
भाग 1:
मेजर अर्जुन राठौड़ अपने 8 महीने के सैन्य ऑपरेशन से लौटा ही था कि उसने अपनी पत्नी को पड़ोसियों के सामने कहते सुना—
—उसकी मां को डिमेंशिया हो गया है… खुद को मारती है, फिर मुझ पर इल्जाम लगाती है।
उसी पल ऊपर बंद कमरे के भीतर से उसकी बूढ़ी मां की चीख आई—
—अर्जुन! बेटा, मुझे यहां से निकाल! मैं पागल नहीं हूं!
गुरुग्राम के सेक्टर 46 की वह गली शाम की आरती, प्रेशर कुकर की सीटी और गाड़ियों के हॉर्न से भरी हुई थी। बाहर तुलसी के गमले के पास 4 पड़ोसी खड़े थे। काव्या, अर्जुन की पत्नी, हल्की क्रीम रंग की साड़ी में बिल्कुल सजी-संवरी खड़ी थी, जैसे किसी दुखभरी फिल्म की आदर्श बहू हो। उसके माथे पर छोटी-सी बिंदी थी, आंखों में बनावटी थकान और आवाज में ऐसा दर्द जिसे सुनकर कोई भी उस पर तरस खा ले।
मेजर अर्जुन के कंधे पर सेना का बैग था। वर्दी धूल से भरी थी, आंखों के नीचे नींद की कमी थी, मगर चाल अब भी सीधी और नियंत्रित थी। उसने सोचा था कि घर लौटते ही मां सरसों के तेल से उसका सिर दबाएगी, काव्या चाय देगी, और घर में बेसन के लड्डू की खुशबू होगी। पर घर के दरवाजे पर उसका स्वागत एक झूठ, एक बंद कमरा और उसकी मां की कांपती चीख से हुआ।
पड़ोस की मिसेज माथुर ने आह भरी।
—बेचारी काव्या, इतने महीनों से अकेले सब संभाल रही है। बुजुर्गों की बीमारी बहुत कठिन होती है।
काव्या ने तुरंत पल्लू आंखों तक ले जाकर कहा—
—मैं तो बस इन्हें बचा रही हूं आंटी। रात को उठकर गैस खोल देती हैं, कभी सीढ़ियों से उतरने लगती हैं, कभी कहती हैं कि मैंने इनके गहने चुरा लिए। डॉक्टर ने कहा है कि अब इन्हें सुरक्षित कमरे में रखना जरूरी है।
अर्जुन ने ऊपर देखा। मां के कमरे की खिड़की पर लोहे की ग्रिल के पीछे पर्दा हल्का-सा हिला। फिर हथेली की आवाज आई, जैसे कोई भीतर से दरवाजा पीट रहा हो।
—काव्या, मां के कमरे पर ताला क्यों है?
काव्या का चेहरा 1 सेकंड को सख्त हुआ, फिर उसने तुरंत अर्जुन के सीने से लगकर कहा—
—तुम्हारे लिए कितना इंतजार किया मैंने। तुम समझोगे न? मम्मीजी अब खुद के लिए खतरा बन चुकी हैं।
अर्जुन ने उसकी पीठ पर हाथ रखा। उसकी आवाज शांत थी।
—हां, समझता हूं।
काव्या ने राहत की सांस ली। उसे लगा युद्ध से लौटा पति थका हुआ है, भावुक है, और वही मानेगा जो उसे बताया जाएगा। वह भूल चुकी थी कि सेना में जाने से पहले अर्जुन 3 साल तक सैन्य खुफिया इकाई में वित्तीय धोखाधड़ी और पहचान जालसाजी के केसों पर काम कर चुका था। उसे चेहरों की मुस्कान से ज्यादा उंगलियों की बेचैनी पढ़नी आती थी।
