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जन्मदिन की मेज़ पर सास ने 7 साल की बच्ची को धक्का देकर कहा, “यहाँ असली बच्चों की जगह है,” 18 रिश्तेदार चुप बैठे रहे, पति ने बस एक भूरा अदालत वाला लिफ़ाफ़ा खोला… और उसी रात परिवार की सबसे बड़ी सच्चाई बाहर आने वाली थी।

PART 1

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जन्मदिन की मेज़ पर सबके सामने, सुषमा ने 7 साल की छोटी अनाया का हाथ झटककर कहा, “यहाँ मेरे बेटे के असली बच्चों की जगह है, किसी और की बेटी की नहीं।”

डाइनिंग हॉल में जैसे अचानक किसी ने आरती की थाली गिरा दी हो। चम्मच हवा में रुक गए, हँसी गले में अटक गई, और अनाया अपनी पीली फ्रॉक में, गोद में छोटा-सा गिफ्ट बैग दबाए, कुर्सी पर जमी रह गई। उसे समझ नहीं आया कि अभी-अभी उसने कौन-सा पाप कर दिया था।

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वह शाम जयपुर के सिविल लाइंस की एक बड़ी हवेली में थी। हवेली के बाहर गेंदे की मालाएँ लटकी थीं, अंदर चंदन और घी की खुशबू थी, और बीच में रखी लंबी मेज़ पर चाँदी के कटोरे, काँच के गिलास और सफ़ेद कढ़ाईदार मेज़पोश सजा था। यह राघव मल्होत्रा का 39वाँ जन्मदिन था। उसकी माँ सुषमा मल्होत्रा ने सुबह से पूरे घर को ऐसे चमकाया था, जैसे बेटे का जन्मदिन नहीं, अपने खानदान की नुमाइश हो।

राघव की पहली शादी से 2 बच्चे थे—आर्यन, 16 साल का, चुप-सा लड़का, जो हर बात को कानों में ईयरफोन लगाकर सह लेता था; और काव्या, 13 साल की, तेज़ बोलने वाली, मगर भीतर से बहुत नरम। राघव की पत्नी निशा इन दोनों की सौतेली माँ थी, लेकिन उसने कभी माँ बनने की ज़िद नहीं की। उसने बस दरवाज़ा खुला रखा—स्कूल से लौटने पर गरम पराठे, परीक्षा की रात चाय, बुखार में माथे पर पट्टी, और उनकी असली माँ के बारे में कभी एक कड़वा शब्द नहीं।

अनाया निशा की बेटी थी। जब राघव निशा की ज़िंदगी में आया, अनाया सिर्फ 3 साल की थी। पहले दिन उसने राघव को “अंकल” कहा था, दूसरे महीने “राघव पापा” और फिर एक दिन सीधे “पापा”। राघव ने उसे कभी रोका नहीं। वह उसके बालों में तेल लगाता, स्कूल प्रोजेक्ट में थर्मोकोल काटता, साइकिल चलाना सिखाते हुए खुद गिर पड़ता, और रात में उसके डर लगने पर हनुमान चालीसा धीमे स्वर में सुनाता।

लेकिन सुषमा के लिए अनाया हमेशा “निशा की लड़की” रही। सुंदर, विनम्र, मीठी, लेकिन मल्होत्रा खून की नहीं। और सुषमा के घर में खून को प्यार से ऊपर रखा जाता था।

अनाया ने उस दिन अपना गिफ्ट खुद बनाया था। लाल कागज़ की कार्ड पर उसने टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—“मेरे सबसे अच्छे पापा के लिए।” साथ में मोतियों का ब्रेसलेट और एक चित्र था, जिसमें राघव, निशा, आर्यन, काव्या, अनाया और उनका कुत्ता मोती हवेली के सामने खड़े थे। चित्र में सबके चेहरे गोल थे, लेकिन सब मुस्कुरा रहे थे।

सुषमा पहले धीरे से आई। उसने अनाया की कुर्सी के पीछे हाथ रखा।

“बेटा, तुम अंदर वाले कमरे में बैठ जाओ। यहाँ बड़े लोगों और अपने बच्चों की जगह है।”

अनाया ने मासूमियत से कहा, “पर पापा ने कहा था मैं उनके पास बैठूँगी।”

