
भाग 1:
जिस दिन मेरी इकलौती बेटी ने मुझे पागल साबित करने के लिए अदालत में खड़ा किया, उसी दिन उसने सफेद सूट पहनकर मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैं उसका पिता नहीं, उसकी विरासत के रास्ते में पड़ा कोई पुराना पत्थर था।
जयपुर जिला अदालत की उस भरी हुई अदालत में लोग फुसफुसा रहे थे। मैं अपनी धुली हुई लेकिन फीकी धोती-कुर्ता पहने, पुराने चमड़े की चप्पलें डाले, हाथ में पगड़ी पकड़े खड़ा था। मेरी पीठ थोड़ी झुकी हुई थी, दाढ़ी सफेद थी और आंखों के नीचे नींद की गहरी परछाइयां थीं। देखने वालों को मैं सच में एक टूटा हुआ बूढ़ा किसान लगता था, जो शायद यह भी नहीं समझ पा रहा था कि उसके साथ क्या होने वाला है।
मेरी बेटी अनन्या सामने बैठी थी। उसके बगल में उसका पति विक्रम सिंह था, महंगे सूट, चमकती घड़ी और चेहरे पर वह अहंकार लिए हुए, जो अक्सर उन लोगों में आ जाता है जिन्हें लगता है कि पैसा कानून से बड़ा होता है। अनन्या ने धीरे से उसकी तरफ झुककर कुछ कहा। विक्रम मुस्कुराया। वह मुस्कान मेरे सीने में किसी चाकू जैसी उतर गई।
आज वे अदालत से यह आदेश लेने आए थे कि मैं मानसिक रूप से अयोग्य हूं। अगर जज मान जाता, तो मेरे आम के बाग, मेरी पैतृक हवेली, मेरे बैंक खाते, मेरी जमीन और वह घर जहां मैंने अपनी पत्नी सावित्री के साथ 42 साल बिताए थे, सब अनन्या और विक्रम के नियंत्रण में चले जाते।
तभी जज ने फाइल से नजर उठाई।
उनकी आंखें मेरे चेहरे पर टिक गईं। पहले उनका चेहरा सख्त था, फिर पीला पड़ गया। उनके हाथ में पकड़ी कलम कांप गई। पूरी अदालत में जैसे हवा रुक गई।
उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा:
—हे भगवान… न्यायमूर्ति देवेंद्र प्रताप राठौड़?
अनन्या की मुस्कान वहीं जम गई।
विक्रम की भौंहें सिकुड़ गईं।
उन्हें नहीं पता था कि गांव की हवेली में चुपचाप तुलसी को पानी देने वाला, सुबह 5 बजे गायों को चारा डालने वाला और शाम को मंदिर की घंटी सुनकर बरामदे में बैठ जाने वाला यह बूढ़ा कभी देश के सबसे तेज सरकारी वकीलों में गिना जाता था।
देवेंद्र प्रताप राठौड़, उम्र 70 साल। 32 साल तक केंद्रीय जांच एजेंसियों के साथ विशेष लोक अभियोजक। सैकड़ों आर्थिक अपराध, जमीन घोटाले, हवाला नेटवर्क और बुजुर्गों की संपत्ति हड़पने वाले गिरोहों को सजा दिलवाने वाला आदमी। लेकिन अपनी बेटी की नजर में अब मैं सिर्फ एक बोझ था।
सब कुछ 3 महीने पहले शुरू हुआ था।
सावित्री के जाने के बाद मेरी दुनिया सिमटकर उदयपुर रोड पर बने हमारे पुराने फार्महाउस तक रह गई थी। वहां 18 बीघा जमीन थी, 2 कुएं थे, आम और अमरूद के पेड़ थे, और बरामदे में सावित्री की लकड़ी की झूला-कुर्सी अब भी रखी थी। उसकी चूड़ियों की हल्की आवाज मुझे कई बार रात में सुनाई देती, जबकि मुझे मालूम था कि वह अब कभी वापस नहीं आएगी।
उस गुरुवार दोपहर डाकिया एक मोटा लिफाफा देकर गया। नगर विकास प्राधिकरण की नोटिस थी। लिखा था कि जमीन पर बकाया कर और जुर्माने के कारण जब्ती की कार्रवाई शुरू की जाएगी।
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
यह असंभव था।
1 महीने पहले ही मैंने विक्रम के खाते में 18 लाख रुपये ट्रांसफर किए थे। उसने कहा था कि फार्महाउस, जमीन और पुरानी हवेली के सारे सरकारी कर वह भर देगा। अनन्या ने भी मुझे समझाया था:
—पापा, अब आपको बैंक और कागजों में दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है। विक्रम सब संभाल लेगा। आप बस आराम करो।
मैंने भरोसा कर लिया था। आखिर वह मेरी बेटी थी।
मैंने अनन्या को फोन किया। वह किसी महंगे होटल में दोपहर के खाने पर थी।
—क्या हुआ पापा? जल्दी बोलिए, मैं मीटिंग में हूं।
—बिटिया, जमीन जब्ती की नोटिस आई है। विक्रम ने टैक्स जमा नहीं किया क्या?
