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तीसरी सालगिरह की रात गर्भवती पत्नी हवेली से भाग गई, लेकिन जल्दबाज़ी में छोड़ी गई 2 गुलाबी रेखाओं वाली पट्टी ने उसके खतरनाक पति को ऐसा सच दिखा दिया, जिसके बाद पूरे शहर की नींद उड़ गई

भाग 1

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तीसरी शादी की सालगिरह की रात, जब नीचे 500 मेहमानों के सामने हीरे जैसे झूमर चमक रहे थे, प्रिया राठौड़ अपने पति अर्जुन की हवेली से भाग रही थी, और घबराहट में वह बाथरूम की कूड़ेदानी में वह चीज़ छोड़ गई थी जिसके लिए अर्जुन पूरा हिंदुस्तान उलट सकता था—2 गुलाबी रेखाओं वाली गर्भ-परीक्षण पट्टी।

दिल्ली के छतरपुर फार्महाउस में राठौड़ हवेली किसी महल से कम नहीं थी। सफेद संगमरमर, पीतल के दरवाज़े, राजस्थानी नक्काशी, विदेशी फूलों की सजावट और हर कोने पर बंदूकधारी आदमी। बाहर से यह दौलत लगती थी, अंदर से प्रिया को यह सोने का पिंजरा लगता था।

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प्रिया 28 साल की थी। उसका शरीर भरा-पूरा था, चेहरा शांत और आंखों में पुरानी मिठास थी। शादी से पहले वह जयपुर में अपनी छोटी-सी बेकरी चलाती थी। उसे अपने हाथों से बने केक, इलायची वाली चाय और बरसात में भीगी सड़कें पसंद थीं। लेकिन अर्जुन राठौड़ से शादी के बाद उसकी दुनिया बदल गई। अर्जुन दिल्ली-मुंबई अंडरवर्ल्ड का सबसे खतरनाक नाम था। लोग उसके सामने सिर झुकाते थे, पुलिस उसकी तरफ देखकर रास्ता बदलती थी, और दुश्मन उसका नाम सुनकर शहर छोड़ देते थे।

अर्जुन ने प्रिया से सचमुच प्यार किया था। उसने कभी उसके शरीर का मज़ाक नहीं उड़ाया। उल्टा जब दुनिया उसे मोटी, साधारण या कमजोर कहती, अर्जुन उसे अपनी शांति कहता। लेकिन पिछले 6 महीनों से राठौड़ और मिर्जा गिरोह के बीच खून की लड़ाई चल रही थी। हवेली के बाहर गाड़ियां रुकतीं तो प्रिया का दिल कांप उठता। आधी रात को फोन बजता तो उसे लगता कोई मर गया। 2 हफ्ते पहले उसने अर्जुन को कमरे में बैठे देखा था, सफेद कुर्ते पर खून लगा था। वह उसका खून नहीं था। अर्जुन ने बस इतना कहा था, “मुझसे दूर मत जाना।”

आज नीचे सालगिरह की दावत थी। अर्जुन ने कहा था, “दुनिया को दिखाना होगा कि राठौड़ परिवार डरता नहीं।” लेकिन प्रिया अब दिखावे का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी। वह मां बनने वाली थी, और वह अपने बच्चे को गोलियों, बदले और डर के बीच जन्म नहीं देना चाहती थी।

उसने महीनों से तैयारी कर रखी थी। अलमारी के पीछे एक बैग छुपा था। उसमें 38 लाख रुपये नकद, एक नया फोन, नकली पहचान और उसकी पुरानी दोस्त मीरा द्वारा कराया गया इंतज़ाम था। बाहर एक बूढ़ा चालक सलीम उसे आगरा रोड तक छोड़ने वाला था, फिर वह किसी छोटे शहर में गायब हो जाती।

नीचे पार्टी में कैमिला मल्होत्रा जैसी अमीर औरतों की हंसी गूंज रही थी। कैमिला ने प्रिया को देखकर कहा, “इतनी फिट ड्रेस पहनने की हिम्मत हर औरत में नहीं होती, खासकर तुम्हारे जैसी में।”

प्रिया मुस्कुराई। आज ये ताने आखिरी बार थे।

वह अर्जुन के पास गई। अर्जुन ने उसे देखते ही दुनिया भूलकर कहा, “आज तुम सबसे खूबसूरत लग रही हो।”

प्रिया का दिल टूट गया। उसने आखिरी बार उसके चेहरे को देखा और धीरे से कहा, “मुझे तुमसे 10 मिनट अकेले बात करनी है।”