सुषमा के चेहरे पर मुस्कान थी, पर आँखें ठंडी थीं।

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“राघव बहुत भावुक है। लेकिन हर बात का एक हिसाब होता है। असली बच्चों को पहले जगह मिलती है।”

निशा ने तुरंत सिर उठाया।

“माँजी, अनाया भी राघव की बेटी है।”

सुषमा हँसी, ऐसी हँसी जो शब्दों से ज़्यादा चोट करती है।

“निशा, समाज में रहने के कुछ नियम होते हैं। रिश्ते बोल देने से नहीं बनते।”

18 मेहमान बैठे थे। बुआ, मामा, चचेरे भाई, पड़ोसी, बिज़नेस पार्टनर। सबने सुना। किसी ने कुछ नहीं कहा। आर्यन ने प्लेट में नज़र गड़ा ली। काव्या ने अपनी नैपकिन इतनी मरोड़ी कि वह रस्सी जैसी हो गई। राघव के पिता महेंद्र पानी का गिलास पकड़कर पत्थर बन गए।

अनाया की आँखें भर आईं।

“दादी, मैं बस पापा को गिफ्ट दे दूँ?”

“बाद में,” सुषमा ने कहा।

अनाया कुर्सी से उतरने में देर कर रही थी। तभी सुषमा ने उसका बाजू पकड़ा और उसे दरवाज़े की तरफ़ खींचा।

निशा खड़ी हो गई।

“हाथ छोड़िए उसका।”

सुषमा ने झुँझलाकर कहा, “नाटक मत करो। कोई उसे घर से नहीं निकाल रहा। बस उसे समझा रही हूँ कि अपनी जगह पहचाननी चाहिए।”

फिर उसने अनाया को धक्का दिया।

छोटी बच्ची चौखट से टकराई। उसका गिफ्ट बैग गिरा। मोती बिखर गए। कार्ड मुड़ गया। अनाया रोती हुई अंदर के कमरे में भाग गई।

उसी पल दरवाज़े पर राघव खड़ा था।

उसके हाथ में फोन था, चेहरा सफ़ेद, आँखें जलती हुई। उसने ज़मीन पर बिखरे मोती देखे, फिर निशा का काँपता चेहरा, फिर अंदर से आती अनाया की सिसकियाँ।

वह कुछ बोला नहीं। बस अंदर गया, अनाया को गोद में उठाकर बाहर लाया, और सबके सामने अपनी कुर्सी के पास खड़ा कर दिया।

फिर उसने निशा से कहा, “किचन में जो भूरा लिफ़ाफ़ा रखा है, उसे लेकर आओ।”

सुषमा ने होंठ सिकोड़ लिए।

“अब क्या तमाशा करेगा, राघव?”

राघव ने ठंडी आवाज़ में कहा, “तमाशा 4 साल से चल रहा था, माँ। आज पर्दा उठेगा।”

PART 2

निशा काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा लेकर आई। राघव ने उसे मेज़ पर रखा और अनाया के कंधे पर हाथ कस दिया।

“माँ, अभी सबके सामने फिर से बोलो—अनाया मेरी असली बेटी नहीं है।”

सुषमा ने गर्दन ऊँची की, “मैंने गलत क्या कहा? आर्यन और काव्या तुम्हारे खून हैं।”

राघव की आँखें भर आईं, पर आवाज़ नहीं टूटी।

“खून ने अनाया को बुखार में रात भर गोद में नहीं उठाया। खून ने उसकी स्कूल फीस नहीं भरी। खून ने उसे पहली बार ‘पापा’ कहते सुनकर रोया नहीं। मैंने रोया था।”

काव्या अचानक खड़ी हो गई।

“दादी, आप हमेशा ऐसा करती हैं। दिवाली पर आपने हमें सोने की चेन दी और अनाया को पुरानी चॉकलेट का डिब्बा।”

आर्यन ने भी कुर्सी पीछे धकेली।

“और फोटो खिंचवाते समय उसे हमेशा किनारे कर देती हैं। वह हमारी बहन है।”

अनाया ने पहली बार सिर उठाया।

राघव ने लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें से अदालत के कागज़ निकले।

“2 साल पहले,” उसने कहा, “मैंने अनाया को कानूनी रूप से गोद ले लिया था।”