कुछ पल चुप्पी रही।
—पापा, आप फिर घबरा रहे हैं। ऐसी नोटिस पुरानी भी हो सकती है। आप आजकल तारीखें भूल जाते हो। शाम को आते हैं।
शाम को वे काले रंग की एसयूवी में आए। विक्रम ने घर में घुसते ही नौकर को ऐसे देखा जैसे वह उसी का मालिक हो। मैंने नोटिस मेज पर रख दी।
—इसका जवाब दो।
वह कुर्सी पर बैठा, लेकिन कागज को हाथ तक नहीं लगाया।
—पापा जी, सरकारी दफ्तरों में यही गड़बड़ होती है। मैंने सब भर दिया है।
—रसीद दिखाओ।
अनन्या ने लंबी सांस ली।
—पापा, आप हर बात पर शक क्यों करते हैं? कल आपने रसोई में गैस खुली छोड़ दी थी। अगर विक्रम समय पर नहीं देखता तो पूरा घर उड़ जाता।
मैंने उसकी आंखों में देखा।
हमारे घर की गैस लाइन सावित्री के मरने के बाद से बंद थी। मैंने खुद मुख्य वाल्व तुड़वाकर अलग करवा दिया था। वहां गैस खुली छोड़ना असंभव था।
उस क्षण मुझे पहली बार समझ आया कि मेरी बेटी झूठ बोल रही है। सीधे मेरी आंखों में देखकर।
मैं चिल्ला सकता था। उन्हें घर से निकाल सकता था। लेकिन मेरे भीतर का पुराना वकील अचानक जाग गया। अगर मैं गुस्सा करता, तो वही मेरे खिलाफ सबूत बनता। इसलिए मैंने हाथ हल्के से कांपने दिए, नजर नीचे कर ली और टूटे हुए स्वर में कहा:
—शायद सच में मुझसे भूल हो रही है।
अनन्या के चेहरे पर राहत आ गई। विक्रम ने उसकी तरफ देखा, जैसे कोई जाल पहली बार सही जगह गिरा हो।
अगली सुबह अनन्या एक छोटी शीशी लेकर आई। शीशी पर कोई नाम नहीं था।
—ये याददाश्त की दवा है पापा। डॉक्टर माथुर ने कहा है कि आपको रोज लेनी होगी।
मैंने गोली उसके सामने निगल ली। भरोसे से नहीं। शायद इस उम्मीद से कि मेरी बेटी मुझे नुकसान नहीं पहुंचा सकती।
पर 15 दिनों में मेरा शरीर मेरा दुश्मन बन गया। सुबह 10 बजे तक उठ नहीं पाता था। पैरों में सीसा भर जाता। हाथ इतने कांपते कि चाय का कप पकड़ना मुश्किल हो जाता। कभी-कभी शब्द दिमाग में आते, पर जुबान तक नहीं पहुंचते। एक दिन मैंने आरती की थाली गिरा दी। अनन्या रोने लगी।
—देखा विक्रम? अब इन्हें अकेला छोड़ना खतरनाक है।
विक्रम ने धीमे से कहा:
—2-4 हफ्ते और। फिर अदालत में काम आसान हो जाएगा।
मैंने यह सुन लिया।
उस रात मैं बिस्तर पर पड़ा रहा, आंखें बंद करके। अनन्या ने सोचा मैं सो गया हूं। विक्रम ने बरामदे में फोन पर किसी से कहा:
—कागज तैयार रखो। बूढ़ा जल्दी ही कानूनी तौर पर अक्षम घोषित हो जाएगा। बाग की जमीन का सौदा 12 करोड़ से कम में नहीं होगा।
मेरे सीने में जो टूटा, वह पिता का दिल था। लेकिन जो बचा, वह कानून जानने वाला आदमी था।