अर्जुन ने फोन देखा। “बस एक संदेश आना बाकी है। उसके बाद सब खत्म हो जाएगा।”

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प्रिया ने यही सुना—वह हिंसा कभी खत्म नहीं होगी।

कुछ देर बाद वह रसोई के रास्ते नौकरों वाली सीढ़ियों से ऊपर गई, गाउन उतारा, साधारण सलवार-कुर्ता पहना, बैग उठाया और अपने हीरे की अंगूठियां अर्जुन के तकिए पर रख दीं। साथ में एक पन्ना छोड़ा—“मैं तुमसे प्यार करती हूं, लेकिन तुम्हारी दुनिया में जिंदा नहीं रह सकती। मुझे मत ढूंढना।”

रात के अंधेरे में वह पिछली गेट से निकली और सलीम की गाड़ी में बैठ गई।

उसे लगा वह बच गई।

लेकिन रात 1:15 पर जब अर्जुन कमरे में लौटा और उसने खाली बिस्तर, टूटी हुई चुप्पी, अंगूठियां और वह कागज देखा, तो हवेली की दीवारें उसके गुस्से से कांप उठीं।

फिर बाथरूम में कूड़ेदानी उलटी।

कपड़ों और टिश्यू के बीच वह सफेद पट्टी बाहर लुढ़की।

अर्जुन ने 2 गुलाबी रेखाएं देखीं, और पहली बार दिल्ली का सबसे खतरनाक आदमी घुटनों के बल गिर पड़ा।

भाग 2

अर्जुन ने वह पट्टी हाथ में पकड़ी तो उसकी सांस जैसे रुक गई। प्रिया सिर्फ उससे भागी नहीं थी, वह उसके बच्चे को उसके अंधेरे से बचाकर ले गई थी।

“करण!” अर्जुन की आवाज़ हवेली में गूंज गई।

कुछ ही मिनटों में दावत बंद हो गई। मेहमानों के फोन जब्त कर लिए गए। गेट बंद हो गए। रसोइयों, चालकों और सजावट वालों से पूछताछ होने लगी। कैमरे देखे गए, लेकिन नौकरों के गलियारे में अंधा कोना था। वहीं से प्रिया गायब हुई थी।

करण, अर्जुन का सबसे भरोसेमंद आदमी, घबराया खड़ा था। “मालिक, एक काले रंग की गाड़ी पिछली गेट के पास दिखी थी। नंबर पूरा नहीं मिला, पर चालक शायद सलीम कुरैशी है। नकद पर लोगों को बिना सवाल छोड़ा करता है।”

अर्जुन की आंखें ठंडी हो गईं। “उसे मेरे सामने लाओ।”

सुबह होने से पहले सलीम एक पुराने गोदाम में अर्जुन के सामने बैठा था। उसके होंठ कांप रहे थे।

“कहां छोड़ा मेरी पत्नी को?”

“साहब, मुझे नहीं पता था वह आपकी बीवी हैं। मीरा नाम की लड़की ने बात कराई थी। मैंने बस उन्हें कानपुर हाईवे पर एक छोटे लॉज में छोड़ा। कमरा 108।”

अर्जुन ने मेज पर हाथ रखा। “अगर वह अकेली है और मिर्जा के लोग उस तक पहुंच गए, तो सिर्फ वह नहीं मरेगी। मेरा बच्चा भी…”

सलीम रो पड़ा। “साहब, कसम से वही जगह है।”

उधर प्रिया छोटे-से लॉज के कमरे 108 में बैठी थी। महंगी हवेली से दूर, सीलन भरी दीवारों और पतले गद्दे के बीच। उसने अपने पेट पर हाथ रखा और धीरे से कहा, “अब कोई हमें नहीं ढूंढ पाएगा।”

सुबह वह दवा की दुकान पर गई। गर्भवती महिलाओं वाली दवा, पानी और बिस्कुट खरीदे। काउंटर पर लगे टीवी पर अचानक उसकी तस्वीर चमकी।

“दिल्ली की उद्योगपति पत्नी प्रिया राठौड़ लापता। सूचना देने वाले को 5 करोड़ रुपये।”

