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जब 5 साल की बच्ची खिलौना भूल गई, देखभाल करने वाली ने पिता की आवाज़ सुनी: “मुझे राक्षस बनाना बंद कर”, फिर एक सुनसान रास्ते ने माँ-बेटी की दबी चीखों का वह सच खोल दिया जिसने सबको अंदर तक हिला दिया

PART 1

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“मुझे पापा के साथ मत भेजिए… प्लीज़,” 5 साल की अनाया झूले के नीचे दुबकी हुई काँप रही थी, जबकि बाकी बच्चे अपने माता-पिता की उँगली पकड़कर खुशी-खुशी बाहर जा रहे थे।

लखनऊ के गोमती नगर की एक शांत गली में बने “नन्ही किरण बाल केंद्र” में शाम का वही रोज़ वाला शोर था—छोटे-छोटे बैग, पानी की बोतलें, अधूरे चित्र, जल्दी में किए गए माथे के चुंबन और दरवाज़े पर खड़े अभिभावकों की आवाज़ें। मीरा अवस्थी, 29 साल की देखभाल करने वाली, बच्चों की ज़िद समझती थी। कोई घर नहीं जाना चाहता था, कोई खिलौना छोड़कर रोता था, कोई नींद के कारण चिड़चिड़ा हो जाता था।

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लेकिन अनाया की हालत ज़िद जैसी नहीं थी।

उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। दोनों हाथ घुटनों से चिपके थे। उसकी छोटी-छोटी उँगलियाँ ऐसे काँप रही थीं जैसे उसने कोई भयानक सपना नहीं, सच देख लिया हो। मीरा धीरे से उसके पास बैठी।

“अनाया बेटा, क्या हुआ? मम्मी आने वाली हैं न?”

अनाया ने सिर हिलाया, फिर होंठ भींच लिए।

“यहाँ सब धीरे बोलते हैं,” उसने फुसफुसाकर कहा, “घर में नहीं।”

मीरा के सीने में जैसे कुछ अटक गया।

“घर में कौन चिल्लाता है?”

अनाया ने जवाब देने के लिए मुँह खोला ही था कि मुख्य द्वार की घंटी बज उठी। मीरा ने रजिस्टर देखा। अनाया को लेने रोज़ उसकी माँ निशा माथुर आती थी। पिता विक्रम माथुर का नाम दूसरे अधिकृत अभिभावक के रूप में था, पर वह महीनों से केंद्र में नहीं आया था।

दरवाज़े पर निशा नहीं, एक लंबा, साफ़-सुथरे कपड़ों वाला आदमी खड़ा था। इस्त्री की हुई कमीज़, चमकते जूते, महँगी घड़ी और चेहरे पर ऐसी शांति, जो स्वाभाविक कम और बनाई हुई ज़्यादा लग रही थी।

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“मैं अनाया माथुर को लेने आया हूँ,” उसने कहा, “मैं उसका पिता हूँ, विक्रम।”

मीरा ने विनम्रता से कहा, “माँ का संदेश आया था कि वही आएँगी। हमें पहचान संकेत मिलाना होगा।”

विक्रम ने मोबाइल आगे कर दिया।

“मेरी पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है। उसने मुझे भेजा है। उसके ही मोबाइल से संदेश भेजा है।”

संकेत मिल गया। काग़ज़ों में उसका नाम था। मीरा के पास रोकने का कोई वैधानिक कारण नहीं था। फिर भी, उसके भीतर कोई घंटी बज उठी।

जब विक्रम कमरे में आया, अनाया ने झूले की लोहे की छड़ पकड़ ली। वह अचानक और छोटी लगने लगी। विक्रम ने हाथ आगे बढ़ाया।

“चलो, बहुत नाटक हो गया।”

अनाया ने मीरा की ओर देखा। वह नज़र मदद माँग रही थी, पर शब्द नहीं निकल रहे थे। मीरा ने उसका बैग उठाया, उसके जूते ठीक किए और नरमी से कहा, “मैं यहीं हूँ, बेटा।”

जैसे ही विक्रम ने उसका हाथ पकड़ना चाहा, अनाया पीछे हट गई।

“नहीं! मैं नहीं जाऊँगी!”