पड़ोसी धीरे-धीरे चले गए। काव्या ने चाय का नाटक किया, फोन पर किसी से धीमे स्वर में बात की, फिर रसोई में चली गई। अर्जुन ने अपना बैग कमरे में रखा और घर को वैसे देखा जैसे कोई सैनिक दुश्मन की पोस्ट देखता है। मां के कमरे की चाबी मुख्य चाबी गुच्छे में नहीं थी। पूजा की अलमारी में नहीं। दराज में नहीं। 18 मिनट बाद वह काव्या के मेकअप बॉक्स के नीचे छोटे मखमली पाउच में मिली।
जब अर्जुन ने दरवाजा खोला तो कमरे से बासी हवा का झटका आया। पंखा बंद था। मोबाइल नहीं था। टीवी नहीं था। खिड़की भीतर से नहीं खुल सकती थी। फर्श पर पतला गद्दा पड़ा था, जिस पर चादर भी नहीं थी। कोने में स्टील का गिलास और आधी सूखी रोटी रखी थी।
सावित्री देवी फर्श पर बैठी थीं। उनके बाल उलझे हुए थे, साड़ी सिकुड़ी हुई थी, मगर आंखें साफ थीं। डर से भरी हुई, पर टूटी हुई नहीं।
उनकी दोनों कलाई पर गहरे नीले निशान थे।
—बेटा, मैं भूलने लगी हूं, यह झूठ है —उन्होंने फुसफुसाकर कहा— वह मुझे पागल साबित करना चाहती है।
अर्जुन उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया। उसकी आंखों में पहली बार दर्द दिखा।
—मां, मुझे पता है।
सावित्री देवी बोलना चाहती थीं, पर बाहर से चूड़ियों की हल्की आवाज आई। उनका चेहरा तुरंत पीला पड़ गया।
—अभी मत पूछ। वह दीवारों के भी कान लगाकर रखती है।
अर्जुन ने मां का हाथ पकड़ा। वह हाथ पहले उसके बचपन में बुखार नापता था, स्कूल की टाई बांधता था, ट्रेनिंग के दिन आशीर्वाद देता था। अब वही हाथ कांप रहा था।
—थोड़ा भरोसा रखो, मां।
सावित्री देवी ने बहुत धीमे कहा—
—मैंने 8 महीने भरोसा रखा। अब देर मत करना।
अर्जुन ने वही किया जो एक बेटे को करते हुए आत्मा फट सकती थी। उसने मां को फिर कमरे में छोड़ा, दरवाजा बाहर से बंद किया और चाबी जेब में रख ली। मगर जाते-जाते उसने मां की हथेली में अपना पुराना छोटा सर्विस बटन दबा दिया, जिसके भीतर माइक्रो रिकॉर्डर छिपा था।
रात के खाने पर काव्या ने मेज पर पालक पनीर, दाल और गरम फुल्के रखे। उसके चेहरे पर पत्नी का स्नेह था, आवाज में चिंता।
—तुम्हें पता है अर्जुन, मैंने बहुत कोशिश की। पर मम्मीजी दिन-ब-दिन बिगड़ती गईं। कभी मुझे नौकरानी कहती हैं, कभी कहती हैं कि यह घर उनका है।
—घर तो सच में उनका है —अर्जुन ने शांत स्वर में कहा।
काव्या ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।
—कागजों में हां। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर संपत्ति संभालना उनके बस की बात नहीं। डॉक्टर मेहरा ने सलाह दी है कि उनकी मानसिक जांच करानी चाहिए। अगर वे अक्षम घोषित हो जाएं तो हम कानूनी अभिभावक बनकर सब संभाल पाएंगे।
उसने मेज पर एक फाइल रखी। उसमें मेडिकल नोट्स, पड़ोसियों के बयान, और संपत्ति से जुड़े कागज थे।
—कौन-सी संपत्ति?