दुकानदार ने उसकी तरफ देखा।

प्रिया का खून जम गया।

वह भागी। सड़क पार की, लॉज की तरफ मुड़ी और वहीं ठिठक गई।

कमरा 108 के बाहर 4 काली गाड़ियां खड़ी थीं।

अर्जुन खुद दरवाज़े के सामने खड़ा था।

प्रिया ने पीछे मुड़कर भागना चाहा, तभी एक सूखी टहनी उसके पैर के नीचे टूटी।

अर्जुन ने सिर घुमाया।

उनकी आंखें मिलीं।

और प्रिया जंगल की तरफ भाग गई।

भाग 3

प्रिया ने कभी इतनी तेज़ दौड़ नहीं लगाई थी। उसके पैर कांप रहे थे, सांस सीने में चुभ रही थी, पर दोनों हाथ बार-बार अपने पेट पर जा रहे थे, जैसे वह अपने भीतर पल रही जिंदगी को दुनिया से ढक लेना चाहती हो। लॉज के पीछे छोटा-सा जंगल था, जिसके आगे मजदूरों की बस्ती और फिर मुख्य सड़क आती थी। उसे बस किसी तरह वहां तक पहुंचना था।

पीछे से अर्जुन की आवाज़ आई, “प्रिया, रुक जाओ! भगवान के लिए रुक जाओ!”

वह आवाज़ आदेश जैसी नहीं थी। वह टूटे हुए आदमी की विनती थी। पर प्रिया ने पलटकर नहीं देखा। उसे डर था कि अगर उसने एक बार भी अर्जुन का चेहरा देख लिया, तो उसका दिल कमजोर पड़ जाएगा।

कांटेदार झाड़ियों ने उसके कुर्ते की आस्तीन फाड़ दी। पैरों में खरोंचें आ गईं। एक बार उसका पैर जड़ में अटका और वह गिरते-गिरते बची। तभी दूसरी तरफ से टायरों की चीख सुनाई दी। काली गाड़ी बस्ती की सड़क पर आकर उसके सामने रुक गई।

प्रिया पीछे हटी।

उसी समय अर्जुन पेड़ों के बीच से बाहर आया। उसका चेहरा रातभर की बेचैनी से पीला था। बाल बिखरे थे। आंखें लाल थीं, लेकिन उनमें वह जंगली गुस्सा नहीं था जिससे प्रिया डरती थी। उनमें सिर्फ डर था—उसे खो देने का डर।

गाड़ी से उतरे आदमी दूर हट गए। करण ने इशारे से सबको पीछे कर दिया।

प्रिया ने कांपते हुए कहा, “पास मत आना, अर्जुन। मैं वापस नहीं जाऊंगी। तुम मुझे कैद कर दोगे। मेरे बच्चे को बंदूकधारियों के बीच बड़ा करोगे। मैं यह नहीं होने दूंगी।”

अर्जुन 8 कदम दूर रुक गया। फिर अचानक वही आदमी, जिसके सामने मंत्री और अपराधी दोनों झुकते थे, सड़क की धूल में घुटनों के बल बैठ गया।

प्रिया की आंखें फैल गईं।

“मुझे नहीं पता था,” अर्जुन ने भारी आवाज़ में कहा। “कसम से, मुझे नहीं पता था कि तुम मां बनने वाली हो। अगर पता होता तो मैं तुम्हें एक पल भी डर में नहीं रहने देता।”

प्रिया हंस पड़ी, पर वह हंसी दर्द से भरी थी। “तुम डर से बने हुए आदमी हो, अर्जुन। तुम्हारे घर के दरवाज़े बाहर से बंद होते हैं। तुम्हारे आदमी हर गाड़ी की तलाशी लेते हैं। रात को तुम्हारे कपड़ों पर खून लगा होता है। तुम कहते हो प्यार है, लेकिन तुम्हारी दुनिया में कोई सुरक्षित नहीं है।”

अर्जुन ने सिर झुका लिया। पहली बार प्रिया ने उसे जवाब तलाशते हुए देखा, धमकी देते हुए नहीं।

“वह खून विक्रम मिर्जा के आदमी का था,” उसने धीरे से कहा। “उसने करण पर हमला किया था।”

“देखा?” प्रिया चिल्लाई। “तुम्हारे लिए हर खून का कोई कारण होता है। हर गोली की कोई मजबूरी होती है। हर मौत के बाद तुम कहते हो आखिरी बार। लेकिन आखिरी बार कभी नहीं आता।”

अर्जुन ने अपनी कोट की जेब से मुड़ी हुई फाइल निकाली और सड़क पर उसकी तरफ सरका दी।

“आ गया।”

प्रिया ने फाइल को देखा। “क्या?”

