा ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने तारा को देखा, जो 2 इमली की गोलियों में से 1 चुनने को जीवन का सबसे बड़ा निर्णय मान रही थी।

“मैंने तुम्हारे लिए नहीं किया,” मीरा ने कहा।

अर्जुन ने सिर झुका दिया। “जानता हूँ।”

“मैंने उसके लिए किया।”

“तो मैं बाकी जीवन यही सीखते हुए बिताऊँगा।”

मीरा ने कोई वादा नहीं किया। उसने अर्जुन का हाथ नहीं थामा। उसने प्रेम, दूसरा अवसर या पुरानी शादी की वापसी जैसे बड़े शब्द नहीं बोले। पर जब वे सड़क पर चले, वह उसके आगे भागती हुई औरत की तरह नहीं चली, न पीछे दबकर चलने वाली औरत की तरह।

वह उसके साथ चली।

तारा बीच में आ गई और दोनों की 1-1 उँगली पकड़ ली।

“अब हम दल हैं?”

अर्जुन ने मीरा की ओर देखा। मीरा ने अर्जुन की ओर। दोनों जानते थे कि पुरानी चोटें एक दिन में नहीं भरतीं। पर यह भी सच था कि परिवार हमेशा शहनाई और बड़े वादों से नहीं लौटता। कभी वह समय पर खरीदी गई दवा से लौटता है, कभी सच बोलने की हिम्मत से, कभी पिता के समय पर पहुँचने से, कभी माँ की पहली चैन भरी साँस से, और कभी बुखार से तपती छोटी हथेली के फिर से मजबूत हो जाने से।

मीरा ने तारा की उँगली दबाई। “हाँ, मेरी जान।”

अर्जुन ने भी धीरे से कहा, “हम दल हैं।”

और उस दिन दिल्ली की भीड़ में, जहाँ किसी को उनकी कहानी नहीं मालूम थी, वे 3 लोग पहली बार घर की ओर अकेले नहीं लौटे।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.