मैंने अगले दिन से गोलियां निगलने का नाटक किया और उन्हें गमले की मिट्टी में दबा दिया। 3 दिन बाद दिमाग साफ होने लगा। चौथे दिन मैंने पुरानी जीप निकाली और शहर के दूसरे छोर पर एक छोटी निजी लैब में जांच करवाई। रिपोर्ट शाम को आई। डॉक्टर ने फोन पर धीमी आवाज में कहा:
—राठौड़ साहब, ये याददाश्त की दवा नहीं है। ये भारी मनोवैज्ञानिक दवाएं हैं। स्वस्थ आदमी को दी जाएं तो भ्रम, कंपकंपी, स्मृति-हानि, बेहोशी और दिल का दौरा भी पड़ सकता है।
मैंने फोन रख दिया।
जिस बेटी को सावित्री ने अपने आंचल में छिपाकर पाला था, वही मुझे धीरे-धीरे मिटा रही थी।
मैंने उसी रात एक पुराने नंबर पर कॉल किया। अरुण खन्ना, मेरा साथी, अब राजस्थान हाई कोर्ट का मशहूर वरिष्ठ वकील था। मैंने सब बताया—नोटिस, दवाएं, विक्रम की बातें, जमीन का सौदा।
अरुण लंबे समय तक चुप रहा, फिर बोला:
—देवेंद्र, वे तुम्हें जिंदा रहते हुए कानूनी तौर पर मारना चाहते हैं।
2 दिन बाद उसके लोग आए। उन्होंने मेरे अध्ययन-कक्ष, बरामदे और तिजोरी के पास छोटे कैमरे लगा दिए। तिजोरी में सावित्री के गहने, जमीन के मूल कागज और मेरी सेवा-काल की फाइलें रखी थीं।
जाल बिछ चुका था।
तीसरी रात विक्रम आया। उसे लगा मैं दवा के असर में बेसुध हूं। उसने अनन्या से चुराई गई मेरी पुरानी चाबी निकाली, दीवार के भीतर लगे गुप्त पैनल को खोला और तिजोरी के कागजों की तस्वीरें लेने लगा। कैमरे ने उसका चेहरा, हाथ और आवाज सब रिकॉर्ड कर लिया।
—हां, चौहान साहब, कागज मिल गए। बूढ़े को पागल घोषित करवा देंगे। अनन्या संरक्षक बनेगी, फिर रजिस्ट्री करा देंगे। पैसे मिलते ही आपका कर्ज भी बंद।
मेरे हाथ मुट्ठी बन गए, लेकिन मैं चुप रहा।
कुछ ही दिनों में मामला और साफ हो गया। विक्रम पर गैरकानूनी साहूकारों का 5 करोड़ से ज्यादा कर्ज था। उसने मेरे नाम की नकली साइन बनाकर जमीन को गारंटी दिखाया था। अनन्या सब जानती थी। उसने डॉक्टर से झूठी रिपोर्ट बनवाई थी कि मैं अपनी मृत पत्नी से बातें करता हूं, घर में आग लगाने की कोशिश करता हूं और अपना नाम तक भूल जाता हूं।
फिर वह दिन आया जब 2 सरकारी कर्मचारी, 1 निजी डॉक्टर और 2 पुलिस वाले फार्महाउस पर पहुंचे। उनके पास अस्थायी आदेश था कि मेरी मानसिक जांच के लिए मुझे निजी देखभाल केंद्र ले जाया जाए।
अनन्या रो रही थी, लेकिन उसके आंसू मेरे लिए नहीं थे।
—मेरे पापा पहले ऐसे नहीं थे। कल रात कह रहे थे कि मां कुएं के पास खड़ी हैं।
मैंने कोई विरोध नहीं किया। बस सावित्री की कुर्सी को आखिरी बार देखा और चुपचाप उनके साथ चला गया।
3 दिन बाद मुझे अदालत में पेश किया गया।
अनन्या और विक्रम समझ रहे थे कि आज वे मुझे कानूनी तौर पर खत्म कर देंगे।
उन्हें यह नहीं पता था कि जज अरविंद माथुर ने 25 साल पहले मेरे साथ काम किया था।