“आखिरी बार आ गया, प्रिया। कल रात जो संदेश मैं इंतज़ार कर रहा था, वह हथियारों का नहीं था। वह पैसे के हस्तांतरण का था। मैंने सब बेच दिया।”

प्रिया स्थिर रह गई।

अर्जुन ने कहा, “बंदरगाह के हिस्से, जुए के अड्डे, वसूली के रास्ते, राजनीतिक सौदे, सब कुछ। 6 महीने से मैं वकीलों और बिचौलियों के साथ यही कर रहा था। मिर्जा से लड़ाई इसलिए खिंची क्योंकि वह मेरा इलाका चाहता था, और मैं बिना तुम्हें बताए बाहर निकलने का रास्ता खरीद रहा था। कल रात 1 बजे आखिरी दस्तखत पूरे हुए। राठौड़ साम्राज्य अब मेरा नहीं है।”

प्रिया ने फाइल उठाई। पन्नों पर कानूनी मुहरें थीं, विदेशी खातों के दस्तावेज़ थे, नई पहचान के कागज़ थे, और हिमाचल में एक पुरानी सेब-बागान वाली कोठी की रजिस्ट्री उसके नाम थी।

“तुम झूठ बोल रहे हो,” उसने फुसफुसाया। “तुम जैसे लोग छोड़ नहीं सकते।”

“मैं भी यही सोचता था,” अर्जुन बोला। “फिर मैंने देखा कि मेरी वजह से तुम धीरे-धीरे खत्म हो रही हो। तुम वह लड़की नहीं रही जो जयपुर की बेकरी में बारिश देखकर हंसती थी। तुम हर आवाज़ पर कांपने लगी थीं। मैं तुम्हें बचाने के नाम पर तुम्हें कैद कर रहा था। मैं तुम्हारे लिए दुनिया जीतता रहा, और तुम्हारा घर ही तुमसे छीन लिया।”

प्रिया की आंखों में आंसू आ गए। लेकिन भरोसा टूटने के बाद लौटना आसान नहीं होता।

“फिर तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

“क्योंकि मैं तुम्हें सालगिरह की रात बताना चाहता था। सबके सामने नहीं, ऊपर कमरे में। मैंने सोचा था, पार्टी खत्म होगी, मैं तुम्हारा हाथ पकड़कर कहूंगा—चलो, अब हम सच में जीते हैं। आज सुबह हमें दिल्ली छोड़ना था। लेकिन जब मैं कमरे में गया, तुम जा चुकी थीं।”

प्रिया ने पेट पर हाथ रखा। हवा में अजीब चुप्पी भर गई। वह अर्जुन के सामने खड़ी थी—एक तरफ उसका डर, दूसरी तरफ वह आदमी जिसने शायद सच में अपना अंधेरा छोड़ दिया था।

तभी दूर से इंजन की गरज आई।

करण ने तुरंत सिर घुमाया। “मालिक!”

एक धूसर गाड़ी बस्ती की सड़क पर पागलों की तरह मुड़ी। उसके शीशे नीचे हुए। बंदूकों की चमक सुबह की धूप में चुभी। मिर्जा गिरोह ने अर्जुन के लोगों की हलचल पकड़ ली थी और अब वे उसी जगह आ गए थे जहां प्रिया खड़ी थी।

सब कुछ 1 पल में हुआ।

अर्जुन ने बंदूक नहीं निकाली। उसने प्रिया की तरफ छलांग लगाई। उसका पूरा शरीर प्रिया के आगे दीवार बन गया। उसने प्रिया को घास पर गिराया और अपने सीने से उसके पेट को ढक लिया।

गोलियों की आवाज़ ने शांत बस्ती को चीर दिया।

प्रिया चीखी। बच्चों के रोने की आवाज़ें घरों से आने लगीं। कांच टूटे। गाड़ियों के शीशे बिखरे। करण और बाकी लोग जवाबी गोली चलाने लगे। पर अर्जुन हिला तक नहीं। उसने अपना शरीर प्रिया के ऊपर जमा दिया, एक हाथ उसके सिर के पीछे, दूसरा उसके पेट के ऊपर।

फिर उसका शरीर झटका खाकर तन गया।

“अर्जुन!” प्रिया चीखी।

उसने जवाब नहीं दिया। बस दांत भींचकर बोला, “हिलो मत। बच्चा…”

उसकी आवाज़ दर्द में डूब गई।

30 सेकंड बाद सड़क पर खामोशी लौट आई। मिर्जा की गाड़ी पेड़ से टकरा चुकी थी। धुआं उठ रहा था। करण चिल्लाया, “रास्ता साफ है! पुलिस आने में 2 मिनट!”