बाहर खड़े 2 अभिभावक पलटकर देखने लगे। विक्रम की मुस्कान सख़्त हो गई। उसने झटके से बच्ची को उठा लिया।

“माफ़ कीजिएगा,” वह बोला, “माँ से बहुत चिपकी रहती है। आज मुझसे ज़िद कर रही है।”

लेकिन मीरा ने उसकी बाँहों में तड़पती अनाया को देखा। यह चिपकना नहीं था। यह डर था।

कुछ मिनट बाद, पिता और बेटी बाहर चले गए। मीरा वहीं खड़ी रह गई, जैसे उसके पैरों ने ज़मीन पकड़ ली हो। तभी सहकर्मी सुनीता ने मेज़ से एक छोटा सफ़ेद कपड़े का खरगोश उठाया।

“अनाया अपना खिलौना भूल गई।”

मीरा ने उसे तुरंत पहचान लिया। अनाया दोपहर की नींद उस खिलौने को गले लगाए बिना नहीं सोती थी। वह दौड़ती हुई बाहर निकली। विक्रम की गाड़ी अभी खड़ी थी। मीरा ने आवाज़ देने को कदम बढ़ाया, तभी कार के भीतर से विक्रम की आवाज़ आई।

“आज वहाँ बहुत तमाशा किया तूने। बिल्कुल अपनी माँ जैसी है—मुझे राक्षस साबित करने में लगी रहती है।”

अनाया ने कुछ नहीं कहा।

मीरा के हाथ में पकड़ा कपड़े का खरगोश दब गया। वह कुछ बोलती, उससे पहले ही कार तेज़ी से सड़क पर निकल गई।

एक पल के लिए मीरा ने खुद को रोका। फिर उसने अपने स्कूटर की चाबी निकाली।

उसे नहीं पता था कि वह नियम तोड़ रही है या किसी जान को बचाने जा रही है… पर भीतर से एक आवाज़ कह रही थी कि अगर उसने आज अनाया को यूँ जाने दिया, तो शायद कल वह बच्ची बोलने के लिए बचे ही नहीं।

PART 2

मीरा ने विक्रम की गाड़ी से दूरी बनाए रखी। वह खुद से कहती रही कि वह बस खिलौना लौटाने जा रही है, बस यही।

पर सच यह था कि अनाया की आँखें उसका पीछा कर रही थीं।

गाड़ी मुख्य सड़क छोड़कर शहर के किनारे की तरफ़ मुड़ गई। चाट की दुकानें पीछे छूट गईं, फिर दवा की दुकानें, फिर मकानों की कतारें। आगे खाली प्लॉट, अधबनी दीवारें और पेड़ों से घिरा सुनसान रास्ता था।

मीरा का गला सूख गया।

गाड़ी एक सँकरे कच्चे मोड़ पर रुकी। विक्रम उतरा, फिर पीछे का दरवाज़ा खोलकर अनाया का हाथ खींचा। बच्ची चल नहीं रही थी।

मीरा स्कूटर रोककर उतरी।

“विक्रम जी! अनाया का खिलौना रह गया था।”

विक्रम मुड़ा। उसके चेहरे की मुस्कान गायब थी।

“आप हमारा पीछा कर रही थीं?”

मीरा ने काँपते हुए खरगोश आगे किया।

“यह इसके लिए ज़रूरी है।”

अनाया की आँखें चमक उठीं, पर वह आगे नहीं बढ़ी। विक्रम ने खिलौना छीनकर बच्ची को पकड़ा दिया।

“अब जाइए।”

मीरा ने चारों ओर देखा। वहाँ कोई घर नहीं था।

“इतनी शाम को बच्ची को यहाँ क्यों लाए हैं?”