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भाग 2:
जज अरविंद माथुर कुर्सी से आधे उठ चुके थे और अदालत में बैठे लोग अब अनन्या या विक्रम को नहीं, मुझे देख रहे थे। अरुण खन्ना ने अपना काला कोट सीधा किया और अदालत से कहा कि यह मामला किसी बूढ़े आदमी की भूलने की बीमारी का नहीं, बल्कि योजनाबद्ध संपत्ति-हड़पने, जबरन नशीली दवा देने और फर्जी संरक्षकता का है। विक्रम का चेहरा पहली बार उतर गया, लेकिन अनन्या अब भी उम्मीद कर रही थी कि वह रोकर सब बचा लेगी। अरुण ने पहले लैब रिपोर्ट रखी, फिर बैंक ट्रांसफर, फिर वह नोटिस जिसकी तारीख जानबूझकर छिपाई गई थी। इसके बाद स्क्रीन पर वीडियो चला। विक्रम मेरे अध्ययन-कक्ष में तिजोरी खोल रहा था, जमीन के कागजों की तस्वीरें ले रहा था और फोन पर कह रहा था कि “बूढ़े को अदालत से बाहर आते ही केंद्र में बंद करवा देंगे।” अनन्या ने अपना चेहरा ढक लिया, पर वीडियो यहीं खत्म नहीं हुआ। अगले दृश्य में वह खुद विक्रम से कह रही थी कि दवा की मात्रा थोड़ा बढ़ा दो, क्योंकि पापा अदालत में अगर साफ बोल गए तो सब खत्म हो जाएगा। अदालत में बैठे मेरे पोते आरव की आया भी रो पड़ी, क्योंकि उसने बताया कि आरव कई रातों से पूछता था कि नाना इतने सोए-सोए क्यों रहते हैं। तभी दरवाजा खुला और 2 पुलिसकर्मी एक घायल आदमी को अंदर लाए। वह विक्रम का ड्राइवर महेश था, जिसे पिछली रात शहर से बाहर पीटकर फेंक दिया गया था, क्योंकि उसने अरुण को विक्रम के कर्जदारों और जमीन-माफिया चौहान से जुड़ी फाइल पहुंचाई थी। महेश ने कांपते हुए बयान दिया कि विक्रम सिर्फ जमीन बेचने नहीं जा रहा था; उसने सौदे की रात फार्महाउस में आग लगवाने की योजना बनाई थी, ताकि मेरी मौत को दुर्घटना बताया जा सके और बीमा का पैसा भी मिल जाए। यह सुनते ही अनन्या चीख पड़ी। उसे शायद जमीन की चोरी मालूम थी, दवा की साजिश मालूम थी, लेकिन आग और हत्या की योजना नहीं। जज ने तुरंत पुलिस को आदेश दिया कि विक्रम को हिरासत में लिया जाए। विक्रम अचानक उठा, अनन्या की बांह पकड़कर फुसफुसाया कि अगर वह उसके खिलाफ बोली तो आरव को कभी नहीं देख पाएगी। उसी क्षण अनन्या पहली बार पत्नी नहीं, मां बनी। उसने कांपती आवाज में कहा कि असली दस्तावेज अब भी विक्रम के फार्महाउस वाले लॉकर में हैं, और चौहान के आदमी आज रात वहां पहुंचने वाले हैं। अदालत में सन्नाटा फैल गया। खेल अब सिर्फ मेरी संपत्ति का नहीं, मेरे परिवार की आखिरी बची सांस का था।
भाग 3:
जज अरविंद माथुर ने हथौड़ा इतनी जोर से मारा कि अदालत की लकड़ी की दीवारें तक गूंज उठीं।