—लखनऊ वाली कोठी। वह पुरानी है, पर लोकेशन बहुत अच्छी है। बेच देंगे तो मम्मीजी के लिए अच्छा वृद्धाश्रम हो जाएगा। और हमारा लोन भी उतर जाएगा।
अर्जुन ने रोटी तोड़ी।
—तुमने बहुत सहा है।
काव्या के चेहरे पर जीत की चमक आई।
—मुझे पता था तुम समझोगे।
उस रात जब काव्या सो गई, अर्जुन ने घर के वाई-फाई लॉग, सीसीटीवी क्लाउड और बैंक ईमेल देखे। आधुनिक कैमरों की फुटेज मिटाई जा चुकी थी, पर डिलीट हिस्ट्री बची थी। हर डिलीट काव्या के लैपटॉप से हुआ था। फिर उसने मां के बैंक खाते का अलर्ट देखा। ईमेल काव्या के निजी अकाउंट पर फॉरवर्ड हो रहे थे। एक निवेश खाते से 82 लाख रुपये निकालने की अधूरी रिक्वेस्ट पड़ी थी। मां के डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल हुआ था।
अर्जुन की सांस भारी हुई, मगर चेहरा ठंडा रहा।
उसने उसी रात बैंक लॉक करवाया, प्रॉपर्टी रिकॉर्ड पर चेतावनी डलवाई, और अपने एक पुराने सैन्य पुलिस मित्र को संदेश भेजा। फिर वह चुपचाप ऊपर गया।
दरवाजा खुलते ही सावित्री देवी उठ बैठीं।
—सच मिल गया?
—आधा।
—बाकी मेरे पास है।
उन्होंने खिड़की की तरफ इशारा किया।
—तेरे पापा ने कभी किसी पर पूरा भरोसा नहीं किया। पुरानी अलमारी के पीछे छोटा कैमरा है। उसे शायद वह सजावट समझती रही।
अर्जुन ने अलमारी हटाई। लकड़ी की पैनलिंग के पीछे धूल भरा छोटा कैमरा था, जिसमें मेमोरी कार्ड लगा था।
सुबह होने से पहले उसने मां से कहा—
—कल डॉक्टर के सामने तुम्हें थोड़ा भ्रमित दिखना होगा।
सावित्री देवी ने अपनी चोट लगी कलाई देखी। फिर उनके चेहरे पर अजीब-सी दृढ़ मुस्कान आई।
—कितनी पागल लगूं?
अर्जुन ने पहली बार अपनी मां को वैसे देखा जैसे बचपन में देखता था—कमजोर शरीर में लोहे का दिल।
उसी क्षण नीचे से काव्या की आवाज आई—
—अर्जुन, तुम ऊपर हो क्या?
सावित्री देवी ने उसकी आंखों में देखा।
—बेटा, अब खेल शुरू हुआ है।
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भाग 2:
अगली सुबह सावित्री देवी बिखरे बालों और पुरानी शॉल में नीचे उतरीं। काव्या ने उन्हें देखते ही फोन कैमरा चालू कर दिया, जैसे वह सबूत जमा कर रही हो। सावित्री देवी ने रसोई की तरफ देखा और धीमे से बोलीं—यह स्टेशन है क्या? लखनऊ जाने वाली ट्रेन यहीं से मिलेगी? काव्या की आंखों में चमक आ गई। —देखा अर्जुन? यही हाल है। इन्हें अपना घर भी याद नहीं। सावित्री देवी लड़खड़ाते हुए मेज तक आईं और जान-बूझकर पानी का गिलास गिरा दिया। काव्या ने तुरंत उनकी कलाई पकड़ ली। पकड़ इतनी तेज थी कि पुराने निशान फिर नीले पड़ने लगे। —नाटक बंद करो बूढ़ी औरत, आज डॉक्टर के सामने भी यही करना, तभी काम जल्दी होगा। अर्जुन ने सिर झुकाए कहा—काव्या, धीरे। काव्या ने हाथ छोड़ा और हंस पड़ी। —अब तुम्हें समझ आया न मैं क्या झेल रही थी? उस दिन दोपहर तक अर्जुन ने सबूतों की दीवार खड़ी कर दी। पुराने कैमरे की फुटेज में काव्या सावित्री देवी का फोन छीनती दिखी, उन्हें कमरे में धकेलती दिखी, और फिर आईने के