विक्रम ने दाँत भींचे।

“उसे डर निकालना था।”

मीरा जम गई।

उसी क्षण अनाया ने पहली बार साफ़ कहा, “आंटी, मम्मी को बचा लीजिए।”

PART 3

विक्रम का चेहरा राख जैसा पड़ गया। उसने तुरंत अनाया का मुँह हथेली से ढकना चाहा, पर मीरा एक कदम आगे बढ़ी।

“बच्ची को हाथ मत लगाइए।”

उसकी आवाज़ उतनी मज़बूत नहीं थी जितनी वह चाहती थी, फिर भी उसमें डर से ज़्यादा ग़ुस्सा था। अनाया ने खरगोश को सीने से चिपका लिया और रोने लगी। विक्रम ने चारों तरफ़ देखा, जैसे कोई गवाह न मिले तो सच बदल जाएगा।

“आपको पता भी है आप क्या कर रही हैं?” उसने धीमे, खतरनाक स्वर में कहा। “मैं उसका पिता हूँ। यह मेरा परिवार है। आप एक मामूली देखभाल करने वाली हैं।”

मीरा ने जवाब नहीं दिया। उसने मोबाइल जेब में ही चालू कर दिया था। रिकॉर्डिंग शुरू हो चुकी थी।

“अनाया,” उसने धीमे से कहा, “मम्मी कहाँ हैं?”

अनाया ने काँपती आवाज़ में कहा, “बाथरूम में बंद हैं। पापा ने कहा था अगर मैं स्कूल में कुछ बोलूँगी तो मम्मी फिर कभी बाहर नहीं आएँगी।”

मीरा की आँखों के आगे अँधेरा-सा छा गया।

विक्रम आगे लपका। “चुप!”

मीरा पीछे हटी, लेकिन भागी नहीं। उसने नंबर मिलाया—112।

विक्रम ने मोबाइल छीनने की कोशिश की। मीरा ने स्कूटर के पीछे घूमकर दूरी बनाई। ऑपरेटर की आवाज़ आई, और मीरा ने बिना रुके पता, गाड़ी का नंबर और हालात बता दिए। विक्रम ने अनाया को बाँह से पकड़कर खींचा।

“चल घर।”

इस बार अनाया चीखी नहीं। वह बस मीरा को देखती रही। वही नज़र फिर से—मदद की आख़िरी पुकार।

मीरा जानती थी कि अकेले वह उसे रोक नहीं सकती। वह विक्रम की गाड़ी के पीछे फिर चली, लेकिन इस बार उसका मोबाइल पुलिस से जुड़ा था। कुछ ही मिनटों में गाड़ी गोमती नगर विस्तार की एक सफ़ेद 2 मंज़िला कोठी के सामने रुकी। घर बाहर से संभ्रांत था—लोहे का फाटक, तुलसी का गमला, दरवाज़े पर पीतल की घंटी, बरामदे में महँगी कुर्सियाँ। ऐसे घरों को देखकर पड़ोसी अक्सर सोचते हैं कि भीतर सब ठीक होगा।

पर भीतर से एक दबा हुआ धमाका आया।

फिर काँच टूटने की आवाज़।

फिर एक औरत की चीख—“विक्रम, मत करो! अनाया के सामने मत करो!”

मीरा का पूरा शरीर काँप गया। उसने स्कूटर बंद किया, दीवार की ओट में खड़े होकर मोबाइल की रिकॉर्डिंग फिर चालू की। परदे के पीछे 2 परछाइयाँ हिल रही थीं। एक छोटी परछाई कोने में सिकुड़ी थी। दूसरी बड़ी परछाई ने कुछ उठाया—शायद लोहे की छड़।

तभी मुख्य दरवाज़ा खुला। विक्रम बाहर निकला। उसके चेहरे पर वह सभ्य आदमी नहीं था जो बाल केंद्र आया था। उसकी आँखों में जंगली क्रोध था। बाँह पर खरोंच थी। वह कार की डिक्की की ओर बढ़ा।

मीरा ने साँस रोक ली।

उसी समय गली में पुलिस की गाड़ी की लाल-नीली रोशनी चमकी। 2 पुलिस वाहन तेज़ी से आकर रुके। 4 पुलिसकर्मी उतरे।

“हाथ ऊपर कीजिए!”