—तुरंत सुरक्षा दी जाए। विक्रम सिंह को अदालत परिसर से बाहर नहीं जाने दिया जाएगा। और पुलिस टीम अभी फार्महाउस लॉकर की तलाशी लेगी।
विक्रम ने हंसने की कोशिश की, लेकिन उसकी हंसी गले में अटक गई।
—यह सब नाटक है, माननीय अदालत। एक बूढ़े आदमी और उसके पुराने वकील की कहानी। मेरी पत्नी भावनात्मक दबाव में है।
मैंने पहली बार उसकी आंखों में सीधा देखा।
—नाटक तुमने शुरू किया था, विक्रम। अब आखिरी दृश्य कानून लिखेगा।
अनन्या मेरी तरफ नहीं देख पा रही थी। वह वहीं बैठी थी, जैसे अचानक उसे समझ आया हो कि जिस आदमी को वह कमजोर समझ रही थी, वही कभी दूसरों के घर बचाने के लिए अदालतों में आग बनकर खड़ा होता था। लेकिन मेरे भीतर कोई जीत नहीं थी। मेरे सामने मेरी बेटी थी—वही बच्ची जिसे मैंने सावित्री की मौत के बाद भी कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। वही बच्ची अब मेरे खिलाफ गवाही देने वाली थी।
पुलिस विक्रम को पकड़ने आगे बढ़ी। तभी वह अचानक उछलकर पीछे हट गया और अपनी जेब से छोटा मोबाइल निकालकर किसी को कॉल करने लगा। एक पुलिसकर्मी ने उसका हाथ मोड़ दिया, फोन गिर गया। स्क्रीन पर नाम चमक रहा था—चौहान।
सब समझ गए कि बाहर कोई इंतजार कर रहा था।
अदालत के बाहर अफरा-तफरी मच गई। पुलिस ने तुरंत परिसर बंद करवाया। कुछ ही देर में खबर आई कि अदालत से 500 मीटर दूर एक सफेद बोलेरो पकड़ी गई, जिसमें पेट्रोल के कैन, नकली रजिस्ट्री पेपर, 2 देसी कट्टे और मेरे फार्महाउस का नक्शा मिला था। चौहान के 3 आदमी गिरफ्तार हुए। उनमें से एक ने स्वीकार किया कि रात में फार्महाउस में घुसकर रिकॉर्ड जलाने थे, फिर खाली हिस्से में आग लगानी थी, ताकि पुराने कागज, कैमरे और तिजोरी सब खत्म हो जाएं।
यह सुनकर अनन्या का शरीर जैसे ढह गया। वह कुर्सी से उठी और सीधे मेरे पैरों की तरफ बढ़ी, लेकिन महिला पुलिसकर्मी ने उसे रोक दिया।
—पापा… मुझे नहीं पता था कि वह आपको मरवाना चाहता है।
मैंने बहुत धीरे कहा:
—लेकिन तुम्हें यह पता था कि वह मुझे दवा दे रहा है।
वह रो पड़ी।
—हां।
—तुम्हें यह पता था कि उसने मेरी साइन नकली बनाई।
—हां।
—तुम्हें यह पता था कि मुझे पागल साबित करने की झूठी रिपोर्ट बन रही है।
अनन्या ने आंखें बंद कर लीं।
—हां, पापा।
मेरी आवाज टूट गई, पर मैंने खुद को संभाला।
—फिर फर्क क्या रह गया, बेटी? किसी को मारने के लिए हमेशा आग लगानी जरूरी नहीं होती। कभी-कभी उसकी इज्जत, याददाश्त और अपना कहने वाले लोग छीन लो, वही काफी होता है।
अदालत में बैठे कई लोग सिर झुका चुके थे। जज माथुर की आंखें भी नम थीं, लेकिन उनका स्वर कठोर था।