सुषमा का चेहरा राख जैसा हो गया।

तभी राघव ने दूसरी कार्ड निकाली।

“और आज हम बताने वाले थे कि हमारे घर एक और बच्चा आने वाला है। उसके 3 बड़े भाई-बहन होंगे—आर्यन, काव्या और अनाया।”

PART 3

मेज़ पर रखा केक अचानक बहुत छोटा लगने लगा, और उस कमरे में खड़ी सच्चाई बहुत बड़ी। सुषमा ने कुर्सी पकड़ ली, जैसे पैरों ने साथ छोड़ दिया हो। उसके चेहरे पर अपमान था, गुस्सा था, लेकिन सबसे ज़्यादा डर था—वह डर जो किसी को तब लगता है जब अपनी ही बनाई दीवार उसके ऊपर गिरने लगती है।

“तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?” उसने धीमे मगर कड़वे स्वर में पूछा।

राघव ने कागज़ मोड़कर फिर सीधा किया।

“क्योंकि मुझे डर था कि तुम कानून को भी नया अपमान बना दोगी। अनाया को मिठाई खिलाने के बजाय कहोगी कि कागज़ से खून नहीं बदलता।”

सुषमा ने तुरंत कहा, “मैं इतनी बुरी नहीं हूँ।”

काव्या रोते हुए बोली, “आप हैं, दादी। कम से कम अनाया के लिए तो आप बुरी रही हैं।”

यह सुनते ही कमरे में कई सिर झुक गए। जिन लोगों ने वर्षों तक सुषमा के तानों को “बुज़ुर्गों की आदत” कहकर टाल दिया था, वे अब उस आदत की कीमत एक बच्ची के चेहरे पर देख रहे थे।

आर्यन अनाया के पास आया। उसकी चाल धीमी थी, जैसे वह भावुक होने से शर्माता हो। उसने अनाया का टूटा हुआ ब्रेसलेट ज़मीन से उठाया, बिखरे मोती अपनी हथेली में जमा किए और बोला, “मैं इसे ठीक कर दूँगा। वैसे भी तुम्हारी बनाई चीज़ें हमेशा टेढ़ी होती हैं।”

अनाया ने आँसू पोंछे।

“बुरी लगती हैं?”

आर्यन ने नज़रें चुराईं।

“नहीं। बस… पहचान में आ जाती हैं कि तुमने बनाई हैं।”

काव्या ने उसे गले लगा लिया।

“और अगर किसी ने फिर तुम्हें अंदर वाले कमरे में भेजा, तो मैं भी वहीं जाऊँगी। लेकिन टीवी का रिमोट मेरा होगा।”

अनाया की हँसी हल्की-सी निकली, टूटी हुई, पर जिंदा।

महेंद्र अब तक चुप थे। वह वही आदमी थे जिन्होंने पूरी ज़िंदगी सुषमा की कठोर बातों को “उसका स्वभाव” कहकर ढँक दिया था। उन्होंने घर की इज़्ज़त बचाने के नाम पर हर बार किसी न किसी की चोट को नज़रअंदाज़ किया। लेकिन आज जब उन्होंने अनाया की काँपती उंगलियाँ देखीं, तो उन्हें पहली बार लगा कि चुप रहना भी कभी-कभी धक्का देने जैसा ही होता है।

वह धीरे-धीरे उठे। उनकी उम्र 71 थी, घुटनों में दर्द रहता था, फिर भी वह अनाया के सामने आकर घुटनों के बल बैठ गए। पूरे हॉल में साँसें थम गईं।

सुषमा घबरा गई।

“महेंद्र जी, यह क्या कर रहे हैं? उठिए।”

महेंद्र ने उसकी ओर नहीं देखा।

“अनाया,” उनकी आवाज़ भारी थी, “दादाजी से गलती हुई।”

अनाया ने उलझकर पूछा, “आपने क्या किया?”