विक्रम ठिठक गया। एक पल को उसने भागने की कोशिश में गर्दन घुमाई, मगर रास्ता बंद था। उसके हाथ धीरे-धीरे ऊपर उठे।

“यह औरत पागल है!” वह चिल्लाया। “यह मेरी बच्ची के केंद्र से मेरा पीछा कर रही है। मेरे परिवार में दखल दे रही है!”

एक महिला पुलिस अधिकारी, निरीक्षक कविता सिंह, मीरा के पास आईं।

“कॉल आपने किया था?”

मीरा ने सिर हिलाया। “जी। मैं अनाया के बाल केंद्र में काम करती हूँ। बच्ची ने मदद माँगी थी। मेरे पास रिकॉर्डिंग है।”

कविता ने तुरंत एक सिपाही को इशारा किया। दूसरे ने विक्रम को गाड़ी से दूर किया। डिक्की खोली गई। भीतर से एक भारी लोहे की रॉड, मोटी रस्सी और कपड़े का पुराना टुकड़ा निकला।

मीरा का खून ठंडा पड़ गया।

विक्रम चिल्लाया, “घर की मरम्मत का सामान है!”

कविता ने उसे घूरा। “मरम्मत घर की होती है, इंसान की नहीं।”

पुलिस घर में घुसी। कुछ मिनटों बाद अनाया बाहर आई। उसके हाथ में वही कपड़े का खरगोश था। जैसे ही उसने मीरा को देखा, वह दौड़कर उससे लिपट गई।

“आंटी…”

मीरा घुटनों पर बैठ गई और उसे अपने सीने से लगा लिया।

“अब कोई तुम्हें नहीं डाँटेगा, बेटा। अब तुम सुरक्षित हो।”

अनाया की सिसकियाँ बहुत धीमी थीं, जैसे वह रोना भी सीखकर नहीं, छिपाकर करती रही हो।

अंदर से निशा माथुर को बाहर लाया गया। उसके होंठ फटे थे, गाल सूजा हुआ था, साड़ी का पल्लू आधा फटा था। हाथों पर पुराने नीले निशान थे और कलाई पर ताज़ा चोट। वह चलते हुए लड़खड़ा रही थी। अनाया ने माँ को देखा तो मीरा से छूटकर भागी।

“मम्मी!”

निशा ने अपनी बच्ची को पकड़ते ही ऐसा रोना शुरू किया जैसे उसके भीतर बरसों से बंद नदी टूट गई हो।

“मेरी बच्ची… तूने बताया? तूने बता दिया?”

अनाया ने सिर हिलाया। “मैंने आंटी को बोला। पापा मुझे पेड़ों के पास ले गए थे। बोले, अगर मैंने मम्मी वाली बात किसी को बताई तो मुझे वहीं बाँध देंगे।”

निशा की आँखें बंद हो गईं। उसके चेहरे पर दर्द, अपराधबोध और राहत एक साथ आ गए।

कविता सिंह ने तुरंत महिला कांस्टेबल को बच्ची और माँ के साथ रहने को कहा। एम्बुलेंस बुला ली गई। पड़ोसी दरवाज़ों से झाँकने लगे। वही लोग जो महीनों से रात में आवाज़ें सुनकर टीवी की आवाज़ बढ़ा देते थे, अब फुसफुसा रहे थे—“हमें तो लगा घर का मामला होगा।”

घर का मामला।

मीरा को इस वाक्य से अचानक घृणा हो गई।

कुछ देर बाद, निशा ने टूटी आवाज़ में सच बताया। विक्रम एक समय में बैंक में शाखा प्रबंधक था। शादी के शुरुआती साल ठीक थे। वह समझदार दिखता था, बेटी के जन्म पर मिठाई बाँटता था, रिश्तेदारों के सामने आदर्श पति बनकर खड़ा रहता था। पर धीरे-धीरे उसका असली चेहरा सामने आने लगा।