—अदालत संरक्षकता की याचिका तत्काल खारिज करती है। देवेंद्र प्रताप राठौड़ पूर्णतः मानसिक रूप से सक्षम हैं। अदालत पुलिस को आदेश देती है कि विक्रम सिंह के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक षड्यंत्र, बुजुर्ग पर संपत्ति-संबंधी अत्याचार, बिना सहमति दवा देने और हत्या की साजिश की जांच दर्ज की जाए। अनन्या सिंह की भूमिका पर भी विधि अनुसार कार्रवाई होगी, पर यदि वह जांच में सहयोग करती है तो उसका बयान अलग से दर्ज किया जाएगा।
विक्रम चिल्लाया:
—अनन्या! कुछ मत बोलना! तुम्हें लगता है तुम्हारा बाप तुम्हें बचा लेगा? वह तुम्हें भी जेल भिजवाएगा!
अनन्या ने पहली बार उसे उस नजर से देखा जिसमें डर से ज्यादा घृणा थी।
—मैंने पापा को धोखा दिया। अब अपने बेटे को नहीं दूंगी।
विक्रम ने पुलिस की पकड़ से छूटने की कोशिश की, मगर 2 जवानों ने उसे वहीं दबोच लिया। उसकी महंगी घड़ी फर्श पर गिरकर टूट गई। मुझे अजीब लगा—कभी-कभी इंसान का झूठ भी उसी आवाज में टूटता है।
तलाशी उसी शाम हुई। मेरे फार्महाउस के पीछे विक्रम ने जो छोटा गेस्टहाउस बनवाया था, उसके फर्श के नीचे लोहे का लॉकर मिला। उसमें नकली वसीयत, मेरी जाली साइन वाली पावर ऑफ अटॉर्नी, चौहान से हुए सौदे के कागज, डॉक्टर माथुर को दी गई रिश्वत की रसीदें और अनन्या के कई संदेश थे। एक संदेश ने मेरे भीतर आखिरी बचा भ्रम भी तोड़ दिया।
“दवा सुबह और रात देना। पापा अदालत में कमजोर दिखने चाहिए। बस फार्महाउस बच जाए तो बाद में उन्हें अच्छे केंद्र में रख देंगे।”
फार्महाउस बच जाए। पिता नहीं।
उस रात मैं घर नहीं लौटा। पुलिस सुरक्षा के कारण मुझे शहर के एक सरकारी अतिथि-गृह में रखा गया। कमरे में अकेला बैठा मैं बहुत देर तक सावित्री की तस्वीर देखता रहा। अगर वह होती तो क्या करती? क्या वह अनन्या को माफ कर देती? शायद हां। क्या वह मुझे भूल जाने को कहती? कभी नहीं।
सुबह अनन्या का बयान दर्ज हुआ। उसने स्वीकार किया कि विक्रम ने पहले उसे डराया था कि कर्जदार उनके बेटे आरव को नुकसान पहुंचा देंगे। फिर लालच दिया कि अगर जमीन बिक गई तो वे मुंबई में नया जीवन शुरू करेंगे। उसने यह भी बताया कि विक्रम ने उसे धीरे-धीरे मुझसे दूर किया था। हर बार जब मैं उसे फोन करता, वह कहता:
—तुम्हारे पापा तुम्हें भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करते हैं।
हर बार जब मैं आरव से मिलना चाहता, वह कहता:
—बूढ़े आदमी के पास बच्चा सुरक्षित नहीं है।
झूठ दिन-ब-दिन रिश्ते की दीवार में ईंट बनता गया, और मेरी बेटी ने उसे गिराने के बजाय उस पर घर बनाने की कोशिश की।