महेंद्र की आँखों में पानी आ गया।

“मैंने कुछ नहीं किया। यही मेरी गलती थी। जब तुम्हारे लिए कम मिठाई रखी गई, मैं चुप रहा। जब तुम्हें फोटो से हटाया गया, मैं चुप रहा। जब तुम्हें नाम से नहीं, ‘निशा की लड़की’ कहकर बुलाया गया, मैं चुप रहा। आज तुम्हें धक्का दिया गया, तब भी मैं तुरंत नहीं उठा। मुझे माफ़ कर दो, बेटा।”

निशा का दिल भर आया। वह समझ रही थी कि यह माफ़ी सिर्फ अनाया से नहीं, उन तमाम बच्चों से थी जिन्हें बड़े लोग रिश्तों की राजनीति में चोट पहुँचाते हैं और फिर कहते हैं—“बच्चे हैं, भूल जाएँगे।”

अनाया ने कुछ पल महेंद्र को देखा। फिर उसने अपना छोटा हाथ उनके गाल पर रखा।

“आप अब चुप नहीं रहोगे?”

महेंद्र रो पड़े।

“नहीं, बेटा। अब नहीं।”

अनाया ने उन्हें गले लगा लिया। वह गले लगाना किसी अदालत के फैसले से कम नहीं था। जिस घर में अब तक रिश्तों का दरवाज़ा खून की चाबी से खुलता था, वहाँ एक 7 साल की बच्ची ने माफ़ी की उंगली से कुंडी खोल दी।

सुषमा की आँखें भर आई थीं, पर उनका अहंकार अभी पूरी तरह टूटा नहीं था।

“सब मुझे ही दोष दे रहे हैं,” उसने कहा, “जैसे मैंने इस घर के लिए कुछ किया ही नहीं।”

राघव ने गहरी साँस ली।

“आपने बहुत किया, माँ। घर बनाया, नाम संभाला, रिश्तेदार जोड़े। लेकिन आपने यह भी तय कर लिया कि इस घर में कौन पूरा इंसान है और कौन आधा। अनाया आधी नहीं है।”

सुषमा ने अनाया की ओर देखा। पहली बार वह उसे सचमुच देख रही थी—एक बच्ची, जो डरी हुई थी; एक बच्ची, जिसने गिफ्ट बैग सीने से ऐसे चिपकाया था जैसे उसमें उसका अधिकार रखा हो; एक बच्ची, जिसने धक्का खाकर भी पापा को गिफ्ट देने की इच्छा नहीं छोड़ी।

निशा ने धीरे से कहा, “माँजी, आपको मुझसे शिकायत हो सकती है। मेरी पिछली ज़िंदगी से, मेरे फैसलों से, मेरी बेटी से नहीं। उसने इस घर में आने से पहले कोई कागज़ नहीं पढ़ा था। उसे सिर्फ इतना पता था कि राघव उसे प्यार करते हैं।”

राघव ने सुषमा के सामने खड़े होकर साफ़ आवाज़ में कहा, “आज के बाद एक बात तय है। अगर अनाया इस घर में बेटी की तरह नहीं आ सकती, तो मेरे बच्चे इस घर में पोते-पोती की तरह नहीं आएँगे। आर्यन नहीं, काव्या नहीं, अनाया नहीं, और वह बच्चा भी नहीं जो आने वाला है।”

सुषमा काँप गई।

“तू मुझे अपने बच्चों से दूर करेगा?”

“नहीं,” राघव ने कहा, “आप खुद को दूर कर रही हैं।”

यह वाक्य कमरे में दीवार से टकराकर लौटता रहा। रिश्तेदारों में कोई कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर रहा था। राघव की बुआ, जो हमेशा सुषमा का पक्ष लेती थीं, इस बार चुप थीं। बिज़नेस पार्टनर ने नज़र झुका ली। मामा ने गला साफ़ किया, पर कोई शब्द नहीं निकला।

कई बार सच अदालत के कागज़ से नहीं, बच्चों की गवाही से साबित होता है। उस रात अनाया के पक्ष में 3 गवाह थे—एक पिता, एक भाई, एक बहन। और चौथा गवाह एक बूढ़ा आदमी था, जिसने देर से सही, अपनी चुप्पी तोड़ दी थी।

राघव ने केक की ओर देखा। मोमबत्तियाँ अभी तक नहीं जली थीं। मलाई की खुशबू अब ठंडी पड़ चुकी थी। उसने अनाया से पूछा, “तुम चाहो तो हम घर चलते हैं।”

अनाया ने निशा का चेहरा देखा, फिर काव्या का, फिर आर्यन का, फिर राघव का।

“केक काट लो,” उसने धीरे से कहा। “आपका जन्मदिन है।”