प्रिया ने अर्जुन को धक्का देकर उठाने की कोशिश की। “मुझे देखने दो!”

अर्जुन धीरे से करवट बदला। उसके कंधे से खून बह रहा था। गोली आर-पार निकली थी, पर खून बहुत था।

प्रिया के हाथ कांपने लगे। “तुम्हें गोली लगी है।”

अर्जुन ने फीकी मुस्कान से कहा, “तुम्हें नहीं लगी। बच्चे को नहीं लगी। बस यही चाहिए था।”

प्रिया रो पड़ी। उस पल उसका सारा गुस्सा नहीं मिटा, लेकिन उसके पीछे छुपा सच साफ हो गया। यह आदमी खतरनाक था, हां। इसने उसे डराया था, हां। लेकिन यह उसे कैद करने नहीं, ढकने आया था। और जब सच में मौत सामने आई, उसने अपने साम्राज्य को नहीं, अपने वारिस को नहीं, पहले प्रिया को बचाया।

करण ने जल्दी से अर्जुन को गाड़ी में बैठाया। उन्हें शहर के बाहर एक निजी चिकित्सक के फार्महाउस क्लिनिक ले जाया गया। रास्ते भर प्रिया ने अर्जुन का हाथ पकड़े रखा। अर्जुन बार-बार आंखें खोलकर सिर्फ यही पूछता, “तुम ठीक हो? पेट में दर्द तो नहीं?”

प्रिया हर बार रोते हुए कहती, “हम ठीक हैं। तुम बस चुप रहो।”

डॉक्टर ने कंधे की पट्टी बांधी। गोली हड्डी को छूकर निकली थी, पर जान का खतरा नहीं था। अर्जुन दर्द से पसीने में भीग गया था, फिर भी उसकी नजर प्रिया से हटती नहीं थी।

कुछ देर बाद उसने करण को इशारा किया। करण ने एक चमड़े का थैला प्रिया के सामने रख दिया।

“इसमें क्या है?” प्रिया ने पूछा।

अर्जुन ने कमजोर आवाज़ में कहा, “तुम्हारी आज़ादी।”

प्रिया ने थैला खोला। अंदर 3 पासपोर्ट थे। एक अर्जुन के लिए, एक प्रिया के लिए, और तीसरा खाली जगह के साथ, उनके बच्चे के लिए। साथ में हिमाचल की कोठी, जयपुर में नई बेकरी, और एक सुरक्षित खाते के कागज़ थे। सब कुछ प्रिया के नाम पर था।

“यह सब तुम्हारा है,” अर्जुन बोला। “अगर तुम आज भी जाना चाहो, तो मैं तुम्हें नहीं रोकूंगा। गाड़ी, पैसा, पहचान, घर—सब तुम्हारा। मैं तुम्हारे पीछे आदमी नहीं भेजूंगा। मैं तुम्हें फोन नहीं करूंगा। मैं तुम्हारे बच्चे को छीनने की कोशिश नहीं करूंगा।”

प्रिया ने अविश्वास से उसे देखा। “तुम मुझे जाने दोगे?”

अर्जुन की आंखें भर आईं। “मैंने तुम्हें प्यार के नाम पर डर दिया। अब अगर सच में प्यार करता हूं, तो तुम्हें चुनने दूंगा। मेरे साथ रहना तुम्हारी मजबूरी नहीं होना चाहिए।”

कमरे में सिर्फ मशीन की धीमी आवाज़ थी। बाहर दूर किसी मंदिर की घंटी बज रही थी। प्रिया ने पासपोर्ट उठाए। उसके हाथों में वह रास्ता था जिसके लिए वह जान बचाकर भागी थी। वह चाहे तो अभी जा सकती थी। किसी पहाड़ी गांव में बस सकती थी। बच्चा उसके साथ होता। अर्जुन बहुत दूर रह जाता।

लेकिन उसने अर्जुन के घायल कंधे को देखा। वह आदमी जिसने सारी उम्र राज किया था, आज पहली बार उसके फैसले के सामने चुप पड़ा था। उसने उसे रोकने के बजाय रास्ता दिया था। शायद यही वह दरवाज़ा था जिसकी उसे जरूरत थी—एक ऐसा दरवाज़ा जो बाहर से बंद नहीं, अंदर से खुला हो।