सामने रोने का अभ्यास करती दिखी। सबसे बड़ा झटका तीसरे वीडियो में था, जिसमें वह राजीव मल्होत्रा नाम के बिल्डर के साथ सोफे पर बैठी थी। राजीव कह रहा था—जैसे ही डॉक्टर डिमेंशिया लिख देगी, बेटे से दस्तखत करवा लेना। फौजी लोग मां के नाम पर जल्दी भावुक हो जाते हैं। लखनऊ वाली कोठी 4 करोड़ से कम में ले लेंगे। काव्या ने हंसकर कहा—और अर्जुन को लगेगा मैंने उसकी मां की सेवा की। फिर उसने राजीव का हाथ पकड़ लिया। अर्जुन ने वीडियो बंद कर दिया। गुस्सा अब आग नहीं रहा, बर्फ बन गया था। शाम को काव्या ने शराब पी और बोली—तुम्हारी मां ने कभी मुझे इस घर की मालकिन नहीं माना। अब देखना, कल वही अपनी कोठी भी मेरे नाम बचाने के लिए छोड़ देगी। अर्जुन ने शांत स्वर में पूछा—अगर वह सच बोल दे तो? काव्या ने मेज पर हाथ मारा। —कौन मानेगा उसे? मैंने 8 महीने में पूरी गली को समझा दिया कि वह पागल है। डॉक्टर रिपोर्ट देगी, पड़ोसी गवाही देंगे, और तुम साइन करोगे। तभी रिकॉर्डर ने हर शब्द कैद कर लिया। उसी रात अर्जुन ने 3 पैकेट भेजे—एक मनोचिकित्सक को, एक वरिष्ठ नागरिक अपराध शाखा को, और तीसरा काव्या के वकील को, ठीक जांच शुरू होने के समय खुलने के लिए। सुबह काव्या मोती की माला पहनकर निकली। उसे लगा वह एक बूढ़ी औरत की आजादी दफनाने जा रही है। उसे पता नहीं था कि एंबुलेंस नहीं, पुलिस भी क्लिनिक पहुंच चुकी थी।
भाग 3:
क्लिनिक गुरुग्राम के एक शांत, महंगे इलाके में था। बाहर कांच का दरवाजा, अंदर सफेद दीवारें, हल्की चंदन की खुशबू और रिसेप्शन पर बैठे लोग। काव्या ने फाइल ऐसे पकड़ी थी जैसे वह कोई विजय पत्र हो। उसके चेहरे पर दया का मुखौटा था, मगर आंखों में जल्दी थी। वह चाहती थी कि सब कुछ खत्म हो जाए—जांच, रिपोर्ट, साइन और फिर संपत्ति।
सावित्री देवी आज नीली बनारसी साड़ी में थीं। यह वही साड़ी थी जो उन्होंने अर्जुन के पिता की रिटायरमेंट पार्टी में पहनी थी। बाल ठीक से बंधे थे, माथे पर हल्की बिंदी थी, और पर्स में अपने पति की पुरानी तस्वीर रखी थी। काव्या को यह सजना पसंद नहीं आया।
—मम्मीजी, इतना तैयार होने की जरूरत नहीं थी। डॉक्टर बीमारी देखती है, फैशन नहीं।
सावित्री देवी ने उसे शांत नज़र से देखा।
—बीमारी नहीं है तो क्या दिखाऊं, बहू?
काव्या ने होंठ भींच लिए।
—ज्यादा चालाक बनने की कोशिश मत कीजिए। अंदर वही बोलिएगा जो घर पर बोलती हैं—कि आपको चीजें याद नहीं रहतीं।
अर्जुन पीछे खड़ा था। उसकी चुप्पी काव्या को अब भी सहमति लग रही थी।
डॉ. नंदिता सेन, वरिष्ठ जेरियाट्रिक मनोचिकित्सक, ने तीनों को कमरे में बुलाया। काव्या ने तुरंत अपनी फाइल आगे बढ़ाई।
—डॉक्टर, मैंने सब लिखा है। गिरना, चिल्लाना, भूलना, झूठे आरोप, हिंसक व्यवहार। मैं तो बस चाहती हूं कि इन्हें सुरक्षित रखा जाए।
डॉ. सेन ने फाइल खोली, फिर अर्जुन की तरफ देखा।
—आप कुछ कहना चाहेंगे?
अर्जुन ने अपना टैबलेट मेज पर रखा।
—जी। पहले यह फाइल भी देख लीजिए।
काव्या की भौंह तन गई।
—कौन-सी फाइल?