निशा का दिल जैसे पिघल गया। इतनी चोट खाने के बाद भी बच्ची अपने पिता का जन्मदिन बचाना चाहती थी।

काव्या ने तुरंत मोमबत्तियाँ लगाईं। आर्यन ने लाइट थोड़ी धीमी की। महेंद्र ने काँपते हाथों से माचिस जलाई। राघव ने अनाया को अपनी कुर्सी पर बिठाया, वही कुर्सी जिसे कुछ देर पहले उससे छीन लिया गया था। फिर वह खुद उसके पास खड़ा हो गया।

“पापा, विश माँगो,” अनाया ने कहा।

राघव ने 3 बच्चों को देखा। आर्यन, जिसकी आँखों में पहली बार खुली हुई नर्मी थी। काव्या, जो अनाया का हाथ पकड़े थी। अनाया, जिसकी आँखें रोने से लाल थीं, लेकिन ठुड्डी ऊँची थी। फिर उसने निशा को देखा, जिसके हाथ अनायास अपने पेट पर टिके थे।

“मेरा विश तो यहीं है,” राघव ने कहा।

उसने मोमबत्तियाँ बुझाईं। तालियाँ बजीं, मगर वह खुशी की आवाज़ नहीं थी। वह किसी पुराने अन्याय के टूटने की आवाज़ थी।

केक कटने के बाद अनाया धीरे से अपना मुड़ा हुआ कार्ड लेकर आई।

“पापा, गिफ्ट?”

राघव तुरंत उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।

“मेरे लिए इससे बड़ा गिफ्ट कुछ नहीं हो सकता।”

अनाया ने कार्ड खोला। अक्षर टेढ़े-मेढ़े थे, कुछ जगह लाल पेन फैल गया था। उसने पढ़ने की कोशिश की, फिर कार्ड राघव को दे दिया।

राघव ने पढ़ा—“मेरे पापा को, जिन्होंने मुझे साइकिल चलाना सिखाया, डर लगने पर लाइट जलाई, और मुझे चुना, जबकि मैं पहले से उनके घर में पैदा नहीं हुई थी।”

राघव के होंठ काँपे। उसने कार्ड आँखों से लगाया।

“अनाया,” उसने धीमे से कहा, “मैंने तुम्हें चुना नहीं। मैंने तुम्हें पहचाना।”

“पहचाना मतलब?”

“मतलब जैसे कोई चीज़ खोई नहीं होती, बस देर से मिलती है। तुम मेरी बेटी पहले से थीं, मुझे बस समझने में समय लगा।”

अनाया उसकी गोद में समा गई।

“अगर मैं आपकी बेटी हूँ, तो दादी मुझे क्यों नहीं मानतीं?”

यह सवाल तलवार की तरह कमरे में उतर गया। सुषमा ने पहली बार सिर उठाया। उसके चेहरे पर जवाब नहीं था। शायद पहली बार उसे समझ आया कि बच्चों के सवालों में सामाजिक बहाने नहीं चलते।

वह धीरे-धीरे आगे आई। सबने उसे देखा। राघव तन गया, जैसे फिर कोई चोट आने वाली हो। निशा ने अनाया को थोड़ा अपनी ओर खींचना चाहा, पर अनाया राघव की गोद में रही।

सुषमा ने अनाया के सामने रुककर बहुत धीमे कहा, “मैंने गलत किया।”

कमरा शांत रहा। यह माफ़ी पूरी नहीं थी, लेकिन पहली दरार थी।

अनाया ने कुछ नहीं कहा।

सुषमा की आँखों से 1 आँसू गिरा।

“मुझे लगता था कि परिवार वही होता है जो खून से जुड़ा हो। शायद मैं गलत थी। लेकिन बेटा, मुझे बदलने में समय लगेगा।”

राघव ने सख़्ती से कहा, “समय मिलेगा, माँ। लेकिन अनाया की कीमत पर नहीं। जब तक आपकी हर बात में सम्मान नहीं होगा, दूरी रहेगी।”

सुषमा ने सिर झुका दिया। उस रात उसने अनाया को गले लगाने की कोशिश नहीं की। शायद उसे अधिकार नहीं लगा। शायद हिम्मत नहीं हुई। लेकिन उसने पहली बार उसे “निशा की लड़की” नहीं कहा।