डॉक्टर माथुर गिरफ्तार हुआ। चौहान पर पहले से 11 मामले निकले। विक्रम के बैंक खाते सीज हुए। मेरी जमीन पर लगे सभी फर्जी दावे रद्द हुए। अदालत ने मेरे नाम से बुजुर्ग संपत्ति-सुरक्षा निगरानी आदेश जारी किया। कई अखबारों ने यह खबर छापी कि एक पूर्व सरकारी वकील को अपनी ही बेटी और दामाद ने पागल घोषित कराने की साजिश रची। कुछ लोग मुझे शेर कह रहे थे, कुछ कह रहे थे कि पिता ने बेटी को बर्बाद कर दिया।
लोग आसानी से फैसला दे देते हैं। उन्हें यह नहीं दिखता कि अदालत जीतने वाला पिता उसी रात तकिये में मुंह छिपाकर रोया था।
2 महीने बाद मैं फार्महाउस लौटा।
आम के पेड़ों पर छोटे फल आ चुके थे। बरामदे में सावित्री की झूला-कुर्सी वैसी ही थी। तुलसी सूखने लगी थी, क्योंकि मेरे जाने के बाद किसी ने सही से पानी नहीं दिया था। मैंने घुटनों के दर्द के बावजूद खुद बाल्टी उठाई और तुलसी में पानी डाला।
अरुण मेरे साथ था। उसने धीरे से कहा:
—तुम चाहो तो अनन्या से पूरी तरह रिश्ता खत्म कर सकते हो। कानूनी रूप से तुम्हारे पास सब अधिकार हैं।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।
उसी समय बाहर गाड़ी रुकी। पुलिस की अनुमति से अनन्या आई थी। उसके साथ 8 साल का आरव था। वह दुबला, घबराया हुआ और आंखों में डरा हुआ बच्चा लग रहा था। जैसे बड़े लोगों के पाप ने उसके बचपन से रंग चुरा लिया हो।
आरव ने मुझे देखते ही दौड़ लगा दी।
—नानू!
वह मेरी कमर से लिपट गया। मेरी सांस अटक गई। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। वही बाल, वही मासूमियत, जो कभी अनन्या की थी।
—मम्मा कहती हैं उन्होंने बहुत गलत किया। लेकिन आप मुझे छोड़ोगे तो नहीं?
मेरे भीतर जो पत्थर 3 महीने से जमा था, वह उसी पल पिघल गया। मैं घुटनों के बल बैठ गया और उसे सीने से लगा लिया।
—तुझे कोई नहीं छोड़ेगा, बेटा। गलती बड़ों ने की है, सजा बच्चे नहीं काटते।
अनन्या फाटक के पास खड़ी थी। उसने साधारण सूती सलवार-कमीज पहनी थी। कोई गहना नहीं, कोई मेकअप नहीं। चेहरा सूजा हुआ, आंखें लाल, आवाज लगभग बुझी हुई।
—पापा, मैं माफी मांगने आई हूं, लेकिन जानती हूं कि माफी का हक मैंने खो दिया है।
मैं चुप रहा।
—मैंने आपको मरते हुए देखा और फिर भी दवा दी। मैंने आपकी आवाज को पागलपन कहा। मैंने मां की यादों वाले घर को सौदे की चीज बना दिया। मैं विक्रम से डरी हुई थी, पर डर ने मुझे निर्दोष नहीं बनाया।
उसके शब्दों में पहली बार बहाना नहीं था। बस अपराध था।
मैंने पूछा:
—आरव को सच बताया?
वह कांपी।
—हां। जितना उसकी उम्र समझ सकती है।
—और अदालत में?
—मैं पूरा बयान दूंगी। विक्रम के खिलाफ भी, अपने खिलाफ भी।
मैंने बरामदे की तरफ देखा। सावित्री की कुर्सी हवा से हल्की-सी हिल रही थी। जैसे वह वहीं बैठी हो, आंखों से पूछ रही हो कि अब क्या करोगे, देवेंद्र?