अर्जुन ने जवाब नहीं दिया। डॉ. सेन ने दस्तावेज पढ़ना शुरू किया। पहले मेडिकल रिपोर्ट थी, जिसमें साफ लिखा था कि सावित्री देवी की कलाई के निशान गिरने से नहीं, बलपूर्वक पकड़ने या बांधने से बने हो सकते हैं। फिर ताले की रिपोर्ट थी—कमरे की कुंडी उलटी लगाई गई थी, ताकि अंदर बैठा व्यक्ति बाहर न आ सके। फिर बैंक रिकॉर्ड था—डिजिटल सिग्नेचर संदिग्ध, ईमेल डायवर्जन, 82 लाख रुपये की कोशिश। फिर वीडियो स्टिल्स।
डॉ. सेन का चेहरा कठोर हो गया।
—मिसेज काव्या, क्या आप बता सकती हैं कि इन्हें बिना फोन, बिना रोशनी और बाहर से बंद कमरे में क्यों रखा गया था?
काव्या तुरंत बोली—
—सुरक्षा के लिए। ये भाग जाती थीं।
—किस तारीख को भागीं?
काव्या रुक गई।
—कई बार।
—कोई रिपोर्ट? कोई डॉक्टर का नोट? कोई पुलिस सूचना?
काव्या ने अर्जुन की तरफ देखा।
—तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?
अर्जुन ने पहली बार उसकी ओर सीधे देखा।
—अब बोलने का समय मां का है।
डॉ. सेन ने सावित्री देवी से सवाल पूछने शुरू किए। तारीख। दिन। प्रधानमंत्री का नाम। अपने पति का पूरा नाम। दवाइयों का समय। बैंक शाखा। लखनऊ वाली कोठी का प्लॉट नंबर। अर्जुन का रेजिमेंट नंबर। अपने पोते-पोतियों के जन्मदिन। सावित्री देवी ने हर उत्तर साफ, क्रमवार और बिना हड़बड़ाहट के दिया।
फिर डॉक्टर ने 5 शब्द याद रखने को कहे। 12 मिनट बाद सावित्री देवी ने सभी 5 शब्द सही दोहरा दिए। उन्होंने घड़ी का समय बताया, एक छोटी गणना की, और फिर शांत स्वर में कहा—
—डॉक्टर, मुझे बीमारी नहीं है। मुझे बंद किया गया था।
काव्या कुर्सी से उठ खड़ी हुई।
—यह सब रटा हुआ है! अर्जुन ने इन्हें सिखाया है। यह बूढ़ी औरत हमेशा से मुझे घर से निकालना चाहती थी।
डॉ. सेन ने कलम रख दी।
—कृपया बैठ जाइए।
—नहीं! आप लोग मेरी बात क्यों नहीं सुन रहे? 8 महीने मैंने इनकी सेवा की है!
अर्जुन ने टैबलेट पर एक ऑडियो चलाया।
काव्या की अपनी आवाज कमरे में गूंजी—
—कौन मानेगा उसे? मैंने 8 महीने में पूरी गली को समझा दिया कि वह पागल है। डॉक्टर रिपोर्ट देगी, पड़ोसी गवाही देंगे, और तुम साइन करोगे।
काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया।
—यह एडिटेड है।
अर्जुन ने दूसरा वीडियो चलाया। स्क्रीन पर काव्या थी। वह सावित्री देवी का मोबाइल छीन रही थी। फिर उन्हें धक्का देकर कमरे में बंद कर रही थी। तीसरे वीडियो में राजीव मल्होत्रा का चेहरा साफ था।
—जैसे ही डॉक्टर डिमेंशिया लिख देगी, बेटे से दस्तखत करवा लेना।
कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया कि दीवार की घड़ी की टिक-टिक भी तेज लगने लगी।
काव्या ने अचानक टैबलेट छीनने की कोशिश की। अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया, पर झटका नहीं दिया। बस इतना रोका कि वह मेज तक न पहुंच सके।
दरवाजा खुला।
2 महिला पुलिसकर्मी और 1 अधिकारी अंदर आए। उनके पीछे वरिष्ठ नागरिक अपराध शाखा का इंस्पेक्टर था।
—काव्या राठौड़, आपको गैरकानूनी कैद, वरिष्ठ नागरिक के साथ अत्याचार, दस्तावेजी धोखाधड़ी और संपत्ति हड़पने की कोशिश के आरोप में हिरासत में लिया जा रहा है।
काव्या चीखी—
—अर्जुन! तुमने मेरे साथ धोखा किया?