पहले उसने निशा की नौकरी छुड़वाई।

“घर संभालो, मेरी इज़्ज़त संभालो,” वह कहता।

फिर उसने उसके मोबाइल की जाँच शुरू की। फिर मायके जाना कम करवाया। फिर हर खर्च का हिसाब माँगने लगा। निशा ने विरोध किया तो उसने कहा कि एक अच्छी पत्नी पति से सवाल नहीं करती। वह बाहर लोगों के सामने हँसता, मंदिर में दान करता, परिवार की तस्वीरें लगाता, पर भीतर वह हर बात पर टूट पड़ता।

सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब विक्रम ने अपने एक रिश्तेदार के कहने पर ज़मीन में पैसा लगाया। सौदा डूब गया। कर्ज़ बढ़ गया। बैंक में उसकी जाँच शुरू हो गई। उसने अपनी गलती मानने के बजाय निशा को दोष दिया।

“तू अशुभ है,” वह कहता। “तेरे आने के बाद ही मेरा घर डूबा।”

निशा ने पहली बार तलाक़ की बात की तो विक्रम ने अनाया को ढाल बना लिया।

“एक बार मुँह खोला तो बच्ची कभी नहीं मिलेगी।”

निशा चुप रही। वह रोज़ टूटती रही। अनाया सब देखती रही। बच्ची को सीधे कम मारा गया, पर डर उसके भीतर ऐसे भरा गया कि वह रात को नींद में भी कहती—“मैं नहीं बताऊँगी।”

उस दिन दोपहर में विक्रम को पता चला था कि निशा ने महिला सहायता केंद्र का नंबर एक पुराने काग़ज़ पर लिखकर रखा है। उसने निशा को बाथरूम में बंद किया, उसका मोबाइल छीन लिया और अनाया को लेने चला गया। उसका इरादा बच्ची को डराकर चुप कराना था। पेड़ों वाला सुनसान रास्ता उसी डर का हिस्सा था। वह चाहता था कि 5 साल की बच्ची समझ जाए कि माँ को बचाने की कोशिश करने का मतलब खुद खतरे में पड़ना है।

पर उसने एक बात नहीं सोची थी—कभी-कभी बच्चों की चुप्पी से ज़्यादा उनकी काँपती आँखें बोल देती हैं।

पुलिस ने घर से और चीज़ें भी बरामद कीं—टूटा हुआ काँच, दीवार पर खून नहीं बल्कि सूखी चोटों के निशान, निशा का छिपाया हुआ काग़ज़, और एक पुराना मोबाइल जिसमें उसने कई रातों की आवाज़ें रिकॉर्ड कर रखी थीं। उन रिकॉर्डिंग में विक्रम की धमकियाँ साफ़ थीं।

“किसी को बताया तो बच्ची को गायब कर दूँगा।”

“तेरे मायके वाले मेरी पहुँच नहीं जानते।”

“लोग मुझे मानते हैं, तुझे पागल कहेंगे।”

अब वही आवाज़ें उसके ख़िलाफ़ सबूत बन रही थीं।

विक्रम को थाने ले जाया गया। वह जाते-जाते भी चिल्लाता रहा।

“निशा, सोच ले! समाज में मुँह दिखाने लायक नहीं बचेगी!”

निशा ने पहली बार सिर उठाकर उसे देखा। आवाज़ कमज़ोर थी, पर शब्द सीधा उसके चेहरे पर लगे।

“आज से समाज नहीं, मेरी बेटी देखेगी कि उसकी माँ चुप नहीं रही।”

विक्रम की आँखों में पहली बार डर आया।

अगले दिन बाल संरक्षण समिति को सूचना दी गई। निशा और अनाया को सुरक्षित आश्रय में रखा गया। मेडिकल जाँच हुई। बयान दर्ज हुए। अदालत से संरक्षण आदेश मिला। विक्रम को निशा और अनाया के पास आने से रोका गया। बैंक की जाँच भी दोबारा खुली, क्योंकि उसके वित्तीय दबाव और झूठे लेन-देन की बातें सामने आने लगीं।