मैंने अनन्या से कहा:
—मैं तुम्हें जेल से बचाने की कोशिश नहीं करूंगा। मैं तुम्हें झूठ से बचाने की भी कोशिश नहीं करूंगा। जो कानून तय करेगा, वही होगा।
उसने सिर झुका लिया।
—मुझे मंजूर है।
मैंने आगे कहा:
—लेकिन अगर तुम सच बोलोगी, इलाज करवाओगी, आरव को सुरक्षित रखोगी और हर दिन अपने किए का सामना करोगी, तो मैं दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं करूंगा।
वह रो पड़ी, लेकिन इस बार उसके आंसू मुझे मनाने के लिए नहीं थे। शायद खुद को देखने के लिए थे।
कई महीने लगे। मुकदमा चला। विक्रम और चौहान को लंबी सजा हुई। डॉक्टर माथुर की लाइसेंस रद्द हुई। अनन्या को सहयोग, दबाव और स्वीकारोक्ति के आधार पर कम सजा मिली, पर उससे भी बड़ी सजा उसे समाज ने नहीं, उसके अपने बेटे की आंखों ने दी। आरव जब भी उससे पूछता कि नानू को दवा क्यों दी, वह झूठ नहीं बोलती। कहती:
—क्योंकि मम्मा कमजोर हो गई थी। और कमजोर इंसान जब सच छोड़ देता है, तो बुरा इंसान बन जाता है।
आरव हर रविवार मेरे पास आने लगा। वह खेतों में दौड़ता, आम के पेड़ों पर चढ़ने की कोशिश करता, गाय गौरी को गुड़ खिलाता और सावित्री की कुर्सी पर बैठकर पूछता:
—नानू, नानी कैसी थीं?
मैं उसे बताता कि सावित्री कैसे बारिश में भीगकर चाय बनाती थी, कैसे वह हर मकर संक्रांति को तिल के लड्डू बनाकर आधे गांव में बांट देती थी, कैसे उसने अनन्या के पहले स्कूल-डे पर रोते-रोते मुझे कहा था:
—बच्चे बड़े हो जाते हैं देवेंद्र, पर मां-बाप का मन वहीं अटका रह जाता है।
एक शाम आरव ने खेत में मिट्टी खोदते हुए एक पुराना डिब्बा निकाला। उसमें सावित्री की चिट्ठियां थीं। शायद उसने वर्षों पहले छिपाई थीं। सबसे ऊपर वाली चिट्ठी मेरे नाम थी।
उसमें लिखा था:
“देवेंद्र, अगर मैं पहले चली जाऊं तो इस घर को सिर्फ दीवार मत बनने देना। लोग बदलेंगे, बच्चे गलती करेंगे, समय चोट देगा। लेकिन सच को कभी मत छोड़ना। सच देर से आता है, पर जब आता है तो घर में फिर से दीपक जलता है।”
मैंने चिट्ठी सीने से लगा ली।
उस दिन सूर्यास्त लाल नहीं, सुनहरा था। आरव तुलसी में पानी डाल रहा था। अनन्या फाटक के बाहर खड़ी थी, अदालत की शर्तों के कारण अभी अंदर नहीं आ सकती थी। उसने दूर से हाथ जोड़े। मैंने कुछ पल उसे देखा, फिर धीरे से सिर हिला दिया।
यह माफी नहीं थी।
यह शुरुआत थी।
मेरी जमीन बच गई थी। मेरा नाम बच गया था। मेरी स्मृति बच गई थी। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि मेरी आत्मा कड़वाहट में कैद नहीं हुई थी।
जिन्होंने मुझे पागल साबित करना चाहा, उन्होंने खुद अपना सच अदालत में खोल दिया।
और उस रात, बरामदे में सावित्री की खाली कुर्सी के पास बैठकर मैंने पहली बार बिना दर्द के मुस्कुराया। हवा में आम के पत्ते हिले, जैसे कोई पुरानी आवाज फिर कह रही हो:
—देवेंद्र, अब जीना मत भूलना।
Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.