अर्जुन का चेहरा पत्थर जैसा था।
—धोखा तुमने दिया। मैंने सिर्फ अपनी मां को जिंदा बाहर निकाला।
काव्या ने रोते हुए कहा—
—मैं तुम्हारी पत्नी हूं!
सावित्री देवी धीरे से उठीं।
—पत्नी घर जोड़ती है, बहू। तुमने तो मां को कमरे में बंद करके घर की दीवार बेचने की तैयारी कर ली थी।
काव्या की आंखें लाल हो गईं।
—आपने कभी मुझे स्वीकार नहीं किया!
सावित्री देवी की आवाज कांपी नहीं।
—मैंने तुम्हें बेटी कहा था। तुमने मुझे संपत्ति कहा।
ये शब्द काव्या को थप्पड़ से भी ज्यादा लगे। पुलिस ने उसके हाथों में हथकड़ी लगाई। काव्या ने आखिरी कोशिश की।
—राजीव ने कहा था सब कानूनी होगा। मैंने अकेले कुछ नहीं किया।
इंस्पेक्टर ने तुरंत पूछा—
—राजीव मल्होत्रा कहां है?
काव्या चुप हो गई। मगर देर हो चुकी थी। उसी समय राजीव को लखनऊ संपत्ति कार्यालय में पकड़ा गया, जहां वह नकली पावर ऑफ अटॉर्नी जमा करने पहुंचा था। उसके लैपटॉप से 3 और बुजुर्गों की संपत्ति के कागज मिले। वह अकेला बिल्डर नहीं था, बल्कि ऐसे लोगों का हिस्सा था जो अकेले बुजुर्ग, बाहर नौकरी कर रहे बेटे और पुराने मकानों को निशाना बनाते थे।
डॉ. सेन ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा—सावित्री देवी पूर्ण मानसिक क्षमता रखती हैं। उन्हें अभिभावक नहीं, सुरक्षा की जरूरत है। उसी दिन अदालत ने काव्या को सावित्री देवी से दूर रहने का आदेश दिया, खातों को फ्रीज कराया और लखनऊ की कोठी पर किसी भी लेन-देन पर रोक लगा दी।
गली में खबर आग की तरह फैली। जो पड़ोसी कल तक सावित्री देवी को “बेचारी पागल” कह रहे थे, वही अगले दिन उनके दरवाजे पर मिठाई और माफी लेकर खड़े थे। मिसेज माथुर सबसे आगे थीं। उनकी आंखें झुकी हुई थीं।
—सावित्री जी, हमें माफ कर दीजिए। हमने काव्या की बात मान ली।
सावित्री देवी ने उन्हें देर तक देखा।
—झूठ पर भरोसा करना गलती थी, पर मेरी चीख सुनकर भी दरवाजा न खटखटाना पाप था।
मिसेज माथुर रो पड़ीं।
—हमें लगा घर का मामला है।
सावित्री देवी ने धीमे कहा—
—यही सोच सबसे ज्यादा लोगों को कैद रखती है।
अर्जुन ने उस दिन पहली बार गहरी सांस ली। पर जीत के बाद भी घर हल्का नहीं हुआ था। हर दीवार याद दिलाती थी कि मां को यहीं बंद रखा गया था। हर रात सावित्री देवी नींद से उठ जातीं, जैसे कोई फिर दरवाजा बंद कर देगा। अर्जुन ने सेना से छुट्टी बढ़ाने की अर्जी दे दी।
मां ने उसका आवेदन फाड़ दिया।
—तूने देश की कसम खाई है। मेरी वजह से पीछे मत हट।
—मां, मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ सकता।
—मैं अकेली नहीं हूं। अब मेरे पास मेरा फोन है, मेरा बैंक है, मेरा ताला है और मेरी आवाज है। बस एक बात याद रख—जिस बेटे को मां ने डरना नहीं सिखाया, वह मां के डर से अपनी जिंदगी मत रोक।
अर्जुन की आंखें भर आईं।
—आप सच में ठीक हैं?