मीरा को कई बार बयान देने जाना पड़ा। कुछ लोगों ने कहा कि उसने “सीमा पार” की। कुछ ने कहा कि वह नौकरी खो सकती थी। पर बाल केंद्र की संचालिका ने सबके सामने कहा, “जिस दिन हमारी देखभाल करने वाली किसी डरी हुई बच्ची की आँखों को अनदेखा कर देगी, उस दिन यह केंद्र बंद कर देना चाहिए।”

कुछ सप्ताह बाद अनाया फिर केंद्र आई। वह पहले जैसी चंचल नहीं हुई थी। उसके भीतर डर अभी भी था। तेज़ आवाज़ पर वह चौंक जाती। कोई पुरुष अभिभावक ऊँची आवाज़ में बोलता तो वह मीरा के पीछे छिप जाती। पर अब उसके हाथ में वही सफ़ेद खरगोश था, और उसके बैग में निशा ने एक छोटा-सा काग़ज़ रखा था—

“मेरी बेटी को सुनने के लिए धन्यवाद।”

मीरा ने वह काग़ज़ पढ़ा तो उसकी आँखें भर आईं।

धीरे-धीरे अनाया ने रंग भरना फिर शुरू किया। पहले उसके चित्रों में घर काले रंग का होता था, दरवाज़े बंद होते थे, खिड़कियाँ बिना रोशनी की होती थीं। फिर एक दिन उसने नया चित्र बनाया—एक घर, जिसके बाहर 2 औरतें थीं। एक की साड़ी गुलाबी थी, दूसरी ने नीला कुर्ता पहना था। बीच में एक बच्ची थी, हाथ में सफ़ेद खरगोश।

मीरा ने पूछा, “यह कौन है?”

अनाया ने उँगली रखकर बताया, “यह मम्मी। यह मैं। और यह आप।”

“घर किसका है?”

अनाया ने थोड़ा सोचा, फिर बोली, “जहाँ कोई चिल्लाता नहीं।”

उस शाम जब निशा उसे लेने आई, उसने मीरा को folded hands से धन्यवाद कहना चाहा। मीरा ने तुरंत उसके हाथ थाम लिए।

“ऐसा मत कीजिए। आपने बहुत सहा है। अब बस जीना है।”

निशा ने अनाया को देखा। “हाँ। अब हम डरकर नहीं रहेंगे।”

बाल केंद्र के बाहर शाम वही थी—माता-पिता, बैग, पानी की बोतलें, बच्चों की आवाज़ें। दुनिया बाहर से वैसी ही लग रही थी। पर मीरा के लिए सब बदल चुका था।

उसने समझ लिया था कि हर रोता बच्चा ज़िद्दी नहीं होता। हर चुप बच्चा शांत नहीं होता। हर साफ़-सुथरे कपड़ों वाला पिता सुरक्षित नहीं होता। और हर टूटी हुई माँ कमज़ोर नहीं होती।

कभी-कभी मदद की पुकार शब्दों में नहीं आती। वह झूले के नीचे काँपती मिलती है। वह एक खिलौना भूल जाने में छिपी होती है। वह एक नज़र में अटकी होती है, जो कहती है—“मुझे मत छोड़ो।”

और उस दिन मीरा ने सचमुच नहीं छोड़ा।

एक छोटे सफ़ेद खरगोश ने रास्ता दिखाया, एक बच्ची की नज़र ने सच खोल दिया, और एक औरत ने यह साबित कर दिया कि जब दुनिया “घर का मामला” कहकर मुँह फेरती है, तब भी कोई एक इंसान खड़ा हो सकता है।

क्योंकि कभी-कभी किसी कहानी का अंत अदालत नहीं बदलती, पुलिस नहीं बदलती, समाज नहीं बदलता।

कभी-कभी अंत बदलता है वह इंसान, जो सड़क पर जाती हुई एक डरी हुई बच्ची को देखकर कहता है—नहीं, आज मैं आँखें बंद नहीं करूँगा।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.