प्रिया धीरे से उसके पास बैठी। “मैं अकेले बेकरी नहीं चलाना चाहती।”

अर्जुन की सांस अटक गई।

“मैं चाहती हूं कि तुम सुबह चाय बनाना सीखो। मैं चाहती हूं तुम बच्चे के लिए पालना खरीदो। मैं चाहती हूं कि जब वह पहली बार चले, तुम बंदूक नहीं, कैमरा पकड़ो।”

अर्जुन की आंखों से आंसू निकल गए।

प्रिया ने उसकी उंगलियां पकड़ लीं। “लेकिन अगर तुम्हारे जीवन में एक भी झूठ, एक भी गोली, एक भी खून लौटकर आया, तो मैं बिना पीछे देखे चली जाऊंगी। इस बार कोई नोट नहीं छोड़ूंगी।”

अर्जुन ने सिर हिलाया। “नहीं आएगा। मैं कसम खाता हूं।”

“मेरी कसम मत खाओ,” प्रिया ने कहा। “बच्चे की कसम खाओ।”

अर्जुन ने कांपते हाथ से उसके पेट को छुआ। “हमारे बच्चे की कसम। अब कोई खून नहीं।”

3 महीने बाद दिल्ली के अखबारों में खबर छपी कि अर्जुन राठौड़ ने अपने सारे वैध कारोबार बेचकर सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लिया। गैरकानूनी दुनिया में उसका नाम धीरे-धीरे डर से कहानी बन गया। मिर्जा गिरोह पुलिस कार्रवाई और आपसी धोखे में बिखर गया। करण ने भी अपराध छोड़कर सुरक्षा कंपनी शुरू कर दी, जहां हथियार से ज्यादा नियम चलते थे।

6 महीने बाद हिमाचल की पहाड़ियों में सुबह की धूप सेब के पेड़ों पर गिर रही थी। एक पुरानी कोठी की रसोई से ताजा ब्रेड और इलायची वाली चाय की खुशबू आ रही थी। प्रिया खिड़की के पास खड़ी थी। उसका पेट अब बहुत बड़ा हो चुका था। चेहरे पर वह शांति लौट आई थी जो कभी जयपुर की बारिशों में चमकती थी।

अर्जुन पीछे से आया। अब उसके हाथों में बंदूक नहीं, आटा लगा था। उसने बुरा-सा गोल परांठा बनाया था, जिसे देखकर प्रिया हंस पड़ी।

“ये परांठा है या नक्शा?” उसने पूछा।

अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, “हमारा बच्चा इसे आधुनिक कला समझेगा।”

तभी बच्चे ने पेट में जोर से लात मारी। अर्जुन घबरा गया। “दर्द हुआ?”

प्रिया ने उसका हाथ पेट पर रखा। “नहीं। शायद इसे तुम्हारा परांठा पसंद नहीं आया।”

अर्जुन ने झुककर उसके पेट से कहा, “ठीक है, मैं सीख जाऊंगा। बस तुम दोनों कहीं मत जाना।”

प्रिया ने उसकी तरफ देखा। “हम कहीं नहीं जा रहे। लेकिन याद रखना, यह घर हवेली नहीं है। यहां दरवाज़े बंद नहीं होंगे।”

अर्जुन ने धीरे से मुख्य दरवाज़े की तरफ देखा। वह खुला था। बाहर पहाड़ थे, हवा थी, धूप थी। कोई बंदूकधारी नहीं। कोई काली गाड़ी नहीं। कोई डर नहीं।

उसने प्रिया को बांहों में लिया, बहुत सावधानी से, जैसे वह किसी जीत को नहीं, किसी माफी को पकड़ रहा हो।

कुछ प्रेम कहानियां फूलों से शुरू होती हैं। कुछ मंदिरों की घंटियों से। प्रिया और अर्जुन की कहानी 2 गुलाबी रेखाओं, एक छोड़ी हुई अंगूठी और भागती हुई औरत के डर से शुरू होकर उस रसोई तक आई थी जहां एक पूर्व अंडरवर्ल्ड बादशाह अपनी पत्नी के लिए टेढ़ा परांठा बना रहा था।

और उस खुले दरवाज़े के सामने खड़ी प्रिया ने पहली बार महसूस किया—वह अब भाग नहीं रही थी।

वह लौटकर भी कैद में नहीं आई थी।

वह अपने बच्चे के साथ ऐसी जिंदगी में आई थी जहां प्यार पहरा नहीं देता, बल्कि रास्ता खुला छोड़ता है।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.