सावित्री देवी मुस्कुराईं।
—नहीं। ठीक होने में वक्त लगेगा। पर अब मैं बंद नहीं हूं, इतना काफी है।
काव्या का केस 7 महीने चला। वीडियो, ऑडियो, बैंक रिकॉर्ड और डॉक्टर की रिपोर्ट के सामने उसका बचाव टूट गया। उसने आखिरकार अपना अपराध स्वीकार किया। उसे जेल, जुर्माना और वरिष्ठ नागरिकों की संपत्ति से जुड़ी किसी भी कानूनी या वित्तीय प्रक्रिया में शामिल होने पर रोक मिली। राजीव को बड़ी सजा मिली, क्योंकि उसके खिलाफ और पीड़ित सामने आए।
तलाक की सुनवाई छोटी थी। काव्या अदालत में बिना गहनों, बिना मेकअप, बिना उस घमंड के आई जो कभी उसके चेहरे पर चमकता था। उसने अर्जुन की तरफ देखा, शायद चाहती थी कि वह 1 बार दया दिखा दे। लेकिन अर्जुन की नजर अपनी मां पर थी।
सावित्री देवी सफेद सूती साड़ी में अदालत के दरवाजे पर खड़ी थीं। उनकी चाल धीमी थी, पर सिर ऊंचा था। जिन लोगों ने कभी उन्हें कमजोर समझा था, आज वही रास्ता छोड़कर खड़े थे।
घर लौटने के बाद अर्जुन ने मां का बंद कमरा बदल दिया। भारी दरवाजा हटाकर हल्का कांच वाला दरवाजा लगवाया, जो भीतर से खुलता था। दीवारों को हल्का पीला नहीं, बल्कि नीला रंग करवाया, क्योंकि सावित्री देवी ने कहा था कि आसमान का रंग कमरे में आना चाहिए। कोने में लकड़ी की आरामकुर्सी रखी गई, पास में किताबों की अलमारी, एक छोटी तुलसी, नया मोबाइल और उनके पति की तस्वीर।
कमरा अब कैद नहीं था। वह सावित्री देवी का पाठक कक्ष बन गया।
8 महीने बाद, अर्जुन फिर पोस्टिंग पर जाने वाला था। सुबह उसने मां को रसोई में देखा। वह सूजी का हलवा बना रही थीं। घी की खुशबू पूरे घर में फैली थी।
अर्जुन ने मुस्कुराकर पूछा—
—मां, आजकल भूलने की बीमारी कैसी है?
सावित्री देवी ने कड़छी घुमाते हुए कहा—
—बहुत बढ़ गई है बेटा। अब तो मुझे यह भी याद नहीं रहता कि मैं कभी उससे डरती थी।
अर्जुन हंस पड़ा, पर उसकी आंखें भीग गईं। उसने मां के पैर छुए। सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
—जा। इस बार लौटेगा तो दरवाजा खुला मिलेगा।
बाहर गेट पर नया कैमरा लगा था। पर इस बार वह किसी को पकड़ने के लिए नहीं था। वह सिर्फ यह याद दिलाने के लिए था कि इस घर की औरत की आवाज अब दीवारों में दबी नहीं रहेगी।
कभी-कभी रात को सावित्री देवी अपने नए कमरे की खिड़की खोलकर बैठतीं। बाहर गली में बच्चे क्रिकेट खेलते, मंदिर की घंटी बजती, और हवा में चाय की खुशबू आती। वह अपने पति की तस्वीर से कहतीं—
—देखा, मैंने हार नहीं मानी।
फिर वह दरवाजे की तरफ देखतीं।
दरवाजा खुला रहता।
और उस खुले दरवाजे में ही उनकी पूरी जीत खड़ी थी।
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