रात देर से जब परिवार हवेली से निकला, बाहर की हवा ठंडी थी। गाड़ी में आर्यन आगे बैठा, काव्या और अनाया पीछे। अनाया के हाथ में टूटा ब्रेसलेट था, जिसे आर्यन ने अपनी जेब में रखने को कहा था ताकि घर जाकर ठीक कर सके। काव्या ने अपना दुपट्टा अनाया के पैरों पर डाल दिया।

निशा ने राघव की ओर देखा। दोनों कुछ पल बोले नहीं। कुछ रातें ऐसी होती हैं जिनके बाद पति-पत्नी के बीच शब्दों की ज़रूरत नहीं बचती। सिर्फ़ साथ काफी होता है।

गाड़ी चल पड़ी। हवेली पीछे छूटने लगी।

कुछ दूर जाकर अनाया ने धीमे से पूछा, “पापा?”

“हाँ, मेरी जान?”

“अगर फिर कोई बोले कि मैं आपकी असली बेटी नहीं हूँ, तो आप फिर बोलोगे?”

राघव ने शीशे में उसकी आँखें देखीं।

“मैं 1000 बार बोलूँगा।”

आर्यन ने तुरंत कहा, “और मैं उससे बहस करूँगा।”

काव्या बोली, “और मैं उसकी प्लेट से गुलाब जामुन उठा लूँगी।”

अनाया हँस पड़ी। वह हँसी छोटी थी, अभी भी आँसुओं से भीगी हुई, लेकिन उसमें डर कम और भरोसा ज़्यादा था।

निशा ने खिड़की के बाहर देखा। जयपुर की सड़कों पर रात की पीली रोशनी फैल रही थी। उसे लगा, आज उसकी बेटी ने सिर्फ़ जन्मदिन की मेज़ पर अपनी जगह वापस नहीं पाई। उसने एक परिवार को मजबूर कर दिया कि वे आईने में खुद को देखें।

आने वाले महीनों में सब कुछ जादू की तरह ठीक नहीं हुआ। सुषमा को सच में बदलने में समय लगा। कई बार वह पुराने शब्दों की तरफ़ लौटती, फिर राघव की आँखें देखकर रुक जाती। उसने अनाया के स्कूल फंक्शन में पहली बार सचमुच ताली बजाई। राखी पर उसने आर्यन और काव्या के साथ अनाया के लिए भी वही चाँदी का सिक्का खरीदा। और जब निशा ने बच्चे को जन्म दिया, सुषमा अस्पताल आई तो सबसे पहले नवजात को नहीं, अनाया को देखा।

“दीदी बनी हो,” उसने धीमे से कहा।

अनाया ने थोड़ी देर सोचा, फिर कहा, “मैं पहले से बहन थी।”

सुषमा की आँखें झुक गईं।

“हाँ,” उसने स्वीकार किया, “तुम पहले से थीं।”

कई साल बाद भी मल्होत्रा परिवार में उस जन्मदिन की चर्चा होती रही। कुछ रिश्तेदार उसे बदनामी कहते, कुछ नाटक, कुछ सुषमा का अपमान। लेकिन निशा उसे अलग तरह से याद करती थी।

वह याद करती थी एक छोटी बच्ची, जिसे एक कुर्सी से उठाया गया था क्योंकि किसी ने समझा कि प्यार वंशावली से छोटा होता है। वह याद करती थी वही बच्ची, जो कुछ देर बाद उसी मेज़ पर सिर ऊँचा करके बैठी थी। वह याद करती थी अदालत के कागज़, टूटे हुए मोती, महेंद्र के घुटने, आर्यन की मुट्ठी, काव्या का हाथ, और राघव की वह आवाज़ जिसने पूरे घर को बता दिया था कि पिता होना जन्म का अहंकार नहीं, निभाने का साहस है।

और सबसे ज़्यादा, वह अनाया की हँसी याद करती थी।

क्योंकि उस रात किसी ने उसे जगह नहीं दी थी।

सबको बस मानना पड़ा था कि वह जगह हमेशा से उसी की थी।

Disclaimer : This content may be created by AI for entertainment purposes. Any resemblance to real persons, events, or places is coincidental.